हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दवाओं की गुणवत्ता को लेकर स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी की निर्मित दवा के मानक स्तर का न होने पर कंपनी के सभी निदेशकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही तब तक नहीं चलाई जा सकती, जब तक कि उनके खिलाफ विशिष्ट आरोप न हों। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने हेल्थ बायोटेक लिमिटेड के निदेशक परमजीत अरोड़ा और एक अन्य की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ मंडी की अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत और समन आदेशों को रद्द कर दिया है।

यह मामला सितंबर 2021 का है, जब ड्रग इंस्पेक्टर (मंडी) ने लिग्नोकेन और एड्रेनालिन इंजेक्शन के नमूने लिए थे। चंडीगढ़ स्थित सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट में यह दवा मानकों पर खरी नहीं पाई गई। इसके बाद विभाग ने दवा निर्माता कंपनी हेल्थ बायोटेक लिमिटेड और उसके निदेशकों के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 18(ए)(i) और 27(डी) के तहत मुकदमा दर्ज किया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि कंपनी ने मैन्युफैक्चरिंग (उत्पादन) कार्यों के लिए एक तकनीकी निदेशक नियुक्त किया है, जो जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में नामित है।याचिकाकर्ता केवल कंपनी के वित्तीय और प्रबंधन कार्यों को देखते है, न कि दवाओं के दैनिक निर्माण की प्रक्रिया को। शिकायत में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया कि इन निदेशकों की दवा निर्माण में क्या विशिष्ट भूमिका थी।

कोर्ट ने पाया कि शिकायत में इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि याचिकाकर्ता कंपनी के दैनिक कामकाज या दवा निर्माण के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 34 के तहत केवल उन्हीं व्यक्तियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जो अपराध के समय व्यवसाय के संचालन के प्रभारी थे। यदि इन निदेशकों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखी जाती है, तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, क्योंकि उनके खिलाफ दोष साबित होने की कोई संभावना नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ मंडी की अदालत में चल रही कार्यवाही और जारी किए गए समन को पूरी तरह रद्द कर दिया है और उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया है 

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