सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की बेंच ने मंगलवार को छोटे दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा पर याचिका को निर्णय के लिए बड़ी बेंच को भेजा जाए या नहीं इस पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति कौल की अध्यक्षता वाली संविधान बेंच इस बात पर विचार कर रही थी कि क्या कई देशों में फैले 10 लाख से कम लोगों के शिया मुस्लिम समुदाय को अपने असंतुष्ट सदस्यों को बहिष्कृत करने का अधिकार है। जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जे. के माहेश्वरी की बेंच ने कहा कि तथ्य यह है कि यह मामला 1986 से लंबित है, जो हमें परेशान करता है। हमारे सामने विकल्प है कि इस पर फैसला सुना दें या इसे नौ-न्यायाधीशों की बेंच को भेजें।
सॉलिसिटर जनरल की दलील, पांच जजों की बेंच नहीं कर सकती सुनवाई
शुरुआत में केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि दाऊदी बोहरा के बहिष्कार के फैसले पर पुनर्विचार पांच-न्यायाधीशों की बेंच द्वारा नहीं सुनाया जा सकता है, क्योंकि पहले भी इतने ही जजों की बेंच ने फैसला दिया था। एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन ने सुझाव दिया कि मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए। बेंच को पहले बताया गया था कि Bombay Prevention of Ex-Communication Act, 1949 को निरस्त कर दिया गया है और The Maharashtra Protection of People from Social Boycott (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2016 लागू हो गया है।
2016 के अधिनियम की धारा 3 में समुदाय के एक सदस्य के 16 प्रकार के सामाजिक बहिष्कार का जिक्र है और धारा 4 में कहा गया है कि सामाजिक बहिष्कार निषिद्ध है और यह एक अपराध होगा। 2016 के अधिनियम में उल्लिखित 16 प्रकारों में से एक समुदाय के एक सदस्य के निष्कासन से संबंधित है। 2016 के अधिनियम में कहा गया है कि अपराध के दोषी व्यक्ति को कारावास, जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है, या 1 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है, या दोनों सजा मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के 1962 के फैसले ने इस समुदाय के सदस्यों के बहिष्कृत करने के अधिकारों की रक्षा की थी। बाद में 1986 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई जिसमें 1962 में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार और खारिज करने की मांग की गई थी।
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