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कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबन्ध) अधिनियम, 1965 ( Taxation Laws (Amendment and Miscellaneous Provisions) Act, 1965 )


 

कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबन्ध) अधिनियम, 1965

(1965 का अधिनियम संख्यांक 41)

[4 दिसम्बर, 1965]

आय-कर अधिनियम, 1961, संपदा-शुल्क अधिनियम, 1953, धन-कर अधिनियम, 1957,

दान-कर अधिनियम, 1958, का और संशोधन करने और राष्ट्रीय

रक्षा स्वर्ण बंधपत्र, 1980 में विनिहित किन्तु प्रकट की

गई आय के कुछ मामलों में कर से छूट का

 उपबंध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के सोलहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो-

1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1965 है । 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

8. राष्ट्रीय रक्षा स्वर्ण बंधपत्र, 1980 में विनिहित किन्तु प्रकट की गई आय के कुछ मामलों में कर से छूट-(1) जहां कोई ऐसा व्यक्ति, जिसने अपनी ऐसी आय से, जो उसने इंडियन इनकम टैक्स ऐक्ट, 1922 (1922 का 11) या आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या एक्सेस प्रोफिट्स टैक्स ऐक्ट, 1940 (1940 का 15) या बिजनेस प्रोफिट्स टैक्स ऐक्ट, 1947 (1947 का 21) या सुपर प्रोफिट्स टैक्स ऐक्ट, 1963 (1963 का 14) या कंपनी (लाभ) अतिकर अधिनियम, 1964 (1964 का 7) के प्रयोजनों के लिए प्रकट नहीं की है, कुछ स्वर्ण अर्जित किया है, आय-कर अधिकारी द्वारा ऐसी आय का पता चलने के पूर्व या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसे स्वर्ण के अभिग्रहण के पूर्व ऐसा स्वर्ण, राष्ट्रीय रक्षा स्वर्ण बंधपत्र, 1980 के लिए अभिदाय के रूप में देती है, वहां ऐसी आय उक्त अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी 1965 के अक्तूबर के बीसवें दिन को या उसके पश्चात् उक्त अधिनियमों के अधीन किसी निर्धारण वर्ष के लिए किए गए किसी निर्धारण या पुनःनिर्धारण में उक्त अधिनियमों के अधीन उसकी कर प्रभार्य आय, लाभ या अभिलाभ में सम्मिलित नहीं की जाएगी ।

(2) धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27) के अधीन किसी व्यक्ति के कुछ धन की संगणना करने में ऐसी आय द्वारा प्रतिदर्शित आस्तियों का मूल्य, जो उपधारा (1) के अधीन उसकी आय, लाभ या अभिलाभ में सम्मिलित नहीं की जा सकती है, उक्त अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, 1965 के अक्तूबर के बीसवें दिन को या उसके पश्चात् उक्त अधिनियम के अधीन किसी निर्धारण वर्ष के लिए किए गए किसी निर्धारण या पुनःनिर्धारण में हिसाब में नहीं लिया जाएगा । 

(3) (क) राष्ट्रीय रक्षा स्वर्ण बंधपत्र, 1980 को अभिदाय करने वाले व्यक्ति का नाम और उसके द्वारा अभिदाय किए गए बंधपत्र से संबंधित विशिष्टियां गुप्त रखी जाएंगी और तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय, किसी लोक सेवक को ऐसे व्यक्ति का नाम या ऐसी विशिष्टियां प्रकट करने या उनके बारे में कोई साक्ष्य देने की अपेक्षा करने का हकदार नहीं होगा ।

(ख) कोई भी लोक सेवक, राष्ट्रीय रक्षा स्वर्ण बंधपत्र,1980 को अभिदाय करने वाले व्यक्ति का नाम या उसके द्वारा अभिदाय किए गए बंधपत्र से संबंधित विशिष्टियां प्रकट नहीं करेगा, सिवाय उस अधिकारी को, जो उपधारा (1) में वर्णित अधिनियमों में से किसी के निष्पादन में या धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27) के निष्पादन में नियोजित है या उस अधिकारी को, जो भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या [केन्द्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित] केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा आय-कर की प्राप्तियों या प्रतिदायों की लेखापरीक्षा करने के लिए नियुक्त है ।

(4) इस धारा में-

(क) स्वर्ण" से किसी भी आकृति या रूप का स्वर्ण अभिप्रेत है, जिसके अन्तर्गत उसकी मिश्र धातु भी है, चाहे वह अपने मूलरूप में हो, गलाया हुआ हो, पुनःगलाया हुआ हो, गढा हुआ या अनगढ़ा हो, और इसके अन्तर्गत कोई स्वर्ण का सिक्का (चाहे विधिमान्य सिक्का हो या न हो), कोई आभूषण और स्वर्ण की कोई अन्य वस्तु भी है; 

(ख) लोक सेवक" के अन्तर्गत भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक या भारतीय स्टेट बैंक के किसी समनुषंगी बैंक का कोई अधिकारी या अन्य कर्मचारी है । 

9. निरसन और व्यावृत्ति-(1) कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अध्यादेश, 1965 (1965 का 5) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है । 

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी उक्त अध्यादेश के अधीन की गई किसी बात या की गई किसी कार्रवाई के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम के अधीन की गई है मानो इस अधिनियम का प्रारम्भ 19 अक्तूबर, 1965 को हुआ हो ।

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