"केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से जनहित याचिकाओं (PIL) के ढांचे की समीक्षा करने और इसे पूरी तरह से समाप्त करने का आग्रह किया है। सरकार का तर्क है कि जिस उद्देश्य से जनहित याचिका की शुरुआत की गई थी, वह अब काफी हद तक पूरा हो चुका है और वर्तमान में इसका दुरुपयोग अधिक हो रहा है। यह महत्वपूर्ण दलील सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष दी।"
जनहित याचिका (PIL) क्या है और इसकी शुरुआत क्यों हुई थी?
"जनहित याचिका की व्यवस्था मुख्य रूप से उन लोगों के लिए शुरू की गई थी जो सामाजिक या आर्थिक रूप से कमजोर थे। इसका लक्ष्य यह था कि जो लोग गरीबी, अशिक्षा, विकलांगता या सामाजिक बहिष्कार के कारण खुद अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते, उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कोई तीसरा व्यक्ति या संस्था उनकी ओर से अदालत में याचिका दायर कर सके। जैसे बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ मामला।"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की प्रमुख दलीलें
सॉलिसिटर जनरल ने अपने लिखित और मौखिक बयानों में कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए। उन्होंने कहा कि पिछले 5 दशकों में वह स्थिति काफी बदल गई है जिसके कारण PIL की जरूरत थी। अब समय आ गया है कि PIL में सिर्फ सुधार न किया जाए, बल्कि इसे पूरी तरह से हटा दिया जाए। उन्होंने कहा कि आज के समय में न्याय प्रणाली अधिक सुलभ और पारदर्शी हो गई है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DALSA) जैसे संस्थान मौजूद हैं, जो जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सलाह और सहायता देते हैं। ई-फाइलिंग के जरिए अब अदालत तक पहुंचना बहुत आसान हो गया है; यहां तक कि एक पत्र भी सीधे अदालत पहुंच सकता है। इसलिए अब किसी 'तीसरे पक्ष' द्वारा प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं है।"
"SG मेहता ने जोर देकर कहा कि आजकल दायर होने वाली ज्यादातर जनहित याचिकाएं प्रेरित होती हैं। पर्दे के पीछे से कोई और इन्हें नियंत्रित करता है, इसलिए ऐसी याचिकाओं पर विचार ही क्यों किया जाना चाहिए।"
मौजूदा मामला: धार्मिक अधिकारों पर सवाल
"सुप्रीम कोर्ट की यह 9 जजों की पीठ सबरीमाला मामले के पुनर्विचार से उपजे एक रेफरेंस की सुनवाई कर रही है। अदालत के सामने एक अहम सवाल यह भी है कि: क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी विशेष धार्मिक समूह का हिस्सा नहीं है, वह जनहित याचिका (PIL) के जरिए उस धर्म की प्रथाओं को चुनौती दे सकता है? इस पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।"
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की प्रतिक्रिया
"सॉलिसिटर जनरल की चिंताओं का जवाब देते हुए CJI सूर्यकांत ने सहमति व्यक्त की कि अदालतें अब जनहित याचिकाओं को लेकर बहुत अधिक सतर्क हो गई हैं, खासकर तब जब लोग अलग-अलग एजेंडे लेकर आते हैं।"
"CJI ने स्पष्ट किया कि अदालतें अब PIL स्वीकार करने से पहले बहुत सावधानी बरतती हैं और इसके पीछे के असली कारण की बारीकी से जांच करती हैं। सीजेआई ने कहा कि यदि आप कोर्ट नंबर 1 की कार्यवाही देखें, तो पाएंगे कि केवल उन्हीं याचिकाओं में नोटिस जारी किए जाते हैं जिनमें कोई वास्तविक दम या ठोस आधार होता है। CJI ने कहा कि साल 2006 से लेकर अब 2026 तक के इन दो दशकों में स्थिति काफी बदल गई है। अंत में CJI ने टिप्पणी की कि अदालतों द्वारा पहले से ही बरती जा रही इस सतर्कता को देखते हुए, शायद जनहित याचिका (PIL) के सामान्य सिद्धांत पर सरकार की दलीलें सुनने की आवश्यकता ही न पड़े।"
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