दिल्ली सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1971
(1971 का अधिनियम संख्यांक 82)
[30 दिसम्बर, 1971]
दिल्ली में सिख गुरुद्वारों और गुरुद्वारा संपत्ति के उचित
प्रबन्ध का और उससे सम्बन्धित विषयों
का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
भाग 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1971 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जब यह अधिनियम प्रवृत्त होगा;
(ख) बोर्ड" से दिल्ली सिख गुरुद्वारा (प्रबन्ध) अधिनियम, 1971 (1971 का 24) की धारा 3 के अधीन गठित दिल्ली सिख गुरुद्वारा बोर्ड अभिप्रेत है;
(ग) समिति" से धारा 3 के अधीन स्थापित दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्ध समिति अभिप्रेत है;
(घ) दिल्ली" से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है;
(ङ) गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक" से केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 13 के अधीन नियुक्त किया गया गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक अभिप्रेत है;
(च) गुरुद्वारों" से दिल्ली स्थित ऐसे सिख गुरुद्वारे अभिप्रेत हैं जो नियत दिन के ठीक पूर्व बोर्ड के प्रबन्ध के अधीन थे या उससे सम्बद्ध थे और इसके अन्तर्गत अन्य ऐसे स्थानीय गुरुद्वारे भी हैं, जो नियत दिन के पश्चात् समिति से सम्बद्ध किए जाएं या उसके प्रबन्ध के अधीन आएं;
(छ) गुरुद्वारा सम्पत्ति" से अभिप्रेत है: -
(i) सब जंगम और स्थावर सम्पत्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व बोर्ड में निहित या उसके नाम में जमा थी;
(ii) सब सम्पत्ति जो गुरुद्वारों के नाम में या बोर्ड के नाम में या ऐतिहासिक गुरुद्वारों के वर्तमान या पूर्व प्रबन्धकों के नाम में है;
(iii) समिति के प्रबन्ध या नियंत्रण के अधीन विभिन्न गुरुद्वारों या संस्थाओं को नकद या वस्तु रूप में दिया गया सब चढ़ावा;
(iv) नकद या वस्तु रूप में सब जंगम और स्थावर सम्पत्ति जो गुरुदारों या समिति द्वारा समय-समय पर क्रय या विनश्चय द्वारा या अन्यथा अर्जित की जाए;
(v) सब अनुदान, संदान या अभिदाय जो समय-समय पर किसी व्यक्ति या प्राधिकारी द्वारा गुरुद्वारों या समिति को दिए जाएं;
और ऐसी गुरुद्वारा संपत्ति की बाबत कोई बाबत कोई अनुयोज्य दावा इसके अंतर्गत है;
(ज) स्थानीय गुरुद्वारा" से दिल्ली में का ऐसा गुरुद्वारा अभिप्रेत है जो नियत दिन के ठीक पूर्व बोर्ड के नियंत्रण या प्रबन्ध के अधीन नहीं था;
(झ) कोई व्यक्ति किसी वार्ड में मामूली तौर पर निवासी" केवल इस आधार पर नहीं समझा जाएगा कि वहां कोई निवास-गृह उसके स्वामित्व या कब्जे में है और अपने मामूली तौर पर निवास के स्थान से अस्थायी रूप से अनुपस्थित होने वाले व्यक्ति का उस स्थान का मामूली तौर पर निवासी होना केवल उस कारण से समाप्त नहीं हो जाएगा;
(ञ) पतित" से ऐसा सिख अभिप्रेत है जो अपनी दाढ़ी या केश कतरता या मूंडता है या जो अमृत छकने के पश्चात् चार में से कोई एक या अधिक कुरहती करता है;
(ट) रजिस्टीकृत सिंह सभा" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत ऐसी सिंह सभा अभिप्रेत है जिसके प्रबन्ध या नियंत्रण में दिल्ली का कोई स्थानीय गुरुद्वारा है;
(ठ) विनियम" से समिति द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया कोई विनियम अभिप्रेत है;
(ड) नियम" से केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया कोई नियम अभिप्रेत है;
(ढ) सिख" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो सिख धर्म को मानता है, केवल श्री गुरु ग्रन्थ साहब तथा दस गुरुओं के उपदेश में विश्वास रखता है तथा उसका अनुसरण करता है एवं बिना कटे बाल रखता है । इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह है कि यदि यह प्रश्न उठे कि कोई जीवित व्यक्ति सिख है या नहीं तो उसके निम्नलिखित घोषणा नियमों द्वारा विहित रूप से करने अथवा करने से इन्कार करने के अनुसार क्रमशः यह समझा जाएगा कि वह सिख है अथवा नहीं है: -
मैं सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि मैं केशधारी सिख हूं, मैं केवल श्री गुरु ग्रन्थ साहब तथा दस गुरुओं के उपदेश में विश्वास रखता हूं और उसका अनुसरण करता हूं और मेरा कोई अन्य धर्म नहीं है ।";
(ण) अमृतधारी सिख" के अन्तर्गत ऐसा प्रत्येक सिख है जिसने पांच प्यारों के हाथों से सिख धर्म के सिद्धान्तों और कृत्यों के अनुसार तैयार किया गया और दिया गया खण्डे का अमृत या खण्डापहुल छका है ।
भाग 2
समिति
3. समिति का निगमन-(1) गुरुद्वारों और गुरुद्वारा सम्पत्ति के उचित प्रबन्ध और नियंत्रण के लिए उस तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्ध समिति नामक एक समिति की स्थापना की जाएगी ।
(2) समिति उपर्युक्त नाम का निगमित निकाय होगी, उसका शाश्वत उत्तराधिकार होगा और सामान्य मुद्रा होगी और उस नाम से वह वाद लाएगी और उसके विरुद्ध वाद लाया जाएगा ।
(3) समिति का प्रधान कार्यालय दिल्ली में होगा ।
4. समिति की संरचना-समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी: -
(क) छियालीस सदस्य, जो उन विभिन्न वार्डों से निर्वाचित किए जाएंगे जिन में दिल्ली का विभाजन इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार किया जाएगा;
(ख) नौ सदस्य, जो समिति के खण्ड (क) में निर्दिष्ट निर्वाचित सदस्यों द्वारा इसमें इसके पश्चात् दी गई रीति से सहयोजित किए जाएंगे: -
(i) दो सदस्य, जो दिल्ली की रजिस्ट्रीकृत सिंह सभाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए उन रजिस्ट्रीकृत सिंह सभाओं के प्रधानों में से लाटरी निकाल कर चुने जाएंगे;
(ii) चार सदस्य, जिनमें से एक-एक निम्नलिखित का हैडग्रन्थी होगाः -(1) श्री अकाल तखत साहिब, अमृतसर, (2) श्री तखत केसगढ़ साहिब, आनन्दपुर, (3) श्री तखत पटना साहिब, पटना, (4) श्री तखत हजूर साहिब, नांदेड़:
परन्तु हैडग्रन्थी को धारा 16 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन पदाधिकारियों और कार्यपालक बोर्ड के अन्य सदस्यों के निर्वाचनार्थ मतदान करने का अधिकार नहीं होगा;
(iii) एक सदस्य, जो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक समिति, अमृतसर का नामनिर्देशिती होगा;
(iv) दो सदस्य, जो दिल्ली के सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए उपखण्ड (i), उपखण्ड (ii) और उपखण्ड (iii) में निर्दिष्ट व्यक्तियों से भिन्न होंगे तथा एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से चुने जाएंगे ।
5. पदावधि-(1) इस धारा में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, समिति के सदस्य की पदावधि चार वर्ष की होगी और उस तारीख से प्रारम्भ होगी जब धारा 15 के अधीन समिति का पहला अधिवेशन किया जाए और उससे अधिक नहीं होगी ।
(2) जब किसी सदस्य की मृत्यु, पद-त्याग या हटाए जाने के कारण या अन्यथा समिति में कोई रिक्ति हो जाए तो नया सदस्य, यथास्थिति, उस रीति से निर्वाचित या सहयोजित किया जाएगा जिससे वह सदस्य निर्वाचित या सहयोजित किया गया था जिसका स्थान भरना है और ऐसा प्रत्येक सदस्य केवल तब तक पद धारण करेगा जब तक वह सदस्य, जिसके स्थान में वह निर्वाचित या सहयोजित हुआ, रिक्ति न होने की दशा में पद धारण करने का हकदार होता ।
(3) बहिर्गामी सदस्य तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसके उत्तराधिकारी के निर्वाचन या सहयोजन की अधिसूचना धारा 12 के अधीन प्रकाशित न हो जाए ।
6. वार्डों का परिसीमन-(1) समिति के सदस्यों के निर्वाचन के प्रयोजनार्थ दिल्ली को एकल सदस्य वार्डों में विभाजित किया जाएगा ।
(2) गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक आदेश द्वारा, -
(क) वार्डों की संख्या; तथा
(ख) प्रत्येक बोर्ड का विस्तार;
अवधारित करेगा ।
(3) गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश में समिति से परामर्श करके समय-समय पर परिवर्तन या संशोधन कर सकेगा ।
7. निर्वाचक नामावली-(1) धारा 6 के अधीन अधिसूचित प्रत्येक वार्ड के लिए नियमों द्वारा विहित रीति से एक निर्वाचक नामावली तैयार की जाएगी जिसमें उन सब व्यक्तियों के नाम दर्ज किए जाएंगे जो उस वार्ड में मतदाताओं के रूप में रजिस्टर किए जाने के हकदार हों ।
(2) कोई व्यक्ति किसी वार्ड की निर्वाचक नामावली में एक से अधिक बार रजिस्टर किए जाने का हकदार न होगा ।
(3) कोई व्यक्ति एक वार्ड से अधिक की निवार्चक नामावली में रजिस्टर किए जाने का हकदार न होगा ।
8. निर्वाचक की अर्हताएं-प्रत्येक व्यक्ति, जो-
(क) अर्हक कालावधि के दौरान कम से कम एक सौ अस्सी दिन तक किसी वार्ड में मामूली तौर पर निवासी रहा हो,
(ख) अर्हक तारीख को कम से कम 21 वर्ष की आयु का सिख हो,
उस वार्ड की निर्वाचक नामावली में रजिस्टर किए जाने का हकदार होगा :
परन्तु कोई व्यक्ति निर्वाचक के रूप में रजिस्टर न किया जाएगा यदि वह-
(क) अपनी दाढ़ी या केश कतरता या मूंडता हो;
(ख) धूम्रपान करता हो;
(ग) मद्यपान करता हो ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनार्थ अर्हक तारीख" तथा अर्हक कालावधि”, -
(i) इस अधिनियम के अधीन पहली बार तैयार की गई निर्वाचक नामावली की दशा में, क्रमशः 1 जनवरी, 1972 और वह कालावधि होगी जो 1 जनवरी, 1971 को प्रारम्भ हो कर 31 दिसम्बर, 1971 को समाप्त होती है; तथा
(ii) बाद में इस अधिनियम के अधीन तैयार की गई प्रत्येक निर्वाचक नामावली की दशा में, उस वर्ष की जिसमें वह तैयार की जाए पहली जनवरी तथा उस वर्ष का ठीक पूर्ववर्ती वर्ष होगी ।
9. मताधिकार-समिति के सदस्य के निर्वाचन के लिए किसी वार्ड में तत्समय प्रवृत्त निर्वाचक नामावली में रजिस्टर किया हुआ प्रत्येक व्यक्ति, जब तक वह इस प्रकार रजिस्टर किया हुआ रहे, उस वार्ड से सदस्य के निर्वाचन में मतदान करने का हकदार होगा, परन्तु कोई व्यक्ति एक से अधिक वार्डों में निर्वाचन में मतदान करने का हकदार न होगा ।
10. सदस्य की अर्हताएं-(1) कोई सदस्य समिति का सदस्य चुने या सहयोजित किए जाने के लिए अर्हित न होगा, यदि-
(क) उसने पच्चीस वर्ष की आयु प्राप्त न की हो;
(ख) वह भारत का नागरिक न हो;
(ग) निर्वाचित सदस्य की दशा में वह किसी वार्ड की निर्वाचक नामावली में निर्वाचक के रूप में रजिस्टर किया हुआ न हो;
(घ) वह अमृतधारी सिख न हो;
(ङ) अमृतधारी सिख होते हुए वह अपने केश या दाढ़ी कतरे या मूंडे;
(च) मद्यपान करे;
(छ) धूम्रपान करे;
(ज) पतित हो;
(झ) विकृत-चित्त हो और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित हो;
(ञ) अनुन्मोचित दिवालिया हो;
(ट) नैतिक अधमता अन्तर्ग्रस्त करने वाले अपराध का दोषसिद्ध किया गया हो अथवा सरकार, बोर्ड, समिति या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा सेवा में से नैतिक अधमता के कारण पदच्युत किया गया हो;
(ठ) किसी गुरुदारे या स्थानीय गुरुद्वारे का वेतनभोगी सेवक हो;
(ड) अंधा व्यक्ति न होते हुए भी गुरुमुखी [पढ़ और लिख] न सकता हो ।
स्पष्टीकरण-किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह-
(i) गुरुमुखी पढ़ सकता है यदि वह गुरुमुखी के श्री गुरुग्रन्थ साहब का पाठ कर सकता है; तथा
(ii) गुरुमुखी लिख सकता है यदि वह समिति में निर्वाचन के लिए नामनिर्देशन पत्र स्वयं अपने हाथ से गुरुमुखी में भरता है ।
यदि यह प्रश्न उठे कि कोई अभ्यर्थी गुरुमुखी पढ़ और लिख सकता है या नहीं तो उस प्रश्न का विनिश्चय उस रीति से किया जाएगा जो 1[नियमों द्वारा विहित की जाए] ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, यह जानते हुए कि वह ऐसी सदस्यता के लिए अर्हित नहीं है, समिति के सदस्य के रूप में बैठेगा या मतदान करेगा तो वह ऐसे प्रत्येक दिन की बाबत जब वह ऐसे बैठे या मतदान करे तीन सौ रुपए की शास्ति का देनदार होगा जो भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।
11. निर्वाचन-धारा 4 के खण्ड (क) के अधीन सदस्यों के निर्वाचन का संचालन, चाहे वह धारा 3 के अधीन समिति के आरंभिक गठन के प्रयोजनार्थ हो या समय व्यतीत हो जाने के कारण होने वाली रिक्तियों को या आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए हो, उस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक द्वारा किया जाएगा:
परन्तु ऐसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए कोई ऐसा निर्वाचन न किया जाएगा जो इस धारा के अधीन साधारण निर्वाचन किए जाने के पूर्व चार मास के भीतर हो ।
12. परिणामों का प्रकाशन-(1) समिति के सदस्य के रूप में निर्वाचित सब व्यक्तियों के नाम नियमों द्वारा विहित रीति से गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक द्वारा ऐसे निर्वाचन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र प्रकाशित किए जाएंगे ।
(2) धारा 4 के खण्ड (ख) के अधीन सदस्यों के रूप में सहयोजित सब व्यक्तियों के नाम भी नियमों द्वारा विहित रीति से गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक द्वारा उसी प्रकार से प्रकाशित किए जाएंगे ।
13. गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक-(1) केन्द्रीय सरकार किसी उपयुक्त व्यक्ति को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक नियुक्त कर सकेगी और उसमें समिति के सदस्यों के निर्वाचन के लिए निर्वाचक नामावली की तैयारी और उस निर्वाचन के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निहित होगा ।
(2) कोई व्यक्ति गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक नियुक्त किए जाने के लिए अर्हित तभी होगा जब वह भारत का नागरिक हो और उसे कम से कम दस वर्ष का न्यायिक या प्रशासनिक अनुभव हो ।
(3) धारा 37 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि गुरुद्धारा निर्वाचन निदेशक की पदावधि तथा उसकी सेवा के निबन्धन और शर्तें वे होंगी जो नियमों द्वारा विहित की जाएं ।
14. निर्वाचित सदस्यों का प्रथम अधिवेशन-(1) धारा 4 के खण्ड (ख) के अधीन समिति के सदस्यों के रूप में सहयोजित किए जाने वाले सदस्यों का चुनाव निर्वाचित सदस्यों के प्रथम अधिवेशन में किया जाएगा, जिसका संयोजन गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक द्वारा निर्वाचन परिणाम के धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन प्रकाशन के पश्चात् पन्द्रह दिन व्यतीत होने के पूर्व तथा यथासम्भवशीघ्र किया जाएगा ।
(2) यदि निर्वाचित सदस्य सहयोजित किए जाने वाले सब व्यक्तियों का चुनाव प्रथम अधिवेशन में करने में असमर्थ हो तो गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक निर्वाचित सदस्यों के प्रथम अधिवेशन को किसी अन्य तारीख या तारीखों के लिए स्थगित कर सकेगा किन्तु ऐसी तारीख पूर्वोक्त प्रथम अधिवेशन की तारीख के पश्चात् पन्द्रह दिन से आगे न होगी ।
15. समिति का प्रथम अधिवेशन-(1) गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक समिति का प्रथम अधिवेशन उस तारीख को बुलाएगा जो वह ठीक समझे और जो धारा 12 की उपधारा (2) के अधीन सहयोजित सदस्यों के नामों के प्रकाशन की तारीख के पश्चात् पन्द्रह दिन से आगे की न हो ।
(2) प्रथम अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा जो गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक नियत करे और वही उसका सभापतित्व करेगा:
परन्तु समिति के अधिवेशन का सभापतित्व करते समय गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक को मत देने का अधिकार न होगा ।
(3) समिति का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने के पूर्व, अनुसूची में इस प्रयोजनार्थ दिए गए प्ररूप के अनुसार गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक के समक्ष शपथ लेगा और उसे हस्ताक्षरित करेगा ।
(4) तत्पश्चात् समिति के सदस्य अपने में से उस अवसर के लिए सभापति का निर्वाचन ऐसी रीति से करेंगे जो नियमों द्वारा विहित की जाए और वह अधिवेशन का सभापतित्व तब तक करेगा जब तक समिति अध्यक्ष निर्वाचित न कर ले ।
16. पदाधिकारियों का निर्वाचन-(1) प्रथम अधिवेशन में धारा 15 की उपधारा (4) के अधीन उस अवसर के लिए सभापति के निर्वाचन के पश्चात् समिति अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष निर्वाचित करेगी जो इस धारा के अधीन अन्य पदाधिकारियों और कार्यपालक बोर्ड के सदस्यों के निर्वाचन का संचालन करेगा ।
(2) समिति अपने प्रथम अधिवेशन में अपने सदस्यों में से एक ज्येष्ठ उपाध्यक्ष, एक कनिष्ठ उपाध्यक्ष, एक महासचिव और एक संयुक्त सचिव भी निर्वाचित करेगी (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् समिति के पदाधिकारी कहा गया है) और उसी अधिवेशन में तथा रीति से अपने में से दस सदस्यों की समिति के कार्यपालक बोर्ड का सदस्य निर्वाचित करेगी और इस प्रकार निर्वाचित पदाधिकारियों और सदस्यों से समिति का कार्यपालक बोर्ड गठित होगा ।
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(4) समिति का कोई सदस्य उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट पदों में से किसी पर एक ही समय एक से अधिक हैसियत में नहीं रहेगा ।
(5) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निर्वाचित अध्यक्ष तथा कार्यपालक बोर्ड के अन्य सदस्य एक वर्ष की अवधि पर्यन्त पद धारण करेंगे, किन्तु केवल एक और अवधि के लिए पुनः निर्वाचन के पात्र होंगे:
परन्तु कोई भी बहिर्गामी पदाधिकारी या सदस्य तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसके उत्तराधिकारी का निर्वाचन न हो जाए ।
(6) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अध्यक्ष तथा अन्य पदाधिकारियों और कार्यपालक बोर्ड के सदस्यों का निर्वाचन या उन पदों में से किसी के लिए कोई पश्चात्वर्ती वार्षिक निर्वाचन ऐसी रीति से किया जाएगा जो नियमों द्वारा विहित की जाए ।
[(7) धारा 5 की उपधारा (2) के उपबन्ध कार्यपालक बोर्ड के अध्यक्ष, किसी अन्य पदाधिकारी या सदस्य के पद की आकस्मिक रिक्ति को भरने में, जहां तक हो सके, ऐसे लागू होंगे जैसे वे समिति की सदस्यता की आकस्मिक रिक्तियों के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।]
[16क. पदाधिकारियों के निर्वाचन के लिए दूसरा अधिवेशन बुलाने की शक्ति-(1) यदि समिति अपने प्रथम अधिवेशन में धारा 15 की उपधारा (4) या धारा 16 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन कार्यपालक बोर्ड के उस अवसर के लिए सभापति या अध्यक्ष या किसी अन्य पदाधिकारी या सदस्य का निर्वाचन करने में असमर्थ हो तो गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक, कार्यपालक बोर्ड के, यथास्थिति, उस अवसर के लिए सभापति, अध्यक्ष या शेष पदाधिकारियों या सदस्यों के निर्वाचन के लिए, समिति का दूसरा अधिवेशन बुलाएगा जो प्रथम अधिवेशन की तारीख के पश्चात् पन्द्रह दिन के आगे नहीं होगा ।
(2) धारा 15 और 16 के उपबन्ध उपधारा (1) के अधीन निर्वाचन के संचालन को, जहां तक हो सके, लागू होंगे ।]
17. सदस्यों और पदाधिकारियों का पद रिक्त करना, पद-त्याग करना और हटाया जाना-(1) समिति का कोई सदस्य अध्यक्ष को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
(2) कोई पदाधिकारी अथवा कार्यपालक बोर्ड का कोई अन्य सदस्य-
(क) समिति का सदस्य न रह जाने की दशा में अपना पद रिक्त कर देगा;
(ख) समिति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी समय पद त्याग सकेगा; तथा
(ग) समिति द्वारा अपने कुल सदस्यों के तीन चौथाई के बहुमत द्वारा पारित संकल्प से अपने पद से हटाया जा सकेगा:
परन्तु खण्ड (ग) के प्रयोजनार्थ, कोई संकल्प तभी प्रस्तावित किया जाएगा जब वह समिति के कम से कम सत्रह सदस्यों द्वारा समर्थित हो और संकल्प प्रस्तावित करने के उनके आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना दे दी गई हो ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन पद त्याग उस तारीख से प्रभावी होगा जिससे वह त्यागपत्र, यथास्थिति, कार्यपालक बोर्ड या समिति द्वारा स्वीकार किया जाए ।
18. सदस्यों की फीसें और भत्ते-कोई पदाधिकारी या कार्यपालक बोर्ड का अन्य सदस्य या समिति का कोई अन्य सदस्य, यदि वह चाहे तो, यथास्थिति, कार्यपालक बोर्ड या समिति के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए, और कार्यपालक बोर्ड या समिति का कोई अन्य कार्य करने के लिए ऐसी फीसें और भत्ते ले सकेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
19. समिति और कार्यपालक बोर्ड के अधिवेशन-(1) समिति का वार्षिक साधारण अधिवेशन प्रत्येक वर्ष किया जाएगा ।
(2) कार्यपालक बोर्ड का अधिवेशन पन्द्रह दिन में कम से कम एक बार अथवा ऐसे अन्तरालों पर होगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
(3) अध्यक्ष, अथवा उसकी अनुपस्थिति में ज्येष्ठ उपाध्यक्ष तथा दोनों की अनुपस्थिति में कनिष्ठ उपाध्यक्ष और तीनों की अनुपस्थिति में सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित कोई अन्य व्यक्ति समिति या कार्यपालक बोर्ड के अधिवेशन का सभापतित्व करेगा ।
(4) समिति और कार्यपालक बोर्ड अपने अधिवेशनों में कार्य करने के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेंगे जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
(5) अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, उन सब प्रश्नों का विनिश्चय, जो समिति या कार्यपालक बोर्ड के किसी अधिवेशन के समक्ष आएं, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के मतों की बहुसंख्या से किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में सभापतित्व करने वाले व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
(6) समिति या कार्यपालक बोर्ड के सब अधिवेशनों की कार्यवाही गुरुमुखी लिपि में पंजाबी में अभिलिखित की जाएगी ।
20. उपसमितियां-(1) कार्यपालक बोर्ड, ऐसे प्रयोजनों के लिए जिनका वह विनिश्चय करे, समिति के सदस्यों में से उतनी उपसमितियां गठित कर सकेगा जितनी वह ठीक समझे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन गठित उपसमिति के अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होंगे और वह अपने अधिवेशनों में कार्य करने के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
(3) उपसमिति का सदस्य, यदि वह चाहे तो, उसके अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए और समिति का कोई अन्य कार्य करने के लिए ऐसी फीसें और भत्ते ले सकेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
21. कार्यपालक बोर्ड और उसके पदाधिकारियों की शक्तियां-(1) कार्यपालक बोर्ड समिति की ओर से उन सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो इस अधिनियम के उपबन्धों द्वारा समिति को प्रदत्त हैं और जिनके बारे में अभिव्यक्त रूप में यह उपबन्ध नहीं है कि उनका प्रयोग समिति द्वारा साधारण अधिवेशन में किया जाए ।
(2) अध्यक्ष या कार्यपालक बोर्ड का कोई अन्य पदाधिकारी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन कर सकेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं या जो समय-समय पर कार्यपालक बोर्ड द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष, स्वप्रेरणा से या अन्यथा, किसी मामले का अभिलेख मंगाने के पश्चात् किसी ऐसे आदेश का पुनरीक्षण कर सकेगा जो किसी ऐसे प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया हो जिसे ऐसी शक्तियां कार्यपालक बोर्ड द्वारा प्रत्यायोजित की गई हों और वह-
(i) उस आदेश को पुष्ट, उपान्तरित या अपास्त कर सकेगा,
(ii) समिति के किसी कर्मचारी पर कोई शास्ति अधिरोपित कर सकेगा या उस पर अधिरोपित किसी शास्ति को हटा सकेगा, कम कर सकेगा, पुष्ट कर सकेगा या बढ़ा सकेगा,
(iii) मामले को उस प्राधिकारी को जिसने आदेश किया या किसी अन्य प्राधिकारी को भेज सकेगा और उसमें अग्रिम कार्रवाई या जांच का निेदेश दे सकेगा जो उस मामले की परिस्थितियों में उचित समझ जाए, अथवा
(iv) अन्य ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(4) उपधारा (3) के अधीन अध्यक्ष द्वारा पारित किसी आदेश का प्रवर्तन तब तक नहीं किया जाएगा जक तक वह कार्यपालक बोर्ड द्वारा पुष्ट न कर दिया जाए ।
22. किसी रिक्ति आदि के कारण ही समिति, कार्यपालक बोर्ड या उपसमितियों के कार्यों की विधिमान्यता का प्रश्नगत न किया जाना-समिति या कार्यपालक बोर्ड या किसी उपसमिति का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य न होगी कि उसके सदस्यों में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि थी ।
23. समिति के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) समिति उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारी नियुक्त कर सकेगी जितने वह अपने कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक समझे, और समय-समय पर उन अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की संख्या, उनके पदनाम, ग्रेड और वेतनमान या अन्य पारिश्रमिक अवधारित कर सकेगी और किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को उसकी असावधानी, अयोग्यता या कर्तव्य-उपेक्षा या अन्य अवचार के आधार पर अवनत या निलम्बित कर सकेगी, हटा सकेगी या पदच्युत कर सकेगी या उस पर कोई अन्य शास्ति अधिरोपित कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अधिकारी और अन्य कर्मचारी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं या जो समिति द्वारा समय-समय पर प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(3) अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबन्धन और शर्तें वे होंगी जो विनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
भाग 3
समिति की शक्तियां और कृत्य
24. समिति की शक्तियां और कृत्य-इस अधिनियम के उपबन्धों तथा तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, दिल्ली में के सभी गुरुद्वारों तथा गुरुद्वारा सम्पत्ति का नियंत्रण, निदेशन तथा साधारण अधीक्षण समिति में निहित होगा, और समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह-
(i) गुरुद्वारों में धार्मिक कृत्यों और कर्मों के उचित रूप से किए जाने की व्यवस्था करे,
(ii) गुरुद्वारों में उपासकों द्वारा पूजा की सुविधाएं प्रदान करे,
(iii) अपनी निधियों, जंगम तथा स्थावर सम्पत्ति, निक्षेपों तथा नकद अथवा अन्य किसी किस्म के चढ़ावे की सुरक्षित अभिरक्षा को सुनिश्चित करे,
(iv) ऐसी सभी बातें करे जो समिति के अधीन के गुरुद्वारों, शैक्षिक तथा अन्य संस्थाओं के कार्यकलाप तथा उनकी सम्पत्ति के दक्ष प्रबन्ध अथवा उपासकों की सुविधाओं के लिए आनुषंगिक तथा सहायक हों,
(v) तीर्थयात्रियों के लिए उपयुक्त आवास तथा सुविधाओं की व्यवस्था करे,
(vi) मुफ्त खाना देने के लिए लंगर चलाए,
(vii) ऐतिहासिक तथा अन्य गुरुद्वारों, शैक्षिक तथा अन्य संस्थाओं और उनकी सम्पत्ति का इस प्रकार प्रबन्ध करे कि वे सिख परम्परा, संस्कृति तथा धर्म के लिए प्रेरणा देने वाले केंद्र बनें,
(viii) अपने प्रबन्ध के अधीन गुरुद्वारों, शैक्षिक तथा अन्य संस्थाओं में व्यवस्था, अनुशासन तथा उचित स्वास्थ्यकर दशाओं को बनाए रखना सुनिश्चित करे,
(ix) निःशुल्क औषधालय खोले,
(x) शिक्षा का, विशेषकर गुरुमुखी लिपि में पंजाबी के ज्ञान का, विस्तार करे,
(xi) शैक्षिक संस्थाएं, अनुसंधान केन्द्र तथा पुस्तकालय स्थापित करे,
(xii) धार्मिक तथा शैक्षिक संस्थाओं, सोसाइटियों तथा जरूरतमंद व्यक्तियों को वित्तीय सहायता दे,
(xiii) जरूरतमंद तथा योग्य विद्यार्थियों को वृत्तिकाएं दे,
(xiv) सिख समुदाय की उन्नति के लिए तथा सिख धर्म के प्रचार के लिए सहायता दे,
(xv) अन्य ऐसे कृत्य तथा धार्मिक अथवा खैराती कार्य करे जो इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
भाग 4
गुरुद्वारा निधि, लेखे तथा लेखापरीक्षा
25. गुरुद्वारा निधि-(1) एक गुरुद्वारा निधि होगी और गुरुद्वारों की तथा गुरुद्वारा सम्पत्ति की सभी प्राप्तियां तथा आय (जिसके अन्तर्गत वे सभी रकमें भी हैं जो तत्समय गुरुद्वारा सम्पत्ति में समाविष्ट हों) उसमें जमा की जाएंगी ।
(2) इसमें अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन रहते हुए, गुरुद्वारा निधि समिति द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ न्यास के रूप में धारित की जाएगी और इस अधिनियम अथवा तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों द्वारा प्राधिकृत किसी प्रयोजन को छोड़कर किसी अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग में नहीं लाई जाएगी ।
(3) समिति द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में किए गए सभी व्यय अथवा किए जाने वाले सभी संदाय अथवा संवितरण गुरुद्वारा निधि से किए जाएंगे ।
26. राजनीतिक प्रयोजनों के लिए अभिदाय करने के बारे में प्रतिषेध-इस अधिनियम की कोई बात, -
(क) किसी राजनीतिक दल को, अथवा
(ख) किसी राजनीतिक दल के फायदे के लिए, अथवा
(ग) किसी व्यष्टि अथवा निकाय को किसी राजनीतिक प्रयोजन के लिए,
किसी रकम या किन्हीं रकमों का अभिदाय करने के लिए समिति को न तो प्राधिकृत करेगी और न प्राधिकृत करने वाली समझी जाएगी ।
27. बजट-(1) प्रत्येक वित्तीय वर्ष के बारे में, समिति का उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्ययों का बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण) समिति के समक्ष रखा जाएगा और सम्यक् रूप से पारित किया जाएगा ।
(2) गुरुद्वारा निधि में से कोई धन समिति द्वारा पारित और अनुमोदित रूप से विनियोजित करने के सिवाय विनियोजित नहीं किया जाएगा ।
28. लेखाओं का रखा जाना-(1) समिति उचित लेखे रखेगी जिनमें गुरुद्वारा निधि में होने वाली प्राप्तियों तथा उससे होने वाले व्यय को दिखाया जाएगा ।
(2) प्रत्येक कलेण्डर मास के अन्त में, उस मास के सम्बन्ध में आय तथा व्यय का विवरण तैयार किया जाएगा और समिति के समक्ष रखा जाएगा और उसे सभी गुरुद्वारों के बाहर मुख्य स्थानों पर लगा दिया जाएगा; और किसी वित्तीय वर्ष के सम्बन्ध में आय तथा व्यय दिखाने वाला समेकित वार्षिक विवरण प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अन्त में उसी प्रकार से तैयार किया जाएगा और समिति के समक्ष तथा गुरुद्वारों के बाहर रखा जाएगा ।
29. लेखाओं की लेखापरीक्षा-(1) समिति के लेखे, जिनके अन्तर्गत समिति द्वारा प्रशासित गुरुद्वारों और शैक्षिक तथा अन्य खैराती संस्थानों को सम्मिलित करते हुए गुरुद्वारा सम्पत्ति के लेखे भी हैं, एक या अधिक ऐसे लेखापरीक्षकों द्वारा लेखापरीक्षित किए जाएंगे जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 की उपधारा (1) के अधीन लेखापरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से अर्हित हों (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् लेखापरीक्षक कहा गया है) और वे प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति से साठ दिन के भीतर समिति द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और उतना पारिश्रमिक प्राप्त करेंगे जितना समिति नियत करे :
परन्तु लेखापरीक्षकों की प्रथम नियुक्ति धारा 15 के अधीन किए गए प्रथम अधिवेशन की तारीख से साठ दिन के भीतर समिति द्वारा की जाएगी ।
(2) ऐसी किसी लेखापरीक्षा तथा लेखाओं की परीक्षा के प्रयोजनार्थ लेखापरीक्षक, लिखित रूप में मांग करके, समिति से अथवा समिति के किसी सदस्य या पदाधिकारी या कर्मचारी से अथवा किसी गुरुद्वारे, समिति की शैक्षिक या अन्य संस्था से अपेक्षा कर सकेंगे कि वह उसके समक्ष ऐसी सभी पुस्तकें, विलेख, वाउचर तथा अन्य दस्तावेजें और कागजपत्र पेश करे, जो वह आवश्यक समझे, और ऐसी किन्हीं पुस्तकों, विलेखों, वाउचरों, दस्तावेजों और कागजपत्रों को रखने वाले या उनके लिए उत्तरदायी किसी व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेंगे कि वह उनके समक्ष किसी लेखापरीक्षा या परीक्षा में उपस्थित हो, और उसके बारे में उन सभी प्रश्नों के उत्तर दे जो उनके बारे में उससे पूछे जाएं तथा और कोई ऐसा विवरण तैयार और प्रस्तुत करे जिसे ऐसा लेखापरीक्षक आवश्यक समझे ।
(3) लेखापरीक्षा तथा परीक्षा के पूरे होने के पश्चात् तीस दिन के भीतर, लेखापरीक्षक प्रत्येक ऐसे लेखे पर जिसकी लेखापरीक्षा और परीक्षा की गई हो समिति को रिपोर्ट देगा ।
(4) लेखापरीक्षा रिपोर्ट, उसके प्राप्त होने के तीस दिन के भीतर, दिल्ली के कम से कम दो दैनिक पत्रों में (जिसमें एक अंग्रेजी का हो और एक पंजाबी का) तथा गुरुद्वारा पत्रिका में भी, यदि कोई हो, प्रकाशित की जाएगी ।
(5) लेखापरीक्षक की रिपोर्ट में, अन्य विषयों के साथ-साथ, व्यय की उन मदों को जो उसकी राय में अवैध, अनियमित अथवा अनुचित हों, समिति को देय धन अथवा सम्पत्ति के वसूल न किए जाने वाले सभी मामलों को, उपेक्षा अथवा कदाचार के कारण धन अथवा सम्पत्ति की हानि या अनिष्टकर व्यय के सभी मामलों को तथा ऐसे सभी मामलों को जिनमें किसी धन अथवा सम्पत्ति को ऐसे किसी प्रयोजन में लगाया गया हो जो इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत नहीं है, विनिर्दिष्ट किया जाएगा ।
30. लेखापरीक्षक की रिपोर्ट पर समिति द्वारा विचार-समिति, लेखापरीक्षक की रिपोर्ट की प्राप्ति की तारीख के ठीक पश्चात् के अधिवेशन में ऐसी रिपोर्ट पर विचार करेगी और अपना समाधान करेगी कि उसमें दिखाया गया कोई व्यय इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार ही किया गया है, अन्यथा नहीं, और ऐसे आदेश करेगी जो उसकी राय में अवैध, अप्राधिकृत अथवा अनुचित व्यय की परिशुद्धि के लिए आवश्यक और उचित हों तथा रिपोर्ट पर ऐसे और आदेश भी कर सकेगी जो वह उचित समझे:
परन्तु उस दशा में जब निकट आगामी अधिवेशन रिपोर्ट की प्राप्ति के पश्चात् दो मास से पूर्व किसी दिन पड़ता हो उस पर उसके ठीक पश्चात् के अधिवेशन में विचार किया जा सकेगा जो उक्त रिपोर्ट की प्राप्ति की तारीख से तीन मास की कालावधि के अवसान के पूर्व बुलाया जाएगा ।
भाग 5
निर्वाचन संबंधी तथा अन्य विवादों का निपटारा
31. निर्वाचन संबंधी विवाद तथा निर्वाचन अपराध आदि-निर्वाचन सम्बन्धी विवादों के निपटारे, समिति के सदस्यों के निर्वाचन या सहयोजन की बाबत भ्रष्ट आचरणों तथा निर्वाचन सम्बन्धी अपराधों के बारे में, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) की धारा 15, 16, 17, 18, 19, 20, 22, 23, 24, 25, 27, 28, 29 और 30 के उपबन्ध, आवश्यक परिवर्तनों सहित, ऐसे उपान्तरों के अधीन रहते हुए लागू होंगे जो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेशित करे ।
32. अन्य विषयों में जिला न्यायालय की अधिकारिता-दिल्ली के जिला न्यायाधीश के न्यायालय को निम्नलिखित विषयों की बाबत भी अधिकारिता होगी, अर्थात्: -
। । । ।
(ग) समिति के किसी सदस्य, पदाधिकारी अथवा अधिकारी अथवा अन्य कर्मचारी के विरुद्ध शिकायतों, अनियमितताओं, न्यास-भंग अथवा किसी गुरुद्वारा, शैक्षिक अथवा अन्य संस्था में दुर्व्यवहार के बारे में अर्जियां;
(घ) समिति तथा उसके कर्मचारियों के बीच में, जिनके अन्तर्गत भूतपूर्व कर्मचारी भी हैं, किसी भी प्रकार के विवाद से उद्भूत होने वाली अर्जियां;
(ङ) समिति के लेखापरीक्षकों की किसी वार्षिक रिपोर्ट के प्रकाशन में अथवा उसमें उठाई गई किसी आपत्ति के ठीक न किए जाने अथवा दूर न किए जाने में असफलता के बारे में आवेदन ।
33. अपीलें-(1) जिला न्यायाधीश द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, उस आदेश से साठ दिन के भीतर दिल्ली उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा और ऐसी अपील पर उच्च न्यायालय का आदेश अन्तिम तथा निश्चायक होगा ।
(2) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) की धारा 5 और 12 के उपबन्ध, यावत्शक्य, इस धारा के अधीन की अपीलों को लागू होंगे ।
भाग 6
प्रकीर्ण
34. स्थानीय गुरुद्वारों के संबद्ध किए जाने की प्रक्रिया-(1) कोई रजिस्ट्रीकृत सिंह सभा अपने नियंत्रणाधीन किसी स्थानीय गुरुद्वारे के सम्बन्ध में, अपने कुल सदस्यों के तीन-चौथाई बहुमत से अंगीकृत संकल्प द्वारा विनिश्चय कर सकेगी कि उस स्थानीय गुरुद्वारे को समिति से संबद्ध कर दिया जाए और यदि समिति उसकी सम्मति दे देती है तो उक्त स्थानीय गुरुद्वारा समिति से संबद्ध किया गया समझा जाएगा ।
(2) इस प्रकार संबद्ध किए गए गुरुद्वारे की तथा रजिस्ट्रीकृत सिंह सभा की सभी आस्तियां तथा दायित्व, तत्पश्चात्, समिति में निहित हो जाएंगे ।
35. सिख धर्म के कृत्यों तथा प्रथाओं पर अधिनियम का प्रभाव न पड़ना-इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि की कोई बात-
(क) इस अधिनियम अथवा तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, किसी ऐसे सम्मान, उपलब्धि या परिलब्धि पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसका कि कोई व्यक्ति किसी गुरुद्वारे में रूढ़ि द्वारा या अन्यथा हकदार हो;
(ख) किसी गुरुद्वारे में किए जाने वाले धार्मिक या आध्यात्मिक कृत्य में किसी हस्तक्षेप को प्राधिकृत नहीं करेगी ।
36. सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का लोक सेवक होना-समिति, कार्यपालक बोर्ड या किसी उपसमिति का प्रत्येक सदस्य, गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक तथा समिति का प्रत्येक अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अन्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।
37. गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक के वेतन आदि का आरम्भ में भारत की संचित निधि में से चुकाया जाना-(1) गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक तथा समिति के निर्वाचनों के संचालन के लिए नियोजित अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन तथा भत्ते आरम्भ में भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे, किन्तु प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर गुरुद्वारा निधि के नामे डालकर समिति से वसूल किए जाएंगे ।
(2) यदि उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार को देय कोई रकम मांग किए जाने के पश्चात् तीन मास के भीतर संदत्त नहीं की जाती तो वह भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।
38. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही समिति, कार्यपालक बोर्ड या किसी उपसमिति के किसी सदस्य के, गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक के या समिति के किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध न होगी ।
39. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध या उनका विनियमन कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) वह रीति जिससे धारा 2 के खण्ड (ढ) के प्रयोजनार्थ घोषणा के जाएगी;
[(कक) यह विनिश्चित करने की रीति और सिद्धान्त कि समिति के सदस्य के रूप में निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी गुरुमुखी पढ़ और लिख सकता है या नहीं;]
(ख) वे विशिष्टियां जो निर्वाचक नामावलियों में दर्ज की जाएंगी;
(ग) निर्वाचक नामावलियों का प्रारम्भिक प्रकाशन;
(घ) वह रीति जिससे तथा वह समय जिसके भीतर निर्वाचक नामावलियों की प्रविष्टियों के बारे में दावे तथा आक्षेप किए जा सकेंगे;
(ङ) वह रीति जिससे दावों या आक्षेपों की सूचनाएं प्रकाशित की जाएंगी;
(च) वह स्थान, तारीख तथा समय जिस पर दावों या आक्षेपों की सुनवाई की जाएगी तथा वह रीति जिससे दावों या आक्षेपों की सुनवाई की जाएगी तथा उनका निपटारा किया जाएगा;
(छ) निर्वाचक नामावलियों का अन्तिम प्रकाशन;
(ज) निर्वाचक नामावलियों का पुनरीक्षण तथा उनकी शुद्धि और उनमें नामों का सम्मिलित किया जाना;
(झ) निर्वाचनों के संचालन के लिए रिटर्निंग आफिसरों, सहायक रिटर्निंग आफिसरों, पीठासीन आफिसरों तथा मतदान आफिसरों की नियुक्ति;
(ञ) अभ्यर्थियों का नामनिर्देशन, नामनिर्देशन पत्रों के प्ररूप, नामनिर्देशनों पर आक्षेप तथा नामनिर्देशनों की संवीक्षा;
(ट) अभ्यर्थियों द्वारा किए जाने वाले निक्षेप, ऐसे निक्षेपों के लिए जाने का समय तथा रीति, तथा वे परिस्थितियां जिनमें ऐसे निक्षेपों का प्रतिदाय अभ्यर्थियों को किया जा सकेगा या उन्हें समिति के प्रति समपहृत किया जा सकेगा;
(ठ) अभ्यर्थिता वापिस लेना;
(ड) अभ्यर्थियों के अभिकर्ताओं की नियुक्ति;
(ढ) सविरोध तथा अविरोध निर्वाचनों में प्रक्रिया;
(ण) मतदान के लिए तारीख, समय तथा स्थान तथा निर्वाचनों के संचालन से संबद्ध अन्य विषय, जिनके अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं: -
(i) प्रत्येक वार्ड के लिए मतदान केन्द्र नियत करना;
(ii) वह समय जिसके दौरान मतदान केन्द्र मतदान के लिए खुला रहेगा;
(iii) मतपत्रों का मुद्रण तथा जारी किया जाना;
(iv) निर्वाचन नामावली को देखते हुए मतदाताओं की जांच;
(v) मतदाताओं के प्रतिरुपण को निवारित करने के लिए मतदाता की बाईं तर्जनी या अन्य किसी अंगुली या अंग पर पक्की स्याही के चिह्न लगाना तथा किसी मतदाता को उस दशा में मतपत्र दिए जाने का प्रतिषेध जब ऐसे पत्र के लिए आवेदन करने के समय उस पर पहले ही से ऐसा कोई चिह्न लगा हो;
(iv) वह रीति जिससे मत, विशेषकर अशिक्षित मतदाताओं या शारीरिक अथवा अन्य निःशक्तता वाले मतदाताओं की दशा में, दिए जाने हैं;
(vii) उन मतों की बाबत जिन पर आपत्ति की गई हो तथा निविदत्त मतों की बाबत अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ;
(viii) मतों की संवीक्षा, मतों की गणना, परिणामों की घोषणा तथा मत बराबर होने की दशा में अथवा एक से अधिक वार्डों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी सदस्य के निर्वाचित होने की दशा में, प्रक्रिया;
(ix) निर्वाचनों से सम्बद्ध कागजपत्रों की अभिरक्षा तथा व्ययन;
(x) बलवा, हिंसा अथवा किसी अन्य पर्याप्त हेतुक से हुए विघ्न की दशा में मतदान का निलम्बन तथा नया मतदान कराना;
(xi) गणना के पूर्व मतपेटियों के नष्ट होने तथा उनसे छेड़छाड़ करने की दशा में नया मतदान कराना;
(xii) मतदान के पूर्व किसी अभ्यर्थी की मृत्यु की दशा में मतदान को भंग करना;
(त) निर्वाचन अर्जी पर संदत्त की जाने वाली फीस;
(थ) गुरुद्वारा निर्वाचन निदेशक की सेवा के निबन्धन और शर्तें;
(द) धारा 15 की उपधारा (4) के अधीन उस अवसर के लिए सभापति के तथा धारा 16 के अधीन कार्यपालक बोर्ड के अध्यक्ष तथा अन्य पदाधिकारियों और सदस्यों के निर्वाचन की प्रक्रिया;
(ध) कोई अन्य विषय जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन नियम बनाना आवश्यक समझे अथवा जिसकी बाबत यह अधिनियम उपबन्ध नहीं करता अथवा अपर्याप्त उपबन्ध करता है और, केन्द्रीय सरकार की राय में, उसके लिए उपबन्ध आवश्यक है;
(न) वह रीति जिससे समिति के सदस्यों के निर्वाचन के परिणाम अथवा सहयोजन को प्रकाशित किया जाएगा, अथवा जिससे नियमों के अधीन किए गए आदेश सहजदृश्य सार्वजनिक स्थानों पर उनकी प्रतियां लगाकर, डोंडी पिटवा कर प्रकाशन द्वारा अथवा स्थानीय समाचारपत्रों में विज्ञापन द्वारा, विख्यात किए जाएंगे ।
(3) इस धारा के अधीन कोई नियम बनाने में केन्द्रीय सरकार उपबन्ध कर सकेगी कि उसके किसी उल्लंघन के लिए कारावास का, जिसकी अवधि छह मास तक हो सकेगी, अथवा जुर्माने का, अथवा दोनों का, दण्ड दिया जा सकेगा ।
[(4) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो तीस दिन की अवधि के लिए रखे जाएंगे । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उन नियमों में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वे ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होंगे । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वे नियम नहीं बनाए जाने चाहिएं तो तत्पश्चात् वे निष्प्रभाव हो जाएंगे । किन्तु नियमों के परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
40. विनियम बनाने की समिति की शक्ति-(1) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों को करने के लिए समिति ऐसे विनियम बना सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों तथा तद्धीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -
। । । । । ।
(ख) वह फीस और भत्ते जो कार्यपालक बोर्ड के पदाधिकारी और अन्य सदस्य अथवा समिति के या किसी उपसमिति के अन्य सदस्य क्रमशः कार्यपालक बोर्ड, समिति या उपसमिति के अधिवेशन में हाजिर रहने तथा किसी अन्य कार्य के लिए प्राप्त करने के हकदार होंगे;
(ग) उस अन्तराल की कालावधियां जिन पर कार्यपालक बोर्ड के अधिवेशन किए जाएंगे, वह रीति जिससे समिति या कार्यपालक बोर्ड या किसी उपसमिति के अधिवेशन बुलाए जाएंगे, उनमें कार्य किए जाने के लिए गणपूर्ति तथा समिति, कार्यपालक बोर्ड या किसी उपसमिति के अधिवेशनों में कार्य करने के लिए अनुसरण किए जाने वाले प्रक्रिया के नियम;
(घ) वह रीति जिससे किसी ऐसे विषय को, जिस पर विनिश्चय की अपेक्षा हो, पदाधिकारियों तथा सदस्यों में परिचालित करके कार्यपालक बोर्ड के बहुमत वाला विनिश्चय प्राप्त किया जाएगा;
(ङ) वे विषय जिनकी बाबत कार्यपालक बोर्ड के अध्यक्ष या अन्य पदाधिकारियों द्वारा अथवा समिति के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी द्वारा शक्तियों का प्रयोग तथा कर्तव्यों का निर्वहन किया जा सकेगा;
(च) समिति के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबन्धन तथा शर्तें, जिनके अन्तर्गत ऐसे अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की भर्ती, स्थानान्तरण, ज्येष्ठता नियत करना, प्रोन्नति तथा उनके विरुद्ध आनुशासनिक कार्रवाई या उन्हें दण्ड भी हैं;
(छ) ऐसे कोई अन्य कृत्य या धार्मिक या खैराती कार्य जो उनके अतिरिक्त जो धारा 24 में विनिर्दिष्ट हैं, समिति द्वारा किए जा सकेंगे, तथा वे शर्तें और निबन्धन जिनके अधीन रहते हुए वे कृत्य या कार्य किए जाएंगे;
(ज) वह रीति जिससे गुरुद्वारा निधि के नकद तथा अन्य धन को निक्षिप्त या विनिहित किया जाएगा;
(झ) वह प्ररूप जिसमें समिति का बजट प्रस्तुत किया जाएगा;
(ञ) वह प्ररूप जिसमें समिति का लेखा रखा जाएगा तथा लेखे का प्रकाशन;
(ट) वह रीति जिससे बोर्ड विनियम या तद्धीन किया गया कोई आदेश सहजदृश्य सार्वजनिक स्थानों पर उसकी प्रक्रियां लगाकर, डोंडी पिटवाकर, प्रकाशन द्वारा या स्थानीय समाचारपत्रों में विज्ञापन द्वारा विख्यात किया जाएगा;
(ठ) अन्य कोई विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
[(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
41. निरसन तथा व्यावृत्ति-(1) समिति की स्थापना की तारीख से ही दिल्ली सिख गुरुद्वारा (प्रबन्ध) अधिनियम, 1971 (1971 का 24) निरसित हो जाएगा ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, -
(क) उक्त अधिनियम के अधीन की गई कोई नियुक्ति, निकाली गई कोई अधिसूचना, किया गया कोई आदेश या बनाया गया कोई नियम, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, प्रवृत्त बना रहेगा और उसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया गया, निकाला गया या बनाया समझा जाएगा जब तक कि उसे उक्त उपबन्धों के अधीन की गई किसी नियुक्ति, निकाली गई किसी अधिसूचना, किए गए किसी आदेश या बनाए गए किसी नियम द्वारा अतिष्ठित नहीं कर दिया जाता;
(ख) दिल्ली सिख गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा या उसके साथ या उसके लिए बनाए गए सभी बजट प्राक्कलनों, उपगत सभी बाध्यताओं और दायित्वों, की गई सभी संविदाओं तथा वचनबंध किए गए सभी कार्यों तथा बातों के बारे में यह समझा जाएगा कि उन्हें समिति द्वारा या उसके साथ या उसके लिए इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन बनाया गया है, उपगत किया गया है अथवा उनका वचनबंध किया गया है;
(ग) सभी जंगम तथा स्थावर गुरुद्वारा सम्पत्ति और किसी भी स्वरूप तथा किस्म के सभी हित जो, ऐसी स्थापना के ठीक पूर्व दिल्ली सिख गुरुद्वारा बोर्ड में निहित हों, उसके हों या उसे देय हों, किसी भी प्रकार के ऐसे सभी अधिकारों, शक्तियों तथा विशेषाधिकारों सहित, जो बोर्ड द्वारा उपयोग या उपभोग में लाए जाते रहे हों या उसके हों, समिति में निहित हो जाएंगे;
(घ) ऐसी स्थापना के ठीक पूर्व बोर्ड को देय समिति को देय सभी धनराशियां जिनके अन्तर्गत भाटक भी हैं, समझी जाएंगी;
(ङ) वे सभी वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां जो दिल्ली सिख गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित की गई हों या संस्थित की जा सकती थीं, समिति द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी या संस्थित की जा सकेंगी;
(च) किसी ऐसे विल, विलेख, या अन्य लिखत का, जिसमें बोर्ड के पक्ष में कोई वसीयत, दान या न्यास अन्तर्विष्ट हो, ऐसी स्थापना से ही ऐसे अर्थ लगाया जाएगा मानो उसमें उक्त बोर्ड के स्थान पर समिति को नामित किया गया हो ।
अनुसूची
[धारा 15 (3) देखिए]
शपथ का प्ररूप
मैं, क०ख० दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्ध समिति का सदस्य निर्वाचित (या सहयोजित) होने पर श्री गुरुग्रन्थ साहिब के समक्ष शपथ लेता हूं कि जिस कर्तव्य को मैं ग्रहण करने वाला हूं उसका निर्वहन मैं निष्ठापूर्वक, ईमानदारी से और शुद्ध अन्तःकरण से, सिख धर्म के अधिकतम हित के लिए करूंगा ।
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