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विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974 ( Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Activities Act, 1974 )


 

विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974

(1974 का अधिनियम संख्यांक 52)

[13 दिसम्बर, 1974]

विदेशी मुद्रा के संरक्षण एवं संवर्धन और तस्करी निवारण

के प्रयोजनों के लिए कुछ मामलों में निवारक

निरोध और उससे संबद्ध विषयों का

उपबंध करने के लिए

अधिनियम

विदेशी मुद्रा विनियमों के अतिक्रमण और तस्करी का राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर अधिकाधिक हानिकर प्रभाव पड़ रहा है और इसके द्वारा राज्य की सुरक्षा पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है ;

और उन लोगों को और उस रीति को ध्यान में रखते हुए जिनके द्वारा ऐसे क्रियाकलाप या अतिक्रमण चलाए और किए जाते हैं और इस बात को ध्यान में रखते हुए कि कुछ क्षेत्रों में, जो तस्करी के लिए अधिक उपयुक्त हैं, तस्करी क्रियाकलाप बड़े पैमाने पर    चोरी-छिपे चलाए और किए जाते हैं, ऐसे क्रियाकलापों और अतिक्रमणों का ठीक तरह से निवारण करने के लिए उनसे किसी भी प्रकार से संबद्ध व्यक्तियों के निरोध का उपबंध करना आवश्यक है ;

अतः भारत गणराज्य के पच्चीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख  को (जो 20 दिसम्बर, 1974 से बाद की न होगी) प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) समुचित सरकार" से केन्द्रीय सरकार द्वारा या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी द्वारा किए गए निरोध-आदेश के संबंध में या ऐसे आदेश के अधीन निरुद्ध व्यक्ति के संबंध में केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है, तथा राज्य सरकार द्वारा या राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा किए गए निरोध-आदेश के संबंध में या ऐसे आदेश के अधीन निरुद्ध व्यक्ति के संबंध में राज्य सरकार अभिप्रेत है ;

(ख) निरोध-आदेश" से धारा 3 के अधीन किया गया आदेश अभिप्रेत है ;

(ग) विदेशी" का वही अर्थ है जो विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) में है ;

(घ) भारतीय सीमाशुल्क सागर खण्ड" का वही अर्थ है जो सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 2 के खण्ड (28) में है ;

(ङ) तस्करी" का वही अर्थ है जो सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 2 के खण्ड (39) में है और इसके सभी व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ;

(च) संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में राज्य सरकार" से उसका प्रशासक अभिप्रेत है ;

(छ) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति निर्देश से, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, उस राज्य के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि, यदि कोई हो, के प्रति निर्देश है ।

3. कुछ व्यक्तियों को निरुद्ध करने का आदेश करने की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का या राज्य सरकार का या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी का, जो उस सरकार के संयुक्त सचिव से निम्न पंक्ति का नहीं है, और जो इस धारा के प्रयोजनों के लिए उस सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किया गया है, या राज्य सरकार के किसी अधिकारी का, जो उस सरकार के सचिव से निम्न पंक्ति का नहीं है और जो इस धारा के प्रयोजनों के लिए उस सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किया गया है, किसी व्यक्ति के संबंध में (जिसके अन्तर्गत विदेशी भी है) यह समाधान हो जाता है कि उसे विदेशी मुद्रा के संरक्षण या संवर्धन के प्रतिकूल किसी रीति से कार्य करने से निवारित करने की दृष्टि से या उसे,-

(i) माल की तस्करी करने, अथवा

(ii) माल की तस्करी का दुष्प्रेरण करने, अथवा

(iii) तस्करित माल के परिवहन या छिपाने या रखने का काम करने, अथवा

(iv) तस्करित माल के परिवहन या छिपाने या रखने का काम करने से अन्यथा तस्करित माल का व्यवहार करने, अथवा

(v) माल की तस्करी में या माल की तस्करी के दुष्प्रेरण में लगे हुए व्यक्ति को संश्रय देने,

से निवारित करने की दृष्टि से ऐसा करना आवश्यक है तो वह यह निदेश देते हुए आदेश कर सकेगी या कर सकेगा कि ऐसे व्यक्ति को निरुद्ध कर लिया जाए :

                 [परन्तु इस उपधारा में विनिर्दिष्ट किसी भी ऐसे आधार पर निरोध का कोई आदेश नहीं किया जाएगा जिस पर स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 46) की धारा 3 के अधीन या जम्मू-कश्मीर स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अध्यादेश, 1988 (1988 का जम्मू-कश्मीर अध्यादेश सं० 1)  की धारा 3 के अधीन निरोध का आदेश किया जा सकता है ।]

(2) जब निरोध-आदेश राज्य सरकार द्वारा या राज्य सरकार द्वारा सशक्त किसी अधिकारी द्वारा किया जाता है तो राज्य सरकार दस दिन के भीतर, केन्द्रीय सरकार को उस आदेश के संबंध में एक रिपोर्ट भेजेगी ।

(3) संविधान के अनुच्छेद 22 के खण्ड (5) के प्रयोजनों के लिए, निरोध-आदेश के अनुसरण में निरुद्ध व्यक्ति को निरोध के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र उन आधारों की संसूचना दी जाएगी जिन पर आदेश किया गया है किन्तु सामान्यतया यह संसूचना निरोध की तारीख से पांच दिन के भीतर दी जाएगी और आपवादिक परिस्थितियों में और ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, निरोध की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर दी जाएगी ।

4. निरोध-आदेशों का निष्पादन-निरोध-आदेश का निष्पादन भारत में किसी स्थान पर उस रीति से किया जा सकेगा जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में गिरफ्तारी के वारण्टों के निष्पादन के लिए उपबंधित है ।

5. निरोध के स्थान तथा निरोध की शर्तों का विनियमन करने की शक्ति-प्रत्येक व्यक्ति, जिसकी बाबत निरोध-आदेश किया गया है,-

(क) ऐसे स्थान पर और ऐसी शर्तों के अधीन, जिनके अंतर्गत भरण-पोषण, दूसरों के साथ मुलाकात या सम्पर्क, अनुशासन, तथा अनुशासन-भंग के लिए दण्ड के बारे में शर्तें भी हैं, जो समुचित सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, निरुद्ध किया जा सकेगा, तथा

(ख) निरोध के एक स्थान से निरोध के दूसरे स्थान को, चाहे वह उसी राज्य में हो या दूसरे राज्य में समुचित सरकार के आदेश द्वारा हटाया जा सकेगा :

                परन्तु राज्य सरकार किसी व्यक्ति को एक राज्य से किसी अन्य राज्य में हटाने का खण्ड (ख) के अधीन आदेश उस अन्य राज्य की सरकार की सहमति के बिना नहीं करेगी ।

[5क. निरोध के आधारों को अलग किया जा सकेगा-जहां कोई व्यक्ति धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन ऐसे निरोध-आदेश के अनुसरण में, जो दो या अधिक आधारों पर किया गया है, निरुद्ध किया गया है, वहां ऐसे निरोध-आदेश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसे आधारों में से प्रत्येक आधार पर अलग-अलग किया गया था और तद्नुसार,-

(क) ऐसे आदेश के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह केवल इस कारण अविधिमान्य या अप्रवर्तनीय है कि आधारों में से एक या कुछ आधार-

(i) स्पष्ट नहीं हैं,

(ii) विद्यमान नही हैं,

(iii) सुसंगत नहीं हैं,

(iv) उस व्यक्ति से संबद्ध नहीं हैं या उससे निकटतः सम्बद्ध नहीं हैं, अथवा

(v) किसी भी अन्य कारण से अविधिमान्य हैं,

और इस कारण यह अभिनिर्धारित करना सम्भव नहीं है कि ऐसा आदेश करने वाली सरकार या अधिकारी का वैसा समाधान हो गया था जैसा कि शेष आधार या आधारों के प्रति धारा 3 की उपधारा (1) में उपबंधित हैं और उसने निरोध-आदेश किया था ;

(ख) निरोध-आदेश करने वाली सरकार या अधिकारी के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने उपधारा (1) के अधीन निरोध-आदेश अपना वैसा समाधान हो जाने के पश्चात् किया था जैसा कि शेष आधार या आधारों के प्रति उस उपधारा में उपबंधित है ।]

6. निरोध-आदेशों का कुछ आधारों पर अविधिमान्य या अप्रवर्तनशील होना-कोई निरोध-आदेश केवल इस कारण अविधिमान्य या अप्रवर्तनशील न होगा कि-

(क) उसके अधीन निरुद्ध किया जाने वाला व्यक्ति निरोध-आदेश करने वाली सरकार या अधिकारी की क्षेत्रीय अधिकारिता की सीमाओं के बाहर है, अथवा

(ख) ऐसे व्यक्ति के निरोध का स्थान उक्त सीमाओं के बाहर है ।

7. फरार व्यक्तियों के संबंध में शक्तियां-(1) यदि समुचित सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि जिस व्यक्ति के संबंध में निरोध-आदेश किया गया है, वह फरार हो गया है या अपने को छिपा रहा है जिससे उस आदेश का निष्पादन नहीं हो सकता तो वह सरकार,-

(क) उस तथ्य की लिखित रिपोर्ट उस महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को देगी जो उस स्थान पर अधिकारिता रखता हो जहां उक्त व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता हो ; और तब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 82, 83, 84 और 85 के उपबन्ध उक्त व्यक्ति और उसकी सम्पत्ति के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे मानो उसे निरुद्ध करने का आदेश मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया गिरफ्तारी का वारण्ट हो ;

(ख) राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा उक्त व्यक्ति को निदेश दे सकेगी कि वह ऐसे अधिकारी के समक्ष, ऐसे स्थान पर और ऐसी अवधि के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, हाजिर हो ; और यदि उक्त व्यक्ति ऐसे आदेश का अनुपालन नहीं करेगा तो, जब तक वह यह साबित न कर दे कि उसका अनुपालन करना उसके लिए सम्भव नहीं था और उसने आदेश में वर्णित अधिकारी को उसमें विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर उस कारण की, जिससे उसका अनुपालन करना असम्भव था, तथा अपने पते ठिकाने की सूचना दे दी थी, वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

                (2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी यह है कि उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन प्रत्येक अपराध संज्ञेय होगा ।

8. सलाहकार बोर्ड-संविधान के अनुच्छेद 22 के खण्ड (4) के उपखण्ड (क) और खण्ड (7) के उपखण्ड (ग) के प्रयोजनों के लिए,-

(क) जब भी आवश्यकता हो, केन्द्रीय सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार, एक या अधिक सलाहकार बोर्डों का गठन करेगी, जिनमें से प्रत्येक में एक अध्यक्ष और दो अन्य व्यक्ति होंगे, जो संविधान के अनुच्छेद 22 के खण्ड (4) के उपखण्ड (क) में विनिर्दिष्ट अर्हताएं रखते हों ;

() धारा 9 में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, समुचित सरकार, निरोध-आदेश की बाबत निर्देश, खण्ड () के अधीन गठित सलाहकार बोर्ड को, निरोध-आदेश के अधीन किसी व्यक्ति के निरोध की तारीख से पांच सप्ताह के भीतर करेगी जिससे सलाहकार बोर्ड संविधान के अनुच्छेद 22 के खण्ड (4) के उपखण्ड () के अधीन रिपोर्ट दे सके ;

(ग) वह सलाहकार बोर्ड, जिसे खण्ड (ख) के अधीन निर्देश किया गया है, निर्देश और अपने समक्ष रखी गई सामग्री पर विचार करने के पश्चात् तथा समुचित सरकार से, या समुचित सरकार के माध्यम से इस प्रयोजनार्थ बुलाए गए किसी व्यक्ति से या सम्बद्ध व्यक्ति से ऐसी अतिरिक्त जानकारी मांगने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, और यदि किसी विशिष्ट मामलें में वह ऐसा करना आवश्यक समझे या यदि सम्बद्ध व्यक्ति चाहे कि उसे सुना जाए तो स्वयं उसे सुनने के पश्चात्, अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वह एक अलग पैरे में अपनी यह राय विनिर्दिष्ट करेगा कि सम्बद्ध व्यक्ति को निरुद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार हैं या नहीं, और सम्बद्ध व्यक्ति के निरोध की तारीख से ग्यारह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देगा ;

(घ) जब सलाहकार बोर्ड के सदस्यों में मतभेद हो तब ऐसे सदस्यों के बहुमत को बोर्ड की राय समझा जाएगा ;

(ङ) कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन निरोध-आदेश किया गया है, सहलाकार बोर्ड को किए गए निर्देश से सम्बद्ध किसी मामले में किसी विधि व्यवसायी द्वारा हाजिर होने का हकदार नहीं होगा और सलाहकार बोर्ड की कार्यवाही और उसकी रिपोर्ट, उसके उस भाग के सिवाय जिसमें बोर्ड की राय विनिर्दिष्ट हो, गोपनीय होंगी ;

(च) प्रत्येक ऐसे मामले में, जिसमें सलाहकार बोर्ड ने यह रिपोर्ट दी है कि उस व्यक्ति के निरोध के लिए उसकी राय में पर्याप्त कारण है, समुचित सरकार निरोध-आदेश को पुष्ट कर सकेगी और सम्बद्ध व्यक्ति को उतनी अवधि तक निरुद्ध रख सकेगी जितनी वह ठीक समझे, तथा प्रत्येक ऐसे मामले में, जिसमें सलाहकार बोर्ड ने यह रिपोर्ट दी है कि सम्बद्ध व्यक्ति के निरोध के लिए उसकी राय में पर्याप्त कारण नहीं है, समुचित सरकार निरोध-आदेश प्रतिसंहृत करेगी और उस व्यक्ति को तुरन्त छुड़वा देगी ।

 [9. ऐसे मामले और परिस्थितियां जिनमें व्यक्तियों को सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किए बिना तीन मास से अधिक अवधि के लिए निरोध में रखा जा सकेगा-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी यह है कि जिस व्यक्ति के संबंध में (जिसके अंतर्गत विदेशी है)  [31 जुलाई, 1999] के पूर्व किसी भी समय निरोध-आदेश इस अधिनियम के अधीन किया जाता है उसे, संविधान के अनुच्छेद 22 के खण्ड (4) के उपखंड (क) के उपबंधों के अनुसार सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किए बिना, उसके निरोध की तारीख से तीन मास से अधिक किन्तु छह मास से अनधिक की अवधि के लिए उस दशा में निरोध में रखा जा सकेगा जब ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध निरोध-आदेश उसे माल की तस्करी करने से या माल की तस्करी दुष्प्रेरित करने से या तस्करित माल के परिवहन या छिपाने या  रखने से निवारित करने की दृष्टि से किया गया है और केन्द्रीय सरकार या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी का, जो उस सरकार के अपर सचिव से निम्न पंक्ति का नहीं है और जिसे इस धारा के प्रयोजनों के लिए उस सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किया गया है, यह समाधान हो गया है कि ऐसा व्यक्ति-

(क) ऐसे क्षेत्र में, जो तस्करी के लिए अधिक उपयुक्त है, माल तस्करी करके लाता है, उस क्षेत्र से बाहर ले जाता है अथवा उस क्षेत्र से होकर ले जाता है या उसके द्वारा ऐसा करना संभाव्य है ; या

(ख) ऐसे क्षेत्र में, जो तस्करी के लिए अधिक उपयुक्त है, माल तस्करी करके लाने के लिए, उस क्षेत्र से बाहर ले जाने के लिए अथवा उस क्षेत्र से होकर ले जाने के लिए दुष्प्रेरित करता है या उसका दुष्प्रेरित करना संभाव्य है ; या

 (ग) ऐसे क्षेत्र में, जो तस्करी के लिए अधिक उपयुक्त है, तस्करित माल के परिवहन या छिपाने या रखने में लगा हुआ है या जिसका इस प्रकार लगा रहना संभाव्य है,

और वह इस आशय की घोषणा उस व्यक्ति के निरोध के पांच सप्ताह के भीतर कर देती है या कर देता है ।

स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा में, क्षेत्र,  जो तस्करी के लिए अधिक उपयुक्त है" से अभिप्रेत है-

(i)  [गोवा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु राज्यों से तथा दमण और दीव तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्रों] से संलग्न भारतीय सीमाशुल्क सागर खंड ;

(ii) 3[गोवा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु राज्यों के, तथा दमण और दीव तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्रों, के राज्यक्षेत्र] के भीतर पड़ने वाला भारत के तट से पचास किलोमीटर की चौड़ाई का अंतरदेशीय क्षेत्र ;

(iii) गुजरात, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान राज्यों में भारत-पाकिस्तान सीमा से पचास किलोमीटर की चौड़ाई का अंतरदेशीय क्षेत्र ;

(iv) दिल्ली सीमाशुल्क विमान पत्तन ; और

(v) भारत के किसी अन्य तट या सीमा या ऐसे अन्य सीमाशुल्क स्टेशन से एक सौ किलोमीटर से अनधिक चौड़ाई का अतिरिक्त या अन्य भारतीय सीमाशुल्क सागर खंड या अंतरदेशीय क्षेत्र, जिसे केन्द्रीय सरकार, तस्करी के लिए, यथास्थिति, ऐसे सागर खंड, क्षेत्र या सीमाशुल्क स्टेशन की उपयुक्तता को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

स्पष्टीकरण 2-स्पष्टीकरण 1 के प्रयोजनों के लिए, सीमाशुल्क विमान पत्तन" और सीमाशुल्क स्टेशन" के वही अर्थ होंगे जो सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 2 के खंड (10) और खंड (13) में हैं ।

(2) किसी निरोध-आदेश के अधीन, जिसे उपधारा (1) के उपबन्ध लागू होते हैं, निरुद्ध किसी व्यक्ति की दशा में, धारा 8 में निम्नलिखित उपांतरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी, अर्थात् :-

(i) खंड () में पांच सप्ताह के भीतर करेगी" शब्दों के स्थान पर चार मास और दो सप्ताह के भीतर करेगी" शब्द रखे जाएंगे ;

(ii) खंड (ग) में,-

(1) संबद्ध व्यक्ति के निरोध की तारीख से" शब्दों के स्थान पर संबद्ध व्यक्ति के निरंतर निरोध की तारीख से"  शब्द रखे जाएंगे ;

(2) ग्यारह सप्ताह" शब्दों के स्थान पर पांच मास और तीन सप्ताह" शब्द रखे जाएंगे ;

(iii) खंड (च) में, निरोध के लिए" शब्दों के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, निरन्तर निरोध के लिए" शब्द रखे जाएंगे।]

10. निरोध की अधिकतम अवधि-ऐसे निरोध-आदेश के अनुसरण में, जिसे धारा 9 के उपबन्ध लागू नहीं होते हैं और जिसकी धारा 8 के खण्ड (च) के अधीन पुष्टि कर दी गई है, किसी व्यक्ति को जिस अधिकतम अवधि तक निरुद्ध रखा जा सकेगा वह  [निरोध की तारीख से एक वर्ष की अवधि की या विनिर्दिष्ट अवधि की, इनमें से जो भी अवधि बाद में अवसित होती हो,] होगी और ऐसे निरोध-आदेश के अनुसरण में, जिसे धारा 9 के उपबन्ध लागू होते हैं और जिसकी पुष्टि धारा 9 की उपधारा (2) के साथ पठित धारा 8 के खंड (च) के अधीन कर दी गई है, किसी व्यक्ति को जिस अधिकतम अवधि तक निरुद्ध रखा जा सकेगा वह 1[निरोध की तारीख से दो वर्ष की अवधि की या विनिर्दिष्ट अवधि की, इनमें से जो भी अवधि बाद में अवसित होती हो,ट होगी :

                परन्तु इस धारा की कोई बात उक्त दोनों में से किसी मामले में निरोध-आदेश को पहले ही किसी समय प्रतिसंहृत कर लेने या उपान्तरित करने की समुचित सरकार की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

[स्पष्टीकरण-इस धारा में और धारा 10क में, विनिर्दिष्ट अवधि" से वह अवधि अभिप्रेत है, जिसके दौरान संविधान के अनुच्छेद 352 के खंड (1) के अधीन 3 दिसम्बर, 1971 को निकाली गई आपात की उद्घोषणा और उस खंड के अधीन 25 जून, 1975 को निकाली गई आपात की उद्घोषणा दोनों ही प्रवर्तन में हों ।]

2[10क. निरोध की अवधि का विस्तार-(1) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध में किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसे निरोध आदेश के अधीन, जिसकी पुष्टि विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 52) के प्रारम्भ से पूर्व धारा 8 के खंड (च) के अधीन कर दी गई है और जो ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व प्रवृत्त है, निरुद्ध किए गए प्रत्येक व्यक्ति का निरोध, जब तक कि उसका निरोध, उसके निरोध की तारीख से एक वर्ष से कम अवधि के लिए, उक्त खंड के अधीन समुचित सरकार द्वारा जारी न रखा गया हो, उस आदेश के अधीन उसके निरोध की तारीख से एक वर्ष का अवसान होने तक या विनिर्दिष्ट अवधि का अवसान होने तक, इनमें से जो भी अवधि बाद में अवसित होती हो, जारी रहेगा :

परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे निरोध-आदेश को पहले ही किसी समय प्रतिसंहृत कर लेने या उपान्तरित करने की समुचित सरकार की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

(2) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति का निरोध, जो किसी ऐसे निरोध-आदेश के अधीन निरुद्ध किया गया है, जिसकी पुष्टि विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 52) के प्रारम्भ से पूर्व धारा 9 की उपधारा (2) के साथ पठित धारा 8 के खंड (च) के अधीन कर दी गई है और जो ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व प्रवृत्त है, जब तक कि उसका निरोध, उसके निरोध की तारीख से दो वर्ष से कम की अवधि के लिए, उक्त उपधारा (2) के साथ पठित उक्त  खंड () के अधीन समुचित सरकार द्वारा जारी रखा गया हो, उस आदेश के अधीन उसके निरोध की तारीख से दो वर्ष का अवसान होने तक या विनिर्दिष्ट अवधि का अवसान होने तक, इनमें से जो भी अवधि बाद में अवसित होती हो, जारी रहेगा :

परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे निरोध-आदेश को पहले ही किसी समय प्रतिसंहृत कर लेने या उपान्तरित करने की समुचित सरकार की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।]

11. निरोध-आदेश का प्रतिसंहरण-(1) साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 21 पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह है कि किसी भी निरोध-आदेश को, किसी भी समय,-

(क) इस बात के होते हुए भी कि आदेश राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा किया गया था, उस राज्य सरकार द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रतिसंहृत या उपान्तरित किया जा सकेगा ;

(ख) इस बात के होते हुए भी कि आदेश केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी द्वारा या किसी राज्य सरकार द्वारा किया गया था, केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रतिसंहृत या उपान्तरित किया जा सकेगा ।

                (2) निरोध-आदेश के प्रतिसंहृत किए जाने से उस व्यक्ति के विरुद्ध धारा 3 के अधीन किसी अन्य निरोध-आदेश का किया जाना वर्जित न होगा ।

12. निरुद्ध व्यक्तियों को अस्थायी तौर पर छोड़ना- [(1) केन्द्रीय सरकार किसी भी समय निदेश दे सकेगी कि उस सरकार द्वारा अथवा उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा अथवा किसी राज्य सरकार द्वारा या राज्य सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा किए गए निरोध-आदेश के अनुसरण में निरुद्ध कोई व्यक्ति, बिना शर्त के या निदेश में विनिर्दिष्ट ऐसी शर्तों पर, जिन्हें वह व्यक्ति स्वीकार करे, किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए छोड़ दिया जाए और उसका छोड़ा जाना किसी भी समय रद्द कर सकेगी ।

(1क) राज्य सरकार किसी भी समय निदेश दे सकेगी कि उस सरकार द्वारा अथवा उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा किए गए किसी निरोध-आदेश के अनुसरण में निरुद्ध कोई व्यक्ति, बिना शर्त के या निदेश में विनिर्दिष्ट ऐसी शर्तों पर, जिन्हें वह व्यक्ति स्वीकार करे, किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए छोड़ दिया जाए और उसका छोड़ा जाना किसी भी समय रद्द कर सकेगी ।]

(2)  [उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अधीन किसी व्यक्ति के छोड़े जाने का निदेश देते समय, छोड़े जाने का निदेश देने वाली सरकार] उससे अपेक्षा कर सकेगी कि वह निदेश में विनिर्दिष्ट शर्तों के उचित पालन के लिए, प्रतिभुओं सहित, बन्धपत्र निष्पादित करे ।

(3) 1[उपधारा (1) या उपधारा (1क)] के अधीन छोड़ा गया कोई व्यक्ति अपने को उस समय और उस स्थान पर और उस प्राधिकारी के समक्ष जो, यथास्थिति, उसके छोड़े जाने का निदेश देने वाले या उसका छोड़ा जाना रद्द करने वाले आदेश में विनिर्दिष्ट हो, अभ्यर्पित करेगा ।

(4) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट रीति से अपने को पर्याप्त कारण के बिना अभ्यर्पित नहीं करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

(5) यदि  1[उपधारा (1) या उपधारा (1क)ट के अधीन छोड़ा गया कोई व्यक्ति अपने पर उक्त उपधारा के अधीन अधिरोपित शर्तों या अपने द्वारा निष्पादित बन्धपत्र की शर्तों में से किसी को पूरा नहीं करेगा तो बन्धपत्र समपहृत घोषित कर दिया जाएगा और उसके द्वारा आबद्ध व्यक्ति उसकी शास्ति का देनदार होगा ।

  [(6) किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी और इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन किया गया निरोध-आदेश प्रवृत्त है, न तो जमानत पर और न जमानत-नामे पर और न अन्यथा छोड़ा जाएगा ।]

 [12क. आपात के सम्बन्ध में कार्रवाई के लिए विशेष उपबंध-(1) इस अधिनियम में या नैसर्गिक न्याय के नियमों में किसी बात के होते हुए भी यह है कि इस धारा के उपबंध संविधान के अनुच्छेद 352 के खंड (1) के अधीन 3 दिसम्बर, 1971 को जारी की गई आपात की उद्घोषणा के या उस खण्ड के अधीन 25 जून, 1975 को जारी की गई आपात की उद्घोषणा के प्रवर्तन की अवधि के या 25 जून, 1975 से  [चौबीस मासट की अवधि के दौरान, इनमें जो भी अवधि सब से कम हो, प्रभावी होंगे ।

(2) विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण (संशोधन) अधिनियम, 1975 के प्रारम्भ के पश्चात् किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन निरोध-आदेश करते समय, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या निरोध या आदेश करने वाला अधिकारी इस बात पर विचार करेगा कि क्या इस अधिनियम के अधीन ऐसे व्यक्ति का निरोध ऐसे आपात के संबंध में प्रभावी तौर पर कार्रवाई करने के लिए आवश्यक है जिसके सम्बन्ध में उपधारा (1) में निर्दिष्ट उद्घोषणाएं जारी की गई हैं (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् आपात कहा गया है) और यदि ऐसे विचार किए जाने पर, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आपात के सम्बन्ध में प्रभावी तौर पर कार्रवाई करने के लिए ऐसे व्यक्ति को निरुद्ध करना आवश्यक है तो वह सरकार या अधिकारी उस प्रभाव की घोषणा कर सकता है और सम्बद्ध व्यक्ति को उस घोषणा की एक प्रति भेज सकता है :

परन्तु जहां ऐसी घोषणा किसी अधिकारी द्वारी की जाती है तो घोषणा के किए जाने की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर समुचित सरकार द्वारा उसका पुनर्विलोकन किया जाएगा और ऐसी घोषणा, जब तक कि उस राज्य सरकार द्वारा उसकी पुष्टि पन्द्रह दिन की उक्त अवधि के भीतर, ऐसे पुनर्विलोकन के पश्चात् नहीं कर दी जाती, प्रभावहीन हो जाएगी ।

(3) इस प्रश्न पर कि क्या किसी ऐसे व्यक्ति का निरोध, जिसके संबंध में उपधारा (2) के अधीन घोषणा की गई है, आपात के संबंध में प्रभावी तौर पर कार्रवाई करने के लिए आवश्यक है, समुचित सरकार द्वारा, ऐसी घोषणा की तारीख से चार मास के भीतर और उसके पश्चात् चार मास से अनधिक के अंतरालों पर पुनर्विचार किया जाएगा और यदि ऐसे पुनर्विचार किए जाने पर, समुचित सरकार को यह प्रतीत होता है कि उस व्यक्ति का निरोध आपात के संबंध में प्रभावी तौर पर कार्रवाई करने के लिए अब आवश्यक नहीं है तो वह सरकार उस घोषणा को प्रतिसंहृत कर सकती है ।

(4) उपधारा (2) या (3) के अधीन कोई विचार, पुनर्विलोकन या पुनर्विचार करने में यदि समुचित सरकार या अधिकारी अन्यथा कार्य करना लोकहित के विरुद्ध समझता है तो ऐसी सरकार या अधिकारी सम्बद्ध व्यक्ति को तथ्य प्रकट किए बिना या कोई अभ्यावेदन करने का अवसर दिए बिना, अपने कब्जे में की जानकारी और सामग्री के आधार पर कार्य कर सकता है ।

(5) यह आवश्यक नहीं होगा कि ऐसे निरोध-आदेश के अधीन, जिसको उपधारा (2) के उपबंध लागू होते हैं, विरुद्ध किसी व्यक्ति को, ऐसी अवधि के दौरान, जिसमें उस उपधारा के अधीन ऐसे व्यक्ति के संबंध में की गई घोषणा प्रवृत्त है, ऐसे आधार प्रकट किए जाएं जिन पर ऐसा आदेश किया गया है और तद्नुसार ऐसी अवधि धारा 3 की उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं ली जाएगी ।

(6) ऐसे निरोध-आदेश के अधीन जिसको उपधारा (2) के उपबंध लागू होते हैं, निरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति की दशा में, यदि वह व्यक्ति ऐसा है जिसके सम्बन्ध में उसके अधीन कोई घोषणा की गई है तो, वह अवधि जिसके दौरान ऐसी घोषणा प्रवृत्त है, निम्नलिखित की संगणना करने के प्रयोजन के लिए हिसाब में नहीं ली जाएगी-

(i) धारा 8 के खण्ड (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट अवधियां ;

(ii) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट एक वर्ष" और पांच सप्ताह" की अवधियां, उपधारा (2) (i) में विनिर्दिष्ट एक वर्ष" की अवधि और धारा 9 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट छह मास" की अवधि ।]

13. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी और कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध होगी

14. निरसन-आन्तरिक सुरक्षा बनाए रखने का (संशोधन) अध्यादेश, 1974 (1974 का 11) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर निरसित हो जाएगा और तद्नुसार उक्त अध्यादेश द्वारा आन्तरिक सुरक्षा बनाए रखने का अधिनियम, 1971 (1971 का 26) में किए गए संशोधन ऐसे प्रारम्भ पर निष्प्रभाव हो जाएंगे ।

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