जूट कंपनी (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1980
(1980 का अधिनियम संख्यांक 62)
[21 दिसम्बर, 1980]
जूट से बनी वस्तुओं का, जो देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं,
विनिर्माण, उत्पादन और वितरण जारी रखना सुनिश्चित करके जनसाधारण के
हितसाधन के लिए जूट कंपनियों के उपक्रमों का उचित प्रबंध सुनिश्चित
करने की दृष्टि से पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट जूट कंपनियों के
उपक्रमों के अर्जन और अन्तरण का तथा उनसे संबंधित
या उनके आनुषंगिक विषयों का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
उक्त जूट कम्पनियां उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में उल्लिखित वस्तुओं का, अर्थात् जूट से पूर्णतः या भागतः बने टेक्सटाइल का विनिर्माण और उत्पादन करती थीं;
और उक्त जूट कम्पनियों में से प्रत्येक के उपक्रमों का प्रबंध केन्द्रीय सरकार ने उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) के उपबंधों के अधीन ग्रहण कर लिया था;
और उक्त जूट कंपनियों के उपक्रमों का अर्जन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि उक्त जूट कंपनियों के उपक्रम, पूर्वोक्त, वस्तुओं का, जो देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं, विनिर्माण, उत्पादन और वितरण जारी रख कर जनसाधारण का हितसाधन करते रहें;
भारत गणराvय के इकतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जूट कंपनी (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1980 है ।
2. पारिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख अभिप्रेत है;
(ख) आयुक्त" से धारा 14 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है;
(ग) जूट कंपनियां" से पहले अनुसूची में विनिर्दिष्ट कम्पनियां (जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित कंपनियां हैं) अभिप्रेत हैं;
(घ) जूटविनिर्मिति निगम" से नेशलन जूट मैनुफेक्चरर्स कारपोरेशन लिमिटेड अभिप्रेत है, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन निगमित और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है;
(ङ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(छ) इस अधिनियम के किसी उपबंध के संबंध में विर्निर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जिसे केंद्रीय सरकार उस उपबंध के प्रयोजनों के लिए अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी;
(ज) उन शब्दों और पदों के, जो इस में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किन्तु कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे, जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
जूट कंपनियों के उपक्रमों का अर्जन और अंतरण
3. जूट कंपनियों के उपक्रमों का केंद्रीय सरकार को अंतरण और उनका उसमें निहित होना-नियत दिन को प्रत्येक जूट कंपनी के उपक्रम और अपने उपक्रमों के संबंध में प्रत्येक जूट कंपनी के अधिकार, हक और हित इस अधिनियम के आधार पर केंद्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
।[भारत का राजपत्र,1980, असाधरण, भाग 2, खण्ड 3, उपखण्ड (i) की अधिसूचना सं० सा० का० नि० 711(अ) के अधीन केन्द्रीय सरकार के निदेशानुसार उक्त अधिनियम की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट जूट कम्पनियों के उपक्रमों और उक्त कम्पनियों के उनके उपक्रमों के संबंध में उनके अधिकार, हक और हित, जो उक्त अधिनियम की धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, केन्द्रीय सरकार में निहित बने रहने की बजाय, 21 दिसम्बर, 1980 से नेशनल जूट मैनुफेक्चरर्स कारपोरेशन लिमिटेड, में निहित हो जाएंगे ।ट
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) प्रत्येक जूट कंपनी के उपक्रमों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार और सभी स्थावर तथा जंगम सम्पत्ति जिसके अन्तर्गत भूमि, भवन, कर्मशालाएं, स्टोर, उपकरण, मशीनरी और उपस्कर, रोकड़-बाकी, हाथ की रोकड़, आरक्षित निधि, विनिधान, बही ऋण और ऐसी सम्पत्ति में या उससे उत्पन्न होने वाले सभी अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व जूट कंपनियों के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, चाहे भारत में या भारत के बाहर, थे और तत्संबंधी सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य सभी दस्तावेज हैं चाहे वे किसी भी प्रकार की हों और यह समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व भी हैं ।
(2) यथा पूर्वोक्त सभी सम्पत्तियां, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई हैं ऐसे निहित होने के आधार पर किसी भी न्यास, बाध्यता, बन्धक, भार, धारणाधिकार और उन्हें प्रभावित करने वाले सभी अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगी और किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी की कोई कुर्की, व्यादेश, डिक्री या आदेश को, जो ऐसी सम्पत्तियों के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करे या ऐसी संपूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग के संबंध में किसी रिसीवर को नियुक्त करे, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(3) किसी ऐसी सम्पत्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, प्रत्येक बन्धकदार और किसी ऐसी संपत्ति में या उनके सम्बन्ध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे समय के अन्दर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित की सूचना आयुक्त को देगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति का बंधकदार या ऐसी किसी सम्पत्ति में या उसके सम्बन्ध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति संबंधित जूट कम्पनियों की धारा 7 और धारा 8 के अधीन दिए जाने के लिए निर्दिष्ट रकमों में से बन्धक धन या अन्य शोध्य रकमों के पूर्णतः या भागतः संदाय के लिए अपने अधिकारों और हितों के अनुसार दावा करने का हकदार होगा किन्तु ऐसा कोई बन्धक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी सम्पत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है ।
(5) ऐसे किसी उपक्रम के संबंध में जो नियत दिन के ठीक पूर्व किसी भी समय धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, जूट कम्पनियों को प्रदत्त और नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त कोई अनुvञप्ति या अन्य लिखत, ऐसे उपक्रम के संबंध में और उसके प्रयोजनों के लिए ऐसे दिन को और उसके पश्चात् अपने प्रकट शब्दानुसार प्रवृत्त बनी रहेगी, तथा धारा 6 के अधीन ऐसे उपक्रम के जूट विनिर्मिति निगम में निहित होने की तारीख से ही वह निगम या ऐसी अनुvञप्ति या अन्य लिखत में प्रतिस्थापित हो गया समझा जाएगा मानो ऐसी अनुvञप्ति या अन्य लिखत ऐसे निगम को प्रदत्त की गई हो और ऐसा निगम उसे उस शेष अवधि के लिए धारण करेगा जिसके लिए उसे जूट कंपनी उसके निबन्धनों के अनुसार धारण करता ।
(6) यदि नियत दिन को किसी जूट कंपनी के उपक्रमों के संबंध में जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में उस कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित कोई वाद या की गई कोई अपील या अन्य कार्यवाही, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो, लम्बित है तो ऐसी जूट कंपनी के उपक्रमों के अन्तरण या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध, या जहां ऐसी जूट कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन जूट विनिर्मिति निगम में निहित किए जाने के लिए निदेश दिया गया है, वहां उस निगम द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी और प्रवर्तित की जा सकेगी ।
5. कुछ पूर्व दायित्वों के लिए जूट कंपनियों का दायी होना-(1) नियत दिन के पूर्व किसी अवधि के संबंध में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व से भिन्न जूट कम्पनियों का दायित्व, उस कम्पनी का दायित्व होगा और उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा, न कि केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां जूट कंपनियों के उपक्रम जूट विनिर्मिति निगम में निहित हैं, वहां उस निगम के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
(2) ऐसे किसी उधार के संबंध में उत्पन्न होने वाला दायित्व जो किसी जूट कम्पनी के उपक्रमों का प्रबंध केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण कर लिए जाने के पश्चात्, उक्त कम्पनी को केन्द्रीय सरकार या किसी राvय सरकार या दोनों द्वारा दिया गया है (उस पर शोध्य ब्याज सहित), नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार का दायित्व हो जाएगा और जब और जैसे ही ऐसे प्रदाय के लिए प्रतिसंदाय शोध्य और संदेय हो जाए, तब और वैसे ही वह सरकार या जूट विनिर्मिति निगम उस दायित्व का उन्मोचन करेगा ।
(3) शंकाओं को दूर करने के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि,-
(क) इस अधिनियम में, अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत जूट कंपनी का कोई दायित्व, जो उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दायित्व से भिन्न है, केन्द्रीय सरकार या जहां उक्त कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन जूट विनिर्मिति निगम में निहित किए जाने के लिए निदेश किया गया है, वहां उस निगम के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ;
(ख) किसी जूट कंपनी के उपक्रमों के संबंध में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण का कोई अधिनिर्णय, डिक्री या आदेश, जो नियत दिन के पूर्व उत्पन्न किसी मामले, दावे या विवाद के बारे में, जो उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी दायित्व के संबंध में कोई मामला, दावा या विवाद नहीं है, नियत दिन के पश्चात् पारित किया गया है, केन्द्रीय सरकार या जहां ऐसी कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन जूट विनिर्मिति निगम में निहित किए जाने के लिए निदेश दिया गया है,वहां उस निगम के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
(ग) उस समय प्रवृत्त किसी विधि के किसी उपबंध के, नियत दिन के पूर्व किए गए उल्लंघन के लिए किसी जूट कंपनी का कोई दायित्व, केन्द्रीय सरकार या जहां ऐसी कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन जूट विनिर्मिति निगम में निहित किए जाने के लिए निदेश दिया जाता है, वहां उस निगम के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
6. जूट कंपनियों के उपक्रमों को जूट विनिर्मिति निगम में निहित करने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, अधिसूचना द्वारा, निदेश देगी कि प्रत्येक जूट कंपनी के उपक्रम और अपने-अपने ऐसे उपक्रमों के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन उस सरकार में निहित हो गए हैं, उनके अधिकार, हक और हित, और प्रत्येक जूट कंपनी के ऐसे दायित्व जो धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट हैं, केन्द्रीय सरकार में निहित रहने के बजाय या तो अधिसूचना की तारीख को या उससे पहले या बाद की ऐसी तारीख को (जो नियत दिन से पूर्व की तारीख न हो) जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां जूट कंपनियों के अपने उपक्रमों के संबंध में उनके अधिकार, हक और हित, तथा धारा 5 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट उनके दायित्व उपधारा (1) के अधीन जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो जाते हैं, वहां वह निगम ऐसे निहित होने की तारीख से ऐसे उपक्रमों के संबंध में स्वामी समझा जाएगा और ऐसे उपक्रमों के संबंध में केन्द्रीय सरकार के सभी अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही जूट विनिर्मिति निगम के क्रमशः अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
अध्याय 3
रकमों का संदाय
7. रकम का संदाय-प्रत्येक जूट कंपनी के उपक्रमों और ऐसे उपक्रमों के संबंध में उस कंपनी के अधिकार, हक और हित, धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित होने के लिए, केन्द्रीय सरकार प्रत्येक जूट कंपनी को नकद और अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट रीति से उतनी रकम देगी जो पहली अनुसूची में ऐसी कंपनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट है ।
8. अतिरिक्त रकम का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, प्रत्येक जूट कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध से उनको वंचित किए जाने के लिए प्रत्येक जूट कंपनी को उस तारीख से प्रारम्भ होकर, जिसको उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) के उपबन्धों के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेश के अनुसरण में, उस कम्पनी के उपक्रमों का प्रबंध ग्रहण किया गया था, नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, प्रतिवर्ष दस हजार रुपए की रकम देगी ।
(2) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रत्येक रकम और उपधारा (1) के उपबन्धों के अनुसार संगणित रकम पर, चार प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज नियत दिन से प्रारम्भ होने वाली और उस तारीख को जिसको ऐसी रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए किया जाएगा ।
(3) किसी जूट कंपनी के संबंध में, उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबधों के अनुसार अवधारित रकम केन्द्रीय सरकार द्वारा जूट कंपनी को उस रकम के अतिरिक्त दी जाएगी, जो पहली अनुसूची में उस कंपनी के सामने विनिर्दिष्ट है ।
अध्याय 4
जूट कंपनियों के उपक्रमों का प्रबन्ध आदि
9. जूट कंपनियों के उपक्रमों का प्रबन्ध आदि-जूट कंपनियों में से प्रत्येक के स्वामित्वाधीन उन उपक्रमों के, जिनके संबंध में अधिकार, हक और हित, धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियंत्रण और प्रबंध, जहां केन्द्रीय सरकार ने धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया है वहां, जूट विनिर्मिति निगम में निहित होगा और तब जूट विनिर्मिति निगम, अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करते हुए ऐसे प्रत्येक उपक्रम के सम्बन्ध में ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग करने और ऐसे सभी कार्य करने का हकदार होगा जिन्हें नियत दिन से ठीक पूर्व वह जूट कंपनी प्रयोग करने और करने के लिए प्राधिकृत थी जिसका उस पर स्वामित्व था ।
10. उपक्रमों के प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्तियों का सभी आस्तियों आदि को परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) जूट कंपनियों के उपक्रमों का प्रबन्ध, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार में या जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो जाने पर, ऐसे निहित होने के ठीक पहले ऐसे उपक्रमों के प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्ति, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम को ऐसे उपक्रमों से संबंधित वे सभी आस्तियां, लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य सभी दस्तावेजें जो उनकी अभिरक्षा में हैं, परिदत्त करने के लिए आबद्ध होंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार जूट विनिर्मिति निगम को ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह मामले की परिस्थितियों में वांछनीय समझे और उक्त निगम भी, यदि ऐसा करना आवश्यक समझा जाए, तो केन्द्रीय सरकार को किसी भी समय उस रीति के बारे में जिससे जूट कंपनियों के उपक्रमों का प्रबन्ध संचालित किया जाएगा या ऐसे प्रबन्ध के दौरान उत्पन्न होने वाले किसी अन्य विषय के बारे में अनुदेश देने के लिए आवेदन कर सकेगा ।
11. व्यक्तियों का उन व्यक्तियों आदि का लेखा-जोखा देने का कर्तव्य जो उसके कब्जे में हैं-(1) ऐसा व्यक्ति, जिसके कब्जे या नियंत्रण में, नियत दिन को, किसी जूट कंपनी के स्वामित्वाधीन उपक्रम से संबंधित कोई आस्तियां, बहियां, दस्तावेजें या अन्य कागज-पत्र हैं, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो गए हैं, उक्त आस्तियों, बहियों, दस्तावेजों और अन्य कागज-पत्रों का लेखा-जोखा केन्द्रीय सरकार को या जूट विनिर्मिति निगम को देने के लिए दायी होगा और वह उनका परिदान केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम को या ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को करेगा जिसे या जिन्हें केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
(2) केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम उन जूट कंपनियों के उपक्रमों का, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में या जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो गए हैं कब्जा लेने के लिए सब आवश्यक कदम उठा सकेगी या उठा सकेगा अथवा उठवा सकेगी या उठवा सकेगा ।
(3) प्रत्येक जूट कंपनी, केन्द्रीय सरकार को अपनी उन सभी सम्पत्तियों और आस्तियों की जो नियत दिन को उसके उन उपक्रमों की हैं जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, पूर्ण सूची ऐसी अवधि के भीतर देगी जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुvञात करे और इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम उस कंपनी को सभी युक्तियुक्त सुविधाएं देगी या देगा ।
अध्याय 5
जूट कंपनियों के कर्मचारियों के बारे में उपबन्ध
12. कर्मचारियों का बना रहना-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन से ठीक पूर्व जूट कंपनियों के किसी उपक्रम में नियोजित रहा है,-
(क) नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हो जाएगा, और
(ख) जहां जूट कंपनियों के उपक्रम जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो गए हैं, वहां ऐसे निहित होने की तारीख से ही उक्त निगम का कर्मचारी होगा,
और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम के अधीन पेंशन उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकार और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा जो उसे उस दशा में अनुvञय होते जब ऐसा निधान न हुआ होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक कि उसके पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तों में, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तन नहीं कर दिया जाता ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जूट कंपनियों के किसी उपक्रम में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम को अन्तरण, ऐसे अधिकार या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
13. भविष्य निधि तथा अन्य निधियां-(1) जहां किसी जूट कंपनी ने अपने स्वामित्वाधीन उपक्रमों में से किसी में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या अन्य निधि स्थापित की है, वहां ऐसे कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन केन्द्रीय सरकार को या जूट विनिर्मिति निगम को अन्तरित हो गई हैं, संबंधित धनराशियां, ऐसी भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि, अन्य निधि में नियत दिन को जमा धनराशियों में से, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगी ।
(2) उन धनराशियों के संबंध में जो उपधारा (1) के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम को अन्तरित हो गई हैं, उस सरकार या निगम द्वारा ऐसी रीति से कार्यवाही की जाएगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 6
संदाय आयुक्त
14. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) धारा 7 और धारा 8 के अधीन जूट कंपनियों को संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा, संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, ऐसे अन्य व्यक्तियों को आयुक्त की सहायता के लिए नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे और तब आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से एक या अधिक को इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) कोई व्यक्ति, जिसे आयुक्त ने अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उसका वही प्रभाव होगा मानो वे उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई हैं, और प्राधिकार दिए जाने के रूप में प्राप्त नहीं हुई हैं ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
15. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर, प्रत्येक जूट कंपनी को संदाय करने के लिए आयुक्त को-
(क) उतनी रकम नकद देगी जो पहली अनुसूची में ऐसी कंपनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट रकम के बराबर है;
(ख) उतनी अतिरिक्त रकम देगी जो धारा 8 के अधीन उस कंपनी को संदेय रकम के बराबर है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, भारत के लोक लेखा में आयुक्त के नाम से एक निक्षेप खाता खोलेगी और इस अधिनियम के अधीन आयुक्त को दी गई प्रत्येक रकम उसके द्वारा उक्त निक्षेप खाते में जमा कराई जाएगी और आयुक्त उक्त निक्षेप खाते की चलाएगा ।
(3) आयुक्त प्रत्येक जूट कंपनी की बाबत जिसके बारे में इस अधिनियम के अधीन उसे कोई संदाय किया गया है, पृथक् अभिलेख रखेगा ।
(4) किसी जूट कंपनी के संबंध में उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकम पर प्रोद्भूत ब्याज ऐसी जूट कंपनी के फायदे के लिए काम आएगा ।
16. केन्द्रीय सरकार या जूट विर्निमिति निगम की कुछ शक्तियां-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम ऐसे धन को, जो किसी जूट कंपनी को उसके उन उपक्रमों के संबंध में, जो केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति में निहित हो गए हैं, शोध्य है और जो नियत दिन के पश्चात् वसूल किया गया है, अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करके, विनिर्दिष्ट तारीख तक प्राप्त करने की हकदार इस बात के होते हुए भी होगी या का हकदार होगा कि ऐसी वसूली नियत दिन के पूर्व की अवधि से संबंध रखती है ।
(2) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम आयुक्त के समक्ष ऐसे प्रत्येक संदाय के संबंध में दावा कर सकेगी या कर सकेगा जो उस सरकार या निगम ने नियत दिन के पश्चात् किसी जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन उपक्रमों में से किसी के संबंध में उसके नियत दिन से पूर्व की किसी अवधि की बाबत दायित्व का, जो धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट दायित्व नहीं है, उन्मोचन करने के लिए किया है, और ऐसे प्रत्येक दावे को उन पूर्विकताओं के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी जो उस विषय को इस अधिनियम के अधीन प्राप्त है जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार या जूट विर्निमिति निगम ने दायित्व का उन्मोचन किया है ।
(3) इस अधिनियम में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, नियत दिन से पूर्व के किसी संव्यवहार की बाबत जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन उपक्रमों के संबंध से उसके दायित्व, जिनका विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व उन्मोचन नहीं किया गया है, उस कंपनी के दायित्व होंगे ।
17. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जिसका किसी जूट कम्पनी के विरुद्ध दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय की बाबत कोई दावा है, जो उस कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम से सम्बद्ध है, ऐसा दावा विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर, आयुक्त के समक्ष करेगा :
परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से तीन दिन की उक्त अवधि के भीतर दावा करने से निवारित रहा था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकेगा, किन्तु इसके पश्चात् नहीं ।
18. दावों की पूर्विकता-(1) धारा 17 के अधीन किए गए दावों को निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी, अर्थात् :-
(क) प्रवर्ग (i) को अन्य सभी प्रवर्गों पर अग्रता दी जाएगी और प्रवर्ग (ii) को प्रवर्ग (iii) पर अग्रता दी जाएगी, और इसी प्रकार आगे भी;
(ख) प्रत्येक प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावे एक समान होंगे और उनका पूर्ण संदाय किया जाएगा, किन्तु यदि इस अधिनियम के अधीन आयुक्त को संदत्त रकम ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए अपर्याप्त है तो वे समान अनुपातों में कम कर दिए जाएंगे और तद्नुसार उनका संदाय किया जाएगा;
(ग) किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट विषय की बाबत दायित्व को चुकाने का प्रश्न केवल तभी उठेगा जब उसके ठीक उच्चतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट सभी दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अधिशेष रह जाएगा ।
19. दावों की परीक्षा-(1) धारा 17 के अधीन दावे प्राप्त होने पर आयुक्त दावों को दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकता के अनुसार क्रमबद्ध करेगा और उस क्रम के अनुसार उनकी परीक्षा करेगा ।
(2) यदि किसी जूट कंपनी के दावों की परीक्षा करने पर आयुक्त की यह राय है कि ऐसी कम्पनी को संदाय करने के लिए इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह ऐसे निम्नतर प्रवर्ग की बाबत किसी दावे की परीक्षा करे ।
20. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) दूसरी अनुसूची में उपवर्णित पूर्विकताओं के प्रति निर्देश से किसी जूट कंपनी के विरुद्ध दावों की परीक्षा करने के पश्चात्, आयुक्त ऐसी कोई तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पूर्व प्रत्येक दावेदार कंपनी के विरुद्ध अपने दावे का सबूत फाइल करेगा ।
(2) इस प्रकार नियत तारीख के बारे में कम से कम 14 दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचार पत्र के एक अंक में जो देश के अधिकांश भाग में पढ़ा जाता है और ऐसी प्रादेशिक भाषा के दैनिक समाचार पत्र के एक अंक में, जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विvञापन द्वारा दी जाएगी, और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत आयुक्त के समक्ष ऐसे विvञापन में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर फाइल करे ।
(3) ऐसे प्रत्येक दावेदार को, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट अवधि के अन्दर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहेगा, आयुक्त द्वारा किए गए संवितरणों से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त, ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात् जो उसकी राय में आवश्यक है और संबंधित जूट कंपनी को दावे का खण्डन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदार को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा ।
(5) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान भी हैं, जहां वह अपनी बैठकें कर सकेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा कराना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य भौतिक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य है, प्रकटीकरण या पेश किया जाना;
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष अन्वेषण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार जो आयुक्त के विनिश्चय से असंतुष्ट है, ऐसे विनिश्चय के विरुद्ध अपील उस उच्च न्यायालय में कर सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर संबंधित जूट कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है :
परन्तु जहां किसी ऐसे व्यक्ति को जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है, आयुक्त नियुक्त किया जाता है, वहां ऐसी अपील उस उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा सुनी और निपटाई जाएगी ।
21. आयुक्त द्वारा धन का संवितरण-इस अधिनियम के अधीन किसी जूट कंपनी के विरुद्ध दावे को स्वीकार करने के पश्चात् ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त द्वारा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त की जाएगी जिसे या जिन्हें ऐसी धनराशि शोध्य है और ऐसा संदाय किए जाने पर ऐसे दावे की बाबत जूट कंपनी के दायित्व का उन्मोचन हो जाएगा ।
22. जूट कंपनियों को रकमों का संवितरण-(1) यदि जूट कंपनियों के संबंध में आयुक्त को संदत्त धन में से दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अतिशेष रह जाता है तो आयुक्त उस अतिशेष का संवितरण ऐसी जूट कंपनी को करेगा ।
(2) जहां किसी जूट कंपनी के कब्जे में की किसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति का कब्जा इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम में निहित हो गया है, किन्तु ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति ऐसी जूट कंपनी की नहीं है, वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति को ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर कब्जे में रखे रहे जिनके अधीन वे नियत दिन से ठीक पूर्व ऐसी जूट कंपनी के कब्जे में थीं ।
23. असंवितरित या अदावाकृत रकमों को साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना-यदि आयुक्त को संदत्त कोई धन, उस तारीख से, जिसको आयुक्त का पद अंतिम रूप से परिसमाप्त किया जाता है, ठीक पूर्ववर्ती तारीख को असंवितरित या दावा न किया गया रहता है तो आयुक्त उसे अपने पद के अंतिम रूप से परिसमापन के पूर्व केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अन्तरित करेगा, किन्तु इस प्रकार अन्तरित धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकेगा और उस संबंध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अन्तरण नहीं किया गया था और दावे के संदाय के लिए आदेश, यदि कोई हो, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश समझा जाएगा ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
24. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
25. दायित्व का ग्रहण किया जाना-(1) जहां दूसरी अनुसूची के भाग 1 में विनिर्दिष्ट किसी प्रवर्ग की किसी मद से उत्पन्न किसी जूट कंपनी के किसी दायित्व का पूर्ण रूप से उन्मोचन इस अधिनियम के अधीन आयुक्त द्वारा उसे संदत्त रकम में से नहीं किया गया है वहां आयुक्त केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में दायित्व की उस मात्रा को सूचित करेगा जो अनुन्मोचित रह गई है और उस दायित्व को केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण किया जाएगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, जूट विनिर्मिति निगम को आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि वह उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा धारण किए गए दायित्व को ग्रहण करे और ऐसे निर्देश की प्राप्ति पर जूट विनिर्मिति निगम का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे दायित्व का उन्मोचन करे ।
26. जब तक कि आनुकल्पिक व्यवस्था नहीं कर दी जाती है प्रबंध का कुछ व्यक्तियों में निहित बने रहना-इस अधिनियम के अधीन किसी जूट कंपनी के उपक्रमों का केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम में निहित होते हुए भी-
(क) कोई व्यक्ति जो ऐसे उपक्रमों के कार्यकलाप का प्रबंध, उस तारीख के पूर्व जिसको उपक्रम इस प्रकार निहित हुए थे, कर रहा था जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम द्वारा ऐसे उपक्रमों के प्रबंध के लिए आनुकल्पिक व्यवस्था नहीं कर दी जाती है, उपक्रमों के कार्यकलाप के प्रबंध को जरी रखेगा मानो ऐसा व्यक्ति, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम द्वारा ऐसे उपक्रमों के प्रबन्ध के लिए प्राधिकृत किया गया है;
(ख) ऐसा व्यक्ति, जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम द्वारा कोई आनुकल्पिक व्यवस्था नहीं कर दी जाती है तब तक वह ऐसी जूट कंपनी के उपक्रमों के संबंध में ऐसे उपक्रमों के किसी भी बैंक के किसी खाते का संचालन करने के लिए प्राधिकृत बना रहेगा मानो कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम द्वारा ऐसे खाते का संचालन करने के लिए वह प्राधिकृत है ।
27. केंद्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम द्वारा अनुसमर्थन के अभाव में संविदाओं का प्रभावहीन हो जाना-किसी सेवा, विक्रय या प्रदाय के लिए किसी जूट कंपनी द्वारा अपने स्वामित्व के अधीन के किसी उपक्रम के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केंद्रीय सरकार में निहित हो गया है, की गई प्रत्येक संविदा, जो नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, नियत दिन से एक सौ अस्सी दिन की समाप्ति से ही प्रभावहीन हो जाएगा, जब तक कि ऐसी संविदा का उस अवधि की समाप्ति के पूर्व, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम, जिनमें ऐसा उपक्रम इस अधिनियम के अधीन निहित हुआ है, लिखित रूप में अनुसमर्थन नहीं कर दिया है और केन्द्रीय सरकार या ऐसा जूट विनिर्मिति निगम ऐसी संविदा का अनुसमर्थन करने के लिए उसमें ऐसे परिवर्तन या उपान्तर कर सकेगी/सकेगा जो वह ठीक समझे :
परन्तु, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसा जूट विनिर्मिति निगम संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और संविदा में कोई परिवर्तन या उपान्तर तब तक नहीं करेगी/करेगा जब तक कि :-
(क) उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है दुर्भाव से की गई है या केन्द्रीय सरकार या ऐसे जूट विनिर्मिति निगम के लिए अहितकर है, और
(ख) संविदा के पक्षकारों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया जाता है और संविदा का अनुसमर्थन करने से इंकार करने या उसमें कोई परिवर्तन या उपान्तर करने के कारणों को लेखबद्ध नहीं कर दिया गया है ।
28. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति-
(क) किसी जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन के उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम से सदोष विधारित करेगा; या
(ख) किसी जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन के उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसे सदोष प्रतिधारित करेगा; या
(ग) किसी जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन के उपक्रम से संबंधित, यथास्थिति, किसी दस्तावेज या तालिका को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम को, या उस सरकार या निगम द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने से जानबूझकर विधारित करेगा या उसे देने में असफल रहेगा; या
(घ) किसी जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन के उपक्रमों से संबंधित किन्हीं आस्तियों, लेखा-बहियों या रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, केन्द्रीय सरकार या जूट विनिर्मिति निगम या उस सरकार या ऐसे निगम द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने में असफल रहेगा; या
(ङ) किसी जूट कंपनी के स्वामित्व के अधीन के किसी उपक्रम की भागरूप किसी संपत्ति को सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा अथवा इस अधिनियम के अधीन ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या या बिल्कुल गलत है,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
29. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित होता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति और मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है ।
30. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केंद्रीय सरकार के या उस सरकार के या जूट विनिर्मिति निगम के किसी अधिकारी के या उस सरकार या निगम द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार या उसके किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के या जूट विनिर्मिति निगम के या उस निगम द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
31. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस धारा और धारा 32 तथा धारा 33 द्वारा प्रदत्त शक्तियों से भिन्न इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन शक्ति का कोई प्रत्यायोजन किया जाता है तब वह व्यक्ति, जिसको ऐसी शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है, केंद्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा ।
32. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह समय जिसके अन्दर और वह रीति जिससे धारा 4 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोई सूचना दी जाएगी;
(ख) वह रीति जिससे धारा 13 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी भविष्य निधि या अन्य निधि के धन का उपयोग किया जाएगा;
(ग) कोई अन्य विषय जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
33. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी :
परन्तु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
पहली अनुसूची
[धारा 2 (ग), धारा 7, धारा 8, धारा 15 (1) (क) देखिए]
|
क्रम संख्यांक |
जूट कंपनी का नाम |
रकम (लाख रुपयों में) |
|
1. |
एलेक्जेन्डर जूट मिल्स लिमिटेड, चार्टर्ड बैंक बिल्डिंग, 4, नेताजी सुभाष रोड, कलकत्ता-700001 |
353.60 |
|
2. |
यूनियन जूट कंपनी लिमिटेड, चार्टर्ड बैंक बिल्डिंग, 4, नेताजी सुभाष, रोड, कलकत्ता-700001 |
461.32 |
|
3. |
खरदाह कंपनी लिमिटेड, 7 रेड क्रास प्लेस, कलकत्ता-700001 |
486.68 |
|
4. |
किनिसन जूट मिल्स कंपनी लिमिटेड, चार्टर्ड बैंक बिल्डिंग 4, नेताजी सुभाष रोड, कलकत्ता-700001 |
644.70 |
|
5. |
आर० बी० एच० एम० जूट मिल्स प्राइवेट लिमिटेड, पी० ओ० कटिहार मिल्स, कटिहार (बिहार) |
17.04 |
|
योग : |
1963.34 |
दूसरी अनुसूची
[धारा 17, धारा 19(1), धारा 20(1), धारा 22(1) और धारा 25(1) देखिए]
पूर्विकता क्रम
भाग 1
प्रवर्ग (i)
वेतन, मजदूरियां, भविष्य निधि, कर्मचारी राvय बीमा के अभिदाय या भारत के जीवन बीमा निगम से संबंधित प्रीमियम के असंदत्त रहने के कारण कर्मचारियों को शोध्य रकम और कोई अन्य रकम जो कर्मचारियों को शोध्य हो चाहे वह केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी जूट कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व या पश्चात् कि किसी अवधि की हो ।
प्रवर्ग (ii)
जूट कंपनी द्वारा राष्ट्रीयकृत बैंक और लोक वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त प्रतिभूत उधार चाहे वे केंद्रीय द्वारा जूट कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व या पश्चात् की किसी अवधि के दौरान के हो ।
प्रवर्ग (iii)
किसी व्यापार या विनिर्माण प्रयोजन के लिए प्रबंध-ग्रहण के पश्चात् की अवधि के दौरान उपलब्ध कोई ऋण ।
भाग 2
प्रवर्ग (iv)
केन्द्रीय सरकार, राvय सरकार और स्थानीय प्राधिकरण या राvय विद्युत बोर्ड को राजस्व, कर, उपकर, रेट या कोई अन्य शोध्य रकम चाहे वे केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी जूट कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व या पश्चात् की किसी अवधि के दौरान की हों ।
प्रवर्ग v
किसी व्यापार या विनिर्माण प्रयोजन के लिए प्रबन्ध-ग्रहण के पूर्व की अवधि के दौरान उपलब्ध कोई ऋण ।
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