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अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 ( Scheduled Tribes And Other Traditional Forest Dwellers (Recognition Of Forest Rights) Act, 2006 )


 

संसद्‌ के अधिनियम

अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006

(2007 का अधिनियम संख्यांक 2)

[29 दिसंबर, 2006]

वन में निवास करने वाली ऐसी अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के, जो ऐसे वनों में पीढ़ियों से निवासकर रहे हैं, किंतु उनके अधिकारों को अभिलिखित नहीं किया

जा सका है, वन अधिकारों और वन भूमि में अधिभोग

मान्यता देने और निहित करने; वन भूमि में इस

प्रकार निहित वन अधिकारों को अभिलिखित

करने के लिए संरचना का और वन भूमि के

संबंध में अधिकारों को ऐसी मान्यता

देने और निहित करने के

लिए अपेक्षित साक्ष्य की

प्रकृति का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के, मान्यताप्राप्त अधिकारों में, दीर्घकालीन उपयोग के लिए जिम्मेदारी और प्राधिकार, जैव विविधता का संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखना और वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की जीविका तथा खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करते समय वनों की संरक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करना भी सम्मिलित है;

और औपनिवेशिक काल के दौरान तथा स्वतंत्र भारत में राज्य वनों को समेकित करते समय उनकी पैतृक भूमि पर वन अधिकारों और उनके निवास को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं दी गई थी, जिसके परिणामस्वरूप वन में निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, जो वन पारिस्थितिकी प्रणाली को बचाने और बनाए रखने के लिए अभिन्न अंग है;   

 और यह आवश्यक हो गया है कि वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की, जिसके अंतर्गत वे जनजातियां भी हैं, जिन्हें राज्य के विकास से उत्पन्न हस्तक्षेप के कारण अपने निवास दूसरी जगह बनाने के लिए मजबूर किया गया था, लंबे समय से चली आ रही भूमि संबंधी असुरक्षा तथा वनों में पहुंच के अधिकारों पर ध्यान दिया जाए;   

 भारत गणराज्य के सतावनवें वर्ष में संसद्‌ द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ - (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।

2. परिभाषाएं - इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

() सामुदायिक वन संसाधन" से ग्राम की परंपरागत या रूढ़िगत सीमाओं के भीतर रूढ़िगत सामान्य वन भूमि या चरागाही समुदायों की दशा में भू-परिदृश्य का मौसमी उपयोग अभिप्रेत है, जिसके अंतर्गत आरक्षित वन, संरक्षित वन और संरक्षित ऐसे क्षेत्रों की भूमि है जैसे अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यान जिन पर समुदायों की परंपरागत पहुंच थी;

(ख) संकटपूर्ण वन्य जीव आवास" से राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों के ऐसे क्षेत्र अभिप्रेत हैं, जहां वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर, मामलेवार, विनिर्दिष्ट रूप से और स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया गया है कि ऐसे क्षेत्र वन्य जीव संरक्षण के प्रयोजनों के लिए अनतिक्रांत रखे जाने के लिए अपेक्षित हैं जैसाकि केन्द्रीय सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा ऐसी विशेषज्ञ समिति से परामर्श की खुली प्रक्रिया के पश्चात्‌ अवधारित और अधिसूचित की जाए, जिसमें उस सरकार द्वारा नियुक्त उस परिक्षेत्र से विशेषज्ञ सम्मिलित होंगे जिसमें धारा 4 की उपधारा (1) और उपधारा (2) से उ-ूत प्रकियात्मक अपेक्षाओं के अनुसार ऐसे क्षेत्रों का अवधारण करने में जनजातीय मंत्रालय का एक प्रतिनिधि भी सम्मिलित होगा ;

(ग) वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति" से अनुसूचित जनजातियों के ऐसे सदस्य या समुदाय अभिप्रेत हैं, जो प्राथमिक रूप से वनों में निवास करते हैं और जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए वनों या वन भूमि पर निर्भर हैं और इसके अंतर्गत अनुसूचित जनजाति चरागाही समुदाय भी हैं;

 () वन भूमि" से किसी वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली किसी प्रकार की भूमि अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत अवर्गीकृत वन, असीमांकित विद्यमान वन या समझे गए वन, संरक्षित वन, आरक्षित वन, अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यान भी हैं;

(ङ) वन अधिकारों" से धारा 3 में निर्दिष्ट वन अधिकार अभिप्रेत है;

() वन ग्राम" से ऐसी बस्तियां अभिप्रेत हैं, जो किसी राज्य सरकार के वन विभाग द्वारा वन संबंधी संक्रियाओं के लिए वनों के भीतर स्थापित की गई हैं या जो वन आरक्षण प्रक्रिया के माध्यम से वन ग्रामों में संपरिवर्तित की गई हैं और जिनके अंतर्गत वन बस्ती ग्राम, नियत मांग धृति, ऐसे ग्रामों के लिए सभी प्रकार की वन कृषि बस्तियां भी हैं, चाहे वे किसी भी नाम से ज्ञात हों और इसके अंतर्गत सरकार द्वारा अनुज्ञात कृषि तथा अन्य उपयोगों के लिए भूमि भी है;

 (छ) ग्राम सभा" से ऐसी ग्राम सभा अभिप्रेत है, जो ग्राम के सभी वयस्क सदस्यों से मिलकर बनेगी और ऐसे राज्यों की दशा में, जिनमें कोई ग्राम पंचायत नहीं है, पाड़ा, टोला और ऐसी अन्य परंपरागत ग्राम संस्थाएं और निर्वाचित ग्राम समितियां भी हैं जिनमें महिलाओं की पूर्ण और अनिर्बंधित भागीदारी है;

() आवासके अंतर्गत ऐसा क्षेत्र भी है, जिसमें आदिम जनजाति समूहों और कृषि पूर्व समुदायों और अन्य वन निवासी अनुसूचित जनजातियों के आरक्षित वनों और संरक्षित वनों में परंपरागत आवास और ऐसे अन्य आवास सम्मिलित हैं;

() गौण वन उत्पाद" के अंतर्गत पादप मूल के सभी गैर-इमारती वनोत्पाद हैं, जिनमें, बांस, झाड़ झंकाड़, ठूंठ, बैंत, तुसार, कोया, शहद, मोम, लाख, तेंदू या केंदू पत्ते, औषधीय पौधे और जड़ी बूटियां, मूल, कन्द और इसी प्रकार के उत्पाद सम्मिलित हैं;

(ञ) नोडल अभिकरण" से धारा 11 में विनिर्दिष्ट नोडल अभिकरण अभिप्रेत है;

(ट) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ड) अनुसूचित क्षेत्र" से संविधान के अनुच्छेद 244 के खंड (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्र अभिप्रेत है;  

() सतत उपयोग" का वही अर्थ होगा जो जैव विविधता अधिनियम, 2002 (2003 का 18) की धारा 2 के खंड () में है;

(ण) अन्य परंपरागत वन निवासी" से ऐसा कोई सदस्य या समुदाय अभिप्रेत है, जो 31 दिसंबर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों तक प्राथमिक रूप से वन या वन भूमि में निवास करता रहा है और जो जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए उन पर निर्भर है ।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजन के लिए   पीढ़ी" से पच्चीस वर्ष की अवधि अभिप्रेत है;

(त) ग्राम" से निम्नलिखित अभिप्रेत है 

(i) पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (1996 का 40) की धारा 4 के खंड (ख) में निर्दिष्ट कोई ग्राम; या

(ii) अनुसूचित क्षेत्रों से भिन्न पंचायतों से संबंधित किसी राज्य विधि में ग्राम के रूप में निर्दिष्ट कोई क्षेत्र; या

(iii) वन ग्राम, पुरातन निवास या बस्तियां और असर्वेक्षित ग्राम, चाहे वे ग्राम के रूप में अधिसूचित हों या नहीं; या

(iv) उन राज्यों की दशा में, जहां पंचायतें नहीं हैं, पारम्परिक ग्राम, चाहे वे किसी भी नाम से ज्ञात हों;

(थ) वन्य पशु" से वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम,1972 (1972 का 53) की अनुसूची 1 से 4 में विनिर्दिष्ट पशु की ऐसी प्रजातियां अभिप्रेत हैं, जो प्रकृति में वन्य के रूप में पाई जाती हैं ।

अध्याय 2

वन अधिकार

3. वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन अधिकार - (1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के सभी वन भूमि पर निम्नलिखित वन अधिकार होंगे, जो व्यक्तिगत या सामुदायिक भूधृति या दोनों को सुरक्षित करते हैं, अर्थात्‌: -

(क) वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों के किसी सदस्य या किन्हीं सदस्यों द्वारा निवास के लिए या जीविका के लिए स्वयं खेती करने के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक अधिभोग के अधीन वन भूमि को धारित करने और उसमें रहने का अधिकार;   

(ख) निस्तार के रूप में सामुदायिक अधिकार, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हों, जिनके अंतर्गत तत्कालीन राजाओं के राज्यों, जमींदारी या ऐसे अन्य मध्यवर्ती शासनों में प्रयुक्त अधिकार भी सम्मिलित हैं;

(ग) गौण वन उत्पादों के, जिनका गांव की सीमा के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से संग्रह किया जाता रहा है स्वामित्व संग्रह करने के लिए पहुंच, उनका उपयोग और व्ययन का अधिकार रहा है;

() यायावरी या चरागाही समुदायों की मत्स्य और जलाशयों के अन्य उत्पाद, चरागाह (स्थापित और घुमक्कड़ दोनों) के उपयोग या उन पर हकदारी और पारम्परिक मौसमी संसाधनों तक पहुंच के अन्य सामुदायिक अधिकार;

(ङ) वे अधिकार, जिनके अंतर्गत आदिम जनजाति समूहों और कृषि पूर्व समुदायों के लिए गृह और आवास की सामुदायिक भू-धृतियां भी हैं;

() किसी ऐसे राज्य में, जहां दावे विवादग्रस्त हैं, किसी नाम पद्धति के अधीन विवादित भूमि में या उस पर के अधिकार;

(छ) वन भूमि पर हक के लिए किसी स्थानीय प्राधिकरण या किसी राज्य सरकार द्वारा जारी पट्‌टों या धृतियों या अनुदानों के संपरिवर्तन के अधिकार;

(ज) वनों के सभी वन ग्रामों, पुराने आवासों, असर्वेक्षित ग्रामों और अन्य ग्रामों के बसने और संपरिवर्तन के अधिकार, चाहे वे राजस्व ग्रामों में लेखबद्ध हों, अधिसूचित हों अथवा नहीं;

(झ) ऐसे किसी सामुदायिक वन संसाधन का संरक्षण, पुनरुज्जीवित या संरक्षित या प्रबंध करने का अधिकार, जिसकी वे सतत्‌ उपयोग के लिए परंपरागत रूप से संरक्षा और संरक्षण कर रहे हैं;

(ञ) ऐसे अधिकार, जिनको किसी राज्य की विधि या किसी स्वशासी जिला परिषद्‌ या स्वशासी क्षेत्रीय परिषद्‌ की विधियों के अधीन मान्यता दी गई है या जिन्हें किसी राज्य की संबंधित जनजाति की किसी पारंपरिक या रूढ़िगत विधि के अधीन जनजातियों के अधिकारों के रूप में स्वीकार किया गया है;

 (ट) जैव विविधता तक पहुंच का अधिकार और जैव विविधता तथा सांस्कृतिक विविधता से संबंधित बौद्धिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान का सामुदायिक अधिकार;

(ठ) कोई ऐसा अन्य पारंपरिक अधिकार जिसका, यथास्थिति, वन में निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों या अन्य परंपरागत वन निवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपभोग किया जा रहा है, जो खंड (क) से खंड (ट) में वर्णित हैं, किंतु उनमें किसी प्रजाति के वन्य जीव का शिकार करने या उन्हें फंसाने या उनके शरीर का कोई भाग निकालने का परंपरागत अधिकार नहीं है;

(ड) यथावत पुनर्वास का अधिकार, जिसके अंतर्गत उन मामलों में आनुकल्पिक भूमि भी है जहां अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को 13 दिसंबर, 2005 के पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से पुनर्वास के उनके वैध हक प्राप्त किए बिना अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित किया गया हो ।

(2) वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (1980 का 69) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, सरकार द्वारा व्यवस्थित निम्नलिखित सुविधाओं के लिए वन भूमि के परिवर्तन का उपबंध करेगी जिसके अंतर्गत प्रति हेक्टेयर पचहत्तर से अनधिक पेड़ों का गिराया जाना भी है, अर्थात्‌: -

(क) विद्यालय;

(ख) औषधालय या अस्पताल;

(ग) आंगनबाड़ी;

(घ) उचित कीमत की दुकानें;

(ङ) विद्युत और दूरसंचार लाइनें;

(च) टंकियां और अन्य लघु जलाशय;

(छ) पेय जल की आपूर्ति और जल पाइपलाइनें;

(ज) जल या वर्षा जल संचयन संरचनाएं;

(झ) लघु सिंचाई नहरें;

(ञ) अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत;

(ट) कौशल उन्नयन या व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र;

(ठ) सड़कें; और

(ड) सामुदायिक केन्द्र:

परंतु वन भूमि के ऐसे परिवर्तन को तभी अनुज्ञात किया जाएगा, जब -

(i) इस उपधारा में वर्णित प्रयोजनों के लिए परिवर्तित की जाने वाली वन भूमि ऐसे प्रत्येक मामले में एक हेक्टेयर से कम है; और

(ii) ऐसी विकासशील परियोजनाओं की अनापत्ति इस शर्त के अधीन रहते हुए होगी कि उसकी सिफारिश ग्राम सभा द्वारा की गई हो ।

अध्याय 3

वन अधिकारों की मान्यता, उनका पुनःस्थापन और निहित होना तथा संबंधित विषय

4. वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन अधिकारों की मान्यता और उनका निहित होना - (1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार, -

(क) ऐसे राज्यों या राज्यों के उन क्षेत्रों में वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों के, जहां उन्हें धारा 3 में उल्लिखित सभी वन अधिकारों की बाबत अनुसूचित जनजातियों के रूप में घोषित किया गया है;

(ख) धारा 3 में उल्लिखित सभी वन अधिकारों की बाबत अन्य परंपरागत वन निवासियों के वनाधिकारों को,

मान्यता प्रदान करती है और उनमें निहित करती है ।

(2) राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों के संकटग्रस्त वन्य जीव आवासों में इस अधिनियम के अधीन मान्यताप्राप्त वन अधिकारों को, पश्चात्‌्‌वर्ती रूप में उपान्तरित या पुनःस्थापित किया जा सकेगा, परंतु किसी भी वन अधिकार धारक को पुनःस्थापित नहीं किया जाएगा या किसी भी रीति में उनके अधिकारों पर वन जीव संरक्षण के लिए अनतिक्रांत क्षेत्रों के सृजन के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित सभी शर्तों के पूरा करने की दशा में के सिवाय प्रभाव नहीं पड़ेगा, अर्थात्‌, -

() विचाराधीन सभी क्षेत्रों में धारा 6 में यथा विनिर्दिष्ट अधिकारों की मान्यता और निहित करने की प्रक्रिया पूरी हो;

(ख) राज्य सरकार के संबद्ध अभिकरणों द्वारा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (1972 का 53) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह स्थापित किया गया है कि अधिकारों के धारकों की उपस्थिति के वन्य पशुओं पर क्रियाकलाप या प्रभाव अपरिवर्तनीय नुकसान करने के लिए पर्याप्त हैं और उक्त प्रजाति के अस्तित्व और उनके निवास के लिए खतरा है;

(ग) राज्य सरकार यह निष्कर्ष निकाल चुकी है कि सहअस्तित्व जैसे अन्य युक्तियुक्त विकल्प उपलब्ध नहीं हैं;

(घ) एक पुनर्व्यवस्थापन या अनुकल्पी पैकेज तैयार और संसूचित किया गया है जो प्रभावित व्यष्टियों और समुदायों के लिए सुनिश्चित जीविका का उपबंध करता है और ऐसे प्रभावित व्यष्टियों और समुदायों की केन्द्रीय सरकार की सुसंगत विधियों और नीति में दी गई अपेक्षाओं को पूरा करने की व्यवस्था करता है;

(ङ) प्रस्तावित पुनर्व्यवस्थापन और पैकेज के लिए संबद्ध क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की स्वतंत्र सूचित सहमति लिखित में प्राप्त कर ली गई है; 

(च) कोई पुनर्व्यवस्थापन तभी होगा जब पुनर्वास अवस्थान पर सुविधाएं और भूमि आबंटन वायदा किए गए पैकेज के अनुसार पूरी की गई हों 

परंतु संकटग्रस्त वन्य जीव आवास, जिससे अधिकार धारकों को इस प्रकार वन्य जीव संरक्षण के प्रयोजनों के लिए पुनःस्थापित किया जाता है, पश्चात्‌्‌वर्ती रूप से राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार या किसी एकक द्वारा किसी अन्य उपयोगों के लिए अपवर्तित नहीं किया जाएगा ।

(3) वन भूमि और उसके निवासियों की बाबत किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को, इस अधिनियम के अधीन वन अधिकारों की मान्यता देना और उनका निहित किया जाना इस शर्त के अध्यधीन होगा कि ऐसी जनजातियों या जनजाति समुदायों या अन्य परंपरागत वन निवासियों ने 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व वन भूमि अधिभोग में ले ली थी ।

(4) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त कोई अधिकार वंशागत होगा किंतु संक्रमणीय या अन्तरणीय नहीं होगा और विवाहित व्यक्तियों की दशा में पति-पत्नी दोनों के नाम में संयुक्त रूप से और यदि किसी घर का मुखिया एकल व्यक्ति है तो एकल मुखिया के नाम में रजिस्ट्रीकृत होगा तथा सीधे वारिस की अनुपस्थिति में वंशागत अधिकार अगले निकटतम संबंधी को चला जाएगा ।

(5) जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, किसी वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन निवासियों का कोई सदस्य उसके अधिभोगाधीन वन भूमि से तब तक बेदखल नहीं किया जाएगा या हटाया नहीं जाएगा जब तक कि मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती है ।

(6) जहां उपधारा (1) द्वारा मान्यताप्राप्त और निहित वन अधिकार धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (क) में वर्णित भूमि के संबंध में हैं, वहां ऐसी भूमि इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को किसी व्यष्टि या कुटुम्ब या समुदाय के अधिभोगाधीन होगी और ऐसी भूमि वास्तविक अधिभोग के अधीन क्षेत्र तक निर्बंधित होगी और किसी भी दशा में इसका क्षेत्र चार हेक्टेयर से अधिक का नहीं होगा ।

(7) वन अधिकार, सभी विल्लंगमों और प्रक्रिया संबंधी अपेक्षाओं से मुक्त रूप में प्रदत्त किया जाएगा, जिसमें वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (1980 का 69) के अधीन अनापत्ति इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट के सिवाय वन भूमि में अपयोजन के लिए शुद्ध वर्तमान मूल्य" और प्रतिकरात्मक वन रोपण का संदाय करने की अपेक्षा सम्मिलित हैं

(8) इस अधिनियम के अधीन मान्यताप्राप्त और निहित वन अधिकारों में वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन भूमि अधिकार सम्मिलित होंगे जो यह साबित कर सकते हैं कि वे राज्य विकास हस्तक्षेप के कारण भूमि प्रतिकर के बिना उनके निवास और खेती से विस्थापित किए गए थे और जहां भूमि का उपयोग उक्त अर्जन से पांच वर्ष के भीतर उस प्रयोजन के लिए नहीं किया गया है, जिसके लिए वह अर्जित की गई थी ।

5. वन अधिकारों के धारकों के कर्तव्य - किसी वन्य अधिकार के धारक, उन क्षेत्रों में जहां इस अधिनियम के अधीन किन्हीं वन अधिकारों के धारक हैं, ग्राम सभा और ग्राम स्तर की संस्थाएं निम्नलिखित के लिए सशक्त हैं, -

(क) वन्य जीव, वन और जैव विविधता का संरक्षण करना;

(ख) यह सुनिश्चित करना कि लगा हुआ जलागम क्षेत्र, जल स्रोत और अन्य पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र पर्याप्त रूप से संरक्षित हैं;

() यह सुनिश्चित करना कि वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों का निवास किसी प्रकार के विनाशकारी व्यवहारों से संरक्षित हैं जो उनकी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को प्रभावित करती हैं;

(घ) यह सुनिश्चित करना कि सामुदायिक वन संसाधनों तक पहुंच को विनियमित करने और ऐसे किसी क्रियाकलाप को रोकने के लिए, जो वन्य जीव, वन और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, ग्राम सभा में लिए गए विनिश्चयों का पालन किया जाता है ।

अध्याय 4

वन अधिकारों को निहित करने के लिए प्राधिकारी और प्रक्रिया

6. वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों में वन अधिकारों को निहित करने के लिए प्राधिकारी और उसकी प्रक्रिया - (1) ग्राम सभा को, ऐसे किसी व्यष्टिक या सामुदायिक वन्य अधिकारों या दोनों की प्रकृति और सीमा को अवधारित करने के लिए प्रक्रिया आरंभ करने का प्राधिकार होगा जो इस अधिनियम के अधीन इसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को, दावे स्वीकार करते हुए, उनके समेकन और सत्यापन तथा ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, सिफारिश किए गए प्रत्येक दावे के क्षेत्र को अंकित करते हुए, मानचित्र तैयार करके दिए जा सकेंगे और तब ग्राम सभा उस आशय का संकल्प पारित करेगी तथा उसके पश्चात्‌ उसकी एक प्रति उपखंड स्तर की समिति को अग्रेषित करेगी ।

(2) ग्राम सभा के संकल्प से व्यथित कोई व्यक्ति उपधारा (3) के अधीन गठित उपखंड स्तर की समिति को कोई याचिका दे सकेगा और उपखंड स्तर की समिति ऐसी याचिका पर विचार करेगी और उसका निपटारा करेगी:

परंतु प्रत्येक ऐसी याचिका ग्राम सभा द्वारा संकल्प पारित करने की तारीख से साठ दिन के भीतर दी जाएगी:

परंतु यह और कि ऐसी याचिका का, व्यथित व्यक्तियों के विरुद्ध निपटारा तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उन्हें अपने मामले को प्रस्तुत करने के लिए युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो ।

(3) राज्य सरकार, ग्राम सभा द्वारा पारित संकल्प की परीक्षा करने के लिए एक उपखंड स्तर की समिति का गठन करेगी और वन अधिकारों का अभिलेख तैयार करेगी तथा इसे उपखंड अधिकारी के माध्यम से अंतिम विनिश्चय के लिए जिला स्तर की समिति को अग्रेषित करेगी ।

 (4) उपखंड स्तर की समिति के विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति, उपखंड स्तर की समिति के विनिश्चय की तारीख से साठ दिन के भीतर जिला स्तर की समिति को कोई याचिका दे सकेगा और जिला स्तर की समिति ऐसी याचिका पर विचार करेगी और उसका निपटारा करेगी:

परंतु ग्राम सभा के संकल्प के विरुद्ध कोई याचिका जिला स्तर की समिति के समक्ष सीधे तब तक नहीं दी जाएगी जब तक वह पहले उपखंड स्तर की समिति के समक्ष दी गई हो और उसके द्वारा उस पर विचार कर लिया गया हो:

परंतु यह और कि याचिका का, व्यथित व्यक्तियों के विरुद्ध निपटारा तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उन्हें अपने मामले को प्रस्तुत करने के लिए युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो ।

(5) राज्य सरकार, उपखंड स्तर की समिति द्वारा तैयार किए गए वन अधिकारों के अभिलेख पर विचार करने और उनका अंतिम रूप से अनुमोदन करने के लिए एक जिला स्तर की समिति का गठन करेगी ।

(6) वन अधिकारों के अभिलेख पर जिला स्तर की समिति का विनिश्चय अंतिम और आबद्धकर होगा ।

(7) राज्य सरकार, वन अधिकारों को मान्यता देने और उन्हें निहित करने की प्रक्रिया को मानीटर करने और ऐसी विवरणियों और रिपोर्टों को, जो उस अभिकरण द्वारा मांगी जाएं, नोडल अभिकरण को प्रस्तुत करने के लिए एक राज्य स्तर की मानीटरी समिति का गठन करेगी ।

(8) उपखंड स्तर की समिति, जिला स्तर की समिति और राज्य स्तर की मानीटरी समिति में राज्य सरकार के राजस्व विभाग, वन विभाग और जनजातीय मामले विभाग के अधिकारी और समुचित स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं के तीन सदस्य होंगे, जिन्हें संबंधित पंचायती राज संस्थाओं द्वारा नियुक्त किया जाएगा, जिनमें से दो सदस्य अनुसूचित जनजातियों के होंगे और कम से कम एक महिला होगी, जैसा विहित किया जाए ।

(9) उपखंड स्तर की समिति, जिला स्तर की समिति और राज्य स्तर की मानीटरी समिति की संरचना और कृत्य तथा उनके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए ।

अध्याय 5

अपराध और शास्तियां

7. इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरणों और समितियों के सदस्यों या अधिकारियों द्वारा अपराध - जहां कोई प्राधिकरण या समिति या ऐसे प्राधिकरण या समिति का कोई अधिकारी या सदस्य इस अधिनियम या उसके अधीन वन अधिकारों की मान्यता से संबंधित बनाए गए किसी नियम के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह या वे इस अधिनियम के अधीन अपराध के दोषी समझे जाएंगे और अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडित किए जाने के भागी होंगे:

परंतु इस उपधारा की कोई भी बात इस धारा में निर्दिष्ट प्राधिकरण या समिति के किसी सदस्य या विभागाध्यक्ष या किसी व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक्तत्परता बरती थी

8. अपराधों का संज्ञान - कोई भी न्यायालय इस अधिनियम की धारा 7 के अधीन किसी अपराध का तब तक संज्ञान नहीं लेगा जब तक कि कोई वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति, किसी ग्राम सभा के संकल्प से संबंधित किसी विवाद के मामले में या किसी उच्च प्राधिकारी के विरुद्ध किसी संकल्प के माध्यम से ग्राम सभा, राज्य स्तर की मानीटरी समिति को साठ दिन से अन्यून की सूचना नहीं दे देती है और राज्य स्तर की मानीटरी समिति ने ऐसे प्राधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही न कर ली हो ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

9. प्राधिकरण, आदि के सदस्यों का लोक सेवक होना - अध्याय 4 में निर्दिष्ट प्राधिकारियों का प्रत्येक सदस्य और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने वाला प्रत्येक अन्य अधिकारी भारतीय दंड संहिता,1860 (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ।

10. स-ावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण - (1) इस अधिनियम के अधीन स-ावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

(2) इस अधिनियम के अधीन स-ावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या उसके किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं   होगी ।

(3) इस अधिनियम के अधीन स-ावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही अध्याय 4 में यथानिर्दिष्ट किसी प्राधिकरण, जिसके अंतर्गत उसका अध्यक्ष, उसके सदस्य, सदस्य सचिव, अधिकारी और अन्य कर्मचारी भी हैं, के विरुद्ध नहीं होगी ।

11. नोडल अभिकरण - जनजाति मामलों से संबंधित भारत सरकार का मंत्रालय या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अधिकारी या प्राधिकारी इस अधिनियम के उपबंधों के कार्यान्वयन के लिए नोडल अभिकरण होगा

12. केन्द्रीय सरकार की निदेश जारी करने की शक्ति - अध्याय 4 में निर्दिष्ट प्रत्येक प्राधिकारी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने और अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में, ऐसे साधारण या विशेष निदेशों के अध्यधीन होगा जो केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, लिखित में दे ।

13. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में होना - इस अधिनियम और पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (1996 का 40) में अन्यथा उपबंधित के सिवाय इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।

14. नियम बनाने की शक्ति - (1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा और पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए नियम, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्‌: -

(क) धारा 6 में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के कार्यान्वयन के लिए प्रक्रिया संबंधी ब्यौरे;

(ख) धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन दावों को प्राप्त करने, उन्हें समेकित करने और उनका सत्यापन करने तथा वन अधिकारों के प्रयोग के लिए सिफारिश किए गए प्रत्येक दावे का क्षेत्र अंकित करते हुए मानचित्र तैयार करने की प्रक्रिया और उस धारा की उपधारा (2) के अधीन उपखंड समिति को याचिका देने की रीति;

 (ग) धारा 6 की उपधारा (8) के अधीन उपखंड स्तर की समिति, जिला स्तर की समिति और राज्य स्तर की मानीटरी समिति के सदस्यों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले राज्य सरकार के राजस्व विभाग, वन विभाग और जनजाति मामले विभाग के अधिकारियों का स्तर;

() धारा 6 की उपधारा (9) के अधीन उपखंड स्तर की समिति, जिला स्तर की समिति और राज्य स्तर की मानीटरी समिति की संरचना और उसके कृत्य तथा उनके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;

(ङ) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्‌, यथाशीघ्र, संसद्‌ के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के स्तर के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो वह नियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्‌ वह नियम, यथास्थिति, केवल ऐसे उपांतरित रूप में ही प्रभावी होगा या निष्प्रभाव हो जाएगा; तथापि, ऐसे किसी परिवर्तन या निष्प्रभाव होने से उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

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