उत्तर प्रदेश में बढ़ते बाल विवाह के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पुलिस की लापरवाही और निष्क्रियता के कारण प्रदेश में बाल विवाह जैसी गंभीर सामाजिक समस्या पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया, जिसमें पुलिस ने ‘ बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 ’ के तहत कार्रवाई की हो। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने डीजीपी को जरूरी गाइडलाइंस और सर्कुलर जारी करने के निर्देश दिए हैं।
 

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस अजय कुमार-ई की बेंच एक नाबालिग लड़की के अपहरण के आरोप में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामले की समीक्षा के दौरान अदालत ने बाल विवाह से जुड़े पहलुओं पर गंभीर चिंता जाहिर की।

कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006’ के तहत समय रहते कार्रवाई करती, तो ऐसे मामलों में कमी लाई जा सकती थी।
 

याचिका में क्या कहा गया

याचिका में बताया गया कि नाबालिग लड़की ने आजाद अंसारी से अपनी मर्जी से शादी की है और वह बिना किसी दबाव के उसके साथ रह रही है। हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रिकॉर्ड और तथ्यों की समीक्षा के बाद पाया कि इस मामले में आजाद अंसारी और उसके सहयोगी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

अदालत ने संकेत दिया कि कानून के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है।

नहीं हो रही कार्रवाई

कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह करवाने वालों के खिलाफ ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006’ की धारा 10 और 11 के तहत कार्रवाई नहीं हो रही है। यही वजह है कि ऐसे मामलों में वृद्धि देखने को मिल रही है।

अदालत ने यह भी कहा कि कई संगठन या संबंधित लोग बाल विवाह कराने के दौरान बच्चियों के आधार कार्ड या हलफनामे का सहारा लेते हैं, जबकि आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि उम्र का वैध कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।
 

DGP को जारी करने होंगे दिशा-निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया है कि बाल विवाह रोकने और संबंधित मामलों में प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए जरूरी गाइडलाइंस और सर्कुलर जारी किए जाएं। कोर्ट का मानना है कि पुलिस स्तर पर स्पष्ट निर्देश और जवाबदेही तय होने से इस सामाजिक बुराई पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।

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