मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तलाक-ए-हसन प्रथा को असंवैधानिक घोषित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर आज यानी 19 मई को सुनवाई होगी।  कई मुस्लिम महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए कहा है कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक-ए-हसन को तलाक का एक मान्य तरीका माना जाता है। इस प्रक्रिया में शौहर अपनी बीवी को लगातार तीन महीनों तक हर महीने एक बार तलाक बोलकर, लिखकर या डिजिटल माध्यम से संदेश भेजकर निकाह खत्म कर सकता है। हर बार तलाक कहने के बाद एक महीने की अवधि दी जाती है ताकि शौहर-बीवी के बीच सुलह की संभावना बनी रहे। अगर इस दौरान दोनों के बीच समझौता हो जाता है या वैवाहिक संबंध सामान्य हो जाते हैं, तो तलाक की प्रक्रिया रुक जाती है। लेकिन अगर तीन महीने तक लगातार तलाक कहा जाता है और सुलह नहीं होती, तो विवाह पूरी तरह समाप्त माना जाता है।

याचिकाकर्ता महिलाओं का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह एकतरफा है क्योंकि इसमें औरत की सहमति या इच्छा की कोई भूमिका नहीं होती। उनका तर्क है कि यह प्रथा भारतीय संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है। आर्टिकल 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, आर्टिकल 15 धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है, जबकि आर्टिकल 21 सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करता है। महिलाओं का कहना है कि तलाक-ए-हसन मर्दों को एकतरफा अधिकार देता है और महिलाओं को कमजोर स्थिति में ला देता है।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट सुना चुका है बड़ा फैसला

गौरतलब है कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई ऐतिहासिक फैसले दे चुका है। साल 2017 में अदालत ने एक साथ तीन बार तलाक बोलकर शादी खत्म करने वाली प्रथा ‘तलाक-ए-बिद्दत’ यानी तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने 2019 में कानून बनाकर इसे दंडनीय अपराध बना दिया। इससे पहले 1985 के चर्चित शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद गुजारा भत्ता पाने का अधिकार दिया था।

क्या है तलाक-ए-हसन?

तलाक-ए-हसन और तीन तलाक के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि तीन तलाक में एक ही बार में शादी खत्म हो जाती थी, जबकि तलाक-ए-हसन में तीन महीने का समय और समझौते की संभावना रहती है। लेकिन, आलोचकों का कहना है कि यह भी मर्दों के पक्ष में झुका हुआ और एकतरफा सिस्टम है। 

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