बीमा अधिनियम, 19381
(1938 का अधिनियम संख्यांक 4)
[26 फरवरी, 1938]
बीमा कारबार से संबंधित विधि का समेकन और
संशोधन करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि बीमा कारबार से संबंधित विधि का समेकन और संशोधन किया जाए, अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
भाग 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बीमा अधिनियम, 1938 है ।
2[(2) इसका विस्तार 3॥। सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह उस तारीख4 को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो-
5[(1) “बीमांकक" से बीमांकक अधिनियम, 2006 (2006 का 35) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (क) में यथापरिभाषित कोई बीमांकक अभिप्रेत है;
(1क) “प्राधिकरण" से बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है;]
6[(2) “पालिसीधारी" के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जिसे पालिसीधारी का वह पूर्ण हित, जो उसका उस पालिसी में है, सदा के लिए समुदिष्ट कर दिया गया है, किन्तु इसके अन्तर्गत उसका ऐसा समनुदेशिती नहीं है जिसका पालिसी में हित विफल किया जा सकता है या तत्समय किसी शर्त के अधीन है;]
7[(3) “अनुमोदित प्रतिभूतियां" से निम्नलिखित अभिप्रेत हैः-
(i) सरकारी प्रतिभूतियां और अन्य प्रतिभूतियां, जो केन्द्रीय सरकार के या किसी 8॥। राज्य की सरकार के राजस्वों पर भारित हैं अथवा जिनके मूलधन और ब्याज की केन्द्रीय सरकार या किसी 8॥। राज्य की सरकार ने पूर्णतः गारण्टी दी है;
- यह अधिनियम 1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा, उपांतरण सहित गोवा, दमण और दीव के संबंध में विस्तारित किया गया ।
- यह अधिनियम 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली पर; 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा (1-10-1963 से) पाण्डिचेरी पर; 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा (1-10-1967 से) सम्पूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर; और अधिसूचना सं० का० आ० 274(अ०), दिनांक 24-6-1975 द्वारा (1-7-1975 से) सिक्किम राज्य पर लागू होने के संबंध में विस्तारित किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 2 द्वारा (1-6-1950 से) प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय" शब्दों का लोप किया गया ।
- 1 जुलाई, 1939, देखिए अधिसूचना सं० 589, आई (4)/38, तारीख 1 अप्रैल, 1939, भारत का राजपत्र, 1939, भाग 1, पृष्ठ 631.
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 2 द्वारा खंड (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 3 द्वारा (1-6-1950 से) पूर्ववर्ती खण्ड के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा भाग क" शब्दों का लोप किया गया ।
(ii) धनराशि के लिए डिबेन्चर या अन्य प्रतिभूतियां, जो पत्तन न्यास या नगर निगम या किसी प्रेसिडेंसी नगर में नगर सुधार न्यास द्वारा या उसकी ओर से किसी केन्द्रीय अधिनियम या राज्य विधान-मण्डल के अधिनियम के प्राधिकार के अधीन निर्गमित की गई है;
(iii) विधि द्वारा स्थापित निगम के शेयर, जिनके मूलधन के प्रतिदाय तथा लाभांश की अदायगी के बारे में केन्द्रीय सरकार या 8॥। राज्य की सरकार ने पूर्णतः गारण्टी दी है;]
(iv) ऐसी प्रतिभूतियां जो किसी भाग ‘ख’ राज्य की सरकार द्वारा निर्गमित की गई हैं या जिनके मूलधन और ब्याज की उसके द्वारा पूर्णतः गारण्टी दी गई है तथा जिन्हें केन्द्रीय सरकार ने, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित प्रतिभूतियों के रूप में विनिर्दिष्ट किया है; और
1। । । ।
2[स्पष्टीकरण-उपखण्ड (i) और (iii) में 1956 की पहली नवम्बर के पूर्व की किसी अवधि के सम्बन्ध में राज्य की सरकार" से भाग क" राज्य की सरकार अभिप्रेत है;]
3[(4) लेखापरीक्षक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो कम्पनियों के लेखापरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए चार्टर्ड अकाउण्टेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) के अधीन अर्हित है;]
4[(4क) बैंककारी कम्पनी" तथा कम्पनी" के वही अर्थ होंगे जो बैंककारी कम्पनी अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) और (घ) में हैं;]
(5) 5[किसी बीमाकर्ता या भाग 3 में यथापरिभाषित क्षेमदा सोसाइटी] द्वारा या उसकी ओर से दी जाने के लिए अपेक्षित किसी दस्तावेज की किसी प्रतिलिपि या उसके अनुवाद के सम्बन्ध में, प्रमाणित" से 6[ऐसे बीमाकर्ता या क्षेमदा सोसाइटी] के प्रधान अधिकारी द्वारा, यथास्थिति, प्रमाणित सही प्रतिलिपि या सही अनुवाद अभिप्रेत है;
7। । । ।
8[(5ख) “बीमा नियंत्रक" से ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार ने इस अधिनियम या जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) या साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) अथवा बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के अधीन प्राधिकरण को सभी शक्तियों का प्रयोग, उसके कृत्यों का निर्वहन औऱ कर्तव्यों का पालन करने के लिए धारा 2ख के अधीन नियुक्त किया है;]
(6) “न्यायालय" से जिले का आरम्भिक अधिकारिता वाला प्रधान सिविल न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अपनी मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करने वाला उच्च न्यायालय भी है;
4[(6क) “अग्नि बीमा कारबार" से अग्नि से या उसके आनुषंगिक रूप से या ऐसी अन्य घटना से, जिसका समावेश अग्नि बीमा पालिसियों में रूढितः सम्मिलित होने वाली या उसकी आनुषंगिक जोखिमों में होता है, हानि के विरुद्ध बीमा की ऐसी संविदाएं करने का कारबार अभिप्रेत है, जो बीमा कारबार के किसी अन्य वर्ग की आनुषंगिक नहीं है;
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 2 द्वारा (23-9-2002 से) लोप किया गया ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 3 द्वारा (1-6-1950 से) पूर्ववर्ती खण्ड के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 3 द्वारा (1-6-1950 से) अन्तःस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 2 द्वारा किसी बीमाकर्ता" के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 2 द्वारा बीमाकर्ता" के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
(6ख) “साधारण बीमा कारबार" से अग्नि, समुद्री या प्रकीर्ण बीमा कारबार अभिप्रेत है, चाहे वह अकेले किया जाता हो या इनमें से एक या अधिक के साथ;]
1[(6ग) “स्वास्थ्य बीमा कारबार" से उन संविदाओं को प्रभावी करना अभिप्रेत है, जो रुग्णता फायदे या चिकित्सा, शल्यचिकित्सा या अस्पताल खर्चे संबंधी, चाहे आंतरिक रोगी या बाह्य रोगी, फायदे, यात्रा रक्षावरण और व्यक्तिगत दुर्घटनावरण उपलब्ध कराते हैं;]
3[(7) “सरकारी प्रतिभूति" से लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) में परिभाषित सरकारी प्रतिभूति अभिप्रेत है;]
2[(7क) भारतीय बीमा कंपनी" से कोई बीमाकर्ता अभिप्रेत है, जो ऐसी कंपनी है, जो शेयरों द्वारा सीमित है, और, -
(क) जिसे कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) के अधीन किसी पब्लिक कंपनी के रूप में बनाया और रजिस्ट्रीकृत किया गया है या बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ के एक वर्ष के भीतर ऐसी कंपनी में संपरिवर्तित किया गया है;
(ख) जिसमें विदेशी विनिधानकर्ताओं द्वारा, जिनके अन्तर्गत पोर्टफोलियो विनिधानकर्ता भी हैं, साधारण शेयरों की कुल धृतियां ऐसी भारतीय बीमा कंपनी की, ऐसी रीति में, जो विहित की जाएं, भारतीय के स्वामित्वाधीन और नियंत्रणाधीन है, समादत्त साधारण पूंजी के उनचास प्रतिशत से अधिक नहीं है ।
स्पष्टीकरण-इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए “नियंत्रण" पद के अन्तर्गत अधिकांश निदेशकों को नियुक्त करने अथवा प्रबंधन या नीति विषयक विनिश्चयों, जिसके अंतर्गत उनकी शेयरधारिता या प्रबंधन अधिकार या शेयरधारकों के करार या मत देने के करार भी हैं, को नियंत्रित करने का अधिकार भी है;]
(ग) जिसका एकमात्र प्रयोजन जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार या पुनर्बीमा कारबार या स्वास्थ्य बीमा कारबार करना है;
3। । । ।
4[(8क) बीमा सहकारी सोसाइटी" से ऐसा कोई बीमाकर्ता अभिप्रेत है जो ऐसी सहकारी सोसाइटी है, -
(क) जो बीमा (संशोधन) अधिनियम, 2002 (2002 का 42) के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) के अधीन या किसी राज्य में सहकारी सोसाइटियों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन या बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 (1984 का 51) के अधीन, सहकारी सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत है;
5[(ख) जीवन बीमा कारबार, साधारण बीमा कारबार या स्वास्थ्य बीमा कारबार की दशा में जिनके पास एक सौ करोड़ रुपए की न्यूनतम समादत्त पूंजी है;]
(ग) जिसमें ऐसा कोई निगम निकाय, चाहे वह निगमित हो या नहीं, जो भारत के बाहर बनाया गया है या रजिस्ट्रीकृत है या तो स्वयं के द्वारा या उसकी सहायिकियों या नामनिर्देशितियों के माध्यम से, किसी भी समय, ऐसी सहकारी सोसाइटी की पूंजी की छब्बीस प्रतिशत से अधिक पूंजी धारित नहीं करता है; और
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा लोप किया गया ।
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 2 द्वारा (23-9-2002 से) अन्तःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(घ) जिसका एकमात्र प्रयोजन भारत में जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार 3[या स्वास्थ्य बीमा कारबार] करना है,]
3[(9) “बीमाकर्ता" से, -
(क) कोई भारतीय बीमा कंपनी, या
(ख) बीमा कारबार करने के लिए संसद् के किसी अधिनियम द्वारा स्थापित कोई कानूनी निकाय, या
(ग) कोई बीमा सहकारी सोसाइटी, या
(घ) भारत में स्थापित शाखा के माध्यम से पुनर्बीमा कारबार में लगी कोई विदेशी कंपनी,
अभिप्रेत है ।
स्पष्टीकरण-इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए, “विदेशी कंपनी" पद से भारत के बाहर किसी देश की विधि के अधीन स्थापित या निगमित कोई कंपनी या निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत लॉयड अधिनियम, 1871 (यूनाइटेड किंगडम) के अधीन स्थापित लॉयड सोसाइटी और उसका कोई सदस्य भी है;]
(10) “बीमा अभिकर्ता" से 1॥। ऐसा बीमा अभिकर्ता अभिप्रेत है जो 1॥। बीमा कारबार की, 2[जिसके अन्तर्गत बीमा पालिसियों को चालू रखने, उनके नवीकरण या उन्हें पुनः परिवर्तित करने से संबंधित कारबार भी है,] याचना करने या उसे अभिप्राप्त करने के प्रतिफलस्वरूप कमीशन या अन्य पारिश्रमिक के रूप में संदाय प्राप्त करता है या प्राप्त करने का करार करता है;
3[(10क) “विनिधान कम्पनी" से ऐसी कम्पनी अभिप्रेत है जिसका प्रधान कारबार शेयरों, स्टाकों, डिबेंचरों या अन्य प्रतिभूतियों का अर्जन करना है;]
2[(10ख) “मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती" के वही अर्थ होंगे जो उनके बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (च) में हैं;]
6[(11) “जीवन बीमा कारबार" से मानव जीवन के बीमे की संविदाएं करने का कारबार अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत मृत्यु पर (केवल दुर्घटना से हुई मृत्यु को छोड़कर) या मानव जीवन पर निर्भर किसी भी आकस्मिकता के घटित होने पर धनराशि के संदाय का आश्वासन दिए जाने से सम्बन्धित संविदा तथा मानव जीवन पर निर्भर अवधि के लिए प्रीमियमों के संदाय की शर्त पर की गई कोई संविदा भी है और इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी समझे जाएंगे-
(क) निर्योग्यता तथा दुगनी या तिगुनी क्षतिपूरक दर्घटना प्रसुविधाएं प्रदान करना, यदि बीमा-संविदा में वैसा उपबंध कर दिया गया हो;
(ख) मानव जीवन पर वार्षिकियां प्रदान करना; और
(ग) अधिवार्षिकी भत्ता तथा 4[ऐसे फायदे प्रदान करना, जो ऐसी किसी निधि में से देय है] जो उन व्यक्तियों की जो किसी विशिष्ट वृत्ति, व्यापार या नियोजन में लगे हुए हैं या लगाए गए हैं या उनके आश्रितों की सहायता और उनके भरणपोषण के लिए ही उपयोज्य हैं ।]
5[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि जीवन बीमा कारबार" में ऐसी कोई यूनिटबद्ध बीमा पालिसी या स्क्रिप या ऐसी कोई लिखत या यूनिट, चाहे जिस नाम से ज्ञात हो, सम्मिलित होगी, जिसमें इस धारा के खंड (9) में निर्दिष्ट किसी बीमाकर्ता द्वारा जारी किए गए विनिधान के घटक और बीमा के घटक का उपबंध है ।]
- 1957 के अधिनियम सं० 35 की धारा 2 द्वारा (1-9-1957 से) व्यष्टि के रूप में" शब्दों का लोप किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 3 द्वारा (1-6-1950 से) अन्तःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 3 द्वारा (1-6-1950 से) पूर्ववर्ती खण्ड के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 26 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
1। । । ।
2[(13क) “समुद्री बीमा कारबार" से किसी भी प्रकार के जलयानों के संबंध में बीमा की संविदाएं करने का कारबार अभिप्रेत है जिसमें स्थोरा, वहनीय माल और उन जलयानों, स्थोरा और वहनीय माल के या उनसे सम्बद्ध ऐसे अन्य हित सम्मिलित हैं जिनका विधितः बीमा किया जा सकता है तथा इसके अन्तर्गत माल, सामग्री, वाणिज्या और किसी भी प्रकार की ऐसी संपत्ति है, जिसका भूमि या जल या दोनों द्वारा अभिवहन के लिए बीमा किया जा चुका है, चाहे ऐसे अभिवहन के अतिरिक्त या उससे आनुषंगिक भाण्डागार जोखिम या वैसी ही जोखिम को उसमें सम्मिलित किया गया हो या नहीं, और इसके अन्तर्गत ऐसी कोई अन्य जोखिम भी है जो उन जोखिमों में रूढ़ितः सम्मिलित की जाती है जिनका बीमा समुद्री बीमा पालिसियों में होता है;
(13ख)”प्रकीर्ण बीमा कारबार" से बीमा की संविदाएं करने का ऐसा कारबार अभिप्रेत है जो खण्ड (6क), (11) और (13क) में सम्मिलित किसी किस्म या किस्मों का मुख्यतः या पूर्णतः कारबार नहीं है;]
3[(13खक) राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 10चख के अधीन गठित राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण अभिप्रेत है;
(13खख) “राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 10चद की उपधारा (1) के अधीन गठित राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण अभिप्रेत है;]
(14) “विहित" से 4[इस अधिनियम] के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
5। । । ।
3। । । ।
(16) “प्राइवेट कम्पनी" और पब्लिक कम्पनी" के वही अर्थ होंगे जो 1[कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 2 के खण्ड (68) और (72)] में हैं; और
6[(16क) विनियम" से बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के अधीन स्थापित भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा विरचित विनियम अभिप्रेत हैं;
(16ख) पुनर्बीमा से एक बीमाकर्ता के जोखिम के भाग का दूसरे बीमाकर्ता द्वारा, जो पारस्परिक रूप से स्वीकार्य प्रीमियम के लिए जोखिम स्वीकार करता है, बीमा अभिप्रेत है;
(16ग) “प्रतिभूति अपील अधिकरण" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 15] के अधीन स्थापित प्रतिभूति अपील अधिकरण अभिप्रेत है;]
3। । । ।
7[2क. कतिपय शब्दों और पदों का निर्वचन-उन शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31), साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ होंगे जो उन अधिनियमों में क्रमशः उनके हैं ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा लोप किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 3 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा खंड (14क) का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
2ख. बीमा नियंत्रक की नियुक्ति- 1[(1) यदि किसी समय, प्राधिकरण का बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन अतिष्ठित किया जाता है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी व्यक्ति को, उस अधिनियम की धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण के पुनर्गठित किए जाने तक बीमा नियंत्रक के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।]
(2) इस धारा के अधीन नियुक्ति करने में केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगी अर्थात् क्या नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति को औद्योगिक, वाणिज्यिक या बीमा संबंधी अनुभव है और क्या ऐसे व्यक्ति के पास बीमांकिक अर्हताएं हैं ।]
भाग 2
बीमाकर्ताओं को लागू उपबन्ध
2[2ग. कुछ व्यक्तियों द्वारा बीमा कारबार किए जाने का प्रतिषेध-(1) इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 (1950 का 47) के प्रारंभ के पश्चात् 3[भारत] में किसी भी प्रकार का बीमा कारबार शुरू नहीं करेगा और 3[भारत] में किसी भी प्रकार का बीमा कारबार करने वाला कोई भी बीमाकर्ता ऐसे प्रारंभ से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् ऐसा कोई कारबार चालू नहीं रखेगा, जब तक कि वह-
(क) पब्लिक कम्पनी न हो, या
(ख) सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) के अधीन या किसी राज्य में सहकारी सोसाइटियों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त ऐसी किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी न हो,
(ग) 3[भारत] के बाहर किसी देश की विधि के अधीन निगमित ऐसा निगमित निकाय न हो जो प्राइवेट कम्पनी के स्वरूप का नहीं है:
परन्तु केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, धारा 2 के खण्ड (11) के उपखण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट स्वरूप के अधिवार्षिकी भत्ते और अधिवार्षिकियां अनुदत्त करने का कारबार करने के प्रयोजनों के लिए या कोई साधारण बीमा कारबार करने के प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति या बीमाकर्ता को इस धारा के प्रवर्तन से छूट इतने विस्तार तक तथा इतनी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों पर, जो वह विनिर्दिष्ट करे, दे सकेगी:
परन्तु यह और कि साधारण बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता की दशा में ऐसी कोई अधिसूचना जारी नहीं की जाएगी जो एक बार में तीन वर्ष से अधिक के लिए प्रभावी हो:
4[परंतु यह भी कि भारतीय बीमा कंपनी से भिन्न कोई बीमाकर्ता बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् भारत में इस अधिनियम के अधीन किसी भी प्रकार का बीमा कारबार करना आरंभ नहीं करेगा:]
5[परंतु यह भी कि कोई बीमाकर्ता जो बीमा कारबार करने वाली कोई भारतीय बीमा कंपनी, बीमा सहकारी सोसाइटी या इस उपधारा के खंड (ग) में निर्दिष्ट कोई निगमित निकाय है, विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 (2005 का 28) की धारा 2 के खंड (यक) में यथापरिभाषित किसी विशेष आर्थिक जोन में कोई बीमा कारबार कर सकेगा ।]
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के समक्ष रखी जाएगी ।]
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 6 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यों" स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 28 की धारा 57 और तीसरी अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
1[(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई बीमा सहकारी सोसाइटी, इस अधिनियम के अधीन, बीमा (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् भारत में किसी भी प्रकार का बीमा कारबार कर सकेगी ।]
5[2गक. इस अधिनियम के उपबंधों को विशेष आर्थिक जोन को लागू करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के उपबंधों में से कोई उपबंध, -
(क) ऐसे बीमाकर्ता को लागू नहीं होगा जो विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 (2005 का 28) की धारा 2 के खंड (यक) में यथापरिभाषित किसी विशेष आर्थिक जोन में बीमा कारबार करने वाली कोई भारतीय बीमा कंपनी, बीमा सहकारी सोसाइटी या धारा 2ग की उपधारा (1) के खंड (ग) में निर्दिष्ट कोई निगमित निकाय है; या
(ख) ऐसे किसी बीमाकर्ता को जो विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 (2005 का 28) की धारा 2 के खंड (यक) में यथापरिभाषित किसी विशेष आर्थिक जोन में बीमा कारबार करने वाली कोई भारतीय बीमा कंपनी, बीमा सहकारी सोसाइटी या धारा 2ग की उपधारा (1) के खंड (ग) में निर्दिष्ट कोई निगमित निकाय है, ऐसे अपवादों, उपांतरणों और अनुकूलनों के साथ ही लागू होगा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।]
2[2गख. भारत में संपत्तियों का प्राधिकरण की अनुज्ञा के सिवाय विदेशी बीमाकर्ताओं द्वारा बीमाकृत न किया जाना-(1) कोई व्यक्ति, प्राधिकरण की पूर्व अनुज्ञा के सिवाय, भारत में किसी संपत्ति या भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या अन्य जलयान या वायुयान के संबंध में ऐसे किसी बीमाकर्ता से बीमे की कोई पालिसी नहीं लेगा या उसका नवीकरण नहीं करेगा, जिसके कारबार का मुख्य स्थान भारत के बाहर है ।
(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबंध का उल्लंघन करेगा तो वह शास्ति का, जो पांच करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]
3[2घ. जब तक बीमाकर्ताओं के दायित्व चुकता न हों तब तक उन्हें इस अधिनियम का लागू रहना-प्रत्येक बीमाकर्ता किसी भी वर्ग के बीमा कारबार के संबंध में तब तक इस अधिनियम के सब उपबंधों के अधीन रहेगा जब तक उस वर्ग के कारबार के बारे में 4[भारत] में उसके दायित्व बिना चुकाए रहते हैं या उनके लिए अन्यथा उपबंध नहीं किया जाता है ।
5। । । ।
3. रजिस्ट्रीकरण-(1) जब तक किसी 6[व्यक्ति] ने 7[नियंत्रक] से 8[किसी विशिष्ट वर्ग का बीमा कारबार करने के लिए] रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त नहीं कर लिया है, तब तक वह 5[व्यक्ति] इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् 3[भारत] में उस वर्ग का बीमा कारबार करना प्रारंभ नहीं करेगा और 3[भारत] में उस वर्ग का बीमा कारबार करने वाला कोई भी बीमाकर्ता इस अधिनियम के प्रारंभ के तीन मास की समाप्ति पर ऐसा कोई कारबार चालू नहीं रखेगाः
9[परन्तु यदि ऐसा बीमाकर्ता जो इस अधिनियम के प्रारंभ के समय 3[भारत] में किसी वर्ग का बीमा कारबार कर रहा हो इस उपधारा की अपेक्षाओं के अनुसार रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त करने में असफल रहता है तो उसके द्वारा की गई कोई भी बीमा संविदा उस दशा में अविधामान्य न होगी, जब उसने वह प्रमाणपत्र 10[उस तारीख1 के पूर्व अभिप्राप्त कर लिया हो जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा], इस निमित्त नियत की जाए:]
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 अनुसूची द्वारा (23-9-2002 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1939 के अधिनियम सं० 11 द्वारा अंतःस्थापित धारा 2क और 2ख को 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 6 द्वारा (1-6-1950 से) धारा 2घ और 2ङ के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यों" स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 4 द्वारा लोप किया गया ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 3 द्वारा बीमाकर्ता" के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक" के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) अंतःस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 3 द्वारा बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1940 के प्रारंभ से एक मास की समाप्ति पर" के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
2[परन्तु यह और कि, यथास्थिति, ऐसा व्यक्ति या बीमाकर्ता जो बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ पर या उसके पूर्व, भारत में किसी वर्ग का ऐसा बीमा कारबार कर रहा हो जिसके लिए ऐसे प्रारंभ के पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं था, ऐसे प्रारंभ से तीन मास की अवधि तक अथवा यदि उसने तीन मास की उक्त अवधि के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया था तो ऐसे आवेदन के निपटारे तक ऐसा कारबार करता रह सकेगाः
परन्तु यह भी कि बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ से ठीक पूर्व अभिप्राप्त किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाण-पत्र के बारे में यह समझा जाएगा कि वह प्राधिकरण से इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ही अभिप्राप्त किया गया है ।]
3[(2) रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन ऐसी रीति में किया जाएगा और उसके साथ ऐसे दस्तावेज लगे होंगे, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।]
4[(2क) यदि, रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन की प्राप्ति पर और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, नियंत्रक का समाधान हो जाता है कि-
(क) आवेदक की वित्तीय स्थिति और उसके प्रबंध का साधारण स्वरूप ठीक है;
(ख) आवेदक को संभाव्यतः उपलब्ध होने वाले कारबार की मात्रा तथा उसका पूंजी संघटन और उपार्जन की संभावनाएं पर्याप्त होंगी;
(ग) यदि आवेदन में विनिर्दिष्ट वर्ग या वर्गों के बीमा कारबार की बाबत रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र आवेदक को दे दिया जाता है तो जनसाधारण का हित साधन होगा; और
(घ) आवेदक ने धारा 2ग, 5[5 और 31क] के उपबंधों का अनुपालन कर दिया है तथा उसने इस धारा की उन सभी अपेक्षाओं की पूर्ति कर दी है, जो उसे लागू हैं,
तो नियंत्रक आवेदक को बीमाकर्ता के रूप में रजिस्ट्रीकृत कर सकेगा और उसे रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दे सकेगा ।
6[(2कक) प्राधिकरण ऐसे आवेदक को रजिस्टर करने के लिए अधिमान देगा और उसे रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करेगा यदि ऐसा आवेदक व्यष्टियों या व्यष्टियों के समूह को स्वास्थ्य रक्षण उपलब्ध कराने के लिए जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार करने के लिए ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, सहमति देता है ।]
(2ख) जहां नियंत्रक रजिस्ट्रीकरण करने से इन्कार करता है वहां वह ऐसे विनिश्चय के लिए कारणों को अभिलिखित करेगा और उनकी एक प्रति आवेदक को देगा ।
1[(2ग) रजिस्ट्रीकरण से इंकार करने के प्राधिकरण के विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति, उस तारीख से, जिसको विनिश्चय की एक प्रति उसके द्वारा प्राप्त की जाती है, तीस दिन के भीतर प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।]
7। । । ।
- 1 अगस्त, 1942; बड़ौदा और मैसूर को छोड़कर राज्यों के सभी बीमाकर्ताओं के लिए देखिए अधिसूचना संख्या 530-आई (12)/42, दिनांक 11 जुलाई, 1942, भारत का राजपत्र 1942, भाग 1, पृष्ठ 1163 ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1965 के अधिनियम सं० 32 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 6 द्वारा लोप किया गया ।
1[(3) किसी ऐसे बीमाकर्ता, जिसका ऐसे व्यक्ति के साथ संयुक्त उद्यम है जिसके कारबार का मुख्य स्थान भारत के बाहर अधिवसित है या धारा 2 के खंड (9) के उपखंड (घ) में यथा परिभाषित किसी बीमाकर्ता की दशा में, प्राधिकरण पहले से किए गए रजिस्ट्रीकरण को, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस देश में, जिसमें ऐसे व्यक्ति को बीमा कारबार करने से उस देश की विधि या प्रथा द्वारा विवर्जित किया गया है, विधारित कर सकेगा ।
(4) प्राधिकरण, किसी बीमाकर्ता के रजिस्ट्रीकरण को, यथास्थिति, या तो पूर्णतया या जहां तक इसका संबंध बीमा कारबार के किसी विशिष्ट वर्ग से है, निलंबित या रद्द कर सकेगा, -
(क) यदि बीमाकर्ता किसी समय, अपनी आस्तियों के मूल्य के उसके दायित्वों की रकम से आधिक्य के संबंध में धारा 64फक के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है; या
(ख) यदि बीमाकर्ता परिसमापनाधीन है या उसे दिवालिया न्यायनिर्णीत कर दिया गया है; या
(ग) यदि बीमाकर्ता का कारबार या कारबार का कोई वर्ग प्राधिकरण के अनुमोदन के बिना किसी व्यक्ति को अंतरित हो गया है या किसी अन्य बीमाकर्ता के कारबार में अंतरित या उसमें समामेलित हो गया है; या
(घ) यदि बीमाकर्ता इस अधिनियम या किसी नियम या किसी विनियम की किसी अपेक्षा अथवा उसके अधीन किए गए आदेश या जारी किए गए किसी निदेश का अनुपालन करने में व्यतिक्रम करता है या उसके उल्लंघन में कार्य करता है; या
(ङ) यदि प्राधिकरण के पास यह विश्वास करने का कारण है कि बीमाकर्ता पर बीमे की किसी पालिसी के अधीन भारत में उद्भूत कोई दावा नियमित न्यायालय में अंतिम निर्णय के पश्चात् तीन मास तक असंदत्त रहता है; या
(च) यदि बीमाकर्ता बीमा कारबार या किसी विहित कारबार से भिन्न कोई कारबार करता है; या
(छ) यदि बीमाकर्ता बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के अधीन प्राधिकरण द्वारा, यथास्थिति, जारी किए गए किसी निदेश या किए गए आदेश का अनुपालन करने में व्यतिक्रम करता है; या
(ज) यदि बीमाकर्ता, कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) या साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) या विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) या धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (2003 का 15) की किसी अपेक्षा का अनुपालन करने में व्यतिक्रम करता है या उसके उल्लंघन में कार्य करता है; या
(झ) यदि बीमाकर्ता धारा 3क के अधीन अपेक्षित वार्षिक फीस का संदाय करने में असफल रहता है; या
(ञ) यदि बीमाकर्ता को तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है; या
(ट) यदि बीमाकर्ता, जो, यथास्थिति, सुसंगत राज्य विधियों या बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के अधीन गठित सहकारी सोसाइटी है, बीमाकर्ता को लागू होने वाली विधि के उपबंधों का उल्लंघन करता है ।
(5) जब प्राधिकरण उपधारा (4) के खंड (क), खंड (घ), खंड (ङ), खंड (च), खंड (छ) या खंड (झ) के अधीन किसी रजिस्ट्रीकरण को निलंबित या रद्द कर देता है, तब वह बीमाकर्ता को अपने विनिश्चय की लिखित में सूचना देगा और विनिश्चय उस तारीख को, जिसे वह उस निमित्त सूचना में विनिर्दिष्ट करे, प्रभावी होगा; ऐसी तारीख उस तारीख से जिसको पारेषण के सामान्य अनुक्रम में सूचना की प्राप्ति होती है, एक मास से कम या दो मास से अधिक की नहीं होगी ।
(5क) जब प्राधिकरण उपधारा (4) के खंड (ख), खंड (ग), खंड (ञ) या खंड (ट) के अधीन किसी रजिस्ट्रीकरण को निलंबित या रद्द कर देता है तब, यथास्थिति, निलंबन या रद्दकरण, उस तारीख को प्रभावी होगा जिसको निलंबन या रद्दकरण के आदेश की सूचना की बीमाकर्ता को तामील की जाती है ।]
1[(5ख) जब रजिस्ट्रीकरण रद्द कर दिया गया है तब बीमाकर्ता रद्दकरण के प्रभावी होने के पश्चात् बीमा की कोई नई संविदाएं नहीं करेगा, किन्तु ऐसे रद्दकरण के पहले उसके द्वारा की गई संविदाओं के विषय में वे सब अधिकार और दायित्व उपधारा (5घ) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए ऐसे बने रहेंगे मानो ऐसा रद्दकरण हुआ ही न हो ।]
2[(5ग) जहां उपधारा (4) के खंड (क), खंड (घ), खंड (ङ), खंड (च), खंड (छ) या खंड (झ) के अधीन कोई रजिस्ट्रीकरण निलंबित या रद्द कर दिया जाता है, वहां प्राधिकरण, स्वविवेकानुसार रजिस्ट्रीकरण को पुनः प्रवर्तित कर सकेगा, यदि बीमाकर्ता उस तारीख से, जिसको निलंबन या रद्दकरण प्रभावी होता है, छह मास के भीतर अपनी आस्तियों के मूल्य के अपने दायित्वों की रकम से आधिक्य के संबंध में धारा 64फक के उपबंधों का अनुपालन कर देता है या वह धारा 3क की उपधारा (4) के अधीन किया गया आवेदन स्वीकार करा लेता है या वह प्राधिकरण का यह समाधान कर देता है कि उस पर कोई ऐसा दावा, जो उपधारा (4) के खंड (ङ) में निर्दिष्ट है, असंदत्त नहीं रहा है या यह कि उसने इस अधिनियम या बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किसी विनियम की किसी अपेक्षा या किए गए किसी आदेश अथवा उन अधिनियमों के अधीन जारी किए गए किसी निदेश का अनुपालन कर दिया है या यह कि उसने, यथास्थिति, बीमा कारबार या किसी विहित कारबार से भिन्न कोई कारबार करना बंद कर दिया है और वह ऐसे किन्हीं निदेशों का, जो प्राधिकरण द्वारा उसे दिए जाएं, अनुपालन करता है ।]
1[(5घ) 3[यदि किसी बीमा कम्पनी का रजिस्ट्रीकरण उपधारा (4) के अधीन रद्द कर दिया गया है तो, 4[नियंत्रक] उस बीमा कम्पनी के परिसमापन के या किसी वर्ग के बीमा कारबार के बारे में कम्पनी के कामकाज के परिसमापन के आदेश के लिए न्यायालय से आवेदन उस तारीख से जिसको वह रद्दकरण प्रभावी हुआ है, छह मास की समाप्ति के पश्चात् उस दशा में कर सकेगा जबकि बीमा कम्पनी का रजिस्ट्रीकरण उपधारा (5ग) के अधीन पुनःप्रवर्तित न कर दिया गया हो या कम्पनी के परिसमापन के लिए न्यायालय में आवेदन पहले ही न कर दिया गया हो । न्यायालय उसमें ऐसे कार्यवाही कर सकेगा मानो इस उपधारा के अधीन आवेदन, यथास्थिति, धारा 53 की उपधारा (2) के या धारा 58 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन हो ।]
5[(5ङ) प्राधिकरण, आदेश द्वारा, किसी रजिस्ट्रीकरण को ऐसी रीति से जो उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, निलंबित या रद्द कर सकेगा:
परंतु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक संबद्ध व्यक्ति को सुने जाने का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।]
6। । । ।
7[(7) प्राधिकरण, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के खोने, नष्ट होने या विकृत होने या ऐसी किसी अन्य दशा में, जिसमें कि प्राधिकरण की यह राय हो कि प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति का दिया जाना आवश्यक है, उसकी दूसरी प्रति पांच हजार रुपए से अनधिक की ऐसी फीस की अदायगी पर दे सकेगा, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए ।]
1[3क. बीमाकर्ता द्वारा वार्षिक फीस का संदाय-(1) ऐसा कोई बीमाकर्ता, जिसे धारा 3 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है, प्राधिकरण को ऐसी वार्षिक फीस का, ऐसी रीति में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, संदाय करेगा ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी रूप से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 3 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक" के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1965 के अधिनियम सं० 32 की धारा 2 द्वारा उपधारा (6) का लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
(2) वार्षिक फीस जमा करने में कोई असफलता रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को रद्द किए जाने के लिए दायी बनाएगी ।]
2[3ख. जीवन बीमा कारबार के निबन्धनों के ठीक होने का प्रमाणन-यदि धारा 3 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के आवेदन पर विचार करते समय या किसी अन्य समय 3[नियंत्रक] को यह प्रतीत होता है कि जीवन बीमा कारबार के संबंध में प्रस्थापित की गई या प्रस्थापित की जाने वाली बीमाकृत बीमे की दरें, सहूलियतें, निबन्धन और शर्तें किसी बारे में व्यावहारिक या ठीक नहीं हैं तो वह यह अपेक्षा कर सकेगा कि तद्विषयक एक विवरण बीमाकर्ता द्वारा इस प्रयोजन के लिए नियुक्त तथा 2[नियंत्रक] द्वारा अनुमोदित बीमांकक के समक्ष रखा जाए तथा लिखित आदेश द्वारा बीमाकर्ता से यह अतिरिक्त अपेक्षा कर सकेगा कि उतने समय के अन्दर, जितना कि उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, यथास्थिति, उक्त दरों, सहूलियतों, निबन्धनों या शर्तों में ऐसे उपान्तर किए जाएं, जिनकी बाबत उक्त बीमांकक यह रिपोर्ट दे कि ये उसे यह प्रमाणित करने के लिए समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हैं कि उक्त दरें, सहूलियतें, निबंधन और शर्तें व्यावहारिक और ठीक हैं ।]
4[4. जीवन बीमा पालिसियों द्वारा प्रतिभूत वार्षिकियों और अन्य प्रसुविधाओं के लिए न्यूनतम सीमाएं-बीमाकर्ता, जारी की गई किसी जीवन बीमा पालिसी या किसी समूह पालिसी पर ऐसी न्यूनतम वार्षिकी और अन्य फायदों का संदाय करेगा या संदाय करने का वचन देगा, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, जिसके अंतर्गत कोई लाभ या बोनस नहीं है, परंतु यह किसी बीमाकर्ता को, किसी पालिसी को किसी मूल्य की समादत्त पालिसी में संपरिवर्तित करने से या किसी रकम के अभ्यर्पण मूल्य का संदाय निवारित नहीं करेगी ।]
5. बीमाकर्ता के नाम के बारे में निर्बन्धन-(1) बीमाकर्ता को ऐसे किसी नाम से जो उस नाम से बिल्कुल मिलता है, जिससे कोई विद्यमान बीमाकर्ता पहले से ही रजिस्ट्रीकृत है, अथवा जो उस नाम से इतनी निकट सदृश्यता रखता है कि वह प्रवंचन के लिए प्रकल्पित है, तभी रजिस्ट्रीकृत किया जाएगा जब विद्यमान बीमाकर्ता का विघटन हो रहा है और वह 2[नियंत्रक] को इसके बारे में अपनी सहमति सूचित कर देता है, अन्यथा नहीं ।
(2) यदि बीमाकर्ता को पूर्वोक्त सहमति के बिना ऐसे नाम से असावधानी में या अन्यथा रजिस्ट्रीकृत कर लिया जाता है, जो उस नाम से बिल्कुल मिलता है जिससे पहले से ही विद्यमान कोई बीमाकर्ता, चाहे वह पहले रजिस्ट्रीकृत हुआ हो या नहीं, कारबार कर रहा है अथवा जो उस नाम से इतनी निकट सदृश्यता रखता है कि वह प्रवंचन के लिए प्रकल्पित है तो प्रथम वर्णित बीमाकर्ता, उस दशा में जब उससे 2[नियंत्रक] द्वितीय वर्णित बीमाकर्ता के आवेदन पर अपेक्षा करे, अपना नाम इतने समय के अन्दर बदल लेगा जितना 2[नियंत्रक] द्वारा नियत किया जाए ।
5[6. पूंजी के संबंध में अपेक्षा-(1) ऐसा कोई बीमाकर्ता, जो धारा 2 के खण्ड (9) के उपखण्ड (घ) में यथापरिभाषित कोई बीमाकर्ता नहीं है, जो बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् भारत में जीवन बीमा, साधारण बीमा, स्वास्थ्य बीमा या पुनः बीमा का कारबार कर रहा है तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा जब तक उसके पास-
(i) जीवन बीमा या साधारण बीमा का कारबार करने वाले किसी व्यक्ति की दशा में, एक अरब रुपए की समादत्त साधारण पूंजी नहीं है; या
(ii) अनन्य रूप से स्वास्थ्य बीमा का कारबार करने वाले किसी व्यक्ति की दशा में, एक अरब रुपए की समादत्त साधारण पूंजी नहीं है; या
(iii) किसी पुनर्बीमाकर्ता के रूप में अनन्य रूप से कारबार करने वाले किसी व्यक्ति की दशा में, दो अरब रुपए की समादत्त साधारण पूंजी नहीं हैः
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 7 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 8 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 10 द्वारा प्रतिस्थापित ।
परंतु बीमाकर्ता, कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18), भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और उनके अधीन जारी किए गए नियमों, विनियमों या निदेशों और तत्समय प्रवृत्त किन्हीं अन्य विधियों के उपबंधों के अनुसार इस धारा में यथा उपबंधित समादत्त साधारण पूंजी बढ़ा सकेगाः
परंतु यह और कि समादत्त साधारण पूंजी का अवधारण करने में, किसी बीमाकर्ता की विरचना और उसके रजिस्ट्रीकरण में उपगत ऐसे किन्हीं प्रारंभिक व्ययों को, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, अपवर्जित किया जाएगा ।
(2) धारा 2 के खंड (9) के उपखंड (घ) में यथापरिभाषित कोई बीमाकर्ता तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके पास पांच हजार करोड़ रुपए से अन्यून की अपनी शुद्ध निधि न हो ।]
1[6क. पूंजी संघटन तथा मतदान अधिकारों और शेयरों के हिताधिकारी स्वामियों के रजिस्टर रखने से संबंधित अपेक्षाएं- 2[(1) शेयरों द्वारा परिसीमित कोई भी पब्लिक कंपनी, जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय भारत में है, तब तक जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार या स्वास्थ्य बीमा कारबार या पुनर्बीमा कारबार नहीं करेगी जब तक कि वह निम्नलिखित शर्तों को पूरा नहीं करती है, अर्थात्ः-
(i) कंपनी की पूंजी ऐसे साधारण शेयरों के रूप में हो, जिनमें से प्रत्येक का एकल अंकित मूल्य है और ऐसी अन्य प्रकार की पूंजी के रूप में होगी, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;
(ii) शेयरधारकों के मतदान अधिकार साधारण शेयरों तक निर्बंधित हों;
(iii) अधिक से अधिक एक वर्ष की ऐसी अवधि के दौरान के सिवाय, जो शेयरों पर मांगों के संदाय के लिए कंपनी द्वारा अनुज्ञात है, सभी शेयरों की, चाहे वे विद्यमान हों या न हों, समादत्त रकम एक समान हैः
परंतु ऐसी किसी पब्लिक कंपनी के संबंध में, जिसने बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 के प्रारंभ के पूर्व मामूली शेयरों से भिन्न कोई ऐसे शेयर निर्गमित किए हैं जिनमें से प्रत्येक का एकल अंकित मूल्य है या जिसने ऐसे शेयर निर्गमित किए हैं जिनकी समादत्त रकम उन सब के लिए समान नहीं है, इस उपधारा में विनिर्दिष्ट शर्तें ऐसे प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि तक लागू नहीं होंगी ।]
(2) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अथवा संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इस धारा के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, पूर्वोक्त जैसी किसी पब्लिक कम्पनी के प्रत्येक शेयरधारी का मताधिकार सभी दशाओं में उसके द्वारा धृत 3[साधारण] शेयरों की समादत्त रकम के ठीक अनुपात में होगा ।
4। । । ।
2[(4) पूर्वोक्त जैसी कोई पब्लिक कंपनी जो जीवन बीमा कारबार, साधारण और स्वास्थ्य बीमा कारबार तथा पुनर्बीमा कारबार कर रही है-
(क) कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) के अधीन रखे जाने वाले सदस्यों के रजिस्टर के अतिरिक्त शेयरों का एक ऐसा रजिस्टर रखेगी, जिसमें प्रत्येक शेयर के हिताधिकारी स्वामी की नाम, उपजीविका और पता, जिसके अंतर्गत हिताधिकारी स्वामी के संबंध में ऐसी कोई तब्दीली भी है जिसकी घोषणा उसे की गई है, ऐसी घोषणा की प्राप्ति के चौदह दिन के भीतर दर्ज किया जाएगा;
(ख) अपने शेयरों का कोई अंतरण तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं करेगी-
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 9 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 11 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 11 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 11 द्वारा लोप किया गया ।
(i) जब तक कि कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 56 के उपबंधों का अनुपालन करने के अतिरिक्त, अंतरिती विहित प्ररूप में इस बाबत घोषणा नहीं कर देता है कि वह शेयरों को अपने ही फायदे के लिए या दूसरों की ओर से, चाहे संयुक्त रूप से या पृथक् रूप से, नामनिर्देशिती के रूप में धारण करने की प्रस्थापना करता है और पश्चात्वर्ती दशा में हिताधिकारी स्वामी या स्वामियों के नाम, उपजीविका और पते नहीं दे देता है और प्रत्येक के फायदाप्रद हित की सीमा व्यक्त नहीं देता है;
(ii) जहां अंतरण के पश्चात् कंपनी के शेयरों में अंतरिती की कुल समादत्त धृति उसकी समादत्त पूंजी के पांच प्रतिशत से अधिक होने की संभावना है, वहां जब तक कि ऐसे अंतरण के लिए प्राधिकरण का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त नहीं कर लिया गया है;
(iii) जहां किसी व्यष्टि, फर्म, समूह, समूह के संघटकों या उसी प्रबंध के अधीन निगमित निकाय द्वारा संयुक्त रूप से अथवा पृथक् रूप से अंतरित किए जाने के लिए आशयित शेयरों का अभिहित मूल्य बीमाकर्ता की समादत्त साधारण पूंजी के एक प्रतिशत से अधिक हो जाता है, वहां जब तक कि ऐसे अंतरण के लिए प्राधिकरण का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त नहीं कर लिया गया है ।
स्पष्टीकरण-इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए “समूह" और “उसी प्रबंध" पदों के वही अर्थ होंगे, जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (2003 का 12) में क्रमशः उनके हैं ।]
(5) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसका उपधारा (4) में निर्दिष्ट कम्पनी के किसी शेयर में ऐसा कोई हित है, जो कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर में किसी अन्य व्यक्ति के नाम में दर्ज है, बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 (1950 का 47) के प्रारंभ से अथवा उसके द्वारा ऐसा हित अर्जित किए जाने की तारीख से, इनमें से जो भी बाद की हो, तीस दिन के अन्दर विहित प्ररूप में एक घोषणा (जो उस व्यक्ति द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित की जाएगी जिसके नाम में वह शेयर रजिस्टर में दर्ज है) कम्पनी को करेगा जिसमें वह ऐसे शेयर में अपना हित घोषित करेगा तथा किसी अन्य विधि या किसी संविदा में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी जो व्यक्ति ऐसे शेयर की बाबत पूर्वोक्त जैसी घोषणा करने में असफल रहता है उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि उस शेयर में उसका किसी भी प्रकार का कोई अधिकार या हक नहीं हैः
परन्तु यदि वह व्यक्ति, जिसके नाम में वह शेयर रजिस्टर में दर्ज है, इस उपधारा द्वारा अपेक्षित घोषणा पर, प्रतिहस्ताक्षर करने से इंकार करता है तो, इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी शेयर में अपने अधिकार को न्यायालय में स्थापित करने वाले उस व्यक्ति के अधिकार पर, जिसका उस शेयर में कोई हित है, प्रभाव नहीं डालेगीः
परन्तु यह और कि जहां इस उपधारा में निर्दिष्ट कोई घोषणा करने वाले किसी व्यष्टि से संबंधित कोई शेयर किसी न्यास के अनुसरण में या निरापद अभिरक्षा में रखे जाने के प्रयोजन के लिए या लाभांश के संग्रहण या आपन के लिए कम्पनी द्वारा अपने नाम में धृत है, वहां इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 19131 (1913 का 7) में या जिस कम्पनी ने शेयर निर्गमित किया है उस कम्पनी के संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, उस व्यष्टि की बाबत यह समझा जाएगा कि वह किसी अन्य व्यक्ति का अपवर्जन करके इस धारा के अधीन मतदान अधिकारों का प्रयोग करने के प्रयोजन के लिए उक्त शेयर का धारक है ।
2। । । ।
3[(11) इस धारा की 2॥। इस धारा के उपबन्ध बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 के प्रारम्भ से ही उन बीमाकर्ताओं को, जो साधारण बीमा कारबार कर रहे हैं, निम्नलिखित उपान्तरों सहित लागू होंगे, अर्थात्ः-
- उपधारा (1), (3), (5) और (6) में बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 (1950 का 47) के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 के प्रति निर्देश है; 2॥।
- अब देखिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 11 द्वारा लोप किया गया ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 4 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
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1[स्पष्टीकरण]-इस धारा के प्रयोजनों के लिए कम्पनी के शेयरों में किसी व्यक्ति की धृति की बाबत यह समझा जाएगा कि-
(i) ऐसे व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों के नाम में धृत ऐसे शेयरों में कुल समादत्त धृति भी है, और
(ii) यदि कम्पनी के कोई शेयर-
(क) ऐसी पब्लिक परिसीमित कम्पनी द्वारा धृत हैं जिसका ऐसा व्यक्ति ऐसा सदस्य है जो समादत्त पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक धारण किए हुए है, या
(ख) ऐसी किसी प्राइवेट परिसीमित कम्पनी द्वारा धृत हैं जिसका ऐसा व्यक्ति सदस्य है, या
(ग) ऐसी कम्पनी द्वारा धृत हैं जिसका ऐसा व्यक्ति प्रबन्ध निदेशक, प्रबन्धक, 2॥। है या जिसमें उसका नियंत्रक हित है, या
(घ) ऐसी फर्म द्वारा धृत हैं जिसका ऐसा व्यक्ति भागीदार है, या
(ङ) ऐसे व्यक्ति द्वारा अन्य के साथ संयुक्ततः धृत हैं,
तो उसके अन्तर्गत कम्पनी या फर्म की कुल समादत्त धृति का या उन शेयरों में कुल संयुक्त धृति का उतना भाग भी है जितना उस अभिदाय का अनुपाती है जो उस व्यक्ति ने, यथास्थिति, कम्पनी की समादत्त पूंजी में या फर्म की समादत्त पूंजी में या संयुक्त धृति में किया है ।
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6ख. पूंजी संघटन संबंधी अपेक्षाओं का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उपबन्ध-(1) 4[जीवन या साधारण या स्वास्थ्य बीमा या पुनर्बीमाट कारबार करने वाली किसी पब्लिक कम्पनी को अपने पूंजी संघटन की धारा 6 की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए समर्थ बनाने हेतु, 7[प्राधिकरण] द्वारा इस निमित्त नियुक्त किया गया अधिकारी, इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 19131 (1913 का 7) में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) कम्पनी के निदेशकों द्वारा पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए प्रस्थापित किसी स्कीम की जांच कर सकेगाः
परन्तु यह तब जब कि-
(i) वह स्कीम शेयरधारियों के अधिवेशन में उनकी राय के लिए रखी जा चुकी हो और उस पर शेयरधारियों की राय सहित उस अधिकारी को भेज दी गई हो, और
(ii) उस स्कीम से असमादत्त शेयर पूंजी की बाबत शेयरधारियों के दायित्व में कोई कमी न होती हो,
(ख) ऐसी प्रस्थापित स्कीम की बाबत आक्षेप और सुझाव आमंत्रित कर सकेगा, और
(ग) ऐसी प्रस्थापित स्कीम के बारे में ऐसे आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात् उसे ऐसे उपान्तरों सहित मंजूर कर सकेगा जो वह आवश्यक या वांछनीय समझे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन स्कीम मंजूर करने वाले अधिकारी के विनिश्चय से व्यथित कोई शेयरधारी या अन्य व्यक्ति उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए ऐसी स्कीम को उपांतरित या ठीक कराने के प्रयोजन से उस 5[प्रतिभूति अपील
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 12 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 13 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 13 द्वारा प्रतिस्थापित ।
अधिकरण] में, जिसकी अधिकारिता में बीमाकर्ता का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है, स्कीम मंजूर करने वाले आदेश की तारीख से नब्बे दिन के अन्दर अपील कर सकेगा ।
(3) यदि 1[प्रतिभूति अपील अधिकरण] में उपधारा (2) के अधीन अपील की गई है तो उस उच्च न्यायालय का विनिश्चय या यदि ऐसी कोई अपील नहीं की गई है तो पूर्वोक्त अधिकारी का विनिश्चय अंतिम होगा और वह सभी शेयरधारियों तथा अन्य सम्पृक्त व्यक्तियों पर आबद्धकर होगा ।
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10. खातों और निधियों का पृथक्करण-(1) जहीं बीमाकर्ता 3[निम्नलिखित वर्गों, अर्थात् जीवन बीमा, अग्नि बीमा, समुद्री बीमा या प्रकीर्ण बीमा,] में से एक से अधिक का कारबार करता है वहां वह प्रत्येक वर्ग के बीमा कारबार की बाबत सब प्राप्तियों और संदायों का पृथक् लेखा रखेगा 4[और जहां बीमाकर्ता 4[प्रकीर्ण बीमा] कारबार अकेले या दूसरे वर्ग के कारबार के साथ करता है वहां जब तक कि 5[नियन्त्रक] इस अपेक्षा का लिखित रूप में अधित्यजन नहीं कर देता है, वह 4[प्रकीर्ण बीमा कारबार के ऐसे सब उपवर्गों में से प्रत्येकट की बाबत सब प्राप्तियों और संदायों का पृथक् लेखा रखेगा, जो 6[विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं] :
परन्तु यदि किसी उपवर्ग में समाविष्ट बीमा कारबार ऐसी बीमा संविदाओं के रूप में हैं जो बारह मास से अनधिक के अन्तरालों पर बीमाकर्ता द्वारा पर्यवसेय हैं और यदि उनके अधीन, कोई दावा उद्भूत होने पर, फायदे का संदाय करने के लिए बीमाकर्ता का दायित्व उस तारीख से जिसको वह दावा उद्भूत हुआ है, एक वर्ष के अन्दर समाप्त हो जाता है, तो 4[प्रकीर्ण बीमा कारबार] का वह उपवर्ग इस उपधारा के अधीन विहित नहीं किया जाएगा ।
(2) जहां बीमाकर्ता जीवन बीमा कारबार करता है वहां 7[ऐसे कारबार की बाबत शोध्य सब प्राप्तियां] एक पृथक् निधि में जमा की जाएंगी जिसका नाम जीवन बीमा निधि होगा और 8[उसकी आस्तियां 9॥।] बीमाकर्ता की सब अन्य आस्तियों से सुभिन्न रूप में और पृथक् रखी जाएंगी] तथा बीमाकर्ता द्वारा जीवन बीमा कारबार की बाबत किए गए निक्षेप की बाबत यह समझा जाएगा कि वह 10[ऐसी निधि की आस्तियों का भाग है 11[तथा हर बीमाकर्ता उन विवरणों और लेखाओं के, जो धारा 11 में निदिष्ट हैं, दिए जाने विषयक धारा 15 की उपधारा (1) में परिसीमित समय के अन्दर नियन्त्रक को एक विवरण देगा जिसमें प्रत्येक कलेण्डर वर्ष के समाप्त होने पर विद्यमान आस्तियों का ब्योरा होगा जो किसी लेखापरीक्षक द्वारा अथवा 10॥। लेखापरीक्षा करने के लिए अर्हित व्यक्ति द्वारा सम्यक् रूप से प्रमाणित किया गया होगाः
परन्तु ऐसा विवरण उस बीमाकर्ता की दशा में, जिसे धारा 11 लागू होती है, उस धारा की उपधारा (1) के खण्ड (क) में उल्लिखित तुलनपत्र के भाग के रूप में होगाः
परन्तु यह और कि बीमाकर्ता ऐसे विवरण में वे सब आस्तियां दिखा सकेगा जो उसके जीवन विभाग में धृत हैं किन्तु साथ ही साधारण आरक्षितियों और उस विभाग के अन्य दायित्वों के कारण की गई कटौतियां भी उससें दिखाई गई होंगीः
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 13 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 14 द्वारा लोप किया गया ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 8 द्वारा (1-6-1969 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 15 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 8 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 15 द्वारा लोप किया गया ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 8 द्वारा ऐसे कोष के भाग के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 11 द्वारा (1-6-1950 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
परन्तु यह और भी कि नियन्त्रक उन आस्तियों का वैसा ही प्रमाणित विवरण मांग सकेगा जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अन्य तारीख को विद्यमान हों, और यह उस तारीख से तीन मास की अवधि के अन्दर दिया जाएगा जिसके सम्बन्ध में विवरण मांगा गया है ।]
1[(2क) जीवन बीमा कारबार करने वाला कोई भी बीमाकर्ता उस वर्ग या वर्गों के बीमा कारबार के अतिरिक्त जिनके लिए वह पहले से ही रजिस्ट्रीकृत है, किसी वर्ग के बीमा कारबार के लिए रजिस्ट्रीकृत किए जाने का हकदार तभी होगा जब 2[नियंत्रक] का समाधान हो जाता है कि बीमाकर्ता की जीवन बीमा निधि की आस्तियां अदायगी के लिए परिपक्व होने वाली जीवन बीमा पालिसियों पर उसके सब दायित्वों को चुका देने के लिए पर्याप्त हैं अन्यथा नहीं ।]
3[(2कक) जहां कोई बीमाकर्ता बीमा का कारबार करता है वहां ऐसे बीमा कारबार के प्रत्येक उपवर्ग के संबंध में देय सभी प्राप्तियां एक पृथक् निधि में जमा की जाएंगी या उससे निकाली जाएंगी, उसकी आस्तियां बीमाकर्ता की अन्य आस्तियों से पृथक् और सुभिन्न रखी जाएंगी तथा प्रत्येक बीमाकर्ता प्राधिकरण को ऐसी निधियों के आवश्यक ब्यौरे, जिनकी प्राधिकरण द्वारा समय-समय पर अपेक्षा की जाए, प्रस्तुत करेगा और ऐसी निधियों का इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन जैसा अभिव्यक्त रूप से अनुज्ञात है, उसके सिवाय प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उपयोजन नहीं किया जाएगा ।]
(3) जीवन बीमा निधि जीवन पालिसीधारियों की इस प्रकार आत्यन्तिक रूप से प्रतिभूति होगी मानो वह ऐसे बीमाकर्ता की हो जो जीवन बीमा कारबार से भिन्न कोई अन्य कारबार नहीं करता तथा वह बीमाकर्ता की ऐसी किन्हीं संविदाओं के दायित्व के अधीन न होगी जिनके अधीन वह उस स्थिति में न होती जिसमें कि बीमाकर्ता का कारबार केवल जीवन बीमा कारबार होता तथा वह 4[बीमाकर्ता के जीवन बीमा कारबार के प्रयोजनों से भिन्नट किन्हीं प्रयोजनों के लिए 5॥। प्रत्यक्षतः या परोक्षतः उपयोजित न की जाएगी ।
6[11. लेखा और तुलनपत्र-(1) प्रत्येक बीमाकर्ता बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम 2015 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् उसके द्वारा किए गए बीमा कारबार के संबंध में और उसके शेयरधारकों की निधियों के संबंध में, प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर उस वर्ष के संबंध में एक तुलनपत्र, लाभ और हानि लेखा, पृथक् प्राप्तियां और संदाय लेखा, आमदनी लेखा, उन विनियमों के अनुसार तैयार करेगा, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) प्रत्येक बीमाकर्ता शेयरधारकों और पालिसीधारियों की निधियों से संबंधित पृथक् खाता रखेगा ।
(3) यदि बीमाकर्ता, कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 2 के खंड (20) में यथापरिभाषित कोई कंपनी नहीं है तो उपधारा (1) में निर्दिष्ट लेखे और विवरण बीमाकर्ता द्वारा या किसी कंपनी की दशा में अध्यक्ष, यदि कोई हो और कंपनी के दो निदेशकों तथा प्रधान अधिकारी द्वारा या किसी बीमा सहकारी सोसाइटी की दशा में सोसाइटी के भारसाधक व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित किए जाएंगे तथा उसके साथ उस अवधि दौरान, जिससे ऐसे लेखे और विवरण संबंधित हैं, कारबार के प्रबंध से संबद्ध भारसाधक व्यक्तियों के नाम, वर्णन और उनकी उपजीविका तथा उनके द्वारा धारित निदेशक पद अंतर्विष्ट करते हुए ऐसा विवरण संलग्न होगा तथा उस अवधि के दौरान के कामकाज की एक रिपोर्ट भी होगी ।]
7[12. लेखापरीक्षा-ऐसे प्रत्येक बीमाकर्ता की दशा में, उसके द्वारा किए गए सभी बीमा कारबार के संबंध में तुलनपत्र, लाभ और हानि लेखा, आमदनी लेखा तथा लाभ और हानि विनियोग लेखा की लेखा परीक्षा उस दशा को छोड़कर जब उनकी लेखा परीक्षा कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) के अधीन की जाती है, लेखापरीक्षक द्वारा प्रतिवर्ष की जाएगी और लेखापरीक्षक को सभी ऐसे लेखाओं की लेखापरीक्षा करते समय वही शक्तियां प्राप्त होंगी, जो कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 147 द्वारा कंपनी लेखापरीक्षकों को प्राप्त हैं और वह उनमें निहित कृत्यों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करेगा तथा उन पर अधिरोपित दायित्व और शास्तियों के अध्यधीन होगा ।]
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 15 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 8 द्वारा जीवन बीमा से भिन्न किन्हीं के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 8 द्वारा धारा 49 में यथा उपबंधित के सिवाय शब्दों और अंकों का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 16 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 17 द्वारा प्रतिस्थापित ।
13. बीमांकिक रिपोर्ट और संक्षिप्तियां- 1[(1) जीवन बीमा कारबार करने वाला प्रत्येक बीमाकर्ता प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार उसके द्वारा किए गए जीवन बीमा कारबार की वित्तीय स्थिति का जिसके अंतर्गत उससे संबंधित उसके दायित्वों का मूल्यांकन भी है किसी बीमांकक द्वारा अन्वेषण कराएगा, तथा ऐसे बीमांकक कि रिपोर्ट का सार विनियमों के अनुसार तैयार कराएगा:
परंतु प्राधिकरण किसी विशिष्ट बीमाकर्ता की परिस्थितियों को ध्यान रखते हुए उसे उस तारीख से जिसको पूर्ववर्ती अन्वेषण किया गया था, दो वर्ष के अपश्चात् की तारीख को अन्वेषण कराने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा:
परंतु यह और कि प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट रीति में तैयार की जाने वाली बीमांकक की रिपोर्ट का सार तैयार कराएगा ।]
(2) जब कभी लाभों के वितरण की दृष्टि से बीमाकर्ता की वित्तीय स्थिति का अन्वेषण किसी अन्य समय पर किया जाता है या ऐसा अन्वेषण किया जाता है जिसके परिणाम प्रकाशित कर दिए जाते हैं तब संक्षिप्ति तैयार करने के बारे में उपधारा (1) के उपबन्ध लागू होंगे ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक संक्षिप्ति के साथ बीमाकर्ता के प्रधान अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित यह प्रमाणपत्र उपाबद्ध होगा कि हर ऐसी पालिसी की, जिसके अधीन वास्तविक या समाश्रित दायित्व है, पूरी और शुद्ध विशिष्टियां अन्वेषण के प्रयोजन के लिए बीमांकक को दे दी गई हैं ।
2[(4) प्रत्येक ऐसे सार के साथ ऐसे प्ररूप और रीति में जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए तैयार किया गया एक विवरण उपाबद्ध किया जाएगा:
परंतु यदि उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट अन्वेषण किसी बीमाकर्ता द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है तो विवरण प्रत्येक वर्ष उपाबद्ध करना आवश्यक नहीं होगा, किंतु प्रत्येक तीन वर्ष में कम से कम एक बार उसे उपाबद्ध किया जाएगा ।]
(5) जहां बीमाकर्ता की वित्तीय स्थिति का अन्वेषण लेखा वर्ष की समाप्ति की तारीख से भिन्न तारीख को किया जाता है वहां अन्तिम लेखा वर्ष की समाप्ति के पश्चात् की अवधि के लिए लेखे और उस तारीख के तुलनपत्र, जिसको अन्वेषण किया जाता है, इस अधिनियम द्वारा उपबन्धित रीति से तैयार किए जाएंगे और उनकी लेखा परीक्षा की जाएगी ।
1[(6) जीवन बीमा कारबार से संबंधित इस धारा के उपबंध बीमा कारबार के किसी ऐसे उपवर्ग को भी लागू होंगे जिसे “प्रकीर्ण बीमा" वर्ग में सम्मिलित किया गया है, और प्राधिकरण विनियमों में ऐसे उपांतरणों और परिवर्तनों को, जो बीमा कारबार के किसी उपवर्ग को उनके लागू करने को सुकर बनाने के लिए आवश्यक हों, प्राधिकृत कर सकेगा:
परंतु यदि प्राधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि बीमा कारबार के किसी ऐसे उपवर्ग में किसी बीमाकर्ता द्वारा किए गए संव्यवहारों की संख्या और रकम इतनी कम है कि उसका कालिक अन्वेषण और मूल्यांकन अनावश्यक है तो वह उस बीमाकर्ता को बीमा कारबार के उस उपवर्ग के संबंध में इस उपधारा के प्रवर्तन से छूट दे सकेगा ।]
3[14. पालिसियों और दावों का अभिलेख-(1) प्रत्येक बीमाकर्ता, उसके द्वारा किए गए सभी संव्यवहारों के संबंध में, -
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 18 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 18 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 19 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) ऐसी पालिसियों का एक अभिलेख रखेगा, जिसमें बीमाकर्ता द्वारा निर्गमित प्रत्येक पालिसी के संबंध में पालिसीधारी का नाम और पता, पालिसी कराने की तारीख और ऐसे किसी अंतरण, समनुदेशन या नामनिर्देशन का अभिलेख रखेगा, जिसकी बीमाकर्ता को सूचना है;
(ख) दावों का एक अभिलेख, जिसमें किए प्रत्येक दावे के साथ दावे की तारीख, दावाकर्ता का नाम और पता तथा वह तारीख जिसको दावा उन्मोचित किया गया था या किसी खारिज किए गए दावे की दशा में खारिज करने की तारीख और उसके आधार रखेगा; और
(ग) खंड (क) और खंड (ख) के अनुसार पालिसियों और दावों का एक अभिलेख इलैक्ट्रानिक पद्धति सहित किसी ऐसे प्ररूप में, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, रखेगा ।
(2) प्रत्येक बीमाकर्ता, उसके द्वारा किए गए सभी कारबार के संबंध में बीमांकित राशि और प्रीमियम के निबंधनानुसार किसी विनिर्दिष्ट अवसीमा से अधिक की पालिसियां इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाने वाली रीति और प्ररूप में इलैक्ट्रानिक रूप में जारी करने का प्रयास करेगा ।]
1[15. विवरणियों का दिया जाना-(1) धारा 11 या धारा 13 की उपधारा (5) में निर्दिष्ट लेखापरीक्षित लेखे और विवरण तथा धारा 13 में निर्दिष्ट सार और विवरण मुद्रित किए जाएंगे और उनकी चार प्रतियां प्राधिकरण को उस अवधि की समाप्ति से जिससे वे संबंधित हैं, छह मास के भीतर विवरणी के रूप में दी जाएंगी ।
(2) इस प्रकार दी गई चार प्रतियों में से एक प्रति किसी कंपनी की दशा में अध्यक्ष द्वारा और कंपनी के दो निदेशकों और प्रधान अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित की जाएगी और यदि कंपनी का कोई प्रबंध निदेशक है तो उस प्रबंध निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित की जाएगी और एक प्रति, यथास्थिति, उस लेखापरीक्षक द्वारा जिसने लेखापरीक्षा की थी, या बीमांकक द्वारा, जिसने मूल्यांकन किया था, हस्ताक्षरित की जाएगी ।]
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18. रिपोर्टों का दिया जाना-प्रत्येक बीमाकर्ता समुत्थान के कार्यकलापों के विषय में ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट की प्रमाणित प्रति जो बीमाकर्ता के सदस्यों या पालिसीधारियों को दी जाती है, यथास्थिति, सदस्यों या पालिसीधारियों को दिए जाने के ठीक पश्चात् 4[नियंत्रक] को देगा ।
19. साधारण अधिवेशनों की कार्यवाही की संक्षिप्ति-प्रत्येक बीमाकर्ता, जो 5[भारत] में तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन कम्पनी या निगमित निकाय है, 6[प्रत्येक साधारण अधिवेशन की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त की, जो बीमाकर्ता की कार्यवृत्त पुस्तिका में दर्ज है, प्रमाणित प्रति] उस अधिवेशन के जिससे वह सम्बन्धित है, किए जाने के तीस दिन के अन्दर 1[नियंत्रक] को देगा ।
20. दस्तावेजों की अभिरक्षा और निरीक्षण तथा प्रतियों का दिया जाना- 7[(1) प्राधिकरण को दी गई प्रत्येक विवरणी या उसकी अधिप्रमाणित प्रति प्राधिकरण द्वारा रखी जाएगी और निरीक्षण के लिए खुली रहेगी; और कोई व्यक्ति किसी ऐसी विवरणी या उसके किसी भाग की प्रति ऐसी फीस के संदाय पर, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, प्राप्त कर सकेगा ।]
(2) धारा 15 1॥। के उपबन्धों के अनुसार दिए गए लेखा विवरणों और संक्षिप्ति की मुद्रित या प्रमाणित प्रति किसी शेयरधारी या पालिसीधारी को उसके द्वारा उस तारीख से जिसको वह दस्तावेज उसे इस प्रकार दी गई थी, दो वर्ष के अन्दर किसी भी
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 20 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 21 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 22 द्वारा लोप किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 14 द्वारा (1-6-1950 से) प्रत्येक साधारण अधिवेशन की कार्यवाही की संक्षिप्ति के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 23 द्वारा प्रतिस्थापित ।
समय आवेदन किए जाने पर बीमाकर्ता द्वारा उस दशा में जब बीमाकर्ता 2[भारत] में गठित या निगमित या अधिवसित है ऐसे आवेदन के चौदह दिन के अन्दर दी जाएगी और किसी अन्य दशा में वह प्रति ऐसे आवेदन के एक मास के अन्दर दी जाएगी ।
(3) यदि बीमाकर्ता कम्पनी है तो वह अपने संगम-ज्ञापन और संगम-अनुच्छेदों की प्रति किसी पालिसीधारी द्वारा यह आवेदन किए जाने पर कि उसे वह दी जाए 4[ऐसी फीस की, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए] अदायगी पर उसे देगा ।
21. विवरणियों के सम्बन्ध में नियंत्रक की शक्तियां-(1) यदि 1[नियंत्रक] को यह प्रतीत होता है कि उसे जो विवरणी इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन दी गई है वह किसी बात के बारे में अशुद्ध या त्रुटिपूर्ण है तो वह-
(क) उस दशा में, जिसमें कि वह ऐसा निदेश देता है, लेखा परीक्षक या बीमांकक द्वारा प्रमाणित ऐसी अतिरिक्त जानकारी की, जो वह ऐसी विवरणी को ठीक करने या उसकी अनुपूर्ति के लिए आवश्यक समझे, बीमाकर्ता से अपेक्षा कर सकेगा;
(ख) बीमाकर्ता से यह मांग कर सकेगा कि नियंत्रक द्वारा जांच किए जाने के लिए वह 2[भारत] में अपने कारबार के मुख्य स्थान पर कोई लेखा बही, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज पेश करे अथवा कोई ऐसा विवरण दे जिसे नियंत्रक बीमाकर्ता पर इस प्रयोजन के लिए तामील की गई सूचना में विनिर्दिष्ट करे;
(ग) उस विवरणी के संबंध में बीमाकर्ता के किसी अधिकारी की शपथ पर परीक्षा कर सकेगा;
(घ) जिस तारीख को अशुद्धि ठीक करने या कमी दूर करने की मांग करने वाली अध्यपेक्षा बीमाकर्ता को दी गई थी उससे एक मास की समाप्ति के पूर्व [या ऐसे अतिरिक्त समय की समाप्ति के पूर्व, जिसे नियंत्रक, अध्यपेक्षा में विनिर्दिष्ट करे,] वह अशुद्धि ठीक नहीं कर दी जाती है या वह कमी दूर नहीं कर दी जाती है तो वह किसी ऐसी विवरणी को प्रतिगृहीत करने से इन्कार कर सकेगा और यदि वह कोई ऐसी विवरणी प्रतिगृहीत करने से इन्कार कर देता है तो बीमाकर्ता के बारे में यह समझा जाएगा कि वह धारा 15 3॥। 4[या धारा 28] 5[या धारा 28क] 6[या धारा 28ख या धारा 64फ] के उन उपबन्धों का, जो विवरणी दिए जाने से संबंधित हैं, अनुपालन करने में असफल रहा है ।
7[(2) प्रतिभूति अपील अधिकरण, किसी बीमाकर्ता के आवेदन पर और प्राधिकरण को सुनने के पश्चात्, उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन प्राधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश को रद्द कर सकेगा, या ऐसी विवरणी को प्रतिगृहीत करने का निदेश दे सकेगा, जिसको प्राधिकरण ने प्रतिगृहीत करने से इंकार कर दिया है, यदि बीमाकर्ता अधिकरण का यह समाधान कर देता है कि परिस्थितियों में प्राधिकरण की कार्रवाई अयुक्तियुक्त थीः
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक वह उस तारीख से, जब प्राधिकरण ने आदेश किया है या विवरणी को प्रतिगृहीत करने से इंकार किया है, चार मास की समाप्ति के पूर्व न किया गया हो ।]
22. पुनर्मूल्यांकन के लिए आदेश करने की नियंत्रक की शक्ति- 8[(1)] यदि 9[नियंत्रक] को यह प्रतीत होता है कि धारा 13 में निर्दिष्ट किसी अन्वेषण या मूल्यांकन से ही 10॥। बीमाकर्ता के कार्यकलाप की दशा इस कारण समुचित रूप से उपदर्शित नहीं होती कि मूल्यांकन के लिए त्रुटिपूर्ण आधार अपनाया गया है 11[तो 2[नियंत्रक]] बीमाकर्ता को सूचना देने और उसे
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 23 द्वारा लोप किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 15 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 24 द्वारा लोप किया गया ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 13 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 15 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 10 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 24 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 14 द्वारा धारा 22 को उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित और उपधारा (2) अन्तःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 25 द्वारा लोप किया गया ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 14 द्वारा अन्तःस्थापित ।
सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् 1[उस तारीख को जिसे वह विनिर्दिष्ट करे,] अन्वेषण और मूल्यांकन बीमाकर्ता के खर्च पर ऐसे बीमांकक द्वारा करा सकेगा जो बीमाकर्ता द्वारा इस प्रयोजन के लिए नियुक्त 2[नियंत्रक] द्वारा अनुमोदित किया गया है 4[और बीमाकर्ता ऐसे नियुक्त तथा अनुमोदित बीमांकक के समक्ष वह सब सामग्री, जो बीमांकक द्वारा अन्वेषण और मूल्यांकन के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित हो, तीन मास से अन्यून इतनी अवधि के अन्दर जितनी 2[नियंत्रक] विनिर्दिष्ट करे, उपस्थित करेगा ।]
1[(2) इस धारा के अधीन किए जाने वाले अन्वेषण और मूल्यांकन के संबंध में धारा 13 की उपधारा (1) और (4) के 3॥। उपबन्ध लागू होंगे:
परन्तु ऐसे अन्वेषण और मूल्यांकन के परिणामस्वरूप तैयार की गई संक्षिप्ति और विवरण ऐसी तारीख तक दे दिया जाएगा जो 2[नियंत्रक] विनिर्दिष्ट करे ।]
23. दस्तावेजों का साक्ष्य-(1) 2[नियंत्रक] को दी गई ऐसी प्रत्येक विवरणी के बारे में, जिसके बारे में 2[नियंत्रक] ने प्रमाणित किया है कि वह इस प्रकार दी गई विवरणी है, यह समझा जाएगा कि वह इस प्रकार दी गई विवरणी है ।
(2) ऐसी प्रत्येक दस्तावेज के बारे में 2[नियंत्रक] द्वारा यह प्रमाणित होना तात्पर्यित है कि वह ऐसे दी गई विवरणी की प्रति है, यह समझा जाएगा कि वह उस विवरणी की प्रति है और जब तक यह साबित नहीं कर दिया जाता कि उसके साथ मूल विवरणी के बीच कुछ अन्तर है, उसे साक्ष्य में इस रूप में ग्रहण किया जाएगा मानो वह मूल विवरणी है ।
24. [विवरणियों की संक्षिप्ति का प्रकाशित किया जाना ।]-[बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1941 (1941 का 13) की धारा 16 द्वारा निरसित ।]
25. विवरणियों का कानूनी प्ररूपों में प्रकाशित किया जाना-कोई भी बीमाकर्ता किसी विवरणी को 2[भारत] में उस प्ररूप से भिन्न प्ररूप में प्रकाशित नहीं करेगा जिसमें वह 2[नियंत्रक] को दी गई हैः
परन्तु इस धारा की कोई बात प्रचार के प्रयोजनों के लिए ऐसी विवरणियों की सही और शुद्ध संक्षिप्तियां प्रकाशित करने से बीमाकर्ता को निवारित नहीं करेगी ।
26. रजिस्ट्रीकरण के आवेदन के साथ दी गई विशिष्टियों में परिवर्तनों का रिपोर्ट किया जाना-जब कभी ऐसा कोई परिवर्तन हो जाता है या किया जाता है जिससे उन बातों में से किसी पर प्रभाव पड़ता है जिनकी बाबत धारा 3 की उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन यह अपेक्षित है कि वे रजिस्ट्रीकरण के लिए बीमाकर्ता द्वारा किए गए आवेदन के साथ प्रस्तुत की जाए तो बीमाकर्ता ऐसे परिवर्तन की पूरी विशिष्टियां 2[नियंत्रक] को तुरन्त देगा । 4[ऐसी सब विशिष्टियां ऐसी रीति से अधिप्रमाणीकृत की जाएंगी जो उस उपधारा में निर्दिष्ट बातों के अधिप्रमाणीकरण के लिए अपेक्षित है और जहां उस परिवर्तन से उन बीमाकृत दरों, सहूलियतों, निबन्धनों और शर्तों पर, जो जीवन बीमा पालिसी के संबंध में प्रस्थापित की गई हों, प्रभाव पड़ता है, वहां उस परिवर्तन की विशिष्टियों के साथ उक्त उपधारा के खण्ड (च) में निर्दिष्ट बीमांकिक प्रमाणपत्र दिया जाएगा ।]
विनिधान, उधार और प्रबन्ध
5[27. आस्तियों का विनिधान-(1) प्रत्येक बीमाकर्ता-
(क) परिपक्व दावों की बाबत भारत में जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के प्रति अपने दायित्वों की रकम के; और
(ख) भारत में अदायगी के लिए परिपक्व हो रही जीवन बीमा की पालिसियों के अधीन दायित्वों को चुकाने के लिए अपेक्षित रकम के,
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 15 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 17 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 26 द्वारा प्रतिस्थापित ।
योग से अन्यून राशि के बराबर आस्तियां उनमें से निम्नलिखित घटाकर-
(i) उन प्रीमियमों की रकम, जो ऐसी पालिसियों के संबंध में बीमाकर्ता को शोध्य हो चुके हैं किन्तु जिनका संदाय नहीं किया गया है और जिनके संदाय के अनुग्रह दिवस समाप्त नहीं हुए हैं, और
(ii) उन उधारों के लिए बीमाकर्ता को शोध्य कोई रकम, जो भारत में भुगतान के लिए परिपक्व होने वाली उन जीवन बीमा पालिसियों के अभ्यर्पण मूल्य पर और उसके भीतर अनुदत्त किए गए हैं जो उसके द्वारा या ऐसे बीमाकर्ता द्वारा निर्गमित हैं, जिसका कारबार उसने अर्जित कर लिया है और जिसके संबंध में, उसने दायित्व ग्रहण कर लिया है, निम्नलिखित रीति में विनिहित करेगा और सदैव विनिहित रखेगा, अर्थात्ः-
- उक्त राशि का पच्चीस प्रतिशत सरकारी प्रतिभूतियों में, उक्त राशि के पच्चीस प्रतिशत से अन्यून रकम के बराबर अतिरिक्त राशि सरकारी प्रतिभूतियों में या अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में; और
(ख) अतिशेष किन्हीं अनुमोदित विनिधानों में से किसी में,
जो उसमें विनिर्दिष्ट परिसीमाओं, शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) साधारण बीमा कारबार करने वाले किसी बीमाकर्ता की दशा में, आस्तियों का बीस प्रतिशत सरकारी प्रतिभूतियों में, आस्तियों के दस प्रतिशत से अन्यून के बराबर अतिरिक्त राशि सरकारी प्रतिभूतियों में या अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में तथा अतिशेष किसी अन्य ऐसे विनिधान में जो प्राधिकरण के विनियमों के अनुसरण में और ऐसी सीमाओं, शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए, जो इस बाबत प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।]
स्पष्टीकरण-इस धारा में, “आस्तियों" पद से उनकी चालू कीमत पर बीमाकर्ता की सभी आस्तियां अभिप्रेत हैं, किन्तु इनमें ऐसी किसी निधि या उसके भाग जिसकी बाबत प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि, यथास्थिति, ऐसी निधि या उसका भाग भारत के बाहर किसी देश की विधि द्वारा विनियमित होता है या प्रकीर्ण व्यय जिसकी बाबत प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि इस धारा के उपबंधों को लागू करना बीमाकर्ता के हित में नहीं होगा, के प्रति विनिर्दिष्ट रूप से धारित कोई आस्ति सम्मिलित नहीं है ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए, कोई विनिर्दिष्ट आस्तियां, ऐसी शर्तों, यदि कोई हों, के अधीन रहते हुए, जो विनिर्दिष्ट की जाएं, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट अनुमोदित विनिधानों में विनिहित आस्तियां या विनिहित रखी गई आस्तियां समझी जाएंगी ।
(4) उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट आस्तियों की संगणना करने में, भारतीय रुपए से भिन्न किसी करेंसी के प्रति निर्देश से किए गए किसी विनिधान को, जो उस करेंसी के प्रति निर्देश से भारत में बीमाकर्ताओं के दायित्वों को पूरा करने के लिए अपेक्षित रूप से अधिक है, ऐसे आधिक्य की सीमा तक हिसाब में नहीं लिया जाएगाः
परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई बात उपधारा (2) के प्रवर्तन को प्रभावित नहीं करेगीः
परन्तु यह और कि प्राधिकरण या तो साधारणतया या किसी विशिष्ट मामले में यह निदेश दे सकेगा कि कोई विनिधान ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो अधिरोपित की जाएं, ऐसी रीति से हिसाब में, लिया जाएगा जो उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट आस्तियों की संगणना में विनिर्दिष्ट की जाएं और जहां कोई निदेश इस परन्तुक के अधीन जारी किया गया है वहां उसकी प्रतियां उसके जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएंगी ।
(5) जहां किसी बीमाकर्ता ने किसी अन्य बीमाकर्ता द्वारा निर्गमित और भारत में अदायगी के लिए परिपक्व होने वाली किन्हीं जीवन बीमा पालिसियों की बाबत पुनर्बीमा प्रतिगृहीत किया है या उसने स्वयं के द्वारा निर्गमित किन्हीं ऐसी पालिसियों के संबंध में अन्य बीमाकर्ता को पुनर्बीमा अभ्यर्पित किया है, वहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट राशि में ऐसे प्रतिग्रहण में अंतर्वलित दायित्व की रकम जोड़ दी जाएगी और ऐसे अभ्यर्पण में अंतर्वलित दायित्व की रकम उसमें से घटा दी जाएगी ।
(6) वे सरकारी प्रतिभूतियां और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियां, जिनमें उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन आस्तियां विनिहित की जानी हैं और विनिहित रखी जानी हैं, बीमाकर्ता द्वारा किसी विल्लंगम, प्रभार, आडमान या धारणाधिकार से मुक्त रूप में धारित की जाएंगी ।
(7) वे आस्तियां जिनकी बाबत इस धारा के अनुसार यह अपेक्षित है कि वे भारत के बाहर निगमित या अधिवसित बीमाकर्ता द्वारा विनिहित रखी जाएं उनके उस भाग तक की सीमा के सिवाय, जो भारत के बाहर विदेशी आस्तियों के रूप में धृत हैं, भारत में धृत रखी जाएंगी और सभी ऐसी आस्तियां उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रकृति के दायित्वों के उन्मोचन के लिए न्यास के रूप में धृत रखी जाएंगी और भारत में निवासी तथा प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित न्यासियों में विनिहित होंगी, और इस उपधारा के अधीन न्यास लिखत प्राधिकरण के अनुमोदन से बीमाकर्ता द्वारा निष्पादित की जाएगी और उसमें उस रीति का उल्लेख किया जाएगा जिससे केवल न्यास की विषय-वस्तु बरती जाएगी ।
स्पष्टीकरण-यह उपधारा भारत में निगमित ऐसे किसी बीमाकर्ता को लागू होगी जिसकी एक-तिहाई शेयर पूंजी के स्वामी या जिसके शासी निकाय के एक-तिहाई सदस्य भारत से अन्यत्र अधिवसित हैं ।
27क. विनिधानों के संबंध में अतिरिक्त उपबंध-(1) जीवन बीमा कारबार करने वाला कोई बीमाकर्ता उसके द्वारा नियंत्रित निधि के किसी भाग को और साधारण कारबार करने वाला कोई बीमाकर्ता अपनी आस्तियों को ऐसे अनुमोदित विनिधानों से भिन्न किसी विनिधान में, न तो विनिहित करेगा और न ही विनिहित रखेगा, जो उसमें ऐसी परिसीमाओं, शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) धारा 27 की उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, कोई बीमाकर्ता, ठीक आगामी उपधाराओं के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उसके द्वारा नियंत्रित निधि या आस्तियों के किसी भाग को, किसी अनुमोदित विनिधान से भिन्न विनिधानों में विनिहित कर सकेगा या विनिहित रख सकेगा, यदि-
(i) ऐसे विनिधान के पश्चात् बीमाकर्ता के ऐसे सभी विनिधानों की कुल रकम, यथास्थिति, धारा 27 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट राशि के पन्द्रह प्रतिशत या उसकी उपधारा (2) में निर्दिष्ट आस्तियों के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं है;
(ii) वह विनिधान उन सब निदेशकों की सहमति से किया गया है या पहले से किए गए किसी विनिधान की दशा में वह विनिधान अधिवेशन में उपस्थित और मतदान के लिए पात्र सभी निदेशकों की सहमति से चालू रखा गया है जिसकी विशेष सूचना भारत में उस समय विद्यमान सब निदेशकों को दी गई हो और सभी ऐसे विनिधानों सहित, जिनसे कोई निदेशक हितबद्ध हो ऐसे सभी विनिधानों की रिपोर्ट ऐसे सब विनिधानों के सम्पूर्ण ब्यौरों सहित और किसी ऐसे विनिधान में निदेशक के हित की सीमा तक प्राधिकरण को अविलंब दे दी गई हो ।
(3) कोई भी बीमाकर्ता धारा 27 में यथा निर्दिष्ट अपनी नियंत्रित निधि या आस्तियों में से, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट प्रतिशतता से अधिक कोई रकम-
(क) किसी एक बैंककारी कंपनी के शेयरों में विनिहित नहीं करेगा, या
(ख) किसी एक कंपनी के शेयरों या डिबेंचरों में विनिहित नहीं करेगा ।
(4) कोई बीमाकर्ता धारा 27 की उपधारा (2) में यथानिर्दिष्ट उसके द्वारा नियंत्रित निधि या आस्तियों में से किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के शेयरों या डिबेंचरों में न तो कोई रकम विनिहित करेगा और न ही विनिहित रखेगा ।
(5) धारा 27 की उपधारा (2) में यथानिर्दिष्ट नियंत्रित निधि या आस्तियों के भागरूप वे सभी आस्तियां, जो सरकारी प्रतिभूतियां या अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियां नहीं हैं जिनमें आस्तियां इस धारा के अनुसार विनिहित की जानी हैं या विनिहित रखी जानी हैं [उपधारा (2) में यथानिर्दिष्ट नियंत्रित निधि या आस्तियों के मूल्य के एक-बटा दस से अनधिक भाग के सिवाय, जो ऐसी शर्तों और निबंधनों के रहते हुए, जो विहित किए जाएं, किसी विनिधान के प्रयोजनों के लिए, लिए गए किसी ऋण के लिए प्रतिभूति के रूप में दिया जा सकता हैट किसी विल्लंगम, भार, आडमान या धारणाधिकार से मुक्त धारण की जाएंगी ।
(6) यदि किसी समय, प्राधिकरण बीमाकर्ता के किसी एक या एक से अधिक विनिधानों को अनुपयुक्त या अवांछित समझता है, तो प्राधिकरण, बीमाकर्ता को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उसे विनिधान या विनिधानों की रकम वसूल करने का निदेश दे सकेगा और वह बीमाकर्ता ऐसे समय के भीतर, जो प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।
(7) इस धारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसी किसी रीति पर प्रभाव डालती है जिससे किसी कर्मचारी की भविष्य निधि या किसी कर्मचारी से ली गई किसी प्रतिभूति से संबंधित धनराशियां या उसी प्रकृति की कोई अन्य धनराशियां किसी केन्द्रीय अधिनियम या किसी राज्य विधान-मंडल के अधिनियम द्वारा या उसके अधीन धारित की जानी अपेक्षित हैं ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में “नियंत्रित निधि" से निम्नलिखित अभिप्रेत है-
(क) जीवन बीमा कारबार करने वाले किसी बीमाकर्ता की दशा में, -
(i) उसकी सभी निधियां, यदि वह किसी अन्य वर्ग का बीमा कारबार नहीं करता है;
(ii) उसके जीवन बीमा कारबार से संबंधित भारत में की सभी निधियां, यदि वह किसी अन्य वर्ग का बीमा कारबार भी करता है ।
स्पष्टीकरण-उपखंड (i) और उपखंड (ii) के प्रयोजनों के लिए, निधि के अंतर्गत ऐसी कोई निधि या उसका भाग नहीं है, जिसकी बाबत प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि, यथास्थिति, ऐसी निधि या उसके भाग को भारत के बाहर किसी देश की प्रवृत्त विधि द्वारा विनियमित किया जाता है या इस धारा के उपबंधों को लागू करना बीमाकर्ता के हित में नहीं होगा;
(ख) जीवन बीमा कारबार करने वाले किसी अन्य बीमाकर्ता की दशा में, -
(i) भारत में उसकी सभी निधियां, यदि वह किसी अन्य वर्ग का बीमा कारबार नहीं करता है;
(ii) उसके जीवन बीमा कारबार से संबंधित भारत में सभी निधियां, यदि वह किसी अन्य वर्ग के बीमा कारबार भी करता है;
किंतु इसमें कोई निधि या उसका भाग सम्मिलित नहीं है जिसके संबंध में प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है, कि, यथास्थिति, ऐसी निधि या उसका भाग भारत के बाहर किसी देश की विधि द्वारा विनियमित किया जाता है या जिसके संबंध में प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि इस धारा के उपबंधों को लागू करना बीमाकर्ता के हित में नहीं होगा ।
27ख. साधारण बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता की आस्तियों के विनिधानों के संबंध में उपबंध-(1) साधारण बीमा कारबार करने वाले किसी बीमाकर्ता की सभी आस्तियों को, ऐसी शर्तों, यदि कोई हों, के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, धारा 27 में विनिर्दिष्ट अनुमोदित विनिधानों में विनिहित की गई या विनिहित रखी गई आस्तियां समझा जाएगा ।
(2) सभी आस्तियां (उनमें से उनके उस भाग के सिवाय जो मूल्यों में कुल आस्तियों के एक-बटा दस से अधिक नहीं है और जो ऐसी शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, किसी विनिधान या दावों के चुकाने के प्रयोजन के लिए दिए गए किसी उधार के लिए प्रतिभूति के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है या जो पालिसियों के प्रतिग्रहण के लिए बैंकों के पास प्रतिभूति निक्षेप के रूप में रखा जाए) किसी भी विल्लंगम, भार, आडमान या धारणाधिकार से मुक्त धारण की जाएंगी ।
(3) धारा 27क की उपधारा (5) द्वारा प्राधिकरण को प्रदत्त शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस धारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह बीमाकर्ता से यह अपेक्षा करती है कि वह बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 (1968 का 62) के प्रारंभ के पश्चात् धारा 27 की उपधारा (1) के उपबंधों के अनुरूप किए गए किसी विनिधान की वसूली करे, जो ऐसा विनिधान किए जाने के पश्चात् इस धारा के अर्थान्तर्गत कोई अनुमोदित विनिधान नहीं रह गया है ।
27ग. कतिपय मामलों में बीमाकर्ता द्वारा विनिधान-कोई बीमाकर्ता, धारा 27 की उपधारा (2) में यथानिर्दिष्ट अपनी नियंत्रित निधि या आस्तियों के कुल पांच प्रतिशत से अनधिक, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनियमों द्वारा विहित की जाएं, संप्रवर्तकों की कंपनियों में विनिहित कर सकेगा ।
27घ. विनिधान की रीति और शर्तें-(1) इस धारा की किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण, पालिसीधारकों के हित में, विनियमों द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किसी बीमाकर्ता द्वारा धारण की जाने वाली आस्तियों के विनिधान का समय, रीति और अन्य शर्तें विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
(2) प्राधिकरण, ऐसे समय, रीति और अन्य शर्तों के संबंध में विनिर्दिष्ट निदेश दे सकेगा, जिनके अधीन रहते हुए, पालिसीधारियों की निधियां, ऐसे अवसंरचना और सामाजिक क्षेत्र में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं विनिहित की जाएंगी और ऐसे विनियम बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ पर या उसके पश्चात्, भारत में जीवन बीमा, साधारण बीमा, स्वास्थ्य बीमा अथवा पुनर्बीमा कारबार करने वाले सभी बीमाकर्ताओं को एक समान रूप से लागू होंगे ।
(3) प्राधिकरण, कारबार की प्रकृति को ध्यान में रखने के पश्चात् और पालिसीधारियों के हितों के संरक्षण के लिए किसी बीमाकर्ता को उसके द्वारा धारित की जाने वाली आस्तियों के विनिधान के समय, रीति और अन्य शर्तों के संबंध में निदेश जारी कर सकेगा:
परंतु इस उपधारा के अधीन कोई निदेश तब तक जारी नहीं किया जाएगा जब तक संबंधित बीमाकर्ता को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो ।
27ङ. भारत के बाहर निधियों के विनिधान के लिए प्रतिषेध-कोई बीमाकर्ता, पालिसीधारियों की निधियों को प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से भारत के बाहर विनिहित नहीं करेगा ।]
1[28. आस्तियों के विनिधान का विवरण और विवरणी-प्रत्येक बीमाकर्ता, प्राधिकरण को किए गए विनिधानों को विवरणी उनका विवरण देते हुए ऐसे प्ररूप, समय और ऐसी रीति में जिसके अन्तर्गत उसका अधिप्रमाणन भी है, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, देगा ।]
2[29. उधारों का प्रतिषेध-(1) कोई भी बीमाकर्ता, अपने द्वारा निर्गमित जीवन बीमा पालिसियों पर उनके अभ्यर्पण मूल्य की सीमा तक उधार देने के सिवाय संपत्ति के आडमान पर या वैयक्तिक प्रतिभूति पर या अन्यथा, कोई उधार अस्थायी अग्रिम उस दशा में, यदि वह बीमाकर्ता कोई कंपनी है, उसके किसी निदेशक, प्रबंधक, बीमांकक, लेखा परीक्षक या अधिकारी को या किसी अन्य कंपनी या फर्म को, जिसमें कोई ऐसा निदेशक, प्रबंधक, बीमांकक या अधिकारी किसी निदेशक, प्रबंधक, बीमांकक, अधिकारी या भागीदार की हैसियत में है, नहीं देगा :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी बीमाकर्ता द्वारा किसी बैंककारी कंपनी को दिए गए ऐसे उधारों को, जो प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, लागू नहीं होगी:
परन्तु यह और इस धारा की कोई बात किसी कंपनी की किसी समनुषंगी कंपनी या किसी अन्य कंपनी को, जिसकी उधार या अग्रिम देने वाली कंपनी समनुषंगी कंपनी है, ऐसे उधार या अग्रिम देने से प्रतिषिद्ध नहीं करेगी, यदि ऐसे उधार या अग्रिम के लिए प्राधिकारी का पूर्व अनुमोदन ले लिया गया है ।
(2) कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 185 के उपबंध ऐसे किसी बीमाकर्ता के, जो कंपनी है, निदेशक को दिए गए उधार की दशा में लागू नहीं होंगे, यदि ऐसा उधार उस पालिसी की प्रतिभूति पर दिया गया है जिस पर जोखिम बीमाकर्ता वहन करता है और पालिसी निदेशक को उसके स्वयं के जीवन के लिए निर्गमित की गई है और वह उधार उस पालिसी के अभ्यर्पण मूल्य की सीमा के भीतर है ।
(3) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए ऐसा कोई बीमाकर्ता-
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 27 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 28 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) ऐसे उधार के सिवाय जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट है, जिसके अंतर्गत बीमाकर्ता के पूर्णकालिक कर्मचारियों को उसके निदेशक बोर्ड द्वारा सम्यक् रूप से अनुमोदित स्कीम के अनुसार उनके वेतन पैकेज के भागरूप मंजूर किए गए उधार भी हैं, कोई उधार या अग्रिम, संपत्ति के आडमान या वैयक्तिक प्रतिभूति पर या अन्यथा नहीं देगाः
(ख) किसी बीमा अभिकर्ता को अस्थायी अग्रिम उस रूप में उसके कृत्यों को सुकर बनाने के लिए उन दशाओं में देने के सिवाय नहीं देगा, जहां ऐसे अग्रिम कुल मिलाकर उसके द्वारा ठीक पूर्ववर्ती के वर्ष के दौरान उपार्जित नवीकरण कमीशन से अधिक नहीं है ।
(4) जहां ऐसी कोई घटना घटित होती है जिससे ऐसी कोई परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं जिसकी विद्यमानता से उधार या अग्रिम दिए जाने के समय ऐसे अनुदान को इस धारा का उल्लंघन होता है वहां ऐसे उधार या अग्रिम का किसी प्रतिकूल संविदा में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी घटना के घटित होने से तीन मास के भीतर प्रतिसंदाय किया जाएगा ।
(5) उपधारा (4) के उपबंधों का अनुपालन करने में व्यतिक्रम की दशा में, संपृक्त निदेशक, प्रबंधक, लेखा परीक्षक, बीमांकक, अधिकारी या बीमा अभिकर्ता, ऐसी किसी अन्य शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो वह उपगत कर ले तीन मास की समाप्ति पर उधार देने वाले बीमाकर्ता के अधीन उस पद पर नहीं रह जाएगा या उसके लिए कार्य करने से प्रविरत हो जाएगा ।]
1[30. धारा 27, धारा 27क, धारा 27ख, धारा 27ग, धारा 27घ या धारा 29 के उल्लंघनों के कारण हुई हानि के लिए निदेशकों, आदि का दायित्व-यदि बीमाकर्ता को या पालिसीधारियों को धारा 27, धारा 27क, धारा 27ख, धारा 27ग, धारा 27घ या धारा 29 के उपबंधों में से किसी उपबंध के उल्लंघन के कारण कोई हानि उठानी पड़ती है तो ऐसा प्रत्येक निदेशक, प्रबंधक या अधिकारी, जिसने जानबूझकर ऐसे उल्लंघन में भाग लिया है, ऐसी किसी अन्य शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जिसके लिए वह इस अधिनियम के अधीन दायी हो सकता है, ऐसी हानि की रकम की प्रतिपूर्ति करने के लिए संयुक्ततः और पृथक्तः दायी होगा ।]
31. बीमाकर्ता की आस्तियों को किस प्रकार रखा जाएगा- 2[(1) किसी बीमाकर्ता की भारत में की आस्तियों में से कोई भी आस्ति, वहां तक के सिवाय जहां तक कि ऐसी आस्तियां धारा 27 की उपधारा (7) के अधीन न्यासियों में निहित की जानी अपेक्षित हैं, प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित लोक अधिकारी के नाम में या उपक्रम के निगमित नाम में यदि, वह, यथास्थिति, कंपनी या बीमा सहकारी सोसाइटी है, रखे जाने से अन्यथा नहीं रखी जाएगी ।]
3[(2) इस धारा की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि किसी प्रतिभूति या अन्य दस्तावेज को उसे उगाहने अथवा उस पर ब्याज, बोनस या लाभांश प्राप्त करने के एकमात्र प्रयोजन के लिए बैंककारी कम्पनी के पक्ष में पृष्ठांकित करना प्रतिषिद्ध है ।]
4[31क. प्रबंधकों आदि से सम्बन्धित उपबन्ध-(1) इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) में या यदि बीमाकर्ता कम्पनी है तो उसके संगम अनुच्छेदों में या किसी संविदा या करार में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 (1950 का 47) के प्रारम्भ से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् किसी भी बीमाकर्ता का-
(क) प्रबंध किसी कम्पनी या फर्म द्वारा न किया जाएगा, या
(ख) निदेशन या प्रबंध ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाएगा जिसका पारिश्रमिक या उसका कोई भाग बीमाकर्ता के जीवन बीमा कारबार विषयक कमीशन के या बोनस के या मूल्यांकन अधिशेष में हिस्से के रूप में है, और न उपर्युक्त जैसे व्यक्ति को ऐसे बीमाकर्ता द्वारा प्रबन्धक या अधिकारी के रूप में या किसी भी हैसियत में नियोजित किया जाएगा; या
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 29 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 30 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 22 द्वारा (1-6-1950 से) पूर्ववर्ती उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 23 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
(ग) निदेशन या प्रबन्ध ऐसे किसी द्वारा नहीं किया जाएगा जिसका पारिश्रमिक या उसका कोई भाग बीमाकर्ता के साधारण बीमा कारबार विषयक कमीशन या बोनस के रूप में है, और न उपर्युक्त जैसा कोई व्यक्ति ऐसे बीमाकर्ता द्वारा प्रबन्धक या अधिकारी के रूप में या किसी भी हैसियत में नियोजित किया जाएगाः
परन्तु इस उपधारा की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह निम्नलिखित को प्रतिषिद्ध करती है-
1[(i) किसी बीमा अभिकर्ता को उस जीवन बीमा कारबार विषयक कमीशन की अदायगी, जो उसके द्वारा या उसके माध्यम से उपाप्त किया गया है;]
2। । । ।
(iv) ऐसे किसी व्यष्टि का लिपिकीय या अन्य अधीनस्थ हैसियत में नियोजन जो अपने द्वारा प्राप्त बीमा कारबार विषयक कमीशन बीमा अभिकर्ता के रूप में पाता हो;
(v) ऐसे किसी व्यष्टि का अधिकारी के रूप में नियोजन जो ऐसे नियोजन से पूर्व या बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 (1950 का 47) के प्रारम्भ से पूर्व जो भी बाद में हो, बीमा अभिकर्ता के रूप में या अभिकर्ताओं के नियोजक को अपनी हैसियत में अपने द्वारा उपाप्त जीवन बीमा के सम्बन्ध में नवीकरण कमीशन पाता हो;
(vi) साधारण बीमा कारबार के लाभों में किसी हिस्से की अदायगी;
(vii) सब वेतनभोगी कर्मचारियों या उनके किसी वर्ग को अतिरिक्त पारिश्रमिक के रूप में समान आधार पर किसी वर्ष में बोनस की अदायगी ।
(2) इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) में या उस बीमाकर्ता के जो कम्पनी है, संगम अनुच्छेदों में अथवा किसी संविदा या करार में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, कोई भी प्रबन्धक, प्रबन्धक निदेशक या कोई अन्य व्यक्ति, जो बीमाकर्ता के कारबार के प्रबन्ध से संयुक्त है, अपना पद उत्तरवर्ती नामनिर्दिष्ट करने का हकदार नहीं होगा तथा कोई भी व्यक्ति जिसे चाहे बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 के प्रारम्भ के पूर्व या चाहे पश्चात् ऐसे नामनिर्दिष्ट किया गया हो ऐसा पद धारण करने अथवा उस पर बने रहने का हकदार नहीं होगा ।
(3) यदि किसी बीमा कम्पनी की दशा में उस कम्पनी के संगम अनुच्छेदों द्वारा अथवा किसी व्यक्ति और उस कम्पनी के बीच हुए किसी करार द्वारा उस कम्पनी के निदेशक या प्रबन्धक या किसी अन्य अधिकारी को यह शक्ति देने के लिए उपबन्ध किया गया है कि वह किसी अन्य व्यक्ति को अपना पद समनुदिष्ट कर दे और उक्त उपबन्ध के अनुसरण में पद का ऐसा समनुदेशन किया गया है तो वह उक्त उपबन्ध में 3[या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में] किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी शून्य होगा ।
(4) किसी भी व्यक्ति को संविदा से या अन्यथा इस बात का कोई अधिकार नहीं होगा कि वह इस धारा के किसी उपबन्ध के प्रवर्तन के कारण हुई किसी हानि के लिए प्रतिकर पाए ।]
4[31ख. अत्यधिक पारिश्रमिक के दिए जाने को निर्बंधित करने की शक्ति-कोई बीमाकर्ता उसके द्वारा किए गए बीमा कारबार के संबंध में किसी व्यक्ति को पारिश्रमिक के रूप में ऐसी रकम से अधिक रकम, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, कमीशन के रूप में या अन्यथा नहीं देगा ।]
5। । । । ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 31 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 31 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 31 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 32 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 33 द्वारा लोप किया गया ।
1[32क. सम्मिलित अधिकारियों का प्रतिषेध तथा पूर्णकालिक अधिकारियों सम्बन्धी अपेक्षा-(1) बीमाकर्ता का, जो 2॥। जीवन बीमा कारबार कर रहा है, प्रबन्ध निदेशक या अन्य अधिकारी किसी अन्य बीमाकर्ता का, जो जीवन बीमा कारबार कर रहा है अथवा किसी बैंककारी कम्पनी का अथवा किसी विनिधान कम्पनी का प्रबन्ध निदेशक या अन्य अधिकारी न होगाः
परन्तु 3[प्राधिकरण] ऐसे प्रबन्ध निदेशक या अन्य अधिकारी को दो बीमाकर्ताओं के कारबार का समामेलन करने के अथवा एक बीमाकर्ता का कारबार दूसरे को अन्तरित करने के प्रयोजन से जीवन बीमा कारबार करने वाले किसी अन्य बीमाकर्ता का प्रबन्ध निदेशक या अन्य अधिकारी होने की अनुज्ञा दे सकेगी ।
6। । । ।
4[32ख. ग्रामीण और सामाजिक सेक्टर में बीमा कारबार-प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ के पश्चात्, 5[ग्रामीण और सामाजिक सेक्टरों में] उतना प्रतिशत जीवन बीमा कारबार और साधारण बीमा कारबार करेगा जितना प्राधिकरण द्वारा, राजपत्र में, इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए ।
32ग. ग्रामीण या असंगठित सेक्टर और पिछड़े वर्गों के संबंध में बीमाकर्ता की बाध्यताएं-प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ के पश्चात् ऐसे व्यक्तियों को जो ग्रामीण सेक्टर में निवास कर रहे हैं, असंगठित या अनियमित सेक्टर के कर्मकारों अथवा समाज के आर्थिक रूप से असुरक्षित या पिछड़े वर्गों के और ऐसे अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों को जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, जीवन बीमा या साधारण बीमा पालिसियां उपलब्ध कराने के लिए धारा 32ख के अधीन बाध्यताओं का निर्वहन करेगा और ऐसी पालिसियों के अन्तर्गत फसल के लिए बीमा भी होगा ।]
6[32घ. मोटरयान के अन्य पक्षकार जोखिम में बीमा कारबार के संबंध में बीमाकर्ता की बाध्यता-साधारण बीमा कारबार करने वाला प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारम्भ के पश्चात् मोटरयान के अन्य पक्षकार जोखिम से संबंधित बीमा कारबार की उतनी न्यूनतम प्रतिशतता का हामीदार होगा जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएः
परन्तु प्राधिकरण, विनियमों द्वारा, ऐसे किसी बीमाकर्ता को, जो मुख्यतया स्वास्थ्य, पुनर्बीमा, कृषि, निर्यात प्रत्यय प्रत्याभूति के कारबार में लगा हुआ है, इस धारा के लागू होने से छूट प्रदान कर सकेगा ।]
7[33. प्राधिकरण द्वारा अन्वेषण और निरीक्षण की शक्ति-(1) प्राधिकरण किसी भी समय, यदि वह ऐसा करना समीचीन समझता है, लिखित आदेश द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो (जिसे अन्वेषक अधिकारी" कहा गया है), यथास्थिति, किसी बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के क्रियाकलापों का अन्वेषण करने तथा ऐसे अन्वेषक अधिकारी द्वारा किए गए ऐसे किसी अन्वेषण की रिपोर्ट प्राधिकरण को देने का निदेश दे सकेगा:
परन्तु अन्वेषक अधिकारी, जहां कहीं आवश्यक हो, इस धारा के अधीन किसी अन्वेषण में उसकी सहायता करने के प्रयोजन के लिए किसी लेखापरीक्षक या बीमांकक या दोनों को नियोजित कर सकेगा ।
(2) कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 210 में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, अन्वेषक अधिकारी, यथास्थिति, किसी बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती का तथा उसकी बहियों और लेखाओं का अपने एक या अधिक अधिकारियों द्वारा किसी भी समय निरीक्षण करा सकेगा तथा प्राधिकरण द्वारा ऐसा करने के लिए निदेश दिए जाने पर ऐसा कराएगा और अन्वेषक अधिकारी ऐसे निरीक्षण पर रिपोर्ट की एक प्रति, यथास्थिति, या बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को देगा ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 24 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 34 द्वारा लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 35 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 36 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 37 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(3) बीमाकर्ता के प्रत्येक प्रबंधक, प्रबंध निदेशक या अन्य अधिकारी का, जिसके अंतर्गत किसी बीमाकर्ता का सेवा प्रदाता या ठेकेदार भी है, यह कर्तव्य होगा कि वह जहां, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती द्वारा उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण करने अथवा उपधारा (2) के अधीन निरीक्षण करने के लिए निर्दिष्ट अधिकारी के समक्ष सेवाएं बाह्य स्रोत से प्राप्त की जाती हैं वहां ऐसी सब लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें, जो उसकी अभिरक्षा और शक्ति में हैं, पेश करे तथा, यथास्थिति, किसी बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के कार्यकलापों से संबंधित ऐसे विवरण और जानकारी, जिनकी उक्त अन्वेषक अधिकारी द्वारा उससे अपेक्षा की जाए, उतने समय के भीतर उसे दे, जितना उक्त अन्वेषक अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(4) उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण करने के लिए अथवा उपधारा (2) के अधीन निरीक्षण करने के लिए निर्दिष्ट कोई अन्वेषक अधिकारी बीमाकर्ता के कारबार के संबंध में, यथास्थिति, बीमाकर्ता के किसी प्रबंधक, प्रबंध निदेशक या अन्य अधिकारी की, जिसके अंतर्गत बीमाकर्ता का सेवा प्रदाता या ठेकेदार भी है, जहां कि, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती द्वारा बाह्य सेवा प्राप्त की जाती है, शपथ पर परीक्षा कर सकेगा ।
(5) अन्वेषक अधिकारी, ऐसे निरीक्षण के संबंध में प्राधिकरण को रिपोर्ट उस दशा में देगा यदि उसे प्राधिकरण द्वारा निरीक्षण किए जाने का निदेश दिया गया हो ।
(6) उपधारा (1) या उपधारा (5) के अधीन किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर प्राधिकरण, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को रिपोर्ट के संबंध में अभ्यावेदन करने का ऐसा अवसर दिए जाने के पश्चात् जो प्राधिकरण की राय में युक्तियुक्त प्रतीत हो, लिखित आदेश द्वारा,
(क) बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि रिपोर्ट से उद्भूत किसी विषय के बारे में वह ऐसी कार्रवाई करे, जो प्राधिकरण ठीक समझे; या
(ख) यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यतर्वी का रजिस्ट्रीकरण रद्द कर सकेगा; या
(ग) किसी व्यक्ति को निदेश दे सकेगा कि वह, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती, यदि वह कंपनी है, के परिसमापन के लिए न्यायालय में आवेदन करे, भले ही, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती का रजिस्ट्रीकरण खंड (ख) के अधीन रद्द किया गया हो या नहीं ।
(7) प्राधिकरण, उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा वह न्यूनतम जानकारी, जो, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती द्वारा अपनी बहियों में रखी जानी हैं वह रीति, जिसमें ऐसी जानकारी रखी जाएगी, वे जांच-पड़तालें तथा अन्य सत्यापन, जो, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती द्वारा इस संबंध में किए जाने हैं तथा उनसे आनुषंगिक सब अन्य ऐसी बातें जो उसकी राय में अन्वेषक अधिकारी को इस धारा के अधीन अपने कृत्यों का समाधानप्रद रूप में निर्वहन करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हैं, विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “बीमाकर्ता" पद के अन्तर्गत भारत में निगमित बीमाकर्ता की दशा में,
(क) उसकी वे सब समनुषंगी आती हैं, जो अनन्यतः भारत के बाहर बीमा कारबार के प्रयोजन से बनाई गई हैं; और
(ख) उसकी सब शाखाएं आती हैं, भले ही वे भारत में या भारत के बाहर स्थित हों ।
(8) इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(9) इस धारा के अधीन किए गए किसी अन्वेषण के और उससे आनुषंगिक सब व्यय, यथास्थिति, बीमाकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती द्वारा चुकाए जाएंगे तथा बीमाकर्ता से शोध्य अन्य ऋणों पर अग्रता रखेंगे तथा भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलीय होंगे ।]
1[कर्मचारिवृन्द की नियुक्ति]
33क. कर्मचारिवृन्द नियुक्त करने की शक्ति- 2॥। 3[प्राधिकरण] बीमाकर्ताओं द्वारा इस अधिनियम के अधीन दी गई विवरणियों, विवरण और जानकारी की संवीक्षा करने के लिए तथा इस अधिनियम के अधीन नियन्त्रक के कृत्यों का दक्षतापूर्ण पालन सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कर्मचारिवृन्द जिन्हें और ऐसे स्थानों पर जहां वह आवश्यक समझे, नियुक्त कर सकेगा ।
निदेश देने की शक्ति
34. निदेश देने की नियन्त्रक की शक्ति-(1) जहां नियन्त्रक का समाधान हो गया है कि-
(क) लोकहित में; या
(ख) किसी बीमाकर्ता के कार्यकलाप ऐसी रीति में संचालित किए जाने के निवारण के लिए जो पालिसीधारियों के हित के लिए अपायकर है अथवा बीमाकर्ता के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली है; या
(ग) साधारणतः किसी बीमाकर्ता का समुचित प्रबन्ध करने के लिए,
यह आवश्यक है कि बीमाकर्ताओं को साधारणतः या किसी बीमाकर्ता को विशिष्टतः निदेश दिए जाएं, वहां वह समय-समय पर, ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह ठीक समझे और बीमाकर्ता ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए, यथास्थिति, आबद्ध होगा या होंगेः
परन्तु ऐसा कोई निदेश किसी विशिष्ट बीमाकर्ता को तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि ऐसे बीमाकर्ता को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
(2) नियंत्रक दिए गए अभ्यावेदन पर या स्वप्रेरणा से ऐसे किसी निदेश को, जो उपधारा (1) के अधीन दिया गया है, उपान्तरित या रद्द कर सकेगा तथा किसी निदेश को ऐसे उपान्तरित या रद्द करने में ऐसी शर्तें, जैसी वह ठीक समझे तथा जिन पर वह उपांतरण या रद्दकरण प्रभावशील होगा, अधिरोपित कर सकेगा ।
प्रबन्ध पर नियंत्रण
34क. प्रबन्ध निदेशकों आदि की नियुक्ति सम्बन्धी उपबन्धों के संशोधन के लिए नियंत्रक का पूर्वानुमोदन आवश्यक होना-(1) बीमाकर्ता की दशा में-
(क) प्रबन्ध निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक की या प्रबन्धक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी की, चाहे वह किसी नाम से ज्ञात हो, नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति, नियुक्ति के पर्यवसान या पारिश्रमिक से सम्बन्धित किसी उपबन्ध का, भले ही वह उपबन्ध बीमाकर्ता के संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में अथवा उसके द्वारा किए गए किसी करार में या बीमाकर्ता द्वारा साधारण अधिवेशन में या उसके निदेशक बोर्ड द्वारा पारित किसी संकल्प में हो, ऐसा कोई भी संशोधन, जो बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 के प्रारम्भ के पश्चात् किया गया हो, तब तक प्रभावशील नहीं होगा जब तक कि वह नियंत्रक द्वारा अनुमोदित न कर दिया जाए;
(ख) प्रबन्ध निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक की या प्रबन्धक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी की, चाहे वह किसी नाम से ज्ञात हो, ऐसी नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति या नियुक्ति का पर्यवसान, जो बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 के प्रारम्भ के पश्चात् की गई या किया गया है, तब तक प्रभावशील नहीं होगी या होगा जब तक कि ऐसी नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति या नियुक्ति का पर्यवसान नियंत्रक के पूर्वानुमोदन से न की गई या न किया गया हो ।
स्पष्टीकरण-प्रबन्धक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी की, भले ही वह किसी नाम से ज्ञात हो, या प्रबन्ध निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक की पदावधि के दौरान या उसके पर्यवसान के पश्चात् किसी भी रूप में कोई भी फायदा प्रदत्त करने वाले
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 16 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
या कोई भी सुख-सुविधा या परिलब्धि उपबन्धित करने वाले, किसी उपबन्ध की बाबत इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, यह समझा जाएगा कि वह उसके पारिश्रमिक से सम्बन्धित उपबन्ध है ।
(2) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 268 और 269, धारा 309 की उपधारा (3) के परन्तुक, धारा 310 और 311, धारा 387 के परन्तुक तथा धारा 388 (जहां तक कि वह धारा 310 और 311 के उपबन्ध कम्पनी के प्रबन्धक के सम्बन्ध में लागू करती है), की कोई बात ऐसे किसी विषय को लागू नहीं होगी जिसके बारे में उपधारा (1) के अधीन नियंत्रक का अनुमोदन अभिप्राप्त किया जाना है ।
(3) प्रबन्ध निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक अथवा ऐसे निदेशक के रूप में जो बारी-बारी से निवृत्त नहीं होता है, अथवा प्रबन्धक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में, भले ही वह किसी नाम से ज्ञात हो, किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी कार्य को इस आधार पर अविधिमान्य नहीं समझा जाएगा कि बाद में यह पता चला है कि उसकी नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के कारण प्रभावशील नहीं हुई, किन्तु इस उपधारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि बीमाकर्ता को यह दिखा दिए जाने के पश्चात् कि ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति प्रभावशील नहीं हुई है, उस व्यक्ति द्वारा किए गए किसी कार्य को विधिमान्य कर देती है ।
34ख. प्रबन्धकार व्यक्तियों को उनके पद से हटा देने की नियंत्रक की शक्ति-(1) जहां नियंत्रक का समाधान हो गया है कि लोकहित में या बीमाकर्ता के कार्यकलाप ऐसी रीति से संचालित किए जाने के निवारण के लिए, जो पालिसीधारियों के हित के लिए अपायकर है, या किसी बीमाकर्ता का समुचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है वहां वह बीमाकर्ता के किसी निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी को भले ही वह किसी नाम से ज्ञात हो, आदेश द्वारा उसके पद से ऐसी तारीख से, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, तथा ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, हटा सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई भी आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि सम्पृक्त निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी को नियंत्रक के प्रस्थापित आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया होः
परन्तु यदि नियंत्रक की यह राय है कि विलम्ब बीमाकर्ता के अथवा उसके पालिसीधारियों के हितों के लिए अपायकर होगा तो वह अवसर देने के समय अथवा तत्पश्चात् किसी समय आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि पूर्वोक्त अभ्यावेदन के, यदि कोई हो, लम्बित रहने तक, यथास्थिति, वह निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी ऐसे आदेश की तारीख से-
(क) बीमाकर्ता के ऐसे निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्य नहीं करेगा;
(ख) बीमाकर्ता के प्रबन्ध में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी भी रूप में न तो भाग लेना न उससे सम्पृक्त रहेगा ।
(3) यदि बीमाकर्ता के निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी की बाबत उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश किया गया है तो वह, यथास्थिति, ऐसे बीमाकर्ता का निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी न रह जाएगा तथा किसी भी बीमाकर्ता के प्रबन्ध से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी भी रूप में पांच वर्ष से अनधिक इतनी अवधि तक जितनी उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, सम्पृक्त न रहेगा या उसमें भाग न लेगा ।
1[(4) यदि ऐसा कोई व्यक्ति, जिसकी बाबत प्राधिकरण ने उपधारा (1) के अधीन अथवा उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन कोई आदेश किया है, इस धारा के उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह हर ऐसे दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन जारी रहता है, एक लाख रुपए अथवा एक करोड़ रुपए, इनमें से जो भी कम हो, की शास्ति का दायी होगा ।]
(5) यदि उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश किया गया है तो नियंत्रक उस निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी के स्थान पर, जिसे उस उपधारा के अधीन उसके पद से हटाया गया है, समुचित व्यक्ति को लिखित आदेश द्वारा ऐसी तारीख से नियुक्त कर सकेगा जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की गई हो ।
(6) निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में इस धारा के अधीन नियुक्त किया गया व्यक्ति-
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 38 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) नियंत्रक के प्रसादपर्यन्त तथा उसके अधीन रहते हुए अधिक से अधिक तीन वर्ष की अवधि के लिए या एक बार में अधिक से अधिक तीन वर्ष तक की ऐसी अतिरिक्त अवधियों के लिए, जो नियंत्रक विनिर्दिष्ट करे, पद धारण करेगा;
(ख) केवल इस कारण कि वह निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी है या अपने पद के कर्तव्यों के निष्पादन में या उनके सम्बन्ध में सद्भावपूर्वक की गई या न की गई किसी बात के लिए कोई बाध्यता या दायित्व उपगत न करेगा ।
(7) किसी विधि में या किसी संविदा में या संगम-ज्ञापन में या संगम-अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन पद से हटाया गया कोई व्यक्ति पद हानि या पद के पर्यवसान के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
34ग. अपर निदेशक नियुक्त करने की नियंत्रक की शक्ति- 1[(1) यदि प्राधिकरण की यह राय है कि लोकहित में अथवा बीमाकर्ता या उसके पालिसीधारियों के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह समय-समय पर लिखित आदेश द्वारा, केन्द्रीय सरकार के परामर्श से, एक या अधिक व्यक्तियों को, उस तारीख से, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, बीमाकर्ता के अपर निदेशकों के रूप में पद धारण करने के लिए नियुक्त कर सकेगाः
परन्तु इस प्रकार नियुक्त किए गए अपर निदेशकों की संख्या किसी भी समय पांच से या बीमाकर्ता के संगम-ज्ञापनों द्वारा बोर्ड के लिए नियत अधिकतम संख्या के एक-तिहाई से, इनमें से जो भी कम हो, अधिक नहीं होगी ।]
(2) इस धारा के अनुसरण में अपर निदेशक के रूप में नियुक्त व्यक्ति-
(क) नियंत्रक के प्रसादपर्यन्त, तथा उसके अधीन रहते हुए तीन वर्ष से अनधिक की या एक बार में तीन वर्ष में अनधिक की ऐसी अतिरिक्त अवधियों के लिए, जो नियंत्रक विनिर्दिष्ट करे, पद धारण करेगा;
(ख) केवल इस कारण कि वह निदेशक है अथवा अपने पद के कर्तव्यों के निष्पादन में या उनके सम्बन्ध में सद्भापूर्वक की गई या न की गई किसी बात के लिए कोई बाध्यता या दायित्व उपगत न करेगा; और
(ग) से बीमाकर्ता के अर्हतादायी शेयर धारण करना अपेक्षित न होगा ।
(3) बीमाकर्ता के निदेशकों की कुल संख्या के किसी अनुपात की गणना करने के प्रयोजन के लिए ऐसे किसी भी अपर निदेशक को गणना में सम्मिलित नहीं किया जाएगा जिसे इस धारा के अधीन नियुक्त किया गया है ।
34घ. धारा 34ख और 34ग का अन्य विधियों पर अध्यारोही होना-कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, धारा 34ख या 34ग के अनुसरण में किसी निदेशक या मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति या उसका हटाया जाना प्रभावी होगा ।
34ङ. नियंत्रक की अपर शक्तियां-नियंत्रक-
(क) बीमाकर्ताओं को साधारणतः या किसी बीमाकर्ता को विशिष्टतः कोई विशिष्ट संव्यवहार या विशिष्ट प्रकार के संव्यहार करने के सम्बन्ध में चेतावनी दे सकेगा या वैसा करना प्रतिषिद्ध कर सकेगा तथा किसी भी बीमाकर्ता को साधारणतः सलाह दे सकेगा;
(ख) यदि किसी भी समय उसका यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में या बीमाकर्ता के हित में या बीमाकर्ता के कार्यकलाप ऐसी रीति से संचालित किए जाने के निवारण के लिए जो बीमाकर्ता या उसके पालिसीधारियों के हित के लिए अपायकर है, ऐसा करना आवश्यक है तो, लिखित आदेश द्वारा तथा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो उसमें विनिर्दिष्ट की गई हों-
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 39 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(i) बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह अपने कार्यकलाप से सम्बन्धित या उससे उत्पन्न होने वाली किसी बात पर विचार करने के प्रयोजन से अपने निदेशकों का अधिवेशन बुलाए;
(ii) अपने अधिकारियों में से एक या अधिक को बीमाकर्ता के निदेशक बोर्ड के या ऐसी किसी समिति के या ऐसे किसी अन्य निकाय के, जो उसके द्वारा गठित है, किसी अधिवेशन में कार्यवाहियों पर निगरानी रखने के लिए प्रतिनियुक्त कर सकेगा और बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह बीमाकर्ता ऐसे प्रतिनियुक्त अधिकारियों को ऐसे अधिवेशनों में सुनवाई का अवसर दे तथा ऐसे अधिकारियों से यह अपेक्षा भी कर सकेगा कि वे ऐसी कार्यवाहियों की रिपोर्ट नियंत्रक को भेजें;
(iii) बीमाकर्ता के निदेशक बोर्ड से अथवा उस द्वारा गठित किसी समिति या किसी अन्य निकाय से अपेक्षा कर सकेगा कि वह नियंत्रक द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट अधिकारी को लिखित रूप में प्रायिक पते पर बोर्ड अथवा उस द्वारा गठित समिति या अन्य निकाय के किसी अधिवेशन की सब सूचनाएं और ऐसे अधिवेशन से सम्बन्धित सब अन्य संसूचनाएं भेजें;
(iv) अपने अधिकारियों में से एक या अधिक को उस रीति के लिए, जिससे बीमाकर्ता के अथवा उसके कार्यालयों या शाखाओं के कार्यकलाप संचालित किए जा रहे हों, तथा उनके सम्बन्ध में रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त कर सकेगा;
(v) बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह आदेश में विनिर्दिष्ट समय के अन्दर प्रबन्ध में ऐसे परिवर्तन करे जो नियंत्रक आवश्यक समझे ।
34च. पुनर्बीमा करार आदि के बारे में निदेश देने की नियंत्रक की शक्ति-(1) धारा 34 की उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि नियंत्रक की यह राय है कि बीमाकर्ता द्वारा किए गए किसी पुनर्बीमा करार अथवा अन्य पुनर्बीमा संविदा के निबन्धन या शर्तें, बीमाकर्ता के लिए अनुकूल नहीं हैं या लोकहित के लिए अपायकर हैं तो वह बीमाकर्ता से आदेश द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह, जब ऐसे करार या ऐसी संविदा के अगले नवीकरण के लिए उपयुक्त समय आ जाए तब, ऐसे करार या ऐसी संविदा के निबंधनों और शर्तों में ऐसे उपान्तर करे जो वह उस आदेश में निर्दिष्ट करे या ऐसे करार या ऐसी संविदा का नवीकरण न करे, और यदि बीमाकर्ता आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है तो उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों का अनुपालन करने में असफल रहा है ।
(2) यदि नियंत्रक के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई बीमाकर्ता ऐसे पुनर्बीमा करार या अन्य पुनर्बीमा संविदाएं कर रहा है या करने वाला है जो बीमाकर्ता के लिए अनुकूल नहीं हैं या लोकहित के लिए अपायकर हैं तो वह बीमाकर्ता को आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगा कि बीमाकर्ता ऐसा पुनर्बीमा करार या अन्य पुनर्बीमा संविदा तभी करे जब ऐसे करार या ऐसी संविदा की प्रति अग्रिम तौर पर नियंत्रक को दे दी गई हो तथा उसके निबन्धन और शर्तों का नियंत्रक द्वारा अनुमोदन कर दिया गया हो और यदि बीमाकर्ता उस आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है तो उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफल रहा है ।
1। । । ।
34ज. तलाशी और अभिग्रहण-(1) जहां अपनी जानकारी के परिणामस्वरूप 2[प्राधिकरण के अध्यक्ष] के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि-
- जिस व्यक्ति से धारा 33 की उपधारा (2) के अधीन यह अपेक्षा की गई है कि वह अपनी अभिरक्षा या शक्ति में की कोई बहियां, लेखे या अन्य दस्तावेजें पेश करे या कराए, उसने ऐसी बहियां, लेखे या अन्य दस्तावेजें पेश नहीं की या कराई हैं अथवा वह उन्हें पेश करने या कराने में असफल रहा है; या
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 40 द्वारा लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
(ख) जिस व्यक्ति से उपर्युक्त जैसी बहियों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को पेश करने की अध्यपेक्षा की गई है या की जा सकती है वह ऐसी बहियों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को, जो धारा 33 की उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण करने के लिए या उस धारा की उपधारा (1क) के अधीन निरीक्षण करने के लिए उपयोगी या सुसंगत होंगी, पेश नहीं करेगा या कराएगा; या
(ग) बीमाकर्ता द्वारा इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन किया गया है या किया जाना संभाव्य है; या
(घ) बीमाकर्ता द्वारा जिस दावे के तय किए जाने का समय आ गया है वह युक्तियुक्त रकम से अधिक रकम पर तय कर दिया गया है या तय किया जाना संभाव्य है; या
(ङ) बीमाकर्ता द्वारा जिस दावे के तय किए जाने का समय आ गया है वह खारिज कर दिया गया है या किया जाना सम्भाव्य है अथवा युक्तियुक्त रकम से कम रकम पर तय कर दिया गया है या तय किया जाना सम्भाव्य है; या
(च) बीमाकर्ता द्वारा कोई अवैध रिबेट या कमीशन दिया गया है या दिया जाना सम्भाव्य है; या
(छ) यह सम्भाव्य है कि बीमाकर्ता की कोई बहियां, लेखे, रसीदें, वाउचर, सर्वेक्षण रिपोर्टें या अन्य दस्तावेजें बिगाड़ दी जाएं, मिथ्याकृत कर दी जाएं या गढ़ ली जाएं,
वहां वह 1[उपनिदेशक या कोई समतुल्य अधिकारीट की पंक्ति से अनिम्नतर पंक्ति के अपने किसी अधीनस्थ अधिकारी को (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्राधिकृत अधिकारी कहा गया है) प्राधिकृत कर सकेगा कि वह-
(i) ऐसे किसी भवन या स्थान में प्रवेश करे और उसकी तलाशी ले जिसके बारे में उसके पास यह सन्देह करने का कारण है कि वहां ऐसी बहियां, लेखे या अन्य दस्तावेजें अथवा किसी दावे, रिबेट या कमीशन से सम्बन्धित कोई बहियां या कागज-पत्र अथवा कोई रसीदें, वाउचर, रिपोर्टें या अन्य दस्तावेजें रखी हैं;
(ii) यदि उसकी तालियां उपलब्ध नहीं हैं तो, खण्ड (i) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए किसी दरवाजे, बक्से, लाकर, तिजौरी, अल्मारी या अन्य पात्र के ताले को तोड़ दे;
(iii) ऐसी तलाशी के परिणामस्वरूप पाई गई ऐसी सब या किन्हीं बहियों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को अभिगृहीत कर ले;
(iv) ऐसी बहियों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों पर पहचान चिह्न लगा दे अथवा उनके उद्धरण या उनकी प्रतियां तैयार कर ले या करा ले ।
(2) प्राधिकृत अधिकारी उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट सब प्रयोजनों या उनमें से किसी के लिए अपनी सहायतार्थ किसी पुलिस अधिकारी या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या दोनों की सेवाओं की मांग कर सकेगा ।
(3) जहां यह बात साध्य न हो कि कोई ऐसी बही, लेखा या अन्य दस्तावेज, जो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट है, अभिगृहीत कर ली जाए वहां प्राधिकृत अधिकारी उस व्यक्ति पर, जिसका उस पर सीधा कब्जा या नियन्त्रण है इस आदेश की तामील कर सकेगा कि वह व्यक्ति ऐसे अधिकारी की पूर्व अनुज्ञा के बिना उसे न तो हटाए, न अपने से विलग करे, न अन्यथा उसे बरते तथा ऐसा अधिकारी ऐसे कदम उठा सकेगा जो इस उपधारा का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों ।
(4) प्राधिकृत अधिकारी तलाशी या अभिग्रहण के दौरान ऐसे किसी व्यक्ति की शपथ पर परीक्षा कर सकेगा जिसकी बाबत यह पाया गया है कि ऐसी किन्हीं बहियों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों पर उसका कब्जा या नियन्त्रण है, तथा तत्पश्चात् ऐसी परीक्षा के दौरान ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कथन इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में काम में लाया जा सकेगा ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 41 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(5) उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत बहियां, लेखे, कागजपत्र, रसीदें, वाउचर, रिपोर्टें या अन्य दस्तावेजें अभिग्रहण की तारीख से एक सौ अस्सी दिन से अधिक की कालावधि के लिए प्राधिकृत अधिकारी द्वारा तभी रखी जाएंगी जबकि उन्हें रखे रखने के कारण उस द्वारा लिखित रूप में दर्ज कर दिए गए हों तथा ऐसे रखे रखने के लिए 1[प्राधिकरण के अध्यक्ष] का अनुमोदन अभिप्राप्त कर लिया गया हो, अन्यथा नहींः
परन्तु 1[प्राधिकरण के अध्यक्ष] इस अधिनियम के अधीन वाली वे सब कार्यवाहियां समाप्त हो जाने के पश्चात् जिनके लिए बहियां, लेखे, कागज-पत्र, रसीदें, वाउचर, रिपोर्टें या दस्तावेजें सुसंगत हैं, तीस दिन से अधिक की अवधि के लिए उन बहियों, लेखाओं कागज-पत्रों, रसीदों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों का रखा जाना प्राधिकृत न करेगा ।
(6) जिस व्यक्ति की अभिरक्षा में से कोई बहियां, लेखे, कागज-पत्रों, रसीदों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों का, जो उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत की गई है, वह व्यक्ति, प्राधिकृत अधिकारी की अथवा ऐसे किसी अन्य व्यक्ति की, जिसे उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया हो, उपस्थिति में ऐसे स्थान और समय पर जो प्राधिकृत अधिकारी द्वारा इस निमित्त नियत किया गया हो, उनकी नकल कर सकेगा या उनसे उद्धरण ले सकेगा ।
(7) यदि उन बहियों, लेखाओं, कागज-पत्रों, रसीदों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों का, जो उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत की गई है, विधितः हकदार व्यक्ति [प्राधिकरण के अध्यक्षट द्वारा उपधारा (5) के अधीन दिए गए अनुमोदन पर किसी कारणवश कोई आक्षेप करता है तो वह ऐसे आक्षेप के लिए कारणों का कथन करते हुए तथा उन बहियों, लेखाओं, कागज-पत्रों, रसीदों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावोजों को वापस दिए जाने का अनुरोध करते हुए 2[प्रतिभूति अपील अधिकरण] से आवेदन कर सकेगा ।
(8) उपधारा (7) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर 2[प्रतिभूति अपील अधिकरण] को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जैसे वह ठीक समझे ।
(9) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5)3 की तलाशियों और अभिग्रहणों से सम्बन्धित उपबन्ध उपधारा (1) के अधीन की जाने वाली हर तलाशी और अभिग्रहण को, जहां तक सम्भव हो, लागू होंगे ।
(10) केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन तलाशी या अभिग्रहण के सम्बन्ध में 4[राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी]; विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में प्रधिकृत अधिकारी द्वारा-
(i) उस भवन या स्थान में, जिसकी तलाशी ली जानी है, उस दशा में प्रवेश करने के लिए, जिसमें कि उसमें निर्बाध प्रवेश नहीं किया जा सकता,
(ii) इस धारा के अधीन अभिगृहीत बहियों, लेखाओं, कागज़-पत्रों, रसीदों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों की निरापद अभिरक्षा सुनिश्चित करने के लिए,
अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा ।]
बीमा कारबार का समामेलन और अंतरण
35. बीमा कारबार का समामेलन और अंतरण- 5[(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, बीमाकर्ता का कोई भी बीमा कारबार इस धारा के अधीन तैयार की गई और प्राधिकरण द्वारा अनुमोदन की गई स्कीम के अनुसार ही किसी अन्य बीमाकर्ता के बीमा कारबार को अन्तरित या उसमें समामेलित किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।]
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 41 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के संसुगत उपबंधों के प्रति निर्देश किया जाए ।
- 1983 के अधिनियम सं० 20 की धारा 2 द्वारा और अनुसूची द्वारा (15-3-1984 से) नियम बना सकेगी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 42 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(2) इस धारा के अधीन तैयार की गई किसी स्कीम में वह करार दिया हुआ होगा जिसके अधीन ऐसा अंतरण या समामेलन प्रस्थापित हो तथा उसमें ऐसे अन्य उपबन्ध भी होंगे जैसे उस स्कीम को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हों ।
(3) 1[ऐसी किसी स्कीम का अनुमोदन करने के लिए] 2[नियंत्रक] को आवेदन करने से पूर्व आवेदन करने के आशय की सूचना, यथास्थिति, ऐसे समामेलन या अंतरण के स्वरूप के विवरण तथा उसके लिए कारण सहित 3[नियंत्रक] को आवेदन किए जाने के कम से कम दो मास पूर्व भेजी जाएगी 4[तथा निम्नलिखित दस्तावेजों में से हर एक की चार प्रमाणित प्रतियां 8[नियंत्रक] को दी जाएंगी तथा ऐसी अन्य प्रतियांट सम्पृक्त बीमाकर्ताओं के प्रधान और शाखा कार्यालयों में तथा उनके मुख्य अभिकरणों में सदस्यों और पालिसीधारियों के निरीक्षण के लिए पूर्वोक्त दो मास के दौरान खुली रखी जाएंगी, अर्थात्ः-
(क) उस करार या विलेख का प्रारूप जिसके अधीन समामेलन या अंतरण करने की प्रस्थापना है;
5[(ख) ऐसे समामेलन या अन्तरण से संबंध रखने वाले बीमाकर्ताओं में से हर एक के बीमा कारबार की बाबत तुलन-पत्र ऐसे प्ररूपों में तैयार किया जाएगा जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं;
(ग) इस प्रकार संबंध रखने वाले बीमाकर्ताओं में से हर एक के जीवन बीमा कारबार की बाबत बीमांकक रिपोर्ट और संक्षिप्तियां इस संबंध में विनिर्दिष्ट विनियमों के अनुरूप तैयार की जाएंगी;]
(घ) प्रस्थापित समामेलन या अंतरण के बारे में रिपोर्ट, जो ऐसे स्वतन्त्र बीमांकक द्वारा तैयार की गई हो, जो उस समामेलन या अंतरण से संपृक्त पक्षकारों में से किसी से वृत्तिक तौर पर उस तारीख से पूर्ववर्ती पांच वर्षों के अंदर किसी समय भी संबंधित न रहा हो उस तारीख को उसने अपनी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए हों;
(ङ) कोई अन्य रिपोर्टें जिन पर समामेलन या अंतरण की स्कीम आधारित हो,
खण्ड (ख), (ग) और (घ) में निर्दिष्ट तुलनपत्र, रिपोर्टें और संक्षिप्तियां उस तारीख तक की स्थिति के संबंध में तैयार की जाएंगी जिसको 6[समामेलन या अंतरण, जिसका प्राधिकरण ने अनुमोदन कर दिया हो] प्रभावशील होना है, और वह तारीख उस तारीख से पूर्ववर्ती बारह मास से अधिक पूर्व की न होगी जिसको 7[नियंत्रक] से इस धारा के अधीन आवेदन किया गया है :
परन्तु यदि 3[नियंत्रक] किसी विशिष्ट बीमाकर्ता की दशा में ऐसा निदेश देता है तो खण्ड (ख) और खण्ड (ग) में निर्दिष्ट तुलनपत्र, रिपोर्ट और संक्षिप्ति के बदले में, जो इस उपधारा के अनुसार तैयार की गई है, 8[इस अधिनियम की] धारा 11 और 13 के अनुसार 4[अथवा इण्डियन लाइफ अश्योरेंस कम्पनीज़ ऐक्ट, 1912 (1912 का 6) की धारा 7 और धारा 8] के अनुसार तैयार किए गए अंतिम तुनलपत्र तथा अंतिम रिपोर्ट और संक्षिप्ति की प्रमाणित प्रतियां क्रमशः दी जा सकेंगी यदि वह तुलनपत्र उस तारीख तक की स्थिति के संबंध में, जो उस तारीख से बाहर मास से अधिक पूर्व की नहीं है तथा वह रिपोर्ट और संक्षिप्ति उस तारीख की स्थिति के संबंध में, जो उस तारीख से पांच वर्ष से अधिक पूर्व की नहीं है, तैयार की गई हो जिस तारीख को 3[नियंत्रक] से इस धारा के अधीन आवेदन किया गया है ।]
9। । । ।
10[36. प्राधिकरण द्वारा समामेलन और अन्तरण की मंजूरी-यदि धारा 35 की उपधारा (3) के अधीन कोई आवेदन प्राधिकरण को किया जाता है तो प्राधिकरण संपृक्त बीमाकर्ता की किसी भी प्रकार की पालिसी के धारकों को आवेदन की सूचना, उस प्रकृति के विवरण सहित दिलाएगा, और, यथास्थिति, उस समामेलन या अन्तरण के निबन्धनों को ऐसी रीति में
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 26 द्वारा (1-6-1950 से) न्यायालय के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 26 द्वारा (1-6-1950 से) केन्द्रीय सरकार के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 22 द्वारा तथा निम्नलिखित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां केन्द्रीय सरकार को दी जाएंगी तथा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 42 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 26 द्वारा (1-6-1950 से) न्यायालय के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 22 द्वारा (भूतलक्षी रूप से) अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 26 द्वारा (1-6-1950 से) उपधारा (4) का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 43 द्वारा प्रतिस्थापित ।
और ऐसी अवधि के लिए, जो वह निदिष्ट करे, प्रकाशित कराएगा तथा निदेशकों की सुनवाई करने के पश्चात् और पालिसीधारियों के तथा ऐसे किन्हीं अन्य व्यक्तियों के जिनकी बाबत वह यह समझे कि वे सुनवाई के हकदार हैं, आक्षेपों पर विचार करने के पश्चात् उस ठहराव का अनुमोदन कर सकेगा और उस ठहराव को प्रभावी बनाने के लिए ऐसे पारिणामिक आदेश कर सकेगा, जो आवश्यक हों ।]
37. समामेलन और अंतरण के पश्चात् अपेक्षित विवरण-जहां कोई दो या अधिक बीमाकर्ता समामेलित होते हैं अथवा 1[बीमाकर्ता का कोई कारबार] 3[नियंत्रक] द्वारा पुष्ट की गई स्कीम के अनुसार या अन्यथा 7[अंतरित होता है], वहां, यथास्थिति, समामेलित कारबार करने वाला बीमाकर्ता अथवा 7[वह व्यक्ति, जिसे वह कारबार अंतरित किया गया है], समामेलन या अंतरण के पूर्ण होने की तारीख से तीन मास से अन्दर 2[ 3[नियंत्रक] को निम्नलिखित देगा]-
(क) उस स्कीम, करार या विलेख की दो प्रमाणित प्रतियां जिसके अधीन वह समामेलन या अंतरण किया गया है; और
(ख) 4[प्रत्येक संबद्ध पक्षकार द्वारा] या, कम्पनी की दशा में, अध्यक्ष और प्रधान अधिकारी द्वारा 10[हस्ताक्षरित इस घोषणा कीट दो प्रतियां कि उनके सर्वोत्तम विश्वास के अनुसार ऐसा प्रत्येक संदाय, जो किसी भी व्यक्ति को उस समामेलन या अंतरण के कारण किया गया है या जाना है, उसमें पूरी तरह से उपवर्णित कर दिया गया है तथा उसमें वर्णित संदायों से भिन्न अन्य कोई भी संदाय धन में, पालिसियों में, बंधपत्रों में, मूल्यवान प्रतिभूतियों में या अन्य सम्पत्ति के रूप में उस समामेलन या अंतरण के किन्हीं पक्षकारों द्वारा या उनकी जानकारी से न तो किए गए हैं और न किए जाने हैं;
5[(ग) जहां समामेलन या अंतरण धारा 36 के अधीन 3[नियंत्रक] द्वारा 6[अनुमोदन की गई स्कीम] के अनुसार नहीं किया गया है, वहां-
(i) ऐसे समामेलन या अंतरण से संबद्ध बीमाकर्ताओं में से प्रत्येक के बीमा कारबार की बाबत तुलनपत्रों की दो-दो प्रतियां, जो प्रथम अनुसूची के भाग 2 में दिए गए प्ररूप में और उस अनुसूची के भाग 1 में दिए गए विनियमों के अनुसार तैयार किए गए हैं; और
(ii) किन्हीं अन्य रिपोर्टों की प्रमाणित प्रतियां, जिन पर उस समामेलन या अंतरण की स्कीमें आधारित हों ।]
7[37क. समामेलन की स्कीम तैयार करने की नियंत्रक की शक्ति-(1) यदि नियंत्रक का यह समाधान हो गया है कि-
(i) लोकहित में; या
(ii) पालिसीधारियों के हित में; या
(iii) बीमाकर्ता का समुचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने के उद्देश्य से; या
(iv) सम्पूर्ण देश के बीमा कारबार के हित में,
ऐसा करना आवश्यक है तो वह उस बीमाकर्ता का किसी अन्य बीमाकर्ता से (जिसे आगे इस धारा में अन्तरिती बीमाकर्ता कहा गया है) समामेलन करने के लिए स्कीम तैयार कर सकेगाः
परन्तु ऐसी कोई स्कीम तभी तैयार की जाएगी जबकि उस अन्य बीमाकर्ता ने ऐसे समामेलन की प्रस्थापना के लिए अपनी लिखित सहमति दे दी हो ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 24 द्वारा जहां बीमाकर्ता का कोई कारबार किसी अन्य को अंतरित किया जाए के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 22 द्वारा केन्द्रीय सरकार को निम्नलिखित देगा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 28 द्वारा (1-6-1950 से) केन्द्रीय सरकार के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 24 द्वारा प्रत्येक संबंधित बीमाकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित घोषणा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 24 द्वारा मूल खण्ड के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 17 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
(2) पूर्वोक्त स्कीम में निम्नलिखित सभी बातों या उनमें से किसी के लिए उपबंध हो सकेंगे, अर्थात्-
(क) अंतरिती बीमाकर्ता का गठन, नाम और रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, उसकी पूंजी, आस्तियां, शक्तियां, अधिकार, हित, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा उसके दायित्व, कर्तव्य और बाध्यताएं;
(ख) अंतरिती बीमाकर्ता को बीमाकर्ता के कारबार, उसकी सम्पत्तियों, आस्तियों और उसके दायित्वों का ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर अन्तरण जो उस स्कीम में विनिर्दिष्ट हों;
(ग) अन्तरिती बीमाकर्ता के निदेशक बोर्ड में कोई परिवर्तन या उसके नए निदेशक बोर्ड की नियुक्ति तथा वह प्राधिकार जिसके द्वारा, वह रीति जिससे तथा वे अन्य निबन्धन और शर्तें जिन पर ऐसा परिवर्तन या नियुक्ति की जाएगी तथा नए निदेशक बोर्ड या किसी निदेशक बोर्ड या किसी निदेशक की नियुक्ति की दशा में वह अवधि जिसके लिए ऐसी नियुक्ति की जाएगी;
(घ) अन्तरिती बीमाकर्ता की पूंजी में परिवर्तन करने के प्रयोजन से या ऐसे अन्य प्रयोजनों से जो उस समामेलन को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हो, उसके संगम-ज्ञापन और संगम-अनुच्छेदों में परिवर्तन;
(ङ) अन्तरिती बीमाकर्ता द्वारा या उसके विरुद्ध ऐसी किन्हीं कार्रवाइयों या कार्यवाहियों का जो उस बीमाकर्ता के विरुद्ध लम्बित हैं, स्कीम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए चालू रखा जाना;
(च) शेयरधारियों, पालिसीधारियों तथा अन्य लेनदारों के जो हित या अधिकार उस समामेलन के पूर्व बीमाकर्ता में या उसके विरुद्ध हैं, उसमें या उनमें उस विस्तार तक कमी, जिस तक नियंत्रक लोकहित में या शेयरधारियों, पालिसीधारियों, और अन्य लेनदारों के हित में या बीमाकर्ता के कारबार को बनाए रखने के लिए आवश्यक समझता है;
(छ) पालिसीधारियों और अन्य लेनदारों के ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए नकद या अन्यथा संदाय जो, -
(i) समामेलन के पूर्व उस बीमाकर्ता में या उसके विरुद्ध उनके हित या अधिकारों की बाबत हैं, या
(ii) यदि बीमाकर्ता में या उसके विरुद्ध उनका पूर्वोक्त हित या उनके पूर्वोक्त अधिकार खण्ड (च) के अधीन कम कर दिए गए हैं, तो ऐसे कम किए गए हित या अधिकारों की बाबत है;
(ज) बीमाकर्ता के शेयरधारियों को उन शेयरों के बदले में जो समामेलन के पूर्व उस बीमाकर्ता में उनके द्वारा धारित थे [भले ही खण्ड (च) के अधीन ऐसे शेयरों में उनका हित कम किया गया हो या नहीं], अंतरिती बीमाकर्ता के शेयरों का आबंटन या यदि कोई शेयरधारी नकद, न कि शेयरों के आबंटन के रूप में अदायगी का दावा करते हैं अथवा किन्हीं भी शेयरधारियों को शेयर आबंटित करना संभव नहीं है तो उन शेयरधारियों के ऐसे दावे को पूर्णतः चुकाने के लिए नकद संदाय जो-
(i) समामेलन के पूर्व बीमाकर्ता के शेयरों में उनके हित की बाबत है; या
(ii) यदि ऐसा हित खण्ड (च) के अधीन कम कर दिया गया है तो शेयरों में ऐसे कम किए गए उनके हित की बाबत है;
(झ) बीमाकर्ता के सब कर्मचारियों की (उन कर्मचारियों के सिवाय जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ में कर्मकार न होते हुए उस स्कीम में विनिर्दिष्टः वर्णित हैं) सेवाओं का अन्तरिती बीमाकर्ता में उसी पारिश्रमिक पर तथा सेवा के उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर चालू रखा जाना जो उस समामेलन की तारीख के ठीक पूर्व, यथास्थिति, वे पाते थे या उन पर लागू होते थे:
परन्तु स्कीम में यह उपबन्ध होगा कि अंतरिती बीमाकर्ता उक्त कर्मचारियों को समामेलन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि का अवसान होने तक न कि उसके पश्चात्, वह पारिश्रमिक देगा और सेवा के वे निबन्धन और शर्तें मंजूर करेगा जो अंतरिती बीमाकर्ता के तत्समान पंक्ति या प्रास्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को लागू हैं, बशर्ते कि उक्त कर्मचारियों की अर्हताएं और अनुभव वही या उसी के बराबर हों जो अंतरिती बीमाकर्ता के ऐसे अन्य कर्मचारियों के हैं:
परन्तु यह और कि यदि किसी मामले में इस बारे में कोई शंका या मतभेद उत्पन्न होता है कि उक्त कर्मचारियों में से किसी की अर्हता और अनुभव वही है या नहीं या उसी के बराबर है या नहीं जो अंतरिती बीमाकर्ता के तत्समान पंक्ति या प्रास्थिति वाले अन्य कर्मचारियों का है तो वह शंका या मतभेद नियंत्रक को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसका उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा;
(ञ) खण्ड (झ) में किसी बात के होते हुए भी, यदि बीमाकर्ता के कर्मचारियों में से कोई कर्मचारी, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ में कर्मकार न होते हुए खण्ड (झ) के अधीन स्कीम में विनिर्दिष्टतः वर्णित हैं या यदि बीमाकर्ता के कर्मचारियों में से किन्हीं ने, यथास्थिति, बीमाकर्ता को या अन्तरिती बीमाकर्ता को उस तारीख से जिसको स्कीम केन्द्रीय सरकार द्वारा मंजूर की गई है, ठीक आगामी एक मास की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय लिखित सूचना द्वारा अपना यह आशय प्रज्ञापित कर दिया है कि वे अन्तरिती बीमाकर्ता के कर्मचारी नहीं बनना चाहते, तो ऐसे कर्मचारियों को ऐसे प्रतिकर की, यदि कोई हो, अदायगी जिसके वे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ के अधीन हकदार हैं तथा ऐसी पेंशन, उपदान, भविष्य निधि या अन्य सेवानिवृत्ति फायदे जो समामेलन की तारीख से ठीक पूर्व बीमाकर्ता के नियमों या प्राधिकरणों के अधीन उन्हें मामूली तौर से अनुज्ञात थे;
(ट) बीमाकर्ता के समामेलन के लिए कोई अन्य निबन्धन और शर्तें;
(ठ) ऐसी आनुषंगिक, परिणामिक और अनुपूरक बातें जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों कि ऐसा समामेलन पूर्णतः और प्रभावी रूप से कार्यान्वित हो जाएगा ।
(3) (क) नियंत्रक द्वारा तैयार की गई स्कीम के प्रारूप की प्रति बीमाकर्ता को तथा अंतरिती बीमाकर्ता तथा समामेलन से संपृक्त किसी अन्य बीमाकर्ता को भी कोई सुझाव और आक्षेप, यदि कोई हो, इतनी अवधि के अन्दर करने के लिए भेजी जाएगी जितनी नियंत्रक इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट करे ।
(ख) स्कीम प्रारूप में नियंत्रक ऐसे उपान्तर, यदि कोई हों, कर सकेगा जो वह उस बीमाकर्ता से तथा अन्तरिती बीमाकर्ता और समामेलन से संपृक्त किसी अन्य बीमाकर्ता से तथा उन बीमाकर्ताओं में से प्रत्येक के और अन्तरिती बीमाकर्ता के किसी शेयरधारी, पालिसीधारी या अन्य लेनदार से भी, प्राप्त सुझावों और आक्षेपों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक समझे ।
1[(4) तत्पश्चात् स्कीम मंजूर के लिए केन्द्रीय सरकार के समक्ष रखी जाएगी तथा केन्द्रीय सरकार स्कीम को किसी उपान्तरण के बिना या ऐसे उपान्तरणों सहित, जो वह आश्यक समझे, मंजूर कर सकेगी तथा केन्द्रीय सरकार द्वारा मंजूर की गई स्कीम उस तारीख को प्रवृत्त होगी जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित करेः
परन्तु स्कीम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ।
(4क) प्रत्येक बीमाकर्ता का प्रत्येक पालिसीधारी या शेयरधारक या सदस्य समामेलन के पूर्व, उस समामेलन के परिणामस्वरूप बीमाकर्ता में वही हित या उसके विरुद्ध वही अधिकार रखेगा जो उसका उस कंपनी में होता जिसका वह मूल रूप से पालिसीधारी या शेयरधारक या सदस्य थाः
परन्तु जहां किसी शेयरधारक या सदस्य के हित या अधिकार मूल बीमाकर्ता में के हित या उसके विरुद्ध के अधिकारों से कम है वहां वह ऐसे प्रतिकर का हकदार होगा जो प्राधिकरण द्वारा ऐसी रीति में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, निर्धारित किया जाए ।
(4ख) बीमा कंपनी द्वारा ऐसे समामेलन के परिणामस्वरूप इस प्रकार निर्धारित किया गया प्रतिकर शेयरधारक या सदस्य को संदत्त किया जाएगा ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 44 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(4ग) उपधारा (4क) के अधीन प्राधिकरण द्वारा किए गए प्रतिकर के निर्धारण से व्यथित कोई सदस्य या शेयरधारक ऐसे निर्धारण के प्रकाशन से तीस दिन के भीतर प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।]
(5) केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (4) के अधीन दी गई मंजूरी इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगी कि इस धारा की समामेलन संबंधी सब अपेक्षाओं का अनुपालन किया जा चुका है तथा मंजूर की गई स्कीम की ऐसी प्रति, जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी द्वारा लिखित रूप में यह प्रमाणित किया गया हो कि वह उसकी सही प्रति है, सभी विधिक कार्यवाहियों में (भले ही वे अपील में हों या अन्यथा हों) साक्ष्य के रूप में उसी विस्तार तक ग्राह्य होगी जिस मूल स्कीम ग्राह्य होती ।
(6) नियंत्रक भी इस धारा के अधीन तैयार की गई स्कीम में इसी प्रकार परिवर्धन, संशोधन या परिवर्तन कर सकेगा ।
(7) स्कीम या उसके किसी उपबन्ध के प्रवर्तन की तारीख से ही वह स्कीम या वह उपबन्ध, यथास्थिति, बीमाकर्ता पर या अन्तरिती बीमाकर्ता तथा किसी अन्य बीमाकर्ता पर, जो उस समामेलन से सम्पृक्त है, तथा उन बीमाकर्ताओं में से प्रत्येक के तथा अन्तरिती बीमाकर्ता के सब शेयरधारियों पर, पालिसीधारियों पर तथा अन्य लेनदारों पर तथा कर्मचारियों पर भी, आबद्धकर होगा तथा वह उन बीमाकर्ताओं में से किसी के या अन्तरिती बीमाकर्ता के संबंध में कोई अधिकार या दायित्व रखने वाले किसी अन्य व्यक्ति पर भी आबद्धकर होगा ।
(8) उस तारीख से ही, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे बीमाकर्ता की सम्पत्ति और आस्तियां स्कीम के आधार पर और उस विस्तार तक जो स्कीम में उपबन्धित हैं, अन्तरिती बीमाकर्ता को अन्तरित हो जाएंगी और उसमें निहित हो जाएंगी तथा बीमाकर्ता के दायित्व स्कीम के आधार पर और उस विस्तार तक, जो स्कीम में उपबन्धित हैं, अन्तरिती बीमाकर्ता को अन्तरित हो जाएंगे और उसके दायित्व हो जाएंगे ।
(9) यदि स्कीम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा ऐसे उपबन्धों से संगत ऐसी कोई बात कर सकेगी जो उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन से उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
(10) इस धारा के अधीन बनाई गई प्रत्येक स्कीम तथा उपधारा (9) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश की प्रतियां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार द्वारा स्कीम मंजूर किए जाने के पश्चात् या आदेश किए जाने के पश्चात्, यथाशक्य शीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएंगी ।
(11) इस धारा की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह एक ही स्कीम के जरिए कई बीमाकर्ताओं का किसी बीमाकर्ता से समामेलन निवारित करती है ।
(12) इस धारा के तथा उसके अधीन बनाई गई किसी स्कीम के उपबन्ध इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी करार, अधिनिर्णय या अन्य लिखत में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
(13) धारा 37 के उपबन्ध इस धारा के उपबन्धों के अधीन कार्यान्वित किए गए समामेलन को लागू नहीं होंगे ।]
पालिसियों का समनुदेशन या अंतरण तथा नामनिर्देशन
1[38. बीमा पालिसियों का समनुदेश और अन्तरण-(1) बीमा पालिसी का पूर्णतः या भागतः अन्तरण या समनुदेशन, भले ही वह प्रतिफल सहित हो या प्रतिफल रहित, केवल पालिसी पर ही ऐसे पृष्ठांकन द्वारा या ऐसी पृथक् लिखत द्वारा, जो दोनों ही दशाओं में अन्तरक द्वारा या समनुदेशक द्वारा या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित हो तथा कम से कम एक साक्षी द्वारा अनुप्रमाणित हो, अन्तरण या समनुदेशन का तथ्य और उसके लिए कारण, समनुदेशिती का पूर्ववृत्त और वे निबंधन, जिन पर समनुदेशन किया गया है, विनिर्दिष्टतः उसमें उपवर्णित करके किया जा सकेगा ।
(2) कोई बीमाकर्ता अन्तरण या समनुदेशन को स्वीकार कर सकेगा या उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी पृष्ठांकन पर कार्रवाई करने से इंकार कर सकेगा, जहां उसके पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि ऐसा अन्तरण या समनुदेशन
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 45 द्वारा प्रतिस्थापित ।
सद्भावी नहीं है या पालिसीधारी के हित में अथवा लोकहित में नहीं है या बीमा पालिसी का लेन-देन करने के प्रयोजन के लिए है ।
(3) बीमाकर्ता, पृष्ठांकन पर कार्रवाई करने से इंकार करने से पूर्व, ऐसे इंकार के कारणों को लेखबद्ध करेगा और उनकी संसूचना ऐसे अन्तरण या समनुदेशन की सूचना पालिसीधारी को दिए जाने की तारीख से तीस दिन के अपश्चात् पालिसीधारी को देगा ।
(4) कोई व्यक्ति जो, बीमाकर्ता के ऐसे अन्तरण या समनुदेशन के प्रति कार्रवाई करने से इंकार करने के विनिश्चय से व्यथित है, बीमाकर्ता से ऐसे इंकार किए जाने के कारणों की संसूचना की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर प्राधिकरण को दावा प्रस्तुत कर सकेगा ।
(5) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अन्तरण या समनुदेशन सम्यक् रूप से अनुप्रमाणित ऐसे पृष्ठांकन या लिखत के निष्पादन पर पूर्ण और प्रभावी हो जाएगा, किंतु जहां वह अन्तरण या समनुदेशन बीमाकर्ता के पक्ष में है, वहां के सिवाय वह बीमाकर्ता के विरुद्ध प्रवृत्त नहीं होगा और यह अन्तरिती या समनुदेशिती या उसके विधिक प्रतिनिधि को ऐसी पालिसी की रकम के लिए या उसके द्वारा प्रतिभूत धनराशि के लिए वाद लाने का कोई अधिकार तब तक प्रदत्त नहीं करेगा जब तक उस अन्तरण या समनुदेशन की लिखित सूचना और स्वयं पृष्ठांकन या लिखत अथवा उसकी ऐसी प्रति, जिसको अन्तरक और अन्तरिती दोनों ने या उनके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ताओं ने उसकी शुद्ध प्रति होना प्रमाणित कर दिया हो, बीमाकर्ताओं को न दे दी गई होः
परन्तु जहां भारत में बीमाकर्ता के एक या अधिक कारबार के स्थान हैं, वहां ऐसी सूचना केवल उस स्थान पर परिदत्त की जाएगी, जहां पालिसी की तामील की जा रही है ।
(6) उपधारा (5) में निर्दिष्ट सूचना जिस तारीख को बीमाकर्ता को परिदत्त की गई हो, वह तारीख उन व्यक्तियों के बीच, जो पालिसी से हितबद्ध हैं, उन सभी दावों की अग्रता विनियमित करेगी जो अन्तरण या समनुदेशन के अधीन हों; और जहां अन्तरण या समनुदेशन की एक से अधिक लिखत हों, वहां ऐसी लिखतों के अधीन दावों की अग्रता उस क्रम से होगी जिसमें उपधारा (5) में निर्दिष्ट सूचनाएं परिदत्त की गई हों :
परन्तु यदि संदाय की अग्रता के संबंध में कोई विवाद समनुदेशितियों के बीच में उत्पन्न होता है तो विवाद प्राधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा ।
(7) उपधारा (5) में निर्दिष्ट सूचना की प्राप्ति पर, बीमाकर्ता ऐसे अंतरण या समनुदेशन का तथ्य, उसकी तारीख और अन्तरिती या समनुदेशिती के नाम सहित अभिलिखित करेगा तथा उस व्यक्ति के, जिसने सूचना दी थी या अंतरिती या समनुदेशिती के अनुरोध पर ऐसी फीस का संदाय करने पर जो विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसी सूचना की प्राप्ति की लिखित अभिस्वीकृति देगा; तथा ऐसी अभिस्वीकृति बीमाकर्ता के विरुद्ध इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगी कि उसे वह सूचना, जिससे ऐसी अभिस्वीकृति संबंधित है, सम्यक् रूप से प्राप्त हो गई है ।
(8) अन्तरण या समनुदेशन के निबन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, बीमाकर्ता उपधारा (5) में निर्दिष्ट सूचना की प्राप्ति की तारीख से, उस अन्तरिती या समनुदेशिती को, जिसका नाम सूचना में दिया गया है, ऐसा एकमात्र अंतरिती या समनुदेशिती मानेगा, जो उस पालिसी के अधीन फायदे का हकदार है तथा ऐसा व्यक्ति उन सब दायित्वों और साम्याओं के अधीन होगा, जिनके अधीन वह अंतरक या समनुदेशक उस अन्तरण या समनुदेशन की तारीख पर था तथा अंतरक या समनुदेशक की सहमति प्राप्त किए बिना या उसे ऐसी कार्यवाहियों का पक्षकार बनाए बिना उस पालिसी के संबंध में कोई भी कार्यवाहियां संस्थित कर सकेगा, पालिसी के अधीन ऋण प्राप्त कर सकेगा या पालिसी अभ्यर्पित कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-उस दशा के सिवाय जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट पृष्ठांकन में अभिव्यक्त रूप से यह उपदर्शित है कि समनुदेशन या अन्तरण इसके अधीन उपधारा (10) के निबन्धनों के अनुसार सशर्त है, प्रत्येक समनुदेशन या अन्तरण संपूर्ण समनुदेशन या अन्तरण समझा जाएगा और, यथास्थिति, समनुदेशिती या अन्तरिती क्रमशः पूर्ण समनुदेशिती या अन्तरिती समझा जाएगा ।
(9) बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ के पूर्व किए गए समनुदेशन या अन्तरण के अधीन जीवन बीमा पालिसी के किसी समनुदेशिती या अन्तरिती के किन्हीं अधिकारों या उपचारों पर इस धारा के उपबन्धों का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(10) किसी विधि या विधि का बल रखने वाली किसी रूढ़ि में उसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, किसी व्यक्ति के पक्ष में इस शर्त के साथ किया गया समनुदेशन विधिमान्य होगा किः-
(क) पालिसी के अधीन आगम, पालिसीधारी को या समनुदेशिती या अन्तरिती की बीमाकृत व्यक्ति से पूर्व मृत्यु होने की दशा में उसके नामनिर्दिशिती या नामनिर्देशितियों को संदेय हो जाएंगे; या
(ख) बीमाकृत व्यक्ति के पालिसी की अवधि तक जीवित रहने परः
परन्तु सशर्त समनुदेशिती किसी पालिसी पर कोई उधार लेने या पालिसी का अभ्यर्पण करने का हकदार नहीं होगा ।
(11) उपधारा (1) के अधीन बीमा की पालिसी के आंशिक समनुदेशन या अन्तरण की दशा में बीमाकर्ता का दायित्व आंशिक समनुदेशन या अन्तरण द्वारा प्रतिभूत रकम तक सीमित होगा और ऐसा पालिसीधारक उसी पालिस के अधीन संदेय अवशिष्ट रकम का और समनुदेशन या अन्तरण करने का हकदार नहीं होगा ।
39. पालिसीधारी द्वारा नामनिर्देशन-(1) जीवन बीमा पालिसी का धारक अपने ही जीवन पर पालिसी कराते समय या संदाय के लिए पालिसी के परिपक्व होने से पूर्व किसी भी समय उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को नामनिर्दिष्ट कर सकेगा जिसे या जिन्हें वह धनराशि, जो पालिसी द्वारा प्रतिभूत है, उसकी मृत्यु की दशा में दी जाएगीः
परन्तु जहां कोई नामनिर्देशिती अवयस्क है, वहां पालिसीधारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह बीमाकर्ता द्वारा अधिकथित रीति में किसी व्यक्ति को इस दृष्टि से नियुक्त कर दे कि वह नामनिर्देशिती की अवयस्कता के दौरान पालिसीधारी की मृत्यु हो जाने की दशा में वह धनराशि, जो पालिसी द्वारा प्रतिभूत है, प्राप्त करेगा ।
(2) इस दृष्टि से कि कोई ऐसा नामनिर्देशन तब के सिवाय, जबकि वह पालिसी के पाठ में ही समाविष्ट हो, पालिसी पर पृष्ठांकन द्वारा प्रभावी किया जाएगा, जिसकी संसूचना बीमाकर्ता को दे दी गई हो और जिसे उसने पालिसी संबंधी अभिलेखों में दर्ज कर लिया हो, तथा ऐसा नामनिर्देशन संदाय के लिए पालिसी के परिपक्व होने के पूर्व किसी भी समय, यथास्थिति, पृष्ठांकन द्वारा या अतिरिक्त पृष्ठांकन द्वारा या विल द्वारा रद्द या परिवर्तित किया जा सकेगा, किन्तु जब तक कि ऐसे रद्दकरण या परिवर्तन की लिखित सूचना बीमाकर्ता को नहीं दे दी जाती, बीमाकर्ता पालिसी के पाठ में उल्लिखित या बीमाकर्ता के अभिलेखों में दर्ज नामनिर्देशिती को पालिसी पर अपने द्वारा सद्भावपूर्वक किए गए किसी संदाय के लिए दायी न होगा ।
(3) बीमाकर्ता नामनिर्देशन या उसका रद्दकरण या परिवर्तन दर्ज कर लेने की लिखित अभिस्वीकृति पालिसीधारी को देगा तथा ऐसा रद्दकरण या परिवर्तन दर्ज करने के लिए ऐसी फीस प्रभारित कर सकेगा जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(4) धारा 38 के अनुसार किया गया पालिसी का अन्तरण या समनुदेशन स्वतः नामनिर्देशन को रद्द कर देगाः
परन्तु ऐसे बीमाकर्ता को जो समनुदेशन के समय पालिसी पर जोखिम उठाता है, पालिसी के ऐसे समनुदेशन से, जो पालिसी के अभ्यर्पण मूल्य के अंदर उस पालिसी की प्रतिभूति पर उस बीमाकर्ता द्वारा दिए गए उधार के प्रतिफलस्वरूप किया गया है, या उधार को चुका दिए जाने पर उसके पुनः समनुदेशन से नामनिर्देशन रद्द नहीं होगा, बल्कि उससे नामनिर्देशिती के अधिकारों पर केवल उसी विस्तार तक प्रभाव पड़ेगा जहां तक उस पालिसी में बीमाकर्ता का हित हैः
परन्तु यह और कि पालिसीधारी को अन्तरिती या समनुदेशिती द्वारा दिए गए उधार के प्रतिफल में पालिसी का अन्तरण या समनुदेशन, चाहे पूर्णतः हो या भागतः, नामनिर्देशन को रद्द नहीं करेगा, किन्तु नामनिर्देशिती के अधिकारों को, यथास्थिति, पालिसी में केवल अंतरिती या समनुदेशिती के हित की सीमा तक प्रभावित करेगाः
परन्तु यह भी कि वह नामनिर्देशन, जो अन्तरण या समनुदेशन के परिणामस्वरूप स्वतः रद्द हो गया है वह नामनिर्देशन तब स्वतः ही पुनःप्रवर्तित हो जाएगा जब बीमाकर्ता को पालिसी की प्रतिभूति पर उधार से भिन्न उधार का प्रतिसंदाय करने पर पालिसीधारी के पक्ष में समनुदेशिती द्वारा पुनः समनुदेशन या अन्तरिती द्वारा पुनः अन्तरण कर दिया गया हो ।
(5) यदि पालिसी उस व्यक्ति के जीवनकाल के दौरान, जिसके जीवन का बीमा किया गया है, संदाय के लिए परिपक्व हो जाती है या यदि नामिर्देशिती की अथवा एक से अधिक नामनिर्देशिती होने की दशा में, सभी नामिर्देशितियों की संदाय के लिए पालिसी के परिपक्व होने के पूर्व मृत्यु हो जाती है तो पालिसी द्वारा प्रतिभूत रकम, यथास्थिति, पालिसीधारी को या उसके वारिसों या विधिक प्रतिनिधियों को या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के धारक को संदेय होगी ।
(6) जहां नामनिर्देशिती अथवा यदि एक से अधिक नामनिर्देशिती हों, तो एक या अधिक नामनिर्देशिती, उस व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् जिसके जीवन का बीमा किया गया है, जीवित बचा रहता है या रहते हैं तो उस पालिसी द्वारा प्रतिभूत रकम ऐसे उत्तरजीवी उत्तरजीवियों को संदेय होगी ।
(7) इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए जहां अपने ही जीवन पर बीमा पालिसी का धारक अपने माता-पिता या अपने पति या अपनी पत्नी या अपने बच्चों या अपने पति या अपनी पत्नी और बच्चों या उनमें से किसी को नामनिर्देशित करता है वहां नामिर्देशिती बीमाकर्ता द्वारा उपधारा (6) के अधीन उसे या उनको संदेय रकम के फायदा पाने का हकदार होगा या होंगे जब तक यह साबित न कर दिया जाए कि पालिसी का धारक पालिसी में अपने हक की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए नामनिर्देशिती को ऐसे कोई फायदा पाने का हक प्रदान नहीं कर सकता था ।
(8) पूर्वोक्त के अधीन रहते हुए, जहां नामनिर्देशिती या यदि एक से अधिक नामनिर्देशिती हैं तो कोई नामनिर्देशिती या ऐसे नामनिर्देशिती, जिसको/जिनको उपधारा (7) लागू होती है, उस व्यक्ति के, जिसका जीवन बीमाकृत है, किन्तु पालिसी द्वारा प्रतिभूत रकम का संदाय करने के पूर्व, मृत्यु होती है तो पालिसी द्वारा प्रतिभूत रकम या पालिसी द्वारा प्रतिभूत उतनी रकम जो (यथास्थिति), उस नामनिर्देशिती या उन नामनिर्देशितियों के जिनकी मृत्यु हो जाती है, अंश को दर्शाती है, यथास्थिति, नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के वारिसों या विधिक प्रतिनिधियों या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के धारक को संदेय होगी और वे उस रकम का फायदा पाने के हकदार होंगे ।
(9) उपधारा (7) और उपधारा (8) की किसी बात का किसी जीवन बीमा पालिसी के आगमों से संदत्त किए जाने वाले किसी उधार देने वाले के अधिकार को नष्ट करने या उसमें अड़चन डालने का प्रभाव नहीं होगा ।
(10) उपधारा (7) और उपधारा (8) के उपबंध बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारम्भ के पश्चात् संदाय के लिए परिपक्व होने वाली सभी जीवन बीमा पालिसियों को लागू होंगे ।
(11) जहां पालिसीधारी की पालिसी की परिपक्वता के पश्चात् मृत्यु हो जाती है किन्तु उसकी पालिसी के आगम और फायदे उसकी मृत्यु के कारण उसे नहीं दिए गए हैं, वहां उस दशा में उसका नामनिर्देशिती उसकी पालिसी के आगमों और फायदे का हकदार होगा ।
(12) इस धारा के उपबंध किसी ऐसी जीवन बीमा पालिसी को लागू नहीं होंगे जिसको विवाहित स्त्री संपत्ति अधिनियम, 1874 (1874 का 3) की धारा 6 लागू होती है या किसी समय लागू रही हैः
परन्तु जहां बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् ऐसे व्यक्ति की, जिसने अपने जीवन या अपनी पत्नी के जीवन और सन्तानों या उनमें से किसी के जीवन का स्पष्ट रूप से बीमा कराया है, पत्नी के पक्ष में किया गया नामनिर्देशन इस धारा के अधीन किया गया अभिव्यक्त होता है, चाहे यह बात पालिसी के मुख्य भाग पर स्पष्ट रूप से अंकित है या नहीं, वहां उक्त धारा 6 के बारे में यह समझा जाएगा कि वह न तो पालिसी को लागू है और न ही लागू रही है ।
40. बीमा कारबार उपाप्त करने के लिए कमीशन के रूप में या अन्यथा संदाय का प्रतिषेध-(1) कोई भी व्यक्ति कमीशन के रूप में या अन्यथा कोई पारिश्रमिक या पारितोषिक बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के सिवाय किसी व्यक्ति को भारत में बीमा कारबार के लिए याचना करने या उसे उपाप्त करने के लिए, ऐसी किसी रीति में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, नहीं देगा और न ही देने की संविदा करेगा ।
(2) कोई भी बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती भारत में किसी बीमाकर्ता द्वारा निर्गमित पालिसियों की बाबत किसी रूप में कमीशन या पारिश्रमिक इस संबंध में विनिर्दिष्ट विनियमों के अनुसार ही प्राप्त करेगा या प्राप्त करने की संविदा करेगा, अन्यथा नहींः
परन्तु प्राधिकरण, उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन विनियम बनाते समय, पालिसी की प्रकृति और अवधि पर और विशिष्टतया संयुक्त अभिकर्ताओं और अन्य मध्यवर्तियों के हित को ध्यान में रखेगा ।
(3) पूर्ववर्ती उपधाराओं या इस संबंध में विरचित विनियमों के उपबंधों में से किसी उपबंध के किसी बीमाकर्ता द्वारा उल्लंघन की बाबत, धारा 102 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कोई ऐसा बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती, जो उक्त उपबंधों का उल्लंघन करेगा, ऐसी शास्ति का दायी होगा जो एक लाख रुपए तक की हो सकेगी ।]
1। । । । ।
2[40ख. जीवन बीमा कारबार में प्रबंध व्ययों की परिसीमा-कोई भी बीमाकर्ता, भारत में उसके द्वारा किए गए बीमा कारबार की बाबत, किसी वित्तीय वर्ष में उस रकम से अधिक रकम, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, प्रबंध व्ययों के रूप में खर्च नहीं करेगा ।
40ग. साधारण, स्वास्थ्य बीमा और पुनर्बीमा कारबार में प्रबंध व्ययों की परिसीमा-भारत में बीमा कारबार करने वाला प्रत्येक बीमाकर्ता प्राधिकरण को प्रबंध व्ययों का ब्यौरा ऐसी रीति और ऐसे प्ररूप में देगा, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।]
41. रिबेट विषयक प्रतिषेध-(1) कोई भी व्यक्ति भारत में जीवन या सम्पत्ति से संबंधित किसी प्रकार की जोखिम की बाबत 3[बीमा करने या बीमा नवीकृत करने या बीमा चालू रखने के लिएट उत्प्रेरणा के रूप में प्रत्यक्षतः या परोक्षतः किसी भी व्यक्ति को उस पूरे कमीशन की जो पालिसी पर देय है या उसके किसी भाग की कोई रिबेट अथवा पालिसी पर दिखाए गए प्रीमियम की ऐसी रिबेट के सिवाय न तो देगा और न देने का प्रस्ताव ही करेगा और न पालिसी लेने वाला या नवीकृत करने वाला 4[या चालू रखने वाला] कोई भी व्यक्ति कोई भी रिबेट ऐसी रिबेट के सिवाय प्रतिगृहीत करेगा जो बीमाकर्ता की प्रकाशित विवरण पत्रिकाओं या सारणियों के अनुसार अनुज्ञात किया जा सकता हैः
4[परन्तु बीमा अभिकर्ता द्वारा अपने ही जीवन पर ली गई जीवन बीमा पालिसी के संबंध में किसी कमीशन के प्रतिग्रहण की बाबत यह बात कि वह इस उपधारा के अर्थ के अन्दर प्रीमियम के रिबेट का प्रतिग्रहण है, उस दशा में न समझी जाएगी जिसमें कि ऐसे प्रतिग्रहण के समय बीमा अभिकर्ता विहित शर्तों की पूर्ति करते हुए यह सिद्ध कर देता है कि वह बीमाकर्ता द्वारा नियोजित वास्तविक बीमा अभिकर्ता है ।]
5[(2) ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस धारा के उपबंधों के अनुपालन में व्यतिक्रम करेगा, शास्ति के लिए, जो दस लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]
6[42. बीमा अभिकर्ताओं की नियुक्ति-(1) कोई बीमाकर्ता किसी व्यक्ति को अपने लिए बीमा कारबार की याचना करने और उसे उपाप्त करने के प्रयोजन के लिए बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगाः
परन्तु ऐसा व्यक्ति उपधारा (3) में वर्णित निर्रहताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं होगा ।
(2) कोई भी व्यक्ति एक जीवन बीमाकर्ता, एक साधारण बीमाकर्ता, एक स्वास्थ्य बीमाकर्ता से अधिक बीमाकर्ता तथा अन्य मोनेलाइन बीमाकर्ताओं में से प्रत्येक के एक से अधिक के लिए बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य नहीं करेगाः
परन्तु प्राधिकरण, विनियम विरचित करते समय यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे किसी अभिकर्ता का, उन दो या अधिक बीमाकर्ताओं का, जिनके लिए वह एक अभिकर्ता हो, प्रतिनिधित्व करने में हित में कोई परस्पर विरोध अनुज्ञात न किया जाए ।
(3) उपधारा (1) के परंतुक में निर्दिष्ट निर्हताएं निम्नलिखित होंगीः-
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 46 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 47 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 27 द्वारा प्रभाव या नवीकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 27 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 48 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 49 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) यह कि वह व्यक्ति अवयस्क है;
(ख) यह कि सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा उसे विकृतचित्त पाया गया है;
(ग) यह कि सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा उसे आपराधिक दुर्विनियोग या आपराधिक न्यासंभग या छल या कूटरचना का या ऐसे किसी अपराध के दुष्प्रेरण का या उसे करने के प्रयास का दोषी पाया गया हैः
परन्तु जहां किसी ऐसे अपराध की बाबत किसी व्यक्ति पर अधिरोपित दंडादेश की समाप्ति से कम से कम पांच वर्ष व्यतीत हो गए हैं, वहां प्राधिकरण ऐसे व्यक्ति की बाबत मामूली तौर पर यह घोषणा करेगा कि उसकी दोषसिद्धि इस खंड के अधीन निरर्हता के रूप में प्रवृत्त नहीं रह गई है;
(घ) यह कि किसी बीमा पालिसी से या किसी बीमाकर्ता के परिसमापन से संबंधित किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान या बीमाकर्ता के कार्यकलापों के अन्वेषण के दौरान यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वह बीमाकर्ता या बीमाकृत के प्रति किसी कपट, बेईमानी या दुर्व्यपदेशन का दोषी रहा है या जानते हुए उसमें भागीदार रहा है या ऐसे अपराध के प्रति मौनानुकूल रहा है;
(ङ) यह कि किसी व्यष्टि की दशा में, उसके पास विनियमों द्वारा यथाविनिर्दिष्ट अपेक्षित अर्हताएं या व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं है अथवा उसने परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है;
(च) यह कि आवेदन करने वाली किसी कंपनी या फर्म की दशा में निदेशक या भागीदार या उसके अधिकारियों में से एक या अधिक अधिकारी या उसके द्वारा इस प्रकार अभिहित अन्य कर्मचारियों और किसी अन्य व्यक्ति की दशा में मुख्य कार्यपालक, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो या उसके द्वारा अभिहित उसके एक या अधिक कर्मचारियों के पास अपेक्षित अर्हताएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं है और उन्होंने खंड (ङ) और खंड (छ) के अधीन यथा अपेक्षित कोई परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है;
(छ) यह कि उसने ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;
(ज) यह कि उसने विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट आचार संहिता का अतिक्रमण किया है ।
(4) कोई व्यक्ति जो बीमा अभिकर्ता के रूप में इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में कार्य करता है, वह ऐसी शास्ति के लिए जो दस हजार रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा और कोई बीमाकर्ता या बीमाकर्ता की ओर से कार्य करने वाला कोई व्यक्ति, जो ऐसे किसी व्यक्ति को बीमा अभिकर्ता के रूप में नियुक्त करता है, जो उस रूप में कार्य करने के लिए अनुज्ञात नहीं है या भारत में बीमा कारबार ऐसे किसी व्यक्ति के माध्यम से करेगा, वह ऐसी शास्ति के लिए, जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।
(5) बीमाकर्ता अपने अभिकर्ताओं के सभी कार्यों और लोपों के लिए, जिनके अंतर्गत उपधारा (3) के खंड (ज) के अधीन विनिर्दिष्ट आचार संहिता का अतिक्रमण भी है, उत्तरदायी होगा और ऐसी शास्ति के लिए दायी होगा, जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी ।]
1[42क. प्रधान अभिकर्ता, विशेष अभिकर्ता के माध्यम से बीमा कारबार और बहुस्तरीय विपणन का प्रतिषेध-(1) कोई भी बीमाकर्ता, बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किसी प्रधान अभिकर्ता, मुख्य अभिकर्ता और विशेष अभिकर्ता को नियुक्त नहीं करेगा और उनके माध्यम से भारत में कोई बीमा कारबार नहीं करेगा ।
(2) कोई भी व्यक्ति, बहुस्तरीय विपणन स्कीम के माध्यम से किसी बीमा पालिसी को लेने या उसका नवीकरण कराने या जारी रखने के लिए किसी व्यक्ति को उत्प्रेरणा के रूप में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अनुज्ञात नहीं करेगा या अनुज्ञात करने की प्रस्थापना नहीं करेगा ।
(3) प्राधिकरण, इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी के माध्यम से बहुस्तरीय विपणन स्कीम में अंतर्वलित इकाई या व्यक्तियों के विरुद्ध समुचित पुलिस प्राधिकारियों को शिकायत कर सकेगा ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 50 द्वारा प्रतिस्थापित ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, बहुस्तरीय विपणन स्कीम" से उक्त प्रयोजन के लिए प्राधिकृत न किए गए व्यक्तियों के माध्यम से बीमा कारबार की याचना करने और उसे उपाप्त करने के प्रयोजनार्थ ऐसी याचना और उपापन के माध्यम से अर्जित कमीशन या पारिश्रमिक के संपूर्ण या भागिक प्रतिफल सहित या उसके बिना कोई स्कीम या कार्यक्रम या ठहराव या योजना (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उक्त प्रयोजन के लिए प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी बहुस्तरीय श्रृंखला में व्यक्तियों का नामांकन भी है ।]
1[42घ. मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को 2[रजिस्ट्रीकरण] जारी करना-(1) प्राधिकरण या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी, विनियमों द्वारा अवधारित रीति से आवेदन करने वाले किसी व्यक्ति को जो इसमें वर्णित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है, इस अधिनियम के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने की 3[रजिस्ट्रीकरण] प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित रीति से और प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित फीस की अदायगी पर, देगाः
परन्तु यह तब जब कि-
(क) व्यष्टि की दशा में, वह धारा 42 की 3[उपधारा (3)] में उल्लिखित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है; या
(ख) कंपनी या फर्म की दशा में, इसके निदेशकों या भागीदारों में से कोई भी, उक्त निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है ।
(2) इस धारा के अधीन दी गई 3[रजिस्ट्रीकरण] का धारक मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने का हकदार हो जाएगा ।
(3) इस धारा के अधीन 3[किए गए रजिस्ट्रीकरण] उसके दिए जाने की तारीख से केवल तीन वर्ष की अवधि तक ही प्रवृत्त रहेगी किन्तु, यदि आवेदक, व्यष्टि है, तो वह आवेदक अथवा आवेदक कंपनी या फर्म है तो, उसके निदेशकों या भागीदारों 4[अथवा उनके द्वारा इस प्रकार पदाभिहित उनके एक या अधिक अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों और किसी अन्य व्यक्ति की दशा में, मुख्य कार्यपालक, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, या उसके द्वारा पदाभिहित उसके एक या अधिक कर्मचारियोंट में से कोई 1[धारा 42 की उपधारा (3) के खंड (ख), खंड (ग), खंड (घ), खंड (ङ) और खंड (छ)] में उल्लिखित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है और अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए आवेदन निर्गमन प्राधिकारी के पास उस तारीख से, जिसको 1[रजिस्ट्रीकरण] प्रवृत्त नहीं रह जाता, कम से कम तीस दिन पूर्व पहुंच गया है तो वह 1[रजिस्ट्रीकरण] प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित फीस का संदाय करने पर और यदि 1[रजिस्ट्रीकरण] के नवीकरण का आवेदन निर्गमन प्राधिकारी के पास उस तारीख से, जिसको वह 1[रजिस्ट्रीकरण] प्रवृत्त नहीं रह गया है, कम से कम तीस दिन पूर्व नहीं पहुंचता है तो शास्ति के रूप में विनियमों द्वारा अवधारित अतिरिक्त फीस का, जो सौ रुपए से अधिक नहीं होगी, संदाय करने पर एक बार में तीन वर्ष की अवधि के लिए नवीकृत किया जाएगा ।
(4) इस धारा के अधीन 1[रजिस्ट्रीकरण] के नवीकरण के लिए कोई भी आवेदन उस दशा में ग्रहण नहीं किया जाएगा, जब कि वह, आवेदन, निर्गमन प्राधिकारी के पास उस अनुज्ञप्ति के प्रवृत्त न रह जाने के पूर्व नहीं पहुंच जाताः
परन्तु यदि प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि अन्यथा असम्यक् कठिनाई होगी तो वह इस उपधारा के उल्लंघन में किसी आवेदन को आवेदक द्वारा सात सौ पचास रुपए की शास्ति का संदाय किए जाने पर स्वीकार कर सकेगा ।
(5) ऊपर निर्दिष्ट निरर्हताएं निम्नलिखित होंगीः-
(क) यह कि वह व्यक्ति अवयस्क है;
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 51 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 51 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 51 द्वारा अंतःस्थापित ।
(ख) यह कि सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि वह विकृतचित्त है;
(ग) यह कि उसके बारे में सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि वह आपराधिक दुर्विनियोजन या आपराधिक न्यास भंग या छल या कूटरचना का या ऐसे किसी अपराध के दुष्प्रेरण का या उसे करने के प्रयत्न का दोषी हैः
परन्तु जहां किसी ऐसे अपराध की बाबत किसी व्यक्ति पर अधिरोपित दंडादेश की समाप्ति से कम से कम पांच वर्ष व्यतीत हो गए हैं, वहां प्राधिकरण ऐसे व्यक्ति की बाबत मामूली तौर पर यह घोषणा करेगा कि उसकी दोषसिद्धि इस खंड के अधीन निरर्हता के रूप में प्रवृत्त नहीं रह गई है;
(घ) यह कि किसी बीमा पालिसी से या किसी बीमा कंपनी के परिसमापन से संबंधित किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान या किसी बीमाकर्ता के कार्यकलापों के अन्वेषण के दौरान यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वह बीमाकर्ता या बीमाकृत के प्रति किसी कपट, बेइमानी या दुर्व्यपदेशन का दोषी है यह जानते हुए उसमें भागीदार रहा है या ऐसे अपराध के प्रति मौनानुकूल रहा है;
(ङ) यह कि उसके पास ऐसी अपेक्षित अर्हताएं और बारह मास से अनधिक की अवधि का ऐसा व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं है, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए;
(च) यह कि उसने ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए;
(छ) यह कि उसने उस आचार संहिता का अतिक्रमण किया है जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(6) यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती पूर्वगामी निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त है तो ऐसी किसी अन्य शास्ति पर, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जिसके लिए वह दायी हो, प्राधिकरण, इस धारा के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती 1[रजिस्ट्रीकरण] को दिया गया रद्द कर देगा और उस दशा में भी रद्द कर सकेगा जबकि मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती ने जानते हुए इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन किया है ।
(7) प्राधिकरण खो गई, नष्ट हो गई या विकृत हो गई 1[अनुज्ञप्ति] के बदले में उसकी दूसरी प्रति ऐसी फीस का संदाय करने पर, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, दे सकेगा ।
1[(8) ऐसा कोई व्यक्ति, जो मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने के लिए इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत हुए बिना उस रूप में कार्य करता है, ऐसी शास्ति का दायी होगा, जो दस लाख रुपए तक की हो सकेगी और ऐसा कोई व्यक्ति, जो किसी मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति को, जो उस रूप में कार्य करने के लिए रजिस्ट्रीकृत नहीं है, नियुक्त करता है या ऐसे किसी व्यक्ति के माध्यम से भारत में कोई बीमा कारबार करता है, वह, ऐसी शास्ति का दायी होगा, जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी ।
(9) जहां उपधारा (8) का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कोई कंपनी या फर्म है, वहां ऐसी किन्हीं अन्य कार्यवाहियों पर, जो कंपनी या फर्म के विरुद्ध की जा सकती है, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कंपनी का ऐसा प्रत्येक निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी और फर्म का ऐसा प्रत्येक भागीदार, जो जानबूझकर ऐसे उल्लंघन का भागी बना है, ऐसी शास्ति का, जो दस लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]
1[42ङ. मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के लिए शर्त-इस अधिनियम के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा, किसी मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने के लिए पूंजी की अपेक्षाएं, कारबार का रूप और अन्य शर्तें विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।]
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 52 द्वारा प्रतिस्थापित ।
1[43. बीमा अभिकर्ताओं का अभिलेख-(1) प्रत्येक बीमाकर्ता और प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो बीमाकर्ता की ओर से कार्य करते हुए बीमा अभिकर्ताओं को नियोजित करता है, अभिलेख रखेगा जिसमें उसके द्वारा नियुक्त प्रत्येक बीमा अभिकर्ता का नाम और पता तथा वह तारीख, जिसको उसकी नियुक्ति आरंभ हुई और वह तारीख, यदि कोई हो, जिसको उसकी नियुक्ति समाप्त हुई, दर्शित की जाएगी ।
(2) बीमाकर्ता द्वारा उपधारा (1) के अधीन तैयार किया गया अभिलेख तब तक बनाए रखा जाएगा, जब तक बीमाकर्ता सेवारत है और नियुक्ति की समाप्ति के पश्चात् पांच वर्ष की अवधि के लिए बनाए रखा जाएगा ।]
2। । । । ।
3[44क. जानकारी मांगने की शक्ति-धारा 40, धारा 40ख और धारा 40ग के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए प्राधिकरण सूचना द्वारा-
(क) बीमाकर्ता से ऐसी जानकारी, जिसे वह आवश्यक समझे, मांग सकेगा, जो यदि अपेक्षित हो, तो लेखापरीक्षक या बीमांकक द्वारा प्रमाणित की गई होगी;
(ख) बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसके द्वारा परीक्षा किए जाने के लिए भारत में बीमाकर्ता के कारबार के मुख्य स्थान पर ऐसी लेखा बहियां, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज पेश करे अथवा ऐसा कोई विवरण दे जो उस सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए;
(ग) ऐसी किसी जानकारी, बही, रजिस्टर या विवरण के बारे में बीमाकर्ता के किसी अधिकारी की शपथ पर परीक्षा कर सकेगा और बीमाकर्ता, ऐसे समय के भीतर जो सूचना में विनिर्दिष्ट किए जाए ऐसी किसी अपेक्षा का पालन करेगा ।
45. अशुद्ध कथन के आधार पर किसी पालिसी पर तीन वर्ष के पश्चात् आक्षेप न किया जाना-(1) किसी भी जीवन बीमा पालिसी पर, पालिसी की तारीख से अर्थात् पालिसी के निर्गमित किए जाने की तारीख से या जोखिम के प्रारंभ होने की तारीख से या पालिसी के पुनर्जीवित होने की तारीख से या पालिसी में राइडर जोड़े जाने की तारीख, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् किसी आधार पर, चाहे जो भी हो, आक्षेप नहीं किया जाएगा ।
(2) किसी जीवन बीमा पालिसी पर, पालिसी के निर्गमित किए जाने की तारीख से या जोखिम प्रारंभ होने की तारीख से या पालिसी के पुनर्जीवित होने की तारीख से या पालिसी में राइडर जोड़े जाने की तारीख से, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, कपट के आधार पर तीन वर्ष के भीतर किसी भी समय आक्षेप किया जा सकेगाः
परन्तु बीमाकर्ता को लिखित में बीमाकृत या बीमाकृत के विधिक प्रतिनिधियों या नामनिर्देशितियों या समनुदेशियों को, वे आधार और तथ्य, जिन पर ऐसा विनिश्चय आधारित है, संसूचित करने होंगे ।
स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए “कपट" पद से बीमाकृत द्वारा या उसके अभिकर्ता द्वारा बीमाकर्ता को धोखा देने या बीमाकर्ता को जीवन बीमा पालिसी निर्गमित करने के आशय से निम्नलिखित में से किया गया कोई कृत्य अभिप्रेत हैः-
(क) उस आशय के तथ्य के रूप में ऐसा जो सत्य नहीं है और जिसे बीमाकृत सत्य होने का विश्वास नहीं करता है;
(ख) बीमाकृत द्वारा तथ्य की जानकारी और विश्वास रखते हुए तथ्य का सक्रिय छिपाव;
(ग) कोई अन्य कृत्य जो धोखा देने के क्षम हो; और
(घ) ऐसा कोई कृत्य या लोप जिसे विधि विशेष रूप में कपटपूर्ण घोषित करे ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 53 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 54 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 55 द्वारा प्रतिस्थापित ।
स्पष्टीकरण 2-ऐसे तथ्यों के बारे में मात्र मौन रहना, जिनसे बीमाकर्ता द्वारा जोखिम के निर्धारण के प्रभावित होने की संभावना हो तब तक कपट नहीं है, जब तक कि मामले की परिस्थितियां ऐसी न हों कि यदि उन पर ध्यान दिया जाए तो बीमाकृत या उसके अभिकर्ता का यह कर्तव्य है कि वह बोलने से मौन रहे या जब तक कि उसका मौन रहना स्वतः ही बोलने के समतुल्य न हो ।
(3) उपधारा (2) में किसी बात होते हुए भी, कोई बीमाकर्ता कपट के आधार पर किसी जीवन बीमा पालिसी को निराकृत नहीं करेगा, यदि बीमाकृत यह साबित कर सकता है कि सारवान् तथ्य का मिथ्या कथन करना या छिपाया जाना उसकी सर्वोत्तम जानकारी और विश्वास के अनुसार सही था या यह कि उस तथ्य को छिपाए जाने का कोई विमर्शित आशय नहीं था या यह कि सारवान् तथ्य का ऐसा मिथ्या कथन या छिपाना जाना बीमाकर्ता की जानकारी में थाः
परंतु कपट की दशा में, यदि पालिसीधारी जीवित नहीं है तो झूठ को नासाबित करने का भार हिताधाकारियों पर होता है ।
स्पष्टीकरण-कोई व्यक्ति, जो बीमा की संविदा की याचना करता है या बातचीत करता है, संविदा करने के प्रयोजन के लिए बीमाकर्ता का अभिकर्ता समझा जाएगा ।
(4) किसी जीवन बीमा पालिसी पर, पालिसी निर्गमित करने की तारीख से या जोखिम के प्रारंभ होने की तारीख से या पालिसी के पुनर्जीवित होने की तारीख से या पालिसी में राइडर जोड़े जाने की तारीख से, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, इस आधार पर कि बीमाकृत के जीवन की प्रत्याशा के बारे में सारवान् तथ्य के किसी कथन को छिपाने का कथन प्रस्ताव में या अन्य दस्तावेज पर गलत ढंग से किया गया था जिस पर पालिसी जारी की गई थी या पुनर्जीवित की गई थी या राइडर जारी किया गया था, तीन वर्ष के भीतर किसी भी समय आक्षेप किया जा सकेगाः
परन्तु बीमाकर्ता को बीमाकृत या बीमाकृत के विधिक प्रतिनिधियों या नामनिर्देशितियों या समनुदेशितियों को वे आधार और सामग्री, जिन पर जीवन बीमा की पालिसी को निराकृत करने का ऐसा विनिश्चय आधारित है, लिखित में संसूचित करनी पड़ेगीः
परन्तु यह और कि मिथ्या कथन या सारवान् तथ्य को छिपाने के आधार पर पालिसी के निराकरण की दशा में, न कि कपट के आधार पर, निराकरण की तारीख तक पालिसी पर संगृहीत प्रीमियम बीमाकृत या विधिक प्रतिनिधियों या नामनिर्देशितियों या समनुदेशितियों को ऐसे निराकरण की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर संदत्त किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए तथ्य का मिथ्या कथन या छिपाया जाना तब तक सारवान् नहीं समझा जाएगा जब तक बीमाकर्ता द्वारा वचनबद्ध किए गए जोखिम पर उसका सीधा संबंध न हो, बीमाकर्ता पर यह दर्शित करने का भार है कि क्या बीमाकर्ता उक्त तथ्य से अवगत था कि बीमाकृत को कोई जीवन बीमा पालिसी निर्गमित नहीं की गई थी ।
(5) इस धारा की किसी बात से बीमाकर्ता किसी भी समय आयु का सबूत उस दशा में मांगने से निवारित नहीं होगा यदि वह ऐसा करने का हकदार हो और किसी भी पालिसी को केवल इस कारण प्रश्नगत किया गया नहीं समझा जाएगा कि पालिसी के निबन्धन बाद में यह साबित किए जाने पर कि जिस व्यक्ति के जीवन का बीमा किया गया है उसकी आयु प्रस्थापना में गलत बाताई गई थी, ठीक कर लिए गए हैं ।]
46. भारत में निर्गमित पालिसियों को भारत में प्रवृत्त विधि का लागू होना-इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् [भारत] में किए गए बीमा कारबार की बाबत बीमाकर्ता द्वारा निर्गमित बीमा पालिसी के धारक को, पालिसी में या उससे सम्बन्धित किसी करार में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, ऐसी पालिसी द्वारा प्रतिभूत राशि का 1[भारत] में संदाय प्राप्त करने का, तथा पालिसी सम्बन्धी किसी अनुतोष के लिए 1[भारत] में किसी सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय में वाद लाने का अधिकार प्राप्त होगा और यदि वाद 1[भारत] में लाया जाता है तो ऐसी किसी पालिसी के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले किसी विधि के प्रश्न का अवधारण 1[भारत] में प्रवृत्त विधि के अनुसार किया जाएगाः
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यों” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[परन्तु इस धारा की कोई बात समुद्री बीमा पालिसी को लागू न होगी ।]
47. न्यायालय में धन का संदाय किया जाना-(1) यदि संदाय के लिए परिपक्व हुई किसी जीवन बीमा पालिसी की बाबत बीमाकर्ता की यह राय है कि परस्पर विरोधी दावों के कारण या उस पालिसी द्वारा प्रतिभूत रकम पर हक सम्बन्धी सबूत की अपर्याप्तता के कारण या अन्यथा किसी अन्य पर्याप्त कारण से बीमाकर्ता के लिए यह असम्भव है कि ऐसी रकम के संदाय के लिए उसे समाधानप्रद उन्मोचन अभिप्राप्त हो जाए, 2[तो बीमाकर्ता] 3॥। उस न्यायालय में ऐसी रकम का संदाय करने के लिए आवेदन कर सकेगा जिसकी अधिकारिता में वह स्थान स्थित है जहां पर पालिसी के निबन्धनों के अधीन या अन्यथा ऐसी रकम देय है ।
(2) ऐसी संदत्त रकम के लिए न्यायालय द्वारा दी गई रसीद उस रकम के संदाय के बारे में बीमाकर्ता का समाधानप्रद उन्मोचन होगी ।
(3) इस धारा के अधीन न्यायालय में संदाय करने की अनुज्ञा के लिए आवेदन बीमाकर्ता के प्रधान अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित शपथपत्र द्वारा सत्यापित अर्जी के रूप में किया जाएगा जिसमें निम्नलिखित विशिष्टियां दी गई होंगी, अर्थात्ः-
(क) बीमाकृत व्यक्ति का नाम और पता;
(ख) यदि बीमाकृत व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उसकी मृत्यु की तारीख और स्थान;
(ग) पालिसी का स्वरूप और उसके द्वारा प्रतिभूत रकम;
(घ) जहां तक बीमाकर्ता को ज्ञात हो प्रत्येक दावेदार का नाम और पता तथा दावे के लिए प्राप्त प्रत्येक सूचना के ब्यौरे;
(ङ) वे कारण जिनसे बीमाकर्ता की यह राय है कि उस रकम के संदाय के लिए समाधानप्रद उन्मोचन अभिप्राप्त नहीं किया जा सकता; और
(च) वह पता जिस पर न्यायालय में जमा की गई रकम के व्ययन सम्बन्धी किसी कार्यवाही की सूचना की तामील बीमाकर्ता पर की जा सकेगी ।
(4) इस धारा के अधीन किया गया आवेदन न्यायालय द्वारा उस दशा में ग्रहण नहीं किया जाएगा जबकि वह आवेदन 4[यथास्थिति, उत्तरजीवी होने के कारण पालिसी के परिपक्व होने की तारीख से या बीमाकृत की मृत्यु की सूचना बीमाकर्ता को प्राप्त होने की तारीख से] छह मास की समाप्ति से पूर्व किया गया है ।
(5) यदि न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि रकम के संदाय के लिए समाधानप्रद उन्मोचन बीमाकर्ता द्वारा अन्यथा अभिप्राप्त नहीं किया जा सकता तो वह इस बात की अनुज्ञा देगा कि न्यायालय में ऐसी रकम का संदाय कर दिया जाए और उसका व्ययन लम्बित रहने तक वह उस रकम को सरकारी प्रतिभूतियों में विनिहित कर देगा ।
(6) बीमाकर्ता उपधारा (3) के अधीन आवेदन करने के पश्चात् दावे के लिए प्राप्त प्रत्येक सूचना न्यायालय को भेजेगा और न्यायालय में संदत्त रकम के व्ययन संबंधी कार्यवाहियों पर या अन्यथा हुए खर्चे के रूप में न्यायालय ने जिस संदाय की अपेक्षा की है उसे उपधारा (3) के अधीन आवेदन के खर्च के बारे में बीमाकर्ता वहन करेगा तथा किसी अन्य खर्च के बारे में वह न्यायालय के विवेकाधीन होगा ।
- 1944 के अधिनियम सं० 7 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 32 द्वारा बीमाकर्ता के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 36 द्वारा (1-6-1950 से) पालिसी के परिपक्व होने की तारीख से 9 मास के अवसान के पूर्व या यदि परिस्थितियां ऐसी हों कि बीमाकर्ता को ऐसी परिपक्वता के बारे में तत्काल जानकारी न मिली हो, बीमाकर्ता को परिपक्वता की सूचना की तारीख से शब्द निरसित ।
- 1939 के अधिनियम सं० 11 की धारा 18 द्वारा बीमाकृत की मृत्यु से या उत्तरजीवी होने के कारण पालिसी के परिपक्व होने की तारीख सेञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(7) न्यायालय प्रत्येक अभिनिश्चित दावेदार को इस तथ्य की सूचना दिलवाएगा कि रकम न्यायालय में संदत्त कर दी गई है और जो दावेदार उस रकम को निकालने का आवेदन करता है उसके खर्च पर उसकी सूचना प्रत्येक अन्य अभिनिश्चित दावेदार को दिलवाएगा ।
(8) न्यायालय में संदत्त रकम के दावों के निपटारे से संबंधित सभी प्रश्नों का विनिश्चय न्यायालय करेगा ।
1। । । । ।
2[48क. बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती का बीमा कंपनी में निदेशक न होना-कोई भी बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती बीमा कंपनी में निदेशक होने के लिए न तो पात्र होगा और न निदेशक रहेगा:
परन्तु बीमा (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ पर पद धारण करने वाला कोई भी निदेशक इस धारा के कारण निदेशक रहने के लिए तब तक अपात्र नहीं होगा जब कि उक्त अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से छह मास समाप्त न हो गए होंः
परन्तु यह और कि प्राधिकरण किसी अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को, किसी बीमा कंपनी के बोर्ड में, ऐसी शर्तों या निबन्धनों के अधीन रहते हुए, जो वह पालिसीधारियों के हित का संरक्षण करने के लिए या हितों के परस्पर विरोध के निवारण के लिए अधिरोपित करे, रहने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।]
3[48ख. निदेशकों के सम्बन्ध में अतिरिक्त उपबन्ध-(1) धारा 2 के खण्ड (9) के उपखण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट और जीवन बीमा कारबार करने वाला बीमाकर्ता किसी ऐसे व्यक्ति को अपना निदेशक न रखेगा जो ऐसे ही किसी अन्य बीमाकर्ता का भी निदेशक हो ।
(2) 4[प्राधिकरण] उतनी अवधि के लिए ऐसे विस्तार तक और ऐसी शर्तों पर जो वह विनिर्दिष्ट करे, निम्नलिखित को इस धारा के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी, अर्थात्ः-
(क) ऐसे किसी बीमाकर्ता को जो किसी अन्य बीमाकर्ता की समनुषंगी कम्पनी है, या
(ख) दो या अधिक बीमाकर्ताओं को यह बात सुकर करने के प्रयोजन से कि उनका समामेलन हो जाए या उनमें से एक बीमाकर्ता के कारबार का दूसरे को अन्तरण हो जाए ।]
48ग. [अपर निदेशकों की नियुक्ति ।]-बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 (1968 का 62) की धारा 21 द्वारा (1-6-1969 से) लोप किया गया ।
5[49. लाभांशों और बोनसों पर निर्बन्धन- 6[(1)] 7॥। जो जीवन बीमा कारबार अथवा किसी ऐसे अन्य वर्ग या उपवर्ग का बीमा कारबार करता है जिसे धारा 13 लागू है, शेयरधारियों को कोई लाभांश या पालिसीधारियों को कोई बोनस घोषित करने या देने के प्रयोजन के लिए या किन्हीं डिबेंचरों को चुकाए जाने के लिए कोई संदाय करने के प्रयोजन के लिए प्रत्यक्षतः या परोक्षतः, यथास्थिति, जीवन बीमा निधि का अथवा ऐसे अन्य वर्ग या उपवर्ग के बीमा कारबार की निधि के किसी भाग का उपयोग उस अधिशेष में से करने के सिवाय न करेगा, 8[जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियामकों द्वारा यथाविनिर्दिष्ट प्ररूप में उस मूल्यांकन तुलनपत्र में दिखाया गया हैट जो धारा 15 में निर्दिष्ट संक्षिप्ति के भाग के रूप में 9[नियंत्रक] को बीमाकर्ता की आस्तियों और दायित्वों के बीमांकिक मूल्यांकन के परिणामस्वरूप दिया गया है, और न ऐसे अधिशेष में कोई वृद्धि किसी आरक्षित निधि में से या अन्यथा अभिदाय द्वारा तब तक करेगा जब तक कि ऐसे अभिदाय उस वर्ग या उपवर्ग के बीमा कारबार
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 56 द्वारा धारा 47क और धारा 48 का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 57 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 40 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 34 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 41 द्वारा (1-6-1950 से) धारा 49 को उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 58 द्वारा लोप किया गया ।
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 12 द्वारा (23-9-2002 से) प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
के लिए उपयोज्य आमदनी खाते के रूप में पूर्वोक्त मूल्यांकन की तारीख को या उससे पूर्व सम्मिलित न कर लिए गए हों, किन्तु उस दशा में वह ऐसा कर सकेगा जबकि वह आरक्षित निधि उन मूल्यांकनों द्वारा प्रकट तत्सदृश्य अधिशेषों के अन्तरण से ही मिलकर बनी हो जिन मूल्यांकनों की बाबत ऐसी विवरणियां इस अधिनियम की धारा 15 के अधीन 5[नियंत्रक] 3॥। को दे दी गई होंः
परन्तु डिबेंचरों पर ब्याज के रूप में किए गए किन्हीं संदायों सहित वे संदाय जो किन्हीं डिबेंचरों को चुकाने के लिए ऐसे अधिशेष में से किए गए हैं, ऐसे अधिशेष के पचास प्रतिशत से अधिक न होंगे और डिबेंचरों पर दिया गया ब्याज ऐसे अधिशेष के दस प्रतिशत से तब के सिवाय अधिक न होगा जबकि डिबेंचरों पर दिया गया ब्याज उस ब्याज के मद्धे मुजरा किया गया हो जो पूर्वोक्त अधिशेष को प्रकट करने वाले मूल्यांकन में अपनाए गए ब्याज का आधार विनिश्चित करने के लिए संपृक्त निधि या निधियों में जमा किया गया हैः
4[परंतु यह और कि (शेयरधारकों के प्रथम भार के रूप में या अन्यथा, गारंटीकृत लाभांशों के संदाय के लिए रकम सहित) किसी अधिशेष का भाग जो शेयरधारकों को आबंटित किया गया है या उनके लिए आरक्षित रखा गया है ऐसी राशियों से अधिक नहीं होगा जो प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए और ऐसा भाग, किसी भी दशा में, भागीदारी पालिसियों की दशा में, ऐसे अधिशेष के दस प्रतिशत और अन्य दशाओं में में उसके संपूर्ण भाग से अधिक नहीं होगा ।]
1[(2) उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए आय-कर की वह वास्तविक रकम, जो उस तारीख से ठीक आगे की, जिस तक का अन्तिम पूर्ववर्ती मूल्यांकन किया गया था और उस तारीख से, जिस तक का प्रश्नगत मूल्यांकन किया गया है, ठीक पहले की अवधि के दौरान स्रोत पर ही काट ली गई है, ऐसे अधिशेष पर आय-कर की प्राक्कलित रकम काटने के पश्चात् ऐसे अधिशेष में जोड़ दी जाएगी और ऐसी वृद्धि और कटौती 4[धारा 13 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट बीमाकंक की रिपोर्ट की संक्षिप्त में दिखाई जाएगी ।]
50. पालिसी के व्यपगत होने पर उपलब्ध विकल्पों की बीमाकृत को सूचना-बीमाकर्ता 2[उस तारीख से, जिसको जीवन बीमा पालिसी की बाबत प्रीमियम देय थे, किन्तु दिए नहीं गए हैं, तीन मास की समाप्ति के पूर्व] पालिसीधारी को, उन विकल्पों की, जो उसे उपलब्ध हैं, जानकारी देते हुए सूचना तभी देगा 3[जब वे विकल्प पालिसी में उपवर्णित नहीं हैं ।]
51. प्रस्थापनाओं और स्वास्थ्य रिपोर्टों की प्रतियों का दिया जाना-प्रत्येक बीमाकर्ता पालिसीधारी को उसकी बीमा प्रस्थापना में और उसके संबंध में दी गई स्वास्थ्य रिपोर्ट में उन प्रश्नों की, जो उससे किए गए हैं, और उन उत्तरों की जो उसने दिए हैं, प्रमाणित प्रतियां पालिसीधारी द्वारा किए गए आवेदन पर और अधिक से अधिक एक रुपए की फीस का संदाय किए जाने पर देगा ।
4[52. विभाजन सिद्धान्त पर कारबार करने का प्रतिषेध-कोई भी बीमाकर्ता विभाजन सिद्धांत पर कोई कारबार आरंभ नहीं करेगा अर्थात् इस सिद्धांत पर कि पालिसी द्वारा प्रतिभूत फायदा नियत न होकर या तो पूर्णतः या भागतः उन पालिसियों के बीच कुछ धनराशियों के वितरण के परिणाम पर निर्भर करता है जो किसी समय-सीमा के अंदर दावे का रूप ग्रहण कर लेती है या इस सिद्धांत पर कि पालिसीधारी द्वारा देय प्रीमियम पूर्णतः या भागतः उन पालिसियों की संख्या पर निर्भर करती है, जो कतिपय समय-सीमा के अंदर दावे का रूप ग्रहण कर लेती हैः
परन्तु इस धारा की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि किसी नियतकालिक बीमा मूल्यांकन के परिणामस्वरूप वह या तो बीमाकृत राशियों में प्रतिवर्ती अभिवृद्धि के रूप में या तुरंत नकद बोनसों के रूप में या अन्यथा बोनसों का आबंटन जीवन बीमा पालिसियों के धारकों में करने से बीमाकर्ता को निवारित करती है ।
52क. बीमा कारबार के प्रबंध के लिए प्रशासक कब नियुक्त किया जा सकेगा-(1) यदि किसी समय प्राधिकरण के पास यह विश्वास करने का कारण है कि जीवन बीमा कारबार करने वाला बीमाकर्ता ऐसी रीति से कार्य कर रहा है जिससे जीवन बीमा
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 41 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1939 के अधिनियम सं० 11 की धारा 20 द्वारा जीवन बीमा की पालिसी के व्यपगत होने के तीन मास के भीतर के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 35 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 59 द्वारा प्रतिस्थापित ।
पालिसी के धारकों के हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य है तो वह बीमाकर्ता को सुनवाई का ऐसा अवसर देने के पश्चात् प्राधिकरण के निदेशन और नियंत्रण के अधीन बीमाकर्ता के कार्यों का प्रबंध करने के लिए प्रशासक नियुक्त कर सकेगा ।
(2) प्रशासक को ऐसा पारिश्रमिक मिलेगा जो प्राधिकरण निदेश दे और प्राधिकरण किसी समय नियुक्ति को रद्द कर सकेगा तथा किसी अन्य व्यक्ति को प्रशासक के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।]
52ख. प्रशासक की शक्तियां और कर्तव्य-(1) प्रशासक बीमाकर्ता के कारबार का प्रबन्ध दक्षता के अनुरूप अधिकतम मितव्ययिता से करेगा तथा वह नियंत्रक के यहां यथासंभव शीघ्र एक रिपोर्ट फाइल करेगा जिसमें यह वर्णित होगा कि निम्नलिखित तरीकों में से कौन सा तरीका तत्समय विद्यमान परिस्थितियों में, जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के साधारण हितों के लिए सर्वाधिक फायदेमन्द होगा, अर्थात्ः-
(क) बीमाकर्ता के कारबार का किसी अन्य बीमाकर्ता को अंतरण,
(ख) बीमाकर्ता द्वारा चाहे कारबार की पालिसियों की बीमाकृत मूल राशि के लिए, उसमें पालिसियों से संलग्न बोनसों की जोड़कर अथवा घटा दी गई रकम के लिए अपना कारबार चालू रखना,
(ग) बीमाकर्ता का परिसमापन, और
(घ) ऐसा कोई तरीका जिसे वह उपयुक्त समझता है ।
(2) नियंत्रक के यहां रिपोर्ट फाइल किए जाने पर नियंत्रक ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जो वह जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के हितों को साधारणतः समुन्नत करने के लिए ठीक समझे ।
(3) उपधारा (2) के अधीन नियंत्रक द्वारा किया गया हर आदेश सभी सम्पृक्त व्यक्तियों पर आबद्धकर होगा तथा उस दशा में जिसमें कि बीमाकर्ता कम्पनी है, बीमाकर्ता के संगम-ज्ञापन अथवा संगम-अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होगा ।
1[52खख. धारा 106 के अधीन कुर्क की जा सकने योग्य सम्पत्ति की बाबत प्रशासक की शक्तियां-(1) यदि प्रशासक का समाधान हो गया है कि कोई व्यक्ति धारा 106 के अधीन कार्यवाही किए जाने के लिए दायी हो गया है तो उस धारा के अधीन उस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाहियां संस्थित करना लंबित रहने तक वह उसे या किसी अन्य व्यक्ति को लिखित आदेश द्वारा प्रतिषिद्ध कर सकेगा कि वह उस सम्पत्ति का अन्तरण या अन्यथा व्ययन न करे जिसकी बाबत प्रशासक की यह राय है कि वह उस धारा के अधीन कार्यवाहियों में कुर्क की जा सकती है ।
(2) प्रशासक द्वारा उपधारा (1) के अधीन किए किसी आदेश से व्यथित व्यक्ति ऐसे आदेश की अपील 2[प्रतिभूति अपील अधिकरण को, उस तारीख से चौदह दिन के भीतर कर सकेगा, जिसको उस आदेश की तामील उस पर की गई हो और प्रतिभूति अपील अधिकरण] उस पर ऐसा आदेश कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।
(3) प्रशासक द्वारा उपधारा (1) के अधीन किया गया आदेश, अपील में 2[प्रतिभूति अपील अधिकरण] द्वारा किए गए किसी आदेश के अधीन रहते हुए, आदेश की तारीख से तीन मास की अवधि के लिए उस दशा में प्रवृत्त रहेगा जबकि उक्त अवधि की समाप्ति के पूर्व धारा 106 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन उस न्यायालय में न कर दिया गया हो जो उस उपधारा के अधीन अधिकारिता के प्रयोग के लिए सक्षम हो, और जब ऐसा आवेदन कर दिया गया हो तो वह आदेश, उस न्यायालय द्वारा किए गए किसी आदेश के अधीन रहते हुए उसी प्रकार प्रवृत्त बना रहेगा मानो वह उस धारा के अधीन कार्यवाहियों में उस न्यायालय द्वारा किया गया कुर्की का आदेश हो ।
(4) प्रशासक द्वारा इस धारा के अधीन किए गए आदेश की-
- 1955 के अधिनियम सं० 54 की धारा 2 द्वारा (1-11-1955 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 60 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) तामील उस दशा में जबकि वह निगम या फर्म को प्रभावित करता हो, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के, यथास्थिति, आदेश 29 के नियम 2 में या आदेश 30 के नियम 3 में समनों की तामील के लिए उपबन्धित रीति से की जाएगी, और
(ख) तामील उस दशा में, जबकि वह आदेश ऐसे व्यक्ति को प्रभावित करता हो जो निगम या फर्म नहीं है, ऐसे व्यक्ति पर-
(i) उसे वह आदेश परिदत्त या निविदत्त करके व्यक्तिगत रूप में की जाएगी, या
(ii) डाक द्वारा की जाएगी, या
(iii) जहां ऐसा व्यक्ति न मिल सकता हो वहां, उस आदेश की प्रति उसके कुटुम्ब के किसी वयस्क सदस्य के पास छोड़कर की जाएगी या उसकी ऐसी प्रति उस परिसर के किसी सहजदृश्य भाग पर लगाकर की जाएगी जिस परिसर की बाबत यह ज्ञात हो कि उसमें उसने अन्तिम बार निवास किया है या कारबार किया है या स्वयं अभिलाभ के लिए काम किया है,
और ऐसा प्रत्येक आदेश राजपत्र में भी प्रकाशित किया जाएगा ।
(5) यदि यह प्रश्न उठता है कि उपधारा (4) के अधीन आदेश की किसी व्यक्ति पर सम्यक् तामील की गई है या नहीं तो राजपत्र में उस आदेश का प्रकाशन इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि उस आदेश की ऐसी तामील की गई है और उपधारा
(4) के खण्ड (क) या खण्ड (ख) के उपबन्धों के अनुपालन में असफलता से उस आदेश की विधिमान्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(6) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी कोई सम्पत्ति जिसकी बाबत प्रशासक द्वारा कोई आदेश दे दिया गया हो, प्रशासक की पूर्व अनुज्ञा से तथा ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो वह अधिरोपित करे, अन्तरित की जा सकेगी या अन्यथा उसका व्ययन किया जा सकेगा ।
(7) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी सम्पत्ति का अन्तरण या अन्य व्ययन, जो प्रशासक द्वारा किए गए किसी आदेश के या उसके द्वारा अधिरोपित किन्हीं निबन्धनों और शर्तों के उल्लंघन में किया गया है, शून्य होगा ।
(8) इस बारे में कि क्या कोई सम्पत्ति धारा 106 के अधीन वाली कार्यवाहियों में कुर्क किए जाने योग्य होगी, अपनी राय बनाने के लिए अपने का समर्थ करने के प्रयोजन के लिए या उस धारा के अधीन कार्यवाही संस्थित करने के लिए अपने को समर्थ करने के प्रयोजन के लिए प्रशासक किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह व्यक्ति ऐसे मुद्दों या विषयों के बारे में, जिनकी बाबत प्रशासक की राय है कि वे उस प्रयोजन से सुसंगत हैं, जानकारी दे और जिस व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा की गई है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसी जानकारी देने के लिए भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 176 के अर्थ में वैध रूप से आबद्ध है ।
(9) प्रशासक को निम्नलिखित विषयों के बारे में वे सभी शक्तियां प्राप्त होंगी जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन प्राप्त होती हैं, अर्थात्:
(क) साक्षियों को समन करना और उन्हें हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना,
(ख) दस्तावेजों को पेश किए जाने की अपेक्षा करना, और
(ग) शपथपत्रों द्वारा साक्ष्य लेना,
और इस धारा के अधीन प्रशासक के समक्ष की किसी कार्यवाही की बाबत यह समझा जाएगा कि वह भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही है ।
(10) इस धारा में या धारा 106 में यथा उपबंधित के सिवाय, तथा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी,
(क) प्रशासक 1॥। के ऐसे किसी आदेश को अपास्त या उपांतरित कराने के लिए जो इस धारा के अधीन दिया गया है, किसी न्यायालय में कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही न की जा सकेगी, और
(ख) कोई भी न्यायालय ऐसी कोई डिक्री न देगा, ऐसा कोई व्यादेश नहीं करेगा और ऐसा कोई अन्य आदेश नहीं करेगा जिससे ऐसा कोई आदेश अकृत हो जाए या किसी भी रीति में प्रभावित हो जाए ।]
52ग. संविदाओं और करारों का रद्द किया जाना-प्रशासक, बीमाकर्ता के बारे में अपनी नियुक्ति के चालू रहने के दौरान किसी भी समय सम्पृक्त व्यक्तियों को उनकी सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, बीमाकर्ता के तथा किसी अन्य व्यक्ति के बीच की ऐसी किसी भी संविदा या करार (पालिसी से भिन्न) को, जिसकी बाबत प्रशासक का यह समाधान हो गया हो कि वह जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है । या तो शर्त के बिना या ऐसी शर्तों पर जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे, रद्द कर सकेगा या उसमें परिवर्तन कर सकेगा ।
2[52घ. प्रशासक की नियुक्ति का पर्यवसान-यदि किसी समय प्राधिकरण को यह प्रतीत होता है कि प्रशासक की नियुक्ति करने वाले आदेश के प्रयोजन की पूर्ति हो गई है या किसी कारण से यह अवांछनीय हो गया है कि नियुक्ति का आदेश प्रवृत्त बना रहे तो प्राधिकरण उस आदेश को रद्द कर सकेगा और तदुपरांत प्रशासक बीमा कारबार के प्रबंध से निर्निहित हो जाएगा और जब तक प्राधिकरण द्वारा अन्यथा निदेश न दिया जाए, वह पुनः उस व्यक्ति में, जिसमें वह प्रशासक की नियुक्ति के ठीक पूर्व निहित था या बीमाकर्ता द्वारा नियुक्त किए गए किसी अन्य व्यक्ति में निहित हो जाएगा ।]
52ङ प्रशासक नियुक्त करने के विनिश्चय की अन्तिमता-3[प्राधिकरण] का ऐसा कोई आदेश या विनिश्चय, जो धारा 52क या धारा 52घ के अनुसार किया गया है, अंतिम होगा, और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
52च. प्रशासक से दस्तावेजें या सम्पत्ति विधारित रखने के लिए शास्तियदि बीमाकर्ता का कोई निदेशक या अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति, बीमाकर्ता के जिस कारबार का प्रबंध प्रशासक में निहित हो गया है, उस काराबार से सम्बन्धित कोई ऐसी लेखाबहियां या कोई अन्य दस्तावेजें जो उसकी अभिरक्षा में हों, प्रशासक को परिदत्त नहीं करेगा या ऐसे बीमाकर्ता की कोई सम्पत्ति रखे रहेगा तो 4[वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, दस हजार रुपए की या दस लाख रुपए की, इनमें से जो भी कम हो, शास्ति का दायी होगा ।]
52छ. धारा 52क से धारा 52घ तक के अधीन की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) 5[धारा 52क, धारा 52ख, धारा 52खख या धारा 52ग] के अनुसार सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही प्रशासक के विरुद्ध न होगी ।
(2) धारा 52क, धारा 52ख या धारा 52घ के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या संभाव्य किसी नुकसान के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही 6॥। नियंत्रक के विरुद्ध न होगी ।]
7। । । । ।
परिसमापन
53. न्यायालय द्वारा परिसमापन -8[(1) अधिकरण, किसी भी बीमा कंपनी का कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अनुसार परिसमापन किए जाने का आदेश दे सकेगा और उस अधिनियम के उपबंध, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, तद्नुसार लागू होंगे ।]
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 60 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 61 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 62 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 63 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1955 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा (1-11-1955 से) धारा 54क से 52ग सहित के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 64 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 65 द्वारा लोप किया गया ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
1[स्पष्टीकरण-धारा 53 से धारा 61क के प्रयोजन के लिए, “अधिकरण" से कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 408 की उपधारा (1) के अधीन गठित राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण" अभिप्रेत है ।]
(2) जिन आधारों पर ऐसा आदेश आधारित किया जा सकता है उनके अतिरिक्त 5[अधिकरण] बीमा कम्पनी के परिसमापन के लिए आदेश
(क) उस दशा में भी दे सकेगा जबकि पहले ही अभिप्राप्त कर ली गई 5[अधिकरण] की मंजूरी से इस निमित्त अर्जी इतने शेयरधारियों द्वारा दी गई हो, जिनकी संख्या कुल शेयरधारियों की संख्या के एक बटा दस से कम नहीं है तथा जो कुल शेयरपूंजी के एक बटा दस से अन्यून भाग धारण किए हुए हों या कम से कम पचास ऐसे पालिसीधारियों द्वारा दी गई हो, जो कम से कम तीन वर्ष से प्रवृत्त और कम से कम कुल पचास हजार रुपए मूल्य की जीवन बीमा पालिसियां धारण किए हुए हों, या
(ख) उस दशा में भी दे सकेगा जबकि 2[नियंत्रक] जिसे ऐसा करने के लिए इसके द्वारा प्राधिकृत किया जाता है, 5[अधिकरण] से इस निमित्त आवेदन निम्नलिखित आधारों में से किसी आधार पर करता है, अर्थात्:
3। । । ।
(ii) कम्पनी इस अधिनियम की किसी अपेक्षा का अनुपालन करने में असफल हो जाने पर उस असफलता की 4[या इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करने पर उस उल्लंघन को] 7[नियंत्रक] द्वारा कम्पनी को ऐसी असफलता 9[या उल्लंघन] की सूचना दे दिए जाने के पश्चात् तीन माह की अवधि तक चालू रखे हुए है,
(iii) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन दी गई 5[किन्हीं विवरणियों या विवरणों] से अथवा उसके अधीन किए गए किसी अन्वेषण के परिणामों से 6[यह प्रतीत होता है कि कम्पनी दिवालिया है या दिवालिया समझी गई है], या
(iv) कम्पनी के चालू रहने से पालिसीधारियों के हितों पर 7[या लोकहित पर साधारणतः] प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।
8[53क. असमादत्त शेयर पूंजी-किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के किसी प्रयोजन के लिए यह अभिनिश्चित करने के वास्ते कि बीमाकर्ता शोधक्षम है या नहीं, बीमाकर्ता की ऐसी किन्हीं आस्तियों को गणना में नहीं लिया जाएगा जो असमादत्त शेयर पूंजी के रूप में है ।]
54. स्वेच्छा से परिसमापन- 9[कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1)] में किसी बात के होते हुए भी, किसी भी कम्पनी का स्वेच्छा से परिसमापन उस कम्पनी के समामेलन या पुनर्गठन के प्रयोजन के लिए ही अथवा इस आधार पर ही किया जाएगा कि अपने दायित्वों के कारण वह अपना कारबार चालू नहीं रख सकती, अन्यथा नहीं किया जाएगा ।
55. दायित्वों का मूल्यांकन-(1) बीमा कम्पनी के परिसमापन में या किसी अन्य बीमाकर्ता के दिवाले की दशा में बीमाकर्ता की आस्तियों और दायित्वों का मूल्य ऐसी रीति से तथा ऐसे आधार पर, जो समापक या दिवाले की दशा में रिसीवर
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 66 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 66 द्वारा लोप किया गया ।
- 1941 के अधिनिमय सं० 13 की धारा 37 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 23 द्वारा (1-6-1969 से) विवरणी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 23 द्वारा (1-6-1969 से) दिवालिया कम्पनी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 23 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
- 1946 के अधिनिमय सं० 6 की धारा 25 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
ठीक समझे, किन्तु 1[सातवीं अनुसूची] में दिए गए नियम के वहां तक, जहां तक कि वह लागू होता हो, तथा ऐसे किन्हीं निदेशों के, जो 1[अधिकरण] द्वारा दिए जाएं, अधीन रहते हुए, अभिनिश्चित किया जाएगा ।
(2) किसी बीमाकर्ता की संविदाओं की रकम को 1[अधिकरण] द्वारा घटाए जाने के प्रयोजनों के लिए उस कम्पनी की आस्तियों और दायित्वों का तथा उस द्वारा निर्गमित पालिसियों की बाबत सब दावों का मूल्य ऐसी रीति से और ऐसे आधार पर, जो पूर्वोक्त नियम का ध्यान रखते हुए 1[अधिकरण] ठीक समझे, अभिनिश्चित किया जाएगा ।
(3) 2[सातवीं अनुसूची] के नियम का वही बल होगा और वह ऐसे निरस्त, परिवर्तित या संशोधित किया जा सकेगा मानो वह 2[कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 643] के अनुसरण में बनाया गया नियम हो तथा बीमा कम्पनियों के परिसमापन की बाबत इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशाली करने के प्रयोजन से उस धारा के अधीन नियम बनाए जा सकेंगे ।
56. जीवन बीमा निधि की अधिशेष आस्तियों का समापन या दिवाले की दशा में उपयोजन-(1) किसी बीमा कम्पनी के परिसमापन तथा किसी अन्य बीमाकर्ता के दिवाले की दशा में, जीवन बीमा कारबार की बाबत उस बीमाकर्ता की आस्तियों और दायित्वों का मूल्य उस बीमाकर्ता की किन्हीं अन्य आस्तियों या किन्हीं अन्य दायित्वों के मूल्य से पृथक्तः अभिनिश्चित किया जाएगा तथा ऐसी कोई आस्तियां वहां तक के सिवाय, जहां तक कि वे आस्तियां जीवन बीमा कारबार से सम्बन्धित दायित्वों से अधिक हों, ऐसे किन्हीं दायित्वों को चुकाने के लिए उपयोजित नहीं की जा सकेंगी जो जीवन बीमा कारबार से सम्बन्धित दायित्वों से भिन्न हों ।
(2) जीवन बीमा कारबार करने वाली बीमा कम्पनी के परिसमापन में या ऐसा कारबार करने वाले किसी अन्य बीमाकर्ता के दिवाले की दशा में, जहां कि परिसमापन या दिवाले की कार्यवाहियों के प्रारम्भ के पूर्व उस बीमाकर्ता के लाभों का कोई आनुपातिक भाग पालिसीधारियों को आबंटित था वहां उस बीमाकर्ता की आस्तियां और दायित्व अभिनिश्चित किए जाने पर, यदि यह पाया जाता है कि आस्तियों में से दायित्व को घटाने के पश्चात् आस्तियां अधिशेष रहती हैं (जिसे इसमें आगे प्रथमदृष्ट्या अधिशेष कहा गया है) तो वहां प्रथमदृष्ट्या अधिशेष के उस अनुपात के बराबर रकम जीवन बीमा कारबार की बाबत उस बीमाकर्ता के दायित्वों में जोड़ दी जाएगी जो अनुपात शेयरधारियों और पालिसीधारियों को आबंटित लाभों के उस अनुपात के बराबर हो जो परिसमापन के प्रारंभ के ठीक पूर्ववर्ती दस वर्षों के दौरान पालिसीधारियों को आबंटित किया गया हो तथा बीमाकर्ता की आस्तियों की बाबत यह बात कि वे उसके दायित्वों से अधिक है केवल वहीं तक समझी जाएंगी जहां तक कि ऐसी रकम उन दायित्वों में जोड़ने के पश्चात् वे आस्तियां उन दायित्वों से अधिक हों :
परन्तु
(क) यदि किसी दशा में ऐसा कोई आबंटन नहीं किया गया है या यदि 3[अधिकरण] को यह प्रतीत होता है कि विशेष परिस्थितियों के कारण यह बात असाम्यापूर्ण होगी कि जीवन बीमा कारबार की बाबत बीमाकर्ता के दायित्वों में जो रकम जोड़ी जानी है वह पूर्वोक्त जैसे अनुपात के बराब रकम हो तो ऐसे जोड़ी जाने वाली रकम उतनी हो सकेगी 3[अधिकरण] निर्दिष्ट करे; और
(ख) यह धारा किसी ऐसे मामले में लागू करने के प्रयोजन के लिए, जिसमें कि प्रश्नगत जीवन बीमा कारबार की किसी शाखा के ही पूर्वोक्त जैसे लाभों का आनुपातिक भाग परिसमापन या दिवाले के प्रारम्भ होने के पूर्व पालिसीधारियों को आबंटित किया गया है, उस शाखा की बाबत उस बीमाकर्ता की आस्तियों और दायित्वों का मूल्य उसी रीति से पृथक्तः अभिनिश्चित किया जाएगा जिससे कि उस जीवन बीमा कारबार की बाबत उसकी आस्तियों और दायित्वों का मूल्य अभिनिश्चित किया गया हो और यदि उसके दायित्वों को उसकी आस्तियों में से घटाने के पश्चात् कोई अधिशेष रहता है तो जीवन बीमा कारबार की बाबत उस बीमाकर्ता के दायित्वों में जोड़ी जाने वाली रकम के अवधारण के प्रयोजन के लिए उस अधिशेष को ही प्रथमदृष्ट्या अधिशेष समझा जाएगा ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 43 द्वारा (1-9-1950 से) छठी अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
57. गौण कम्पनियों का परिसमापन-(1) जहां किसी बीमा कम्पनी का बीमा कारबार या बीमा कारबार का कोई भाग दूसरी बीमा कम्पनी को ऐसे किसी ठहराव के अधीन अन्तरित कर दिया गया है जिसके अनुसरण में प्रथम वर्णित कम्पनी के (जिसे इस धारा में गौण कम्पनी कहा गया है), या उसके लेनदारों के दावे उस कम्पनी के विरुद्ध हो जिसे अन्तरण किया गया है (और जिसे इस धारा में प्रधान कम्पनी कहा गया है) वहां यदि प्रधान कम्पनी का परिसमापन 3[अधिकरण] द्वारा 1॥। किया जा रहा है तो (इसमें इसके पश्चात् वर्णित के अधीन रहते हुए) वह 3[अधिकरण] यह आदेश देगा कि गौण कम्पनी का परिसमापन प्रधान कम्पनी के साथ ही किया जाए और उसी या किसी पश्चात्वर्ती आदेश से एक ही व्यक्ति को दोनों कम्पनियों का समापक नियुक्त कर सकेगा तथा दोनों कम्पनियों का परिसमापन ऐसे किए जाने की दृष्टि से मानों वे एक कम्पनी हों, ऐसी अन्य बातों के लिए उपबंध कर सकेगा जैसी 2[अधिकरण] को आवश्यक प्रतीत हों ।
(2) प्रधान कम्पनी के परिसमापन का प्रारम्भ ही गौण कम्पनी के परिसमापन का प्रारम्भ होगा, किन्तु ऐसा तब होगा जब 1[अधिकरण] ने अन्यथा आदेश किया हो ।
(3) कई कम्पनियों के सदस्यों के अधिकारों और दायित्वों का उनके बीच समायोजन करने में 1[अधिकरण] उन कम्पनियों के गठन का और उन कम्पनियों के बीच किए गए ठहराव का उसी प्रकार ध्यान रखेगा जिस प्रकार कि अधिकरण एकल कम्पनी के परिसमापन की दशा में विभिन्न वर्ग के अभिदायियों के अधिकारों और दायित्वों का ध्यान रखता है या उससे निकटतम ऐसी रीति को, जो उन परिस्थितियों में संभव हो, ध्यान में रखेगा ।
(4) जहां किसी ऐसी कम्पनी का, जिसकी बाबत यह अभिकथन है कि वह गौण कम्पनी है, परिसमापन उस प्रधान कम्पनी के परिसमापन के समय नहीं किया जा रहा है जिसकी गौण कम्पनी होने का उसकी बाबत अभिकथन है, वहां 1[अधिकरण] गौण कम्पनी के परिसमापन का निदेश तब तक नहीं देगा जब तक कि उन सब आक्षेपों को (यदि कोई हों) सुनने के पश्चात्, जो उस कम्पनी के परिसमापन के विरुद्ध उस कम्पनी द्वारा या उसकी ओर से पेश किए जाएं, 1[अधिकरण] की यह राय न हो कि वह कम्पनी प्रधान कम्पनी की गौण कम्पनी है और प्रधान कम्पनी के साथ उस कम्पनी का परिसमापन न्यायोचित और साम्यापूर्ण है ।
(5) प्रधान कम्पनी के साथ किसी गौण कम्पनी के परिसमापन के सम्बन्ध में आवेदन प्रधान कम्पनी या गौण कम्पनी के किसी लेनदार या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति द्वारा किया जा सकेगा ।
(6) जहां कोई कम्पनी एक बीमाकर्ता कम्पनी की प्रधान कम्पनी है और किसी दूसरी बीमा कम्पनी की गौण कम्पनी है या जहां कई बीमा कम्पनियां एक ही प्रधान कम्पनी की गौण कम्पनियां हैं वहां 1[अधिकरण] कितनी ही ऐसी कम्पनियों की बाबत एक साथ या उनके पृथक् समूहों में, इस धारा में अधिकथित सिद्धांतों के अनुसार ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जो वह सर्वाधिक समीचीन समझे ।
58. बीमा कम्पनियों के भागतः परिसमापन की स्कीमें-(1) यदि किसी समय यह समीचीन प्रतीत होता है कि किसी बीमा कम्पनी के कार्यकलाप का उस कम्पनी के उपक्रम के किसी वर्ग के कारबार की बाबत परिसमापन किया जाना चाहिए, किन्तु उसके उपक्रम के किसी अन्य वर्ग का कारबार उस कम्पनी द्वारा चालू रखा जाना चाहिए या दूसरे बीमाकर्ता को अन्तरित कर दिया जाना चाहिए तो उन प्रयोजनों के लिए स्कीम इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार तैयार की जा सकेगी और 1[अधिकरण] की पुष्टि के लिए उसके समक्ष रखी जा सकेगी ।
(2) इस धारा के अधीन तैयार की गई किसी स्कीम में कंपनी की आस्तियों और दायित्वों का (ऐसी किन्हीं अधिशेष आस्तियों के आबंटन सहित जो प्रस्तावित परिसमापन में निकले) उन वर्गों के कारबारों के बीच, जिन पर प्रभाव पड़ता हो आबंटन और वितरण के करने के लिए, अपनी पालिसियों की बाबत पालिसीधारियों के प्रत्येक वर्ग के भावी अधिकारों के लिए और कम्पनी के कार्यकलाप में से ऐसे कार्यकलापों के परिसमापन की रीति के लिए उपबंध होगा जिनका परिसमापन किया जाना हो, तथा कम्पनी के उद्देश्यों की बाबत कम्पनी के ज्ञापन में परिवर्तन करने के लिए उपबंध हो सकेंगे और ऐसे अतिरिक्त उपबंध भी हो सकेंगे जो उस स्कीम को प्रभावी करने के लिए समीचीन हों ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
(3) परिसमापनाधीन तथा दिवाले के अधीन बीमाकर्ताओं के दायित्वों के मूल्यांकन संबंधी और परिसमापनाधीन या दिवाले के अधीन जीवन बीमा निधि की अधिशेष आस्तियों के उपयोजन संबंधी इस अधिनियम के उपबंध, इस धारा के अधीन बनाई जाने वाली स्कीम के अनुसार कम्पनी के कार्यकलाप के किसी भाग के परिसमापन को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे बीमा कम्पनियों के परिसमापन के संबंध में लागू होते हैं और इस धारा के अधीन बनाई जाने वाली कोई स्कीम कम्पनियों के परिसमापन संबंधी इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) के उपबंधों में से किसी को आवश्यक उपान्तरों सहित, लागू कर सकेगी ।
1[(4) इस धारा के अधीन ऐसी किसी स्कीम को पुष्ट करने वाला अधिकरण का कोई आदेश, जिससे कंपनी के उद्देश्यों की बाबत उसके ज्ञापन में परिवर्तन किया गया है, परिवर्तनों की बाबत ऐसे प्रभावी होगा मानो वह कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 4 के अधीन पुष्ट किया गया आदेश हो और उस अधिनियम की धारा 7 और धारा 17 के उपबंध तद्नुसार लागू होंगे ।]
2। । । । ।
3 । । । । 60. पालिसी मूल्यों की सूचना-आस्तियों के नकद वितरण के प्रयोजन से बीमा कम्पनी के परिसमापन में और किसी अन्य बीमाकर्ता के दिवाले की कार्यवाही में, यथास्थिति, समापक या समनुदेशिती उन सभी व्यक्तियों की दशा में, जिनकी बाबत उस कम्पनी या अन्य बीमाकर्ता की बहियों से यह प्रतीत होता है कि वे उस कम्पनी या अन्य बीमाकर्ता द्वारा दी गई पालिसियों के हकदार या उन पालिसियों से हितबद्ध हैं, उस कम्पनी या अन्य बीमाकर्ता कम्पनी के ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के प्रति दायित्व का मूल्य अभिनिश्चित करेगा तथा ऐसे मूल्य की सूचना उन व्यक्तियों को ऐसी रीति से देगा जो 4[अधिकरण] निर्दिष्ट करे और जिस व्यक्ति को सूचना ऐसे दी गई हो वह ऐसे अभिनिश्चित मूल्य से तब तक आबद्ध रहेगा जब तक कि वह ऐसे मूल्य पर आपत्ति करने के अपने आशय की सूचना ऐसी रीति से और इतने समय के अन्दर नहीं दे देता है जो 1[अधिकरण] के विनिर्णय या आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट हो ।
61. बीमा संविदाओं को कम कर देने की 1[अधिकरण] की शक्ति-जहां कोई बीमा कम्पनी परिसमापनाधीन है या कोई अन्य बीमाकर्ता दिवालिया हो गया है वहां 1[अधिकरण] उस कम्पनी या अन्य बीमाकर्ता की बीमा संविदाओं की रकम को ऐसे निबंधनों और ऐसी शर्तों पर कम कर देने का आदेश दे सकेगा जो 1[अधिकरण] न्यायोचित समझे ।
(2) जहां जीवन बीमा कारबार करने वाली किसी कम्पनी की बाबत यह साबित कर दिया गया है कि वह दिवालिया है वहां 1[अधिकरण] यदि ठीक समझे तो, परिसमापन का आदेश करने के बदले उस कम्पनी की बीमा संविदाओं की रकम ऐसे निबंधनों और ऐसी शर्तों पर कम कर देने का आदेश दे सकेगा जो 1[अधिकरण] ठीक समझे ।
(3) इस धारा के अधीन आदेश किए जाने के लिए आवेदन या तो समापक द्वारा या कम्पनी द्वारा या उसकी ओर से या पालिसीधारी द्वारा या 5[नियंत्रक] द्वारा किया जा सकेगा तथा 2[नियंत्रक] और ऐसा कोई अन्य व्यक्ति, जिसकी बाबत 1[अधिकरण] का विचार हो कि उस पर प्रभाव पड़ना सम्भाव्य है, ऐसे आवेदन पर सुनवाई का हकदार होगा ।
6[61क. राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण को अपील-(1) अधिकरण के किसी आदेश या विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(2) अधिकरण द्वारा पक्षकारों की सहमति से किए गए किसी आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण को कोई अपील नहीं होगी ।
- 2015 के अधिनिमय सं० 5 की धारा 67 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 24 द्वारा (1-6-1969 से) उपधारा (5) का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 68 द्वारा लोप किया गया ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2003 के अधिनियम सं० 11 की धारा 133 और अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील, अधिकरण द्वारा दिए गए आदेश या किए गए विनिश्चय की प्रति अपीलार्थी द्वारा प्राप्त करने की तारीख से पैंतालीस दिन के भीतर, फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में और ऐसी फीस के साथ होगी जो विहित की जाए :
परन्तु राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण पैंतालीस दिन की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात् किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न करने का पर्याप्त कारण था ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील के प्राप्त होने पर, राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात्, उस आदेश की जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करने, उपांतरित करने या उसे अपास्त करने वाला ऐसा आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे ।
(5) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति अधिकरण को और अपील के पक्षकारों को भेजेगा ।
(6) उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर वह यथासंभव शीघ्रता से विचार करेगा और अपील की प्राप्ति की तारीख से छह मास के भीतर अपील को अंतिम रूप से निपटाने के लिए उसके द्वारा प्रयास किया जाएगा ।]
विदेशी कम्पनियों के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध
62. अभारतीय कम्पनियों पर व्यतिकारी निर्योग्यताएं अधिरोपित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-जहां भारत के बाहर के ऐसे किसी देश की विधि या प्रथा द्वारा, जिसमें ऐसा बीमाकर्ता जो 1[भारत] में बीमा कारबार कर रहा है, गठित, निगमित या अधिवसित है, उन बीमा कम्पनियों से जो 4[भारत] में निगमित हैं, उस देश में अपना बीमा कारबार करने की शर्त के तौर पर यह बात अपेक्षित है कि वे किसी ऐसी विशेष अपेक्षा का अनुपालन करें, भले ही वह निक्षेपों या आस्तियों को उस देश में रखने के बारे में हो या अन्य प्रकार की हो, जो उस देश के बीमाकर्ताओं पर इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित नहीं है, वहां, यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी विशेष अपेक्षा विद्यमान है तो वह सरकार राजपत्र में आसूचना द्वारा, वही अपेक्षा या यथाशक्य वैसी ही अपेक्षाएं 4[भारत] में बीमा कारबार करने की शर्त के तौर पर उस देश के बीमाकर्ताओं पर अधिरोपित करने का निदेश दे सकेगी ।
63. भारत के बाहर स्थापित बीमाकर्ताओं द्वारा फाइल की जाने वाली विशिष्टियां-4[भारत] के बाहर अपने कारबार का मुख्य स्थान रखने वाला या भारत के बाहर अधिवसित ऐसा प्रत्येक बीमाकर्ता, जो ऐसा कारबार अभिप्राप्त करने के उद्देश्य से 4[भारत] में कारबार का स्थान स्थापित करता है या 4[भारत] में प्रतिनिधि नियुक्त करता है, ऐसे कारबार के स्थान की स्थापना से या ऐसे 2[प्रतिनिधि] की नियुक्ति से तीन मास के अन्दर 2[नियंत्रक] के यहां निम्नलिखित फाइल करेगा-
(क) चार्टर, कानून, व्यवस्थापन-विलेख, या ज्ञापन और अनुच्छेदों या अन्य लिखत की, जिससे बीमाकर्ता को गठित किया गया है या जिसमें उसका गठन परिभाषित है, प्रमाणित प्रति और यदि लिखत अंग्रेजी भाषा में न हो तो उसका प्रमाणित अनुवाद;
(ख) यदि बीमाकर्ता कम्पनी है तो उसके निदेशकों की सूची;
(ग) 3[भारत] में निवासी ऐसे किसी एक या अधिक व्यक्तियों के नाम और पते जो बीमाकर्ता पर तामील किए जाने के लिए अपेक्षित आदेशिका की और किसी सूचना की तामील बीमाकर्ता की ओर से स्वीकार करने के लिए प्राधिकृत हों, तथा उस मुख्तारनामे की प्रति, जो उन्हें दिया गया हो;
(घ) 1[भारत] में बीमाकर्ता के प्रधान कार्यालय का पूरा पता;
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1939 के अधिनियम सं० 11 की धारा 23 द्वारा अभिकर्ताञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(ङ) बीमाकर्ता द्वारा किए जाने वाले बीमा कारबार के वर्गों का विवरण; और
(च) शपथ द्वारा सत्यापित कथन, जिसमें धारा 62 में विनिर्दिष्ट स्वरूप की विशेष अपेक्षाएं, यदि कोई हों, उपवर्णित हों, जो बीमाकर्ता के उद्भव के देश में भारतीय राष्ट्रिकों पर अधिरोपित की गई हों,
और दिए गए प्रधान कार्यालय के पते में या किए जाने वाले कारबार के वर्गों में या यहां निर्दिष्ट किसी लिखत में या यहां निर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी के नाम में या ऊपर खण्ड (च) में विनिर्दिष्ट बातों में कोई परिवर्तन होने की दशा में, ऐसी कम्पनी ऐसे परिवर्तन की विशिष्टियां 1[नियंत्रक] को तत्काल देगी ।
64. भारत के बाहर स्थापित बीमाकर्ताओं द्वारा रखी जाने वाली बहियां-1[भारत] के बाहर अपने कारबार का मुख्य स्थान या अधिवास रखने वाला प्रत्येक बीमाकर्ता 1[भारत] में अपने प्रधान कार्यालय में ऐसी लेखा बहियां, रजिस्टर और दस्तावेजें रखेगा जिनसे वे लेखे, विवरण और संक्षिप्तियां, जिनकी बाबत इस अधिनियम के अधीन उससे यह अपेक्षित है कि भारत में उसके द्वारा किए गए बीमा कारबार की बाबत वह उन्हें 2[नियंत्रक] को दे, तैयार की जा सकें, और, यदि आवश्यक हो तो, 2[नियंत्रक] द्वारा उनकी जांच की जा सके, 2[तथा प्रत्येक कलैण्डर वर्ष की जनवरी के अंतिम दिन को या उसके पूर्व लेखापरीक्षक का इस भाव का प्रमाणपत्र देगा कि उक्त लेखा बहियां, रजिस्टर और दस्तावेजें, भारत में बीमाकर्ता के प्रधान कार्यालय में अपेक्षित रूप में रखे जा रहे हैं ।]
3[भाग 2क
4[जीवन बीमा परिषद् और साधारण बीमा परिषद् और उनकी समितियां]
5। । । । ।
6[64ग. जीवन बीमा और साधारण बीमा परिषदें-इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से ही,-
(क) विद्यमान जीवन बीमा परिषद्, बीमाकर्ताओं के प्रतिनिधि निकाय को, जो भारत में जीवन बीमा कारबार कर रहा है; और
(ख) विद्यमान साधारण बीमा परिषद्, बीमाकर्ताओं के प्रतिनिधि निकाय को, जो भारत में साधारण बीमा, स्वास्थ्य बीमा कारबार और पुनर्बीमा कारबार कर रहा है,
इस अधिनियम के अधीन संबंधित परिषदों के रूप में गठित किया गया समझा जाएगा ।
64घ. परिषदों में प्रतिनिधित्व करने का प्राधिकार-जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् के किसी सदस्य के लिए यह विधिपूर्ण होगा वह संपृक्त परिषद् की किसी बैठक में ऐसे सदस्य के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के लिए अपने किसी अधिकारी को प्राधिकृत करे ।]
64ङ. जीवन बीमा परिषद् और साधारण बीमा परिषद् के प्राधिकारी-जीवन बीमा परिषद् तथा साधारण बीमा परिषद् की इस भाग में उपबंधित रीति से गठित कार्यपालिका समितियां 7॥। प्राधिकारी होंगी ।
8[64च. जीवन बीमा परिषद् और साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समितियां-(1) जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 44 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 45 द्वारा (1-9-1950 से) भाग 2क और धारा 64क से 64न अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 69 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 70 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 71 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 25 द्वारा (1-6-1969 से) कतिपय शब्दों का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 72 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) जीवन बीमा परिषद् के सदस्यों के चार प्रतिनिधि, जो उक्त सदस्यों द्वारा अपनी व्यष्टिक हैसियत में ऐसी रीति से निर्वाचित किए जाएंगे, जो परिषद् की उपविधियों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं;
(ख) प्राधिकरण द्वारा नामनिर्दिष्ट एक प्रख्यात व्यक्ति, जो बीमा कारबार से संबद्ध न हो; और
(ग) क्रमशः बीमा अभिकर्ताओं, मध्यवर्तियों और पालिसीधारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन व्यक्ति, जिन्हें प्राधिकरण द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाए;
(घ) स्व-साहाय्य समूहों और बीमा सहकारी सोसाइटियों में से प्रत्येक के एक-एक प्रतिनिधि:
परन्तु खंड (क) में यथावर्णित प्रतिनिधियों में से एक को जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया जाएगा ।
(2) साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -
(क) साधारण बीमा परिषद् के सदस्यों के चार प्रतिनिधि, जो उक्त सदस्यों द्वारा अपनी व्यष्टि हैसियत में ऐसी रीति से निर्वाचित किए जाएंगे, जो परिषद् की उपविधियों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;
(ख) प्राधिकरण द्वारा नामनिर्दिष्ट एक प्रख्यात व्यक्ति, जो बीमा कारबार से संबद्ध न हो;
(ग) क्रमशः बीमा अभिकर्ताओं, अन्य पक्षकार प्रशासकों, सर्वेक्षकों और हानि निर्धारकों तथा पालिसीधारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले चार व्यक्ति, जिन्हें प्राधिकरण द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाए:
परन्तु खंड (क) में वर्णित प्रतिनिधियों में से एक को साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया जाएगा ।
(3) यदि उपधारा (1) और उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कोई व्यष्टि निकाय जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समितियों के सदस्यों में से किसी का निर्वाचन करने में असफल रहता है तो प्राधिकरण उस रिक्त स्थान को भरने के लिए किसी व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट कर सकेगा और इस प्रकार नामनिर्दिष्ट किया गया कोई व्यक्ति, यथास्थिति, जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति का इस प्रकार सदस्य समझा जाएगा मानो उसे उसमें सम्यक् रूप से निर्वाचित किया गया हो ।
(4) उक्त कार्यपालिका समितियों में से प्रत्येक उक्त समिति, उक्त समिति के किसी अधिवेशन में किसी कारबार के संव्यवहार के लिए उपविधियां तैयार कर सकेगी ।
(5) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् ऐसे व्यक्तियों को मिलकर ऐसी अन्य समितियां बना सकेगी, जो वह ऐसे कृत्यों के निर्वहन के लिए ठीक समझे, जो उन्हें प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(6) जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति और साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के सचिव की नियुक्ति प्रत्येक मामले में संबंधित कार्यपालिका समिति द्वारा की जाएगी:
परन्तु संबंधित कार्यपालिका समिति द्वारा नियुक्त प्रत्येक सचिव ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे सभी कृत्य करेगा, जो संबंधित कार्यपालिका समिति द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किए जाएं ।]
64छ. पदत्याग और आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना-(1) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति का कोई भी सदस्य समिति के सदस्य के रूप में अपना पद समिति के अध्यक्ष को सम्बोधित उस भाव की लिखित सूचना द्वारा त्याग सकेगा ।
(2) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति में हुई आकस्मिक रिक्तियां, भले ही वे त्यागपत्र से या मुत्यु से या अन्यथा हुई हों, 1[ऐसी रीति से भरी जाएंगी, जो संबंधित परिषद् की उपविधियों में अधिकथित की जाएं] और ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस प्रकार नामनिर्दिष्ट व्यक्ति तब तक पद पर बना रहेगा जब तक कि उस समिति का विघटन न हो जाए जिसके लिए उसे नामनिर्दिष्ट किया गया है ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 73 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(3) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के किसी कार्य पर आपत्ति केवल इस आधार पर न की जाएगी कि सम्पृक्त समिति में कोई स्थान खाली है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।
64ज. कार्यपालिका समिति की अस्तित्वावधि और विघटन-(1) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति का कार्यकाल उसके प्रथम अधिवेशन की तारीख से तीन वर्ष होगा जिसकी समाप्ति पर वह विघटित हो जाएगी और नई कार्यपालिका समिति गठित की जाएगी ।
(2) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति का विघटन हो जाने पर भी उसके बहिर्गामी सदस्य तब तक जब तक कि, यथास्थिति, जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की अन्य कार्यपालिका परिषद् का गठन न हो जाए पर पद बने रहेंगे और ऐसे प्रशासनिक तथा अन्य कर्तव्यों का निर्वहन करते रहेंगे जो विहित किए जाएं ।
1। । । । ।
64ञ. जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के कृत्य-(1) जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के निम्नलिखित कृत्य होंगे: -
(क) जीवन बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ताओं को आचरण के मानक तथा अच्छा आचार स्थापित करने के बारे में और जीवन बीमा पालिसियों के धारकों की दक्ष सेवा करने के बारे में सहायता, सलाह और मदद देना;
(ख) भारत में जीवन बीमा कारबार की बाबत बीमाकर्ताओं के व्ययों को नियन्त्रित करने के विषय में नियन्त्रक को सलाह देना;
(ग) जीवन बीमा पालिसियों के धारकों के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति से कार्य करने वाले बीमाकर्ता के विषय में नियन्त्रक को सूचना देना;
(घ) खण्ड (क), (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी ऐसे विषय से आनुषंगिक या प्रासंगिक किसी बात के बारे में कार्य करना जिसे 2[प्राधिकरण] के अनुमोदन से जीवन बीमा परिषद् भारत के राजपत्र में अधिसूचित करे ।
3[(2) जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति, अपने कृत्यों का प्रभावी रूप से निर्वहन करने में अपने को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए जीवन बीमा का कारबार करने वाले बीमाकर्ताओं से ऐसी फीस संगृहीत कर सकेगी, जो परिषद् द्वारा बनाई गई उपविधियों में अधिकथित की जाए ।]
64ट. जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति व्ययों के नियंत्रण के बारे में सलाह दे सकेगी-(1) जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रत्येक वर्ष 31 मार्च के पूर्व कम से कम एक बार इस दृष्टि से अपना अधिवेशन करे कि वह धारा 40ख की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन वे सीमाएं नियत करने में नियंत्रक को सलाह दे सके जिन तक जीवन बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता द्वारा ऐसे कारबार की बाबत पूर्वगामी वर्ष में उपगत वास्तविक व्यय उस उपधारा के अधीन विहित सीमाओं से अधिक हो सकते हैं तथा ऐसी सीमाएं नियत करने में नियंत्रक उस वर्ष के दौरान जीवन बीमा कारबार में साधारणतः विद्यमान परिस्थितियों का सम्यक् ध्यान रखेगा और वह बीमाकर्ताओं के विभिन्न समूहों के लिए विभिन्न सीमाएं नियत कर सकेगा ।
(2) जहां बीमाकर्ता प्रबन्ध मण्डल के व्ययों की बाबत धारा 40ख के उपबन्धों के उल्लंघन का दोषी हो वहां नियंत्रक बीमाकर्ता को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उसे चेतावनी दे सकेगा ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 74 द्वारा लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनिमय सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनिमय सं० 5 की धारा 75 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(3) जहां किसी बीमाकर्ता को सात वर्ष की अवधि के अन्दर उपधारा (2) के अधीन दो चेतावनियां दी जा चुकी हों और उसने उनकी अवहेलना कर दी हो वहां नियंत्रक इस प्रयोजन के लिए बीमाकर्ता द्वारा नियुक्त तथा नियंत्रक द्वारा अनुमोदित बीमांकक द्वारा उस तारीख तक का अन्वेषण और मूल्यांकन, जो नियंत्रक विनिर्दिष्ट करे, बीमाकर्ता के व्यय पर कराएगा तथा बीमाकर्ता उक्त बीमांकक के समक्ष वह समस्त सामग्री, जो ऐसे अन्वेषण और मूल्यांकन के प्रयोजन से उस द्वारा मांगी जाए, तीन मास से अन्यून इतनी अवधि के अन्दर प्रस्तुत कर देगा जितनी नियंत्रक विनिर्दिष्ट करे ।
(4) यथास्थिति, धारा 13 की उपधारा (1) और (4) के तथा धारा 15 की उपधारा (1) और (2) के या धारा 16 की उपधारा (2) के उपबन्ध इस धारा के अधीन अन्वेषण और मूल्यांकन के सम्बन्ध में लागू होंगे:
परन्तु ऐसे अन्वेषण और मूल्यांकन के फलस्वरूप तैयार की गई संक्षिप्ति और विवरण उस तारीख तक दे दिए जाएंगे जो नियंत्रक विनिर्दिष्ट करे ।
(5) ऐसी प्रत्येक संक्षिप्ति के साथ बीमाकंक द्वारा हस्ताक्षरित एक कथन उपाबद्ध किया जाएगा जिसमें वह जानकारी दी गई होगी जो विहित की जाए ।
(6) उपधारा (4) के अनुसार दी गई संक्षिप्ति और विवरण की प्राप्ति पर नियंत्रक ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जो विहित की जाए ।
64ठ. साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के कृत्य-(1) साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के निम्नलिखित कृत्य होंगे: -
(क) साधारण बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ताओं को आचरण के मानक तथा अच्छा आचार स्थापित करने के बारे में और साधारण बीमा पालिसियों के धारकों की दक्ष सेवा करने के बारे में सहायता और सलाह देना;
(ख) भारत में साधारण बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ताओं के कमीशन तथा अन्य खर्चों से सम्बन्धित व्ययों को नियंत्रित करने के विषय में नियंत्रक को सलाह देना;
(ग) साधारण बीमा पालिसियों के धारकों के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति से कार्य करने वाले बीमाकर्ता के विषय में नियंत्रक को सूचना देना;
(घ) खंड (क), (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी ऐसे विषय से आनुषंगिक या प्रासंगिक किसी बात के बारे में कार्य करना जिसे 1[प्राधिकरण] के अनुमोदन से साधारण बीमा परिषद् भारत के राजपत्र में अधिसूचित करे ।
2[(2) साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति अपने कृत्यों का प्रभावी रूप से निर्वहन करने में अपने को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए साधारण बीमा का कारबार करने वाले बीमाकर्ताओं से ऐसी फीस संगृहीत कर सकेगी जो परिषद् द्वारा बनाई गई उपविधियों में अधिकथित की जाए ।]
64ड. साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति व्ययों के नियंत्रण के बारे में सलाह दे सकेगी-(1) साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रत्येक वर्ष 31 मार्च के पूर्व कम से कम एक बार इस दृष्टि से अपना अधिवेशन करे कि धारा 40ख की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन वे सीमाएं नियत करने में नियंत्रक को सलाह दे सके जिन तक साधारण बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता द्वारा ऐसे कारबार की बाबत पूर्वगामी वर्ष में उपगत वास्तविक व्यय उस उपधारा के अधीन विहित सीमाओं से अधिक हो सकते हैं और ऐसी सीमाएं नियत करने में नियंत्रक उस वर्ष के दौरान साधारण बीमा कारबार में साधारणतः विद्यमान परिस्थितियों का सम्यक् ध्यान रखेगा और वह बीमाकर्ताओं के विभिन्न समूहों के लिए विभिन्न सीमाएं नियत कर सकेगा ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 76 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(2) जहां बीमाकर्ता प्रबन्ध मंडल के व्ययों की बाबत धारा 40ख के उपबन्धों के उल्लंघन का दोषी हो वहां नियंत्रक बीमाकर्ता को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उसे चेतावनी दे सकेगा ।
(3) जहां किसी मामले में बीमाकर्ता को उपधारा (2) के अधीन दी गई दो चेतावनियों की उसने अवहेलना कर दी हो वहां बीमाकर्ता के विरुद्ध नियंत्रक ऐसी कार्रवाई कर सकेगा जो विहित की जाए ।
64ढ. कुछ मामलों में एक साथ कार्य करने की कार्यपालिका समितियों की शक्ति- 1[प्राधिकरण, वे परिस्थितियां जिनमें, वह रीति जिससे, और वे शर्तें, जिन पर जीवन बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति और साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति दोनों समितियों के सामान्य हित की बात के संबंध में कार्यवाही करने के प्रयोजन से संयुक्त अधिवेशन कर सकेंगी, विनिर्दिष्ट कर सकेगा,] तथा ऐसे संयुक्त अधिवेशन में दोनों समितियों के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वे दोनों समितियों के सदस्यों में से इस प्रयोजन के लिए नियुक्त उपसमिति के अवधारण के लिए कोई मामला, जो समितियों के विचाराधीन हो, प्रत्यायोजित कर दे ।
64ण. [बीमा की दरें आदि विनियमित करने की साधारण बीमा परिषद् की शक्ति ।]-[1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 27 द्वारा (1-6-1969 से) लोप किया गया] ।
64त. [प्रादेशिक परिषद् ।]- [1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 27 द्वारा (1-6-1969 से) लोप किया गया] ।
64थ. [प्रादेशिक परिषद् के कृत्य ।]- [1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 27 द्वारा (1-6-1969 से) लोप किया गया] ।
64द. जीवन बीमा परिषद् तथा साधारण बीमा परिषद् की साधारण शक्तियां-(1) अपने कर्तव्यों के दक्ष पालन के लिए, यथास्थिति, जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद्-
(क) ऐसे अधिकारी और सेवक नियुक्त कर सकेगी जो आवश्यक हों और उनकी सेवा की शर्तें नियत कर सकेगी;
(ख) वह रीति अवधारित कर सकेगी जिससे कोई विहित फीस संगृहीत की जा सकेगी;
2[(ग) उन सभी बीमाकर्ताओं की, जो किसी भी परिषद् के सदस्य हैं, सूची की अद्यतन प्रति रख सकेगी और बनाए रख सकेगी;]
(घ) 4[निम्नलिखित के लिए: -
(i) प्रथम निर्वाचन से भिन्न निर्वाचन किए जाने के लिए,
(ii) अधिवेशनों के बुलाए जाने और आयोजन के लिए, उनमें किए जाने वाले कार्य के संचालन के लिए तथा गणपूर्ति के लिए आवश्यक व्यक्तियों की संख्या के लिए,
(iii) बीमाकर्ताओं द्वारा जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की कार्यपालिका समिति के समक्ष ऐसे कथन या जानकारी, जो उन द्वारा मांगी गई हो, रखने के लिए तथा उनकी प्रतियां बीमाकर्ता द्वारा नियंत्रक को दिए जाने के लिए,
(iv) किन्हीं फीसों के उद्ग्रहण और संग्रहण के लिए,
(v) ऐसी किसी अन्य बात के विनियमन के लिए जो इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों का पालन करने के वास्ते उसे समर्थ बनाने के लिए प्रयोजन के लिए आवश्यक हो,
3[उपविधियां बना सकेगी] ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 77 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 78 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 78 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(2) जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् सम्पृक्त कार्यपालिका समिति 1॥। को, यथास्थिति, जीवन बीमा परिषद् या साधारण बीमा परिषद् की उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन प्रदत्त शक्तियों में से किसी का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी ।
2। । । । ।
3[भाग 2ख
टैरिफ सलाहकार समिति तथा टैरिफ दरों का नियंत्रण
4। । । । ।
5[64पठक. संक्रमणकालीन उपबंध-(1) इस भाग में किसी बात के होते हुए भी, जब तक धारा 64पग के अधीन सलाहकार समिति द्वारा अधिकथित दरों, फायदों और निबंधनों तथा शर्तों को प्राधिकरण द्वारा उस तारीख से, जो प्राधिकरण राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अवधारित करे, अधिसूचना से निकाला नहीं जाता है और दरों, फायदों और निबंधनों तथा शर्तों को संबंधित बीमाकर्ता द्वारा विनिश्चित नहीं कर दिया जाता है, तब तक सलाहकार समिति द्वारा अधिसूचित दरें, फायदे और निबंधन तथा शर्तें प्रवृत्त बनी रहेंगी और सदैव प्रवृत्त बनी रही समझी जाएंगी तथा कोई भी ऐसी दरें, फायदे और निबंधन तथा शर्तें सभी बीमाकर्ताओं पर बाध्य होंगी ।
(2) प्राधिकरण, केंद्रीय सरकार के परामर्श से, टैरिफ सलाहकार समिति के विघटन पर, उसके विद्यमान कर्मचारियों के लिए, ऐसे कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह आदेश द्वारा अवधारित करे, एक स्कीम तैयार करेगा ।]
6[64पड. सर्वेक्षक या हानि निर्धारक-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ से एक वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् साधारण बीमा कारबार की बाबत तब तक सर्वेक्षक या हानि निर्धारक के रूप में कार्य नहीं करेगा, जब तक कि वह-
(क) ऐसी शैक्षिक अर्हताएं धारण न करता हो, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं;
(ख) सर्वेक्षकों और हानि निर्धारकों के किसी वृत्तिक निकाय का, अर्थात्, भारतीय बीमा सर्वेक्षक और हानि निर्धारक संस्थान का सदस्य न हो:
परंतु किसी फर्म या कंपनी की दशा में, ऐसे सभी भागीदार या निदेशक या अन्य व्यक्ति, जिनसे, यथास्थति, रिपोर्टित हानि का सर्वेक्षण या निर्धारण करने की अपेक्षा की जाए, खंड (क) और खंड (ख) की अपेक्षाओं को पूरा करेंगे ।
(2) प्रत्येक सर्वेक्षक और हानि निर्धारक अपने उन कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों और अन्य वृत्तिक अपेक्षाओं की बाबत, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, आचार संहिता का पालन करेगा ।
(3) पूर्वगामी उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ से पूर्व किसी अनुज्ञप्त सर्वेक्षक या हानि निर्धारक के रूप में कार्य करने वाले व्यक्तियों का कोई वर्ग या के वर्ग उस अवधि के लिए, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, उस रूप में कार्य करता रहेगा या रहेंगे:
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 28 द्वारा (1-6-1969 से) कतिपय शब्दों का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनिमय सं० 5 की धारा 79 द्वारा लोप किया गया ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 29 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनिमय सं० 5 की धारा 80 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनिमय सं० 5 की धारा 81 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनिमय सं० 5 की धारा 82 द्वारा प्रतिस्थापित ।
परंतु सर्वेक्षक या हानि निर्धारक उस अवधि के भीतर, जो प्राधिकरण द्वारा अधिसूचित की जाए, उपधारा (1) के खंड (क) और खंड (ख) की अपेक्षाओं को पूरा करेगा, जिसमें असफल रहने पर सर्वेक्षक या हानि निर्धारक स्वतः ही सर्वेक्षक या हानि निर्धारक के रूप में कार्य करने के लिए निरर्हित हो जाएगा ।
(4) किसी भी बीमा पालिसी के संबंध में किसी हानि की बाबत, जो भारत में हुई हो, प्राधिकरण द्वारा विनियमों में विनिर्दिष्ट रकम के बराबर या उससे अधिक मूल्य का ऐसा दावा, जिसका भारत में संदाय या तय किया जाना अपेक्षित हो और जो बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ से एक वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् किसी भी समय उद्भूत हुआ हो या बीमाकर्ता को प्रज्ञापित किया गया हो, यदि प्राधिकरण द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न किया जाए तो, बीमाकर्ता द्वारा संदाय या तय किए जाने के लिए तभी ग्रहण किया जाएगा जबकि उसने उस हानि की बाबत, जो हुई है, ऐसे व्यक्ति से रिपोर्ट अभिप्राप्त नहीं की है जो सर्वेक्षक या हानि निर्धारक के रूप में (जिसे इसमें इसके पश्चात् अनुमोदित सर्वेक्षक या हानि निर्धारक" कहा गया है) कार्य करने के लिए इस धारा के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति धारण किए हुए है, अन्यथा ग्रहण नहीं किया जाएगा :
परन्तु इस उपधारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह अनुमोदित सर्वेक्षक या हानि निर्धारक द्वारा निर्धारित रकम से भिन्न किसी रकम पर किसी दावे का संदाय करने या उसे तय करने के बीमाकर्ता के अधिकार को छीनती है या न्यून करती है ।
(5) प्राधिकरण किसी भी समय उपधारा (4) में निर्दिष्ट स्वरूप के किसी दावे की बाबत कोई स्वतंत्र रिपोर्ट अपने द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अन्य अनुमोदित सर्वेक्षक या हानि निर्धारक से मांग सकेगा और ऐसा सर्वेक्षक या हानि निर्धारक उतने समय के अन्दर जितना प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए या उस दशा में, जबकि कोई समय सीमा उसके द्वारा विनिर्दिष्ट नहीं की गई है, उचित समय के अन्दर, प्राधिकरण को ऐसी रिपोर्ट देगा और ऐसी रिपोर्ट का खर्चा या उससे संबंधित खर्चा बीमाकर्ता द्वारा वहन किया जाएगा ।
(6) प्राधिकरण उपधारा (5) में निर्दिष्ट रिपोर्ट प्राप्त होने पर दावा तय किए जाने से संबंधित ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह आवश्यक समझे और ऐसे निदेशों के अन्तर्गत किसी दावे के तय किए जाने से संबद्ध ऐसा निदेश भी है जो ऐसी रकम से कम या अधिक की बाबत होगा जिस पर उसे तय करने की प्रस्थापना हो या जिस पर वह तय किया गया हो और बीमाकर्ता ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा:
परन्तु जहां प्राधिकरण किसी दावे को उससे कम रकम पर तय करने का निदेश देता है जिस पर वह पहले तय किया गया है, वहां बीमाकर्ता के बारे में यह बात कि उसने निदेश का अनुपालन कर दिया है उस दशा में समझी जाएगी जब वह प्राधिकरण का यह समाधान कर दे कि इस बात का सम्यक् ध्यान रखते हुए उसने सम्यक् शीघ्रता से सभी उचित कदम उठा लिए हैं कि उसमें होने वाला व्यय उस रकम के अननुपात में तो नहीं है जो वसूल की जानी है:
परन्तु यह और कि जहां दावे की रकम पहले की चुका दी गई है और प्राधिकरण की यह राय है कि जितनी रकम अधिक दी गई है उसकी वसूली से बीमाकृत को असम्यक् कठिनाई होगी वहां कम रकम के संदाय का कोई भी निदेश नहीं दिया जाएगा:
परन्तु यह और भी कि इस धारा की किसी बात से बीमाकर्ता ऐसे किसी सिविल या आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं होगा जिसके अधीन वह उस दशा में होता जबकि उस उपधारा के उपबंध न होते ।
(7) कोई भी बीमाकर्ता बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ से एक वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् बीमा पालिसी के अधीन हानि के दावे के सर्वेक्षण या सत्यापन के लिए या उसके बारे में रिपोर्ट देने के लिए कोई भी फीस या पारिश्रमिक किसी व्यक्ति को तभी देगा जबकि ऐसा सर्वेक्षण, सत्यापन या रिपोर्ट करने वाला व्यक्ति अनुमोदित सर्वेक्षक या हानि निर्धारक हो, अन्यथा नहीं ।
(8) जहां किसी बीमा पालिसी पर उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट रकम से कम मूल्य के दावे के मामले में बीमाकर्ता के लिए यह साध्य नहीं है कि वह उस दावे की रकम से अननुपातिक व्यय उपगत किए बिना अनुमोदित सर्वेक्षक या हानि निर्धारक को नियोजित करे वहां बीमाकर्ता किसी अन्य व्यक्ति को (जो सर्वेक्षक या हानि निर्धारक के रूप में नियोजित किए जाने के लिए तत्समय निरर्हित व्यक्ति नहीं है), ऐसी हानि का सर्वेक्षण करने के लिए नियोजित कर सकेगा और ऐसे नियोजित व्यक्ति को उतनी उचित फीस या पारिश्रमिक दे सकेगा जितना वह ठीक समझे ।
(9) प्राधिकरण किसी बीमा पालिसी पर उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट रकम से कम मूल्य के किसी दावे की बाबत, उस दशा में जबकि सर्वेक्षक या हानि निर्धारक ने उसे दावे की बाबत रिपोर्ट नहीं दी है या दिए जाने की प्रस्थापना नहीं की है, यह निदेश दे सकेगा कि ऐसे दावे की रिपोर्ट अनुमोदित सर्वेक्षक या हानि निर्धारक द्वारा दी जाए और जहां प्राधिकरण ऐसा कोई निदेश देता है वहां उपधारा (5) और उपधारा (6) के उपबंध उस दावे की बाबत लागू होंगे ।
(10) जहां किसी वर्ग के दावों के संबंध में प्राधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि सर्वेक्षण या हानि निर्धारण का काम अनुज्ञप्त सर्वेक्षक या हानि निर्धारक से भिन्न किसी व्यक्ति को सौंप दिया जाना रुढ़िगत है या कोई सर्वेक्षण या हानि निर्धारण साध्य नहीं है वहां वह, आदेश द्वारा, ऐसे वर्ग के दावों को इस धारा के प्रवर्तन से छूट दे सकेगा ।]
भाग 2ग
शोधन क्षमता मार्जिन, प्रीमियम का अग्रिम संदाय और कारबार का नया स्थान खोलने पर निर्बन्धन
1[64फ. अस्तियों और दायित्वों का मूल्यांकन कैसे किया जाए-(1) धारा 64फक के उपबंधों का अनुपालन अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, आस्तियों का मूल्यांकन ऐसे मूल्य पर किया जाएगा, जो उनके बाजार या वसूलीय मूल्य से अधिक न हो और कतिपय आस्तियों को प्राधिकरण द्वारा ऐसी रीति में, अपवर्जित किया जा सकेगा जो इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(2) बीमाकर्ता के दायित्व की प्रत्येक मद का ऐसी रीति में समुचित मूल्य लगाया जाएगा जो इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(3) प्रत्येक बीमाकर्ता, यथास्थिति, साधारण बीमा कारबार के संबंध में प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित लेखा परीक्षक द्वारा या जीवन बीमा कारबार के संबंध में प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित बीमांकक द्वारा प्रमाणित अपनी आस्तियों और दायित्वों का विवरण, जिनका इस धारा द्वारा अपेक्षित रीति से निर्धारण प्रत्येक वर्ष की 31 मार्च को किया गया है, इस अधिनियम के अधीन फाइल किए जाने के लिए अपेक्षित विवरणियों के साथ ऐसे समय के भीतर, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, प्राधिकरण को देगा ।
64फक. आस्तियों की पर्याप्तता-(1) प्रत्येक बीमाकर्ता और पुनर्बीमाकर्ता सदैव अपने दायित्वों की रकम के ऊपर अपनी आस्तियों का मूल्य इतना अधिक बनाए रखेगा, जो धारा 6 के अधीन यथाकथित और विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट रीति से निकाली गई न्यूनतम पूंजी की रकम के पचास प्रतिशत से कम न हो ।
(2) यथास्थिति, किसी ऐसे बीमाकर्ता और पुनर्बीमाकर्ता को, जो उपधारा (1) का अनुपालन नहीं करता, दिवालिया समझा जाएगा और प्राधिकरण द्वारा किए गए आवेदन पर न्यायालय द्वारा परिसमापन किया जा सकेगा ।
(3) प्राधिकरण, इस प्रयोजन के लिए बनाए गए विनियम के रूप में, शोधन क्षमता के नियंत्रण स्तर के नाम से ज्ञात शोधन क्षमता मार्जिन का स्तर विनिर्दिष्ट करेगा, जिसके भंग होने पर प्राधिकरण किन्हीं अन्य उपचारात्मक उपायों पर, जो वह ठीक समझे, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार कार्य करेगा:
परंतु यदि किसी बीमाकर्ता की बाबत प्राधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि इस उपधारा के उपबंधों का अनुपालन करने से बीमाकर्ता को या तो प्रतिकूल दावा विषयक अनुभव के कारण या नए कारबार की मात्रा में तीव्र वृद्धि के कारण या किसी अन्य कारण से, असम्यक् कठिनाई होगी तो वह यह निदेश दे सकेगा कि इस उपधारा के उपबंध इतनी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह विनिर्दिष्ट करे, उस बीमाकर्ता को ऐसे उपांतरणों के साथ लागू होंगे:
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 83 द्वारा प्रतिस्थापित ।
परंतु यह तब जब कि उपांतरणों के परिणामस्वरूप शोधन क्षमता का नियंत्रण स्तर उससे कम न हो, जो उपधारा (1) के अधीन अनुबंधित है ।
(4) यदि, कोई बीमाकर्ता या पुनर्बीमाकर्ता किसी समय, शोधन क्षमता मार्जिन का अपेक्षित नियंत्रण स्तर बनाए नहीं रखता है, तो वह प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए निदेशों के अनुसार प्राधिकरण को एक वित्तीय योजना, छह मास से अनधिक की विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, कमी को दूर करने के लिए एक कार्य-योजना उपदर्शित करते हुए, प्रस्तुत करेगा ।
(5) ऐसा कोई बीमाकर्ता, जिसने उपधारा (4) के अधीन यथा अपेक्षित योजना प्राधिकरण को प्रस्तुत की है, योजना में उपांतरणों का यदि प्राधिकरण उसे अपर्याप्त समझे, प्रस्ताव करेगा और ऐसे किसी घटनाक्रम में प्राधिकरण ऐसे निदेश जिनके अंतर्गत किसी नए कारबार को करने या किसी प्रशासक की नियुक्ति या दोनों करने से संबंधित निदेश भी है, दे सकेगा, जो वह आवश्यक समझे ।
(6) यथास्थिति, ऐसे किसी बीमाकर्ता या पुनर्बीमाकर्ता के बारे में, जो उपधारा (4) के उपबंधों का अनुपालन नहीं करता, यह समझा जाएगा कि उसने इस धारा की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में व्यतिक्रम किया है ।
(7) प्राधिकरण, किसी बीमाकर्ता या पुनर्बीमाकर्ता की आस्तियों और दायित्वों का निरीक्षण या सत्यापन करने के लिए या यह सिद्ध करने के लिए कि इस धारा की अपेक्षाओं का किसी विशेष तारीख को अनुपालन कर दिया गया है, आवश्यक विशिष्टियां अभिप्राप्त करने के लिए किसी भी समय, ऐसे कदम उठाने का हकदार होगा, जो वह आवश्यक समझे और, यथास्थिति, बीमाकर्ता या पुनर्बीमाकर्ता प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त की गई किसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करेगा तथा यदि वह अध्यपेक्षा की प्राप्ति से दो मास के भीतर ऐसा करने में सफल नहीं होता है तो, यथास्थिति, बीमाकर्ता या पुनर्बीमाकर्ता के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने इस धारा की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में व्यतिक्रम किया है ।
(8) उपधारा (1) के उपबंधों को, यथास्थिति, ऐसे किसी बीमाकर्ता या पुनर्बीमाकर्ता को लागू करने में, जो किसी समूह का सदस्य है, उस बीमाकर्ता के लिए सुसंगत रकम वह होगी जिसका उस सुसंगत रकम के, उस अनुपात के बराबर रकम, से जिसका ऐसे समूह द्वारा, यदि उसे एकल बीमाकर्ता समझा जाता, वही अनुपात होगा जो कि समूह द्वारा निर्गमित प्रत्येक पालिसी पर कुल जोखिम से ऐसे बीमाकर्ता के जोखिम के भाग का है:
परंतु जब बीमाकर्ताओं का कोई समूह, समूह नहीं रह जाता है, तो उस समूह में का प्रत्येक ऐसा बीमाकर्ता, जो भारत में किसी वर्ग का बीमा कारबार करना जारी रखता है, उपधारा (1) की अपेक्षाओं का इस प्रकार अनुपालन करेगा मानो वह किसी समय किसी समूह का बीमाकर्ता न रहा हो:
परंतु यह और कि यह पूर्वगामी परंतुक के उपबंधों का पर्याप्त अनुपालन होगा, यदि बीमाकर्ता अपने दायित्वों की रकम के ऊपर अपनी आस्तियों के मूल्य के आधिक्य को समूह के अस्तित्व में न रहने की तारीख से छह मास के भीतर अपेक्षित रकम तक ले आता है:
परंतु यह भी कि प्राधिकरण पर्याप्त कारण दर्शित किए जाने पर, छह मास की उक्त अवधि को ऐसी और अवधियों तक बढ़ा सकेगा, जो वह ठीक समझे, किंतु यह कि इस प्रकार कुल अवधि किसी भी दशा में एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकेगी ।
(9) प्रत्येक बीमाकर्ता प्राधिकरण को, शोधन क्षमता मार्जिन के ब्यौरे देने संबंधी विवरणी, ऐसे प्ररूप, समय, ऐसी रीति में, जिसके अन्तर्गत उसका अधिप्रमाणन भी है, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, प्रस्तुत करेगा ।]
64फख. जब तक कि प्रीमियम अग्रिम तौर पर प्राप्त न हो जाए किसी भी जोखिम का ग्रहण न किया जाना-(1) कोई भी बीमाकर्ता ऐसे किसी बीमा कारबार की बाबत भारत में कोई जोखिम, जिसके सम्बन्ध में प्रीमियम मामूली तौर पर भारत के बाहर देय नहीं है, तब तक ग्रहण नहीं करेगा जब तक कि देय प्रीमियम उसे प्राप्त न हो जाए या देय प्रीमियम का संदाय ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसी रीति से और इतने समय के अन्दर किए जाने के लिए गारण्टी न दे दी जाए जो विहित हो या जब तक कि इतनी रकम का निक्षेप, जितनी विहित हो, विहित रीति से अग्रिम तौर पर न कर दिया जाए ।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उन जोखिमों की दशा में, जिनके लिए प्रीमियम पहले से ही अभिनिश्चित किया जा सकता है, जोखिम की उपधारणा उस तारीख के पहले नहीं की जा सकेगी जिसकी वह प्रीमियम नकद या चैक के रूप में बीमाकर्ता को दिया गया है ।
स्पष्टीकरण-यदि प्रीमियम डाक से भेजे गए मनीआर्डर या चैक द्वारा दिया गया है तो जोखिम उस तारीख को ग्रहण की जा सकेगी जिसको, यथास्थिति, मनीआर्डर बुक किया गया है या चैक डाक से भेजा गया है ।
(3) यदि बीमाकृत की पालिसी के रद्द किए जाने या उसके निबन्धनों और शर्तों में परिवर्तन किए जाने के कारण या अन्यथा प्रीमियम का प्रतिदाय शोध्य हो जाए तो वह बीमाकर्ता द्वारा बीमाकृत को क्रास किए हुए या आदेशी चैक द्वारा या डाक मनीआर्डर द्वारा सीधे दे दिया जाएगा तथा बीमाकृत से बीमाकर्ता समुचित रसीद अभिप्रापत कर लेगा और ऐसा प्रतिदाय किसी भी दशा में अभिकर्ता के खाते में जमा न किया जाएगा ।
(4) जहां बीमा अभिकर्ता बीमा पालिसी पर प्रीमियम बीमाकर्ता के निमित्त संगृहीत करता है वहां वह अपना कमीशन काटे बिना ऐसे संगृहीत पूरा प्रीमियम, बैंक और डाक के अवकाश दिनों को छोड़कर, संग्रहण से चौबीस घण्टे के अन्दर बीमाकर्ता के पास निक्षिप्त कर देगा या बीमाकर्ता को डाक द्वारा भेज देगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार बीमा पालिसियों के विशिष्ट प्रवर्गों के बारे में उपधारा (1) की अपेक्षाओं को नियमों द्वारा शिथिल कर सकेगी ।
1[(6) प्राधिकरण, समय समय पर, उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा बीमाकर्ता द्वारा प्रीमियम की प्राप्ति की रीति विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।]
2[64फग. कारबार का नया स्थान खोलने पर निर्बंधन-कोई भी बीमाकर्ता, बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 के प्रारंभ के पश्चात् न तो भारत में और न भारत के बाहर कारबार कोई नया स्थान खोलेगा और न बंद करेगा और न भारत में या भारत के बाहर स्थित कारबार के किसी विद्यमान स्थान की अवस्थिति को, विनियमों द्वारा यथाविनिर्दिष्ट रीति में के सिवाय, उसी शहर, नगर या ग्राम से अन्यत्र बदलेगा ।]
3। । । । ।
4[भाग 4क
पुनर्बीमा
101क. भारतीय पुनर्बीमाकर्ताओं के यहां पुनर्बीमा-(1) प्रत्येक बीमाकर्ता प्रत्येक पालिसी पर बीमाकृत धनराशि के इतने प्रतिशत का जितना 5[प्राधिकरण द्वारा केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन सेट उपधारा (2) के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाए, पुनर्बीमा पुनर्बीमाकर्ताओं से कराएगा ।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए 6[प्राधिकरण] राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) प्रत्येक पालिसी पर बीमाकृत धनराशि का वह प्रतिशत विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसका पुनर्बीमा किया जाना है और विभिन्न वर्ग के बीमाओं के लिए विभिन्न प्रतिशत विनिर्दिष्ट किए जा सकेंगे:
परन्तु ऐसे विनिर्दिष्ट प्रतिशत ऐसी पालिसी पर बीमाकृत धनराशि के तीस प्रतिशत से अधिक नहीं होगा; और
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 13 द्वारा (23-9-2002 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 84 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 85 द्वारा लोप किया गया ।
- 1961 के अधिनियम सं० 11 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
(ख) वे अनुपात भी विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसमें उक्त प्रतिशत को भारतीय पुनर्बीमाकर्ताओं में आबंटित किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, भारत में अग्निबीमा कारबार करने वाला बीमाकर्ता, उपधारा (2) के अधीन ऐसे कारबार की बाबत प्रत्येक पालिसी पर बीमाकृत धनराशि के विनिर्दिष्ट प्रतिशत का पुनर्बीमा करने के बदले में उस कारबार की बाबत प्रथम अधिशेष में से इतनी रकम का, जो वह ठीक समझे, पुनर्बीमा भारतीय बीमाकर्ताओं में करा सकेगा, किन्तु यह इस प्रकार करा सकेगा कि ऐसे पुनर्बीमा पर किसी वर्ष में उस द्वारा देय प्रीमियमों की कुल रकम ऐसे कारबार की बाबत उस वर्ष के दौरान (अध्यर्पित या प्रतिगृहीत पुनर्बीमा पर प्रीमियमों को गणना में लिए बिना) प्रीमियम आय के उक्त प्रतिशत से कम न हो ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए वर्ष 1961 की बाबत यह समझा जाएगा कि उससे उस वर्ष की पहली अप्रैल से लेकर 31 दिसम्बर तक की अवधि अभिप्रेत है ।
(4) उपधारा (2) के अधीन अधिसूचना में उस पुनर्बीमा कारबार की बाबत, जो इस धारा के अधीन किया जाना अपेक्षित है, निबन्धन और शर्तें भी विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी तथा ऐसे निबन्धन और शर्तें भारतीय पुनर्बीमाकर्ताओं तथा अन्य बीमाकर्ताओं पर आबद्धकर होंगी ।
(5) उपधारा (2) के अधीन कोई भी अधिसूचना धारा 101ख के अधीन गठित सलाहकार समिति से परामर्श करने के पश्चात् ही निकाली जाएगी ।
(6) इस धारा के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना अपने निकाले जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
(7) शंकाएं दूर करने के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (1) की किसी बात का यह अर्थ न लगाया जाएगा कि वह किसी पालिसी पर बीमाकृत पूरी धनराशि का या उपधारा (2) के अधीन विनिर्दिष्ट प्रतिशत से अधिक प्रतिशत का पुनर्बीमा किसी भारतीय पुनर्बीमाकर्ता या अन्य बीमाकर्ता से कराने से किसी बीमाकर्ता को रोकती है ।
(8) इस धारा में-
(i) “पालिसी" से भारत में किए गए साधारण बीमा कारबार की बाबत पहली अप्रैल, 1961 को या उसके पश्चात् निर्गमित या नवीकृत पालिसी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत पुनर्बीमा पालिसी नहीं है ; और
1[(ii) “भारतीय पुनर्बीमाकर्ता" से ऐसी भारतीय बीमा कंपनी अभिप्रेत है जिसे प्राधिकरण द्वारा धारा 3 की उपधारा (2क) के अधीन भारत में अनन्य रूप से पुनर्बीमा कारबार करने के लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है ।]
101ख. सलाहकार समिति-(1) 2[प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से,] धारा 101क के प्रयोजनों के लिए एक सलाहकार समिति गठित करेगी जो बीमा कारबार का विशेष ज्ञान और अनुभव रखने वाले अधिक से अधिक पांच व्यक्तियों से मिलकर बनेगी ।
(2) सलाहकार समिति के सदस्यों की पदावधि और उनको देय भत्ते, समिति द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, और समिति का कामकाज करने के लिए आवश्यक गणपूर्ति तथा उसमें हुई आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जो 3[प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारितट की जाए ।
3[101ग. पुनर्बीमा करारों की परीक्षा-नियंत्रक किसी भी समय-
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 15 द्वारा (23-9-2002 से) प्रतिस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 33 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
(क) बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह भारत में अपने कारबार के मुख्य स्थान में वे सब पुनर्बीमा करार तथा अन्य पुनर्बीमा संविदाएं, जो बीमाकर्ता द्वारा की गई हैं, परीक्षा के लिए उसके समक्ष प्रस्तुत करे;
(ख) बीमाकर्ता के किसी अधिकारी की ऊपर खण्ड (क) में निर्दिष्ट दस्तावेज के संबंध में शपथ पर परीक्षा कर सकेगा; या
(ग) लिखित रूप में सूचना देकर बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह नियंत्रक को खण्ड (क) में निर्दिष्ट दस्तावेजों में से किसी की प्रतियां बीमाकर्ता के प्रधान अधिकारी द्वारा प्रमाणित करा के दे ।]
भाग 5
प्रकीर्ण
1[102. इस अधिनियम के अनुपालन में चूक के लिए या उसके उल्लंघन में कार्य के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति जिससे इस अधिनियम, या उसके अधीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों के अधीन अपेक्षा है कि वह
(क) प्राधिकरण को कोई दस्तावेज, विवरण, लेखा, विवरणी या रिपोर्ट प्रस्तुत करे, उन्हें पेश करने में असफल रहेगा; या
(ख) निदेशों का पालन करे, ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहेगा,
(ग) शोधन क्षमता मार्जिन बनाए रखे, ऐसा शोधन क्षमता मार्जिन बनाए रखने में असफल रहेगा;
(घ) बीमा संधियों के बारे में निदेशों का पालन करे, उक्त बीमा संधियों के ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहेगा,
तो वह शास्ति का जो 2[ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता बनी रहती है, एक लाख रुपए या एक करोड़ रुपए, इनमें से जो भी कम हो, दायी होगा] ।
3[103. धारा 3 के उल्लंघन में बीमा कारबार करने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति धारा 3 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किए बिना, बीमा कारबार करेगा, तो वह ऐसी शास्ति से जो पच्चीस करोड़ रुपए से अधिक की नहीं होगी, और कारावास से, जो दस वर्ष तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
104. धारा 27, धारा 27क, धारा 27ख, धारा 27घ और धारा 27ङ के उल्लंघन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति धारा 27, धारा 27क, धारा 27ख, धारा 27घ और धारा 27ङ के उपबंधों का पालन करने में असफल रहेगा, तो वह ऐसी शास्ति का, जो पच्चीस करोड़ रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा ।]
105. संपत्ति सदोष अभिप्राप्त करना या विधारित करना-यदि बीमाकर्ता का ऐसा कोई भी निदेशक, प्रबंध निदेशक, प्रबन्धक या अन्य अधिकारी या कर्मचारी किसी संपत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उक्त अधिनियम के किसी प्रयोजन के लिए सदोष उपयोजित करेगा, तो वह शास्ति का जो 4[जो एक करोड़ रुपए से अधिक की नहीं होगी,] दायी होगा ।
105क. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारोबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 87 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 88 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 89 द्वारा प्रतिस्थापित ।
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का दायी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,
(क) “कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत
(i) फर्म; और
(ii) व्यक्तियों का संगम या व्यष्टियों का निकाय है चाहे वह निगमित हो या नहीं; और
(ख) “निदेशक" से,
(i) फर्म के संबंध में, फर्म का भागीदार अभिप्रेत है;
(ii) व्यक्तियों के संगम या व्यष्टियों के निकाय के संबंध में, उसके कार्यों का नियंत्रण करने वाला कोई सदस्य अभिप्रेत है ।
1[105ख. धारा 32ख, धारा 32ग और धारा 32घ का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई बीमाकर्ता धारा 32ख, धारा 32ग और धारा 32घ के उपबंधों का पालन करने में असफल रहेगा तो वह शास्ति का, जो पच्चीस करोड़ रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा ।
105ग. न्यायनिर्णयन की शक्ति-(1) प्राधिकरण, धारा 2गख की उपधारा (2), धारा 34ख की उपधारा (4), धारा 40 की उपधारा (3), धारा 41 की उपधारा (2), धारा 42 की उपधारा (4) और उपधारा (5), धारा 42घ की उपधारा (8) और उपधारा (9), धारा 52च और धारा 105ख के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए, ऐसे किसी अधिकारी को, जो संयुक्त निदेशक या समतुल्य अधिकारी की पंक्ति से नीचे का न हो, संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् विहित रीति में जांच करने के लिए, न्यायनिर्णायक अधिकारी के रूप में नियुक्त करेगा ।
(2) प्राधिकरण, इस प्रकार नियुक्त किए गए अधिकारी से जांच रिपोर्ट प्राप्त होने पर, संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् पूर्वोक्त धाराओं में उपबंधित कोई शास्ति अधिरोपित कर सकेगा ।
(3) न्यायनिर्णायक अधिकारी को, कोई जांच करते समय, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से अवगत किसी व्यक्ति को साक्ष्य देने या ऐसा कोई दस्तावेज पेश करने के लिए, जो न्यायनिर्णायक अधिकारी की राय में जांच के लिए उपयोगी हो या उसकी विषय-वस्तु से सुसंगत हो, समन करने और कराने की शक्ति होगी और यदि ऐसी जांच पर, उसका यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट धाराओं में से किसी के उपबंधों का पालन करने में असफल रहा है तो वह ऐसी शास्ति की सिफारिश कर सकेगा, जो उन धाराओं में से किसी के उपबंधों के अनुसार वह ठीक समझे ।
105घ. न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा ध्यान में रखने जाने वाले कारक-धारा 105ग के अधीन शास्ति की मात्रा की सिफारिश करते समय, न्यायनिर्णायक अधिकारी और ऐसी शास्ति अधिरोपित करते समय, प्राधिकरण निम्नलिखित कारकों को सम्यक् रूप से ध्यान में रखेगा, अर्थात्:
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 90 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(क) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप किए गए अननुपातिक अभिलाभ या अनुचित फायदे, जहां कहीं अनुमान्य हों, की रकम,
(ख) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप पालिसीधारियों को हुई हानि की रकम; और
(ग) व्यतिक्रम की पुरावृत्त प्रकृति ।]
1[106. बीमाकर्ता की सम्पत्ति का प्रत्यावर्तन या कतिपय मामलों में प्रतिकर आदिष्ट करने की न्यायालय की शक्ति-(1) यदि नियन्त्रक या धारा 52क के अधीन नियुक्त प्रशासक के आवेदन पर अथवा बीमाकर्ता के या बीमा कम्पनी के किसी पालिसीधारी या किसी सदस्य के अथवा बीमा कम्पनी के समापक के (उस दशा में, जबकि बीमा कम्पनी समापनाधीन हो) आवेदन पर न्यायालय का समाधान हो जाता है कि
(क) किसी बीमाकर्ता ने (जिसके अन्तर्गत, उस दशा में जबकि बीमाकर्ता बीमा कम्पनी है, ऐसा कोई व्यक्ति जिसने उस बीमा कम्पनी के संप्रवर्तन या बनाए जाने में भाग लिया हो, अथवा कोई भूतपूर्व या विद्यमान निदेशक, प्रबन्ध अभिकर्ता, प्रबन्धक, सचिव, या समापक भी है) या बीमाकर्ता के किसी अधिकारी, कर्मचारी या अभिकर्ता ने,
(i) बीमाकर्ता की कोई धनराशि या सम्पत्ति दुरुपयोजित की है या प्रतिधारित की है या वह बीमाकर्ता की किसी धनराशि या सम्पत्ति के लिए दायित्वाधीन या लेखादायी हो गया है; या
(ii) वह बीमाकर्ता के सम्बन्ध में किसी अपकरण या न्यासभंग का दोषी रहा है; या
(ख) किसी व्यक्ति का, भले ही वह बीमाकर्ता के कार्यकलाप से किसी रूप में सम्बन्धित हो या न हो या सम्बन्धित रहा हो या न रहा हो, बीमाकर्ता की किसी धनराशि या सम्पत्ति पर सदोषी कब्जा है अथवा ऐसी किसी धनराशि या सम्पत्ति के अपने कब्जे में होते हुए, उसने उसे सदोष विधारित किया है या बीमाकर्ता के उपयोग से भिन्न किसी उपयोग के लिए संपरिवर्तित कर लिया है; या
(ग) इस अधिनियम के उपबन्धों के किसी उल्लंघन के कारण जीवन बीमा निधि की रकम कम हो गई है,
तो न्यायालय ऐसे किसी भी बीमाकर्ता, निदेशक, प्रबन्ध अभिकर्ता, प्रबन्धक, सचिव या समापक की अथवा, यथास्थिति, उस बीमाकर्ता के किसी ऐसे अधिकारी, कर्मचारी या अभिकर्ता की या ऐसे अन्य व्यक्ति की परीक्षा कर सकेगा तथा उसे इस बात के लिए विवश कर सकेगा कि वह दुरुपयोग, प्रतिधारण, अपकरण या न्यासभंग की बाबत प्रतिकर के रूप में ऐसी धनराशि, जो न्यायालय ठीक समझे, बीमाकर्ता की आस्तियों में अभिदत्त करे या ऐसी धनराशि दे, जो बीमाकर्ता की ऐसी किसी धनराशि या सम्पत्ति की बाबत जिसकी बाबत वह दायित्वाधीन या लेखादायी है, उससे शोध्य पाई गई हो, या, यथास्थिति, बीमाकर्ता की किसी धनराशि या सम्पत्ति या उसका कोई भाग प्रत्यावर्तित करे; और जहां जीवन बीमा निधि की रकम इस अधिनियम के उपबन्धों के किसी उल्लंघन के कारण कम हो गई है वहां न्यायालय की यह शक्ति होगी कि वह उस धनराशि का निर्धारण करे, जितनी उस निधि से कम हो गई है, और ऐसे उल्ल्ंघन के दोषी व्यक्ति को यह आदेश दे कि वह व्यक्ति पूरी धनराशि या उसका कोई भाग प्रतिकर के रूप में उस निधि में अभिदत्त करे तथा पूर्वोक्त मामलों में से किसी में भी न्यायालय की यह शक्ति होगी कि वह यह आदेश दे कि इतनी दर पर और उस समय से उस पर ब्याज दे जो न्यायालय ठीक समझे ।
(2) उपधारा (1) या उपधारा (3) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां यह साबित हो जाता है कि बीमाकर्ता की कोई धनराशि या सम्पत्ति विलुप्त हो गई है या खो गई है वहां न्यायालय उस समय तक यह उपधारणा करेगा कि ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो सुसंगत समय पर ऐसी धनराशि या सम्पत्ति का भारसाधक था या उसकी बाबत व्ययन करने की शक्ति रखता था (चाहे वह निदेशक, प्रबंधक, प्रधान अधिकारी या कोई अन्य अधिकारी हो), ऐसी धनराशि या सम्पत्ति के लिए उपधारा (1) के खण्ड (क) के उपखण्ड (i) के अर्थ में लेखादायी हो गया है, और उस उपधारा के उपबंध तदनुसार लागू होंगे जब तक कि ऐसा व्यक्ति यह साबित नहीं कर देता है कि उस धनराशि या सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन बीमाकर्ता के कारबार के मामूली अनुक्रम में और उस कारबार के प्रयोजन के लिए किया गया है या यह साबित नहीं कर देता है कि ऐसी धनराशि या सम्पत्ति के विलुप्त हो जाने या खो जाने को रोकने के लिए उसने सब युक्तियुक्त कदम उठाए थे या वह ऐसे विलुप्त हो जाने या खो जाने के लिए अन्यथा समाधानप्रद कारण नहीं दे देता ।
- 1955 के अधिनियम सं० 54 की धारा 4 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(3) जहां बीमाकर्ता बीमा कम्पनी है और किसी व्यक्ति द्वारा उपधारा (1) के खण्ड (क), (ख) और (ग) में निर्दिष्ट कार्यों में से कोई कार्य किया गया है वहां जो भी व्यक्ति बीमा कम्पनी का सुसंगत समय पर निदेशक, प्रबन्ध अभिकर्ता, प्रबन्धक, समापक, सचिव या अन्य अधिकारी रहा है, उसके बारे में उस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, उस समय तक यह समझा जाएगा कि वह उस कार्य के लिए उसी रीति से और उसी सीमा तक दायित्वाधीन है जिस तक वह व्यक्ति दायित्वाधीन है जिसने वह कार्य किया है जब तक कि वह यह साबित नहीं कर देता है कि वह कार्य उसकी सहमति या मौनानुकूलता के बिना किया गया है, तथा उसकी ओर से की गई किसी उपेक्षा या लोप के कारण उसका किया जाना सुकर नहीं हुआ है ।
(4) जहां इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति के (जिसे इसमें इसके पश्चात् अपचारी कहा गया है) विरुद्ध कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर न्यायालय का शपथपत्र से या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि
(क) अपचारी के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला सिद्ध कर दिया गया है; और
(ख) ऐसा करना बीमाकर्ता के पालिसीधारियों के या बीमा कम्पनी के सदस्यों के हित की दृष्टि से न्यायसंगत और उचित है,
वहां न्यायालय
(i) बीमाकर्ता की किसी ऐसी सम्पत्ति की कुर्की का निदेश दे सकेगा जो अपचारी के कब्जे में है;
(ii) अपचारी की किसी ऐसी सम्पत्ति की कुर्की का निदेश दे सकेगा जो उसकी है या जिसकी बाबत उपधारा (5) के अर्थ में यह समझा जाता है कि वह उसकी है;
(iii) किसी ऐसी सम्पत्ति की कुर्की का जो अपचारी द्वारा उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही के प्रारम्भ के पूर्ववर्ती दो वर्ष के अन्दर या ऐसी कार्यवाहियों के लम्बित रहने के दौरान अन्तरित की गई है, उस दशा में निदेश दे सकेगा जबकि न्यायालय का शपथपत्र से या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि वह अन्तरण सद्भाव और प्रतिफल के बिना किया गया है ।
(5) उपधारा (4) के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित प्रकार की सम्पत्ति अपचारी की सम्पत्ति समझी जाएगी
(क) किसी व्यक्ति के नाम में विद्यमान कोई सम्पत्ति, जिसकी बाबत इस कारण कि वह व्यक्ति, चाहे तो नातेदारी के जरिए या अन्यथा, अपचारी से सम्बन्धित है, या किन्हीं अन्य सुसंगत परिस्थितियों के कारण यह प्रतीत होता है कि वह अपचारी की है;
(ख) ऐसी प्राइवेट कम्पनी की सम्पत्ति जिसके कार्यकलापों की बाबत अपचारी या तो स्वयं या अपने नामनिर्देशितियों, नातेदारों, भागीदारों या कम्पनी के किन्हीं शेयरों में हितबद्ध व्यक्तियों के जरिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियन्त्रण करने के लिए समर्थ है या वैसा नियंत्रण अपने हाथ में ले लेने का हकदार है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति को अपचारी का नामनिर्देशिती उस दशा में समझा जाएगा जबकि प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उसे अपचारी की ओर से ऐसा कोई अधिकार या शक्ति प्राप्त है या जिससे यह अपेक्षित है कि अपचारी के निदेश के अनुसार या अपचारी के निमित्त वह ऐसे किसी अधिकार या शक्ति का प्रयोग करे जो इस स्वरूप का हो जिससे कम्पनी के कार्यकलापों का नियन्त्रण करने के लिए अपचारी समर्थ हो जाए या ऐसा नियन्त्रण अपने हाथ में ले लेने का वह हकदार हो जाए ।
(6) इस धारा के अधीन कुर्क की गई सम्पत्ति की बाबत कोई दावा या ऐसी कुर्की के प्रति कोई आक्षेप न्यायालय में आवेदन द्वारा किया जाएगा और दावेदार या आक्षेपकर्ता को यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य देना होगा कि वह सम्पत्ति इस धारा के अधीन कुर्क नहीं की जी सकती तथा न्यायालय इस दावे या आक्षेप का अन्वेषण संक्षिप्त रीति से करेगा ।
(7) उपधारा (1) के अधीन आवेदन का निपटारा करते समय न्यायालय उन सब व्यक्तियों को, जो उसे इस धारा के अधीन कुर्क की गई किसी सम्पत्ति में हितबद्ध प्रतीत होते हों, सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ऐसा आदेश, जो वह ठीक समझे, किसी ऐसी सम्पत्ति का व्ययन इस प्रयोजन से करने की बाबत देगा कि इस धारा के अधीन कोई दायित्व प्रभावकारी रूप से लागू किया जा सके और ऐसे सभी व्यक्ति इस धारा के अधीन कार्यवाही में पक्षकार समझे जाएंगे ।
(8) न्यायालय को इस धारा के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों में उत्पन्न सभी प्रकार के प्रश्नों का और विशिष्टतया ऐसे प्रश्न का, जो इस धारा के अधीन कुर्क की गई किसी सम्पत्ति से संबंधित हो, विनिश्चय करने की पूरी शक्ति और अनन्य अधिकारिता प्राप्त होगी तथा किसी अन्य न्यायालय को किसी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही में ऐसे किसी प्रश्न का विनिश्चय करने की अधिकारिता नहीं होगी ।
(9) उपधारा (5) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट किसी प्राइवेट कम्पनी की सम्पत्ति के व्ययन की बाबत कोई आदेश देते समय न्यायालय अपचारी तथा उस खण्ड में निर्दिष्ट व्यक्तियों से भिन्न ऐसे सभी व्यक्तियों के हित का सम्यक् ध्यान रखेगा जो उस सम्पत्ति में हितबद्ध हों ।
(10) यह धारा इस बात के होते हुए भी लागू होगी कि वह कार्य ऐसा है जिसके लिए संपृक्त व्यक्ति आपराधिक दायित्व के भी अधीन हो सकता है ।
(11) इस धारा के अधीन कार्यवाही में न्यायालय की वे सब शक्तियां होंगी जो इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) की धारा 237 के अधीन न्यायालय की होती है ।
(12) यह धारा भाग 3 में यथा परिभाषित क्षेमदा सोसाइटी के बारे में उसी प्रकार लागू होगी जिस प्रकार वह बीमाकर्ता के बारे में लागू होती है ।
(13) बीमा (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 1955 (1955 का 54) के प्रारम्भ की तारीख से ही इस धारा के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने का हकदार न्यायालय वह उच्च न्यायालय होगा जिसकी अधिकारिता के अन्दर बीमाकर्ता का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है (जिसे इसमें इसके पश्चात् उच्च न्यायालय कहा गया है) और उच्च न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय में ऐसे प्रारम्भ पर इस धारा के अधीन लम्बित कार्यवाही ऐसे प्रारम्भ की तारीख को उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएगी ।
(14) उच्च न्यायालय निम्नलिखित का उपबन्ध करने के लिए नियम बना सकेगा
(क) वह रीति जिससे इस धारा के अधीन जांच और कार्यवाहियां की जा सकेंगी;
(ख) कोई अन्य बात जिसके लिए उपबन्ध उच्च न्यायालय को इस धारा के अधीन अपनी अधिकारिता का प्रभावी रूप में प्रयोग करने में समर्थ बनाने के लिए किया जाना हो ।]
1[106क. नियंत्रक को सूचना और उसकी सुनवाई-(1) जब न्यायालय में कोई आवेदन ऐसा आदेश किए जाने के लिए किया जाता है जिसे यह धारा लागू होती है, तब न्यायालय उस दशा को छोड़कर जिसमें कि 2[नियंत्रक] ने स्वयं आवेदन किया हो या नियंत्रक को उसका पक्षकार बना लिया गया हो, 2[नियंत्रक] को उस आवेदन की प्रति उसकी सुनवाई के लिए नियत तारीख की सूचना सहित भेजेगा और उसे सुनवाई का अवसर देगा ।
(2) जिन आदेशों को यह धारा लागू होती है वे निम्नलिखित हैं, अर्थात्:
3। । । ।
(ग) जीवन बीमा कारबार के अन्तरण या समामेलन के लिए किसी ठहराव को मंजूरी देने वाला धारा 36 के अधीन कोई आदेश या उसके परिणामस्वरूप कोई आदेश;
(घ) बीमा कम्पनी 3॥। के परिसमापन का आदेश;
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 14 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 91 द्वारा लोप किया गया ।
(ङ) बीमा कम्पनी के भागतः समापन की स्कीम की पुष्टि करने के लिए धारा 58 के अधीन आदेश;
3। । । ।
1। । । ।
108. अवमुक्ति देने की न्यायालय की शक्ति-यदि किन्हीं सिविल या दाण्डिक-कार्यवाहियों में उस न्यायालय को, जो मामले की सुनवाई कर रहा है, यह प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति उपेक्षा, व्यतिक्रम, कर्तव्य भंग या न्यासभंग की बाबत दायी है या हो सकता है, किन्तु उसने ईमानदारी से और युक्तियुक्त रूप से कार्य किया है तथा मामले की सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह उचित होगा कि उस उपेक्षा, व्यतिक्रम, कर्तव्य भंग या न्यास भंग के लिए उसे क्षमा कर दिया जाए तो न्यायालय उस दायित्व से उसे ऐसे निबन्धनों पर, जो वह ठीक समझे, या तो पूर्णतः या भागतः अवमुक्त कर सकेगा ।
2[109. अपराध का संज्ञान-कोई भी न्यायालय, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या किन्हीं विनियमों के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, प्राधिकरण के किसी अधिकारी या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।]
3[110. प्रतिभूति अपील प्राधिकरण को अपील-(1) कोई व्यक्ति, जो
(क) बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ पर और उसके पश्चात् या इस अधिनियम, उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन प्राधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश से, या
(ख) इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णयन के रूप में प्राधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश से,
व्यथित है, उस मामले पर अधिकारिता रखने वाले प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन की गई प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको प्राधिकरण द्वारा किए गए आदेश की प्रति उसके द्वारा प्राप्त की जाती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए:
परंतु यदि प्रतिभूति अपील अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि अपील को पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण था तो वह उसे उस अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील की प्राप्ति पर, प्रतिभूति अपील अधिकरण अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस आदेश को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपांतरित या अपास्त करते हुए, उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(4) प्रतिभूति अपील अधिकरण, उसके द्वारा किए गए आदेश की प्रति, प्राधिकरण और पक्षकारों को उपलब्ध कराएगा ।
(5) उपधारा (1) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रतापूर्वक कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा अपील की प्राप्ति की तारीख से छह मास के भीतर अपील का अंतिम रूप से निपटारा किए जाने का प्रयास किया जाएगा ।
(6) किसी अपील को फाइल करने और निपटारा करने की प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए ।
(7) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 15प, धारा 15फ, धारा 15ब, धारा 15म और धारा 15य में अंतर्विष्ट उपबंध इस अधिनियम के उपबंधों से उद्भूत होने वाली अपीलों को ऐसे लागू होंगे, जैसे वे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन की अपीलों को लागू होते हैं ।]
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 92 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 93 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 94 द्वारा प्रतिस्थापित ।
1[110क. नियंत्रक की शक्तियों और कर्तव्यों का प्रत्यायोजन- 2[प्राधिकरण का अध्यक्ष] इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों या कर्तव्यों में से किसी का भी प्रत्यायोजन अपने अधीनस्थ किसी व्यक्ति को साधारण या विशेष आदेश द्वारा कर सकेगा । ऐसी प्रत्यायोजित शक्तियों या कर्तव्यों में से किसी का भी प्रयोग या निर्वहन ऐसे निर्बन्धनों, सीमाओं और शर्तों के अधीन, यदि कोई हों, किया जाएगा जो 4[प्राधिकरण का अध्यक्ष] अधिरोपित करे, तथा वह उसके नियंत्रण और पुनरीक्षण के अधीन रहेगा ।
110ख. दस्तावेजों पर हस्ताक्षर-यदि किसी दस्तावेज की बाबत इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा यह अपेक्षित है कि उस पर 4[प्राधिकरण के अध्यक्षट द्वारा या उसके अधीनस्थ किसी व्यक्ति द्वारा या धारा 42 की उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाएं तो उसकी बाबत यह बात कि वह समुचित रूप से हस्ताक्षरित है, उस दशा में समझी जाएगी जबकि उस पर ऐसे 4[प्राधिकरण के अध्यक्ष], व्यक्ति या अधिकारी के अनुकृत हस्ताक्षर, मुद्रित, उत्कीर्ण, शिलामुद्रित अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी अन्य यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा छपे हों ।]
3[110ग. जानकारी मांगने की शक्ति-4[प्राधिकरण का अध्यक्ष] किसी भी बीमाकर्ता से लिखित सूचना द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह बीमाकर्ता अपने बीमा कारबार से संबंधित कोई जानकारी नियंत्रक को दे और बीमाकर्ता ऐसी अध्यपेक्षा का अनुपालन उस सूचना की प्राप्ति के पश्चात् इतनी अवधि के अन्दर करेगा जो उसमें विनिर्दिष्ट हो ।
(2) इस धारा के अधीन दी गई प्रत्येक जानकारी बीमाकर्ता के प्रधान अधिकारी द्वारा, और यदि सूचना में अपेक्षा की गई हो तो लेखापरीक्षक द्वारा भी, प्रमाणित की जाएगी ।]
4[110घ. प्रतिकर के लिए कुछ दावों का वर्जन-किसी भी व्यक्ति को धारा 34 या धारा 34क या धारा 34ङ या धारा 37क के उपबन्धों में से किन्हीं के प्रवर्तन के कारण या इस अधिनियम के अधीन बीमाकर्ता को दिए गए किसी आदेश या निदेश के अनुपालन के कारण हुई किसी हानि के लिए संविदा के आधार पर या अन्यथा प्रतिकर का कोई अधिकार नहीं होगा ।
5। । । । ।
110च. राज्य सरकारों आदि को लागू होने वाले उपबन्ध-धारा 3, 3क, 27ख, 28ख, 33, 34, धारा 34ङ का खंड (क), 34च, 40क, 40ग, 44क, 64प से लेकर 64पड तक (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं हैं), 64फ, 64फक, 64फख, 64फग तथा 101क, 101ग, 110घ, 110छ तथा 110ज के उपबन्ध, धारा 118 के अधीन मंजूर की गई किसी छूट के होते हुए भी, यथाशक्य उस साधारण बीमा कारबार को और उसके संबंध में भी लागू होंगे जो राज्य सरकार द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कम्पनी द्वारा किया जाता है ।
6। । । । ।
7[110जक. शास्ति का भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूलीय होना-प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित कोई शास्ति, भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूलीय होगी ।]
111. सूचनाओं की तामील-(1) बीमाकर्ता 8॥। पर जिस आदेशिका या सूचना की तामील की जानी अपेक्षित है उसकी तामील उस दशा में पर्याप्त रूप से की गई मानी जाएगी जबकि वह किसी ऐसे व्यक्ति को संबोधित है जिसकी बाबत 9[नियंत्रक] के रजिस्टर में यह दर्ज है कि वह ऐसा व्यक्ति है जो बीमाकर्ता 5॥। की ओर से सूचनाएं स्वीकार करने के लिए प्राधिकृत है और वह 6[नियंत्रक] के रजिस्टर में दर्ज व्यक्ति के पते पर छोड़ दी गई है या रजिस्ट्रीकृत डाक से भेज दी गई है ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 15 द्वारा धारा 110क और धारा 110ख अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 59 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 37 द्वारा (1-6-1969 से) अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 95 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 96 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 97 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 98 द्वारा लोप किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) ऐसी कोई सूचना या अन्य दस्तावेज, जिसकी बाबत इस अधिनियम द्वारा यह अपेक्षित है कि वह पालिसीधारी को भेजी जाए, उस व्यक्ति को संबोधित की जा सकेगी और भेजी जा सकेगी जिसे ऐसी पालिसी से संबंधित सूचनाएं प्रायः भेजी जाती हैं तथा ऐसे सम्बोधित और भेजी गई सूचना ऐसे पालिसीधारी को दी गई सूचना समझी जाएगी:
परन्तु जहां अन्तरिती समनुदेशिती या नामनिर्देशिती के रूप में किसी पालिसी में हितबद्ध होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति ने बीमाकर्ता 5॥। को अपने उस हित की लिखित सूचना दे दी है वहां जिस सूचना की बाबत इस अधिनियम द्वारा यह अपेक्षित है कि वह पालिसीधारियों को भेजी जाए, वह सूचना ऐसे व्यक्ति को भी उस पते पर भेजी जाएगी जो उसने अपनी सूचना में दिया हो ।
112. अंतरिम बोनसों की घोषणा-इस अधिनियम में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, कोई बीमाकर्ता, जो जीवन बीमा कारबार कर रहा है, उन पालिसीधारियों को, जिनकी पालिसियां अंतः मूल्यांकन अवधि के दौरान मृत्यु के कारण या अन्यथा संदाय के लिए परिपक्व हो गई हैं, अंतरिम बोनस या बोनसों की घोषणा अन्वेषक बीमांकक की उस सिफारिश पर, जो अन्तिम पूर्ववर्ती मूल्यांकन पर की गई थी, करने के लिए स्वतंत्र होगा ।
1[113. पालिसी द्वारा अभ्यर्पण मूल्य का अर्जन-(1) जीवन बीमा की कोई पालिसी, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट सन्नियमों के अनुसार अभ्यर्पण मूल्य अर्जित करेगी ।
(2) जीवन बीमा की प्रत्येक पालिसी में पालिसी के गारंटीशुदा अभ्यर्पण मूल्य की संगणना के लिए प्राधिकरण द्वारा यथा अनुमोदित सूत्र अंतर्विष्ट होगा ।
(3) किसी प्रतिकूल संविदा के होते हुए भी, असंबद्ध योजना के अधीन जीवन बीमा की ऐसी पालिसी, जिसने अभ्यर्पण मूल्य अर्जित कर लिया है, आगे के प्रीमियमों के असंदाय के कारण व्यपगत नहीं होगी, बल्कि उसे प्राधिकरण द्वारा यथा अनुमोदित और पालिसी में अंतर्विष्ट सूत्र के माध्यम से परिकलित बीमाकृत समादत्त राशि की सीमा तक और उत्तरभोगी बोनस, जो पालिसी से पहले ही संलग्न है, तक प्रवृत्त रखा जाएगा:
परंतु असंबद्ध योजना के अधीन जीवन बीमा की पालिसी को, उस रीति से प्रवृत्त रखा जाएगा, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(4) उपधारा (3) के उपबंध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे,
(i) जहां किसी पालिसी द्वारा बीमाकृत समादत्त राशि, संलग्न बोनसों सहित, प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट रकम से कम है या प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट रकम से कम रकम की वार्षिकी का रूप ले लेती है; या
(ii) जब पक्षकार प्रीमियम के संदाय में व्यतिक्रम होने के पश्चात् लिखित में अन्य ठहराव करने के लिए सहमत हो जाते हैं ।]
114. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए, नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे
2। । । । ।
3। । । । ।
4[(ककक) धारा 2 के खंड (7क) के उपखंड (ख) के अधीन भारतीय बीमा कंपनी के स्वामित्व और नियंत्रण की रीति;]
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 99 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 16 द्वारा (23-9-2002 से) लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 100 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 100 द्वारा अंतःस्थापित ।
1[(ख) वह रीति जिससे यह अवधारित किया जाएगा कि बीमाकर्ता के किन संव्यवहारों को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए 2॥। 3[भारत] 4॥। में किया गया बीमा कारबार माना जाएगा;
2। । । । ।
(घ) धारा 16 की उपधारा (2) के खण्ड (घ) में निर्दिष्ट प्ररूप;
(ङ) वह रीति जिससे वे विवरण, पत्रिकाएं और सारणियां जो धारा 41 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट हैं प्रकाशित की जाएंगी और वह प्ररूप जिसमें वे तैयार की जाएंगी;
5। । । । ।
(ज) धारा 65 6[की उपधारा (2)] के खण्ड (क) से लेकर खण्ड (च) तक में विनिर्दिष्ट आकस्मिकताओं से भिन्न अनिश्चित आकस्मिकताएं, जिनके घटित होने पर धनराशि क्षेमदा सोसाइटियों द्वारा दी जा सकेगी;
(झ) धारा 74 की उपधारा (1) के खण्ड (क) से (ग) तक में विनिर्दिष्ट बातों से भिन्न बातें जिनके लिए क्षेमदा सोसाइटी नियम बनाएगी;
(ञ) भाग 3 द्वारा अपेक्षित लेखा, विवरणी या रजिस्टर का प्ररूप और वह रीति, जिससे ऐसा लेखा, विवरणी या रजिस्टर सत्यापित किया जाएगा;
(ट) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उनके अधीन देय फीसें तथा वह राशि जिससे वे संगृहीत की जाती हैं; 7॥।
(ठ) वे शर्तें और बातें जो धारा 92 की उपधारा (5), 8[(6)], (10) और (12) के अधीन विहित की जा सकेंगी;
3[(ठक) धारा 105ग की उपधारा (1) के अधीन जांच की रीति;
(ठख) वह प्ररूप, जिसमें धारा 110 की उपधारा (2) के अधीन अपील की जा सकेगी और ऐसी अपील की बाबत संदेय फीस और उसकी उपधारा (6) के अधीन किसी अपील को फाइल करने और उसके निपटारे की प्रक्रिया;]
9। । । । ।
10[(ड) कोई अन्य बात जो विहित की जानी है या की जाए ।]
11। । । । ।
12[(3) इस धारा के अधीन या धारा 34ज की उपधारा (10) के अधीन [बनाया गया प्रत्येक नियमट तथा इस भाग के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 62 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा भारत में या शब्दों का लोप किया गया ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 द्वारा यथास्थिति शब्द का लोप किया गया ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 16 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 16 द्वारा और शब्द का लोप किया गया ।
- 1939 के अधिनियम सं० 11 की धारा 32 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 16 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 16 द्वारा परन्तुक का लोप किया गया ।
- 1983 के अधिनियम सं० 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-3-1984 से) उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 100 द्वारा प्रतिस्थापित ।
परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
1[(4)] स्थानीय सरकार द्वारा क्षेमदा बीमा सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 5) की धारा 24 के उपबंधों के अधीन बनाए गए और इस अधिनियम के प्रारम्भ पर प्रवृत्त सब नियम, जहां तक वे भाग 3 के उपबंधों से असंगत नहीं हैं, तब तक प्रवृत्त बने रहेंगे जब तक कि इस धारा के अधीन बनाए गए नियमों से वे प्रतिस्थापित न करा दिए जाएं और वे ऐसे प्रभावी होंगे मानो वे इस धारा के अधीन सम्यक् रूप से बनाए गए हों ।]
2[114क. विनियम बनाने की प्राधिकरण की शक्ति-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए ऐसे विनियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से सुसंगत हों ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्:
3[(क) धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने की रीति और उसके साथ संलग्न किए जाने वाले दस्तावेज;]
(ख) धारा 3 की उपधारा (5ङ) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण की रीति;
(ग) धारा 3 की उपधारा (7) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति जारी किए जाने के लिए पांच हजार रुपए से अनधिक की ऐसी फीस जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए;
7[(घ) धारा 3क की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण की वार्षिक फीस और उसके संदाय की रीति;]
4[(घक) ऐसी न्यूनतम वार्षिकी और अन्य फायदे, जो धारा 4 के अधीन बीमाकर्ता द्वारा प्रतिभूत किए जाएंगे;
(घकक) ऐसे प्रारंभिक व्ययों का अवधारण, जिन्हें धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन बीमाकर्ताओं के लिए नियत समादत्त साधारण पूंजी की गणना करने के लिए अपवर्जित किया जा सकेगा;
(घख) धारा 6क की उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित ऐसी साधारण पूंजी और ऐसे रूप की पूंजी जिसके अंतर्गत मिश्र-पूंजी भी है;]
5। । । । ।
8[(ङक) धारा 10 की उपधारा (1) और उपधारा (2कक) के अधीन यथा अपेक्षित बीमा कारबार के प्रत्येक वर्ग और उपवर्गों की बाबत सभी प्राप्तियों और संदायों के खाते का पृथक्करण; और उक्त धारा के अधीन उसका अधित्यजन;]
(च) 7[धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन तुलन-पत्र, लाभ-हानि लेखा और प्राप्तियों तथा संदायों का पृथक् लेखा और आय लेखा तैयार करना;]
7[(छ) वह रीति, जिसमें बीमांकक की रिपोर्ट का उद्धरण विनिर्दिष्ट किया जाएगा और वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 13 में निर्दिष्ट विवरण संलग्न किया जाएगा;]
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 16 द्वारा मूल उपधारा (3), उपधारा (4) के रूप में पुनर्संख्यांकित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा लोप किया गया ।
8[(छक) धारा 14 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन पालिसियों और दावों के अभिलेखों का बनाए रखा जाना;
(छख) धारा 14 की उपधारा (2) के अधीन पालिसियों को इलेक्ट्रानिक रूप में निर्गमित किए जाने की रीति और प्ररूप;]
1[(ज) धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन विवरणी या उसके किसी भाग की प्रति उपाप्त करने के लिए फीस;]
1[(झ) आस्तियों का विनिधान और धारा 27, धारा 27क, धारा 27ख, धारा 27ग के अधीन कतिपय मामलों में किसी बीमाकर्ता द्वारा विनिधानों और बीमाकर्ताओं द्वारा विनिधान के संबंध में और उपबंध तथा धारा 27घ के अधीन आस्तियों के विनिधान का समय, उसकी रीति और अन्य शर्तें;]
1[(झक) वह प्ररूप जिसमें किए गए विनिधानों, वह समय और रीति, जिसके अंतर्गत धारा 28 के अधीन उसका अधिप्रमाणन भी है, का ब्यौरा देते हुए विवरणी फाइल की जाएगी;
(झख) ऋण, जिसके अंतर्गत धारा 29 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन बीमाकर्ता द्वारा पूर्णकालिक कर्मचारियों को मंजूर किए गए ऋण भी हैं;
(झग) धारा 31ख के अधीन बीमाकर्ता द्वारा किसी व्यक्ति को संदाय की जाने वाली धनराशि;
(झघ) धारा 32ख और धारा 32ग के अधीन ग्रामीण या सामाजिक या असंगठित सेक्टर और पिछड़े वर्गों की बाबत बीमाकर्ता का दायित्व;
(झङ) धारा 32घ के अधीन मोटर यानों के अन्य पक्षकार के जोखिम में बीमा कारबार की न्यूनतम प्रतिशतता;]
1[(ञ) यथास्थिति, बीमाकर्ताओं या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती द्वारा अपनी पुस्तकों में रखी जाने वाली न्यूनतम जानकारी, वह रीति जिसमें ऐसी जानकारी रखी जाएगी, उस संबंध में जांच तथा अन्य सत्यापन और धारा 33 की उपधारा
(7) के अधीन उसके आनुषंगिक सभी अन्य विषय;]
2[(ञक) धारा 35 की उपधारा (3) के खंड (ख) और खंड (ग) के अधीन वह प्ररूप जिसमें संबंधित प्रत्येक बीमाकर्ता के बीमा कारबार की बाबत तुलनपत्र और वह रीति, जिसमें जीवन बीमा कारबार की बाबत बीमांकिक रिपोर्टें और उद्धरण तैयार किए जाएंगे;
(ञख) धारा 37क की उपधारा (4क) के परंतुक के अधीन प्रतिकर के निर्धारण की रीति;
(ञग) धारा 39 की उपधारा (3) के अधीन बीमाकर्ता द्वारा प्रभारित की जाने वाली फीस;
(ञघ) धारा 40 के अधीन किसी बीमा अभिकर्ता या मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को कमीशन के रूप में या अन्यथा पारिश्रमिक या इनाम संदत्त करने या प्राप्त करने की रीति और उनकी रकम;
(ञङ) धारा 40ख और धारा 40ग के अधीन प्रबंध के व्ययों की रीति और प्ररूप;]
3। । । । ।
1[(ड) धारा 42 की उपधारा (3) के खंड (ङ) के अधीन बीमा अभिकर्ता के रूप में नियुक्ति के लिए अपेक्षित अर्हताएं या व्यावहारिक प्रशिक्षण अथवा उत्तीर्ण की जाने वाली परीक्षा;]
3। । । । ।
1[(ण) धारा 42 की उपधारा (3) के खंड (ज) के अधीन आचार संहिता;]
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा लोप किया गया ।
3। । । । ।
(थ) धारा 42घ की उपधारा (1) के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को अनुज्ञप्ति देने की रीति और फीस;
(द) वह फीस और अतिरिक्त फीस जो धारा 42घ की उपधारा (3) के अधीन मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों की अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए अवधारित की जाएगी;
(ध) धारा 42घ की उपधारा (5) के खंड (ङ) के अधीन मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों के लिए अपेक्षित अर्हताएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण;
(न) धारा 42घ की उपधारा (5) के खंड (च) के अधीन मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों के रूप में कार्य करने के लिए उत्तीर्ण की जाने वाली परीक्षा;
(प) धारा 42घ की उपधारा (5) के खंड (छ) के अधीन आचार संहिता;
(फ) धारा 42घ की उपधारा (7) के अधीन अनुज्ञप्ति की दूसरी प्रति जारी करने के लिए फीस;
1। । । । ।
(फख) धारा 42ङ 1॥। के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने के लिए पूंजी कारबार के रूप और अन्य शर्तों की अपेक्षाएं;
(फग) प्राधिकरण द्वारा धारा 49 की उपधारा (1) के अधीन यथा विनिर्दिष्ट तुलनपत्र का प्ररूप ।]
1। । । । ।
2[(भ) धारा 64पड की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन सर्वेक्षकों और हानि निर्धारकों के लिए शैक्षिक अर्हताएं और आचार संहिता;
(भक) वह अवधि जिसके लिए कोई व्यक्ति धारा 64पड की उपधारा (3) के अधीन सर्वेक्षक और हानि निर्धारक के रूप में कार्य कर सकेगा;]
2[(म) धारा 64फ की उपधारा (1) के अधीन कतिपय आस्तियों के अपवर्जन की रीति, उपधारा (2) के अधीन दायित्वों के मूल्यांकन की रीति और उपधारा (3) के अधीन विवरण प्रस्तुत करने के लिए समय;]
(य) धारा 64फ की उपधारा (3) के अधीन आस्तियों और दायित्वों का मूल्यांकन;
2[(यक) आस्तियों की पर्याप्तता से संबंधित धारा 64फक की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट विषय;]
3[(यकख) धारा 64फक की उपधारा (9) के अधीन शोधन क्षमता के मार्जिन के ब्यौरे देने वाली विवरणी का प्ररूप, समय, रीति, जिसके अंतर्गत उसका अधिप्रमाणन भी है;
(यकग) धारा 64फग के अधीन कारबार के स्थान खोलने और बंद करने की रीति;]
(यख) धारा 101क और धारा 101ख के अधीन पुनर्बीमा से संबंधित विषय;
4[(यख) धारा 64फख की उपधारा (6) के अधीन विनिर्दिष्ट की जाने वाली प्रीमियम की प्राप्ति की रीति;]
3[(यखक) धारा 113 की उपधारा (1) के अधीन जीवन बीमा पालिसी के अभ्यर्पण मूल्य के सन्नियम;]
(यग) पालिसीधारकों के हितों का संरक्षण करने के लिए शिकायतों को दूर करने और बीमा उद्योग का विनियमन, संप्रवर्तन करने तथा उसके सुव्यवस्थित विकास को सुनिश्चित करने से संबंधित विषय;
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 101 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 17 द्वारा (23-9-2002 से) अंतःस्थापित ।
(यघ) कोई अन्य विषय जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना है या किया जाए या जिसकी बाबत विनियमों द्वारा उपबंध किए जाने हैं या किए जाएं ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में या दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
115. प्ररूपों में परिवर्तन- 1[प्राधिकरण] ऐसे बीमाकर्ता के, जो कम्पनी नहीं है, आवेदन पर या उसकी सहमति से उन प्ररूपों को, जो अनुसूचियों में दिए गए है, उस बीमाकर्ता की बाबत इस प्रयोजन से परिवर्तित कर सकेगी कि वे उस बीमाकर्ता की परिस्थितियों के अनुकूल हो जाएं:
परन्तु इस धारा के अधीन की गई किसी बात से बीमाकर्ता को इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित सभी जानकारी देने से वहां तक छूट नहीं मिलेगी जहां तक कि उसके लिए ऐसा करना सम्भव है ।
116. कतिपय अपेक्षाओं से छूट देने की शक्ति- 2[(1)] केन्द्रीय सरकार 3[भारत] के बाहर 4[किसी देश या राज्य] में गठित, निगमित या अधिवसित किसी बीमाकर्ता को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा 5[इस अधिनियम के उपबंधों में से ऐसे किसी भी उपबंध से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए,] पूर्णतः या ऐसी शर्तों पर या ऐसे उपान्तरों के अधीन छूट दे सकेगी जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
6। । । । ।
7[(2) यह धारा भाग 3 में यथापरिभाषित क्षेमदा सोसाइटी के बारे में उसी प्रकार लागू होगी जिस प्रकार वह बीमाकर्ता के बारे में लागू होती है ।]
8[116क. विवरणियों के संक्षेप का प्रकाशित किया जाना- 9[बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के प्रारंभ की तारीख से पूर्व केन्द्रीय सरकारट प्रत्येक वर्ष ऐसी रीति से, जो वह निर्दिष्ट करे, इस अधिनियम के अधीन या इस अधिनियम के अधीन तात्पर्यित उन लेखाओं, तुलनपत्रों, विवरणों, संक्षिप्तियों और अन्य विवरणियों का संक्षेप प्रकाशित कराएगी, जो प्रकाशन के वर्ष से पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान, 10[नियंत्रक] को इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में दी गई हैं, तथा वह ऐसे संक्षेप के साथ 5[नियंत्रक] का या 4[बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ की तारीख से पूर्व केन्द्रीय सरकारट का कोई टिप्पण और कोई पत्राचार जोड़ सकेगी :
परन्तु इस धारा की किसी बात से यह अपेक्षित न होगा कि 11[धारा 10 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट विवरणट या धारा 28 की उपधारा (1) 1[या 2[धारा 28क या धारा 28ख] में निर्दिष्ट विवरणियों या धारा 31ख की उपधारा (2) में या धारा 40ख में निर्दिष्ट विवरणों का प्रकाशन किया जाए] ।]
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 63 द्वारा धारा 116 उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनर्संख्यांकित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 60 द्वारा (1-6-1950 से) किसी भाग क राज्य के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं० 20 की धारा 17 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 60 द्वारा (1-6-1950 से) परन्तुक का लोप किया गया ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 63 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 64 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1999 के अधिनियम सं० 41 की धारा 30 और पहली अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1946 के अधिनियम सं० 6 की धारा 47 द्वारा कथनञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
117. इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 के उपबंधों की व्यावृत्ति-इस धारा की किसी बात से उस बीमाकर्ता के, जो कम्पनी है, 3[या भाग 3 में यथापरिभाषित उस क्षेमदा सोसाइटी के, जो कम्पनी है,] इस दायित्व पर प्रभाव नहीं पड़ेगा कि जिन बातों के लिए इस अधिनियम द्वारा अन्यथा विनिर्दिष्ट उपबंध नहीं किया गया है उनकी बाबत वह इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) के उपबंधों का अनुपालन करे ।
4[118. छूट-इस अधिनियम की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी,
(क) भारतीय व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी व्यवसाय संघ को, या
(ख) ऐसी किसी भविष्य निधि को, जिस पर भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध लागू हैं; या
(ग) उस दशा में जबकि केन्द्रीय सरकार किसी मामले में ऐसा आदेश दे तथा उस विस्तार तक या उन शर्तों या उपान्तरों के अधीन रहते हुए, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट हों, ऐसे किसी बीमा कारबार को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा या राज्य सरकार द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कम्पनी द्वारा किया जा रहा है; या
(घ) उस दशा में जबकि नियंत्रक किसी मामले में ऐसा आदेश दे और उस विस्तार तक या ऐसी शर्तों या उपान्तरों के अधीन रहते हुए जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट हों
(i) इंडियन इन्कम टैक्स ऐक्ट, 1922 (1922 का 11) की धारा 58एन के खंड (ए) में यथा परिभाषित अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि को; या
(ii) 27 जनवरी, 1937 के पूर्व विद्यमान और केन्द्रीय सरकार द्वारा शासकीय रूप से मान्य ऐसी किसी निधि को, जो निधि में अभिदाय करने वालों और उनके आश्रितों के पारस्परिक फायदे के लिए सरकारी सेवकों या सरकारी पेंशनधारियों के द्वारा या निमित्त कायम रखी जाती है; या
(iii) केवल सरकारी सेवकों या रेल सेवकों से मिलकर बनी किसी पारस्परिक या क्षेमदा बीमा सोसाइटी को, जिसे क्षेमदा बीमा सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 5) के सब उपबन्धों या उनमें से किसी से छूट मिली हुई है ।]
5[119. प्रकाशित विवरण पत्रिका आदि का निरीक्षण और उसकी प्रतियों का दिया जाना-कोई भी व्यक्ति धारा 3 की उपधारा (2) के खण्ड (च) के अधीन बीमाकर्ता द्वारा 6[नियंत्रक] के यहां फाइल किए गए दस्तावेजों का निरीक्षण पांच रुपए फीस का संदाय करके कर सकेगा और किसी ऐसी दस्तावेज या उसके किसी भाग की प्रति, ऐसी प्रति तैयार करने के लिए विहित दर पर अग्रिम संदाय करके, अभिप्राप्त कर सकेगा ।]
120. इस अधिनियम के अधीन निक्षिप्त प्रतिभूतियों के बाजार मूल्य का अवधारण-इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के अनुसरण में भारतीय रिजर्व बैंक में निक्षिप्त प्रतिभूतियों का निक्षेप की तारीख पर बाजार मूल्य भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अवधारित किया जाएगा और उसका उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा ।
121. [1882 के अधिनियम संख्या 4 की धारा 130 का संशोधन ।]- [निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित] ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 61 द्वारा (1-6-1950 से) अंतःस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं० 62 की धारा 38 द्वारा (1-6-1969 से) धारा 28क, के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 65 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 35 की धारा 5 द्वारा (1-9-1957 से) पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1941 के अधिनियम सं० 13 की धारा 67 द्वारा पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 4 द्वारा (1-6-1950 से) बीमा अधीक्षक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
122. [1908 के अधिनियम संख्या 9 की अनुसूची 1 का संशोधन ।]-[निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित] ।
123. [निरसन ।]- [निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित] ।
1। । । । ।
2। । । । ।
3[सातवीं अनसुसूची]
(धारा 55 देखिए)
दिवालियापन या समापन में बीमाकर्ता के दायित्वों के मूल्यांकन सम्बन्धी नियम
वार्षिकी कारबार सहित जीवन बीमा कारबार के अनुक्रम में की गई चालू संविदाओं की बाबत बीमाकर्ता के दायित्वों को उस रीति से तथा उस आधार पर संगणित किया जाएगा जिसका अवधारण न्यायालय द्वारा अनुमोदित बीमांकक द्वारा किया गया हो और ऐसा अनुमोदित बीमांकक पूर्वोक्त जैसा अवधारण करने में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेगा
(क) किए जाने वाले मूल्यांकन का प्रयोजन;
(ख) ब्याज की दर और मृत्यु तथा रुग्ण्ता की दर जो मूल्यांकन में काम में लाई जानी है; और
(ग) ऐसे कोई विशेष निदेश जो न्यायालय द्वारा दिए जाएं ।
जीवन पालिसियों से भिन्न चालू पालिसियों की बाबत बीमाकर्ता का दायित्व अन्तिम दिए गए प्रीमियम का ऐसा भाग होगा जो पालिसी के उस अनवसित भाग के अनुपाती है जिसकी बाबत वह प्रीमियम दिया गया था ।
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- 2002 के अधिनियम सं० 42 की धारा 18 द्वारा (23-9-2002 से) पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी अनुसूची का लोप किया गया ।
- 2015 के अधिनियम सं० 5 की धारा 102 द्वारा लोप किया गया ।
- 1950 के अधिनियम सं० 47 की धारा 65 द्वारा (1-19-1950 से) मूल छठी अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

