भारतीय विवाह विषयक वाद (युद्ध विवाह)
अधिनियम, 1948
(1948 का अधिनियम संख्यांक 40)
[3 सितम्बर, 1948]
कुछ विवाह विषयक वादों में न्यायालयों पर
अस्थायी अधिकारिता प्रदत्त
करने के लिए
अधिनियम
कुछ विवाह विषयक वादों में ॥। न्यायालयों को अस्थायी अधिकारिता प्रदत्त करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय विवाह विषयक वाद (युद्ध विवाह) अधिनियम, 1948 है ।
(2) इसका विस्तार [उन राज्यक्षेत्रों] के सिवाय संपूर्ण भारत पर है, 3[तो 1 नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे] ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो
(क) उच्च न्यायालय" का वही अर्थ होगा, जो भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 (1869 का 4) में है;
(ख) विवाह" के अन्तर्गत कोई ऐसा तात्पर्यित विवाह है जो आरम्भ में ही शून्य था और पति" और पत्नी" का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(ग) युद्ध-अवधि" से ऐसी अवधि अभिप्रेत है, जो 1939 के सितम्बर के तीसरे दिन को प्रारम्भ होती है और 1946 के मार्च के इक्तीसवें दिन समाप्त होती है ।
3. अधिनियम का लागू होना-वे विवाह, जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है, ऐसे विवाह हैं जो युद्ध-अवधि के दौरान अनुष्ठापित हुए हैं और जिसमें विवाह के समय पति भारत के बाहर अधिवसित था और पत्नी विवाह के ठीक पूर्व भारत में अधिवसित थी:
परन्तु यह अधिनियम किसी ऐसे विवाह को लागू नहीं होगा, यदि उसके अनुष्ठापित होने के पश्चात् से उसके पक्षकार उस देश में एकत्र निवास करते थे जहां उस निवास के समय पति अधिवसित था ।
स्पष्टीकरण-उपर्युक्त परन्तु के प्रयोजनों के लिए, संपूर्ण यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका, संपूर्ण यूनाइटेड किंगडम और ॥। संपूर्ण ब्रिटिश कब्जाधीन क्षेत्र में से प्रत्येक को एक देश के रूप में माना जाएगा ।
4. उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अस्थायी विस्तार-किसी ऐसे विवाह के सम्बन्ध में, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, उच्च न्यायालय को विवाह-विच्छेद या विवाह की अकृतता के लिए किन्हीं कार्यवाहियों में या उसके सम्बन्ध में अधिकारिता होगी मानो दोनों पक्षकार ऐसे सभी सारवान् समय पर भारत में अधिवसित थे ; और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 (1869 का 4) के उपबन्ध यावत्साध्य इस अधिनियम के अधीन संस्थित किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों के संबंध में लागू होंगे, मानो वे उस अधिनियम के अधीन संस्थित कार्यवाहियां हैं :
परन्तु यह धारा विवाह-विच्छेद के या विवाह की अकृतता के लिए किन्हीं कार्यवाहियों के सम्बन्ध में तब तक लागू नहीं होगी जब तक
(क) याचिकादाता अथवा प्रत्यर्थी क्रिश्चियन धर्म नहीं मानते है; और
(ख) विवाह-विच्छेद या विवाह की अकृतता के लिए कार्यवाहियां इस अधिनियम के प्रारम्भ में तीन वर्ष के अपश्चात् प्रारम्भ नहीं की जाती हैं ।
5. व्यावृत्ति-इस अधिनियम की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह विवाह-विच्छेद या विवाह की अकृतता के लिए किन्हीं कार्यवाहियों में या उनके संबंध में उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार करती है या उसमें परिवर्तन करती है यदि उन कार्यवाहियों के प्रारम्भ पर पक्षकार भारत में कहीं भी अधिवसित हैं ।
6. कुछ डिक्रियों और आदेशों को मान्यता देना-मेट्रिमोनियल काज़ेज (वार मैरिज़ेस) ऐक्ट, 1944 (जा० 6 का 7 और 8, अ० 43) के आधार पर यूनाइटेड किंगडम में दी गई किसी डिक्री या आदेश की विधिमान्यता इस अधिनियम के आधार पर भारत के राज्यों के न्यायालयों में मान्य होगी ।
7. नियम बनाने की शक्ति-इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के लिए उच्च न्यायालय ऐसे नियम बना सकेगा, जो आवश्यक हों ।
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