सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकार द्वारा 10 फीसदी आरक्षण देने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ याचिका दायर की गई है. यूथ फॉर इक्वलिटी नाम के एक संगठन ने यह याचिका दायर की है. इस संगठन ने अपनी याचिका में यह दावा किया है कि यह संशोधन संविधान की मूल भावना का उल्लंघन करता है.यूथ फॉर इक्वालिटी नाम के एनजीओ ने याचिका में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय की गई है. उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से आरक्षण देना गलत है और ये सिर्फ सामान्य श्रेणी के लोगों को नहीं दिया जा सकता है.
याचिका में कहा गया है कि गैर-अनुदान प्राप्त संस्थाओं को आरक्षण की श्रेणी में रखना गलत है. याचिका में अपील की गई है कि इस बिल को गैर संवैधानिक घोषित किया जाए. इसमें कहा गया है कि ये फैसला वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए किया गया है.
यूथ फॉर इक्वलिटी ने दायर याचिका में इस मुद्दे पर तत्काल सुनवाई की मांग की है और आर्थिक आधार पर नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिये जाने वाले इस संशोधन पर स्टे लगाने की मांग की है.
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी नहीं हुई है. माना जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय में इस पर अगले हफ़्ते सुनवाई हो सकती है.
याचिका में दावा किया गया है, "यह संविधान संशोधन पूरी तरह से उस संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन करता है जिसके तहत इंदिरा साहनी केस में नौ जजों ने कहा था कि आरक्षण का एकमात्र आधार आर्थिक स्थिति नहीं हो सकती. इस तरह यह संशोधन कमज़ोर है और इसे निरस्त किए जाने की ज़रूरत है क्योंकि यह केवल उस फ़ैसले को नकारता है."
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