वृत्ति-कर परिसीमा (संशोधन और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1949
(1949 का अधिनियम संख्यांक 61)
[26 दिसम्बर, 1949]
प्रोफेशन्स टैक्स लिमिटेशन ऐक्ट, 1941 का और संशोधन करने
और संयुक्त प्रांत में विभव तथा संपत्ति पर कुछ करों के
अधिरोपण को विधिमान्य करने के लिए
अधिनियम
न्यायालय से यह निर्धारित किया गया है कि यूनाइटेड प्रोविन्सेस डिस्ट्रिक्ट बोर्ड्स ऐक्ट, 1922 (1922 का सं० प्रा० अधिनियम सं० 10) की धारा 108 के खण्ड (ख) के अधीन विभव तथा संपत्ति पर अधिरोपित कर, प्रोफेशन्स टैक्स लिमिटेशन ऐक्ट, 1941 (1941 का 20) की धारा 2 द्वारा वृत्तियों, व्यवसायों, आजीविकाओं या नियोजनों पर कर के बारे में विहित प्रति वर्ष पचास रुपए की परिसीमा के अधीन है;
और नगरपालिका या जिला बोर्डों द्वारा संयुक्त प्रांत में विभव तथा संपत्ति पर अधिरोपित करों का प्रोफंशन्स टैक्स लिमिटेशन ऐक्ट, 1941 (1941 का 20) की धारा 2 के प्रवर्तन से अपवर्जित करने के प्रयोजन के लिए उस अधिनियम का और संशोधन करना और इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व उसके अधिरोपण को विधिमान्य करना समीचीन है;
अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वृत्ति-कर परिसीमा (संशोधन और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1949 है ।
2. [1941 के अधिनियम सं० 20 की अनुसूची का संशोधन ।]-इसका मुद्रण नहीं किया गया है, क्योंकि 1941 का अधिनियम सं० 20 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा निरसित किया गया है ।
3. अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व विभव तथा संपत्ति पर कर के अधिरोपण का विधिमान्यकरण-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी
(i) यूनाइटेड प्रावेन्सेस म्युनिसिपोलिटीज ऐक्ट, 1916 (1961 का सं० प्रा० अधिनियम सं० 2) की धारा 128 की उपधारा (1) के खण्ड (ii) के अधीन या यूनाइटेड प्रोविन्सेस डिस्ट्रिक्ट्स बोर्डस ऐक्ट, 1922 (1922 का सं० प्रा० अधिनियम सं० 10) की धारा 108 के खण्ड (ख) के अधीन इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व विभव तथा संपत्ति पर अधिरोपित कोई भी कर, केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं समझा जाएगा या कभी अविधिमान्य हुआ नहीं जाएगा कि अधिरोपित कर उक्त अधिनियम द्वारा विहित प्रति वर्ष पचास रुपए की परिसीमा से अधिक है और किसी ऐसे कर के अधिरोपण की विधिमान्यता किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जाएगी ; और
(ii) खण्ड (i) में निर्दिष्ट कर के किसी प्रभाग की वापसी के किसी भी दावे को कोई भी न्यायालय केवल इस आधार पर स्वीकार नहीं करेगा कि ऐसा प्रभाग उसमें निर्दिष्ट परिसीमा से अधिक है या उस आधार पर ऐसे कर के किसी प्रभाग की वापसी का निदेश करने वाली किसी डिक्री या आदेश को प्रवर्तित नहीं करेगा ।
4. 1949 के अध्यादेश सं० 17 का निरसन-वृत्ति-कर परिसीमा (संशोधन और विधिमान्यकरण) अध्यादेश, 1949 इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
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