युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) अधिनियम, 1943
(1943 का अधिनियम संख्यांक 23)
[2 सितम्बर, 1943]
उन कर्मकारों को, जिन्हें कोई युद्ध क्षति हुई है, प्रतिकर संदाय
करने का दायित्व नियोजकों पर अधिरोपित करने तथा
नियोजकों के ऐसे दायित्व के लिए बीमे का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि उन कर्मकारों को, जिन्हें कोई युद्ध क्षति हुई है, प्रतिकर संदाय करने का दायित्व नियोजकों पर अधिरोपित किया जाए और नियोजकों के ऐसे दायित्व के लिए बीमे का उपबन्ध किया जाए;
अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) अधिनियम,1943 है ।
1[(2) इसका विस्तार, 2[उन राज्यक्षत्रों के] सिवाय, 2[जो 1 नवम्बर, 1956 के ठीक पूर्व भाग-ख राज्यों में समाविष्ट थे] ।
(3) यह उस तारीख3 को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो, -
(क) “वयस्क" और “अप्राप्तवय" के वही अर्थ होंगे जो कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) में हैं;
(ख) “नियोजक" के अन्तर्गत कोई व्यक्ति-निकाय, चाहे वह निगमित हो या नहीं, और नियोजक का कोई प्रबन्ध-अभिकर्ता और मृत नियोजक का विधिक प्रतिनिधि आता है, और जबकि कर्मकार की सेवाएं, उस व्यक्ति द्वारा, जिसके साथ कर्मकार ने सेवा या शिक्षुता की कोई संविदा की है, अस्थायी तौर पर उधार दी गई हैं या भाड़े पर दी गई हैं वहां नियोजक" से जब तक वह कर्मकार उस अन्य व्यक्ति के लिए काम करता रहता है पश्चात् कथित व्यक्ति अभिप्रेत है;
(ग) “निधि" से धारा 11 के अधीन गठित युद्ध क्षति प्रतिकर बीमा निधि अभिप्रेत है;
(घ) “अभिलाभपूर्वक लगे हुए व्यक्ति" या युद्ध क्षति" से वही अर्थ होंगे जो युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941(1941 का 7) में उनके हैं;
(ङ) “आंशिक निःशक्तता" से, जहां वह निःशक्तता अस्थायी प्रकार की है वहां, ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है, जिससे कर्मकार की उस नियोजन में उपार्जन सामर्थ्य कम हो जाती है, जिसमें वह उस समय, जब क्षति हुई, लगा हुआ था, और जहां कि निःशक्तता स्थायी प्रकार की है वहां, ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है, जिससे किसी भी ऐसे नियोजन में उसकी उपार्जन-सामर्थ्य कम हो जाती है जिसे ग्रहण करने के लिए वह उस समय समर्थ था:
परन्तु 1[प्रथम अनुसूची] की मद 2 से मद 9 तक में विनिर्दिष्ट हर एक क्षति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके परिणामस्वरूप स्थायी आंशिक निःशक्तता होती है;
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 भाग-ख राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 16 नवम्बर, 1943, देखें भारत का राजपत्र, 1943, भाग 1, पृ० 1258.
(च) “विहित" से धारा 20 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
2[(चच) “वर्तमान संघर्ष की समाप्ति" से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसे केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख घोषित करे जिसको उक्त संघर्ष समाप्त हुआ था;]
(छ) “पूर्ण निःशक्तता" से ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है, चाहे वह अस्थायी प्रकार की हो या स्थायी प्रकार की, जो किसी कर्मकार को ऐसे सब काम के लिए असमर्थ कर देती है, जिसे वह उस समय, जब ऐसी क्षति हुई थी, करने में समर्थ था:
परन्तु दोनों आंखों की दृष्टि का स्थायी पूर्ण हानि के बारे में, या 4[प्रथम अनुसूची] की मद 1 में विनिर्दिष्ट किसी क्षति के बारे में या 4[प्रथम अनुसूची] की मद 2 से मद 9 तक में विनिर्दिष्ट क्षतियों के किसी समुच्चय के बारे में, वहां जहां निःशक्तता का संकलिल प्रतिशत जो उस अनुसूची में उन क्षतियों के सामने विनिर्दिष्ट है सौ प्रतिशत होता है, यह समझा जाएगा कि उसके परिणामस्वरूप स्थायी पूर्ण निःशक्तता हुई है;
(ज) “स्कीम" से धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट युद्ध क्षति प्रतिकर बीमा स्कीम अभिप्रेत है;
(झ) “मजदूरी" से कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) में परिभाषित मजदूरी अभिप्रेत है, और “मासिक मजदूरी" का वही अर्थ है जो इस पद को कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) की धारा 5 में दिया गया है और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए इसकी संगणना उस रीति से की जाएगी जो उस धारा में अधिकथित है;
(ञ) “कर्मकार" से (उस व्यक्ति से भिन्न जिसका नियोजन आकस्मिक प्रकार का है और जो नियोजकों के व्यवसाय या कारबार के प्रयोजनों के लिए नियोजित होने से अन्यथा नियोजित है) कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 6 में विनिर्दिष्ट नियोजनों में से किसी में नियोजित है ।
3. अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर किसके द्वारा और कैसे संदेय होगा-(1) उन शर्तों के अधीन रहते हुए, जो स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाएं, अभिलाभपूर्वक लगे हुए व्यक्ति को, जो ऐसा कर्मकार है, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941 (1941 का 7) के अधीन उपबन्धित किसी अनुतोष के अतिरिक्त, नियोजक द्वारा वह प्रतिकर संदेय होगा जिसकी रकम और किस्म धारा 5 में उपबन्धित है:
परन्तु जहां किसी नियोजक ने धारा 9 की उपधारा (1) में यथा अपेक्षित कोई बीमा पालिसी ली हुई है और उस पर प्रीमियम के रूप में सब संदाय, जो तत्पश्चात् उसके द्वारा देय हों, स्कीम के उपबन्धों के अनुसार कर दिए हैं, अथवा जहां 3[धारा 9 की उपधारा (1) के या] धारा 12 की उपधारा (2) के उपबन्धों के द्वारा नियोजक से बीमा कराने की अपेक्षा नहीं की गई है वहां केन्द्रीय सरकार नियोजक की ओर से इस उपधारा के अधीन प्रतिकर देने के नियोजक के दायित्व को ग्रहण करेगी और उसका निर्वहन करेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर स्कीम में इस निमित्त किए गए उपबन्धों के अनुसार संदेय होगा ।
(3) यह धारा सरकार पर आबद्धकर होगी ।
4. इस अधिनियम के और 1941 के अध्यादेश 7 के अधीन प्रतिकर प्राप्त करने से अन्यथा प्राप्त करने के अधिकार पर परिसीमा-जहां किसी व्यक्ति को, किसी ऐसी युद्ध क्षति की बाबत, जिसकी बाबत प्रतिकर इस अधिनियम के अधीन संदेय है, नियोजक से इस अधिनियम के और युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941 (1941 का 7) के उपबन्धों के अलावा प्रतिकर (चाहे वह उपदान, पेंशन,अनुकम्पा-संदाय के रूप में हो या अन्यथा), अथवा नुकसानी प्राप्त करने का अधिकार है वहां इस अधिनियम का विस्तार ऐसे प्रतिकर या नुकसानी के केवल उतने भाग तक होगा जितना इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम से अधिक है ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 2 द्वारा अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1945 (1945 का 41) की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1945 (1945 का 41) की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
5. प्रतिकर की रकम-(1) इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर इस प्रकार होगा, -
(क) जहां क्षति के परिणामस्वरूप मृत्यु हो जाती है वहां-
(i) वयस्क की दशा में-वैसे ही मामले में कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन संदेय रकम में से सात सौ बीस रुपए घटाकर शेष रकम, और
(ii) अप्राप्तवय की दशा में-दो सौ रुपए;
(ख) जहां क्षति के परिणामस्वरूप स्थायी पूर्ण निःशक्तता हो जाती है वहां, -
(i) वयस्क की दशा में-वैसे ही मामले में कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन संदेय रकम में से एक हजार आठ रुपए घटाकर शेष रकम, और
(ii) अप्राप्तवय की दशा में-वैसे ही मामले में युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941 (1941 का 7) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन वयस्क को संदेय मासिक संदाय, जब तक कि वह अप्राप्तवय रहता है, और तत्पश्चात् पूर्वगामी उपखंड के अनुसार;
(ग) जहां क्षति के परिणामस्वरूप स्थायी आंशिक निःशक्तता हो जाती है वहां-
(i) ऐसी क्षति की दशा में 1[प्रथम अनुसूची] में विनिर्दिष्ट है-उस प्रतिकर का, जो स्थायी पूर्ण निःशक्तता की दशा में संदेय होता, उतना प्रतिशत जितना निःशक्तता के प्रतिशत के रूप में उसमें विनिर्दिष्ट है,
(ii) ऐसी क्षति की दशा में जो 2[प्रथम अनुसूची] में विनिर्दिष्ट नहीं है-उस प्रतिकर का ऐसी निःशक्तता के लिए 2[प्रथम अनुसूची] में विनिर्दिष्ट प्रतिशत जो युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941 (1941 का 7) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन कार्य कर रहे सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा तत्समान को]ि की ठहराई जाए,
(iii)) जहां एक से अधिक क्षतियां होती हैं वहां-उन क्षतियों की बाबत संदेय कुल प्रतिकर, किन्तु यह प्रतिकर किसी भी दशा में उस प्रतिकर से अधिक न होगा जो उसे तब संदेय होता तब उन क्षतियों के परिणामस्वरूप स्थायी पूर्ण निःशक्तता हो गई होती;
(घ) जहां क्षति के परिणामस्वरूप, चाहे पूर्ण, चाहे आंशिक, अस्थायी निःशक्तता हो जाती है, वहां-
(i) वयस्क की दशा में-वैसे ही मामले के कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन संदेय अर्धमासिक संदाय, किन्तु प्रत्येक मामले में जब तक वह युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941 (1941 का 7) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन संदाय प्राप्त करता रहे तब तक सात रुपए घटाकर शेष रकम, और
(ii) अप्राप्तवय की दशा में-वैसे ही मामले में कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन संदेय अर्धमासिक संदाय, जब तक कि वह अप्राप्तव्य रहता है और तत्पश्चात् पूर्वगामी उपखंड के अनुसार ।
(2) जहां कर्मकार की मासिक मजदूरी तीन सौ रुपए से अधिक है वहां इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर वह रकम होगी जो उस कर्मकार की दशा में, जिसकी मासिक मजदूरी दो सौ रुपए से अधिक है, उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन संदेय है ।
6. कर्मकार, जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है-वे कर्मकार, जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है, निम्नलिखित है: -
(क) किसी ऐसे नियोजन या नियोजन-वर्ग में नियोजित कर्मकार, जिसके बारे में आवश्यक सेवा (अनुरक्षण) अध्यादेश, 1941 (1941 का 11) की धारा 3 के अधीन यह घोषित किया गया है कि उस पर वह अध्यादेश लागू होगा, चाहे ऐसी घोषणा बाद में प्रतिसंहृत की गई हो या न की गई हो;
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 4 द्वारा अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(ख) 1[कारखाना अधिनियम, 1934 (1934 का 25)] की धारा 2 के खंड (ञ) में परिभाषित किसी कारखाने में नियोजित
कर्मकार;
(ग) 2[भारतीय खान अधिनियम, 1923 (1923 का 4)] के अर्थ में किसी खान में नियोजित कर्मकार;
(घ) किसी महापत्तन में नियोजित कर्मकार;
(ङ) किसी ऐसी सम्पदा में नियोजित कर्मकार, जो सिनकोना, काफी, रबड़ या चाय के उत्पादन के लिए चलाई जाती है और जिस पर पूर्वगामी बारह मासों में किसी एक दिन पच्चीस या उससे अधिक व्यक्ति कर्मकार के रूप में नियोजित किए गए हैं;
(च) केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट किसी नियोजन में नियोजित कर्मकार ।
7. युद्ध क्षति प्रतिकर बीमा स्कीम-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक स्कीम प्रवर्तन में लाएगी, जो युद्ध प्रतिकर बीमा स्कीम3 कहलाएगी । इस स्कीम द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सब बातों के लिए उपबन्ध किया जाएगा और केंद्रीय सरकार, उन कर्मकारों के नियोजकों के संबंध में जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है, इस अधिनियम के और स्कीम के अधीन उन नियोजकों द्वारा कर्मकारों के प्रति ऐसे नियोजकों का उपगत दायित्वों के लिए बीमा करने का जिम्मा लेगी ।
(2) स्कीम यह सुनिश्चित करेगी कि केन्द्रीय सरकार का स्कीम के अधीन बीमाकर्ता के रूप में कोई भी दायित्व केन्द्रीय सरकार की ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा विहित प्ररूप में जारी की गई बीमा पालिसी द्वारा अवधारित किया जाएगा ।
(3) स्कीम यह उपबन्ध कर सकेगी कि वह उस तारीख को, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, प्रवर्तन में आएगी या प्रवर्तन में आ गई समझी जाएगी ।
(4) स्कीम, केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी भी समय संशोधित की जा सकेगी ।
(5) उपधारा (1) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, स्कीम, -
(क) इस अधिनियम और स्कीम के अधीन संदेय प्रतिकर के संदाय को विनियमित करने के लिए उपबन्ध कर सकेगी, जिनके अन्तर्गत स्कीम की किसी भी अपेक्षा के उल्लंघन के लिए जुर्माने से जो एक हजार रुपए से अधिक न होगा, दण्डित किए जाने का उपबन्ध भी है;
(ख) इस अधिनियम के अधीन संदाय किए जाने के लिए अनुपात और रीति और व्यक्ति विनिर्दिष्ट करते हुए उपबन्ध कर सकेगी;
(ग) इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर के लिए कर्मकार को हक से वंचित करने के लिए शर्तें या परिस्थितियां विनिर्दिष्ट कर सकेगी और स्कीम के अधीन दी गई किसी बीमा पालिसी के लिए अभिव्यक्त या विवक्षित शर्त रख सकेगी कि उक्त विनिर्देश की अवज्ञा करने पर प्रतिकर का संदाय पालिसी के अन्तर्गत नहीं माना जाएगा ।
(घ) ऐसी शर्तें या परिस्थितियां विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जिनके अधीन कर्मकार को संदेय प्रतिकर को रोका या घटाया जा सकता है अथवा रद्द किया जा सकता है यदि युद्ध क्षति अध्यादेश, 1941 (1941 का 7) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन अधिनिर्णय को रोका या घटाया अथवा रद्द या पुनर्विलोकित किया जाता है;
(ङ) उन दशाओं का उपबन्ध कर सकेगी, जिनमें किसी नियोजक ने इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित पूरे दायित्व का या उसके किसी भाग का जिम्मा स्वेच्छा से ले लिया है;
- अब कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) देखें ।
- अब खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) देखें ।
- देखें भारत का राजपत्र, 1943 भाग 1, पृ० 1359.
(च) स्कीम के अधीन किसी बीमा पालिसी पर शोध्य कुल प्रीमीयम का अन्तिम निर्धारण 1[या तो नियोजक द्वारा पहले ही दिए जा चुके प्रीमियम के सब अग्रिम संदायों के समतुल्य के रूप में, या नियोजक द्वारा दिए गए किन्हीं अग्रिम संदायों की रकम जिन अवधियों के संबंध में नियत की गई थी उनके लिए नियोजक के कुल मजदूरी बिलों के प्रतिशत के रूप में या] वर्तमान संघर्ष की समाप्ति के ठीक पूर्ववर्ती बारह से अन्यून या पन्द्रह से अनधिक मास की अवधि के लिए नियोजक के लिए कुल मजदूरी बिलों के प्रतिशत के रूप में किए जाने का उपबन्ध कर सकेगी, और किसी ऐसी पालिसी पर देय कुल प्रीमियम के निर्धारण के लिए उपबन्ध कर सकेगी जिसका प्रवृत्त रहना वर्तमान संघर्ष की समाप्ति के पूर्व ही इस कारण समाप्त हो गया हो कि नियोजक ने कारबार छोड़ दिया है;
(छ) किसी बीमा पालिसी पर शोध्य कुल प्रीमियम की किसी नियोजक से वसूली के लिए उपबन्ध कर सकेगी, जिसके अन्तर्गत किसी विहित अवधि के लिए उसके कुल मजदूरी बिलों के प्रतिशत पर आधारित रकम के कालिक अग्रिम संदायों के रूप में उसकी वसूली के, प्रत्येक नियोजक द्वारा ऐसे किए गए संदायों के अलग-अलग निधियों में रखे जाने के और अन्तिम रूप से निर्धारित कुल प्रीमियम का ऐसे कालिक संदायों के योग में अन्ततः समायोजन के उपबन्ध भी हैं:
1[परन्तु जहां विहित अवधि के कुल मजदूरी बिलों पर आधारित कालिक संदाय की रकम आठ रुपए से कम है वहां उसे बढ़ा कर आठ रुपए कर दिया जाएगा:]
परन्तु यह 1[और] कि ऐसे कालिक संदायों में से प्रथम संदाय 1[आठ रुपए के पूर्वोक्त न्यूनतम के अधीन रहते हुए,] उतनी रकम का होगा जितनी उस अवधि के लिए, जिसके प्रति निर्देश से संदाय की रकम नियत की गई है, मजदूरी बिल के प्रति एक सौ रुपए पर चार आने से अनधिक के बराबर हो:
परन्तु यह और कि ऐसे कालिक संदाय वर्ष की प्रत्येक तिमाही में एक से अधिक बार नहीं होंगे:
परन्तु यह और कि प्रथम कालिक संदाय के पश्चात् किसी कालिक संदाय की दर, 1[आठ रुपए के पूर्वोक्त न्यूनतम के अधीन रहते हुए,] उस दर से अधिक नहीं होगी, जो उन अग्रिम धनों के, यदि कोई हों, जो धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा निधि में जमा किए गए हैं, प्रतिसंदाय के पश्चात्, निधि की रकम को पन्द्रह लाख रुपए तक बढ़ाने के लिए प्राक्कलित है ।
8. केन्द्रीय सरकार द्वारा अभिकर्ताओं का नियोजन-केन्द्रीय सरकार, किसी व्यक्ति या फर्म का, इस अधिनियम के किन्हीं प्रयोजनों के लिए अपने अभिकर्ताओं के रूप में कार्य करने के लिए, नियोजन कर सकेगी या ऐसा नियोजन प्राधिकृत कर सकेगी, और इस प्रकार नियोजित व्यक्तियों या फर्मों को उतना पारिश्रमिक दे सकेगी जितना केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
9. अनिवार्य बीमा-(1) 2[जिस नियोजक का इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात्, किसी भी तिमाही के लिए कुल मजदूरी बिल कभी भी पन्द्रह सौ रुपए से अधिक नहीं हुआ है, उसके सिवाय,] कर्मकारों का प्रत्येक नियोजक, जिसे यह अधिनियम लागू होता है या बाद में लागू किया जाता है, उस तारीख से पूर्व जो विहित की जाए, या उसके प्रथम बार ऐसा नियोजक बनने के पश्चात् उस अवधि के अवसान के पूर्व, जो विहित की जाए, स्क्रीम के अनुसार जारी कि गई एक बीमा पालिसी लेगा जिससे कि उसका वर्तमान संघर्ष की समाप्ति तक के लिए या वर्तमान संघर्ष की समाप्ति से पूर्व की किसी तारीख तक के लिए, यदि कोई हो, जिसको कि वह ऐसा नियोजक नहीं रह जाता, जिसे यह लागू होती है, उन सब दायित्वों के लिए बीमा हो जाए जो उस पर इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित है ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 6 द्वारा अंतःस्थापित ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा या उस उपधारा द्वारा अपेक्षित बीमा पालिसी लेकर उस पर प्रीमियम के रूप में ऐसा संदाय करने में, जो स्कीम के उपबन्धों के अनुसार उसके द्वारा तत्पश्चात् शोध्य हो, असफल रहेगा, वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और ऐसी दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन या अननुपालन जारी रहता है, अतिरिक्त जुर्माने से भी दण्डनीय होगा जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा ।
(3) यह धारा सरकार को और जब तक कि केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अन्यथा आदेश न दे, किसी 1[रेल प्रशासन] को आबद्धकर नहीं होगी ।
10. कुछ बीमा कारबार का प्रतिषेध-(1) उस तारीख के पश्चात्, जिसको स्कीम प्रवृत्त की जाती है, उस व्यक्ति के सिवाय जिसे केन्द्रीय सरकार ने स्कीम के अनुसरण में पालिसियां जारी करने के लिए अपने अभिकर्ता के रूप में प्राधिकृत किया है, 2[उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है,] नियोजकों का उन दायित्वों के लिए बीमा करने का कारबार नहीं करेगा, जिनके बीमे का उपबन्ध स्कीम में है ।
(2) उपधारा (1) की कोई भी बात किसी ऐसी बीमा पालिसी को, जो उस तारीख के पहले ली गई है, जिसको स्कीम प्रवर्तन में लाई जाती है और उस तारीख के पश्चात् चालू रहती है, अथवा किसी ऐसी बीमा पालिसी को, जो ऐसे दायित्वों के बारे में हो, जो इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित दायित्वों से अधिक है, लागू नहीं होगी ।
(3) जो कोई उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा वह जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा, और यदि प्रथम दिन के पश्चात् उल्लंघन जारी रहता है, तो प्रत्येक दिन के लिए अतिरिक्त जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
11. युद्ध क्षति प्रतिकर बीमा निधि-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक निधि की स्थापना करेगी जो युद्ध क्षति प्रतिकर बीमा निधि कहलाएगी, इस निधि में स्कीम के अधीन बीमा प्रीमियमों के रूप में, अथवा धारा 17 के अधीन 3[या उसकी तत्स्थानी विधि के 1[जो भारत के किसी ऐसे भाग में, जहां इस अधिनियम का विस्तार नहीं है,] या द्वितीय अनुसूची में दिए गए राज्यक्षेत्रों में (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् प्रशासित क्षेत्र कहा गया है) प्रवृत्त हो,] किसी उपबन्ध के अधीन, अपराधों के शमन पर किए गए संदायों के रूप में, अथवा इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित किसी जुर्माने में से न्यायालय द्वारा 4दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 545 के अधीन दिलवाए गए व्यय या प्रतिकर के रूप में, अथवा स्कीम के अधीन अधिरोपित शास्तियों के रूप में केंद्रीय सरकार द्वारा प्राप्त सभी राशियां जमा की जाएंगी, और इसमें से वे सब राशियां प्रदत्त की जाएंगी जो केंद्रीय सरकार द्वारा, इस अधिनियम या स्कीम के अधीन के अपने दायित्व के निर्वहन के लिए अथवा स्कीम के प्रयोजनों के लिए नियोजित अभिकर्ताओं के पारिश्रमिक और व्यय के केन्द्रीय सरकार द्वारा संदाय के लिए, अथवा स्कीम के प्रशासन-खर्च के केन्द्रीय सरकार द्वारा संदाय के लिए अपेक्षित हों :
परन्तु सरकार के किसी दायित्व के निर्वहन में सरकार द्वारा नियोजित कर्मकारों को प्रतिकर का संदाय करने के लिए निधि में से कोई भी संदाय नहीं किया जाएगा ।
(2) यदि निधि में जमा राशि किसी समय उस राशि से कम हो जाती है जो निधि के प्रयोजनों के पर्याप्त निवर्हन के लिए उस समय आवश्यक है तो केन्द्रीय सरकार साधारण राजस्व में से अग्रिम धन के रूप में उतनी रकम निधि में देगी जितने केन्द्रीय सरकार आवश्यक समझे ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा फेडरल रेलवे के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा पूर्ववर्ती शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित ।
- अब सुसंगत उपबंधों के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) देखें ।
(3) यदि निधि में से किए जाने वाले सभी संदायों के चुकाए जाने पर निधि में कोई अतिशेष रह जाता है तो उस अतिशेष से एक ऐसी निधि बनाई जाएगी जिसे केन्द्रीय सरकार कर्मकारों के लाभ के लिए प्रयुक्त और प्रशासित करेगी ।
(4) केन्द्रीय सरकार निधि में प्राप्त और उसमें से संदत्त सभी राशियों का लेखा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से तैयार करेगी, जो विहित की जाए, और हर छह मास के पश्चात् उसे प्रकाशित करेगी ।
12. मालिक और ठेकेदार-(1) जहां कोई व्यक्ति (जिसे इस धारा में मालिक कहा गया है), अपने व्यापार या कारबार के अनुक्रम में या उसके प्रयोजनों के लिए, उन कर्मकारों की सेवाओं का उपयोग करता है, जिनकी सेवाएं अस्थायी रूप से उसे उधार या भाड़े पर किसी अन्य ऐसे व्यक्ति के साथ ठहराव द्वारा दी गई है, जिससे कि उन कर्मकारों ने सेवा या शिक्षुता की संविदाएं की हैं, अथवा अपने व्यापार या कारबार के अनुक्रम में या उसके प्रयोजनों के लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ उस अन्य व्यक्ति द्वारा या उसके अधीन किसी ऐसे सम्पूर्ण कार्य या उसके किसी भाग के निष्पादन के लिए संविदा करता है जो मामूली तौर पर मालिक के व्यापार या कारबार का भाग है (जिन ऐसे दोनों अन्य व्यक्तियों को इस धारा में ठेकेदार कहा गया है) वहां मालिक ठेकेदार से धारा 8 के अधीन कार्य करने वाले केन्द्रीय सरकार के उस अभिकर्ता का नाम प्राप्त करेगा जिससे उसका बीमा कराने का आशय है और अभिकर्ता को यह रिपोर्ट देगा कि उसका ठेकेदार के साथ कोई ठहराव या संविदा विद्यमान है ।
(2) इस अधिनियम में अन्यत्र किसी बात के होते हुए भी किसी ऐसे मामले में जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, उन कर्मकारों की बाबत, जो उसके द्वारा नियोजित है और जिनकी सेवाएं ऐसे ठहराव पर उधार दी गई हैं या भाड़े पर दी गई हैं या ऐसी संविदा पर कार्य के निष्पादन में प्रयोग की गई हैं जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, जहां कि ठहराव या संविदा एक मास की अवधि से कम के लिए है, ठेकेदार के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित दायित्व के लिए बीमा करे ।
(3) स्कीम में किसी ठेकेदार द्वारा किसी मालिक को ऐसी कोई जानकारी देने के लिए, जो इस धारा के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने को समर्थ बनाने के लिए आवश्यक है, उपबन्ध हो सकेगा, जिसके अंतर्गत स्कीम की किसी अपेक्षा के उल्लंघन के लिए एक हजार रुपए से अनधिक के जुर्माने के दंड का उपबन्ध भी है ।
13. जानकारी प्राप्त करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ कि इस अधिनियम तथा स्कीम की अपेक्षाओं का पालन किया गया है या नहीं, किसी नियोजक से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसे लेखे, बहियां या अन्य दस्तावेजें प्रस्तुत करे या उसे ऐसी जानकारी या ऐसे प्रमाणपत्र दे, जिन्हें वह उचित रूप से आवश्यक समझे ।
(2) जो कोई, इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा उसकी शक्तियों के प्रयोग में जानबूझकर बाधा डालेगा या उसके अधीन किए गए किसी अनुरोध का अनुपालन करने में उचित कारण के बिना असफल रहेगा, वह, ऐसे प्रत्येक अवसर के लिए जब ऐसी कोई बाधा या असफल होती है, जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(3) जो कोई, इस धारा के अधीन अपनी बाध्यताओं के तात्पर्यित अनुपालन में जानबूझकर या अन्धाधुन्ध ऐसा कथन करेगा जिसमें कोई तात्त्विक बात मिथ्या हो, वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
14. असंदत्त प्रीमियम की वसूली-(1) धारा 9 की उपधारा (2) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जहां कोई व्यक्ति इस अधिनियम और स्कीम द्वारा अपेक्षित रूप में या अपेक्षित पूरी रकम तक का बीमा कराने में असफल रहा है और इस प्रकार उसने किसी ऐसे धन के प्रीमियम के तौर पर संदाय का अपवंचन किया है जिसका संदाय उसे, ऐसी असफलता के प्रभाव में, स्कीम के उपबन्धों के अनुसार करना पड़ता वहां केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अधिकारी वह रकम अवधारित कर सकेगा जिसके संदाय का इस प्रकार अपवंचन किया गया है, और इस प्रकार अवधारित रकम उस व्यक्ति द्वारा संदेय होगी तथा उपधारा (2) में उपबन्धित रूप से उससे वसूल की जा सकेगी ।
(2) स्कीम के अधीन जारी की गई किसी बीमा पालिसी पर प्रीमियम के रूप में स्कीम के उपबन्धों के अनुसार संदेय कोई राशि तथा उपधारा (1) के अधीन संदेय अवधारित की गई कोई रकम भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।
(3) कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन अवधारण किया गया है, विहित अवधि के भीतर, उस अवधारण के विरुद्ध केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा, जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
15. जहां नियोजक बीमा कराने में असफल रहा है वहां प्रतिकर का संदाय-जहां कोई नियोजक धारा 9 की उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित बीमा पालिसी लेने से असफल रहा है, या उस उपधारा द्वारा अपेक्षित बीमा पालिसी लेने के पश्चात् उस पर प्रीमियम के रूप में ऐसे संदाय करने में असफल रहा है जो तत्पश्चात् स्कीम के उपबन्धों के अनुसार उसके द्वारा देय हैं वहां ऐसे किसी प्रतिकर का संदाय निधि में से किया जा सकेगा जिसके संदाय के लिए वह इस अधिनियम के अधीन जिम्मेदार है, और इस प्रकार संदत्त राशि, ऐसी संदत्त राशि से अनधिक उतनी रकम की शास्ति सहित, जितनी केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा अवधारित की जाए, उस निधि में जमा की जाने के लिए नियोजक से भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।
16. अभियोजनों पर निबन्धन-इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए, किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई अभियोजन केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसकी सहमति या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी प्राधिकारी द्वारा या उसकी सहमति से ही संस्थित किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
17. अपराधों का शमन-धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, या तो अभियोजन संस्थित करने से पूर्व या उसके पश्चात्, केन्द्रीय सरकार द्वारा अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी प्राधिकारी द्वारा शमन, ऐसी किसी धनराशि के, जिसे, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या वह प्राधिकारी ठीक समझे, निधि में जमा करने के लिए संदाय कर दिए जाने पर, किया जा सकेगा ।
18. विधिक कार्यवाहियों का वर्जन-(1) कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन ली गई या ली गई तात्पर्यित किसी बीमा पालिसी पर प्रीमियम के रूप में संदत्त की गई तात्पर्यित किसी धनराशि के प्रतिदाय के लिए केन्द्रीय सरकार या धारा 8 के अधीन उसके अभिकर्ता के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद नहीं चलाया जा सकेगा ।
19. नियोजकों को छूट देने की शक्ति-यदि किसी नियोजक के अनुरोध पर केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि उसने इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व बीमाकर्ताओं के साथ ऐसी कोई संविदा की है कि जिसके अन्तर्गत इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित दायित्व सारतः आ जाते हैं तो वह उसे तब तक के लिए, जब तक ऐसी संविदा की जारी रहती है, इस अधिनियम के उपबन्धों से छूट दे सकेगी ।
20. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित विहित किए जा सकेंगे, -
(क) किसी नियोजक का कुल मजदूरी बिल अभिनिश्चित करने में अनुसरण में किए जाने वाले सिद्धांत, जिनके अन्तर्गत कुछ को]ियों की मजदूरी के या कुछ तत्त्वों के, जो मजदूरी की परिभाषा के अन्तर्गत हैं, उससे अपवर्जित करने के लिए उपबन्ध भी हैं;
(ख) धारा 7 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट बीमा पालिसियों के प्ररूप;
(ग) धारा 7 की उपधारा (5) के खंड (छ) में निर्दिष्ट अवधि;
2। । । । । । ।
(ङ) धारा 9 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट तारीख और अवधि;
(च) धारा 11 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट लेखे का प्ररूप, तथा उसे तैयार और प्रकाशित करने की रीति;
(छ) धारा 14 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधियां ।
- भारत का राजपत्र, 1943, भाग 1, पृ० 1369, देखें ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 8 द्वारा खण्ड (घ) निरसित ।
1[(3) इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात्, केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
21. स्कीम का भारतीय राज्यों को लागू होना-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि 2[भारत के किसी ऐसे भाग की, जिस पर इस अधिनियम का विस्तार नहीं है,] 3[या प्रशासित क्षेत्रों] की विधि द्वारा ऐसा उपबन्ध किया गया है जो सारतः इस अधिनियम द्वारा किए गए ऐसे उपबन्ध के समान है, जो नियोजकों पर दायित्व अधिरोपित करता है और उनसे ऐसे दायित्वों के लिए बीमा पालिसियां लेने की अपेक्षा करता है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, घोषित कर सकेगी कि वह धारा 4[ 5[भारत के ऐसे भाग के,] या प्रशासित क्षेत्रों में समाविष्ट राज्यक्षेत्र को लागू होगी] ।
(2) इस धारा के 6[किसी ऐसे राज्यक्षेत्र को] लागू होने पर, इस अधिनियम के अधीन बनाई गई स्कीम का विस्तार 7[उस राज्यक्षेत्र में] नियोजकों के उन्हीं दायित्वों के साथ उसी रीति में, उसी विस्तार तक और उन्हीं शर्तों के अधीन रहते हुए केन्दीय सरकार द्वारा ग्रहण किए जाने के संबंध में वैसे ही लागू होगा मानो वे नियोजक उन 6[राज्यक्षेत्रों मे हों जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है] ।
(3) इस धारा के 7[ऐसे किसी राज्यक्षेत्र को] लागू होने पर, धारा 10 के उपबन्धों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे, स्कीम के अनुसरण में पालिसियां जारी करने के लिए केन्द्रीय सरकार के अभिकर्ता के रूप में उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के सिवाय, किसी व्यक्ति को उस अधिसूचना की तारीख के बाद, जिसके द्वारा यह धारा लागू की गई है, 8[उस राज्यक्षेत्र में] नियोजकों का ऐसे दायित्वों के लिए बीमा करने का कारबार करने से प्रतिषिद्ध करते हैं जिनके बीमे का स्कीम में उपबन्ध है ।
8[प्रथम अनुसूची
[धारा 2 और धारा 5(1) देखिए]
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मद सं० |
क्षति |
निःशक्तता का प्रतिशत
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1. |
दो या अधिक अंगों की हानि, पागलपन, जैक्सोनियना अपस्मार, बहुत गम्भीर चेहरे की विद्रूपता |
100 |
|
2. |
कोहनी से ऊपर या कोहनी पर दाहिनी भुजा की हानि |
90 |
- 2005 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा भाग ख राज्य या भारत में फ्रांसिसी बस्तियां के स्थान पर प्रतिस्थापित । रेखांकित शब्द युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 9 द्वारा अंतःस्थापित किए गए थे ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 9 द्वारा अंतःस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 9 द्वारा उस राज्य के स्थान पर अंतःस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा पूर्ववर्ती शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 9 द्वारा किसी राज्य को शब्दों के स्थान पर अंतःस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 9 द्वारा उस राज्य में के स्थान पर अंतःस्थापित ।
- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 10 द्वारा अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
|
3 |
चेहरे की गम्भीर विद्रूपता, वाक्शक्ति की पूर्ण हानि, कोहनी पर या कोहनी से ऊपर बांई भुजा की हानि, कोहनी से नीचे दाहिनी भुजा की हानि, घुटने पर या घुटने से ऊपर टांग की हानि |
70 |
|
मद सं० |
क्षति |
निःशक्तता का प्रतिशत |
|
4 |
कोहनी से नीचे बांई भुजा की हानि, घुटने से नीचे टांग की हानि, श्रवण शक्ति की स्थायी पूर्ण हानि |
60 |
|
5 |
एक आंख की हानि, दाहिने अंगूठे या दाहिने हाथ की चार अंगुलियों की हानि |
50 |
|
6 |
दोनों पैरों के अंगुलिपर्व के ऊपर की सभी अंगुलियों की हानि, बाएं अंगूठे या बाएं हाथ की चार अंगुलियों या दाहिने हाथ की तीन अंगुलियों की हानि |
40 |
|
7 |
एक पैर के अंगुलिपर्व से ऊपर की सभी अंगुलियों की हानि, दोनों पैरों के अंगुलिपर्व पर या उससे नीचे की सभी अंगुलियों की हानि |
30 |
|
8 |
बिना बेघन वाली क्षति के कारण जोड़ों के संचालन का सीमित निर्बन्धन, अस्थि-भंग से अंग की सीमित क्रिया, किसी भी हाथ की दो अंगुलियों की हानि, किसी भी हाथ के अंगूठे या दो या अधिक अंगुलियों का हासित क्रिया सहित विवृत अस्थि-अंग |
20 |
|
9 |
अंगूठे की एक अंगुल्यस्थि की हानि, तर्जनी अंगुली की हानि, पैर के अंगूठे की हानि |
10] |
1[द्वितीय अनुसूची
[धारा 11(1) देखिए]
1. बड़ौदा छावनी ।
2. पश्चिम भारत राज्य प्रशासित क्षेत्र (विधियों का लागू होना) आदेश, 1937 में विनिर्दिष्ट पश्चिम भारत राज्य एजेन्सी में प्रशासित क्षेत्र ।
3. मध्य भारत प्रशासित क्षेत्र (विधियों का लागू होना) आदेश, 1937 में विनिर्दिष्ट मध्य भारत एजेन्सी में प्रशासित क्षेत्र ।
4. ग्वालियर रेजिडेन्सी क्षेत्र ।
5. आबू जिला ।
6. हैदराबाद प्रशासित क्षेत्र (विधियों का लागू होना) आदेश, 1937 में विनिर्दिष्ट हैदराबाद राज्य में प्रशासित क्षेत्र ।
7. बंगलौर का सिविल और मिलिटरी स्टेशन ।
8. कोल्हापुर रेजिडेन्सी क्षेत्र और वाडी जागीर ।
9. पोलिटिकल डिपार्टमेंन्ट की अधिसूचना सं० 189-आई० बी० और 190-आई० बी० तारीख 8 सितम्बर, 1937 में विनिर्दिष्ट पश्चिम भारत राज्य एजेन्सी में रेलवे की भूमि ।
10. राजपूताना और मध्य भारत रेल भूमि (विधियों का लागू होना) आदेश, 1937 में विनिर्दिष्ट राजपूताना और मध्य भारत रेल भूमि ।
11. पंजाब राज्य रेल भूमि (विधियों का लागू होना) आदेश, 1939 में विनिर्दिष्ट पंजाब राज्य रेल भूमि ।
12. गुजरात राज्य एजेन्सी में रेवा कांठा एजेन्सी में थाना सर्किल और डांग ।
13. मणिपुर में ब्रिटिश रिजर्व ।
14. शिलांग प्रशासित क्षेत्र ।]
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- युद्ध क्षति (प्रतिकर बीमा) संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का 54) की धारा 10 द्वारा अंतःस्थापित ।

