संघ राज्यक्षेत्र (न्यायिक और कार्यपालक कृत्यों का पृथक्करण) अधिनियम, 1969
(1969 का अधिनियम संख्यांक 19)
[31 मई, 1969]
संघ राज्यक्षेत्रों में न्यायिक और कार्यपालक
कृत्यों के पृथक्करण का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम संघ राज्यक्षेत्र (न्यायिक और कार्यपालक कृत्यों का पृथक्करण) अधिनियम, 1969 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के सिवाय सभी संघ राज्यक्षेत्रों पर है ।
(3) यह किसी भी संघ राज्यक्षेत्र में, जिस पर इसका विस्तार है, उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उसकी बाबत नियत करे :
परन्तु किसी संघ राज्यक्षेत्र में विभिन्न क्षेत्रों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी तथा किसी संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी क्षेत्र के सम्बन्ध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश से वह तारीख अभिप्रेत होगी जिसको यह उस संघ राज्यक्षेत्र या क्षेत्र में प्रवृत्त हो ।
2. परिभाषा-धारा 3 से 9 तक में संघ राज्यक्षेत्र" से चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र से भिन्न कोई संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ।
3. दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 में संशोधन-किसी संघ राज्यक्षेत्र को लागू होने में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) को न्यायिक और कार्यपालक कृत्यों के पृथक्करण के प्रयोजन के लिए उस रीति से और उस विस्तार तक संशोधित किया जाएगा जो अनुसूची में विनिर्दिष्ट है ।
4. अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की अधिसूचनाओं आदि का संशोधन के कारण अविधिमान्य न हो जाना-इस अधिनियम के वे उपबन्ध, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) को ऐसे संशोधित करते हैं कि वह रीति जिससे, वह प्राधिकारी जिसके द्वारा, या वह विधि जिसके अधीन या जिसके अनुसार कोई शक्तियां प्रयोक्तव्य हैं, परिवर्तित हो जाए, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सम्यक् रूप से की गई या निकाली गई किसी भी अधिसूचना, आदेश, सुपुर्दगी, कुर्की, उपविधि, नियम या विनियम, या सम्यक् रूप से की गई किसी भी बात को अविधिमान्य नहीं बना देंगे और ऐसी कोई भी अधिसूचना, आदेश सुपुर्दगी, कुर्की, उपविधि, नियम या विनियम या बात उसी रीति से, उसी विस्तार तक और उन्हीं परिस्थितियों में प्रतिसंहृत की जा सकेगी, उसमें फेरफार किया जा सकेगा, या उसे अकृत किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् सक्षम प्राधिकारी द्वारा और ऐसे मामले को तत्समय लागू उपबन्धों के अनुसार सम्यक् रूप से की गई या निकाली गई थी ।
5. न्यायिक और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों द्वारा किए जाने वाले कृत्य-जहां किसी भी विधि के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा किए जाने वाले कृत्य, उन विषयों से सम्बन्ध रखते हों जिनमें साक्ष्य का मूल्यांकन या उसकी छानबीन या किसी ऐसे विनिश्चय की विरचना अन्तर्ग्रस्त हो, जो किसी व्यक्ति को किसी दण्ड या शास्ति के लिए, या अन्वेषण, जांच या विचारण लम्बित रहने तक अभिरक्षा में निरोध के लिए उच्छन्न करता हो, या जिसका प्रभाव किसी व्यक्ति को किसी न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए भेजने का हो, वहां ऐसे कृत्य, इस अधिनियम के और इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित दण्ड प्रक्रिया संहिता, 18982 (1898 का 5) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किए जा सकेंगे; और जहां ऐसे कृत्य उन विषयों से सम्बन्ध रखते हों जो प्रशासनिक या कार्यपालक प्रकृति के हों, जैसे कोई अनुज्ञाप्ति देना, कोई अनुज्ञप्ति निलम्बित या रद्द करना, कोई अभियोजन मंजूर करना या किसी अभियोजन के प्रत्याहरण, वहां वे यथापूर्वोक्त अध्यधीन रहते हुए किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किए जा सकेंगे ।
6. हिमाचल प्रदेश के अन्तरित क्षेत्रों में विधियों का निरसन-हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के अन्तरित क्षेत्रों में, इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, पंजाब (सेपरेशन ऑफ ज्यूडीशल एण्ड एक्जीक्यूटिव फंकशन्स) ऐक्ट, 1964 (1964 का पंजाब अधिनियम 25) और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) जैसे कि वे ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व उक्त क्षेत्रों में प्रवृत्त थे, उन बातों के सम्बन्ध में के सिवाय निरसित हो जाएंगे जो ऐसे निरसन के पूर्व उक्त पंजाब अधिनियम के अधीन या उक्त पंजाब अधिनियम द्वारा संशोधित विधियों के उपबन्धों के अधीन की गई थीं या जिनके किए जाने का ऐसे लोप किया गया था और ऐसे निरसन पर साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 ऐसे लागू होगी मानो ऐसा निरसन किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा किसी अधिनियमिति का निरसन हो; और इस अधिनियम द्वारा यथा संशोधित उक्त संहिता, ऐसे प्रारम्भ पर, उक्त क्षेत्रों में विस्तारित और प्रवृत्त हो जाएगी, तथा उक्त पंजाब अधिनियम द्वारा संशोधित (उक्त संहिता से भिन्न) विधियों के उपबन्ध उक्त क्षेत्रों में वैसे ही प्रभावी होंगे मानो वे उपबन्ध उक्त पंजाब अधिनियम द्वारा संशोधित नहीं किए गए हों ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में अन्तरित क्षेत्र" से, लाहौल और स्पिति जिलों में समाविष्ट राज्यक्षेत्रों के सिवाय, वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जो पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) की धारा 5 की उपधारा (1) द्वारा हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में जोड़ दिए गए हैं ।
7. व्यावृत्ति-(1) इस धारा में यथा उपबन्धित के सिवाय, इस अधिनियम की किसी भी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह-
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की गई या की जानी सहन की गई किसी भी बात की विधिमान्यता, अवधिमान्यता, प्रभाव या परिणाम पर,
(ख) ऐसे प्रारम्भ के पूर्व अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व पर;
(ग) ऐसे प्रारम्भ के पूर्व किसी कार्य की बाबत, उपगत या अधिरोपित किसी शास्ति, समपहरण या दंड पर;
(घ) ऐसे अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दंड के बारे में किसी अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार पर,
प्रभाव डालती है और ऐसा कोई भी अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार इस अधिनियम के और इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबन्धों के अनुसार संस्थित किया, चालू रखा या प्रवर्तित किया जा सकेगा और ऐसी कोई भी शास्ति, समपहरण या दंड उक्त उपबन्धों के अनुसार अधिरोपित किया जा सकेगा ।
(2) वे सब विधिक कार्यवाहियां जो किसी मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व लम्बित हों, यदि इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबन्धों के अधीन ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय का ऐसी कार्यवाहियों की बाबत अधिकारिता रखना समाप्त हो जाए तो, ऐसे प्रारम्भ पर उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय को अन्तरित हो जाएंगी जिसे इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 के उपबन्धों के अधीन अधिकारिता हो, और ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा सुनी और निपटाई जाएंगी तथा ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय को उनकी बाबत सब शक्तियां और अधिकारिता, जिनके अन्तर्गत दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 350 के अधीन उत्तरवर्ती मजिस्ट्रेट की शक्ति भी है, वैसे ही होंगी, मानो वे ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष या ऐसे न्यायालय में मूलतः संस्थित की गई थीं ।
8. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न हो तो सम्बद्ध संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा कोई भी ऐसी बात (जिसके अन्तर्गत किसी भी विधि के अधीन अधिकारिता रखने वाले समुचित मजिस्ट्रेट को, चाहे वह न्यायिक हो या कार्यपालक, विनिर्दिष्ट करना भी है) उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए कर सकेगी जो ऐसे उपबन्धों से असंगत न हो:
परन्तु ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में उच्च न्यायालय" का वही अर्थ होगा जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (i) में है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
9. इस अधिनियम को संशोधित करने की संघ राज्यक्षेत्र विधान सभा की शक्ति-संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 21 में किसी बात के होते हुए भी, संघ राज्यक्षेत्र विधान सभा इस अधिनियम का उस संघ राज्यक्षेत्र को इसके लागू होने के सम्बन्ध में संशोधन, विधि द्वारा, कर सकेगी ।
अनुसूची
(धारा 3 देखिए)
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में संशोधन
1. धारा 6 के स्थान पर, निम्नलिखित धाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
6. दण्ड न्यायालयों के वर्ग-उच्च न्यायालय के और इस संहिता से भिन्न किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन गठित न्यायालयों के अतिरिक्त दण्ड न्यायालयों के दा वर्ग होंगे, अर्थात्: -
i. सेशन न्यायालय ।
ii. मजिस्ट्रेटों के न्यायालय ।
क 1-मजिस्ट्रेटों के वर्ग
6क. मजिस्ट्रेटों के वर्ग-मजिस्ट्रेटों के निम्नलिखित वर्ग होंगे, अर्थात्: -
i. न्यायिक मजिस्ट्रेट:
(1) मुख्य न्यायिक मजिस्टेट ।
(2) प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ।
(3) द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ।
ii. कार्यपालक मजिस्ट्रेट:
(1) जिला मजिस्ट्रेट ।
(2) उपखंड मजिस्ट्रेट ।
(3) प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट ।
(4) द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट ।
(5) विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ।"।
2. धारा 7 की उपधारा (2) तथा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
(2) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार ऐसे खंडों और जिलों की सीमाओं या संख्याओं में परिवर्तन कर सकेगी ।
(3) जो सेशन-खण्ड और जिले किसी संघ राज्यक्षेत्र में, संघ राज्यक्षेत्र (न्यायिक और कार्यपालक कृत्यों का पृथक्करण) अधिनियम, 1969 के उस संघ राज्यक्षेत्र में प्रारम्भ होने के ठीक पूर्व वर्तमान हैं, वे क्रमशः सेशन-खण्ड और जिले रहेंगे, यदि और जब तक वे उपधारा (2) में उपबन्धित प्रकार से परिवर्तित न कर दिए जाएं ।"।
3. धारा 9 में, -
(i) उपधारा (1) में, न्यायाधीश" शब्द के पश्चात् उच्च न्यायालय से परामर्श करके" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (2) में, राज्य सरकार" शब्दों के पूर्व उच्च न्यायालय से परामर्श करके" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;
(iii) उपधारा (3) में, राज्य सरकार" शब्दों के पूर्व उच्च न्यायालय से परामर्श करके" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे; तथा
(iv) उपधारा (4) में, जहां कहीं राज्य सरकार" शब्द आते हैं उनके पूर्व, उच्च न्यायालय से परामर्श करके" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
4. धारा 10 में, -
(i) पार्श्व शीर्षक के स्थान पर निम्नलिखित पार्श्व शीर्षक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -
जिला मजिस्ट्रेट और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ।";
(ii) उपधारा (1) में मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(iii) उपधारा (2) में, किसी भी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को" शब्दों के स्थान पर किसी भी प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट को" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे और इस प्रकार यथासंशोधित उस उपधारा के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अन्तःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
(2क) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार हर जिले में एक प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां विनिहित करेगी ।
(2ख) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार किसी भी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी और ऐसे अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को उपधारा (2क) में निर्दिष्ट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की सब या कोई शक्तियां, जैसा कि राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करके निदिष्ट करे, प्राप्त होंगी ।";
(iv) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(3) धारा 88 की उपधारा (6ग), धारा 406ख, और धारा 528 की उपधारा (2ख) और (3) के प्रयोजनों के लिए ऐसा अपर जिला मजिस्ट्रेट जिला मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ समझा जाएगा; और धारा 88 की उपधारा (6ग), धारा 192 की उपधारा (1), धारा 406ख, और धारा 528 की उपधारा (2) और (2क) के प्रयोजनों के लिए ऐसा अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ समझा जाएगा ।"।
5. धारा 12 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
12. कार्यपालक मजिस्ट्रेट और न्यायिक मजिस्ट्रेट-(1) राज्य सरकार जिला मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त, उतने व्यक्तियों को, जितनों को वह ठीक समझे, किसी भी जिले में प्रथम या द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी, और राज्य सरकार, या राज्य सरकार के नियन्त्रण के अध्यधीन रहते हुए जिला मजिस्ट्रेट, समय-समय पर उन स्थानीय क्षेत्रों को परिभाषित कर सकेगा जिनके अन्दर ऐसे व्यक्ति उन सब शक्तियों या उनमें से किन्हीं का प्रयोग कर सकेंगे जो इस संहिता के अधीन क्रमशः उनमें विनिहित की जाएं ।
(2) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को, जो किसी संघ राज्यक्षेत्र या ऐसे राज्यक्षेत्रों के किसी समूह का सिविल न्यायाधीश या उसकी न्यायिक सेवा का सदस्य हो, किसी भी जिले में किसी वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान कर सकेगी; और उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार, अथवा उच्च न्यायालय के नियन्त्रण के अध्यधीन रहते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, समय-समय पर, उन स्थानीय क्षेत्रों को परिभाषित कर सकेगा जिनके अन्दर वह उन सब शक्तियों या उनमें किन्हीं का प्रयोग कर सकेगा जो इस संहिता के अधीन उसमें विनिहित की जाएं ।
(3) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार, संघ राज्यक्षेत्र (न्यायिक और कार्यपालक कृत्यों का पृथक्करण) अधिनियम, 1969 के प्रारम्भ से तीन वर्षों से अनधिक की ऐसी कालावधि के लिए, जो वह ठीक समझे, उतने व्यक्तियों को, जितनों को आवश्यक समझा जाए, और जो किसी संघ राज्यक्षेत्र की या किसी राज्य की सिविल सेवा के सदस्य हों तथा जो ऐसे राज्यक्षेत्र या राज्य में मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग उक्त अधिनियम के प्रारम्भ के समय कर रहे हों या उसके पूर्व करते रहे हों, किसी जिले में न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी; और उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार उन स्थानीय क्षेत्रों को परिभाषित कर सकेगी जिनके अन्दर ऐसे व्यक्ति उन सब शक्तियों या उनमें से किन्हीं का प्रयोग कर सकेंगे जो इस संहिता के अधीन क्रमशः उनमें विनिहित की जाएं ।
(4) किसी ऐसी परिभाषा द्वारा, जो उपधारा (1), (2) या (3) में निर्दिष्ट है, अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, ऐसे व्यक्तियों की अधिकारिता और शक्तियों का विस्तार ऐसे जिले में सर्वत्र होगा ।"।
6. धारा 13 की उपधारा (1) में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
7. धारा 14 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
14. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट-राज्य सरकार विशिष्ट क्षेत्रों के लिए या विशिष्ट कृत्यों के पालन के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी और उनको ऐसी शक्तियां प्रदान कर सकेगी, जो वह ठीक समझे । ऐसे मजिस्ट्रेट विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट कहलाएंगे और ऐसी अवधि के लिए नियुक्त किए जाएंगे जो राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा निदिष्ट करे ।"।
8. धारा 15 की उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठ-(1) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार किसी संघ राज्यक्षेत्र के किसी स्थान में के किन्हीं दो या अधिक न्यायिक मजिस्ट्रेटों को निदेश दे सकेगी कि वे न्यायपीठ के रूप में इकट्ठे बैठें और प्रथम या द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस संहिता द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त या प्रदेय शक्तियों में से कोई भी शक्ति आदेश द्वारा ऐसे न्यायपीठ में विनिहित कर सकेगी और उसे निदेश दे सकेगी कि वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग केवल ऐसे मामलों में या मामलों के ऐसे वर्गों में और ऐसी स्थानीय सीमाओं के अन्दर, जिन्हें उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार ठीक समझे, करे ।"।
9. धारा 16 में, -
(i) राज्य सरकार, या राज्य सरकार के नियन्त्रण के अध्यधीन रहते हुए जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर राज्य सरकार के अनुमोदन के अध्यधीन रहते हुए उच्च न्यायालय" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठों के" शब्दों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठों के" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
10. धारा 17 के स्थान पर निम्नलिखित धाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
17. न्यायिक मजिस्ट्रेटों और न्यायपीठों का मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों के तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों एवं सहायक सेशन न्यायाधीशों का सेशन न्यायाधीश के अधीनस्थ होना-(1) धारा 12 की उपधारा (2) और (3) के अधीन नियुक्त सब न्यायिक मजिस्ट्रेट और धारा 15 के अधीन गठित सब न्यायपीठ, सेशन न्यायाधीश के नियन्त्रण के अध्यधीन रहते हुए, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ होंगे, और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ऐसे मजिस्ट्रेटों और न्यायपीठों के कारबार के वितरण के बारे में समय-समय पर ऐसे नियम बना सकेगा या विशेष आदेश दे सकेगा जो इस संहिता से संगत हों ।
(2) सब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सेशन न्यायाधीश के अधीनस्थ होंगे ।
(3) सब सहायक सेशन न्यायाधीश उस सेशन न्यायाधीश के अधीनस्थ होंगे जिसके न्यायालय में वे अधिकारिता का प्रयोग करते हों और वह सेशन न्यायाधीश ऐसे सहायक सेशन न्यायाधीशों में कारबार के वितरण के बारे में नियम, जो इस संहिता से संगत हों समय-समय पर बना सकेगा ।
(4) जब सेशन न्यायाधीश अनिवार्य कारणों से स्वयं अनुपस्थित हो या कार्य करने में असमर्थ हो तब वह किसी भी अर्जेंट आवेदन के अपर या सहायक सेशन न्यायाधीश द्वारा या, यदि कोई अपर या सहायक सेशन न्यायाधीश न हो तो, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा निपटाए जाने के लिए भी उपबन्ध कर सकेगा और ऐसे किसी आवेदन को निपटाने के लिए ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को अधिकारिता होगी ।
17क. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों का अधीनस्थ होना-(1) धारा 12 की उपधारा (1), धारा 13 और धारा 14 के अधीन नियुक्त सब कार्यपालक मजिस्ट्रेट जिला मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ होंगे और (उपखण्ड मजिस्ट्रेट से भिन्न) हर कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जो उपखण्ड में शक्तियों का प्रयोग करता हो, जिला मजिस्ट्रेट के साधारण नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए, उपखण्ड मजिस्ट्रेट के भी अधीनस्थ होगा ।
(2) जिला मजिस्ट्रेट अपने अधीनस्थ कार्यपालक मजिस्ट्रेटों में कारबार के वितरण के बारे में और अपर जिला मजिस्ट्रेट को कारबार के आबंटन के बारे में समय-समय पर ऐसे नियम बना सकेगा या विशेष आदेश दे सकेगा, जो इस संहिता से संगत हों ।
17ख. उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय से अवर न्यायालय-सेशन न्यायालय और न्यायिक और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय उच्च न्यायालय से अवर दण्ड न्यायालय होंगे, तथा न्यायिक और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय सेशन न्यायालय से अवर दण्ड न्यायालय होंगे ।"।
11. धारा 29 की उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(1) इस संहिता के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि किसी अन्य विधि के अधीन किसी अपराध का विचारण, जब ऐसी विधि में इस निमित्त कोई न्यायालय उल्लिखित हो, ऐसे न्यायालय द्वारा किया जाएगा:
परन्तु यदि ऐसे उल्लिखित न्यायालय निम्नलिखित सारणी के स्तम्भ (1) में विनिर्दिष्ट न्यायालय हो तो ऐसे अपराध का विचारण उसके स्तम्भ (2) में उसके सामने विनिर्दिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा किया जाएगा:
सारणी
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विधि में विनिर्दिष्ट न्यायालय का नाम |
न्यायालय जिसके द्वारा विचारणीय है |
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(1) |
(2) |
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1. जिला मजिस्ट्रेट |
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट । |
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2. प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट |
प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट । |
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3. उपखण्ड मजिस्ट्रेट |
प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट । |
|
4. द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट 5. तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट |
द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट । |
|
6. मजिस्ट्रेट (वहां के सिवाय जहां वह ऊपर उल्लिखित किसी अभिव्यक्ति में आता हो) |
न्यायिक मजिस्ट्रेट ।" |
12. धारा 29ख में, जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट द्वारा या ऐसे किसी मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकेगा जिसे राज्य सरकार ने" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा या किसी ऐसे न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकेगा जिसे उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार ने" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
13. धारा 30 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
30. सात वर्ष से अनधिक कारावास से दण्डनीय अपराध-धारा 28 या धारा 29 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, सब अपराधों का, जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से या सात वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय नहीं हैं, विचारण न्यायिक मजिस्ट्रेट की हैसियत से करने की शक्ति, उच्च न्यायालय से परामर्श करके, राज्य सरकार किसी भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या किसी भी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में विनिहित कर सकेगी:
परन्तु किसी भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में ऐसी शक्तियां विनिहित न की जाएंगी, यदि उसने मजिस्ट्रेट की हैसियत से कम से कम दस वर्ष तक ऐसी शक्तियों का प्रयोग न कर लिया हो जो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, की शक्तियों से निम्नतर नहीं हैं:
परन्तु यह और कि यदि किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ने ऐसे मजिस्ट्रेट की हैसियत में अपनी नियुक्ति से पूर्व सहायक सेशन न्यायाधीश की शक्तियों का प्रयोग किया हो तो उसमें इस धारा के अधीन शक्तियां इस तथ्य के होते हुए भी विनिहित की जा सकेंगी कि उसने प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग कम से कम दस वर्ष तक नहीं किया है ।"।
14. धारा 32 में, -
(क) पार्श्व शीर्षक में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे,
(ख) उपधारा (1) में, -
(i) प्रारम्भिक वाक्य में, मजिस्ट्रेटों" शब्द से पूर्व न्यायिक" शब्द अन्तःस्थापित किया जाएगा,
(ii) खण्ड (क) में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेटों और प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेटों के न्यायालय" शब्दों के स्थान पर, प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय" शब्द और खण्ड (ख) में, मजिस्ट्रेटों के न्यायालय" शब्दों के स्थान पर, न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे,
(iii) खण्ड (ग) का लोप कर दिया जाएगा;
(ग) उपधारा (2) में, किसी भी मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर, किसी भी न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
15. धारा 33 की उपधारा (1) में, -
(i) पार्श्व शीर्षक में मजिस्ट्रेटों" शब्द के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेटों" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) प्रारम्भिक पैरा में, किसी भी मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर किसी भी न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(iii) परन्तुक के खण्ड (ख) में, मजिस्ट्रेट द्वारा" शब्दों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
16. धारा 34 के पार्श्व शीर्षक में, जिला" शब्द के स्थान पर न्यायिक" शब्द प्रतिस्थापित किया जाएगा ।
17. धारा 36 में, जिला मजिस्ट्रेटों" शब्दों के पश्चात् मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे; और प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेटों को" शब्दों के स्थान पर प्रथम और द्वितीय वर्ग न्यायिक तथा कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
18. धारा 37 और 38 के स्थान पर निम्नलिखित धाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
37. मजिस्ट्रेटों को प्रदेय अतिरक्त शक्तियां-मामूली शक्तियों के अतिरिक्त, -
(i) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार किसी भी न्यायिक मजिस्ट्रेट में अनुसूची 4 के भाग 1क में विनिर्दिष्ट शक्तियों में से कोई भी शक्ति विनिहित कर सकेगी;"
(ii) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अपनी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के किसी भी न्यायिक मजिस्ट्रेट में अनुसूची 4 के भाग 1ख में विनिर्दिष्ट शक्तियां विनिहित कर सकेगा;
(iii) राज्य सरकार किसी भी कार्यपालक मजिस्ट्रेट में अनुसची 4 के भाग 2क में विनिर्दिष्ट शक्तियों में से कोई भी शक्ति विनिहित कर सकेगी; तथा
(iv) जिला मजिस्ट्रेट अपनी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के किसी भी कार्यपालक मजिस्ट्रेट में अनुसूची 4 के भाग 2ख में विनिर्दिष्ट शक्तियां विनिहित कर सकेगा ।
38. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 37 के अधीन की शक्तियों के प्रयोग का उच्च न्यायालय या राज्य सरकार के नियन्त्रण के अध्यधीन होना-धारा 37 के खण्ड (ii) के अधीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्रदत्त शक्ति उच्च न्यायालय के नियन्त्रण के अध्यधीन रहते हुए प्रयुक्त की जाएगी और उस धारा के खण्ड (iv) के अधीन जिला मजिस्ट्रेट को प्रदत्त शक्ति राज्य सरकार के नियन्त्रण के अध्यधीन रहते हुए प्रयुक्त की जाएगी ।
38क. न्यायिक मजिस्ट्रेटों को शक्तियां उच्च न्यायालय से परामर्श करके प्रदत्त किया जाना-जब कभी इस संहिता के या संविधान की सप्तम अनुसूची की सूची 2 और 3 में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी से सम्बन्धित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबन्धों के अधीन कोई न्यायिक शक्तियां किसी सेशन न्यायाधीश या अपर या सहायक सेशन न्यायाधीश या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या किसी भी अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्रदत्त की जानी हों या ऐसे किसी भी मजिस्ट्रेट को ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए विशेषतः सशक्त किया जाना हो तब ऐसी शक्तियां प्रदत्त करने वाले या ऐसी शक्तियों के प्रयोग के लिए सशक्त करने वाले आदेश, राज्य सरकार द्वारा, इस बात के होते हुए भी कि ऐसे उपबन्ध में यह अभिव्यक्ततः उपबन्धित न हो, उच्च न्यायालय से परामर्श करके किए जाएंगे ।"
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह प्रश्न कि क्या कोई शक्तियां न्यायिक हैं, उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा विनिश्चित किया जाएगा और ऐसा विनिश्चय अन्तिम होगा ।"।
19. धारा 39 की उपधारा (1) में, निम्नलिखित परन्तुक जोड़ दिया जाएगा, अर्थात्: -
परन्तु न्यायिक मजिस्ट्रेटों की दशा में राज्य सरकार ऐसी शक्तियां उच्च न्यायालय से परामर्श करके प्रदान करेगी ।"।
20. धारा 40 में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ दिया जाएगा, अर्थात्: -
परन्तु न्यायिक मजिस्ट्रेटों की दशा में ऐसा कोई निदेश उच्च न्यायालय से परामर्श किए बिना नहीं दिया जाएगा ।"।
21. धारा 41 में, -
(i) उपधारा (1) में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ दिया जाएगा, अर्थात्: -
परन्तु राज्य सरकार न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्रदत्त किसी भी शक्ति का प्रत्याहार, उच्च न्यायालय से परामर्श किए बिना, नहीं करेगी ।";
(ii) उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्रदत्त किन्हीं भी शक्तियों का प्रत्याहार उसके द्वारा किया जा सकेगा ।"।
22. धारा 57 में, -
(i) उपधारा (2) में, मजिस्ट्रेट के" शब्दों के स्थान पर अधिकारिता रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (3) में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
23. धारा 63 में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर, अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
24. धारा 78 की उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
(1) जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या कोई भी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट अपनी अधिकारिता के क्षेत्र के भीतर के किसी भी भू-धारक, फार्मर, या भूमि के प्रबन्धक को, किसी निकल भागे हुए सिद्धदोष, उद्घोषित अपराधी, या अजमानतीय अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति की, जो पीछा किए जाने से बच निकला हो, गिरफ्तारी करने के लिए वारण्ट निदिष्ट कर सकेगा ।"।
25. धारा 88 में, -
(क) उपधारा (2) में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के पश्चात् या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) उपधारा (6ख) में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के पश्चात् या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ग) उपधारा (6ग) के परन्तुक के स्थान पर निम्नलिखित परन्तुक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -
परन्तु यदि वह जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में किया गया है, तो वह उसे अपने अधीनस्थ किसी भी मजिस्ट्रेट को निपटारे के लिए दे सकेगा और ऐसे मजिस्ट्रेट को ऐसे दावे या आक्षेप के बारे में सभी शक्तियां और अधिकारिता ऐसी होंगी मानो कुर्की का आदेश ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा निकाला गया था और दावा या आक्षेप मूलतः उसके समक्ष किया गया था ।"।
26. धारा 95 में, जहां कहीं जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं, उनके पश्चात् मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
27. धारा 96 की उपधारा (2) में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के पश्चात् या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
28. धारा 98 में, जहां कहीं, जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं उनके पश्चात् मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
29. धारा 106 की उपधारा (1) में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय" शब्दों के स्थान पर या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या किसी भी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
30. धाराओं 107, 108, 109 और 110 में, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
31. धारा 124 में, -
(i) जहां कहीं मुख्य प्रेसिडेंसी" शब्द आते हैं, उनके स्थान पर मुख्य न्यायिक" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (1) में इस अध्याय के अधीन" शब्दों के स्थान पर, यथास्थिति, धारा 118 या धारा 106 के अधीन" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(iii) उपधारा (2) में, इस अध्याय के अधीन" शब्दों के स्थान पर, यथास्थिति, धारा 106 या धारा 118 के अधीन" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
32. धारा 125 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
125. किसी बन्धपत्र को, जो परिशान्ति कायम रखने के लिए हो, रद्द करने की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की और किसी बन्धपत्र को, जो परिशान्ति कायम रखने के लिए या सदाचार के लिए हो, रद्द करने की जिला मजिस्ट्रेट की शक्ति-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट परिशान्ति कायम रखने के लिए किसी बन्धपत्र को जो धारा 106 के अधीन निष्पादित किया गया हो, पर्याप्त कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, किसी समय भी रद्द कर सकेगा तथा जिला मजिस्ट्रेट परिशान्ति कायम रखने या सदाचार के लिए किसी ऐसे बन्धपत्र को जो उसके जिले में के उसके न्यायालय से अवरिष्ठ किसी न्यायालय के आदेश द्वारा धारा 118 के अधीन निष्पादित किया गया हो किसी समय भी उसी तरह रद्द कर सकेगा ।"।
33. धारा 126 में, -
(i) उपधारा (1) में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से" शब्दों के स्थान पर उस न्यायालय से जिसके द्वारा धारा 106 या 118 के अधीन प्रतिभूति देने का आदेश किया गया था" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) उपधारा (2) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(2) ऐसा आवेदन किए जाने पर न्यायालय यह अपेक्षा करते हुए कि वह व्यक्ति, जिसके लिए ऐसा प्रतिभू आबद्ध है, उपसंजात हो या उसके समक्ष लाया जाए, समन या वारण्ट, जो भी ठीक समझे, निकालेगा ।"।
34. धाराओं 127, 128, 129, 130, 131 और 132 में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
35. धारा 133 में, -
(i) उपधारा (1) के प्रारम्भिक पैरा में तथा उपधारा (2) में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) उपधारा (1) के अन्तिम पैरा में, प्रथम या द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
36. धारा 143 में, कोई भी अन्य मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कोई भी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
37. धारा 144 की उपधारा (1) में, किसी भी अन्य मजिस्ट्रेट की (जो तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट न हो)" शब्दों और कोष्ठकों के स्थान पर किसी भी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट की" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
38. धारा 145 की उपधारा (1) और धारा 147 की उपधारा (1) में, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
39. धारा 155 की उपधारा (1) में, मजिस्ट्रेट के पास जाने को निर्देशित करेगा" शब्दों के स्थान पर उस मजिस्ट्रेट के पास जाने को निर्देशित करेगा जिसे ऐसे मामले का विचारण करने की या विचारण के लिए सुपुर्द करने की शक्ति हो" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
40. धारा 164 की उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित उपधाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात् :-
(1) कोई भी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किया गया कोई भी द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट इस अध्याय के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन अन्वेषण के अनुक्रम में या तत्पश्चात् जांच या विचारण प्रारम्भ होने के पूर्व किसी भी समय अपने से किए गए किसी भी कथन या संस्वीकृति को अभिलिखित कर सकेगा ।
(1क) यदि ऐसे कारणों से, जो लेखन द्वारा अभिलिखित किए जाएंगे, राज्य सरकार ऐसा करना आवश्यक समझे तो कोई प्रथम वर्ग या द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट (जो पुलिस आफिसर न हो) ऐसे कथनों या संस्वीकृतियों को अभिलिखित करने के लिए उस सरकार द्वारा विशेषतया प्राधिकृत किया जा सकेगा ।"।
41. धारा 167 में, -
(i) उपधारा (2) के परन्तुक के स्थान पर निम्नलिखित परन्तुक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -
परन्तु कोई भी ऐसा द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त नहीं किया गया है, और कोई भी ऐसा द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट, जो उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त नहीं किया गया है, पुलिस की अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत न करेगा ।”; तथा
(ii) उपधारा (4) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(4) यदि ऐसा आदेश जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जाता है, तो वह अपने आदेश की एक प्रति उस आदेश को देने के अपने कारणों सहित उस मजिस्ट्रेट के पास भिजवाएगा जिसका वह अव्यवहित अधीनस्थ है तथा यदि ऐसा आदेश मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जाए तो वह अपने आदेश की एक प्रति उस आदेश को देने के अपने कारणों सहित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भिजवाएगा ।"।
42. धारा 170 की उपधारा (3) में, जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
43. धारा 174 की उपधारा (5) में, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट" और कोई भी मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कोई भी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
44. धारा 176क का, जो केवल लक्षदीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र को लागू होती है, लोप कर दिया जाएगा ।
45. धारा 186 की उपधारा (1) में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किए गए प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किए गए प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किए गए प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
46. धारा 187 की उपधारा (1) में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द तथा ऐसा मजिस्ट्रेट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उस जिला या उपखण्ड मजिस्ट्रेट के पास" शब्दों के स्थान पर ऐसा मजिस्ट्रेट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को, यथास्थिति, उस जिला या उपखण्ड या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
47. धारा 190 में, -
(i) उपधारा (1) में, कोई भी प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कोई भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द तथा कोई भी अन्य मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कोई भी अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
(ii) उपधारा (2) में, राज्य सरकार या राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेशों के अध्यधीन रहते हुए जिला मजिस्ट्रेट किसी भी मजिस्ट्रेट को" शब्दों के स्थान पर, उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार, या उच्च न्यायालय के साधारण या विशेष आदेशों के अध्यधीन रहते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी भी अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।;
(iii) उपधारा (3) में, राज्य सरकार किसी भी प्रथम या द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार किसी भी प्रथम या द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
48. धारा 192 में, -
(i) उपधारा (1) में, कोई भी मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कोई भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) उपधारा (2) में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
49. धारा 193 की उपधारा (2) में, राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करके" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
50. धारा 196ख में मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
51. धारा 206 की उपधारा (1) में कोई भी प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई भी अन्य मजिस्ट्रेट (जो तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट नहीं है)" शब्दों तथा कोष्ठकों के स्थान पर कोई भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई भी द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
52. धारा 249 में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी से कोई भी अन्य मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी से कोई भी द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द स्थापित किए जाएंगे ।
53. धारा 250 की उपधारा (3) में, या तृतीय" शब्दों का लोप कर दिया जाएगा ।
54. धारा 260 की उपधारा (1) के प्रारम्भिक पैरा में खण्ड (क), (ख) और (ग) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्: -
(क) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट,
(ख) उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किया गया कोई भी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट, तथा
(ग) न्यायिक मजिस्ट्रेटों का कोई भी न्यायपीठ जिसमें प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां विनिहित की गई हैं और जो उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किया गया है ।"।
55. धारा 261 में, -
(i) पार्श्व शीर्षक में, मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठ" शब्दों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठ" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) प्रारम्भिक पैरा में, राज्य सरकार ऐसे मजिस्ट्रेटों के किसी न्यायपीठ को जिनमें द्वितीय वर्ग या तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट की शक्तियां विनिहित हों" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार ऐसे न्यायिक मजिस्ट्रेटों के किसी न्यायपीठ को, जिनमें द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां विनिहित हों," शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
56. धारा 263 में, मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठ" शब्दों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायपीठ" और राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
57. धारा 265 की उपधारा (2) में, राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार" शब्द, तथा मजिस्ट्रेटों के किसी भी न्यायपीठ को प्राधिकृत कर सकेगी" शब्दों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेटों के किसी भी न्यायपीठ को प्राधिकृत कर सकेगी" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
58. धारा 269 की उपधारा (1) और (2) में, राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
59. धारा 337 की उपधारा (1) में, -
(i) प्रारम्भिक पैरा में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) परन्तुक के स्थान पर निम्नलिखित परन्तुक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -
परन्तु जहां कि अपराध जांच या विचारण के अधीन हो, वहां मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई भी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट एतद्द्वारा प्रदत्त शक्ति का, जब तक कि वह जांच या विचारण करने वाला मजिस्ट्रेट न हो, प्रयोग न करेगा, और जहां कि अपराध अन्वेषणाधीन हो, वहां जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई भी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, जब तक कि वह उस स्थान में जहां कि अपराध की जांच या विचारण किया जा सकता हो अधिकारिता रखने वाला न्यायिक मजिस्ट्रेट न हो और उस शक्ति के प्रयोग के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी अभिप्राप्त न कर ली गई हो, उस शक्ति का प्रयोग न करेगा ।"।
60. धारा 338 में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
61. धारा 346 की उपधारा (1) में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर यथास्थिति, जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
62. धारा 349 में, -
(i) उपधारा (1) में, -
(क) द्वितीय या तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ख) जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) उपधारा (1क) में, जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
63. धारा 373 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
373. सेशन न्यायालय द्वारा जिला मजिस्ट्रेट और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निष्कर्ष और दण्डादेश की प्रति का भेजा जाना-सेशन न्यायालय द्वारा विचारित मामलों में न्यायालय अपने निष्कर्ष और दण्डादेश की (यदि कोई हो) प्रति उस जिला मजिस्ट्रेट और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर विचारण किया गया हो ।"।
64. धारा 380 में प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
65. धारा 406क के स्थान पर निम्नलिखित धाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
406क. प्रतिभू को प्रतिगृहीत करने से इन्कार करने वाले या अगृहीत करने वाले आदेश से अपील-धारा 122 के अधीन प्रतिभू को प्रतिगृहीत करने से इन्कार करने या अगृहीत करने वाले आदेश से व्यथित कोई भी व्यक्ति ऐसे आदेश के विरुद्ध-
(क) यदि वह जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया हो, तो सेशन न्यायालय को,
(ख) यदि वह जिला मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया हो तो, जिला मजिस्ट्रेट को, तथा
(ग) यदि वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया हो तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को,
अपील कर सकेगा ।
406ख. अपर जिला मजिस्ट्रेट को या अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपील का अन्तरण-जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट धारा 406क के अधीन उसको की गई किसी भी अपील को, यथास्थिति, अपर जिला मजिस्ट्रेट को या अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अन्तरित कर सकेगा और ऐसा अपर जिला मजिस्ट्रेट या अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उस अपील को सुन सकेगा और निपटा सकेगा ।" ।
66. धारा 407 में, जो केवल लक्षदीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीव समूह संघ राज्यक्षेत्र को लागू होती है, -
(i) जहां कहीं जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं उनके स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (1) में, द्वितीय या तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(iii) उपधारा (2) में, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
67. धारा 408 में, -
(i) जैसी कि वह लक्षदीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र से भिन्न किसी संघ राज्यक्षेत्र को लागू होती है, जिला मजिस्ट्रेट या किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए विचारण में दोषसिद्ध किया गया है या जो कोई व्यक्ति धारा 349 के अधीन दण्डादिष्ट किया गया है या धारा 380 के अधीन जिस किसी व्यक्ति के बारे में किसी मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश किया गया है या दण्डादेश पारित किया गया है" शब्दों और अंकों के स्थान पर या न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए विचारण में दोषसिद्ध किया गया है या जो कोई व्यक्ति धारा 349 के अधीन दण्डादिष्ट किया गया है या धारा 380 के अधीन जिस व्यक्ति के बारे में किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश किया गया है या दण्डादेश पारित किया गया है" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे ;
(ii) जैसी कि वह लक्षदीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र को लागू होती है, जिला मजिस्ट्रेट या किसी अन्य प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए विचारण में दोषसिद्ध किया गया है या जो कोई व्यक्ति धारा 349 के अधीन दण्डादिष्ट किया गया है या धारा 380 के अधीन जिस किसी व्यक्ति के बारे में किसी मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश किया गया है या दण्डादेश पारित किया गया है" शब्दों और अंकों के स्थान पर या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए विचारण में दोषसिद्ध किया गया है या जो कोई व्यक्ति धारा 349 के अधीन दण्डादिष्ट किया गया है या धारा 380 के अधीन जिस व्यक्ति के बारे में किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश किया गया है या दण्डादेश पारित किया गया है" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
68. धारा 409 में, -
(क) जैसी कि वह लक्षदीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र को लागू होती है, परन्तुक में राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) जैसी कि वह लक्षदीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र से भिन्न संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होती है, -
(i) उपधारा (1) के परन्तुक में, या तृतीय" शब्दों का लोप कर दिया जाएगा, तथा
(ii) उपधारा (2) में, राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
69. धारा 412 में प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
70. धारा 413 में, या जिला मजिस्ट्रेट या कोई अन्य प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर, या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या कोई अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
71. धारा 425 की उपधारा (1) में, जहां कहीं जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं, उनके स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे तथा अन्त में और उसकी एक प्रति जिला मजिस्ट्रेट को भेजी जाएगी" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।
72. धारा 428 की उपधारा (1) में, जहां कहीं मजिस्ट्रेट" शब्द आता है, उसके स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
73. धारा 435 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
435. अवर न्यायालयों के अभिलेख मंगाने की शक्ति-(1) किसी भी अभिलिखित या पारित किए गए निष्कर्ष, दण्डादेश या आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में और, यथास्थिति, ऐसे अवर न्यायालय या ऐसे मजिस्ट्रेट को किन्हीं भी कार्यवाहियों की नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन से उच्च न्यायालय या कोई भी सेशन न्यायाधीश अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर स्थित किसी भी अवर दण्ड न्यायालय के समक्ष की किसी भी कार्यवाही के अभिलेख को मंगा सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा और कोई भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अपनी अधिकारिता के अधीन के किसी भी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष की किसी भी कार्यवाही का अभिलेख मंगा सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा और ऐसा अभिलेख मंगाते समय निदेश दे सकेगा कि अभिलेख की परीक्षा लम्बित रहने तक किसी दण्डादेश या आदेश का निष्पादन निलम्बित रखा जाए और यदि अभियुक्त परिरोध में हो तो वह जामनत पर या स्वयं अपने बन्धपत्र पर छोड़ दिया जाए ।
(2) जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई भी उपखण्ड मजिस्ट्रेट किसी भी अधीनस्थ कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष की किसी भी कार्यवाही के अभिलेख को किसी अभिलिखित या पारित किए गए आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में और ऐसे अधीनस्थ मजिस्ट्रेट की किन्हीं कार्यवाहियों की नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन से मंगा सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा और ऐसा अभिलेख मंगाते समय निदेश दे सकेगा कि अभिलेख की परीक्षा लम्बित रहने तक किसी आदेश का निष्पादन निलम्बित रखा जाए और यदि वह व्यक्ति परिरोध में हो तो वह जमानत पर या स्वयं अपने बन्धपत्र पर छोड़ दिया जाए ।
(3) यदि उपधारा (2) के अधीन कार्य करने वाले किसी उपखंड मजिस्ट्रेट का यह विचार हो कि ऐसी कोई कार्यवाही या आदेश अवैध या अनुचित है या ऐसी कोई कार्यवाही अनियमित है, तो वह अभिलेख को, उस पर अपनी ऐसी टिप्पणियों सहित, जैसी वह ठीक समझे, जिला मजिस्ट्रेट को भेजेगा ।
(4) उच्च न्यायालय धाराओं 118, 122, 143, 144 या 145 के अधीन की किसी कार्यवाही के अभिलेख को इस बात के होते हुए भी मंगा सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा कि ऐसी कार्यवाही किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई थी ।
(5) यदि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष की किसी कार्यवाही के बारे में कोई आवेदन उपधारा (1) के अधीन या तो सेशन न्यायाधीश से या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से किया गया हो, तो उनमें से दूसरा कोई भी अतिरिक्त आवेदन ग्रहण न करेगा और यदि किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष की किसी कार्यवाही के बारे में कोई आवेदन उपधारा (1) के अधीन सेशन न्यायालय से या उपधारा (2) के अधीन जिला मजिस्ट्रेट से किया गया हो तो उनमें से दूसरा कोई भी अतिरिक्त आवेदन ग्रहण न करेगा ।"।
74. धारा 436 को उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनर्संख्यांकित किया जाएगा और-
(i) इस प्रकार पुनर्संख्यांकित उपधारा (1) में, -
(क) जहां कहीं जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं उनके स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे,
(ख) परन्तुक में धारा" शब्द के स्थान पर उपधारा" शब्द प्रतिस्थापित किया जाएगा;
(ii) इस प्रकार पुनर्संख्यांकित उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(2) धारा 435 के अधीन किसी अभिलेख की परीक्षा करने पर या अन्यथा जिला मजिस्ट्रेट किसी उपखण्ड मजिस्ट्रेट को यह निदेश दे सकेगा कि वह किसी ऐसी कार्यवाही में, जिसमें छोड़े जाने का या उन्मोचन का आदेश धारा 119 के अधीन किया गया है, अतिरिक्त जांच, या तो स्वयं करे या अपने अधीनस्थ किसी अन्य मजिस्ट्रेट से कराए और उपखण्ड मजिस्ट्रेट ऐसी जांच स्वयं कर सकेगा या करने के लिए किसी भी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को निदेश दे सकेगा:
परन्तु कोई भी जिला मजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति के मामले में, जो छोड़ दिया गया है या उन्मोचित कर दिया गया है, इस उपधारा के अधीन अतिरिक्त जांच करने का कोई निदेश उस दशा में के सिवाय न देगा जिसमें यह हेतुक दर्शित करने के लिए कि ऐसा निदेश क्यों नहीं दिया जाना चाहिए ऐसे व्यक्ति को अवसर मिल चुका है ।"।
75. धारा 437 में, जहां कहीं जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं उनके स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
76. धारा 438 में, -
(i) उपधारा (1) में, जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे, तथा
(ii) उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
(3) जिला मजिस्ट्रेट किसी भी कार्यवाही के अभिलेख की धारा 435 के अधीन या अन्यथा परीक्षा करने पर-
(क) यदि ऐसी कार्यवाही धारा 118, 122, 143, 144 या 145 के अधीन किसी आदेश के बारे में हो और उसका विचार हो कि ऐसी कार्यवाही में किया गया आदेश उलट दिया जाना या परिवर्तित किया जाना चाहिए, तो ऐसी परीक्षा के परिणाम की रिपोर्ट उच्च न्यायालय को उसके आदेशों के लिए करेगा;
(ख) यदि ऐसी कार्यवाही किसी अन्य धारा के अधीन किए गए आदेश के बारे में हो तो, धारा 436 की उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, धारा 423, 426, 427 और 428 द्वारा अपील न्यायालय को प्रदत्त शक्तियों में से किसी का भी प्रयोग कर सकेगा ।" ।
77. धारा 439 की उपधारा (3) में, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
78. धारा 479 में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट या अन्य मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या किसी अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
79. धारा 488 की उपधारा (1) में, जिला मजिस्ट्रेट, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या कोई अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
80. धारा 512 की उपधारा (2) में, कोई भी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर कोई प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
81. धारा 515 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
515. धारा 514 के अधीन आदेशों से अपील और उनका पुनरीक्षण-धारा 514 के अधीन दिए गए सब आदेशों से अपील-
(i) जिला मजिस्ट्रेट के यहां हो सकेगी, यदि वे किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित हों, तथा
(ii) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां हो सकेगी यदि वे किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित हों,
अथवा यदि ऐसे अपील न की गई हो तो वे, यथास्थिति, जिला मजिस्ट्रेट द्वारा या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पुनरीक्षित किए जा सकेंगे ।"।
82. धारा 524 में, -
(i) उपधारा (1) में, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) उपधारा (2) में, उस न्यायालय में होगी जिसमें ऐसा आदेश पारित करने वाले न्यायालय के दण्डादेशों के विरुद्ध अपील होती है" शब्दों के स्थान पर सेशन न्यायाधीश को होगी" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
83. धारा 528 में, -
(i) उपधारा (2) में, -
(क) पार्श्व शीर्षक के स्थान पर निम्नलिखित पार्श्व शीर्षक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मामलों को प्रत्याहृत या निर्देशित कर सकेगा ।”; तथा
(ख) कोई भी मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
(2क) मामलों के वर्गों को प्रत्याहृत करने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्राधिकृत करने की शक्ति-उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपने अधीनस्थ किसी भी मजिस्ट्रेट से या तो मामलों के ऐसे वर्गों को जैसे वह उचित समझे या मामलों के विशिष्ट वर्गों को प्रत्याहृत करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी ।
(2ख) जिला मजिस्ट्रेट मामलों को प्रत्याहृत या निर्देशित कर सकेगा-कोई जिला मजिस्ट्रेट अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से किसी मामले को प्रत्याहृत कर सकेगा या किसी मामले को, जिसे उसने ऐसे मजिस्ट्रेट को सौंपा है, वापस मंगा सकेगा और ऐसे मामले की जांच स्वयं कर सकेगा या उसे किसी अन्य ऐसे मजिस्ट्रेट को जांच के लिए निर्देशित कर सकेगा जो उसकी जांच करने के लिए सक्षम हो ।"।
84. धारा 559 की उपधारा (2) में, प्रेसिडेंसी नगर में मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट और ऐसे नगरों के बाहर जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेटों की दशा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की दशा में जिला मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
85. धारा 561 में जहां कहीं, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं, उनके स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
86. धारा 562 की उपधारा (1) के परन्तुक में-
(i) तृतीय वर्ग मजिस्ट्रेट या द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त न किया गया हो" शब्दों के स्थान पर द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जो उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त न किया गया हो," शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(ii) प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को या उपखण्ड मजिस्ट्रेट को" शब्दों के स्थान पर प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
87. धारा 565 में, -
(i) उपधारा (1) में, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या किसी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (3) में, राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; तथा
(iii) उपधारा (5) में, मजिस्ट्रेट" शब्द के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
88. अनुसूची 2 के स्तम्भ 8 में, -
(i) प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट" पद में के सिवाय जहां कहीं मजिस्ट्रेट" शब्द आता है उसके स्थान पर, न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द और जहां कहीं कोई मजिस्ट्रेट" शब्द आते हैं उनके स्थान पर कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) धारा 124क के सामने की प्रविष्टि के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
सेशन न्यायालय, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किया गया कोई अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट”; तथा
(iii) धारा 376 से सम्बन्धित प्रविष्टि में, मुख्य प्रसिडेंसी मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।
89. अनुसूची 3 और 4 के स्थान पर निम्नलिखित अनुसूचियां प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्: -
अनुसूची 3
(धारा 36 देखिए)
राज्य मजिस्ट्रेटों की मामूली शक्तियां
1-द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) अपनी उपस्थिति में अपराध करने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार करने की या गिरफ्तार करने का निदेश देने की और अभिरक्षा में सुपुर्द करने की शक्ति, धारा 64
(2) अपराधी को गिरफ्तार करने की या अपनी उपस्थिति में उसकी गिरफ्तारी की जाने का निदेश देने की शक्ति, धारा 65
(3) वारण्ट पृष्ठांकित करने की या वारण्ट के अधीन गिरफ्तार किए गए अभियुक्त व्यक्ति के भेजे जाने के लिए आदेश देने की शक्ति, धाराएं 83, 84 और 86
(4) जो मामले न्यायिक रूप से उसके समक्ष हों, उनमें उद्घोषणाएं निकालने की शक्ति, धारा 87
(5) सम्पत्ति को कुर्क करने और बेचने की और कुर्क की गई सम्पत्ति पर दावों या आक्षेपों का निपटारा करने की शक्ति, धारा 88
(6) कुर्क की गई सम्पत्ति को प्रत्यावर्तित करने की शक्ति, धारा 89
(7) पत्रों और तारों के लिए तलाशी ली जाने की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 95
(8) तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 96
(9) तलाशी वारण्ट पृष्ठांकित करने की और पाई गई चीज के परिदान का आदेश देने की शक्ति, धारा 99
(10) उन मामलों में, जिनमें मजिस्ट्रेट को विचारण करने या विचारणार्थ सुपुर्द करने की अधिकारिता हो अपराध के अन्वेषण के लिए पुलिस को आदेश देने की शक्ति, धारा 155
(11) पुलिस अन्वेषण के दौरान किसी व्यक्ति का निरोध, जो पुलिस की अभिरक्षा में निरोध न हो, प्राधिकृत करने की शक्ति, धारा 167
(12) आदेशिका निकाला जाना, मुल्तवी करने और मामले की जांच करने की या अन्वेषण का निदेश देने की शक्ति, धारा 202
(13) न्यायालय में पाए गए अपराधी को निरुद्ध करने की शक्ति, धारा 351
(14) साक्षी की परीक्षा के लिए कमीशन निकालने की शक्ति, धाराएं 503, 506
(15) मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष हाजिर (उपसंजात) होने के लिए बन्धपत्र के समपहृत होने पर उसकी राशि वसूल करने की शक्ति, धारा 514 और नई प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 514क
(16) जांच या विचारण के लम्बित रहने तक सम्पत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के बारे में आदेश करने की शक्ति, धारा 516क
(17) सम्पत्ति के व्ययन के बारे में आदेश करने की शक्ति, धारा 517
(18) संदिग्ध प्रकृति की सम्पत्ति को बेचने की शक्ति, धारा 525
(19) आवेदन के समर्थन में शपथपत्र की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 539क
(20) स्थानीय निरीक्षण करने की शक्ति, धारा 539ख ।
2-प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(2) भू-धारकों को वारण्ट निर्दिष्ट करने की शक्ति, धारा 78
(3) जांच के सम्यक् अनुक्रम में से अन्यथा तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 98
(4) सदोष परिरुद्ध किए गए व्यक्तियों का पता चलाने के लिए तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 100
(5) बन्धपत्र का निष्पादन अपेक्षित करने की शक्ति, धारा 106
(6) प्रतिभुओं को उन्मोचित करने की शक्ति, धारा 126क
(7) पुलिस अन्वेषण के दौरान कथनों और संस्वीकृतियों को अभिलिखित करने की शक्ति, धारा 164
(8) पुलिस अन्वेषण के दौरान किसी व्यक्ति का पुलिस की अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत करने की शक्ति, धारा 167
(9) विचारणार्थ सुपुर्द करने की शक्ति, धारा 206
(10) जब कोई परिवादी न हो, तब कार्यवाहियों को रोक देने की शक्ति, धारा 249
(11) उस मामले में जांच के दौरान, जिसकी जांच वह स्वयं कर रहा है, सह-अपराधी को क्षमा का निविदान करने की शक्ति, धारा 337
(12) भरण-पोषण के आदेश करने की शक्ति, धारा 488 और 489
(13) अपने द्वारा किसी अन्य मजिस्ट्रेट को सौंपे गए मामले को वापस मंगाने की शक्ति, धारा 528 (4)
(14) प्रथम अपराधियों के बारे में आदेश करने की शक्ति, धारा 562
(15) छोड़े गए सिद्धदोषों को अपना निवास अधिसूचित करने के लिए आदेश देने की शक्ति, धारा 565
3-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(2) किशोर अपराधियों का विचारण करने की शक्ति, धारा 29ख
(3) पत्रों, तारों आदि के परिदान की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 95
(4) डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में के दस्तावेजों के लिए तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 96
(5) धारा 106 के अधीन प्रतिभूति देने में असफल रहने के लिए कारावासित व्यक्तियों को छोड़ने की शक्ति, धारा 124
(6) धारा 106 के अधीन परिशान्ति कायम रखने के बन्धपत्र को रद्द करने की शक्ति, धारा 125
(7) संज्ञेय मामले में पुलिस अन्वेषण का आदेश देने की शक्ति, धारा 156
(8) स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के व्यक्ति के लिए जिसने स्थानीय अधिकारिता के बाहर अपराध किया हो, आदेशिका निकालने की शक्ति, धारा 186
(9) परिवाद ग्रहण करने की शक्ति, धारा 190
(10) पुलिस रिपोर्टें प्राप्त करने की शक्ति, धारा 190
(11) परिवाद के बिना मामलों को ग्रहण करने की शक्ति, धारा 190
(12) किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को मामले अन्तरित करने की शक्ति, धारा 192
(13) कुछ मामलों में ऐसे पुलिस आफिसर द्वारा, जो कि निरीक्षक की पंक्ति से नीचे की पंक्ति का न हो, प्रारम्भिक अन्वेषण किए जाने का आदेश देने की शक्ति, धारा 196ख
(14) संक्षेपतः विचारण करने की शक्ति, धारा 260
(15) मामले के किसी भी प्रक्रम में सह-अपराधी को क्षमा का निविदान करने की शक्ति, धारा 337
(16) अधीनस्थ मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित कार्यवाही पर दण्डादेश देने की शक्ति, धारा 349
(17) प्रतिभुओं को प्रतिगृहीत करने से इन्कार करने या अगृहीत करने के न्यायिक मजिस्ट्रेटों के आदेशों की अपीलें सुनने की शक्ति, धारा 406क
(18) अभिलेख मंगाने की शक्ति, धारा 435
(19) जांच का आदेश देने की शक्ति, धारा 436
(20) सुपुर्दगी का आदेश देने की शक्ति, धारा 437
(21) उच्च न्यायालय को मामले की रिपोर्ट करने की शक्ति, धारा 438
(22) धारा 514 के अधीन पारित आदेशों की अपील सुनने या उन आदेशों का पुनरीक्षण करने की शक्ति, धारा 515
(23) मामलों के प्रत्याहरण की और उनका विचारण करने की या उन्हें विचारण के लिए निर्देशित करने की शक्ति, धारा 528
4-द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) अपनी उपस्थिति में अपराध करने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार करने की या गिरफ्तार करने का निदेश देने की और अभिरक्षा में सुपुर्द करने की शक्ति, धारा 64
(2) अपराधी को गिरफ्तार करने की या अपनी उपस्थिति में उसकी गिरफ्तारी की जाने का निदेश देने की शक्ति, धारा 65
(3) वारण्ट पृष्ठांकित करने की या वारण्ट के अधीन गिरफ्तार किए गए अभियुक्त व्यक्ति के भेजे जाने के लिए आदेश देने की शक्ति, धाराएं 83, 84 और 86
(4) उद्घोषणाएं निकालने की शक्ति, धारा 87
(5) सम्पत्ति को कुर्क करने और बेचने की शक्ति, धारा 88
(6) कुर्क की गई सम्पत्ति को प्रत्यावर्तित करने की शक्ति, धारा 89
(7) पत्रों और तारों के लिए तलाशी ली जाने की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 95
(8) तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 96
(9) तलाशी वारण्ट पृष्ठांकित करने की और पाई गई चीज के परिदान का आदेश देने की शक्ति, धारा 99
(10) विधिविरुद्ध जमाव को बिखर जाने का समादेश देने की शक्ति, धारा 127
(11) विधिविरुद्ध जमाव को बिखेरने में सिविल बल का प्रयोग करने की शक्ति, धारा 128
(12) विधिविरुद्ध जमाव को बिखेरने में सैनिक बल का प्रयोग किए जाने की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 130
(13) पुलिस अन्वेषण के दौरान किसी व्यक्ति का निरोध, जो पुलिस की अभिरक्षा में निरोध न हो, प्राधिकृत करने की शक्ति, धारा 167
(14) कमीशन पर साक्ष्य लेने की शक्ति, धारा 503
(15) मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष हाजिर (उपसंजात) होने के बन्धपत्र के समपहृत होने पर उसकी राशि वसूल करने की शक्ति, धारा 514 और नई प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 514क
(16) सम्पत्ति के व्ययन के बारे में आदेश करने की शक्ति, धारा 517
(17) संदिग्ध प्रकृति की सम्पत्ति को बेचने की शक्ति, धारा 525
5-प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(2) जांच के अनुक्रम में से अन्यथा तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 98
(3) सदोष परिरुद्ध किए गए व्यक्तियों का पता चलाने के लिए तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 100
(4) परिशान्ति कायम रखने के लिए प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 107
(5) सदाचार के लिए प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 109
(6) प्रतिभुओं को उन्मोचित करने की शक्ति, धारा 126क
(7) स्थानीय न्यूसेंसों के बारे में आदेश देने की शक्ति, धारा 133
(8) कब्जा सम्बन्धी मामलों में आदेश, आदि देने की शक्ति, धाराएं 145, 146 और 147
(9) पुलिस अन्वेषण के दौरान किसी व्यक्ति का पुलिस की अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत करने की शक्ति, धारा 167
(10) मृत्यु-समीक्षाएं करने की शक्ति, धारा 174
6-उपखण्ड मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(2) भू-धारकों को वारण्ट निदिष्ट करने की शक्ति, धारा 78
(3) सदाचार के लिए प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 100
(4) न्यूसेंसों की पुनरावृत्तियों के प्रतिषेध का आदेश करने की शक्ति, धारा 143
(5) धारा 144 के अधीन आदेश करने की शक्ति
(6) स्थानीय जांच करने के लिए अधीनस्थ कार्यपालक मजिस्ट्रेट को प्रतिनियुक्त करने की शक्ति, धारा 148
(7) स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के व्यक्ति के लिए जिसने स्थानीय अधिकारिता के बाहर अपराध किया हो आदेशिका निकालने की शक्ति, धारा 186
(8) उस सम्पत्ति को बेचने की शक्ति, जिसके बारे में अभिकथित है या सन्देह है कि वह चुराई हुई आदि है, धारा 524
7-प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(1) उपखण्ड मजिस्ट्रेट की मामूली शक्तियां
(2) पत्रों, तारों आदि के परिदान की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 95
(3) डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में की दस्तावेजों के लिए तलाशी वारण्ट निकालने की शक्ति, धारा 96
(4) सदाचार के लिए प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 108
(5) परिशान्ति कायम रखने के लिए या सदाचार रखने के लिए धारा 118 के अधीन आबद्ध व्यक्तियों को उन्मोचित करने की शक्ति, धारा 124
(6) परिशान्ति कायम रखने के लिए या सदाचार रखने के लिए धारा 118 के अधीन बन्धपत्र को रद्द करने की शक्ति, धारा 125
(7) कुछ मामलों में ऐसे पुलिस आफिसर द्वारा, जो कि निरीक्षक की पंक्ति से नीचे की पंक्ति का न हो, प्रारम्भिक अन्वेषण किए जाने का आदेश देने की शक्ति, धारा 196ख
(8) अन्वेषण के प्रक्रम में सह-अपराधी को क्षमा का निविदान करने की शक्ति, धारा 337
(9) प्रतिभुओं को प्रतिगृहीत करने से इन्कार करने के या अगृहीत करने के कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के आदेशों की अपीलें सुनने की शक्ति, धारा 406क
(10) अभिलेख मंगाने और उनकी परीक्षा करने की शक्ति, धारा 435(2)
(11) कार्यवाहियों आदि में अतिरिक्त जांच करने की कार्यपालक मजिस्ट्रेट की निदेश देने की शक्ति, धारा 436 (2)
(12) उच्च न्यायालय को मामले की रिपोर्ट करने की शक्ति, धारा 438 (3)
(13) विशिष्ट मामले में किसी व्यक्ति को लोक अभियोजक नियुक्त करने की शक्ति, धारा 492 (2)
(14) धारा 514 के अधीन पारित आदेशों की अपीलें सुनने या आदेशों का पुनरीक्षण करने की शक्ति, धारा 515
(15) अपहृत स्त्री वापस देने के लिए विवश करने की शक्ति, धारा 552 ।
अनुसूची 4
(धारा 37 और धारा 38 देखिए)
वे अतिरिक्त शक्तियां जो राज्य मजिस्ट्रेटों में विनिहित की जा सकेंगी
भाग 1
क-वे शक्तियां जो उच्च न्यायालय से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा विनिहित की जा सकेंगी
वे शक्तियां जो प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) किशोर अपराधियों का विचारण करने की शक्ति, धारा 29ख
(2) स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के व्यक्ति के लिए, जिसने स्थानीय अधिकारिता के बाहर अपराध किया हो, आदेशिका निकालने की शक्ति, धारा 186
(3) परिवाद पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(4) पुलिस रिपोर्टों पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(5) परिवाद के बिना अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(6) संक्षेपतः विचारण करने की शक्ति, धारा 260
(7) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124क के अधीन मामलों के विचारण की शक्ति
वे शक्तियां जो द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) किशोर अपराधियों का विचारण करने की शक्ति, धारा 29ख
(2) पुलिस अन्वेषण के दौरान कथनों और संस्वीकृतियों को अभिलिखित करने की शक्ति, धारा 164
(3) पुलिस अन्वेषण के दौरान किसी व्यक्ति का पुलिस की अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत करने की शक्ति, धारा 167
(4) परिवाद पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(5) पुलिस रिपोर्टों पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(6) परिवाद के बिना अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(7) विचारणार्थ सुपुर्द करने की शक्ति, धारा 206
(8) प्रथम अपराधियों के बारे में आदेश करने की शक्ति, धारा 562
ख-वे शक्तियां जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा विनिहित की जा सकेंगी
वे शक्तियां जो प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) परिवाद पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(2) पुलिस रिपोर्टों पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(3) मामलें अन्तरित करने की शक्ति, धारा 192(2)
वे शक्तियां जो द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) परिवाद पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
(2) पुलिस रिपोर्टों पर अपराधों का संज्ञान करने की शक्ति, धारा 190
भाग 2
क-वे शक्तियां जो राज्य सरकार द्वारा विनिहित की जा सकेंगी
वे शक्तियां जो उपखण्ड मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
अवर न्यायालयों के अभिलेखों को मंगाने की और उनको जिला मजिस्ट्रेट को भेजने की शक्ति, धारा 435 की उपधाराएं (2) और (3)
वे शक्तियां जो प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) राजद्रोह के मामले में सदाचार के लिए प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 108
(2) सदाचार के लिए प्रतिभूति की अपेक्षा करने की शक्ति, धारा 110
(3) न्यूसेंसों की पुनरावृत्तियों के प्रतिषेध का आदेश करने की शक्ति, धारा 143
(4) धारा 144 के अधीन आदेश करने की शक्ति
(5) पुलिस अन्वेषण के दौरान कथनों और संस्वीकृतियों को अभिलिखित करने की शक्ति, धारा 164
(6) स्थानीय अधिकारिता के अन्दर के व्यक्ति के लिए, जिसने स्थानीय अधिकारिता के बाहर अपराध किया हो, आदेशिका निकालने की शक्ति, धारा 186
(7) उस सम्पत्ति को बेचने की शक्ति, जिसके बारे में अभिकथित है या सन्देह है कि वह चुराई हुई आदि है, धारा 524
वे शक्तियां जो द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) न्यूसेंसों की पुनरावृत्तियों के प्रतिषेध का आदेश करने की शक्ति, धारा 143
(2) धारा 144 के अधीन आदेश करने की शक्ति
(3) पुलिस अन्वेषण के दौरान कथनों और संस्वीकृतियों को अभिलिखित करने की शक्ति, धारा 164
(4) पुलिस अन्वेषण के दौरान किसी व्यक्ति का पुलिस की अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत करने की शक्ति, धारा 167
(5) मृत्यु-समीक्षाएं करने की शक्ति, धारा 174
ख-वे शक्तियां जो जिला मजिस्ट्रेट द्वारा विनिहित की जा सकेंगी
वे शक्तियां जो प्रथम वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) न्यूसेंसों की पुनरावृत्तियों के प्रतिषेध का आदेश करने की शक्ति, धारा 143
(2) धारा 144 के अधीन आदेश करने की शक्ति
वे शक्तियां जो द्वितीय वर्ग कार्यपालक मजिस्ट्रेट में विनिहित की जा सकेंगी
(1) न्यूसेंसों की पुनरावृत्तियों के प्रतिषेध का आदेश करने की शक्ति, धारा 143
(2) धारा 144 के अधीन आदेश करने की शक्ति
(3) मृत्यु-समीक्षाएं करने की शक्ति, धारा 174 ।"।
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