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प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 ( Securities Contracts (Regulation) Act, 1956 )


 

प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956

(1956 का अधिनियम संख्यांक 42)

[4 सितम्बर, 1956]

प्रतिभूतियों में व्यौहार के कारबार का विनियमन करके,  *** और उनसे

सम्बद्ध कतिपय अन्य विषयों के लिए उपबंध करके

प्रतिभूतियों में अवांछनीय संव्यवहारों

को रोकने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 है

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है

(3) यह उस तारीख  को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,-

                () “संविदा" से प्रतिभूति के क्रय या विक्रय के लिए या उससे संबंधित संविदा अभिप्रेत है;

 [(कक) “निगमीकरण" से ऐसे मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज का, जो व्यष्टियों का निकाय या सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है, ऐसे किसी अन्य स्टॉक एक्सचेंज द्वारा उत्तराधिकार अभिप्रेत है जो ऐसे व्यष्टियों या सोसाइटी द्वारा चलाए जा रहे प्रतिभूतियों के क्रय, विक्रय या व्यवहार के कारबार में सहायता करने, उसको विनियमित करने या नियंत्रित करने के प्रयोजन के लिए निगमित कंपनी है;

(कख) “अपारस्परिक समन्वय" से किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के सदस्यों के व्यापार संबंधी अधिकारों से, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा अनुमोदित स्कीम के अनुसार, स्वामित्व और प्रबंध का पृथक्करण अभिप्रेत है;]

 [ [(कग;] “व्युत्पन्न" के अंतर्गत निम्नलिखित हैं,-

() ऐसी प्रतिभूति, जो किसी ऋण-लिखत, शेयर, उधार, चाहे प्रतिभूति हो या अप्रतिभूत, जोखिम लिखत या अंतर के लिए संविदा से व्युत्पन्न हो या प्रतिभूति का कोई अन्य प्ररूप;

() ऐसी संविदा जो अपना मूल्य अंतर्निहित प्रतिभूतियों की कीमतों या कीमतों के सूचकांक से व्युत्पन्न करती है;]

 [() वस्तु व्युत्पन्न; और

() ऐसी अन्य लिखतें, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा व्युत्पन्न घोषित की जाएं;]

() “सरकारी प्रतिभूति" से ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो लोक ऋण लेने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् सृजित और निर्गमित की गई है और जो लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 के खंड (2) में विनिर्दिष्ट रूपों में से किसी रूप की है;

7[(खख) “माल" से अनुयोज्य दावों, धन और प्रतिभूतियों से भिन्न हर प्रकार की जंगम सम्पत्ति अभिप्रेत है;

(खग) “वस्तु व्युत्पन्न" से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-

(i) ऐसे माल के परिदान की संविदा, जो केंद्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचित की जाए और जो कोई तुरंत परिदान संविदा नहीं है; या

(ii) अंतरों की संविदा, जो अपना मूल्य ऐसे अंतर्निहित माल की कीमतों या कीमतों के अक्षांकों या क्रियाकलापों, सेवाओं, अधिकारों, हितों और दशाओं, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड के परामर्श से अधिसूचित किए जाएं, से व्युत्पन्न करती है, किंतु इसके अंतर्गत खंड (कग) के उपखंड () और () में यथानिर्दिष्ट प्रतिभूतियां   नहीं हैं;]

                                () “सदस्य" से किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का सदस्य अभिप्रेत है;

 [(गक) “अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा" से ऐसी विनिर्दिष्ट परिदान संविदा अभिप्रेत है, जिसके अधीन या किसी परिदान आदेश, रेल प्राप्ति, लदान बिल या भांडागार प्राप्ति या उससे संबंधित किन्हीं अन्य हकदारी दस्तावेजों के अधीन अधिकार या दायित्व अंतरणीय नहीं होते;]

() “प्रतिभूति विकल्प करार" से भविष्य में प्रतिभूतियों के क्रय या विक्रय करने के अधिकार के, या क्रय और विक्रय करने के अधिकार के क्रय या विक्रय के लिए संविदा अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत प्रतिभूतियों में तेजी, मन्दी, तेजी-मंदी, गल्ली, पुट, कॉल या पुट एण्ड कॉल हैं;

() “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

1[(ङक) “तुरंत परिदान संविदा" से ऐसी संविदा अभिप्रेत है, जिसमें या तो तुरंत या संविदा की तारीख के पश्चात्, ग्यारह दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के भीतर और ऐसी शर्तों के अधीन, जो माल के संबंध में केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और माल के परिदान तथा उसकी कीमत के संदाय के लिए उपबंध है और ऐसी संविदा के अधीन अवधि उसके पक्षकारों की पारस्परिक सम्मति से या अन्यथा नहीं बढ़ाई जा सकती है :

परंतु यदि ऐसी संविदा का पालन या तो पूर्णतः या भागतः,-

(I) किसी ऐसी धनराशि, जो संविदा दर और निपटान दर या समाशोधन दर या किसी मुजराई संविदा की दर के बीच के अंतर के बराबर हो वसूली द्वारा; अथवा

(II) किन्हीं अन्य साधनों, जो भी हों, द्वारा,

किया गया है और जिसके परिणामस्वरूप संविदा के अन्तर्गत आने वाले माल के वास्तविक निविदान या उसकी पूरी कीमत के संदाय से छूट दे दी गई है तो ऐसी संविदा तुरंत परिदान संविदा नहीं समझी जाएगी;]

() “मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज" से ऐसा स्टाक एक्सचेंज अभिप्रेत है जो धारा 4 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा तत्समय मान्यताप्राप्त है;

() “नियम" के अन्तर्गत साधारणतया किसी स्टाक एक्सचेंज के गठन और प्रबन्ध से सम्बन्धित नियमों के प्रति निर्देश से किसी ऐसे स्टाक एक्सचेंज की दशा में, जो कोई निगमित संगम है, उसके संगम-ज्ञापन और संगम-अनुच्छेद हैं;

 [(छक) “स्कीम" से किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के निगमीकरण या अपारस्परिक समन्वय के लिए स्कीम अभिप्रेत है जिसमें, निम्नलिखित के लिए उपबंध हैं-

(i) विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए शेयरों का निर्गमन और किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के सदस्यों के सदस्यता कार्डों के स्थान पर व्यापार संबंधी अधिकारों का उपबंध;

(ii) मतदान अधिकारों पर निर्बंधन;

(iii) मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज की संपत्ति, कारबार, आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों, मान्यताओं, संविदाओं का अंतरण, मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज द्वारा या उसके विरुद्ध विधिक कार्यवाहियां, चाहे वे मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के नाम में हों या किसी न्यासी के नाम में या अन्यथा हों और मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज को या उसके द्वारा दी गई कोई अनुज्ञा;

(iv) मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के कर्मचारियों का किसी अन्य मान्यताप्रापत स्टॉक एक्सचेंज को अंतरण;

(v) मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के, यथास्थिति, निगमीकरण या अपारस्परिक समन्वय के प्रयोजन के लिए या उसके संबंध में अपेक्षित कोई अन्य विषय;]

 [ (छख) “प्रतिभूति अपील अधिकरण" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रतिभूति अपील अधिकरण अभिप्रेत है;]

() “प्रतिभूति" के अन्तर्गत,-

(i) किसी निगमित कम्पनी या अन्य निगमित निकाय में या उसके शेयर, स्िक्रप, स्टाक, बन्धपत्र, डिबेंचर, डिबेंचर स्टाक या इसी प्रकार की अन्य विपण्य प्रतिभूतियां हैं;

                 [(iक) व्युत्पन्न है;

(iख) ऐसी यूनिटें या कोई अन्य लिखत हैं जो किसी सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा ऐसी स्कीमों के विनिधानकर्ताओं को जारी की गई हैं;]

 [(iग) वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54) की धारा 2 के खंड (यछ) में यथापरिभाषित रसीदें;]

 [(iघ) किसी पारस्परिक निधि स्कीम के अधीन विनिधानकर्ताओं को जारी की गई यूनिटें या कोई अन्य ऐसी लिखत;]

 [(iड) ऐसे किसी निर्गमनकर्ता द्वारा, जो विशेष प्रयोजन वाला सुभिन्न अस्तित्व है, जिसके पास ऐसे अस्तित्व को समनुदेशित बंधक ऋण सहित कोई ऋण या प्राप्य राशियां हैं, और जो बंधक ऋण सहित, यथास्थिति, ऐसे ऋण या प्राप्य राशियों में से विनिधानकर्ता के फायदाप्रद हित को अभिस्वीकार करता है, किसी विनिधानकर्ता को जारी किया गया कोई प्रमाणपत्र या लिखत है (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो);]

 [स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि प्रतिभूतियों" में ऐसी कोई यूनिटबद्ध बीमा पालिसी या स्िक्रप या ऐसी कोई लिखत या यूनिट, चाहे जिस नाम से ज्ञात हो, सम्मिलित नहीं होगी, जिसमें व्यक्तियों के जीवन या ऐसे व्यक्तियों द्वारा विनिधान के संबंध में संयुक्त फायदा जोखिम के लिए उपबंध है और जिसे बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (9) में निर्दिष्ट किसी बीमाकर्ता द्वारा जारी किया गया है;]

                                                 [(ii) सरकारी प्रतिभूतियां हैं;

(iiक) ऐसी अन्य लिखतें हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रतिभूति घोषित की जाएं; औरट

(iii) प्रतिभूतियों में अधिकार या हित हैं;

 [(जक) “विनिर्दिष्ट माल संविदा" से ऐसी वस्तु व्युत्पन्नी अभिप्रेत है जिसमें भविष्य की किसी विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान विनिर्दिष्ट क्वालिटी या प्रकार के माल के ऐसी कीमत पर जो संविदा द्वारा नियत की गई है या संविदा द्वारा करार पाई गई रीति से नियत की जाने वाली है वास्तविक परिदान के लिए उपबन्ध है और जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों के नाम उल्लिखित हैं;]

 [() “हाजिर संविदा" से ऐसी संविदा अभिप्रेत है जिसमें-

() संविदा की तारीख के ही दिन या उसके अगले दिन, प्रतिभूतियों के वास्तविक परिदान और उनकी कीमत के संदाय के लिए उपबंध  है, यदि संविदा के पक्षकार एक ही नगर या स्थान में निवास नहीं करते हैं तो पूर्वोक्त अवधि की संगणना करने में, प्रतिभूतियों के भेजने में या उनके लिए डाक द्वारा धन भेजने में लगी वास्तविक अवधि अपवर्जित की जाएगी;

() किसी फायदाग्राही स्वामी के खाते से दूसरे फायदाग्राही स्वामी के खाते में निक्षेपागार द्वारा प्रतिभूतियों के अंतरण के लिए उपबंध है, जब ऐसी प्रतिभूतियों के विषय में किसी निक्षेपागार द्वारा व्यवहार किया जाता है ;]

 

 [() “स्टॉक एक्सचेंज" से प्रतिभूतियों में क्रय करने, विक्रय करने या व्यौहार करने के कारबार में सहायता करने, उसे विनियमित करने या नियंत्रित करने के प्रयोजन के लिए-

() धारा 4 और धारा 4 के अधीन निगमीकरण और अपारस्परिक समन्वय से पूर्व गठित व्यष्टियों का कोई निकाय, चाहे वह निगमिमत हो या नहीं; या

() कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन निगमित कोई निगम निकाय, चाहे वह निगमीकरण और अपारस्परिक समन्वय की स्कीम के अधीनहो या अन्यथा, अभिप्रेत है;]

 [() “अंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा" से ऐसी विनिर्दिष्ट माल संविदा अभिप्रेत है जो अनंतरणीय विनिर्दिष्ट परिदान संविदा नहीं है, और जो उसकी अंतरणीयता के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन है, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ]

                 [2. कतिपय शब्दों और पदों का निर्वचन-उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और इस अधिनियम में परिभाषित नहीं हैं किन्तु कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) या निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) में परिभाषित हैं, के वही अर्थ होंगे जो उन अधिनियमों में हैं ]

मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज

                3. स्टाक एक्सचेंजों की मान्यता के लिए आवेदन-(1) कोई स्टाक एक्सचेंज, जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त करने का इच्छुक है, केन्द्रीय सरकार को विहित रीति से आवेदन कर सकता है

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्ये आवेदन में ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं और उसके साथ संविदाओं के विनियमन और नियंत्रण से सम्बद्ध स्टाक एक्सचेंज की उपविधियों की एक प्रति होगी और साथ ही साधारणतया स्टाक एक्सचेंज के गठन से और विशिष्टतया निम्नलिखित से संबंधित नियमों की एक प्रति होगी,-

() ऐसे स्टाक एक्सचेंज का शासी निकाय, उसका गठन और प्रबंध की शक्तियां और वह रीति जिससे उसका कारबार चलाया जाना है;

() स्टाक एक्सचेंज के पदाधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य;

() स्टाक एक्सचेंज में सदस्यों के विभिन्न वर्गों का प्रवेश, सदस्यता की अर्हताएं और सदस्यों का स्टाक एक्सचेंज से अपवर्जन, निलम्बन और निष्कासन तथा उसमें पुनः प्रवेश;

() स्टाक एक्सचेंज के सदस्यों के रूप में भागीदारियों के रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया, उन दशाओं में जिनमें नियम ऐसी सदस्यता के लिए उपबन्ध करते हैं, और प्राधिकृत प्रतिनिधियों और लिपिकों का नामनिर्देशन और नियुक्ति

4. स्टाक एक्सचेंजों को मान्यता का दिया जाना-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का, ऐसी जांच के पश्चात् जो इस निमित्त आवश्यक हो तथा ऐसी और जानकारी प्राप्त करने के पश्चात्, यदि कोई हो, जिसकी वह अपेक्षा करे, यह समाधान हो जाता है कि,-

() रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने वाले स्टाक एक्सचेंज के नियम और उपविधियां ऐसी शर्तों के अनुरूप हैं जो खरा व्यौहार सुनिश्चित करने की और विनिधानकर्ताओं के संरक्षण की दृष्टि से विहित की जाएं;

() स्टाक एक्सचेंज ऐसी अन्य शर्तों का (जिनके अन्तर्गत सदस्यों की संख्या के बारे में शर्तें भी हैं) अनुपालन करने के लिए रजामन्द हैं जिन्हें केन्द्रीय सरकार, स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय से परामर्श के पश्चात् और स्टाक एक्सचेंज के व्यवहार क्षेत्र को और उसकी प्रतिष्ठा को और ऐसी प्रतिभूतियों की प्रकृति को जिनमें उसके द्वारा व्यौहार किया जाता है, ध्यान में रखते हुए, इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए अधिरोपित करे; और

() यह व्यापार के हित में और लोक हित में होगा कि उस स्टाक एक्सचेंज को मान्यता दी जाए,

                तो वह स्टाक एक्सचेंज को, ऐसी शर्तों के अधीन जो उस पर पूर्वोक्त रूप में अधिरोपित की जाएं और ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, मान्यता दे सकती है

                (2) उपधारा (1) के खण्ड () के अधीन स्टाक एक्सचेंजों को मान्यता देने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाने वाली शर्तों में, अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित से संबंधित शर्तें हो सकती हैं, अर्थात् :-

(i) स्टाक एक्सचेंजों की सदस्यता के लिए अर्हताएं;

(ii) वह रीति जिससे सदस्यों के बीच संविदाएं की जाएंगी और प्रवर्तित की जाएंगी;

(iii) प्रत्येक स्टाक एक्सचेंज में केन्द्रीय सरकार का तीन से अनधिक इतने व्यक्तियों द्वारा प्रतिनिधित्व जितने केन्द्रीय सरकार इस निमित्त नामनिर्दिष्ट करे; और

(iv) सदस्यों के लेखाओं का रखा जाना और जब भी केन्द्रीय सरकार द्वारा संपरीक्षा की अपेक्षा की जाए उनकी चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा संपरीक्षा

(3) इस धारा के अधीन किसी स्टॉक एक्सचेंज को दी गई मान्यता भारत के राजपत्र में और उस राज्य के राजपत्र में भी प्रकाशित की जाएगी जिसमें उस स्टॉक एक्सचेंज का प्रधान कार्यालय स्थित है और ऐसी मान्यता भारत के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होगी

(4) मान्यताप्राप्त करने के लिए दिया गया कोई आवेदन सम्पृक्त स्टाक एक्सचेंज को उस मामले में सुनवाई का अवसर दिए बिना नामंजूर नहीं किया जाएगा; ऐसी नामंजूरी के लिए जो कारण हैं वे स्टॉक एक्सचेंज को लिखित रूप में संसूचित किए जाएंगे

(5) किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के, धारा 3 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी से संबंधित कोई नियम केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के बिना संशोधित नहीं किए जाएंगे

                 [4. स्टॉक एक्सचेंजों का निगमीकरण और अपारस्परिक समन्वय-नियत तारीख से ही, सभी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज (यदि वे नियत तारीख से पूर्व निगमीकृत और अपारस्परिक रूप से समन्वित हो नहीं हैं, तोट धारा 4 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार, निगमीकृत और अपास्परिक रूप से समन्वित हो जाएंगे :

परंतु भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि कोई मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज नियत तारीख को या उसके पश्चात् निगमीकृत और अपारस्परिक रूप से समन्वित होने से पर्याप्त कारण से निवारित हुआ था तो, उस स्टॉक एक्सचेंज के संबंध में कोई अन्य नियत तारीख विनिर्दिष्ट कर सकेगा और ऐसा मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज ऐसी नियत तारीख से पूर्व उस रूप में बना रहेगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “नियत तारीख" से वह तारीख अभिप्रेत है, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और भिन्न-भिन्न स्टॉक एक्सचेंजों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी

4. निगमीकरण और अपास्परिक समन्वय के लिए प्रक्रिया-(1) धारा 4 में निर्दिष्ट सभी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा यथाविनिर्दिष्ट समय के भीतर, उसके अनुमोदन के लिए निगमीकरण और अपारस्परिक समन्वय की एक स्कीम प्रस्तुत करेंगे :

परंतु भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के नाम को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जो पहले से ही निगमीकृत या अपारस्परिक रूप से समन्वित रहा है तथा ऐसे स्टॉक एक्सचेंज से इस धारा के अधीन स्कीम प्रस्तुत करना अपेक्षित नहीं होगा

(2) भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड, उपधारा (1) में निर्दिष्ट स्कीम की प्राप्ति पर, ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो इस निमित्त आवश्यक हो और ऐसी और जानकारी, यदि कोई हो, जिसकी वह अपेक्षा करे, अभिप्राप्त करने के पश्चात् तथा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना व्यापार के हित में और लोकहित में भी होगा, तो उपांतर सहित या उपांतर के बिना, स्कीम का अनुमोदन कर सकेगा

(3) उपधारा (2) के अधीन किसी स्कीम का भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा अनुमोदन नहीं किया जाएगा, यदि विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए शेयरों का पुरोधरण या किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के सदस्यों के सदस्यता कार्ड के स्थान पर व्यापार अधिकारों का उपबंध या सदस्यों को लाभांशों का संदाय उस स्टॉक एक्सचेंज की किन्हीं आरक्षितियों या आस्तियों से करने का प्रस्ताव किया गया है

(4) जहां स्कीम का अनुमोदन उपधारा (2) के अधीन किया जाता है, वहां इस प्रकार अनुमोदित स्कीम तत्काल-

                () भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा राजपत्र में;

() मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज द्वारा भारत में परिचालित ऐसे दो दैनिक समाचारपत्रों में, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं,

प्रकाशित की जाएगी और ऐसे प्रकाशन पर, इस अधिनियम में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या तत्समय प्रवृत्त किसी करार, अधिनिर्णय, निर्णय, डिक्री या अन्य लिखत में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, ऐसी स्कीम प्रभावी होगी और मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के सभी सदस्यों, लेनदारों, निक्षेपकर्ताओं और कर्मचारियों सहित सभी व्यक्तियों और प्राधिकारियों और ऐसे सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी होगी, जिनके पास मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या उसके सदस्यों के साथ, उनके विरुद्ध, उनके ऊपर, उनके प्रति या उनके संबंध में कोई संविदा, अधिकार, शक्ति, बाध्यता या दायित्व हैं

                (5) जहां भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (2) के अधीन स्कीम का अनुमोदन करना व्यापार के साथ ही लोकहित में भी नहीं होगा तो वह आदेश द्वारा स्कीम को नामंजूर कर सकेगा और ऐसी नामंजूरी का आदेश उसके द्वारा राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा :

परंतु भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड स्कीम को नामंजूर करने वाला आदेश पारित करने से पूर्व, सम्बद्ध सभी व्यक्तियों और सम्बद्ध मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज को, सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देगा

(6) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, उपधारा (2) के अधीन स्कीम का अनुमोदन करते समय, लिखित आदेश द्वारा,-

                () ऐसे शेयरधारकों के, जो मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों के स्टॉक दलाल भी हैं, मतदान अधिकारों को;

() मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के शेयरधारकों या स्टॉक दलालों के, स्टॉक एक्सचेंज के शासी बोर्ड में प्रतिनिधियों को नियुक्त करने के अधिकार को;

() मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के स्टॉक दलालों के, मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के शासी बोर्ड में नियुक्त किए जाने वाले प्रतिनिधियों की अधिकतम संख्या को, जो शासी बोर्ड की कुल संख्या के एक-चौथाई से अधिक नहीं होगी,

निर्बंधित कर सकेगा

(7) उपधारा (6) के अधीन किया गया आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा और उसके प्रकाशन पर, ऐसा आदेश, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, पूर्ण प्रभाव रखेगा

(8) ऐसा प्रत्येक मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज, जिसकी बाबत निगमीकरण या अपारस्परिक समन्वय के लिए स्कीम का उपधारा (2) के अधीन अनुमोदन किया गया है या तो जनता को साधारण शेयरों के नए पुरोधरण द्वारा या ऐसी किसी अन्य रीति से, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, यह सुनिश्िचत करेगा कि उपधारा (7) के अधीन आदेश के प्रकाशन की तारीख से बारह मास के भीतर उसकी साधारण शेयर पूंजी का कम से कम इक्यावन प्रतिशत व्यापार अधिकार रखने वाले शेयरधारकों से भिन्न जनता द्वारा धारित है :

परंतु भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, उसे दर्शित किए गए पर्याप्त कारण पर और लोकहित में, उक्त अवधि को बारह मास की और अवधि के लिए बढ़ा सकेगा ]

5. मान्यता का वापस लिया जाना- [(1;] यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किसी स्टॉक एक्सचेंज को दी गई मान्यता, व्यापार के हित में या लोक हित में, वापस ले ली जानी चाहिए, तो केन्द्रीय सरकार उस स्टॉक एक्सचेंज के शासी निकाय पर यह लिखित सूचना तामील कर सकती है कि केन्द्रीय सरकार उस सूचना में कथित कारणों से मान्यता वापस लेने का विचार कर रही है, और उस मामले में शासी निकाय को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस स्टॉक एक्सचेंज को दी गई मान्यता वापस ले सकती है :

परन्तु ऐसी कोई वापसी, अधिसूचना की तारीख से पहले की गई किसी संविदा की विधिमान्यता पर प्रभाव नहीं डालेगी, और केन्द्रीय सरकार, स्टॉक एक्सचेंज से परामर्श के पश्चात् वापसी की अधिसूचना में या इसी प्रकार प्रकाशित किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना में, उस तारीख को विद्यमान संविदाओं के सम्यक् पालन के लिए ऐसा उपबंध कर सकती है जो वह ठीक समझे

  [(2) जहां मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज को निगमीकृत नहीं किया गया है या उसका पारस्परिक समन्वय नहीं किया गया है या वह उसके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर धारा 4 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट स्कीम प्रस्तुत करने में असफल रहता है या स्कीम धारा 4 की उपधारा (5) के अधीन भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा नामंजूर कर दी गई है, वहां धारा 4 के अधीन ऐसे स्टॉक एक्सचेंज को अनुदत्त मान्यता इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, वापस ली गई समझी जाएगी और केन्द्रीय सरकार, मान्यता की ऐसी वापसी को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रकाशित करेगी :

परंतु ऐसी वापसी, अधिसूचना की तारीख से पूर्व की गई किसी संविदा की विधिमान्यता को प्रभावित नहीं करेगी और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, स्टॉक एक्सचेंज के साथ परामर्श करने के पश्चात्, धारा 4 की उपधारा (5) के अधीन राजपत्र में प्रकाशित स्कीम को नामंजूर करने वाले आदेश में ऐसे उपबंध कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ]

6. नियतकालिक विवरणियां मांगने की या जांच किए जाने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) प्रत्येक मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज  [भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] को अपने कार्यकलापों के बारे में ऐसी नियतकालिक विवरणियां देगा जो विहित की जाएं

(2) प्रत्येक मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज और उसका प्रत्येक सदस्य पांच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधियों के लिए जो केन्द्रीय सरकार, सम्पृक्त स्टॉक एक्सचेंज से परामर्श के पश्चात् व्यापार के हित में या लोक हित में विहित करे, ऐसी लेखा बहियां और अन्य दस्तावेजें रखेगा और उनका परिरक्षण करेगा और ऐसी लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों का सभी उचित समयों पर  [भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] द्वारा निरीक्षण किया जा सकेगा

(3) उपधारा (1) और (2) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्डट का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना व्यापार के हित में या लोकहित में है, तो वह, लिखित आदेश द्वारा,-

() किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या उसके किसी सदस्य से, स्टॉक एक्सचेंज के या स्टॉक एक्सचेंज के संबंध में उस सदस्य के कार्यकलापों के बारे में ऐसी जानकारी या स्पष्टीकरण, जिसकी 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] द्वारा अपेक्षा की जाए, लिखित रूप में देने की अपेक्षा कर सकता है; या

() किसी स्टॉक एक्सचेंज के शासी निकाय के कार्यकलापों के या स्टॉक एक्सचेंज के संबंध में स्टॉक एक्सचेंज के किसी सदस्य के कार्यकलापों के बारे में विहित रीति से जांच करने के लिए और ऐसी जांच के परिणाम की रिपोर्ट              1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] को ऐसे समय के भीतर, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, देने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है या, स्टॉक एक्सचेंज के किसी सदस्य के कार्यकलापों के बारे में किसी जांच की दशा में, शासी निकाय को जांच करने और अपनी रिपोर्ट 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] को देने के लिए निदेश                दे सकता है

                (4) यदि किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के कार्यकलापों के या स्टॉक एक्सचेंज के संबंध में उसके किसी सदस्य के कार्यकलापों के बारे में उपधारा (3) के अधीन कोई जांच प्रारम्भ कर दी जाती है तो,-

                                () ऐसे स्टॉक एक्सचेंज का प्रत्येक निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी;

                                () ऐसे स्टॉक एक्सचेंज का प्रत्येक सदस्य;

() यदि स्टॉक एक्सचेंज का सदस्य कोई फर्म है, तो उस फर्म का प्रत्येक भागीदार, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी; और

() प्रत्येक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय जिसने कारबार के दौरान खंड (), () और () में उल्लिखित व्यक्तियों में से किसी के साथ चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से व्यौहार किया है,

जांच करने वाले प्राधिकारी के समक्ष ऐसी जांच की विषय-वस्तु से संबंधित या उससे संबद्ध सभी ऐसी लेखा बहियां और अन्य दस्तावेजें जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति में हैं पेश करने के लिए और प्राधिकारियों को उससे सम्बन्धित कोई ऐसा कथन या जानकारी, जिसकी उससे अपेक्षा की जाए, ऐसे समय के भीतर जो विनिर्दिष्ट किया जाए, देने के लिए आबद्ध होगा

7. स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा केन्द्रीय सरकार को वार्षिक रिपोर्ट का दिया जाना-प्रत्येक मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज वार्षिक रिपोर्ट की एक प्रति केन्द्रीय सरकार को देगा और उस वार्षिक रिपोर्ट में ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं

 [7. मतदान के अधिकारों, आदि को निर्बंधित करने के बारे में नियम बनाने की मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज                         की शक्ति-(1) मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध करने के लिए नियम बना सकता है या अपने द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों में संशोधन कर सकता है, अर्थात् :-

() किसी बैठक में स्टॉक एक्सचेंज के समक्ष रखे गए किसी विषय की बाबत मतदान के अधिकारों का केवल सदस्यों तक निर्बन्धन;

() किसी बैठक में स्टॉक एक्सचेंज के समक्ष रखे गए किसी विषय की बाबत मतदान के अधिकारों का इस प्रकार विनियमन जिससे कि प्रत्येक सदस्य को स्टॉक एक्सचेंज की साधारण समादत्त पूंजी में उसके शेयर को विचार में लाए बिना, केवल एक मत देने का हक हो;

() सदस्य के किसी अन्य व्यक्ति को स्टॉक एक्सचेंज की बैठक में उपस्थित होने और मत देने के लिए अपना परोक्षी नियुक्त करने के अधिकार पर निर्बन्धन;

() ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक विषय जो खंड (), () और () में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हों

                (2) किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज की उपधारा (1) के खंड () से () तक में निर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में बनाए गए या संशोधित किए गए नियमों का कोई प्रभाव नहीं होगा जब तक कि वे केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित कर दिए जाएं और उस सरकार द्वारा राजपत्र में प्रकाशित कर दिए जाएं और इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियमों का अनुमोदन करने में केन्द्रीय सरकार उनमें ऐसे उपांतर कर सकती है जो वह ठीक समझे और ऐसे प्रकाशन पर, केन्द्रीय सरकार द्वारा यथा अनुमोदित नियम, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, विधिमान्यतः बनाए गए समझे जाएंगे ]

8. नियम बनाए जाने का निदेश देने की या नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) जहां, साधारणतया स्टॉक एक्सचेंजों के शासी निकायों से या विशिष्टतया किसी स्टॉक एक्सचेंज के शासी निकाय से परामर्श के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, वहां वह ऐसा करने के कारणों के कथन सहित लिखित आदेश द्वारा, यथास्थिति, साधारणतया मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों को या विशिष्टतया किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज को, ऐसे आदेश की तारीख से   [दो मास] की अवधि के भीतर धारा 3 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं विषयों की बाबत नियम बनाने का या पहले से बनाए गए नियमों को संशोधित करने का निदेश दे सकती है

(2) यदि कोई मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज उपधारा (1) के अधीन दिए गए आदेश का उसमें विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अनुपालन करने में असफल रहता है या उसकी उपेक्षा करता है, तो केन्द्रीय सरकार, या तो आदेश में प्रस्थापित प्ररूप में या उसमें ऐसे उपांतर करके जो स्टॉक एक्सचेंज और केन्द्रीय सरकार के बीच करार पाए जाएं, उस मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के लिए नियम बना सकती है या उसके द्वारा बनाए गए नियमों को संशोधित कर सकती है

(3) जहां इस धारा के अनुसरण में कोई नियम बनाए गए हैं या संशोधित किए गए हैं, वहां इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियम भारत के राजपत्र में और उस राज्य या उन राज्यों के राजपत्र या राजपत्रों में भी प्रकाशित किए जाएंगे जिनमें मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या स्टॉक एक्सचेंजों के प्रधान कार्यालय स्थित हैं, और भारत के राजपत्र में उनके प्रकाशन पर, इस प्रकार बनाए गए या संशोधित किए गए नियम कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो वे, यथास्थिति, मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा बनाए गए हैं या संशोधित किए गए हैं

 [8. समाशोधन निगम-(1) कोई मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से, किसी समाशोधन गृह के कर्तव्यों और कृत्यों का, ऐसे समाशोधन निगम को, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन निगमित एक कंपनी है, निम्नलिखित प्रयोजन के लिए अंतरण कर सकेगा,-

                () संविदाओं और उनके अधीन मतभेदों का कालिक निपटारा;

() प्रतिभूतियों का परिदान और उनके लिए संदाय;

() कोई अन्य विषय, जो ऐसे अंरतण के आनुषंगिक हो या उससे संसक्त हो

(2) प्रत्येक समाशोधन निगम किसी समाशोधन गृह के कर्तव्यों और कृत्यों को उपधारा (1) में निर्दिष्ट समाशोधन निगम को अंतरण करने के प्रयोजन के लिए, उपविधियां बनाएगा और उन्हें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को उसके अनुमोदन के लिए प्रस्तुत करेगा

(3) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, यह समाधान हो जाने पर कि किसी समाशोधन गृह के कर्तव्यों और कृत्यों का समाशोधन निगम को अंतरण व्यापार के हित में और लोकहित में भी है, उपधारा (2) के अधीन उसे प्रस्तुत की गई उपविधियों का अनुमोदन अनुदत्त कर सकेगा और उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी समाशोधन गृह के कर्तव्यों और कृत्यों को समाशोधन निगम को अंतरित किए जाने का अनुमोदन कर सकेगा

(4) धारा 4, धारा 5, धारा 6, धारा 7, धारा 8, धारा 9, धारा 10, धारा 11, और धारा 12 के उपबंध, जहां तक हो सकें, उपधारा (1) में निर्दिष्ट समाशोधन निगम को उसी प्रकार लागू होंगे, जैसे वे मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के संबंध में लागू होते हैं ]

9. उपविधियां बनाने की मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों की शक्ति-(1)  [भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्डट के पूर्व अनुमोदन के अध्यधीन रहते हुए, कोई मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज संविदाओं के विनियमन और नियंत्रण के लिए उपविधियां बना सकता है

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी उपविधियां निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकती हैं, अर्थात् :-

                () बाजारों का खुलना और बन्द होना और व्यापार के समय का विनियमन;

() संविदाओं और उनके अधीन अन्तरों के कालिक निपटान के लिए, प्रतिभूतियों के परिदान और उनके भुगतान के लिए, परिदान आदेश पारित करने के लिए समाशोधन गृह और उस समाशोधन गृह का विनियमन और अनुरक्षण;

() समाशोधन गृह द्वारा प्रत्येक कालिक निपटान के पश्चात्, यथाशक्य शीघ्र, निम्नलिखित सभी या किन्हीं विशिष्टियों का 3[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] को प्रस्तुत किया जाना जैसी 3[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] द्वारा, समय-समय पर, अपेक्षा की जाए, अर्थात् :-

(i) प्रत्येक प्रवर्ग की ऐसी प्रतिभूति की कुल संख्या जिसकी एक निपटान की अवधि से दूसरी की मिति बढ़ाई गई है;

(ii) प्रत्येक प्रवर्ग की ऐसी प्रतिभूति की कुल संख्या जिसके बारे में संविदाओं का प्रत्येक निपटान की अवधि के दौरान से ले देकर हिसाब चुकता कर लिया गया है;

(iii) प्रत्येक प्रवर्ग की ऐसी प्रतिभूति की कुल संख्या जो प्रत्येक समाशोधन के अवसर पर वास्तव में परिदत्त कर दी गई है;

() इस निमित्त  [भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] द्वारा जारी किए गए निदेशों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, खण्ड () के अधीन 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] को प्रस्तुत की गई सभी या किन्हीं विशिष्टियों का समाशोधन गृह द्वारा प्रकाशन;

() निरंक अन्तरणों का विनियमन और प्रतिषेध;

() उन संविदाओं की संख्या और वर्ग जिनकी बाबत समाशोधन गृह के माध्यम से निपटान किए जाएंगे या अन्तरों का भुगतान किया जाएगा;

() बदला का या मिति बढ़ाने की सुविधाओं का विनियमन या प्रतिषेध;

() निपटान के लिए दिनों का नियत किया जाना, उनमें परिवर्तन किया जाना या उन्हें मुल्तवी किया जाना;

() बाजार भाव आधारित और घोषित करना, जिनके अन्तर्गत प्रतिभूतियों के लिए खुलने के, बन्द होने के, सबसे ऊंचे और सबसे नीचे भाव भी हैं;

() संविदाओं के निबन्धन, शर्तें और अनुषंग जिनके अन्तर्गत मार्जिन अपेक्षाओं का, यदि कोई हों, और उनसे सम्बन्धित शर्तों का, और लिखित संविदाओं के प्ररूप का विहित किया जाना भी है;

() संविदाओं के किए जाने, उनके पालन, विखण्डन और पर्यवसान का विनियमन जिनके अन्तर्गत सदस्यों के बीच, या किसी सदस्य और उसके व्यौहारी के बीच, या किसी सदस्य और किसी ऐसे व्यक्ति के बीच जो सदस्य नहीं हैं; संविदाएं और किसी क्रेता या विक्रेता या मध्यवर्ती के व्यतिक्रम या दिवाले के परिणाम, किसी क्रेता या विक्रेता द्वारा किसी भंग या लोप के परिणाम, और ऐसे सदस्यों के, जो ऐसी संविदाओं के पक्षकार नहीं हैं, उत्तरदायित्व हैं;

() तरवनी कारबार का विनियमन जिसके अन्तर्गत उस पर मर्यादाओं का लगाया जाना भी है;

() स्टाक एक्सचेंज में प्रतिभूतियों का सूचीबद्ध किया जाना, व्यौहार के प्रयोजन के लिए किसी प्रतिभूति का सम्मिलित किया जाना और किन्हीं ऐसी प्रतिभूतियों का निलम्बन या उनकी वापसी और किन्हीं विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों के व्यापार का निलम्बन या प्रतिषेध;

() दावों या विवादों के निपटान की रीति और प्रक्रिया, जिनके अन्तर्गत उनका माध्यस्थम् द्वारा निपटान भी है;

() फीस, जुर्माने, और शास्तियों का उद्ग्रहण और वसूली;

() किसी भी हैसियत में संविदाओं के पक्षकारों के बीच व्यापारक्रम का विनियमन;

() दलाली और अन्य प्रभारों का मान नियत करना;

() सौदों का किया जाना, उनका मिलान, निपटान और उनका बन्द किया जाना;

() व्यापार में उद्भूत होने वाली अपात-स्थितियां, चाहे पूल या संबद्ध कार्यवाही या बाजार मुठ्ठी में करने के परिणामस्वरूप हों या अन्यथा, और ऐसी आपात-स्थितियों में शक्तियों का प्रयोग जिनके अन्तर्गत प्रतिभूतियों की अधिकतम और न्यूनतम कीमतें नियत करने की शक्ति भी है;

() सदस्यों द्वारा अपने खाते किए जाने वाले व्यौहारों का विनियमन;

() स्टाक के आढ़तियों और दलालों के कृत्यों का पृथक्करण;

() असाधारण परिस्थितियों में किसी एक सदस्य द्वारा किए गए व्यापार की मात्रा के बारे में सीमाएं;

() सदस्यों की ऐसी जानकारी या स्पष्टीकरण देने की और ऐसे कारबार से सम्बन्धित ऐसी दस्तावेजें जिनकी शासी निकाय द्वारा अपेक्षा की जाए, पेश करने की बाध्यता

                (3) इस धारा के अधीन बनाई गई उपविधियां :-

() उन उपविधियों को विनिर्दिष्ट कर सकती हैं जिनमें से किसी का उल्लंघन किसी ऐसी संविदा को, जो उन उपविधियों के अनुसार नहीं की गई हैं, धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन शून्य बना देगा;

() यह उपबन्ध कर सकती है कि उन उपविधियों में से किसी का उल्लंघन सम्पृक्त-सदस्य को निम्नलिखित दण्डों में से एक या अधिक का भागी बना देगा, अर्थात् :-

(i) जुर्माना;

(ii) सदस्यता से निष्कासन;

(iii) किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए सदस्यता से निलम्बन;

(iv) वैसी ही प्रकृति की कोई अन्य शास्ति जिनके अन्तर्गत धन का संदाय नहीं है

(4) इस धारा के अधीन बनाई गई उपविधियां पूर्व प्रकाशन के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन होंगी, जो विहित की जाएं, और  [भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्डट द्वारा अनुमोदित किए जाने पर, भारत के राजपत्र में और उस राज्य के राजपत्र में भी प्रकाशित की जाएंगी जिसमें उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का प्रधान कार्यालय स्थित है, और भारत के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होंगी :

परन्तु यदि 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] का किसी मामले में यह समाधान हो जाता है कि व्यापार के हित में या लोक हित में कोई उपविधियां तुरन्त बनाई जानी चाहिएं, तो वह, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें विनिर्दिष्ट करके, लिखित आदेश द्वारा, पूर्व प्रकाशन की शर्त से छूट दे सकती है

10. मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों के बारे में उपविधियां बनाने या उनका संशोधन करने की केन्द्रीय सरकार की         शक्ति-(1) 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] या तो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय से इस निमित्त लिखित अनुरोध की प्राप्ति पर या स्वप्रेरणा से, यदि उस स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय से परामर्श के पश्चात् उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो, और ऐसा करने के लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करने के पश्चात्, धारा 9 में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपविधियां बना सकती हैं या उस धारा के अधीन ऐसे स्टाक एक्सचेंज द्वारा बनाई गई उपविधियों को संशोधित कर सकती हैं

(2) जहां, इस धारा के अनुसरण में, कोई उपविधियां बनाई गई हैं या संशोधित की गई हैं वहां इस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई उपविधियां भारत के राजपत्र में और उस राज्य के राजपत्र में भी प्रकाशित की जाएंगी जिसमें उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का प्रधान कार्यालय स्थित है, और भारत के राजपत्र में उनके प्रकाशन पर, इस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई उपविधियां इस प्रकार प्रभावी होंगी मानो वे सम्पृक्त मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज द्वारा बनाई गई हैं या संशोधित की गई हैं

(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का शासी निकाय 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] द्वारा इस धारा के अधीन स्वप्रेरणा से बनाई गई या संशोधित की गई किन्हीं उपविधियों के सम्बन्ध में आपत्ति करता है तो वह, उपधारा (2) के अधीन भारत के राजपत्र में उनके प्रकाशन से  [दो मास] के भीतर, 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] को उनके पुनरीक्षण के लिए आवेदन कर सकता है, और 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] उस मामले में स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, इस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई उपविधियों का पुनरीक्षण कर सकती है, और जहां इस प्रकार बनाई गई या संशोधित की गई कोई उपविधियां इस उपधारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई के परिणामस्वरूप पुनरीक्षित की जाती हैं, वहां इस प्रकार पुनरीक्षित उपविधियां उपधारा (2) में उपबन्धित रूप में प्रकाशित की जाएंगी और         प्रभावी होंगी

(4) इस धारा के अधीन किन्हीं उपविधियों का बनाया जाना या संशोधन या पुनरीक्षण सभी दशाओं में पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन होगा :

परन्तु यदि 1[भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड] का किसी मामले में यह समाधान हो जाता है कि व्यापार के हित में या लोक हित में कोई उपविधियां तुरन्त बनाई जानी चाहिएं, संशोधित की जानी चाहिएं या पुनरीक्षित की जानी चाहिएं, तो वह उसके लिए जो कारण हैं उन्हें विनिर्दिष्ट करके, लिखित आदेश द्वारा, पूर्व प्रकाशन की शर्त से छूट दे सकती है

11. मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय को अतिष्ठित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित किन्हीं अन्य शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय को अतिष्ठित किया जाना चाहिए, तो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार उस शासी निकाय पर यह लिखित सूचना तामील कर सकती है कि केन्द्रीय सरकार उस सूचना में विनिर्दिष्ट कारणों से शासी निकाय को अतिष्ठित करने का विचार कर रही है और उस मामले में शासी निकाय को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय को अतिष्ठित किया हुआ घोषित कर सकती है, और उस शासी निकाय की सभी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन करने के लिए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त कर सकती है, और जहां एक से अधिक व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं, वहां ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक को उसका अध्यक्ष और किसी दूसरे को उपाध्यक्ष नियुक्त कर सकती है

(2) उपधारा (1) के अधीन राजपत्र में किसी अधिसूचना के प्रकाशन के निम्नलिखित परिणाम होंगे, अर्थात् :-

() ऐसे शासी निकाय के, जो अतिष्ठित कर दिया गया है, सदस्य अतिष्ठित किए जाने की अधिसूचना की तारीख से ऐसे सदस्यों की हैसियत में पद पर नहीं रहेंगे;

() उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति ऐसे शासी निकाय की, जो अतिष्ठित कर दिया गया है, सभी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन कर सकता है, या कर सकते हैं;

() उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज की ऐसी सभी सम्पत्ति, जिसे उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति, लिखित आदेश द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे या करें कि वह उस स्टाक एक्सचेंज के कारबार को चलाने में उसे या उन्हें समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हैं, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों में निहित होंगी

(3) किसी विधि में या उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के, जिसका शासी निकाय उपधारा (1) के अधीन अतिष्ठित कर दिया जाता है, नियमों या उपविधियों में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, उस उपधारा के अधीन नियुक्त व्यक्ति ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा या करेंगे जो उस उपधारा के अधीन प्रकाशित अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, और केन्द्रीय सरकार इसी प्रकार की अधिसूचना द्वारा, ऐसी अवधि में समय-समय पर फेरफार कर सकती है

(4) केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के पद की अवधि के पर्यवसान के पहले किसी भी समय, उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज से उसके नियमों के अनुसार शासी निकाय को पुनर्गठित करने की अपेक्षा कर सकती है और ऐसे पुनर्गठन पर, उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज की सभी सम्पत्ति जो उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों में निहित हो गई है अथवा उसके या उनके कब्जे में थी, इस प्रकार पुनर्गठित शासी निकाय में, यथास्थिति, निहित या पुनर्निहित हो जाएगी :

परन्तु जब तक शासी निकाय इस प्रकार पुनर्गठित किया जाए, तब तक उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति अपनी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन करता रहेगा या करते रहेंगे

12. मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों के कारबार को निलम्बित करने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार की राय में कोई आपातस्थिति पैदा हो गई है और उस आपातस्थिति का सामना करने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार ऐसा करना समीचीन समझती है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उनके लिए जो कारण है उन्हें उसमें उपवर्णित करके, किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज को उसके ऐसे कारबार को सात दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, निलम्बित करने का निदेश दे सकती है और यदि, केन्द्रीय सरकार की राय में, व्यापार के हित में या लोक हित में यह अपेक्षित है कि ऐसी अवधि को बढ़ाया जाना चाहिए, तो वह, इसी प्रकार की अधिसूचना द्वारा, उक्त अवधि को समय-समय पर बढ़ा सकती है :

परन्तु जहां निलम्बन की अवधि प्रथम अवधि से आगे बढ़ाई जानी है, वहां निलम्बन की अवधि को बढ़ाने वाली कोई अधिसूचना तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक उस  [मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज] के शासी निकाय को उस मामले में सुनवाई का अवसर दे दिया जाए

 [12. निदेश जारी करने की शक्ति-यदि जांच करने के पश्चात् या जांच करवाए जाने के पश्चात् भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि,-

                () विनिधानकर्ताओं के हित में या प्रतिभूति बाजार के सुव्यवस्थित विकास के लिए; या

() किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या समाशोधन निगम या ऐसे अन्य अभिकरण या व्यक्ति के, जो प्रतिभूतियों के संबंध में व्यापार या समाशोधन या समझौते की सुविधाएं प्रदान कर रहा है, कार्यकलापों को, जो ऐसी रीति में किए जा रहे हैं, जो विनिधानकर्ताओं या प्रतिभूति बाजार के हित के लिए हानिकारक हैं, निवारित करने के लिए; या

() खंड () में निर्दिष्ट किसी ऐसे स्टॉक एक्सचेंज या समाशोधन निगम या अभिकरण या व्यक्ति का उचित प्रबंध सुनिश्चित करने के लिए,

ऐसा करना आवश्यक है तो वह,-

(i) खंड () में निर्दिष्ट किसी स्टॉक एक्सचेंज या समशोधन निगम या अभिकरण या किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को, जो प्रतिभूति बाजार से सहबद्ध है; या

(ii) किसी ऐसी कंपनी को, जिसकी प्रतिभूतियां किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं या सूचीबद्ध किए जाने के लिए प्रस्तावित हैं, ऐसे निदेश जारी कर सकेगा, जो प्रतिभूतियों में विनिधानकर्ताओं और प्रतिभूति बाजार के हितों के लिए समुचित हों ]

 [स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस धारा के अधीन निदेशों को जारी करने की शक्ति में, किसी ऐसे व्यक्ति को, निदेश करने की शक्ति सम्मिलित होगी और सदैव उसका सम्मिलित होना समझा जाएगा, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के उल्लंघन में, किसी संव्यवहार या क्रियाकलाप में लगकर, ऐसे उल्लंघन से कमाए गए सदोष अभिलाभ या टाली गई हानि के समान रकम का प्रत्यर्पण करने के लिए लाभ कमाता है या हानि को टालता है ]

संविदा और प्रतिभूति विकल्प करार

                13. अधिसूचित क्षेत्रों में संविदाओं का कतिपय परिस्थितियों में अवैध होना-यदि केन्द्रीय सरकार का, किसी  [राज्य या राज्यों या क्षेत्र में] प्रतिभूतियों के संव्यवहारों की प्रकृति या मात्रा को ध्यान में रखते हुए, यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है, तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि यह धारा ऐसे 2[राज्य या राज्यों या क्षेत्र] को लागू होगी, और तब ऐसे 2[राज्य या क्षेत्र या राज्यों,] में की प्रत्येक संविदा, जो उस अधिसूचना की तारीख के पश्चात् ऐसे 2[राज्य या राज्यों या क्षेत्र] में 2[मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज या मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों सदस्यों के बीच] या ऐसे सदस्य के माध्यम से या ऐसे सदस्य के साथ किए जाने के भिन्न रूप में की गई, अवैध होगी :

 [परन्तु ऐसे राज्य या राज्यों या क्षेत्र में दो या अधिक मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों के सदस्यों के बीच की गई कोई संविदा-

(i) ऐसे निबन्धनों और शर्तों के अध्यधीन होगी, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से संबंधित स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा अनुबंधित की जाएं;

(ii) यदि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा इस प्रकार अनुबद्ध की जाती है तो संबंधित स्टॉक एक्सचेंजों की पूर्व अनुज्ञा अपेक्षित होगी ]

                 [13. अतिरिक्त व्यापार स्थल-स्टाक एक्सचेंज, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से, उक्त बोर्ड द्वारा नियत निबंधनों और शर्तों के अनुसार, अतिरिक्त व्यापार स्थल स्थापित कर सकेगा

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिएअतिरिक्त व्यापार स्थल" से किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज द्वारा उसके कार्यक्षेत्र से बाहर निवेशकों को उस स्टाक एक्सचेंज के विनियमन ढांचे के अधीन ऐसे व्यापार स्थल के माध्यम से प्रतिभूतियों का क्रय और विक्रय करने हेतु समर्थ बनाने के लिए प्रस्थापित व्यापार परिधि या व्यापार सुविधा अभिप्रेत है ]

14. अधिसूचित क्षेत्रों में संविदाओं का कतिपय परिस्थितियों में शून्य होना-(1) धारा 13 के अधीन अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी राज्य या क्षेत्र में की गई कोई ऐसी संविदा, जो धारा 9 की उपधारा (3) के खण्ड () के अधीन उस निमित्त विनिर्दिष्ट उपविधियों में से किसी के उल्लंघन में है,-

(i) उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के किसी ऐसे सदस्य के, जिसने किसी ऐसी उपविधि के उल्लंघन में ऐसी संविदा की है, अधिकारों की बाबत शून्य होगी, और

(ii) किसी अन्य व्यक्ति के, जिसने जानबूझकर ऐसे संव्यवहार में भाग लिया है, जिससे ऐसा उल्लंघन होता है, अधिकारों की बाबत भी शून्य होगी

(2) उपधारा (1) की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह उस मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति के किसी ऐसी संविदा को प्रवर्तित कराने के या ऐसी संविदा के अधीन या उनकी बाबत किसी धनराशि को वसूल करने के अधिकार पर उस दशा में प्रभाव डालती है जब ऐसे व्यक्ति को इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऐसा संव्यवहार धारा 9 की उपधारा (3) के खण्ड () में विनिर्दिष्ट उपविधियों में से किसी के उल्लंघन में था

15. कतिपय परिस्थितियों में सदस्यों का मालिक के रूप में कार्य कर सकना-किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का कोई सदस्य, किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के किसी सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति के साथ किन्हीं प्रतिभूतियों की बाबत मालिक के रूप में कोई संविदा नहीं करेगा जब तक कि उसने ऐसे व्यक्ति की सहमति या प्राधिकार प्राप्त कर लिया हो और वह क्रय या विक्रय के टिप्पण, ज्ञापन या करार में यह प्रकट नहीं करता है कि वह मालिक के रूप में कार्य कर रहा है :

परन्तु जहां सदस्य ने ऐसे व्यक्ति की सहमति या प्राधिकार लिखित रूप से भिन्न रूप में प्राप्त किया है, वहां वह ऐसे व्यक्ति से ऐसी सहमति या प्राधिकार की लिखित पुष्टि ऐसी संविदा की तारीख से तीन दिन के भीतर प्राप्त करेगा :

परन्तु यह और कि किसी ऐसी विद्यमान संविदा को जो ऐसे व्यक्ति द्वारा उपविधियों के अनुसार की गई है, बन्द करने के लिए ऐसे व्यक्ति की ऐसी लिखित सहमति या प्राधिकार उस दशा में आवश्यक नहीं होगा, जब वह सदस्य ऐसे बन्द करने की बाबत क्रय या विक्रय के टिप्पण, ज्ञापन या करार में यह प्रकट करता है कि वह मालिक के रूप में कार्य कर रहा है

16. कतिपय दशाओं में संविदाओं का प्रतिषेध करने की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की राय है कि किसी राज्य या क्षेत्र में विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों में अवांछनीय सट्टा रोकना आवश्यक है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि कोई व्यक्ति, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट राज्य या क्षेत्र में, केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी प्रतिभूति के क्रय या विक्रय के लिए कोई संविदा, सिवाय ऐसे विस्तार और रीति के, यदि कोई हो, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, नहीं करेगा

(2) उपधारा (2) के अधीन जारी की गई अधिसूचना की तारीख के पश्चात् उसके उपबंधों के उल्लंघन में की गई सभी संविदाएं अवैध होंगी

17. कतिपय क्षेत्रों में प्रतिभूतियों के व्यौहारियों को अनुज्ञप्ति का दिया जाना-(1) उपधारा (3) के उपबन्धों और इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति चाहे अपनी ओर से या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से, किसी ऐसे राज्य या क्षेत्र में, जिसको धारा 13 का लागू होना घोषित नहीं किया गया है और जिसको केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस धारा का लागू होना घोषित करे, इस निमित्त  [भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा दी गई अनुज्ञप्ति] के प्राधिकार के सिवाय, प्रतिभूतियों में व्यौहार का कारबार, नहीं करेगा, या किया जाना तात्पर्यित नहीं करेगा

(2) उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना किसी राज्य या क्षेत्र की बाबत तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक केन्द्रीय सरकार का, उस रीति को ध्यान में रखते हुए जिससे ऐसे राज्य या क्षेत्र में प्रतिभूतियों में व्यौहार होता है, यह समाधान नहीं हो जाता  है कि व्यापार के हित में या लोक हित में यह वांछनीय या समीचीन है कि ऐसे व्यौहार का अनुज्ञप्ति पद्धति द्वारा विनियमन किया जाना चाहिए

(3) प्रतिभूतियों में व्यौहार के सम्बन्ध में उपधारा (1) द्वारा अधिरोपित निर्बन्धन किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के सदस्य द्वारा या उसकी ओर से किसी बात के किए जाने को लागू नहीं होंगे

 [17. धारा 2 के खंड () के उपखंड (त्ङ) में निर्दिष्ट प्रतिभूतियों का जनता को निर्गमन और उनका सूचीबद्ध किया जाना-इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, धारा 2 के खंड () के उपखंड (iड) में निर्दिष्ट प्रकृति की कोई प्रतिभूतियां तब तक जनता को प्रस्थापित नहीं की जाएंगी या किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं की जाएंगी जब तक कि निर्गमनकर्ता ऐसी पात्रता के मानदंड को पूरा नहीं कर देता और ऐसी अन्य अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर देता जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं

(2) धारा 2 के खंड () के उपखंड (त्ङ) में निर्दिष्ट प्रत्येक ऐसा निर्गमनकर्ता जो जनता को उसमें निर्दिष्ट प्रमाणपत्रों या लिखतों की प्रस्थापना करने का आशय रखता है, जनता को प्रस्थापना दस्तावेज जारी करने से पूर्व एक या अधिक मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों को ऐसे स्टॉक एक्सचेंज में या ऐसे प्रत्येक स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किए जाने वाल ऐसे प्रमाणपत्रों या लिखतों के लिए अनुज्ञा हेतु आवेदन करेगा

(3) जहां सूचीबद्ध किए जाने के लिए उपधारा (2) के अधीन आवेदित अनुज्ञा मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों या उनमें से किसी के द्वारा नहीं दी गई है या देने से इंकार कर दिया गया है वहां निर्गमनकर्ता तुरंत आवेदकों से प्रस्थापना दस्तावेज के अनुसरण में प्राप्त सभी धन का, यदि कोई हों, प्रतिसंदाय करेगा और यदि ऐसा कोई धन निर्गमनकर्ता के उस धन का प्रतिसंदाय करने के लिए दायी होने के पश्चात् आठ दिन के भीतर प्रतिसंदत्त नहीं किया जाता है, तो निगमिनकर्ताऔर उसका, यथास्थिति, प्रत्येक निदेशक या न्यासी, जो व्यक्तिक्रमी है आठ दिन की समाप्ति को ही, संयुक्त रूप से और पृथक् रूप से उस धन का पंद्रह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज सहित प्रतिसंदाय करने के दायी होंगे

स्पष्टीकरण-किसी अन्य दिन के पश्चात् आठवें दिन की गणना करने में ऐसे किसी भी मध्यवर्ती दिन की, जो परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) के अधीन सार्वजनिक अवकाश दिन है, अवहेलना की जाएगी और यदि आठवां दिन ही      (इस प्रकार गणना करने पर) ऐसा सार्वजनिक अवकाश दिन है, तो उक्त प्रयोजनों के लिए उसके पश्चात् पहला दिन जो अवकाश दिन नहीं है रखा जाएगा  

(4) मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में किसी पब्लिक कंपनी की प्रतिभूतियों के सूचीबद्ध किए जाने से संबंधित इस अधिनियम के सभी उपबंध, यथा आवश्यक परिवर्तन सहित, धारा 2 के खंड () के उपखंड (त्ङ) में निर्दिष्ट प्रकृति की प्रतिभूतियों को ऐसे निर्गमनकर्ता द्वारा, जो विशेष प्रयोजन वाला सुभिन्न अस्तित्व है, सूचीबद्ध कराने के लिए लागू होंगे ]

18. धारा 13, 14, 15 और 17 से हाजिर सौदाओं का अपवर्जन-(1) धारा 13, 14, 15 और 17 की कोई बात हाजिर सौदाओं को लागू नहीं होंगी

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि व्यापार के हित में या लोक हित में किसी राज्य या क्षेत्र में भी (चाहे उस राज्य या क्षेत्र को धारा 13 का लागू होना घोषित किया गया हो या नहीं) हाजिर सौदाओं में व्यौहार के कारबार का विनियमन और नियंत्रण करना समीचीन है, तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि धारा 17 के उपबन्ध साधारणतया हाजिर सौदाओं की बाबत या ऐसी प्रतिभूतियों के, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, क्रय या विक्रय के हाजिर सौदाओं की बाबत भी लागू होंगे, और वह रीति और विस्तार भी विनिर्दिष्ट कर सकती है जिससे और जहां तक उस धारा के उपबन्ध इस प्रकार लागू होंगे

 [18. व्युत्पन्न में संविदा-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी अन्य बात के होते हुए भी, व्युत्पन्न संविदाएं वैध और विधिमान्य होंगी यदि ऐसी संविदाओं का-

() मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में व्यापार;

() मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के समाशोधनगृह  [में परिनिर्धारण; याट

 [() ऐसे पक्षकारों के बीच और ऐसे निबंधनों पर, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,                   विनिर्दिष्ट करे,]

ऐसे स्टाक एक्सचेंज के नियमों और उपविधियों के अनुसार किया गया है ]

                19. मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों से भिन्न स्टाक एक्सचेंजों का प्रतिषेध-(1) कोई व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना, प्रतिभूतियों में कोई संविदा करने के, उसमें सहायता करने के या उसका पालन करने के प्रयोजन के लिए (मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज से भिन्न) किसी स्टाक एक्सचेंज का गठन नहीं करेगा या उसके गठन में सहायता नहीं करेगा या उसका सदस्य नहीं होगा

(2) यह धारा किसी राज्य या क्षेत्र में उस तारीख  को प्रवृत्त होगी जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे

                                                                                                                                                                                       

*** प्रतिभूतियों का सूचीबद्ध किया जाना

                 [21. सूचीबद्ध करने के लिए शर्तें-जहां किसी व्यक्ति के आवेदन पर किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में प्रतिभूतियां सूचीबद्ध की जाती हैं वहां ऐसा व्यक्ति उस स्टाक एक्सचेंज के साथ किए गए सूचीकरण करार की शर्तों का पालन करेगा ]

 [21. प्रतिभूतियों का सूची से हटाया जाना-(1) कोई मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज, किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज से प्रतिभूतियों को, ऐसे किसी या किन्हीं आधारों पर, जो इस अधिनियम के अधीन विहित किए जाएं, उसके लिए कारण लेखबद्ध करने के पश्चात्, सूची से हटा सकेगा :

परंतु किसी कंपनी की प्रतिभूतियों को तब तक सूची से नहीं हटाया जाएगा जब तक कि संबद्ध कंपनी को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर दिया गया हो

(2) कोई भी सूचीबद्ध कंपनी या व्यथित विनिधानकर्ता प्रतिभूतियों को सूची से हटाने के मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के विनिश्चय के विरुद्ध, प्रतिभूतियों को सूची से हटाने के मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के विनिश्चय की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल कर सकेगा और इस अधिनियम की धारा 22 से धारा 22 के उपबंध जहां तक हो सके, ऐसी अपीलों को लागू होंगे :

परंतु यदि प्रतिभूति अपील अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि कंपनी उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित हुई थी, तो वह उस कंपनी को एक मास से अनधिक की और अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ]

 [22. पब्लिक कम्पनियों की प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध करने से स्टाक एक्सचेंजों के इन्कार के विरुद्ध अपील का         अधिकार-जहां कोई मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज ऐसी किसी शक्ति के अनुसरण में, जो उसकी उपविधियों द्वारा उसे दी गई हैं, कार्य करते हुए किसी पब्लिक कम्पनी  [या सामूहिक विनिधान स्कीम] की प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध करने से इंकार करता है, वहां वह कम्पनी  2[या स्कीम] इस बात की हकदार होगी कि उसे ऐसे इंकार के कारण बताए जाएं, तथा वह,-

                () उस तारीख से, जिसको ऐसे इंकार के कारण उसे बताए जाते हैं, पन्द्रह दिन के भीतर, या

() जहां स्टाक एक्सचेंज ने कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 73 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर (जिसे इस धारा में इसके पश्चात्विनिर्दिष्ट समय" कहा गया है) इस अनुज्ञा के लिए कि शेयरों या डिबेंचरों में व्यौहार स्टाक एक्सचेंज में होने लगे, आवेदन को निपटाने का लोप किया है या उसमें असफल रहा है, वहां विनिर्दिष्ट समय के अवसान की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर या एक मास से अनधिक की ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर, जिसे केन्द्रीय सरकार पर्याप्त कारण दिखाए जाने पर अनुज्ञात करे,

केन्द्रीय सरकार को, यथास्थिति, ऐसे इंकार, लोप या असफलता के विरुद्ध अपील कर सकती है और तब केन्द्रीय सरकार स्टाक एक्सचेंज को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्,-

(i) स्टाक एक्सचेंज के विनिश्चय में फेरफार कर सकती है या उसको अपास्त कर सकती है, या

(ii) जहां स्टाक एक्सचेंज ने विनिर्दिष्ट समय के भीतर आवेदन का निपटरा करने का लोप किया है या उसमें असफल रहा है, वहां वह अनुज्ञा दे सकती है या देने से इन्कार कर सकती है,

तथा जहां केन्द्रीय सरकार मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के विनिश्चय को अपास्त करती है या अनुज्ञा देती है, वहां स्टाक एक्सचेंज केन्द्रीय सरकार के आदेशों के अनुरूप कार्य करेगा :

 [परन्तु इस धारा के अधीन कोई अपील, प्रतिभूति विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1999, के प्रारंभ की तारीख को, और उसके पश्चात्, यथास्थिति, इंकार, लोप या असफलता के विरुद्ध नहीं की जाएगी ]

3[22. पब्लिक कंपनियों की प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध करने से स्टाक एक्सचेन्ज के इन्कार के विरुद्ध प्रतिभूति अपील अधिकरण में अपील करने का अधिकार-(1) जहां कोई मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेन्ज, ऐसी किसी शक्ति के अनुसरण में जो उसकी उपविधियों द्वारा उसे दी गई हैं, कार्य करते हुए किसी कंपनी की प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध करने से इंकार करता है वहां वह कंपनी इस बात की हकदार होगी कि उसे ऐसे इंकार के कारण बताए जाएं, और वह-

                () उस तारीख से जिसको उसे ऐसे इंकार के कारण बताए जाते हैं, पन्द्रह दिन के भीतर, या

() जहां स्टाक एक्सचेन्ज ने कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 73 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर (जिसे इस धारा में इसके पश्चात्विनिर्दिष्ट समय" कहा गया है्) इस अनुज्ञा के लिए कि शेयरों या डिबेंचरों में व्यौहार स्टाक एक्सचेन्ज में किया जाए, आवेदन को निपटाने का लोप किया है या उसमें असफल रहा है, वहां विनिर्दिष्ट समय की समाप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर या एक मास से अनधिक की ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर, जो प्रतिभूति अपील अधिकरण पर्याप्त कारण दर्शित करने पर अनुज्ञात करे,

उस विषय में अधिकारिता रखने वाले प्रतिभूति अपील प्राधिकरण को, यथास्थिति, ऐसे इंकार, लोप या असफलता के विरुद्ध अपील कर सकती है और तब प्रतिभूति अपील अधिकरण स्टाक एक्सचेन्ज को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्,-

(i) स्टाक एक्सचेन्ज के विनिश्चय में फेरफार कर सकता है या उसको अपास्त कर सकता है, या

(ii) जहां स्टाक एक्सचेन्ज ने विनिर्दिष्ट समय के भीतर आवेदन का निपटारा करने का लोप किया है या उसमें असफल रहा है, वहां वह अनुज्ञा दे सकता है या देने से इंकार कर सकता है,

तथा जहां प्रतिभूति अपील अधिकरण मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेन्ज के विनिश्चय को अपास्त करता है या अनुज्ञा देता है वहां स्टाक एक्सचेन्ज प्रतिभूति अपील अधिकरण के आदेशों के अनुरूप कार्य करेगा

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए

(3) प्रतिभूति अपील अधिकरण अपने द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति बोर्ड को और अपील के पक्षकारों को भेजेगा

(4) उपधारा (1) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथाशक्य शीघ्र कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा अपील को उसके प्राप्त होने की तारीख से छह मास के भीतर अंतिम रूप से निपटाने का प्रयास किया जाएगा

22. प्रतिभूति अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) प्रतिभूति अपील अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होगा, किन्तु वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों से मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और इस अधिनियम और किन्हीं नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्ति होगी, जिसके अंतर्गत वे स्थान भी हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा

(2) प्रतिभूति अपील अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-

                () किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

                () दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

() शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

() साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

() अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

() किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;

() किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के किसी आदेश या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना; और

() कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए

                (3) प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अंर्तगत और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और प्रतिभूति अपील अधिकरण, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए, सिविल न्यायालय समझा जाएगा

22. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार-अपीलार्थी प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट या कंपनी सचिव या लागत लेखापाल या विधि व्यवसायी या अपने अधिकारियों में से किसी को प्राधिकृत कर सकेगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

() “चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट" से चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में यथापरिभाषित ऐसा चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

() “कंपनी सचिव" से कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 (1980 का 56) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में यथापरिभाषित ऐसा कंपनी सचिव अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

() “लागत लेखापाल" से लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम, 1959 (1959 का 23) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में यथापरिभाषित ऐसा कोई लागत लेखापाल अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

() “विधि व्यवसायी" से कोई अधिवक्ता, वकील या उच्च न्यायालय का कोई अटर्नी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत व्यवसायरत कोई प्लीडर भी है

22. परिसीमा-परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबंध, जहां तक हो सके, प्रतिभूति अपील अधिकरण को की गई अपील को लागू होंगे

22. सिविल न्यायालय की अधिकारिता होना-किसी सिविल न्यायालय को ऐसे विषय से संबंधित कोई वाद ग्रहण करने या कार्यवाही करने की अधिकारिता नहीं होगी जिसका अवधारण करने के लिए, प्रतिभूति अपील अधिकरण को इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन सशक्त बनाया गया है और किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत व्यादेश मंजूर नहीं किया जाएगा

 [22. उच्चतम न्यायालय को अपील-प्रतिभूति अपील प्राधिकरण के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, प्रतिभूति अपील अधिकरण के विनिश्चय या आदेश की उस पर संसूचना की तारीख से साठ दिन के भीतर, ऐसे आदेश से उद्भूत विधि के किसी प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय को अपील कर सकेगा :

परन्तु यदि उच्चतम न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित हुआ था तो वह उसे साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर फाइल करने के लिए अनुज्ञात            कर सकेगा ]

शास्तियां और प्रक्रिया

23. शास्तियां-(1) कोई व्यक्ति, जो-

() धारा 6 की उपधारा (4) के अधीन की गई किसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करने में बिना उचित प्रतिहेतु के (जिसे साबित करने का भार उसी पर होगा) असफल रहेगा; या

() धारा 13 या धारा 16 के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई संविदा करेगा; या

()  [धारा 17 या धारा 17क] या धारा 19 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा; या

 [() धारा 18 या धारा 30 के अधीन बनाए गए नियमों के उल्लंघन में व्युत्पन्न कोई संविदा करेगा ;]

() किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के स्थान से भिन्न किसी ऐसे स्थान को अपने स्वामित्व में रखेगा या चलाएगा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई संविदाएं करने के या उनका पालन करने के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता है और जानते हुए ऐसे स्थान का ऐसे प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाया जाना अनुज्ञात       करेगा; या

() मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के स्थान से भिन्न किसी ऐसे स्थान का प्रबन्ध करेगा, नियंत्रण करेगा या उसको चलाने  में सहायता करेगा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में कोई संविदा करने के या उनका पालन करने के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता है या जहां ऐसी संविदाएं अभिलिखित या समायोजित की जाती हैं या ऐसी संविदाओं से उद्भूत होने वाले अधिकार या दायित्व चाहे किसी भी रीति से समायोजित, विनियमित या प्रवर्तित किए जाते हैं; या

() किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का सदस्य होते हुए या ऐसे स्टाक एक्सचेंज के नियमों या उपविधियों के अधीन उस सदस्य के अभिकर्ता के रूप में प्राधिकृत होते हुए या धारा 17 के अधीन प्रतिभूतियों के व्यौहारी के रूप में अनुज्ञप्त होते हुए किसी व्यक्ति को जानबूझकर यह व्यपदिष्ट करेगा या यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करेगा कि इस अधिनियम के अधीन उसके माध्यम से संविदाएं की जा सकती हैं या उनका पालन किया जा सकता है; या

() किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज का सदस्य होते हुए या ऐसे स्टाक एक्सचेंज के नियमों या उपविधियों के अधीन उस सदस्य के अभिकर्ता के रूप में प्राधिकृत होते हुए या धारा 17 के अधीन प्रतिभूतियों के व्यौहारी के रूप में अनुज्ञप्त होते हुए इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में संविदाओं से सम्बन्धित किसी कारबार के लिए, किसी भी रीति से, या ता अपने लिए या किन्हीं अन्य व्यक्तियों की ओर से, संरचना करेगा, विज्ञापन करेगा या टाउट का काम करेगा; या

() इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के उल्लंघन में बोली लगाने या प्रस्थापना करने के लिए या किन्हीं संविदाओं को करने या उनका पालन करने के लिए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज की उपविधियों में विनिर्दिष्ट कारबार के स्थान से भिन्न किसी स्थान पर संयोजित करेगा, एकत्र करेगा या एकत्र होने में सहायता करेगा,

 [दोषसिद्धि पर, इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा शास्ति के किसी अधिनिर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डनीय होगा ]

(2) कोई व्यक्ति, जो धारा 15 के उपबन्धों के उल्लंघन में कोई संविदा करेगा  [ [अथवा जो 3[धारा 21 या धारा 21क] के उपबन्धों का याट धारा 22 के अधीन केन्द्रीय सरकार] के  [या प्रतिभूति अपील अधिकरण के] आदेशों का अनुपालन करने में असफल रहेगा, 3[दोषसिद्धि पर, इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा शास्ति के किसी अधिनिर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डनीय होगा ]

 [23. जानकारी, विवरणी आदि देने में असफलता के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति, जिससे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन,-

() कोई जानकारी, दस्तावेज, बहियां, विवरणियां या रिपोर्ट किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज को देने की अपेक्षा की जाती है, उस मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध करार या शर्तों या उपविधियों में उनके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर उन्हें देने में असफल रहेगा, वह  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा;

() किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के सूचीबद्ध करार या शर्तों अथवा उपविधियों के अनुसार लेखाबहियों या अभिलेखों को बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है, उनको बनाए रखने में असफल रहेगा, वह 2[ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

                23. किसी व्यक्ति द्वारा ग्राहकों के साथ करार करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जिससे इस अधिनियम के अधीन या मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के अधीन बनाई गई किन्हीं उपविधियों के अधीन अपने ग्राहकों के साथ करार करने की अपेक्षा की जाती है, ऐसा करार करने में असफल रहेगा तो वह प्रत्येक ऐसी असफलता के लिए,  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

23. विनिधानकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई स्टॉक दलाल या उप-दलाल या कोई कंपनी जिसकी प्रतिभूतियां किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं या सूचीबद्ध किए जाने के लिए प्रस्तावित हैं, विनिधानकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज द्वारा लिखित रूप में मांग किए जाने के पश्चात् भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज द्वारा अनुबद्ध समय के भीतर ऐसी शिकायतों को दूर करने में असफल रहेगा तो  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

23. ग्राहक या ग्राहकों की प्रतिभूतियों या धन को पृथक् करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 के अधीन स्टॉक दलाल या उप दलाल के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, ग्राहक या ग्राहकों की प्रतिभूतियों या धन को पृथक् करने में असफल रहेगा या ग्राहक या ग्राहकों की प्रतिभूतियों या धन को स्वयं या किसी अन्य ग्राहक के लिए उपयोग करेगा तो वह  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

23. सूचीबद्ध करने की शर्तों या सूची से हटाने की शर्तों या आधारों का अनुपालन करने से असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई कंपनी या सामूहिक विनिधान स्कीम या पारस्परिक निधि का प्रबंध करने वाला कोई व्यक्ति सूचीबद्ध करने की शर्तों या सूची से हटाने की शर्तों या आधारों का अनुपालन करने में असफल रहेगा या उनका भंग करेगा तो कंपनी या वह व्यक्ति,  [ऐसी शास्ति के लिए, जो पांच लाख रुपए से कम की नहीं हागी, किंतु जो पच्चीस करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

23. सूचीबद्ध की गई प्रतिभूतियों का आधिक्य में डिमैटेरियलाइज करने या परिदान करने के लिए शास्ति-यदि कोई जारीकर्ता कंपनी की जारी प्रतिभूतियों से अधिक प्रतिभूतियों को डिमैटेरियलाइज करेगा या स्टॉक एक्सचेंजों में ऐसी प्रतिभूतियां परिदत्त करेगा, जो मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं या प्रतिभूतियों को वहां परिदत्त करेगा जहां किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज द्वारा व्यवसाय करने की अनुज्ञा नहीं दी गई है तो वह  [ऐसी शास्ति के लिए, जो पांच लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो पच्चीस करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

23. कालिक विवरणियां आदि देने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को कालिक विवरणियां प्रस्तुत करने में असफल रहेगा या उसकी उपेक्षा करेगा या भारतीय प्रतिभूति  और विनिमय बोर्ड द्वारा यथानिर्देशित अपने नियम या उपविधियों को बनाने या उसका संशोधन करने में असफल रहेगा या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा जारी निदेशों का अनुपालन करने में असफल रहेगा तो ऐसा मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज ऐसी शास्ति के लिए  जो  [ऐसी शास्ति के लिए, जो पांच लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो पच्चीस करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा]

23. जहां पृथक् शास्ति उपबंधित नहीं है वहां उल्लंघन के लिए शास्ति-जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध, मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के नियमों या अनुच्छेदों या उपविधियों या विनियमों या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा जारी ऐसे निदेशों का, जिनके लिए कोई पृथक्, शास्ति उपबंधित नहीं की गई है, अनुपालन करने में असफल रहेगा, वह  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगाट

23. न्यायनिर्णयन की शक्ति-(1) धारा 23, धारा 23, धारा 23, धारा 23, धारा 23, धारा 23, धारा 23, और धारा 23 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, कोई शास्ति अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए, संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज के ऐसे अधिकारी को जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के प्रभाग प्रमुख की पंक्ति से नीचे का हो, विहित रीति में जांच करने के लिए न्यायनिर्णायक अधिकारी नियुक्त करेगा   

(2) न्यायनिर्णायक अधिकारी को जांच करते समय, ऐसे किसी व्यक्ति को, जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित है, समन करने और साक्ष्य देने के लिए, उसको हाजिर कराने या कोई ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत कराने की शक्ति होगी, जो न्यायनिर्णायक अधिकारी की राय में, जांच की विषय-वस्तु के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हो सकता है और यदि ऐसी जांच करने पर, उसका यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट धाराओं में से किसी भी धारा के उपबंधों का पालन करने में असफल रहा है तो वह उन धाराओं में से किसी धारा के उपबंधों के अनुसार ऐसी शास्ति अधिरोपित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे

 [(3) बोर्ड, इस धारा के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के अभिलेख को मंगा सकेगा और उनकी परीक्षा कर सकेगा तथा यदि उसका यह विचार है कि न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेश उस विस्तार तक गलत है, जहां तक यह प्रतिभूति बाजार के हितों में नहीं है तो वह ऐसी जांच करने या करवाने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, यदि मामले की परिस्थितियां उसको न्यायोचित ठहराती हैं, शास्ति की मात्रा में वृद्धि करते हुए, आदेश पारित कर सकेगा :

परन्तु ऐसा आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक संबद्ध व्यक्ति को मामले में सुने जाने का अवसर प्रदान नहीं किया जाता है :

परन्तु यह और कि इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात, न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेश की तारीख से तीन मास की अवधि के अवसान या धारा 15 के अधीन अपील के निपटान के पश्चात्, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, लागू नहीं होगी ]

23. निर्णायक अधिकारी द्वारा विचार में लीए जाने वाली बातें-न्यायनिर्णायक अधिकारी, धारा 23 के अधीन शास्ति की मात्रा का न्यायनिर्णयन करते समय, निम्नलिखित बातों का सम्यक् रूप से ध्यान रखेगा, अर्थात् :-

() व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप प्राप्त अननुपातिक लाभ या अनुचित फायदों की मात्रा, जहां कहीं उसकी गणना की जा सकती है;

() व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप विनिधानकर्ता या विनिधानकर्ताओं के समूह को कारित हानि की रकम;

() व्यतिक्रम की आवृत्तिमय प्रकृति

                 [23ञक. प्रशासनिक और सिविल कार्यवाहियों का निपटारा-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध कोई कार्यवाही धारा 12 या धारा 23 के अधीन आरंभ की गई है या आरंभ की जाए, अभिकथित व्यतिक्रमों के लिए आरंभ की गई या आरंभ की जाने वाली कार्यवाहियों के निपटारे का प्रस्ताव करने के लिए बोर्ड को लिखित में आवेदन फाइल कर सकेगा

(2) बोर्ड, व्यतिक्रमों की प्रकृति, गंभीरता और समाघात पर विचार करने के पश्चात्, व्यतिक्रमी द्वारा ऐसी राशि के संदाय पर या ऐसे अन्य निबंधनों पर, जो बोर्ड द्वारा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार अवधारित किए जाएं, निपटारे के लिए प्रस्ताव से सहमत हो सकेगा

(3) इस धारा के अधीन निपटारे के प्रयोजनों के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बोर्ड द्वारा यथाविनिर्दिष्ट प्रक्रिया लागू होगी

(4) इस धारा के अधीन, यथास्थिति, बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध धारा 23 के अधीन कोई अपील नहीं होगी ]

 [23ञख. रकमों की वसूली-(1) यदि कोई व्यक्ति न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहता है या धारा 12 के अधीन जारी प्रत्यर्पण आदेश के निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या बोर्ड को देय किन्हीं फीसों का संदाय करने में असफल रहता है तो वसूली अधिकारी, व्यक्ति से देय रकम विनिर्दिष्ट करते हुए, विनिर्दिष्ट प्ररूप में अपने लेख में एक कथन (ऐसे कथन को इस अध्याय में इसके पश्चात् प्रमाणपत्र कहा गया है) तैयार कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति के प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम को निम्नलिखित एक या अधिक पद्धतियों से वसूल करने के लिए कार्यवाही करेगा, अर्थात् :-

                () व्यक्ति की जंगम संपत्ति की कुर्की और विक्रय;

                () व्यक्ति के बैंक खातों की कुर्की;

                () व्यक्ति की स्थावर संपत्ति की कुर्की और विक्रय;

() व्यक्ति की गिरफ्तारी और कारागार में उसका निरोध;

() व्यक्ति की जंगम और स्थावर संपत्तियों के प्रबंध के लिए प्रापक की नियुक्ति,

और इस प्रयोजन के लिए आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 220 से धारा 227, धारा 228, धारा 229, धारा 232, दूसरी और तीसरी अनुसूचियों तथा समय-समय पर प्रवृत्त आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 के उपबंध, जहां तक हो सके ऐसे आवश्यक उपांतरणों के साथ लागू हो सकेंगे मानो उक्त उपबंध और उसके अधीन बनाए गए नियम, इस अधिनियम के उपबंध थे और आय-कर अधिनियम 1961 के अधीन आय-कर के स्थान पर इस अधिनियम के अधीन देय रकम के प्रति, निर्देश हैं

स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए व्यक्ति की जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन में, ऐसी कोई संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन सम्मिलित हैं, जो ऐसी तारीख को या उसके पश्चात्, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः, अंतरित किए गए हैं, जब प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट कोई रकम, व्यक्ति द्वारा पर्याप्त प्रतिफल से भिन्न उसके पति या पत्नी या अप्राप्तवय बालक या पुत्र की पत्नी या पुत्र के अप्राप्तवय बालक को देय हो चुकी थी और जो पूर्वोक्त किन्हीं व्यक्तियों द्वारा धारित की गई है या उनके नाम पर है और जहां तक उसके अप्राप्तवय बालक या उसके पुत्र के अप्राप्तवय बालक को इस प्रकार अंतरित जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन का संबंध है वहां उसका, यथास्थिति, ऐसे अप्राप्तवय बालक या पुत्र के अप्राप्तवय बालक के वयस्क होने की तारीख के पश्चात् भी इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति से देय किसी रकम की वसूली करने के लिए व्यक्ति की जंगम या स्थावर सम्पत्ति या बैंक खातों में धारित धन में सम्मिलित होना बना रहेगा   

स्पष्टीकरण 2-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की दूसरी और तीसरी अनुसूचियों और आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 के उपबंधों के अधीन निर्धारिती के प्रति किसी निर्देश का, प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट व्यक्ति के बारे में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उसके प्रतिनिर्देश है

स्पष्टीकरण 3-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अध्याय 17 और दूसरी अनुसूची में अपील के प्रति किसी निर्देश का, इस अधिनियम की धारा 23 के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील के बारे में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उसके प्रति निर्देश है

(2) वसूली अधिकारी, उपधारा (1) के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते समय स्थानीय जिला प्रशासन की सहायता प्राप्त करने के लिए सशक्त होगा

(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, धारा 12 के अधीन बोर्ड द्वारा जारी किसी निदेश के अननुपालन के अनुसरण में उपधारा (1) के अधीन किसी वसूली अधिकारी द्वारा रकमों की वसूली की, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध किसी अन्य दावे पर अग्रता होगी

(4) उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए वसूली अधिकारी" पद से बोर्ड का कोई ऐसा  अधिकारी अभिप्रेत है जिसको लिखित में सामान्य या विशेष आदेश द्वारा वसूली अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जाए ]

                23. शास्तियों के रूप में वसूल की गई राशियों का भारत की संचित निधि में जमा किया जाना-इस अधिनियम के अधीन शास्तियों के रूप में वसूल की गई सभी राशियां भारत की संचित निधि में जमा की जाएंगी

                23. प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील-(1) मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या न्यायनिर्णायक अधिकारी के आदेश या विनिश्चय या धारा 4  [या धारा 23 की उपधारा (3;] के अधीन भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील कर सकेगा और इस अधिनियम की धारा 22, धारा 22, धारा 22, और धारा 22 के उपबंध यथाशक्य ऐसी अपीलों को लागू होंगे

                (2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील, उस तारीख से जिसको आदेश या विनिश्चय की प्रति अपीलार्थी को प्राप्त होती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित          की जाए :

                परंतु प्रतिभूति अपील अधिकरण उक्त पैंतालीस दिन की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए पर्याप्त कारण था

                (3) प्रतिभूति अपील अधिकरण, उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, अपील के पक्षकारों को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात्, उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करते हुए, उसका उपांतरण करते हुए या उसे अपास्त करते हुए ऐसे आदेश पारित कर सकेगा, जिन्हें वह ठीक समझे

(4) प्रतिभूति अपील अधिकरण उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति, अपील के पक्षकारों और संबद्ध न्यायनिर्णायक अधिकारी को भेजेगा

(5) उपधारा (1) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्यवाही की जाएगी और उस अपील का, अपील की प्राप्ति की तारीख से छह मास के भीतर, अंतिम रूप से निपटारा करने का प्रयास किया जाएगा

23. अपराध-(1) इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा शास्ति के किसी अधिनिर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों या उपविधियों के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उनके उल्लंघन के लिए दुष्प्रेरण करेगा, जिसके लिए इस अधिनियम में अन्यत्र किसी दंड का उपबंध नहीं है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडनीय होगा

(2) यदि कोई व्यक्ति न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहेगा या उसके किन्हीं निदेशों या आदेशों का पालन करने में असफल रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास से कम की नहीं होगी, किन्तु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा

23. कतिपय अपराधों का शमन-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय ऐसे किसी अपराध का जो केवल कारावास से और जुर्माने से भी दंडनीय अपराध नहीं है, किसी कार्यवाही को संस्थित करने से पूर्व या पश्चात्, किसी ऐसे प्रतिभूति अपील अधिकरण या किसी न्यायालय द्वारा शमन किया जाएगा, जिसके समक्ष ऐसी कार्यवाहियां लंबित हैं

23. उन्मुक्ति देने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा सिफारिश किए जाने पर यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसे किसी व्यक्ति ने, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उसने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों में से किसी का अतिक्रमण किया है, अभिकथित अतिक्रमण के संबंध में पूरा और सही प्रकटन किया है तो वह ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन किसी अपराध के अभियोजन से या अभिकथित अतिक्रमण के संबंध में इस अधिनियम के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण से भी उन्मुक्ति प्रदान कर सकेगी :

परंतु ऐसी कोई उन्मुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे मामलों में नहीं दी जाएगी, जिनमें ऐसे किसी अपराध के लिए अभियोजन की कार्यवाहियां ऐसी उन्मुक्ति के अनुदान के लिए आवेदन की प्राप्ति की तारीख से पूर्व संस्थित की जा चुकी हैं :

परंतु यह और कि इस उपधारा के अधीन भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की सिफारिश केन्द्रीय सरकार पर आबद्धकारी नहीं होगी

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को अनुदत्त उन्मुक्ति किसी भी समय केन्द्रीय सरकार द्वारा वापस ली जा सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति ने कार्यवाहियों के अनुक्रम में उस शर्त का पालन नहीं किया था, जिसके अधीन उन्मुक्ति दी गई थी या उसने मिथ्या साक्ष्य दिया था और तदुपरांत, ऐसे व्यक्ति का ऐसे अपराध के लिए, जिसके संबंध में उन्मुक्ति दी गई थी या किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए, जिसका वह उल्लंघन के संबंध में दोषी रहा प्रतीत होता है, विचारण किया जा सकेगा और वह, इस अधिनियम के अधीन ऐसी शास्ति के अधिरोपण का भी दायी हो जाएगा जिसके लिए ऐसा व्यक्ति उस समय दायी होता, यदि उसे ऐसी उन्मुक्ति नहीं दी गई होती ]

24. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के    भागी होंगे :

परन्तु इस धारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह साबित कर देता है कि वह अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है, या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी घोर उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां उस कम्पनी का ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए,-

                () “कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है,

                ()  [“निदेशक" से,-

(i) किसी फर्म के संबंध में उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है;

(ii) व्यक्तियों के किसी संगम या व्यष्टियों के किसी निकाय के संबंध में ऐसा कोई सदस्य अभिप्रेत है जो उसके कार्यकलाप पर नियंत्रण रखता है ]

 [(3) इस धारा के उपबन्ध, धारा 22 के उपबन्धों के अतिरिक्त होंगे, कि उनके अल्पीकरण में ]

25. कतिपय अपराधों का संज्ञेय होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5)  में किसी बात के होते हुए भी, धारा 23  *** के अधीन दण्डनीय कोई अपराध उस संहिता के अर्थान्तर्गत संज्ञेय अपराध समझा जाएगा

 [26. न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान-(1) कोई न्यायालय इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों अथवा उपविधियों के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज या किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर के सिवाय नहीं लेगा ]

                                                                                                                                                                                       

 [26. विशेष न्यायालयों की स्थापना किया जाना-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपराधों का शीघ्र विचारण प्रदान करने के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा, उतने विशेष न्यायालयों को, जितने आवश्यक हों, स्थापित या नामनिर्दिष्ट कर सकेगी

(2) विशेष न्यायालय, ऐसे एकल न्यायाधीश से गठित होगा, जो केंद्रीय सरकार द्वारा ऐसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, जिसकी अधिकारिता के भीतर नियुक्त किया जाने वाला न्यायाधीश कार्यरत है, नियुक्त किया जाएगा

(3) कोई व्यक्ति किसी विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक वह ऐसी नियुक्ति से ठीक पूर्व, यथास्थिति, किसी सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश का पद धारण नहीं कर रहा है

26. विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय अपराध-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, प्रतिभूति विधि (संशोधन) अधिनियम, 2014 के प्रारंभ की तारीख से पूर्व या ऐसे प्रारंभ की तारीख को या उसके पश्चात् किए गए इस अधिनियम के अधीन सभी अपराधों का, ऐसे क्षेत्र के लिए, जिसमें अपराध किया गया है, स्थापित विशेष न्यायालय द्वारा या जहां ऐसे क्षेत्र के लिए एक से अधिक विशेष न्यायालय हैं, उनमें से ऐसे किसी एक द्वारा, जो संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, संज्ञान लिया जाएगा और विचारण किया जाएगा

26. अपील और पुनरीक्षण-उच्च न्यायालय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 29 और अध्याय 30 द्वारा, उच्च न्यायालय को प्रदत्त सभी शक्तियों का, जहां तक लागू हो सकें, उसी प्रकार प्रयोग कर सकेगा मानो उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कोई विशेष न्यायालय, उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला कोई सेशन न्यायालय हो

26. विशेष न्यायालयों के समक्ष कार्यवाहियों में संहिता का लागू होना-(1) इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध, विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय का, सेशन न्यायालय होना समझा जाएगा तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति का, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2 के खंड () के अर्थांतर्गत लोक अभियोजक होना समझा जाएगा

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति को, सात वर्ष से अन्यून के लिए अधिवक्ता के रूप में व्यवसाय में होना चाहिए या संघ या राज्य के अधीन सात वर्ष से अन्यून की अवधि के लिए विधि के विशेष ज्ञान की अपेक्षा करने वाले किसी पद को धारण करना चाहिए

26. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध का, जो विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय है, जब तक विशेष न्यायालय स्थापित किया जाए, तब तक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी क्षेत्र पर अधिकारिता का प्रयोग करने वाले सेशन न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाएगा और विचारण किया जाएगा :

परंतु इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात, इस धारा के अधीन सेशन न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए गए किसी मामले या मामलों के वर्ग को अंतरित करने के लिए संहिता की धारा 407 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्तियों को प्रभावित नहीं करेगी ]

प्रकीर्ण

27. लाभांशों के लिए हक-(1) किसी प्रतिभूति के धारक के लिए, जिसका उक्त प्रतिभूति को जारी करने वाली कम्पनी की बहियों में नाम है, किसी वर्ष के लिए उस कम्पनी द्वारा उसकी बाबत घोषित किसी लाभांश को प्राप्त करना और रखे रहना, इस बात के होते हुए भी, विधिपूर्ण होगा कि उक्त प्रतिभूति उसके द्वारा पहले से सप्रतिफल अन्तरित की जा चुकी है, जब तक कि अन्तरिती ने जो अन्तरक से लाभांश का दावा करता है वह प्रतिभूति और अन्तरण से सम्बन्धित अन्य सभी दस्तावेजें जिनकी कम्पनी द्वारा अपेक्षा की जाए, अपने नाम से रजिस्ट्री करने के लिए कम्पनी के पास लाभांश शोध्य होने की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर दाखिल कर दी हों

स्पष्टीकरण-इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट अवधि,-

(i) अन्तरिती की मृत्यु की दशा में, उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा लाभांश के लिए अपना दावा साबित करने में लगाई गई वास्तविक अवधि तक;

(ii) अन्तरण विलेख के चोरी से या अन्तरिती के नियन्त्रण के बाहर के किसी अन्य कारण से खो जाने की दशा में, उसके प्रतिस्थापन के लिए लगाई गई वास्तविक अवधि तक; और

(iii) डाक सम्बन्धी कारणों की वजह से किसी प्रतिभूति और अन्तरण से सम्बन्धित अन्य दस्तावेजों के दाखिल किए जाने में विलम्ब की दशा में, ऐसे विलम्ब की वास्तविक अवधि तक,

बढ़ाई जाएगी

(2) उपधारा (1) की कोई बात,-

() किसी कम्पनी के किसी ऐसे लाभांश को जो शोध्य हो गया है, किसी व्यक्ति को जिसका नाम तत्समय कम्पनी की बहियों में उस प्रतिभूति के, जिसकी बाबत लाभांश शोध्य हो गया है, धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, संदाय करने के अधिकार पर; या

() किसी प्रतिभूति के अन्तरिती के, किसी अन्तरक या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी किसी दशा में जिसमें कम्पनी ने अन्तरिती के नाम में प्रतिभूति के अन्तरण को रजिस्टर करने से इंकार कर दिया है, अन्तरण से सम्बन्धित अपने अधिकारों को, यदि कोई हों, प्रवर्तित कराने के अधिकार पर,

प्रभाव नहीं डालेगी

 [27. सामूहिक विनिधान स्कीम से आय प्राप्त करने का अधिकार-(1) किन्हीं ऐसी प्रतिभूतियों के, जो सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिट या अन्य लिखत हैं, धारक के लिए, जिसका नाम उक्त प्रतिभूति को जारी करने वाली सामूहिक विनिधान स्कीम की बहियों में है, किसी वर्ष के लिए सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा उसकी बाबत घोषित सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिटों या अन्य लिखतों की बाबत किसी आय को प्राप्त करना और रखे रहना, इस बात के हाते हुए भी, विधिपूर्ण होगा कि उक्त प्रतिभूति, जो सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिट और अन्य लिखत हैं, उसके द्वारा पहले ही  सप्रतिफल अन्तरित की जा चुकी है, तब तक कि अन्तरिती ने, जो अन्तरक से सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिटों या अन्य लिखतों की बाबत अन्तरण से आय का दावा करता है, वह प्रतिभूति और अन्तरण से संबंधित अन्य सभी दस्तावेजें, जिनकी सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा अपेक्षा की जाए, अपने नाम से रजिस्टर करने के लिए सामूहिक विनिधान स्कीम के पास सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिटों या अन्य लिखतों की बाबत आय के शोध्य होने की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर दाखिल कर दिए हों

स्पष्टीकरण-इस धारा में विनिर्दिष्ट अवधि,-

(i) अन्तरिती की मृत्यु की दशा में, उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिटों या अन्य लिखतों की बाबत आय के लिए अपना दावा साबित करने में लगाई गई वास्तविक अवधि तक; और

(ii) अन्तरण विलेख के चोरी से या अन्तरिती के नियंत्रण के बाहर के किसी अन्य कारण से खो जाने की दशा में, उसके प्रतिस्थापन के लिए लगाई गई वास्तविक अवधि तक;

(iii) डाक संबंधी कारणों से किसी प्रतिभूति के, जो सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिट या अन्य लिखत हैं, और अन्तरण से संबंधित अन्य दस्तावेजों के दाखिल किए जाने में विलम्ब की दशा में, ऐसे विलम्ब की वास्तविक अवधि तक,

बढ़ाई जाएगी

(2) उपधारा (1) की कोई बात,-

() किसी सामूहिक विनिधान स्कीम के सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिटों या अन्य लिखतों की किसी ऐसी आय को, जो शोध्य हो गई है किसी व्यक्ति को, जिसका नाम तत्समय सामूहिक विनिधान स्कीम की बहियों में उस प्रतिभूति के जो सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिट या अन्य लिखत हैं, जिनकी बाबत सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिटों या अन्य लिखतों की बाबत आय शोध्य हो गई है, धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, संदाय करने के अधिकार पर; या

() किसी प्रतिभूति के, जो सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिट या अन्य लिखत हैं, अन्तरिती के अन्तरक या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी किसी दशा में, जिसमें कंपनी ने अन्तरिती के नाम में प्रतिभूति के, जो सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी किए गए यूनिट या अन्य लिखत हैं, अन्तरण को रजिस्टर करने से इन्कार कर दिया है अन्तरण से संबंधित अपने अधिकारों को, यदि कोई हों, प्रवर्तित कराने के अधिकार पर,

प्रभाव नहीं डालेगी ]

                 [27. पारस्परिक निधि से आय प्राप्त करने का अधिकार-(1) किन्हीं ऐसी प्रतिभूतियों के, जो किसी पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटें या अन्य लिखतें हैं, ऐसे धारक के लिए जिसका नाम उक्त प्रतिभूति को जारी करने वाली पारस्परिक निधि की बहियों में है, किसी वर्ण के लिए उनके संबंध में पारस्परिक निधि द्वारा घोषित, पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटों या अन्य लिखतों से संबंधित किसी आय को प्राप्त करना और उसको प्रतिधारित करना इस बात के होते हुए भी, विधिपूर्ण होगा कि उक्त प्रतिभूति, जो पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटें और अन्य लिखतें हैं, उसके द्वारा पहले ही प्रतिफल के लिए अंतरित की जा चुकी हैं, जब तक कि अंतरिती ने, जो पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटों या अन्य लिखतों के संबंध में अंरतण से आय का दावा करता है, प्रतिभूति और अंतरण से संबंधित अन्य सभी दस्तावेजों को, जिनकी पारस्परिक निधि द्वारा अपेक्षा की जाए, अपने नाम से रजिस्टर करने के लिए पारस्परिक निधि के पास, पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटों या अन्य लिखतों से संबंधित आय के शोध्य होने की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर, दाखिल कर दिया हो

                स्पष्टीकरण-इस धारा में विनिर्दिष्ट अवधि,-

(i) अन्तरिती की मृत्यु की दशा में, उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा, पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटों और अन्य लिखतों से संबंधित आय के लिए अपना दावा सिद्ध करने में लगाई गई वास्तविक अवधि तक;

(ii) अंतरण विलेख के चोरी हो जाने के कारण या अंतरिती के नियंत्रण के परे किसी अन्य कारण से खो जाने की दशा में, उसके प्रतिस्थापन के लिए लगाई गई वास्तविक अवधि तक; और

(iii) डाक संबंधी कारणों से किसी प्रतिभूति के, जो पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिट या अन्य लिखत हैं, और अंतरण से संबंधित अन्य दस्तावेजों के दाखिल किए जाने में विलम्ब की दशा में, ऐसे विलंब की वास्तविक अवधि तक,

बढ़ाई जाएगी

(2) उपधारा (1) की कोई बात,-

() किसी पारस्परिक निधि के, पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटों या अन्य लिखतों की किसी ऐसी आय को, जो किसी व्यक्ति को शोध्य हो गई है, जिसका नाम तत्समय पारस्परिक निधि की बहियों में उस प्रतिभूति के, जो पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिट या अन्य लिखत है, जिनकी बाबत और पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटों या अन्य लिखतों की बाबत आय शोध्य हो गई है, धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, संदाय करने के अधिकार पर; या

() किसी प्रतिभूति के, जो पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिट या अन्य लिखतें हैं, अंतरिती के अंतरणकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध किसी दशा में, जिसमें कंपनी ने अंतरिती के नाम में प्रतिभूति के, जो पारस्परिक निधि द्वारा जारी की गई यूनिटें या अन्य लिखतें हैं, अंतरण को रजिस्टर करने से इंकार कर दिया है, अंतरण से संबंधित अपने अधिकारों को, यदि कोई हों, प्रवर्तित करने के अधिकार पर,

प्रभाव नहीं डालेगी ]

                 [28. कतिपय दशाओं में अधिनियम का लागू होना-(1) इस अधिनियम के उपबन्ध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे, अर्थात् :-

() सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक, कोई स्थानीय प्राधिकारी या किसी विशेष विधि द्वारा स्थापित कोई निगम या कोई ऐसा व्यक्ति जिसने किसी ऐसे प्राधिकारी के अधिकरण के साथ या उसके माध्यम से जो इस खण्ड में निर्दिष्ट है, कोई संव्यवहार किया है;

() कोई संपरिवर्तनीय बन्धपत्र या शेयर वारण्ट या उससे सम्बन्धित कोई विकल्प या अधिकार, जहां तक वह उस व्यक्ति को, जिसके पक्ष में पूर्व कथित में से कोई जारी किया गया है, उसे जारी करने वाली कम्पनी या अन्य निगमित निकाय से या उसके शेयरधारकों या सम्यक्तः नियुक्त अभिकर्ताओं में से किसी से, उसके जारी किए जाने के समय करार पाई गई कीमत के आधार पर, चाहे बन्धपत्र या वारण्ट के संपरिवर्तन द्वारा या अन्यथा, उस व्यक्ति के विकल्प पर उस कम्पनी, या अन्य निगमित निकाय के शेयर प्राप्त करने का हकदार बनाता है

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि व्यापार और वाणिज्य या देश के आर्थिक विकास के हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह, राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा, किसी वर्ग की संविदाओं को ऐसी संविदाओं के रूप में जिनको यह अधिनियम या इसके कोई उपबन्ध लागू नहीं होंगे, और ऐसी शर्तें, मर्यादाएं या निर्बन्धन भी, यदि कोई हों, जिनके अधीन वे इस प्रकार लागू नहीं होंगे, विनिर्दिष्ट कर सकती है ]

29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, किसी भी ऐसी बात के बारे में जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों या उपविधियों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय या उसके किसी सदस्य, पदाधिकारी या सेवक के विरुद्ध या धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के विरुद्ध किसी न्यायालय में होगी

 [29. प्रत्यायोजित करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियां (धारा 30 के अधीन शक्तियों के सिवाय) ऐसे विषयों के संबंध में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भी प्रयोक्तव्य होंगी ]

30. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकती है

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात् :-

() वह रीति जिससे आवेदन किए जा सकते हैं, वे विशिष्टियां जो उनमें अन्तर्विष्ट होंगी और ऐसे आवेदनों की बाबत फीस का उद्ग्रहण;

() वह रीति जिससे किसी स्टाक एक्सचेंज को मान्यता देने के प्रयोजन के लिए कोई जांच की जा सकती हैं, वे शर्तें जो ऐसी मान्यता देने के लिए अधिरोपित की जा सकती हैं जिनके अन्तर्गत यदि सम्पृक्त स्टाक एक्सचेंज को उस क्षेत्र में एकमात्र मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज होना है तो सदस्यों के प्रवेश के बारे में शर्तें भी हैं, और वह प्ररूप जिसमें ऐसी मान्यता दी जाएगी;

() वे विशिष्टियां जो केन्द्रीय सरकार को दी जाने वाली नियत कालिक विवरणियों में और वार्षिक रिपोर्टों         में होंगी;

() वे दस्तावेजें जो धारा 6 के अधीन रखी जाएंगी और परिरक्षित की जाएंगी और वे अवधियां जिनके लिए वे परिरक्षित की जाएंगी;

() वह रीति जिससे धारा 6 के अधीन किसी स्टाक एक्सचेंज के शासी निकाय द्वारा कोई जांच की जाएगी;

() वह रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन बनाई या संशोधित की जाने वाली उपविधियां इस प्रकार बनाई या संशोधित की जाने के पहले आलोचना के लिए प्रकाशित की जाएंगी;

() वह रीति जिससे प्रतिभूतियों के व्यौहारियों द्वारा धारा 17 के अधीन अनुज्ञप्तियों के लिए आवेदन किए जा सकते हैं, उनकी बाबत संदेय फीस और ऐसी अनुज्ञप्तियों की अवधि, वे शर्तें जिनके अधीन ऐसी अनुज्ञप्तियां दी जा सकती हैं, जिनके अन्तर्गत ऐसी संविदाओं के करने में उपयोग किए जाने वाले प्ररूपों से सम्बन्धित, अनुज्ञप्त व्यौहारियों द्वारा रखी जाने वाली दस्तावेजों से सम्बन्धित और ऐसे प्राधिकारी को जो विनिर्दिष्ट किया जाए, नियतकालिक सूचना देने से सम्बन्धित और शर्तों के भंग होने पर अनुज्ञप्तियों के प्रतिसंहरण से संबंधित शर्तें भी हैं;

 [() वे अपेक्षाएं जिनका अनुपालन-

() पब्लिक कंपनियों द्वारा किसी स्टॉक एक्सचेंज में अपनी प्रतिभूतियों को सूचीबद्ध कराने के प्रयोजन के लिए किया जाएगा;

() सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा किसी स्टॉक एक्सचेंज में अपने यूनिटों को सूचीबद्ध कराने के प्रयोजन के लिए किया जाएगा;

 [(जक) वे आधार, जिन पर धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज से किसी कंपनी की प्रतिभूतियों को सूची से हटाया जा सकेगा;

(जख) वह प्ररूप, जिसमें धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और ऐसी अपील के संबंध में संदेय फीस;

(जग) वह प्ररूप, जिसमें धारा 22 के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और ऐसी अपील के संबंध में संदेय फीस;

(जघ) धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन जांच की रीति;

(जङ) वह प्ररूप, जिसमें धारा 23 के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और ऐसी अपील के संबंध में संदेय फीस;]

() कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है

                1[(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

                 [30. वस्तु व्युत्पन्नों से संबंधित विशेष उपबंध-(1) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई बात अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को लागू नहीं होगी :

परंतु कोई व्यक्ति किसी ऐसे क्षेत्र में जिसको धारा 13 के उपबंध लागू किए गए हैं, तो (किसी स्टॉक एक्सचेंज से भिन्न) किसी ऐसे संगम का गठन करेगा और उसके गठन में सहायता करेगा और उसका सदस्य होगा, जो संविदा के दूसरे पक्षकार या उससे या संविदा में नामित किसी दूसरे पक्षकार को या उससे वास्तविक परिदान किए बिना या प्राप्त किए बिना उसके किसी पक्षकार द्वारा किसी अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा के पालन की सुविधाएं प्रदान करता है

(2) जहां किसी क्षेत्र की बाबत, धारा 13 के उपबंध किसी माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए वस्तु व्युत्पन्नों के संबंध में लागू किए गए हैं वहां केंद्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि उक्त क्षेत्र या उसके किसी ऐसे भाग में, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, इस अधिनियम के सभी या कोई उपबंध उक्त माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को साधारणतया लागू नहीं होंगे या विशिष्टतया ऐसी संविदाओं के किसी वर्ग को लागू         नहीं  होंगे

(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यदि केंद्रीय सरकार की यह राय है कि व्यापार के हित में या लोक हित में किसी क्षेत्र में अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को विनियमित या नियंत्रित किया जाना समीचीन है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि इस अधिनियम के सभी या कोई उपबंध ऐसे क्षेत्र में अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं के ऐसे वर्ग या वर्गों को और ऐसे माल या माल के वर्ग की बाबत, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, लागू होंगे और वह ऐसी रीति, जिसमें तथा वह सीमा, जिस तक उक्त सभी या कोई उपबंध इस प्रकार लागू होंगे, भी विनिर्दिष्ट कर सकेगी ]

 [31. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की विनियम बनाने की शक्ति-(1) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 30 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत हों

 [(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-

() वह रीति जिसमें किसी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज की साधारण शेयर पूंजी का, कम-से-कम इक्यावन प्रतिशत ऐसे शेयरधारकों से भिन्न, जिनके पास उस धारा की उपधारा (8) के अधीन व्यापार अधिकार हैं, जनता द्वारा धारा 4 की उपधारा (7) के अधीन आदेश के प्रकाशन की तारीख से बारह मास के भीतर धारित किया जाता है;

() धारा 17 के अधीन पात्रता का मानदंड और अन्य अपेक्षाएं;]

 [() धारा 23ञक की उपधारा (2) के अधीन कार्यवाहियों के निपटारे के लिए बोर्ड द्वारा अवधारित निबंधन;

() कोई अन्य विषय जिनको विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है या जिनको विनिर्दिष्ट किया जाए या जिनके संबंध में उपबंध, विनियमों द्वारा किया जाना है ]

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु विनिमय के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

31. [निरसित]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और प्रथम अनुसूची द्वारा निरसित

 [32. कतिपय अधिनियमों का विधिमान्यकरण-प्रशासनिक तथा सिविल कार्यवाहियों के निपटान के संबंध में मूल अधिनियम के अधीन किया गया या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई कार्य या कोई बात, सभी प्रयोजनों के लिए इस प्रकार विधिमान्य और प्रभावी समझी जाएगी मानो मूल अधिनियम में किए गए संशोधन सभी तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त रहे हों ]

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