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ब्याज अधिनियम, 1978 ( Interest Act, 1978 )


 

ब्याज अधिनियम, 1978

(1978 का अधिनियम संख्यांक 14)

[31 मार्च, 1978]

कुछ दशाओं में ब्याज अनुज्ञात किए जाने से संबंधित

विधि का समेकन और संशोधन

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के उनतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम ब्याज अधिनियम, 1978 है ।

(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) न्यायालय" के अन्तर्गत अधिकरण और मध्यस्थ भी हैं ;

(ख) ब्याज की चालू दर" से ब्याज की अधिकतम दरों में से सब से ऊंची वह दर अभिप्रेत है, जिस पर ब्याज का संदाय विभिन्न वर्गों के अनुसूचित बैंक विभिन्न प्रकार के निक्षेपों पर (उन निक्षेपों से भिन्न जो बचत खाते में रखे गए हैं या जो पूर्त या धार्मिक संस्थाओं द्वारा रखे गए हैं) उन निदेशों के अनुसार कर सकेंगे जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंककारी कम्पनियों को बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के अधीन साधारणतया दिए या जारी किए गए हैं ।

स्पष्टीकरण-इस खण्ड में अनुसूचित बैंक" से ऐसा कोई बैंक अभिप्रेत है जो सहकारी बैंक नहीं है और बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) द्वारा प्राधिकृत कोई कारबार करता है ;

(ग) ऋण" से किसी अभिनिश्चित धनराशि के लिए कोई दायित्व अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत वस्तु रूप में संदेय कोई ऋण भी है किन्तु इसके अन्तर्गत कोई निर्णीत ऋण नहीं है ;

() वैयक्तिक क्षति" के अन्तर्गत कोई रोग और किसी व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक दशा का कोई ह्रास भी है ;

(ङ) उन अन्य सभी शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं, किन्तु परिभाषित नहीं हैं और भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे, जो उस अधिनियम में हैं ।

3. ब्याज अनुज्ञात करने की न्यायालय की शक्ति-(1) यदि न्यायालय किसी ऋण या नुकसानी की वसूली के लिए किन्हीं कार्यवाहियों में या किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनमें किसी ऐसे ऋण या नुकसानी की बाबत, जिसका संदाय पहले ही किया जा चुका है, ब्याज के लिए कोई दावा किया जाता है, ठीक समझता है तो वह, यथास्थिति, ऋण या नुकसानी के लिए हकदार व्यक्ति या ऐसा दावा करने वाले व्यक्ति को ब्याज की चालू दर से अनधिक दर पर निम्नलिखित संपूर्ण अवधि या उसके किसी भाग के लिए, अर्थात् :-

(क) यदि कार्यवाहियां किसी ऐसे ऋण के संबंध में हैं जो किसी लिखत के आधार पर किसी निश्चित समय पर संदेय है तो जिस तारीख को ऋण संदेय है, उस तारीख से कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने की तारीख तक ;

(ख) यदि कार्यवाहियां ऐसे किसी ऋण के संबंध में नहीं हैं तो उस तारीख से, जो हकदार व्यक्ति या दावा करने वाले व्यक्ति द्वारा दायी व्यक्ति को दी गई उस लिखित सूचना में उल्लिखित हो जिसमें यह सूचित किया गया हो कि ब्याज का दावा किया जाएगा, कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने की तारीख तक,

ब्याज अनुज्ञात कर सकेगा :

परन्तु जहां ऋण या नुकसानी की रकम कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने के पूर्व वापस कर दी गई है वहां ऐसे वापस कर देने के पश्चात् की अवधि के लिए ब्याज इस धारा के अधीन अनुज्ञात नहीं किया जाएगा । 

                (2) यदि उपधारा (1) में वर्णित किन्हीं कार्यवाहियों में,-

(क) ऐसी राशि के लिए कोई निर्णय, आदेश या अधिनिर्णय दिया जाता है जो नुकसानी पर ब्याज के अलावा चार हजार रुपए से अधिक है ; और

(ख) वह राशि वादी या किसी अन्य व्यक्ति को हुई वैयक्तिक क्षति के सम्बन्ध में या किसी व्यक्ति की मृत्यु के सम्बन्ध में नुकसानी को दर्शित करती है या उस राशि में ऐसी नुकसानी सम्मिलित है,

तो उस उपधारा द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग ऐसे किया जाएगा कि उस राशि में वह ब्याज सम्मिलित किया जा सके जो उस नुकसानी या उसके ऐसे भाग पर न्यायालय सूचना में उल्लिखित तारीख से कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने की तारीख तक की संपूर्ण अवधि या उसके किसी भाग के लिए उचित समझे किन्तु ऐसी शक्ति का प्रयोग तब नहीं किया जाएगा जब न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि इस बात के  विशेष कारण हैं कि उस नुकसानी की बाबत कोई ब्याज नहीं दिया जाना चाहिए ।

                (3) इस धारा की कोई बात,-

(क) निम्नलिखित के सम्बन्ध में लागू न होगी, अर्थात् :-

(i) कोई ऋण या नुकसानी जिस पर ब्याज किसी करार के आधार पर साधिकार संदेय है ; या

(ii) कोई ऋण या नुकसानी जिस पर ब्याज का संदाय किया जाना किसी अभिव्यक्त करार के आधार पर वर्जित है ;

(ख) निम्नलिखित पर प्रभाव नहीं डालेगी, अर्थात् :-

(i) परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) में यथापरिभाषित किसी विनिमयपत्र, वचनपत्र या चेक के अनादर के लिए वसूल किया जा सकने वाला प्रतिकर, या

(ii) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 2 के नियम 2 के उपबन्ध ;

(ग) ब्याज पर ब्याज अधिनिर्णीत करने के लिए न्यायालय को सशक्त नहीं करेगी । 

4. कुछ अधिनियमितियों के अधीन देय ब्याज-(1) धारा 3 में किसी बात के होते हुए भी, ब्याज ऐसी सभी दशाओं में संदेय होगा जिनमें किसी अधिनियमिती, अन्य नियम या विधि या विधि का बल रखने वाली किसी प्रथा द्वारा ब्याज संदेय है ।

(2) ऊपर जो कहा गया है उसके होते हुए भी और उपधारा (1) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, न्यायालय निम्नलिखित दशाओं में, नीचे विनिर्दिष्ट तारीख से कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने की तारीख तक प्रत्येक दशा में ऐसी दर पर, जो न्यायालय उचित समझे, ब्याज अनुज्ञात करेगा, किन्तु तब नहीं करेगा जब न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि इस बात के विशेष कारण हैं कि ब्याज अनुज्ञात नहीं किया जाना चाहिए, अर्थात् :-

(क) जहां धन या अन्य सम्पत्ति विधि या संविदा द्वारा अधिरोपित किसी बाध्यता के पालन के लिए प्रतिभूति के रूप में निक्षिप्त है वहां निक्षेप की तारीख से ;

(ख) जहां धन देने या कोई सम्पत्ति वापस करने की बाध्यता किसी वैश्वासिक सम्बन्ध के आधार पर पैदा होती है वहां वाद-हेतुक की तारीख से ;

(ग) जहां धन या कोई सम्पत्ति कपट द्वारा अभिप्राप्त की गई है, या रखी गई है वहां वाद-हेतुक की तारीख से ;

(घ) जहां मेहर या भरणपोषण के लिए दावा है वहां वाद-हेतुक की तारीख से ।

5. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 34 का लागू होना-इस अधिनियम की कोई भी बात सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908(1908 का 5) की धारा 34 के उपबन्धों पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

6. निरसन और व्यावृत्ति-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से ब्याज अधिनियम, 1839 (1839 का 32) और तत्समान कोई अन्य विधि, जो ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व किसी राज्य में प्रवृत्त है, निरसित हो जाएगी ।

(2) इस अधिनियम के उपबन्ध इस अधिनियम के प्रारम्भ के समय लम्बित किसी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही को लागू नहीं होंगे और ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व लागू तत्समान विधि के उपबन्ध, उपधारा (1) द्वारा ऐसी विधि के निरसन के होते हुए भी, ऐसे वाद या अन्य विधिक कार्यवाही को लागू होते रहेंगे ।

(3) उपधारा (2) में विशिष्ट विषयों के उल्लेख का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह निरसन के प्रभाव से सम्बन्धित साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के साधारणतया लागू किए जाने पर कोई प्रभाव या प्रतिकूल प्रभाव डालता है ।

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