भारतीय चुनावी प्रक्रिया को दुनिया की सबसे भरोसेमंद व्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन समय-समय पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम को लेकर उठते सवाल इस भरोसे को चुनौती भी देते रहे हैं। अब पहली बार ऐसा हुआ है जब कोर्ट ने सीधे तौर पर ईवीएम की तकनीकी जांच का रास्ता खोल दिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक सीट या एक उम्मीदवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे चुनावी सिस्टम की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर एक बड़ी बहस को जन्म देता है। यह कदम बताता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने की जगह अभी भी जिंदा है और संस्थाएं जवाबदेही तय करने के लिए तैयार हैं।

की चांदीवली विधानसभा सीट से जुड़ा यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। कांग्रेस नेता नसीम खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने ईवीएम की जांच की अनुमति दी है, जो 16 और 17 अप्रैल को होगी।

बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस सोमशेखर सुंदरेसन ने इस मामले में सुनवाई करते हुए ईवीएम के निरीक्षण का आदेश दिया। यह आदेश 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में चांदीवली सीट पर इस्तेमाल हुई मशीनों के संदर्भ में दिया गया है। याचिकाकर्ता नसीम खान ने ईवीएम के साथ कथित छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। हालांकि कोर्ट ने उनके भ्रष्ट चुनावी आचरण से जुड़े अन्य आरोपों को खारिज कर दिया।

इस फैसले के बाद राज्य चुनाव आयोग ने सभी संबंधित उम्मीदवारों को सूचित किया है कि ईवीएम की जांच दो दिन तक चलेगी। यह जांच भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा की जाएगी, जो इन मशीनों का निर्माता है। जांच प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ता के विशेषज्ञ और चुनाव अधिकारी भी मौजूद रहेंगे, इससे पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

चुनाव नतीजे और विवाद की जड़

चांदीवली सीट पर हुए चुनाव में शिवसेना के दिलीप भाऊसाहेब लांडे को 1,24,641 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के नसीम खान को 1,04,016 वोट मिले। इस हार के बाद नसीम खान ने परिणाम को चुनौती दी और ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।

हा, यह भारतीय चुनावी इतिहास में पहली बार है जब किसी हाईकोर्ट ने ईवीएम की तकनीकी जांच की अनुमति दी है। इससे पहले ईवीएम को लेकर कई याचिकाएं दाखिल हुईं, लेकिन इस तरह की प्रत्यक्ष जांच का आदेश नहीं दिया गया था। यह फैसला न्यायपालिका की सक्रियता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

जांच की प्रक्रिया कैसे होगी?

ईवीएम की जांच 16 और 17 अप्रैल को निर्धारित की गई है। इसमें मशीनों की डायग्नोस्टिक जांच होगी, जिसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के विशेषज्ञ करेंगे। इस दौरान याचिकाकर्ता के प्रतिनिधि और चुनाव अधिकारी भी मौजूद रहेंगे, ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।

इस फैसले का आगे क्या असर हो सकता है?

इस आदेश के बाद भविष्य में अन्य चुनावी मामलों में भी ईवीएम जांच की मांग बढ़ सकती है। इससे चुनाव आयोग पर पारदर्शिता बढ़ाने का दबाव आएगा और राजनीतिक दलों को भी अपने आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश करने होंगे। यह फैसला चुनावी सुधारों की दिशा में एक नई बहस को जन्म दे सकता है।

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