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बिहार और पश्चिमी बंगाल (राज्यक्षेत्र अन्तरण) ( Bihar and West Bengal (Transfer of Territories) Act, 1956 )


 

बिहार और पश्चिमी बंगाल (राज्यक्षेत्र अन्तरण) अधिनियम, 1956

(1956 का अधिनियम संख्यांक 40)

[1 सितम्बर, 1956]

बिहार से पश्चिमी बंगाल को कतिपय राज्यक्षेत्रों के

अन्तरण और उससे संबंधित विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

भाग 1

प्रारम्भिक

                1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बिहार और पश्चिमी बंगाल (राज्यक्षेत्र अन्तरण) अधिनियम, 1956 है

                2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,-

                                () “नियत दिन" से 1956 के नवम्बर का प्रथम दिन अभिप्रेत है ;

()  “अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है ;

() “सभा निर्वाचन-क्षेत्र", “परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र" औरसंसदीय निर्वाचन-क्षेत्र" के वही अर्थ हैं जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) में है ;

() “निर्वाचन आयोग" से अनुच्छेद 324 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है ;

() “विधि" के अन्तर्गत संपूर्ण बिहार या पश्चिमी बंगाल में या उसके किसी भाग में विधि का बल रखने वाली कोई अधिनियमिति, अध्यादेश, विनियम, आदेश, उपविधि, नियम, स्कीम, अधिसूचना या अन्य लिखत भी है ;

() “अधिसूचित आदेश" से राजपत्र में प्रकाशित आदेश अभिप्रेत है ;

() “जनसंख्या अनुपात" से ऐसा अनुपात अभिप्रेत है, जिसे केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, अन्तरित राज्यक्षेत्रों को छोड़कर, बिहार राज्य की अंतिम जनगणना पर यथा अभिनिश्चित जनसंख्या और अन्तरित राज्यक्षेत्रों की इस प्रकार यथा अभिनिश्चित जनसंख्या के बीच अनुपात के रूप में विनिर्दिष्ट करे ;

() “विहित" से अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

() “आसीन सदस्य" से संसद् या राज्य के विधान-मण्डल के दोनों सदनों में से किसी के संबंध में ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस सदन का सदस्य है ;

() “अंतरित राज्यक्षेत्र" से वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं, जो धारा 3 द्वारा बिहार राज्य से पश्चिमी बंगाल राज्य को अन्तरित कर दिए हैं ;

() “खजाना" के अन्तर्गत उपखजाना भी है

भाग 2

राज्यक्षेत्रों का अन्तरण

3. बिहार से पश्चिमी बंगाल को राज्यक्षेत्रों का अन्तरण-(1) नियत दिन से पश्चिमी बंगाल राज्य में ऐसे राज्यक्षेत्र जोड़ दिए जाएंगे, जो निम्नलिखित में 1956 के मार्च के प्रथम दिन को समाविष्ट थे-

() पूर्णिया जिले के किशनगंज उपखंड का वह भाग, जो उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त प्राधिकारी द्वारा सीमांकित सीमा-रेखा के पूर्व की ओर है और उक्त जिले के गोपालपुर थाने का वह भाग जो उक्त सीमा-रेखा के, यथास्थिति, पूर्व या उत्तर की ओर है ; और

() चास थाना, चांडिल थाना और बराभूम थाना के पताम्दा पुलिस स्टेशन को छोड़कर, मानभूम जिले का पुरुलिया उपखण्ड,

और तब उक्त राज्यक्षेत्र बिहार राज्य के भाग नहीं रहेंगे

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट सीमा-रेखा इस प्रकार सीमांकित की जाएगी कि साधारणतया वह दालकोला, किशनगंज और चोपड़ा को दार्जिलिंग में सिलिगुड़ी के साथ जोड़ने वाले पूर्णिया जिले में राजपथ के पश्चिम की ओर दो सौ गज और दालकोला और करनदिघी को पश्चिम दिनाजपुर जिले में रायगंज के साथ जोड़ने वाले पूर्णिया जिले में राजपथ के दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम की ओर दो सौ गज हो :

                परन्तु सीमा-रेखा इस प्रकार सीमांकित की जाएगी कि वह किसी ग्राम या नगर में होकर जाए :

                परन्तु यह और कि उस बिन्दु से, जहां से प्रथम वर्णित राजपथ किशनगंज नगरपालिका की दक्षिणी सीमा से मिलता है, उस बिन्दु तक, जहां वह उस नगरपालिका की उत्तरी सीमा को छोड़ता हो, सीमा-रेखा वही होगी जो पूर्व की ओर उस नगरपालिका की सीमा है

                (3) उपधारा (1) के खण्ड () में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्र दार्जिलिंग जिले के अन्तर्गत होगा और उसका भाग होगा और उस उपधारा के खण्ड () में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्र पश्चिमी बंगाल राज्य के बर्दवान खण्ड के भीतर पुरुलिया जिले से ज्ञात होने वाला पृथक् जिला होगा

                (4) उपधारा (3) की कोई भी बात नियत दिन के पश्चात्, पश्चिमी बंगाल राज्य में किसी जिले या खण्ड का नाम, विस्तार और सीमाओं में परिवर्तन करने की राज्य सरकार की शक्ति पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी

                4. संविधान की प्रथम अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से संविधान की प्रथम अनुसूची में, भाग में, राज्यों के राज्यक्षेत्रों के वर्णन में,-

() आसाम राज्य के राज्यक्षेत्र से संबंधित पैरा के पश्चात् निम्नलिखित पैरे अन्तःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात् :-

“बिहार राज्य के राज्यक्षेत्र में वे राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, जो इस संविधान के प्रारंभ के ठीक पहले या तो बिहार प्रांत में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे कि मानो वे उस प्रांत के भाग रहे हों किन्तु वे राज्यक्षेत्र जो बिहार और पश्चिमी बंगाल (राज्यक्षेत्र अन्तरण) अधिनियम, 1956 की धारा 3 की उपधारा (1) में उल्लिखित हैं, इससे अपवर्जित हैं

पश्चिमी बंगाल राज्य के राज्यक्षेत्र में वे राज्यक्षेत्र  समाविष्ट होंगे, जो इस संविधान के प्रारंभ के ठीक पहले या तो पश्चिमी बंगाल प्रान्त में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे मानो वे उस प्रांत के भाग रहे हों तथा चन्द्रनगर (विलयन) अधिनियम, 1954 की धारा 2 के खण्ड () मे यथापरिभाषित चन्द्रनगर का राज्यक्षेत्र और वे राज्यक्षेत्र भी जो बिहार और पश्चिमी बंगाल (राज्यक्षेत्र अन्तरण) अधिनियम, 1956 की धारा 3 की उपधारा (1) में उल्लिखित हैं, ";

() अंतिम पैरा मेंऔर पश्चिमी बंगाल राज्य के मामले में, चन्द्रनगर (विलयनअधिनियम, 1954 की धारा 2 के खण्ड () में यथा परिभाषित चन्द्रनगर का राज्यक्षेत्र भी समाविष्ट होगा" शब्द, कोष्ठक, अक्षर और अंक का लोप                           किया जाएगा

भाग 3

विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व

राज्य सभा

                5. संविधान की चतुर्थ अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से, संविधान की चतुर्थ अनुसूची में, स्थान-सारणी में बिहार और पश्चिमी बंगाल से संबंधित प्रविष्टियों के स्थान पर द्वितीय स्तम्भ में क्रमशः “22" और “16" प्रविष्टियां प्रतिस्थापित की जाएंगी

6. राज्य सभा में रिक्तियां भरी जाने के लिए उप-निर्वाचन-नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, बिहार और पश्चिमी बंगाल को आबंटित स्थानों में उस दिन विद्यमान रिक्तियों को भरने के लिए उप-निर्वाचन किए जाएंगे

7. राज्य सभा के सदस्यों की पदावधि-1958 के अप्रैल के द्वितीय दिन को और तत्पश्चात् प्रत्येक दूसरे वर्ष की समाप्ति पर राज्य सभा के सदस्यों में से यथाशक्य निकतम एक-तिहाई सदस्य निवृत्त हो जाएं, इसलिए राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग से परामर्श के पश्चात् आदेश द्वारा निर्वाचित सदस्यों की पदावधि के बारे में धारा 6 के अधीन ऐसा उपबन्ध करेगा, जैसा वह ठीक समझे

लोक सभा

8. विद्यमान लोक सभा के बारे में उपबन्ध-धारा 3 की कोई भी बात विद्यमान लोक सभा के बिहार से निर्वाचित किसी आसीन सदस्य के निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी

विधान सभाएं

9. बिहार विधान सभा के कतिपय आसीन सदस्यों का आबंटन-ठाकुर गंज, करनदिघी, पारा-एंव-चास और बड़ा बाजार-एंव-चांडिल निर्वाचन-क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले बिहार विधान सभा के आसीन सदस्य, पश्चिमी बंगाल को उनके भागों के अन्तरण द्वारा उन निर्वाचन-क्षेत्रों के विस्तार में कमी हो जाने पर भी बिहार विधान सभा के सदस्य बने रहेंगे ; और अन्तरित राज्यक्षेत्रों में पूर्णतः या अंशतः होने वाले अन्य निर्वाचन-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले उस सभा के आसीन सदस्य, नियत दिन से पश्चिमी बंगाल विधान सभा को निर्वाचित किए गए समझे जाएंगे और बिहार विधान सभा के सदस्य के रूप में नहीं रहेंगे

10. बिहार और पश्चिमी बंगाल की विधान सभाओं की अवधि-धारा 9 के अधीन बिहार और पश्चिमी बंगाल की विधान सभाओं के गठन में परिवर्तन, अनुच्छेद 172 के खण्ड (1) में यथा उपबंधित उनकी अवधि पर प्रभाव नहीं डालेंगे

विधान परिषदें

11. बिहार विधान परिषद्-(1) परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन (बिहार) आदेश, 1951 में बिहार राज्य, भागलपुर या छोटा नागपुर खण्ड के प्रति किसी निर्देश का यही अर्थ लगाया जाएगा कि उसमें, यथास्थिति, उस राज्य या खण्ड से अन्तरित राज्यक्षेत्र नहीं हैं

(2) ऐसे परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसका विस्तार उपधारा (1) के आधार पर परिवर्तित किया गया है, प्रतिनिधित्व करने वाला, बिहार विधान परिषद् का प्रत्येक आसीन सदस्य, नियत दिन से इस प्रकार यथा परिवर्तित उस निर्वाचन-क्षेत्र से उक्त परिषद् के लिए निर्वाचित किया गया समझा जाएगा

12. पश्चिमी बंगाल विधान परिषद्-(1) परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन (पश्चिमी बंगाल) आदेश, 1951 में पश्चिमी बंगाल राज्य, बर्दवान खण्ड या दार्जिलिंग जिले के प्रति किसी निर्देश का यही अर्थ लगाया जाएगा कि उसमें, यथास्थिति, उस राज्य, खण्ड या जिले को अन्तरित राज्यक्षेत्र सम्मिलित हैं

(2) उक्त आदेश से उपाबद्ध सारणी में, द्वितीय स्तंभ की प्रविष्ट में, पश्चिमी बंगाल पश्चिम (स्नातक) निर्वाचन-क्षेत्र के सामने बांकुरा" शब्द के पश्चात्पुरुलिया" शब्द अन्तःस्थापित किया जाएगा

(3) ऐसे परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसका विस्तार उपधारा (1) या उपधारा (2) के आधार पर परिवर्तित किया गया है, प्रतिनिधित्व करने वाला पश्चिमी बंगाल विधान परिषद् का प्रत्येक आसीन सदस्य, नियत दिन से, इस प्रकार यथा परिवर्तित उस निर्वाचन-क्षेत्र से उक्त परिषद् के लिए निर्वाचित किया गया समझा जाएगा

निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन

13. लोक सभा में के स्थानों का आबंटन और राज्य विधान सभाओं को स्थानों का समनुदेशन-डिलिमिटेशन कमीशन ऐक्ट, 1952 (1952 का 81) के अधीन परिसीमन आयोग के आदेश द्वारा बिहार और पश्चिमी बंगाल को लोक सभा में आबंटित स्थानों की संख्या और उन राज्यों में से प्रत्येक की विधान सभा को समनुदेशित स्थानों की संख्या, निम्नलिखित रूप में उपांतरित की जाएगी-

 

लोक सभा में के

स्थानों की संख्या

विधान सभा में के

स्थानों की संख्या

बिहार

53

318

पश्चिमी बंगाल

36

252

 

  14. अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां आदेशों का उपांतरण-इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् यथा शक्यशीघ्र, राष्ट्रपति, अधिसूचित आदेश द्वारा संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 और संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश, 1950 में ऐसे उपान्तरण कर सकेगा जैसा धारा 3 द्वारा प्रभावित राज्यक्षेत्रों के अन्तरण को ध्यान में रखते हुए वह ठीक समझे

15. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या का अवधारण-(1) उक्त आदेशों के इस प्रकार उपांतरित किए जाने के पश्चात् बिहार और पश्चिमी बंगाल में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की अंतिम जनगणना पर जनसंख्या, जनगणना प्राधिकारी द्वारा, ऐसी रीति में अभिनिश्चित या प्राक्कलित की जाएगी जैसी विहित की जाए और उसे भारत के राजपत्र में, उस प्राधिकारी द्वारा, अधिसूचित किया जाएगा

(2) इस प्रकार अधिसूचित जनसंख्या के आंकड़े अंतिम जनगणना पर यथा अभिनिश्चित सुसंगत जनसंख्या के आंकड़ों  के रूप में लिए जाएंगे और पहले ही प्रकाशित किन्हीं आंकड़ों का स्थान लेंगे

16. निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-(1) इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, निम्नलिखित के लिए एक प्राधिकारी नियुक्त करेगी-

() धारा 15 के अधीन अधिसूचित जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर, संविधान और इस अधिनियम के सुसंगत उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, लोक सभा में और उन राज्यों में से प्रत्येक की विधान सभा में बिहार और पश्चिमी बंगाल की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या अवधारित करना ; और

() उक्त उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, डिलिमिटेशन कमीशन ऐक्ट, 1952 (1952 का 81) की धारा 8 के अधीन बिहार और पश्चिमी बंगाल के बारे में परिसीमन आयोग द्वारा दिए गए आदेशों का उस विस्तार तक, जितना आवश्यक या समीचीन हो, पुनरीक्षण करना

(2) उक्त प्राधिकारी अपने कृत्यों का ऐसी रीति से पालन करेगा और ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जैसी विहित                         की जाए

भाग 4

उच्च न्यायालय

                17. कलकत्ता उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तारण और उसको कार्यवाहियों का अंतरण-(1) इसमें इसके पश्चात् यथा उपबंधित के सिवाय,-

() कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय की अधिकारिता, नियत दिन से अंतरित राज्यक्षेत्रों पर विस्तारित होगी ; और

() पटना स्थित उच्च न्यायालय को उस दिन से अन्तरित राज्यक्षेत्रों के बारे में अधिकारिता नहीं होगी

(2) नियत दिन के ठीक पूर्व, पटना स्थित उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां, जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा, वाद-हेतुक के उत्पन्न होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कार्यवाहियों के रूप में प्रमाणित की गई हैं, जिनकी कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए और विनिश्चत किया जाना चाहिए, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय को अंतरित की जाएंगी

(3) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु उन उपबंधों के सिवाय, जो इसमें इसके पश्चात् दिए गए हों जहां किसी कार्यवाही में नियत दिन के पूर्व पटना स्थित उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश की बाबत अनुतोष चाहा गया हो, वहां, अपीलों, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदनों, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को ग्रहण करने, सुनने और निपटाने की अधिकारिता पटना स्थित उच्च न्यायालय को होगी और कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय को                 होगी :

परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के पटना स्थित उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात्, उस उच्च न्यायालय के मु्ख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय को अंतरित की जानी चाहिएं, तो वह आदेश देगा कि वे कार्यवाहियां इस प्रकार अंतरित की जाएं और तब ऐसी कार्यवाहियां तद्नुसार अंतरित कर दी जाएंगी

(4) () उपधारा (2) के आधार पर कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय को अन्तरित किसी कार्यवाही में, नियत दिन के पूर्व पटना स्थित उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया कोई आदेश, या

() किसी ऐसी कार्यवाही में जिसकी बाबत पटना स्थित उच्च न्यायालय उपधारा (3) के आधार पर अधिकारिता धारण करता है, उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया कोई आदेश,

सभी प्रयोजनों के लिए केवल पटना स्थित उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं, अपितु कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा

                18. कलकत्ता उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में उपस्थित होने का अधिकार-कोई भी व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व पटना स्थित उच्च न्यायलय में अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय करने का हकदार है और उस उच्च न्यायालय से धारा 17 के अधीन कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय को अन्तरित किन्हीं कार्यवाहियों में उपस्थित होने के लिए प्राधिकृत था, उसे उन कार्यवाहियों के बारे में कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय में उपस्थित होने का अधिकार होगा

                19. निर्वचन-धारा 17 और 18 के प्रयोजनों के लिए,-

() पटना स्थित उच्च न्यायालय में कार्यवाहियां तब तक लंबित समझी जाएंगी जब तक उस न्यायालय ने पक्षकारों के बीच के सभी विवाद्यकों को, जिनके अन्तर्गत कार्यवाहियों के खर्चों के विनिर्धारण की बाबत विवाद्यक भी हैं, निपटा दिया हो और इनके अन्तर्गत अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के लिए आवेदन, पुनरीक्षण के लिए अर्जियां और रिट के लिए अर्जियां भी होंगी ;

() उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उसके न्यायाधीश या खण्ड न्यायालय के प्रति निर्देश भी है तथा न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा दिए गए आदेश के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा पारित दण्डादेश, निर्णय या डिक्री के प्रति निर्देश भी हैं

भाग 5

व्यय का प्राधिकरण

20. वर्तमान विनियोग अधिनियमों के अधीन अंतरित राज्यक्षेत्रों में व्यय के लिए धन का विनियोग-(1) नियत दिन से, उस दिन के पूर्व पश्चिमी बंगाल के विधान-मण्डल द्वारा 1956-57 के वित्तीय वर्ष के किसी भाग के बारे में किसी व्यय को पूरा करने के लिए उस राज्य की संचित निधि में से किसी धन के विनियोग के लिए पारित कोई अधिनियम, अंतरित राज्यक्षेत्रों के संबंध में भी प्रभावी होगा और ऐसे अधिनियम द्वारा, उस राज्य में किसी सेवा के लिए व्यय की जाने वाली, प्राधिकृत रकम में से उन राज्यक्षेत्रों में किसी रकम का खर्च करना उस राज्य सरकार के लिए विधियुक्त होगा

(2) नियत दिन के पश्चात् पश्चिमी बंगाल का राज्यपाल अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किसी प्रयोजन या सेवा के लिए राज्य की संचित निधि में से किसी अवधि के लिए, जो 31 मार्च, 1957 के बाद की होगी, ऐसा व्यय, जो वह आवश्यक समझे, प्राधिकृत                     कर सकेगा

21. राजस्व का वितरण-यूनियन ड्यूटीज आफ एक्साइट (डिस्ट्रिब्यूशन) ऐक्ट, 1953 (1953 का 3) की धारा 3 और संविधान (राजस्व-वितरण) आदेश, 1953 के पैरा 3, 4 और 5, 1956-57 वित्तीय वर्ष के बारे में, ऐसे उपांतरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे, जैसा राष्ट्रपति, अधिसूचित आदेश द्वारा, इस अधिनियम की धारा 3 द्वारा किए गए राज्यक्षेत्रों के अन्तरण को ध्यान में रखते हुए विनिर्दिष्ट करें

भाग 6

आस्तियों और दायित्वों का प्रभाजन

22. भूमि और माल-(1) इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए अंतरित राज्यक्षेत्रों में बिहार राज्य के स्वामित्व की सब भूमि और सब सामान, वस्तुएं और अन्य माल, नियत दिन से, पश्चिमी बंगाल राज्य को संक्रांत हो जाएंगे

(2) बिहार में किसी वर्ग के किसी अनिर्गमित सामान का विभाजन पश्चिमी बंगाल और बिहार के बीच, 31 मार्च, 1956 को समाप्त होने वाली तीन वर्ष की अवधि में, अन्तरित राज्यक्षेत्रों और बिहार के शेष भाग के लिए किए गाए उस वर्ग के सामान के कुल मांगपत्रों के अनुपात में किया जाएगा :

परन्तु इस धारा की कोई भी बात ऐसे सामान को लागू नहीं होगी, जो विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए जैसे कि विशिष्ट संस्थाओं, कर्मशालाओं या उपक्रमों या सन्निर्माणाधीन विशेष संकर्मों पर प्रयोग या उपयोग के लिए रखा गया हो

(3) इस धारा मेंभूमि" पद के अन्तर्गत प्रत्येक प्रकार की स्थावर संपत्ति तथा ऐसी संपत्ति में या उस पर के कोई अधिकार हैं औरमाल" पद के अन्तर्गत सिक्के, बैंक नोट तथा करेंसी नोट नहीं आते

23. खजाना और बैंक अतिशेष-नियत दिन के ठीक पूर्व बिहार के सभी खजानों में की रोकड़ बाकी और भारतीय रिजर्व बैंक के पास के बिहार के जमा अतिशेषों के योग का विभाजन उस राज्य और पश्चिमी बंगाल के बीच जनसंख्या के अनुपात के अनुसार किया जाएगा :

परन्तु ऐसे विभाजन के प्रयोजनों के लिए कोई रोकड़ बाकी किसी एक खजाने से दूसरे खजाने को अन्तरित नहीं की जाएगी और प्रभाजन नियत दिन को भारतीय रिजर्व बैंक की बहियों में बिहार और पश्चिमी बंगाल के जमा अतिशेषों के समायोजन द्वारा          किया जाएगा

24. करों का बकाया-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में अवस्थित संपत्ति पर के किसी कर या शुल्क की बकाया को, जिसके अन्तर्गत भू-राजस्व की बकाया भी है, वसूल करने का बिहार का अधिकार पश्चिमी बंगाल का होगा और किसी अन्य कर या शुल्क की बकाया को वसूल करने का बिहार का अधिकार, ऐसे किसी मामले में, जहां कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान अन्तरित राज्यक्षेत्रों में है, वहां भी वह पश्चिमी बंगाल का ही होगा

25. उधारों और अग्रिमों की वसूली का अधिकार-बिहार द्वारा नियत दिन के पूर्व अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किसी स्थानीय निकाय, सोसाइटी, कृषक या अन्य व्यक्ति को दिए गए किन्हीं उधारों या अग्रिमों को वसूल करने का अधिकार पश्चिमी बंगाल को होगा

26. कतिपय निधियों में जमा-बिहार के रोकड़ बाकी विनिधान खाते, अकाल राहत निधि तथा साधारण निधि में किए गए विनिधान और केन्द्रीय सड़क निधि में बिहार के खाते में जमा राशियों का विभाजन बिहार और पश्चिमी बंगाल के बीच जनसंख्या के अनुपात के अनुसार किया जाएगा ; और किसी ऐसी विशेष निधि में के विनिधान, जिसके उद्देश्य अन्तरित राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग तक सीमित हों, पश्चिमी बंगाल को संक्रांत हो जाएंगे

27. राज्य उपक्रमों की आस्तियां और दायित्व-(1) अन्तरित राज्यक्षेत्र में अवस्थित बिहार के किसी वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम से संबंधित आस्तियां और दायित्व पश्चिमी बंगाल को संक्रांत हो जाएंगे

(2) जहां किसी ऐसे वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम के लिए बिहार द्वारा कोई अवक्षयण आरक्षित निधि रखी गई हो, वहां उस निधि में से किए गए विनिधान के बारे में धारित प्रतिभूतियां भी पश्चिमी बंगाल को संक्रांत हो जाएंगी

28. लोक ऋण-(1) बिहार का लोक ऋण, जो उस उधार के कारण हो, जो सरकारी प्रतिभूतियां जारी करके लिया गया हो और नियत दिन के ठीक पूर्व जनता को बकाया हो, बिहार का ऋण बना रहेगा :

परन्तु-

() पश्चिमी बंगाल, लोक ऋण की शोध व्यवस्था और अदायगी के लिए समय-समय पर देय राशियों के अंश का बिहार को देनदार होगा ; और

() उक्त अंश के अवधारण के प्रयोजन के लिए बिहार और पश्चिमी बंगाल के बीच उक्त ऋण का विभाजन इस प्रकार किया गया समझा जाएगा मानो वह उपधारा (2) में निर्दिष्ट ऋण हो

(2) नियत दिन के पूर्व, केन्द्रीय सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक या किसी अन्य बैंक से लिए गए उधारों के कारण बिहार के लोक ऋण का विभाजन क्रमशः, अन्तरित राज्यक्षेत्रों को छोड़कर बिहार के राज्यक्षेत्रों में और अन्तरित राज्यक्षेत्रों में, सभी पूंजी संकर्मों और अन्य पूंजी लागत पर नियत दिन तक उपगत कुल व्यय के अनुपात में बिहार और पश्चिमी बंगाल के बीच किया जाएगा :

परन्तु ऐसे विभाजन के प्रयोजनों के लिए जिनके लिए पूंजी खाते रखे गए हों, उन आस्तियों पर केवल व्यय, ध्यान में                    लिया जाएगा

(3) जहां बिहार ने अपने द्वारा लिए गए किसी उधार की अदायगी के लिए कोई निक्षेप निधि या अवक्षयण निधि रखी हो, वहां उस निधि में से किए गए विनिधानों के बारे में धारित प्रतिभूतियों का विभाजन बिहार और पश्चिमी बंगाल के बीच उसी अनुपात में किया जाएगा, जिसमें उपधारा (2) में निर्दिष्ट लोक ऋण का विभाजन किया जाए

(4) इस धारा में, “सरकारी प्रतिभूति" पद से ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है, जो जनता से उधार लेने के प्रयोजन के लिए सृजित और निर्गमित की गई है लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 के खण्ड (2) में विनिर्दिष्ट या उसके अधीन विहित प्ररूपों में से किसी प्ररूप की है

29. आधिक्य में वसूल किए गए करों की वापसी-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में स्थित किसी संपत्ति पर आधिक्य में वसूल किए गए कर या शुल्क, जिनमें भू-राजस्व भी सम्मिलित है, की वापसी के बारे में बिहार का दायित्व पश्चिमी बंगाल का दायित्व होगा और जहां उस कर या शुल्क के निर्धारण करने का स्थान अन्तरित राज्यक्षेत्र में है वहां आधिक्य में वसूल किए गए किसी अन्य कर या शुल्क की वापसी के मामले में बिहार का दायित्व भी पश्चिमी बंगाल का दायित्व होगा

30. निक्षेप-अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किए गए किसी सिविल निक्षेप या स्थानीय निधि निक्षेप के बारे में बिहार का दायित्व, नियत दिन से, पश्चिमी बंगाल का दायित्व होगा

31. भविष्य-निधि-किसी ऐसे सरकारी सेवक के, जो नियत दिन को सेवा में होते हुए स्थायी रूप से पश्चिमी बंगाल को आबंटित किया गया है, भविष्य-निधि खाते के बारे में बिहार का दायित्व, उस दिन से पश्चिमी बंगाल का दायित्व होगा

32. पेंशन-पेंशनों के बारे में बिहार के दायित्व का प्रभाजन उस राज्य और पश्चिमी बंगाल के बीच, अनुसूची के उपबंधों के अनुसार होगा

33. संविदाएं-(1) जहां बिहार राज्य ने राज्य के किन्हीं प्रयोजनों के लिए अपनी कार्यपालिक शक्ति के प्रयोग में कोई संविदा नियत दिन के पूर्व की हो, वहां वह संविदा-

() यदि संविदा के प्रयोजन, नियत दिन से अनन्यतः उस राज्य के प्रयोजन हैं, तो बिहार की कार्यपालिक शक्ति के प्रयोग में ;

() यदि संविदा के प्रयोजन, उस दिन के अनन्यतः उस राज्य के प्रयोजन हैं, तो पश्चिमी बंगाल की कार्यपालिक शक्ति के प्रयोग में ; और

                () किसी अन्य मामले में बिहार की कार्यपालिक शक्ति के प्रयोग में,

की गई समझी जाएगी और वे सब अधिकार और दायित्व जो ऐसी किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हैं या प्रोद्भूत हों, उस सीमा तक, जहां तक वे बिहार के अधिकार और दायित्व होते, यथास्थिति, बिहार या पश्चिमी बंगाल के अधिकार या दायित्व होंगे :

                परन्तु किसी ऐसे मामले में, जो खण्ड () में निर्दिष्ट किया गया है, इस उपधारा द्वारा अधिकारों और दायित्वों का किया गया प्रारंभिक आबंटन, ऐसे वित्तीय समायोजन के अधीन रहते हुए होगा, जैसा दोनों राज्यों के बीच करार पाया जाए, या ऐसे करार के अभाव में, जैसा केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे

                (2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे दायित्वों में, जो किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हैं या प्रोद्भूत हों, निम्नलिखित अन्तर्विष्ट किए गए समझे जाएंगे-

() उस संविदा से संबंधित कार्यवाहियों में किसी न्यायालय या अन्य अधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश या अधिनिर्णय को पूरा करने का कोई दायित्व ; और

                                () ऐसी किन्हीं कार्यताहियों में या उनके संबंध में उपगत व्ययों के बारे में कोई दायित्व

                (3) यह धारा उधारों, प्रत्याभूतियों और अन्य वित्तीय बाध्यताओं के बारे में दायित्वों के प्रभाजन से संबंधित इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी और बैंक अतिशेष और प्रतिभूतियों के विषय में कार्यवाही, उनके संविदात्मक अधिकारों की प्रकृत्ति के होते हुए भी, उन अन्य उपबंधों के अधीन की जाएगी

34. अनुयोज्य दोष के बारे में दायित्व-जहां नियत दिन के ठीक पूर्व, बिहार पर संविदा भंग से भिन्न अनुयोज्य दोष के बारे में कोई दायित्व हो, वहां वह दायित्व,-

() यदि वादहेतुक पूर्णतया अन्तरित राज्यक्षेत्र के भीतर पैदा हुआ हो तो पश्चिमी बंगाल का दायित्व होगा ;

() यदि अन्तरित राज्यक्षेत्रों को छोड़कर बिहार के राज्यक्षेत्रों के भीतर वादहेतुक पूर्णतया पैदा हुआ हो, तो बिहार का दायित्व होगा ; और

() किसी अन्य दशा में प्रारंभिक रूप से बिहार का दायित्व होगा किन्तु यह ऐसे वित्तीय समायोजन के अधीन होगा, जैसा उस राज्य और पश्चिमी बंगाल के बीच करार पाया जाए, या ऐसे करार के अभाव में जिसका केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे

35. सहकारी सोसाइटियों का प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायित्व-जहां नियत दिन के ठीक पूर्व, बिहार पर किसी रजिस्ट्रीकृत सहकारी सोसाइटी के दायित्व के बारे में प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायित्व हो, वहां वह दायित्व-

() यदि उस सोसाइटी का कार्य-क्षेत्र अन्तरित राज्यक्षेत्रों तक सीमित हो तो पश्चिमी बंगाल का होगा ; और

                () किसी अन्य दशा में, बिहार का रहेगा  

36. उचंत मद-यदि कोई उचंत मद, अन्ततः इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी में निर्दिष्ट प्रकार की किसी आस्ति या दायित्व पर प्रभाव डालने वाली पाई जाती है तो उसके संबंध में उस उपबंध के अनुसार कार्यवाही की जाएगी

37. कुछ मामलों में आबंटन या समायोजन के लिए आदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-जहां या तो बिहार या पश्चिमी बंगाल किसी संपत्ति का हकदार हो जाता है या कोई फायदा प्राप्त करे या किसी दायित्व के अधीन हो जाता है और नियत दिन से तीन वर्ष की कालावधि के भीतर उन राज्यों में से किसी द्वारा किए गए किसी निर्देश पर केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि यह न्याय-संगत तथा साम्यापूर्ण है कि वह संपत्ति या फायदा अन्य राज्य को अंतरित किया जाना चाहिए या उसे अंश मिलना चाहिए या उस दायित्व के मद्धे अन्य राज्य द्वारा अभिदाय किया जाना चाहिए, वहां उक्त संपत्ति या फायदे, दोनों राज्यों के बीच ऐसी रीति से आबंटित किए जाएंगे या वह अन्य राज्य दायित्व के अधीन रहने वाले राज्य को उसके बारे में ऐसा अभिदाय करेगा, जो केन्द्रीय सरकार दोनों राज्य सरकारों से परामर्श के पश्चात्, आदेश द्वारा, अवधारित करे

38. कुछ व्यय का संचित निधि पर भारित किया जाना-या तो बिहार द्वारा या पश्चिमी बंगाल द्वारा अन्य राज्य को इस भाग के उपबंधों के कारण संदेय सभी राशियां, जिसके द्वारा ऐसी राशियां संदेय हैं, उस राज्य की संचित निधि पर भारित होंगी

भाग 7

प्रशासनिक उपबन्ध

39. राज्य वित्तीय निगम-(1) बिहार और पश्चिमी बंगाल राज्यों के लिए, राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) के अधीन गठित वित्तीय निगम, नियत दिन से, उन राज्यों के लिए धारा 3 के उपबंधों द्वारा यथा परिवर्तित उनके क्षेत्रों सहित गठित किए गए समझे जाएंगे

(2) बिहार राज्य वित्तीय निगम की समादत्त पूंजी के उसके अंश के मद्धे, बिहार, पश्चिमी बंगाल को ऐसी रकम संदाय करने का दायी होगा, जैसी केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा अवधारित करे

40. कतिपय विद्यमान सड़क परिवहन अनुज्ञापत्रों के चालू रहने के बारे में अस्थायी उपबंध-(1) मोटर यान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) की धारा 63 में किसी बात के होते हुए भी, बिहार के राज्य परिवहन प्राधिकरण द्वारा या बिहार के किसी प्रादेशिक परिवहन प्राधिकरण द्वारा दिया गया अनुज्ञापत्र, यदि ऐसा अनुज्ञापत्र अन्तरित राज्यक्षेत्रों के भीतर किसी क्षेत्र में नियत दिन के ठीक पूर्व विधिमान्य और प्रभावी था, उस क्षेत्र में उस समय प्रवृत्त उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस दिन के पश्चात् उस क्षेत्र में, विधिमान्य और प्रभावी बना रहा समझा जाएगा और किसी ऐसे अनुज्ञापत्र पर, पश्चिमी बंगाल के राज्य परिवहन प्राधिकरण द्वारा या पश्चिमी बंगाल के किसी प्रादेशिक परिवहन प्राधिकरण द्वारा, ऐसे क्षेत्र में, उसके उपयोग के लिए, विधिमान्य करने के प्रयोजन के लिए प्रतिहस्ताक्षर करना आवश्यक नहीं होगा :

परन्तु केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों से परामर्श के पश्चात्, जिसके द्वारा वह अनुज्ञापत्र दिया गया था उस प्राधिकरण द्वारा, अनुज्ञापत्र से संलग्न शर्तों में परिवर्धन, संशोधन या फेरफार कर सकेगी

(2) नियत दिन के पश्चात् किसी परिवहन यान के बारे में अन्तरित राज्यक्षेत्रों में उसके चलाने के लिए किसी ऐसे अनुज्ञापत्र के अधीन कोई पथकर, प्रवेश फीस या वैसी ही प्रकृति के अन्य प्रभार उद्गृहीत नहीं किए जाएंगे यदि उस यान को उस दिन के ठीक पूर्व बिहार की सीमाओं के परे चलाने के लिए ऐसे पथकर, प्रवेश फीस या प्रभार के संदाय से छूट प्राप्त हो :

परन्तु केन्द्रीय सरकार, दोनों राज्य सरकारों से परामर्श के पश्चात्, यथास्थिति, ऐसे किसी पथकर, प्रवेश फीस या अन्य प्रभार के उद्ग्रहण को प्राधिकृत कर सकेगी

41. सेवाओं से संबंधित उपबन्ध-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व बिहार के कार्यकलाप के संबंध में सेवा कर रहा हो, उस दिन से, तब तक इसी प्रकार की सेवा करता रहेगा जब तक कि केन्द्रीय सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा उससे यह अपेक्षा की जाए कि वह पश्चिमी बंगाल के कार्यकलापों के संबंध में अंतिम रूप में सेवा करे

(2) नियत दिन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र केन्द्रीय सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा वह राज्य अवधारित करेगी, जिसे पश्चिमी बंगाल को अनन्तिम रूप से आबंटित प्रत्येक व्यक्ति सेवा के लिए अंतिम रूप से आबंटित किया जाएगा और वह तारीख अवधारित करेगी जिससे ऐसा आबंटन प्रभावी होगा या प्रभावी हुआ समझा जाएगा

(3) प्रत्येक व्यक्ति, जो उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन बिहार या पश्चिमी बंगाल को अंतिम रूप से आबंटित किया गया है यदि वह पहले से ही उसमें सेवा कर रहा हो तो वह उस राज्य में ऐसी तारीख से, जो दो राज्य सरकारों के बीच करार पाई जाए और ऐसे करार के अभाव में, जैसी केन्द्रीय सरकार अवधारित करे, सेवा करने के लिए उपलभ्य किया जाएगा

(4) इस धारा की कोई भी बात, नियत दिन के पश्चात्, बिहार या पश्चिमी बंगाल के कार्यकलापों के संबंध में सेवा करने वाले व्यक्तियों की सेवा-शर्तों के अवधारण के संबंध में संविधान के भाग 14 के अध्याय 1 के उपबन्धों के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी :

परन्तु इस धारा के अधीन पश्चिमी बंगाल को अनन्तिम रूप से या अंतिम रूप से आबंटित किसी व्यक्ति के मामले को नियत दिन के ठीक पूर्व लागू होने वाली सेवा-शर्तें केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के सिवाय, उसके लिए अहितकर रूप में परिवर्तित नहीं की जाएंगी

(5) केन्द्रीय सरकार, नियत दिन के पूर्व या पश्चात् किसी भी समय, दोनों में से किसी राज्य सरकार को ऐसे निदेश दे सकेगी, जो इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों को प्रवृत्त करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक प्रतीत हों और राज्य सरकार ऐसे निदेशों का अनुपालन करेगी

42. अधिकारियों को उन्हीं पदों में बनाए रखने के बारे में उपबन्ध-प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व अन्तरित राज्यक्षेत्रों के भीतर किसी क्षेत्र में, बिहार के कार्यकलापों के संबंध में किसी पद या अधिकार-पद को धारण कर रहा है या उसके कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो, वह पश्चिमी बंगाल में वही पद या अधिकार-पद धारण करता रहेगा और उस दिन से पश्चिमी बंगाल की सरकार या उसमें अन्य समुचित प्राधिकारी द्वारा उस पद या अधिकार-पद पर सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया समझा जाएगा :

परन्तु इस धारा की कोई बात किसी सक्षम प्राधिकारी को नियत दिन के पश्चात् किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में उसके ऐसे पद या अधिकार-पद पर बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश पारित करने से निवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी

भाग 8

विधिक और प्रकीर्ण उपबन्ध

43. विधियों का प्रादेशिक विस्तार-धारा 3 के उपबंधों की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि उनसे उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर नियत दिन के ठीक पूर्व कोई प्रवृत्त विधि विस्तारित होती है या लागू होती है, कोई परिवर्तन हुआ है और ऐसी किसी विधि में बिहार या पश्चिमी बंगाल के प्रति प्रादेशिक निर्देशों का जब तक अन्य सक्षम विधान-मण्डल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्यथा उपबंधित हो, तब तक यही अर्थ लगाया जाएगा मानो वे नियत दिन के पूर्व उस राज्य के भीतर राज्यक्षेत्र हैं

44. विधियों के अनुकूलन की शक्ति-बिहार या पश्चिमी बंगाल के संबंध में किसी विधि का लागू होना सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए समुचित सरकार, नियत दिन से एक वर्ष की समाप्ति के पूर्व आदेश द्वारा विधि के ऐसे अनुकूलन तथा उपान्तर, चाहे वे निरसन या संशोधन के रूप में हों, जैसे आवश्यक या समीचीन हो, कर सकेगी और तब ऐसी प्रत्येक विधि जब तक सक्षम प्राधिकारी या सक्षम विधान-मण्डल द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित कर दी जाए तब तक इस प्रकार किए गए अनुकूलनों या उपांतरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी

स्पष्टीकरण-इस धारा मेंसमुचित सरकार" पद से संघ सूची में प्रगणित किसी विषय से संबंधित किसी विधि के बारे में केन्द्रीय सरकार और किसी अन्य विधि के बारे में राज्य सरकार अभिप्रेत है

45. विधियों के अर्थान्वयन की शक्ति-इस बात के होते हुए भी कि नियत दिन के पूर्व बनाई गई किसी विधि के अनुकूल के लिए कोई उपबन्ध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबन्ध किया गया है, बिहार या पश्चिमी बंगाल के संबंध में उसका लागू होना सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए ऐसी विधि को प्रवर्तित करने के लिए, अपेक्षित या सशक्त किया गया कोई न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी उस विधि का अर्थान्वयन, सार पर प्रभाव डाले बिना ऐसी रीति से कर सकेगा, जो उस न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष के मामले की बाबत आवश्यक या उचित हो

46. कानूनी कृत्यों का प्रयोग करने वाले प्राधिकारियों आदि को नामित करने की शक्ति-पश्चिमी बंगाल सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसा प्राधिकारी, अधिकारी या व्यक्ति विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जो नियत दिन से अन्तरित राज्यक्षेत्रों के किसी भाग में उस दिन प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसे प्रयोक्तव्य कृत्यों का प्रयोग करने के लिए, जो उस अधिसूचना में उपवर्णित हो, समक्ष होगा और ऐसी विधि तद्नुसार प्रभावी होगी

47. विधिक कार्यवाहियां-जहां, नियत दिन के ठीक पूर्व, बिहार राज्य इस अधिनियम के अधीन पश्चिमी बंगाल राज्य को अन्तरित किसी सम्पत्ति, अधिकार या दायित्वों के बारे में किन्हीं विधिक कार्यवाहियों का पक्षकार है, वहां वह राज्य बिहार राज्य के स्थान पर, यथास्थिति, प्रतिस्थापित किया गया या उन कार्यवाहियों में पक्षकार के रूप में जोड़ा गया समझा जाएगा और कार्यवाहियां तद्नुसार चालू रखी जाएंगी

48. लंबित कार्यवाही का अन्तरण-(1) नियत दिन से ठीक पूर्व किसी न्यायालय (उच्च न्यायालय से भिन्न), अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी के समक्ष लंबित प्रत्येक कार्यवाही-

() किसी ऐसे क्षेत्र में, जो उस दिन बिहार के भीतर का हो, यदि वह कार्यवाही अन्तरित राज्यक्षेत्र के किसी भाग से अनन्यतः संबंधित हो तो पश्चिमी बंगाल से तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी को अन्तरित हो जाएगी ; और

() किसी ऐसे क्षेत्र में, जो उस दिन अन्तरित राज्यक्षेत्रों के भीतर आता है, यदि वह बिहार के भीतर रहने वाले राज्यक्षेत्रों के किसी भाग से अनन्यतः संबंधित कार्यवाही है, तो उस राज्य में तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी को अन्तरित हो जाएगी

(2) यदि यह प्रश्न उठता है कि क्या उपधारा (1) के अधीन कोई कार्यवाही अन्तरित की जानी चाहिए तो वह उस क्षेत्र की बाबत, जिसमें वह न्यायालय अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी, जिसमें या जिसके समक्ष ऐसी कार्यवाही नियत दिन को लंबित है, कृत्य कर रहा है, ऐसे क्षेत्र के बारे में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय को निर्देशित की जाएगी और उस उच्च न्यायालय का विनिश्चय अंतिम होगा

(3) इस आधार में,-

                () “कार्यवाही" के अन्तर्गत कोई वाद, मामला या अपील भी है ; और

                () राज्य मेंतत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी" से अभिप्रेत है-

(i) ऐसा न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी, जिसमें या जिसके समक्ष वह कार्यवाही, यदि वह नियत दिन के पश्चात् संस्थित की जाती तो रखी जाती, या

(ii) शंका की दशा में उस राज्य का ऐसा न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी जो उस राज्य की सरकार द्वारा नियत दिन के पश्चात् या बिहार राज्य द्वारा नियत दिन के पूर्व तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी के रूप में अवधारित किया जाए

49. कतिपय न्यायालयों में विधि-व्यवसाय करने का प्लीडरों का प्राधिकार-कोई व्यक्ति, जो नियत दिन से ठीक पूर्व अन्तरित राज्यक्षेत्रों में किन्हीं अधीनस्थ न्यायालय में विधि-व्यवसाय के हकदार प्लीडर के रूप में नामावलित है, उस दिन से छह मास की अवधि के लिए, इस बात के होते हुए भी कि उन न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उनका कोई भाग पश्चिमी बंगाल को अन्तरित कर दिया गया है, उन न्यायालयों में विधि-व्यवसाय करने का हकदार बना रहेगा

50. अन्य विधियों से असंगत उपबन्धों का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध, किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे

51. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई आती है, तो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, कोई भी ऐसा कार्य कर सकेगा, जो ऐसे उपबन्धों से असंगत हो तथा उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो

52. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी

 [(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

 

अनुसूची

(धारा 32 देखिए)

पेंशनों की बाबत दायित्व का प्रभाजन

1. पैरा 3 में वर्णित समायोजनों के अधीन रहते हुए, नियत दिन के पूर्व बिहार द्वारा अनुदत्त पेंशनें बिहार और पश्चिमी बंगाल का प्रत्येक राज्य अपने-अपने खजानों से देगा

2. उक्त समायोजनों के अधीन रहते हुए, बिहार के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले उन अधिकारियों की पेंशनों के बारे में दायित्व, जो नियत दिन के पूर्व निवृत्त होते हैं या सेवा-निवृत्ति पूर्व छुट्टी पर चले जाते हैं, किन्तु पेंशनों के लिए जिनके दावे उस दिन के ठीक पहले बकाया हैं, बिहार राज्य का दायित्व होगा

3. नियत दिन से प्रारंभ होने वाली और 31 मार्च, 1957 को समाप्त होने वाली कालावधि की बाबत तथा प्रत्येक पश्चात्वर्ती वित्तीय वर्ष की बाबत, पैरा 1 और 2 में निर्दिष्ट पेंशनों के बारे में किए गए कुल संदायों की संगणना की जाएगी; पेंशनों की बाबत बिहार के दायित्व के उस कुल का, बिहार और पश्चिमी बंगाल के बीच प्रभाजन, जनसंख्या के अनुपात में किया जाएगा और अपने द्वारा देय अंश से अधिक का संदाय करने वाले राज्य आधिक्य की रकम की प्रतिपूर्ति अन्य राज्य द्वारा की जाएगी

4. (1) बिहार के कार्यकलाप के संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व सेवा करने वाले और उस दिन या उसके पश्चात् निवृत्त होने वाले अधिकारी की पेंशन के बारे में दायित्व, पेंशन अनुदत्त करने वाले राज्य का दायित्व होगा; किन्तु किसी ऐसे अधिकारी की बिहार राज्य के कार्यकलाप के संबंध में सेवा के कारण माना जाने वाला पेंशन का प्रभाग, बिहार और पश्चिमी बंगाल के बीच जनसंख्या के अनुपात में, आंबंटित किया जाएगा और पेंशन अनुदत्त करने वाली सरकार, अन्य सरकार से इस दायित्व का अपना अंश प्राप्त करने की हकदार होगी

(2) यदि ऐसा कोई अधिकारी नियत दिन के पश्चात् कुछ अवधि के लिए बिहार के कार्यकलाप के संबंध में और कुछ समय के लिए पश्चिमी बंगाल के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करता रहा हो, तो पेंशन अनुदत्त करने वाली सरकार से भिन्न सरकार, जिसके द्वारा पेंशन अनुदत्त की गई है उस सरकार को ऐसी रकम की प्रतिपूर्ति करेगी जो नियत दिन के पश्चात् उसकी सेवा के कारण पेंशन के भाग का वही अनुपात हो जो प्रतिपूर्ति करने वाले राज्य के अधीन नियत दिन के पश्चात् की उसकी अर्हक सेवा का उस अधिकारी की उसकी पेंशन के प्रयोजन के लिए परिकलित नियत दिन के पश्चात् की कुल सेवा का हो

5. इस अनुसूची में पेंशन के प्रति निर्देश का अर्थ इस प्रकार लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत पेंशन के संराशिकृत प्रति मूल्य के निर्देश भी हैं

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