भारतीय बेतार तारयांत्रिकी अधिनियम, 1933
(1933 का अधिनियम संख्यांक 17)1
[11 सितम्बर, 1933]
बेतार तारयांत्रिकी यंत्रों के कब्जे को
विनियमित करने के लिए
अधिनियम
2[भारत में] बेतार तारयांत्रिकी यन्त्रों के कब्जे को विनियमित करना समीचीन है; अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -
प्रारम्भिक
1. संक्षित नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम भारतीय बेतार तारयांत्रिकी अधिनियम, 1933 कहा जा सकेगा ।
3[(2) इसका विस्तार 4॥। सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह उस तारीख5 को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि कोई बात विषय या सन्दर्भ में विरुद्ध न हो-
6[(1) “बेतार संचार" से किसी भी प्रकार के चिह्नों, संकेतों, लेखन, प्रतिबिम्बों और ध्वनियों अथवा आसूचना का विद्युत्, चुम्बकत्व, या रेडियो तरंग अथवा हर्ट्सियन तरंग के माध्यम से कोई प्रेषण, उत्सर्जन या प्राप्ति अभिप्रेत है जो प्रेषक और अभिग्राहिव यंत्र के बीच तारों या अन्य अविरत विद्युत् चालकों के प्रयोग के बिना हो ।
स्पष्टीकरण- “रेडियो तरंग" या “हर्ट्सियन तरंग" से कृत्रिम निदेश के बिना अंतरिक्ष में संचारित 3,000 जीगासाइकिल प्रति सेकिंड से कम आवृत्तियों की विद्युत् चुम्बकीय तरंगें अभिप्रेत हैं;]
(2) “बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र" से बेतार संचार में प्रयुक्त या प्रयोक्तव्य कोई यन्त्र, साधित्र, उपकरण या सामग्री अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत कोई ऐसी वस्तु है जो धारा 10 के अधीन बनाए गए नियम द्वारा बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र होनी अवधारित की गई है किन्तु न तो कोई ऐसा यंत्र, साधित्र, उपकरण या सामग्री जो सामान्यतया अन्य विद्युत प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की जाती है जब तक कि वह बेतार संचार के लिए विशेषतया परिकल्पित या अनुकूलित न हो अथवा विशेषतया इस प्रकार परिकल्पित या अनुकूलित किसी यन्त्र, साधित्र, उपकरण या सामग्री की भाग न हो और न कोई ऐसी वस्तु ही इसके अन्तर्गत है जो धारा 10 के अधीन बनाए गए नियम द्वारा बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र न होनी अवधारित है; 7॥।
8[(2क) बेतार प्रेषक" से बेतार संचार के प्रेषण या उत्सर्जन के लिए प्रयुक्त या प्रयोक्तव्य कोई यन्त्र, साधित्र, उपकरण या सामग्री अभिप्रेत है;]
- यह अधिनियम अधिसूचना सं० का० आ० 2735, तारीख 1-9-1962 द्वारा (1-9-1962 से) गोवा, दमण और दीव को, देखिए भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2, अनुभाग 3(त्त्), पृ० 1991-92; 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली को; 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा (1-10-1963 से) पांडिचेरी को; और 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा (1-10-1967 से) लक्षद्वीप को लागू करने के लिए विस्तारित किया गया ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 2 द्वारा प्रान्तों में के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा जोड़े गए हैदराबाद राज्य को छोड़कर शब्दों का 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 1 जनवरी, 1934, देखिए, भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1933, भाग 1, पृ० 1131.
- 1961 के अधिनियम सं० 15 की धारा 4 द्वारा खंड (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 4 द्वारा और शब्द का लोप किया गया ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित खंड (2क) के स्थान पर 1961 के अधिनियम सं० 15 की धारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(3)” विहित" से धारा 10 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।
3. अनुज्ञप्ति के बिना बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र के कब्जे का प्रतिषेध-धारा 4 द्वारा यथा उपबन्धित को छोड़कर, कोई भी व्यक्ति बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र को कब्जे में इस अधिनियम के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति के अधीन और अनुसार रखने के सिवाय नहीं रखेगा ।
4. अधिनियम के उपबन्धों से व्यक्तियों को छूट देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को या तो साधारणतया या विहित शर्तों के अध्यधीन अथवा विनिर्दिष्ट बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र के सम्बन्ध में इस अधिनियम के उपबन्धों से छूट दे सकेगी ।
5. अनुज्ञप्तियां-भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) के अधीन गठित तार प्राधिकारी, इस अधिनियम के अधीन बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र को कब्जे में रखने की अनुज्ञप्ति देने के लिए सक्षम प्राधिकारी होगा तथा ऐसी रीति में, ऐसी शर्तों पर और ऐसे संदायों के अध्यधीन, जैसे विहित किए जाएं, अनुज्ञप्तियां दे सकेगा ।
6. अपराध और शास्ति-(1) जो कोई 1[बेतार प्रेषक से भिन्न किसी बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र] को धारा 3 के उपबन्धों के उल्लंघन में कब्जे में रखेगा वह प्रथम अपराध की दशा में जुर्माने से, जो एक सौ रुपए तक का हो सकेगा और द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में जुर्माने से, जो दो सौ पचास रुपए तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा ।
2[(1क) जो कोई किसी बेतार प्रेषक को धारा 3 के उपबन्धों के उल्लंघन में कब्जे में रखेगा वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।]
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि किसी व्यक्ति के कब्जे में बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र है यदि ऐसा यन्त्र उसके दृश्यमान भारसाधन में है या किसी ऐसे परिसर अथवा स्थान में स्थित है जिस पर उसका प्रभावी नियन्त्रण है ।
(3) यदि इस धारा के अधीन किसी अपराध के विचारण में अभियुक्त को सिद्धदोष ठहराया जाता है तो न्यायालय विनिश्चित करेगा कि क्या कोई यन्त्र जिसके सम्बन्ध में अपराध किया गया है अधिहृत कर लिया जाना चाहिए और यदि वह वैसा विनिश्चित करता है तो तदनुसार अधिहरण आदिष्ट कर सकेगा ।
3[7. तलाशी की शक्ति-केन्द्रीय सरकार द्वारा तन्निमित्त विशेष रूप से सशक्त4 कोई अधिकारी किसी ऐसे भवन, जलयान या स्थान की तलाशी ले सकेगा, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वहां कोई बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र जिसके सम्बन्ध में धारा 6 के अधीन दण्डनीय कोई अपराध किया गया है, रखा या छिपाया हुआ है, और उसका कब्जा हो सकेगा ।]
8. ऐसे यंत्र का जो अधिकृत किया गया हो या जिसका कोई स्वामी न हो, केन्द्रीय सरकार की सम्पत्ति होना-धारा 6 की उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन अधिहृत सब बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र और सब ऐसे बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र जिनके कोई दृश्यमान स्वामी न हों केन्द्रीय सरकार की सम्पत्ति होंगे ।
9. [विहित प्राधिकारी को जुर्माने का संदाय करने का निदेश करने की न्यायालय की शक्ति ।]-विधि अनुकूलन आदेश, 1937 द्वारा प्रभावहीन किया गया तथा निरसन और संशोधन अधिनियम, 1940 (1940 का 32) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
10 केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए नियम5, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 5 द्वारा बेतार तारयांत्रिकी यंत्र के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 5 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 1949 के अधिनियम सं० 31 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- इस अधिसूचना के लिए, भारत का राजपत्र, 1951, भाग 2, खण्ड 3, पृ० 1910 देखिए ।
- इस धारा के अधीन बनाए गए भारतीय बेतार तारयांत्रिकी (कब्जा) नियम, 1938 के लिए भारत का राजपत्र, 1933, भाग 1, पृ० 1131 देखिए ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-
(i) यह अवधारित करना कि कोई वस्तु या वस्तुओं का वर्ग इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए बेतार तारयांत्रिकी यन्त्र होगा या नहीं होगा;
(ii) व्यक्तियों या व्यक्तियों के वर्गों को इस अधिनियम के उपबन्धों से धारा 4 के अधीन छूटें;
(iii) अनुज्ञप्तियों के दिए जाने, नवीकरण, निलम्बन और रद्दकरण की रीति और उन्हें प्रशासित करने वाली शर्तें, अनुज्ञप्तियों के प्ररूप और अनुज्ञप्तियों के दिए जाने और नवीकरण के लिए किए जाने वाले संदाय;
(iv) बेतार तारयांत्रिकी यंत्रों में व्यवहारियों के कब्जे में के बेतार तारयांत्रिकी यंत्रों के अर्जन और विक्रय द्वारा या अन्यथा व्ययन के ब्यौरे अन्तर्विष्ट करने वाले अभिलेखों को रखना;
(v) बेतार तारयांत्रिकी यन्त्रों में व्यवहारियों और ऐसे यन्त्रों के विनिर्माताओं द्वारा उनके विक्रय को शासित करने वाली शर्तें 1॥। ।
6। । । । ।
(3) इस धारा के अधीन नियम बनाने में केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट कर सकेगी कि उसका भंग जुर्माने से, जो एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
2[(4) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा 3[दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व] दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
11. भारतीय तार अधिनियम, 1885 की व्यावृत्ति-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) के अधीन प्रतिषिद्ध किसी बात का किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी, और इस अधिनियम के अधीन दी गई कोई अनुज्ञप्ति किसी व्यक्ति को ऐसी बात करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी जिसके किए जाने के लिए भारतीय तार अधिनियम, 1885 के अधीन अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा आवश्यक है ।
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- 1940 के अधिनियम सं० 32 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा और शब्द और खण्ड (ध्त्) लोप किए गए ।
- 1961 के अधिनियम सं० 15 की धारा 5 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 1986 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-5-1986 से) प्रतिस्थापित ।

