मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने तलाक के एक मामले में बड़ा फैसला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि एक हिंदू पत्नी द्वारा अपनी 'थाली' (मंगलसूत्र) को हटाना पति के प्रति 'मानसिक क्रूरता' की श्रेणी में आता है। इसी के साथ जस्टिस पी. वड़ामलई की पीठ ने 30 वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे एक दंपति के मामले में पति को दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने पत्नी द्वारा तलाक के खिलाफ दायर की गई अपील को खारिज कर दिया। तलाक को 2017 में एक निचली अदालत ने मंजूरी दी थी और 2019 में उस फैसले को बरकरार रखा गया था। बता दें कि 'थाली' मुख्य रूप से दक्षिण भारत में मंगलसूत्र को कहा जाने वाला नाम है। यह एक पारंपरिक और पवित्र वैवाहिक आभूषण होता है।
क्या है पूरा मामला?
इस दंपति की शादी 30 अगस्त 1977 को हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार हुई थी। भारतीय सेना में कार्यरत पति ने क्रूरता, परित्याग और लंबे समय तक एक-दूसरे से अलग रहने के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी।
पति का कहना था कि पत्नी:
उस पर लगातार दूसरी महिलाओं के साथ संबंध होने का आरोप लगाती थी।
उसकी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत पत्र भेजती थी।
उसने अपना थाली (मंगलसूत्र) उतार दिया था।
गहने पहनना बंद कर दिया था।
ईसाई धर्म अपना लिया था।
पति ने अदालत से कहा कि इन सभी कारणों से उसे मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं।
पत्नी का बचाव और प्रत्यारोप:
पत्नी ने पति के दावों को खारिज करते हुए अपनी ओर से गंभीर आरोप लगाए। उसने दावा किया कि असल में पति के ही अन्य महिलाओं के साथ संबंध थे। उसने आरोप लगाया कि पति ने एक बार उसे और उनके बच्चों को घर के अंदर बंद करके आग लगा दी थी। पत्नी ने यह भी दावा किया कि पति ने उसका दाहिना अंगूठा काट दिया था, जिसके चलते पति पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ और उसे दोषी भी ठहराया गया था।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि पत्नी ने साक्ष्य के दौरान खुद यह स्वीकार किया था कि उसने मंगलसूत्र उतार दिया था और वह सोने के आभूषण नहीं पहनती थी। मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू वैवाहिक जीवन में 'थाली' का अत्यधिक महत्व है। कोर्ट ने पुराने फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि मंगलसूत्र वैवाहिक जीवन के निरंतर चलने का एक पवित्र प्रतीक है और इसे सामान्यतः केवल पति की मृत्यु के बाद ही निकाला जाता है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा: "यह न्यायालय मानता है कि थाली को हटाना मानसिक क्रूरता को दर्शाता है।
सेना के अधिकारियों को शिकायत भेजना भी बना मुद्दा
"अदालत ने पाया कि पत्नी ने गवाही में यह भी कबूल किया था कि उसने पति के सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखकर उसके अवैध संबंधों की शिकायत की थी। अदालत ने टिप्पणी की, "यह बिल्कुल स्पष्ट है कि पत्नी ने स्वीकार किया है कि उसने पति के कथित अवैध संपर्कों के बारे में सेना के उच्च अधिकारियों से शिकायत की थी।" अदालत के अनुसार, इस प्रकार के कृत्य भी पति के लिए मानसिक प्रताड़ना का कारण बनते हैं। इन्हीं सभी तथ्यों और सबूतों को आधार मानते हुए, मद्रास हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दिए गए तलाक के फैसले को सही ठहराया और पत्नी की अपील को खारिज कर दिया।"
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पति-पत्नी करीब 30 वर्षों से अधिक समय से अलग-अलग रह रहे थे और उनके वैवाहिक संबंध व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुके थे। ऐसे में निचली अदालत द्वारा दिया गया तलाक का आदेश उचित था। मद्रास हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए तलाक की डिक्री को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि मामले के तथ्यों, लंबे अलगाव, सेना के अधिकारियों को भेजी गई शिकायतों और पत्नी द्वारा थाली हटाने जैसी परिस्थितियों को देखते हुए पति द्वारा लगाए गए मानसिक क्रूरता के आरोप साबित होते हैं।
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