पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एनआरआई परिवार की जमीन पर कथित कब्जे के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करने के आरोपी को बड़ा झटका देते हुए उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से साफ इनकार कर दिया।
जस्टिस सुमीत गोयल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के तुरंत बाद बिना परिस्थितियों में किसी ठोस बदलाव के एफआईआर रद्द कराने की मांग करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने इसे “हिट एंड ट्राई स्ट्रैटेजम” और “सेकेंड बाइट एट द एप्पल” करार देते हुए याचिका खारिज कर दी तथा याचिकाकर्ता पर 5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
मामला एक एनआरआई परिवार की लगभग 54 बीघा जमीन से जुड़ा है। आरोपी ने दावा किया था कि शिकायतकर्ता के पिता ने यह जमीन उसे बेचने पर सहमति दी थी और उसने 28 लाख रुपये बतौर बयाना भी दिया था। लेकिन जांच में आरोप लगा कि जमीन हड़पने के लिए दस्तावेजों में हेराफेरी की गई।
अग्रिम जमानत हो चुकी है रद्द
आरोपी पहले अग्रिम जमानत पाने में हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक असफल रहा। इसके बाद उसने एफआईआर रद्द कराने की याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब अदालत पहले ही अग्रिम जमानत पर विचार करते हुए प्रथमदृष्टया मामले की गंभीरता देख चुकी है, तब उसी तथ्यात्मक स्थिति में सीधे एफआईआर रद्द कराने की मांग न्यायिक तर्क और प्रक्रिया दोनों के विपरीत है।
अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी से संरक्षण जैसी सीमित राहत पाने में विफल रहता है तो उसी आधार पर उससे कहीं बड़ी राहतपूरी एफआईआर समाप्त कराने की मांग एक “कानूनी विरोधाभास” है।
अदालत ने की सख्त टिप्पणी
जस्टिस गोयल ने कहा कि एफआईआर रद्द करना असाधारण राहत है, जिसका उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाता है जहां आरोप प्रथमदृष्टया कोई संज्ञेय अपराध ही न बनाते हों या जांच स्पष्ट रूप से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो। अदालत ने दो टूक कहा कि जो व्यक्ति जानबूझकर जांच से बचता रहा हो, वह समानांतर रूप से अदालत से अपने पक्ष में मेरिट पर फैसला नहीं मांग सकता।
हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करना न्यायिक अंतिमता की पवित्रता को कमजोर करेगा और असंतुष्ट पक्षकारों को बार-बार अलग-अलग कानूनी रास्तों से वही राहत पाने की छूट देगा। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति न्यायिक अराजकता को जन्म दे सकती है। जुर्माने की राशि चार सप्ताह के भीतर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के पास जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।
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