मेटल कारपोरेशन (राष्ट्रीयकरण तथा प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1976
(1976 का अधिनियम संख्यांक 100)
[7 सितम्बर, 1976]
राजस्थान राज्य के ज्वार क्षेत्र में और उसके आस-पास जस्त और सीसे के भंडारों का
लोकहित में, यथासंभवपूर्ण तथा समुपयोजन करने तथा उन खनिजों का ऐसी
रीति से उपयोग करने के लिए जिससे सामूहिक हित साधन हो, केन्द्रीय
सरकार को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए मेटल कारपोरेशन
के उपक्रम का प्रबन्ध, ऐसे उपक्रम का उक्त कारपोरेशन
को पुनःअंतरित और उसमें पुनः निहित हुए समझे
जाने के पश्चात्, ग्रहण करने का और मेटल
कारपोरेशन के उपक्रम के पश्चात्वर्ती
अर्जन का और उससे संबंधित या
उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सत्ताइसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मेटल कारपोरेशन (राष्ट्रीयकरण तथा प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1976 है ।
(2) इस अधिनियम की धारा 20 और धारा 21 तुरन्त प्रवृत्त होंगी और शेष उपबन्ध 22 अक्तूबर, 1965 को प्रवृत्त हुए समझे जाएंगे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से 2 अगस्त, 1976 अभिप्रेत है ;
(ख) इस अधिनियम का प्रारंभ" से 22 अक्तूबर, 1965 अभिप्रेत है ;
(ग) मेटल कारपोरेशन" से मेटल कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड अभिप्रेत है, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ में एक कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय कलकत्ता में है ;
(घ) खनिज रियायत नियम" से केन्द्रीय सरकार द्वारा खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का 67) के अधीन बनाया गया तत्समय प्रवृत्त खनिज रियायत नियम अभिप्रेत है ;
(ङ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(छ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ हैं जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
3. उपक्रम" का अर्थ-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मेटल कारपोरेशन के उपक्रम की बाबत यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां (जिनके अन्तर्गत खनन पट्टे, यदि कोई हों, भी हैं) शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी जंगम और स्थावर सम्पत्ति, जिसके अन्तर्गत भूमि, भवन, संकर्म, खानें, कर्मशालाएं, परियोजनाएं, प्रगालक, परिष्करणी, भण्डार, उपकरण, मशीनरी, लोकोमोटिव, मोटर गाड़ी और अन्य यान, खान से निकाला गया या निष्कर्षित जस्त या सीसा अयस्क, सान्द्र और धातुएं, चाहे वे प्रसंस्करण में या स्टाक में या अभिवहन में हों, रोकड़ बाकी, हाथ की रोकड़, आरक्षित निधि, विनिधान और बही-ऋण तथा ऐसी सम्पत्ति से उद्भूत होने वाले अन्य सभी अधिकार और हित हैं, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व उपक्रम के संबंध में मेटल कारपोरेशन के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, चाहे भारत में या भारत के बाहर, थे तथा तत्संबंधी सभी लेखाबहियां, रजिस्टर, मानचित्र, रेखांक, खण्ड चित्र, रेखाचित्र, सर्वेक्षण, अभिलेख और अन्य सभी प्रकार की दस्तावेजें हैं और यह भी समझा जाएगा कि उपक्रम के संबंध में मेटल कारपोरेशन के सब उधार, दायित्व और बाध्यताएं, इसके अन्तर्गत हैं ।
अध्याय 2
मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का प्रबन्ध ग्रहण
4. मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का प्रबन्ध ग्रहण-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, मेटल कारपोरेशन आफ इंडिया (उपक्रम का अर्जन) अधिनियम, 1966 (1966 का 36) निरसित हो जाएगा और ऐसे निरसित होने पर, मेटल कारपोरेशन का वह उपक्रम, जो इस प्रकार निरसित अधिनियम की धारा 3 के उपबंधों के आधार पर केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो गया था और मेटल कारपोरेशन का उपक्रम उस अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट उसकी सभी संपत्तियों, आस्तियों, दायित्वों और बाध्यताओं और ऐसी अन्य संपत्तियों, आस्तियों और बाध्यताओं सहित, जो 22 अक्तूबर, 1965 के पश्चात् उस उपक्रम के प्रयोजनों के लिए अर्जित या उपगत की गई थीं और जो उक्त अधिनियम की धारा 12 के उपबन्धों के अनुसरण में बनाई गई सरकारी कंपनी को उक्त अधिनियम की धारा 12 के उपबन्धों के आधार पर अंतरित और उसमें निहित हो गई थीं, इस अधिनियम के उपबंधों के आधार पर मेटल कारपोरेशन को पुनः अंतरित और उसमें पुनर्निहित हो गई समझी जाएंगी और ठीक उसके पश्चात् मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का प्रबंध केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो गया समझा जाएगा ।
(2) कोई संविदा, चाहे अभिव्यक्त हो या विवक्षित या अन्य ठहराव, जहां तक उसका संबंध मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के कारबार और कार्यकलाप के प्रबन्ध से है और जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, ऐसे प्रारम्भ पर समाप्त हो गया समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व मेटल कारपोरेशन के प्रबंध के भारसाधक सभी व्यक्तियों के बारे में, जिनके अन्तर्गत निदेशकों या प्रबन्धकों के रूप में या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 197क में विनिर्दिष्ट किसी अन्य प्रबन्धकीय हैसियत में पद धारण करने वाले व्यक्ति भी हैं, यह समझा जाएगा कि उन्होंने ऐसे प्रारम्भ पर अपने पद रिक्त कर दिए हैं ।
(4) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी कोई व्यक्ति, जिसके बारे में कोई प्रबन्ध-संविदा या अन्य ठहराव उपधारा (2) के कारण समाप्त हो गया है या जो उपधारा (3) के उपबन्धों के कारण पद पर नहीं रहता है, यथास्थिति, प्रबन्ध-संविदा या अन्य ठहराव के समय पूर्व समाप्ति के लिए या पद-हानि के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
5. उपक्रम का प्रबंध ग्रहण करने के लिए प्रशासक की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, प्रशासनिक दृष्टि से ऐसा करने के लिए यथाशीघ्र सुविधानुसार, ऐसी पूर्वतर या पश्चात्वर्ती तारीख से (जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पूर्व की न हो (किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को) जिसके अन्तर्गत सरकारी कम्पनी भी है, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ पर विद्यमान हो या उसके पश्चात् निगमित हो) मेटल कारपोरेशन के प्रशासक के रूप में नियुक्त कर सकेगी और इस प्रकार नियुक्त प्रशासक ऐसे उपक्रम का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार के लिए और उसकी ओर से चलाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रशासक की नियुक्ति पर मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का प्रबन्ध ऐसे प्रशासक में निहित हो जाएगा और ऐसी नियुक्ति के ठीक पूर्व ऐसे उपक्रम के प्रबन्ध के भारसाधक सभी व्यक्ति ऐसे प्रबन्ध के भारसाधक नहीं रह जाएंगे और मेटल कारपोरेशन के उपक्रम से सम्बन्धित अपनी अभिरक्षा में की सभी आस्तियां, लेखाबहियां, रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें प्रशासक को देने के लिए आबद्ध होंगे ।
(3) केन्द्रीय सरकार प्रशासक को उसकी शक्तियों और कर्तव्यों के बारे में, ऐसे निदेश (जिनके अन्तर्गत किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के समक्ष किन्हीं विधिक कार्यवाहियों को प्रारम्भ करने, उनमें प्रतिरक्षा करने या उन्हें चालू रखने के बारे में अनुदेश भी हैं) जारी कर सकेगी, जो वह वांछनीय समझे, और प्रशासक भी ऐसी रीति के बारे में, जिसमें मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के प्रबन्ध का संचालन किया जाएगा या ऐसे प्रबंध के दौरान उत्पन्न होने वाले किसी अन्य विषय के सम्बन्ध में, अनुदेशों के लिए केन्द्रीय सरकार को किसी समय आवेदन कर सकेगा ।
(4) जहां ऐसी कोई सम्पत्ति जिसका प्रबन्ध धारा 4 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, किसी व्यक्ति के कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, वहां ऐसा व्यक्ति उस सम्पत्ति का परिदान तत्काल केन्द्रीय सरकार को करेगा ।
(5) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसके कब्जे में या नियंत्रण के अधीन, इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, मेटल कारपोरेशन के उपक्रम से संबंधित कोई बहियां, कागज-पत्र या अन्य दस्तावेजें हैं, ऐसी बहियों, कागज-पत्र या अन्य दस्तावेजों का लेखा-जोखा प्रशासक को देने के लिए दायी होगा और उनका परिदान वह प्रशासक या ऐसे व्यक्ति को करेगा जिसे केन्द्रीय सरकार या प्रशासक इस निमित्त प्राधिकृत करे ।
(6) मेटल कारपोरेशन ऐसी अवधि के भीतर, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुज्ञात करे, उस सरकार को इस अधिनियम के प्रारम्भ पर मेटल कारपोरेशन की सभी सम्पत्ति और आस्तियों की (जिनके अन्तर्गत बही ऋण और विनिधान और माल असबाब की विशिष्टियां भी हैं), ऐसे प्रारम्भ पर मेटल कारपोरेशन के विद्यमान सभी दायित्वों और बाध्यताओं की और मेटल कारपोरेशन द्वारा किए गए और ऐसे प्रारम्भ पर प्रवृत्त ऐसे सभी करारों की भी, जिनके अन्तर्गत मेटल कारपोरेशन के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की छुट्टी, पेंशन, उपदान और सेवा के अन्य निबन्धनों से संबंधित करार, चाहे वे अभिव्यक्त हों या विवक्षित हैं, जिनके अधीन, इस अधिनियम के उपबन्धों के आधार पर, केन्द्रीय सरकार के दायित्व हैं या होंगे या हो सकेंगे, पूर्ण तालिका देगा और इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार मेटल कारपोरेशन को सभी उचित सुविधाएं देगी ।
(7) प्रशासक, केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और मेटल कारपोरेशन के उपक्रम की निधियों में से ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो केन्द्रीय सरकार नियत करे ।
6. 1956 के अधिनियम सं० 1 का लागू होना-(1) कम्पनी अधिनियम, 1956 में या मेटल कारपोरेशन के संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक मेटल कारपोरेशन का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार में निहित रहता है-
(क) मेटल कारपोरेशन के शेयरधारकों या किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वे या वह किसी व्यक्ति को मेटल कारपोरेशन का निदेशक होने के लिए नामनिर्दिष्ट या नियुक्त करे ;
(ख) मेटल कारपोरेशन के शेयरधारकों के किसी अधिवेशन में इस अधिनियम के प्रारम्भ पर या उसके पश्चात् पारित किसी भी संकल्प को तब तक प्रभावी नहीं किया जाएगा जब तक उसे केन्द्रीय सरकार अनुमोदित नहीं कर देती ;
(ग) मेटल कारपोरेशन के परिसमापन के लिए या उसके उपक्रम की बाबत समापक या रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई भी कार्यवाही किसी न्यायालय में केन्द्रीय सरकार की सहमति से ही होगी, अन्यथा नहीं ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों और इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए और ऐसे अन्य अपवादों, निर्बन्धनों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, जिन्हें केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अधीन रहते हुए, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) मेटल कारपोरेशन को वैसे ही लागू रहेगा जैसे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख के पूर्व उसे लागू था ।
अध्याय 3
मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का अर्जन
7. मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का केन्द्रीय सरकार में निहित होना-(1) नियत दिन को मेटल कारपोरेशन का उपक्रम और ऐसे उपक्रम के सम्बन्ध में मेटल कारपोरेशन के अधिकार, हक और हित, केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें पूर्ण रूप से निहित हो जाएंगे ।
(2) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, मेटल कारपोरेशन के उपक्रम में सम्मिलित सभी सम्पत्ति, जो उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, ऐसे निहित होने के बल पर सभी न्यासों, बाध्यताओं, बन्धकों, भारों, धारणाधिकारों और उसको प्रभावित करने वाले अन्य सभी विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएगी और ऐसी सम्पत्ति के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करने वाली किसी न्यायालय की कुर्की, व्यादेश या डिक्री या आदेश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह वापस ले लिया गया है ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि मेटल कारपोरेशन की सम्पत्ति में सम्मिलित किसी सम्पत्ति का कोई बंधकदार या कोई अन्य व्यक्ति, जिसका ऐसी सम्पत्ति में या उसकी बाबत कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित है, बंधक धन या अन्य शोध्य रकमों के पूर्णतः या भागतः अपने अधिकारों और हितों के अनुसार, संदाय के लिए दावा, केन्द्रीय सरकार से करने का हकदार होगा किन्तु ऐसा कोई बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी सम्पत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है ।
(3) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, वे सब संविदाएं और काम करने के बारे में ठहराव, जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान हैं और मेटल कारपोरेशन को प्रभावित करते हैं, जहां तक कि वे मेटल कारपोरेशन के उपक्रम से सम्बन्धित हैं, मेटल कारपोरेशन के या किसी भी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो प्रतिभू था या जिसने उनके पालन की प्रत्याभूति दी थी, प्रभावहीन या अप्रवर्तनीय हो जाएंगे तथा केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या उसके पक्ष में उनका वैसा ही पूर्ण बल और प्रभाव होगा और वे वैसे ही पूर्णतया प्रभावी रूप में प्रवर्तनीय होंगे मानो मेटल कारपोरेशन के बजाय केन्द्रीय सरकार उनमें नामित थी या उनकी पक्षकार थी ।
(4) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के सम्बन्ध में, मेटल कारपोरेशन या केन्द्रीय सरकार या मेटल कारपोरेशन आफ इंडिया (उपक्रम का अर्जन) अधिनियम, 1966 (1966 का 36) की धारा 12 में निर्दिष्ट सरकारी कम्पनी के द्वारा या विरुद्ध कोई भी कार्यवाही या वाद हेतुक, जो नियत दिन के ठीक पूर्व लम्बित या विद्यमान है, उस दिन से केन्द्रीय सरकार या धारा 9 में निर्दिष्ट सरकारी कम्पनी के द्वारा या विरुद्ध वैसे ही चालू रखा जा सकेगा और प्रवर्तित किया जा सकेगा जैसे वह, यथास्थिति, मेटल कारपोरेशन, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी के द्वारा या विरुद्ध प्रवर्तित किया जा सकता, यदि यह अधिनियम प्रख्यापित न किया गया होता, और वह मेटल कारपोरेशन, उसके प्रतिभू या प्रत्याभूतिदाता के द्वारा या विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं रह जाएगा ।
8. केन्द्रीय सरकार का राज्य सरकार का पट्टेदार होना-(1) जहां राज्य सरकार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अनुदत्त या अनुदत्त समझे गए किसी खनन पट्टे के अधीन मेटल कारपोरेशन के अधिकार धारा 7 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाते हैं, वहां केन्द्रीय सरकार, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, यथास्थिति, ऐसी खान के संबंध में राज्य सरकार या ऐसे अन्य व्यक्ति की पट्टेदार हो गई समझी जाएगी मानो, ऐसी खान के सम्बन्ध में खनन पट्टा केन्द्रीय सरकार को अनुदत्त किया गया हो और ऐसे पट्टे की अवधि वह सम्पूर्ण अवधि होगी जिसके लिए ऐसा पट्टा राज्य सरकार या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा खनन रियायत नियमों के अधीन अनुदत्त किया जा सकता था और तब ऐसे खनन पट्टे के अधीन सभी अधिकार, जिनके अन्तर्गत पट्टेदार को दिए गए भूतल, भूमिगत और अन्य अधिकार भी हैं, केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हुए समझे जाएंगे ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट पट्टे की अवधि की समाप्ति पर, ऐसे पट्टे का नवीकरण, यदि केन्द्रीय सरकार चाहे तो, राज्य सरकार या अन्य व्यक्ति द्वारा उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर, जिन पर वह पट्टा मेटल कारपोरेशन ने नियत दिन से ठीक पूर्व धारण किया था, उस अधिकतम अवधि के लिए किया जाएगा जिसके लिए ऐसे पट्टे का नवीकरण खनिज रियायत नियमों के अधीन किया जा सकता है ।
9. किसी सरकारी कम्पनी में मेटल कारपोरेशन के उपक्रम को निहित करने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 7 में किसी बात के होते हुए भी, यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि सरकारी कम्पनी उन निबन्धनों और शर्तों का, जिन्हें अधिरोपित करना वह सरकार ठीक समझे, अनुपालन करने के लिए रजामन्द है या उसने उनका अनुपालन कर दिया है तो वह लिखित आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि मेटल कारपोरेशन का उपक्रम और ऐसे उपक्रम के सम्बन्ध में मेटल कारपोरेशन के अधिकार, हक और हित केन्द्रीय सरकार में निहित बने रहने के बजाय, सरकारी कम्पनी में, या तो निदेश के प्रकाशन की तारीख को या उससे पहले या बाद की ऐसी तारीख को (जो नियत दिन से पहले की तारीख न हो), जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, निहित की जाएंगे ।
(2) जहां मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित, उपधारा (1) के अधीन, सरकारी कम्पनी में निहित हो जाते हैं, वहां वह सरकारी कम्पनी ऐसे निहित होने की तारीख से ही, उस खान के संबंध में पट्टेदार समझी जाएगी जिसकी मेटल कारपोरेशन पट्टेदार थी, मानो ऐसी खान के संबंध में खनन पट्टा सरकारी कम्पनी को दिया गया हो और ऐसे पट्टे की अवधि वह सम्पूर्ण अवधि होगी जिसके लिए ऐसा पट्टा खनिज रियायत नियमों के अधीन दिया जा सकता था, और ऐसी खान के संबंध में केन्द्रीय सरकार के सभी अधिकार और दायित्व ऐसे निहित होने की तारीख से ही, उस सरकारी कम्पनी के क्रमशः अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
(3) धारा 8 की उपधारा (2) के उपबन्ध, ऐसे पट्टे को जो सरकारी कम्पनी में निहित हैं, उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे केन्द्रीय सरकार में निहित पट्टे को लागू होते हैं और उसमें केन्द्रीय सरकार के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे उस सरकारी कम्पनी के प्रति निर्देश हैं ।
(4) इस अधिनियम में इसके पश्चात् सरकारी कम्पनी के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस सरकारी कम्पनी के प्रति, जो, यथास्थिति, धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन प्रशासक के रूप में नियुक्त की गई है या उस सरकारी कम्पनी के प्रति निर्देश है, जो उपधारा (1) के अधीन निदेश में निर्दिष्ट है ।
अध्याय 4
रकमों का संदाय
10. प्रबन्ध से वंचित किए जाने के लिए रकम का संदाय-मेटल कारपोरेशन को उसके उपक्रम के प्रबन्ध से उसे वंचित किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार, ग्यारह लाख उन्तालीस हजार रुपए प्रति वर्ष की दर से संगणित रकम, 22 अक्तूबर, 1965 से आरम्भ होकर, नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, नकद देगी ।
11. उपक्रम के अर्जन के लिए रकम का संदाय-मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित धारा 7 के अधीन केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार, मेटल कारपोरेशन को एक करोड़ अट्ठानवें लाख रुपए की रकम नकद देगी ।
12. संदाय का समय-(1) केन्द्रीय सरकार मेटल कारपोरेशन को धारा 10 के अधीन अवधारित रकम और धारा 11 के अधीन संदेय रकम, नियत दिन से (जिसे इसमें इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट अवधि कहा गया है) तीन मास की अवधि की समाप्ति से पूर्व, देगी ।
(2) यदि उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम का संदाय विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान के पूर्व नहीं कर दिया जाता है तो उस रकम पर, विनिर्दिष्ट अवधि समाप्त होने की तारीख को प्रारम्भ होकर, उस रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा मेटल कारपोरेशन को कर दिए जाने की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज दिया जाएगा :
परन्तु उस तारीख से ब्याज नहीं लगेगा जिसको मेटल कारपोरेशन को रकम निविदत्त की जाती है और वह इस प्रकार निविदत्त रकम, स्वीकार नहीं करती है ।
अध्याय 5
मेटल कारपोरेशन के उपक्रम का प्रबन्ध, आदि
13. उपक्रम का प्रबन्ध आदि-मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के, जिसके सम्बन्ध में उसके अधिकार, हक और हित, धारा 7 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियंत्रण और प्रबन्ध, धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन दिए गए निदेश में विनिर्दिष्ट सरकारी कम्पनी में निहित होंगे और तब सरकारी कम्पनी, ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग करने और ऐसे सभी कार्य करने की हकदार होगी जिन शक्तियों का प्रयोग करने और जिन कार्यों को करने के लिए मेटल कारपोरेशन, अपने उपक्रम के संबंध में, प्राधिकृत है ।
अध्याय 6
मेटल कारपोरेशन के कर्मचारियों के बारे में उपबन्ध
14. कर्मचारियों के बारे में उपबन्ध-(1) मेटल कारपोरेशन का प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी [कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 187क में विनिर्दिष्ट निदेशक या कोई प्रबन्धकार व्यक्ति या मेटल कारपोरेशन के सम्पूर्ण कारबार या उसके सारवान् भाग का किसी विशेष करार के अधीन प्रबन्ध करने के हकदार किसी अन्य व्यक्ति के सिवाय], जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व मेटल कारपोरेशन के नियोजन में था, जहां तक वह कर्मचारी मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के कार्यकलाप के सम्बन्ध में नियोजित है, ऐसे प्रारम्भ से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी का अधिकारी या अन्य कर्मचारी हो जाएगा और वैसी ही सेवाधृति और वैसे ही पारिश्रमिक पर और वैसे ही निबन्धनों और शर्तों पर और पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद धारण करेगा जिन पर वह मेटल कारपोरेशन के अधीन उस दशा में धारण करता, यदि यह अधिनियम अधिनियमित न किया गया होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक कि केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप में समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक उसका पारिश्रमिक, निबन्धन और शर्तें केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी सम्यक् रूप में परिवर्तित नहीं कर देती :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन किसी अधिकारी या कर्मचारी को स्वीकार नहीं है तो उसका नियोजन-
(क) स्थायी कर्मचारियों की दशा में, तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर, और
(ख) अन्य कर्मचारी की दशा में, एक मास के पारिश्रमिक के बराबर,
रकम का संदाय कर दिए जाने पर, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा समाप्त कर दिया जाएगा :
परन्तु यह और कि इस धारा की कोई भी बात ऐसे किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को लागू नहीं होगी जिसने इस अधिनियम के प्रारम्भ से आगामी तीन मास के भीतर, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अपने इस आशय की लिखित सूचना दे दी है कि वह केन्द्रीय सरकार का या सरकारी कम्पनी का अधिकारी का अन्य कर्मचारी नहीं होना चाहता है ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, मेटल कारपोरेशन के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवाओं का केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण ग्रहण नहीं करेगा ।
15. भविष्य-निधि और अन्य निधियां-(1) जहां मेटल कारपोरेशन ने अपने उपक्रम में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य-निधि, अधिवार्षिकी-निधि, कल्याण-निधि या कोई अन्य निधि स्थापित की है वहां ऐसे अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरित हो गई हैं, सम्बन्धित धन, ऐसी भविष्य-निधि, अधिवार्षिकी-निधि, कल्याण-निधि या अन्य निधि में नियत दिन को जमा धन में से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएगा ।
(2) उस धन के सम्बन्ध में, जो उपधारा (1) के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरित हो जाता है, उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा ऐसी रीति से कार्रवाई की जाएगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
16. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अन्य विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
17. असद्भाव से की गई संविदा आदि का रद्द या उसमें परिवर्तन किया जाना-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्षों के भीतर किसी भी समय मेटल कारपोरेशन या मेटल कारपोरेशन के प्रबंध अभिकर्ता और किसी अन्य व्यक्ति के बीच ऐसी कोई संविदा या करार हुआ है जो असद्भाव से किया गया है या मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के लिए अहितकर है, तो वह ऐसी संविदा या करार को (चाहे बिना किसी शर्त के अथवा ऐसी शर्तों के अधीन जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे) जहां तक उसका सम्बन्ध मेटल कारपोरेशन के उपक्रम से है, रद्द करने या उसमें परिवर्तन करने का कोई आदेश कर सकेगा और तत्पश्चात् वह संविदा या करार तदनुसार प्रभावी होगा :
परन्तु किसी संविदा या करार को तब तक रद्द या परिवर्तित नहीं किया जाएगा जब तक उस संविदा या करार के पक्षकारों को सुनवाई का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश में परिवर्तन कराने के लिए अथवा उसके उलट दिए जाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में आवेदन कर सकता है और तब ऐसा न्यायालय ऐसे आदेश को पुष्ट या उसमें उपान्तर कर सकेगा या उसे उलट सकेगा ।
18. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार या उस सरकार के किसी अधिकारी या प्रशासक या सरकारी कम्पनी अथवा उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के कारण हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, या उसके किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारियों के या सरकारी कम्पनी या उस कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
19. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि धारा 22 द्वारा प्रदत्त शक्ति से भिन्न, इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली, सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग, किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जा सकेगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन शक्ति प्रत्यायोजित की जाती है तब, वह व्यक्ति, जिसे ऐसी शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है, केन्द्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा ।
20. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति,-
(क) मेटल कारपोरेशन के किसी उपक्रम की भागरूप किसी सम्पत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी से सदोष विधारित करेगा ; या
(ख) मेटल कारपोरेशन के उपक्रम की भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसे सदोष प्रतिधारित करेगा या ऐसे उपक्रम से सम्बन्धित किसी दस्तावेज को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी या उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय से जानबूझकर विधारित करेगा या उसे देने में असफल रहेगा या मेटल कारपोरेशन के उपक्रम से सम्बन्धित किन्हीं आस्तियों, लेखा बहियों, रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी या उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने में असफल रहेगा ; या
(ग) मेटल कारपोरेशन के किसी उपक्रम की भागरूप किसी सम्पत्ति को, सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा या इस अधिनियम के अधीन कोई ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या है या बिल्कुल गलत है,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
21. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के लिए दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी जो यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; तथा
(ख) किसी फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
22. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह रीति, जिससे धारा 15 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी भविष्य-निधि या अन्य निधि में के धन के सम्बन्ध में कार्रवाई की जाएगी ;
(ख) कोई अन्य विषय, जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है, या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
23. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी :
परन्तु ऐसा कोई आदेश उस तारीख से, जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
24. अधिकरण आदि का उत्सादन-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर मेटल कारपोरेशन आफ इंडिया (उपक्रम का अर्जन) अधिनियम, 1966 (1966 का 36) की धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन गठित अधिकरण का उत्सादन हो जाएगा और उसके समक्ष लंबित प्रत्येक कार्यवाही, उसके द्वारा किया गया प्रत्येक आदेश और किसी ऐसे आदेश के विरुद्ध प्रत्येक अपील या आवेदन का उपशमन हो जाएगा, और ऐसे उपशमन पर, केन्द्रीय सरकार, अधिकरण द्वारा रखे गए या उसके समक्ष किसी कार्यवाही से संबंधित, सभी अभिलेख, आवेदन, ज्ञापन, रजिस्टर और अन्य दस्तावेज अपने भारसाधन में ले लेगी ।
(2) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर,-
(क) मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के कार्यकलाप या कारबार के सम्बन्ध में, ऐसे प्रारम्भ के पूर्व, संस्थित और ऐसे प्रारम्भ पर लंबित, किसी भी प्रकार के प्रत्येक वाद, अपील या अन्य कार्यवाही का इस अधिनियम की किसी बात के कारण उपशमन नहीं होगा या वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी प्रकार प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, मेटल कारपोरेशन द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी, और प्रवर्तित की जा सकेगी, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कंपनी के विरुद्ध नहीं ;
(ख) मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के कार्यकलाप या कारबार के सम्बन्ध में, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् किन्तु नियत दिन के पूर्व संस्थित और नियत दिन को लंबित किसी भी प्रकार के प्रत्येक वाद, अपील या अन्य कार्यवाही का, इस अधिनियम की किसी बात के कारण उपशमन नहीं होगा या वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी प्रकार प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा किन्तु ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी और प्रवर्तित की जा सकेगी ।
(2) 22 अक्तूबर, 1965 को आरम्भ होकर, नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान किसी भी समय केन्द्रीय सरकार, प्रशासक या सरकारी कम्पनी द्वारा की गई किसी बात या कार्रवाई या की गई किसी संविदा के बारे में यह समझा जाएगा कि वह मेटल कारपोरेशन के उपक्रम के प्रबन्ध के सम्यक् अनुक्रम में, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा की गई है ।
25. 1976 के अध्यादेश सं० 12 का निरसन और व्यावृत्ति-(1) मेटल कारपोरेशन (राष्ट्रीयकरण तथा प्रकीर्ण उपबंध) अध्यादेश, 1976 इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
_______________

