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मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 ( Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 )


 

मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939

(1939 का अधिनियम संख्यांक 8)

[17 मार्च, 1939]

मुस्लिम विधि के अधीन विवाहित स्त्रियों द्वारा विवाह विघटन के

वादों से संबंधित मुस्लिम विधि के उपबन्धों का समेकन

करने और उन्हें स्पष्ट करने, तथा किसी विवाहित

मुसलमान स्त्री द्वारा इस्लाम धर्म के त्याग

के उसके विवाह-बन्धन पर प्रभाव

के बारे में शंकाएं दूर

करने के लिए

अधिनियम

                यह समीचीन है कि मुस्लिम विधि के अधीन विवाहित स्त्रियों द्वारा विवाह विघटन के वादों से सम्बन्धित मुस्लिम विधि के उपबन्धों का समेकन किया जाए और उन्हें स्पष्ट किया जाए तथा किसी विवाहित मुसलमान स्त्री द्वारा इस्लाम धर्म के त्याग के उसके विवाह-बन्धन पर प्रभाव के बारे में शंकाएं दूर की जाएं; अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-

                1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 है । 

(2) इसका विस्तार  [जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय] सम्पूर्ण भारत पर है  । 

2. विवाह-विघटन की डिक्री के लिए आधार-मुस्लिम विधि के अधीन विवाहित स्त्री अपने विवाह के विघटन के लिए निम्नलिखित आधारों में से किसी एक या अधिक आधार पर डिक्री प्राप्त करने की हकदार होगी, अर्थात् :-

(i) चार वर्ष से पति का ठौर-ठिकाना ज्ञात नहीं है; 

(ii) पति ने दो वर्ष तक उसके भरण-पोषण की व्यवस्था करने में उपेक्षा की है या उसमें असफल रहा है; 

(iii) पति को सात वर्ष या उससे अधिक की अवधि के लिए कारावास का दण्ड दिया गया है; 

(iv) पति तीन वर्ष तक अपने वैवाहिक कर्तव्यों का पालन करने में समुचित कारण बिना असफल रहा है; 

(v) पति विवाह के समय नपुंसक था और बराबर नपुंसक रहा है; 

(vi) पति दो वर्ष तक उन्मत्त रहा है या कुष्ठ या उग्र रतिज रोग से पीड़ित है; 

(vii) पन्द्रह वर्ष की आयु प्राप्त होने से पहले ही उसके पिता या अन्य संरक्षक ने उसका विवाह किया था और उसने अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व ही विवाह का निराकरण कर दिया है;

                परन्तु यह तब जब विवाहोत्तर संभोग न हुआ हो; 

(viii) पति उसके साथ क्रूरता से व्यवहार करता है, अर्थात् :-

(क) अभ्यासतः उसे मारता है या क्रूर-आचरण से उसका जीवन दुखी करता है, भले ही ऐसा आचरण शारीरिक दुर्व्यवहार की कोटि में न आता हो, या 

(ख) कुख्यात स्त्रियों की संगति में रहता है या गर्हित जीवन बिताता है, या 

(ग) उसे अनैतिक जीवन बिताने पर मजबूर करने का प्रयत्न करता है, या 

(घ) उसकी सम्पत्ति का व्ययन कर डालता है या उसे उस पर अपने विधिक अधिकारों का प्रयोग करने से रोक देता है, या 

(ङ) धर्म को मानने या धर्म-कर्म के अनुपालन में उसके लिए बाधक होता है, या 

(च) यदि उसकी एक से अधिक पत्नियां हैं तो कुरान के आदेशों के अनुसार उसके साथ समान व्यवहार नहीं करता है; 

(ix) कोई ऐसा अन्य आधार है जो मुस्लिम विधि के अधीन विवाह विघटन के लिए विधिमान्य है :

परन्तु-

(क) आधार (iii) पर तब तक कोई डिक्री पारित नहीं की जाएगी जब तक दण्डादेश अन्तिम न हो गया हो; 

(ख) आधार (i) पर पारित डिक्री, ऐसी डिक्री की तारीख से छह मास तक प्रभावी नहीं होगी और यदि पति या तो स्वयं या किसी प्राधिकृत अभिकर्ता के माध्यम से उस अवधि में हाजिर हो जाता है, और न्यायालय का यह समाधान कर देता है कि वह अपने दाम्पत्य कर्तव्यों का पालन करने के लिए तैयार है, तो न्यायालय उक्त डिक्री को अपास्त कर देगा; और 

(ग) आधार (ध्) पर कोई डिक्री पारित करने के पूर्व न्यायालय, पति द्वारा आवेदन किए जाने पर, ऐसा आदेश करेगा जिसमें पति से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उस आदेश की तारीख से एक वर्ष के भीतर न्यायालय का यह समाधान कर दे कि वह नपुंसक नहीं रह गया है और यदि पति उस अवधि में इस प्रकार न्यायालय का समाधान कर देता है तो उक्त आधार पर कोई भी डिक्री पारित नहीं की जाएगी । 

3. पति के वारिसों पर सूचना की तामील किया जाना जब पति का ठौर-ठिकाना ज्ञात नहीं है-किसी ऐसे वाद में, जिसे धारा 2 का खण्ड (त्) लागू होता है-

(क) ऐसे व्यक्तियों के नाम तथा पते वादपत्र में लिखे जाएंगे जो मुस्लिम विधि के अधीन पति के वारिस होते यदि वादपत्र फाइल करने की तारीख को उसकी मृत्यु हो जाती; 

(ख) वाद की सूचना की तामील ऐसे व्यक्तियों पर की जाएगी; और 

(ग) ऐसे व्यक्तियों को वाद में सुनवाई का अधिकार होगा : 

परन्तु पति के चाचा तथा भाई को, यदि कोई हो, एक पक्षकार के रूप में उल्लिखित किया जाएगा, भले ही वे वारिस न हों ।

4. अन्य धर्म में संपरिवर्तन का प्रभाव-किसी विवाहित मुसलमान स्त्री द्वारा इस्लाम धर्म का त्याग या इस्लाम से भिन्न किसी धर्म में उसका संपरिवर्तन से स्वयंमेव उसके विवाह का विघटन नहीं होगा : 

परन्तु ऐसे त्याग, या संपरिवर्तन के पश्चात्, वह स्त्री धारा 2 में उल्लिखित आधारों में से किसी भी आधार पर अपने विवाह के विघटन के लिए डिक्री प्राप्त करने की हकदार होगी :

परन्तु यह और कि इस धारा के उपबन्ध, किसी अन्य धर्म से इस्लाम धर्म में संपरिवर्तित किसी ऐसी स्त्री को लागू नहीं होंगे, जो अपने भूतपूर्व धर्म का पुनःअंगीकार कर लेती है ।

5. मेहर विषयक अधिकारों पर प्रभाव होना-इस अधिनियम की कोई भी बात विवाहित स्त्री के किसी ऐसे अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी, जो उसके विवाह विघटन पर उसके मेहर या मेहर के किसी भाग के बारे में मुस्लिम विधि के अधीन हो ।

6. [1937 के अधिनियम सं० 26 की धारा 5 का निरसन ।]-निरसन तथा संशोधन अधिनियम, 1942 (1942 का 25) की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।

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