पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001
(2001 का अधिनियम संख्यांक 53)
[30 अक्तूबर, 2001]
पौधा किस्म, कृषकों और पौधा संवर्धकों के अधिकारों के संरक्षण
के लिए प्रभावी प्रणाली स्थापित करने और पोधों की
नई किस्मों के विकास को प्रोत्साहित
करने हेतु उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
यह आवश्यक समझा जाता है कि कृषकों के, नई पौधा किस्मों के विकास के लिए पौधा आनुवंशिक साधनों के संरक्षण, सुधार और उनको उपलब्ध कराने में किसी भी समय किए गए उनके योगदान के संबंध में अधिकारों को मान्यता दी जाए और उनका संरक्षण किया जाए;
और देश में त्वरित कृषि विकास के लिए यह आवश्यक है कि नई पौधा किस्मों के विकास के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों ही सेक्टरों में अनुसंधान और विकास के लिए विनिधान को प्रोत्साहित करने हेतु पौधा संवर्धकों के अधिकारों का संरक्षण किया जाए;
और ऐसे संरक्षण से देश में बीज उद्योग की वृद्धि सुकर होगी जिससे कृषकों को उच्च क्वालिटी के बीज और पौधा रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित होगी;
और पूर्वोक्त उद्देश्यों को प्रभावी बनाने के लिए कृषकों और पौधा संवर्धकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए उपाय करना आवश्यक है;
और भारत, जिसने बैद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं से संबंधित करार का अनुसमर्थन कर दिया है, अन्य बातों के साथ-साथ, पौधा किस्मों के संरक्षण से संबंधित उक्त करार के भाग 2 के अनुच्छेद 27 के उपपैरा (ख) को प्रभावी बनाने के लिए उपबंध करता है;
भारत गणराज्य के बावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) प्राधिकरण" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण अभिप्रेत है;
(ख) किसी किस्म के संबंध में, फायदे में हिस्सा बटाना" से अभिप्रेत है फायदे का ऐसा अनुपात जो ऐसी किस्म के संवर्धक को प्रोद्भूत हुआ है या फायदे का ऐसा अनुपात जो संवर्धक को, यथास्थिति, ऐसी किस्म के अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी से प्रोद्भूत हुआ है जिसके लिए कोई दावेदार धारा 26 के अधीन प्राधिकरण द्वारा अवधारित रूप में हकदार होगा;
(ग) प्रजनक" से ऐसा कोई व्यक्ति या व्यक्ति-समूह या कोई कृषक या कृषक-समूह या ऐसी कोई संस्था अभिप्रेत है जिसने किसी किस्म का प्रजनन, क्रम-विकास या विकास किया है;
(घ) अध्यक्ष" से अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ङ) अध्यक्ष" से धारा 3 की उपधारा (5) के खंड (क) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(च) अभिसमय देश" से ऐसा देश अभिप्रेत है जिसने पौधे की किस्मों के संरक्षण के लिए किसी अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय को अंगीकार कर लिया है जिसे भारत ने भी अंगीकार किया है या ऐसा देश जिसमें पौधे की किस्मों के संरक्षण संबंधी कोई विधि है जिसके आधार पर भारत ने दोनों देशों के नागरिकों को पौधा प्रजनक अधिकार प्रदान करने के लिए करार किया है;
(छ) किसी किस्म य उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री के संबंध में अभिधान" से, किसी भाषा में लिखित अक्षरों या अक्षरों और अंकों के समुच्चय द्वारा अभिव्यक्त, यथास्थिति, उसकी किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री का अभिधान अभिप्रेत है;
(ज) आवश्यक लक्षण" से किसी पौधा-किस्म की ऐसी वंशागत विशेषताएं अभिप्रेत हैं जो ऐसे अन्य वंशागत अवधारकों के किसी एक या अधिक जीनों की अभिव्यंजना द्वारा अवधारित की जाती हैं, जो पौधें की किस्म के मुख्य लक्षणों, क्रिया या उपयोगिता में सहायक होते हैं;
(झ) किसी किस्म (प्रारंभिक किस्म) के संबंध में, अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म" ऐसी प्रारंभिक किस्म से अनिवार्यतः व्युत्पन्न कही जाएगी जब वह-
(i) प्रधानतः ऐसी प्रारंभिक किस्म से, या किसी ऐसी किस्म से व्युत्पन्न की जाती है जो प्रधानतः स्वयं, ऐसी प्रारंभिक किस्म से, उन आवश्यक लक्षणों की अभिव्यंजना को बनाए रखते हुए, जो किसी ऐसी प्रारंभिक किस्म की समजीनी या समजीनियों के संयोजन का परिणाम है, व्युत्पन्न की जाती है;
(ii) ऐसी प्रारंभिक किस्म से स्पष्ट रूप से विभेद्य है; और
(iii) उन आवश्यक लक्षणों की अभिव्यंजना में ऐसी प्रारंभिक किस्म के अनुरूप है (उन भिन्नताओं के सिवाय जो व्युत्पन्न के कार्य के परिणाम हैं) जो ऐसी प्रारंभिक किस्म की समजीनी या समजीनियों के संयोजन का परिणाम है;
(ञ) विद्यमान किस्म" से भारत में उपलब्ध ऐसी किस्म अभिप्रेत है, जो, -
(i) बीज अधिनियम, 1966 (1966 का 54) की धारा 5 के अधीन अधिसूचित है; या
(ii) कृषक किस्म है; या
(iii) ऐसी किस्म है जिसके बारे में सामान्य ज्ञान है; या
(iv) कोई अन्य किस्म है जो सार्वजनिक क्षेत्र में है;
(ट) कृषक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो, -
(i) स्वयं भूमि की जुताई करके फसलों की खेती करता है; या
(ii) किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से भूमि की जुताई का सीधे पर्यवेक्षण करते हुए फसलों की खेती करता है; या
(iii) जंगली जातियों या परंपरागत किस्मों का पृथक्तः या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्ततः संरक्षण और परिरक्षण करता है या ऐसी जंगली जातियों या परंपरागत किस्मों के मूल्य में, उनके लाभकारी गुणधर्मों के चयन और उनकी पहचान द्वारा वृद्धि करता है;
(ठ) कृषक किस्म" से ऐसी किस्म अभिप्रेत है जो, -
(i) कृषकों द्वारा अपने खेतों में परम्परागत रूप से जोती जाती है और विकसित की जाती है; या
(ii) जंगली जाति की है या किसी किस्म की भूमिप्रजाति है जिसके बारे में कृषक सामान्य ज्ञान रखता है;
(ड) जीन निधि" से धारा 45 की उपधारा (1) के अधीन गठित राष्ट्रीय जीन निधि अभिप्रेत है;
(ढ) न्यायिक सदस्य" से धारा 55 की उपधारा (1) के अधीन इस रूप में नियुक्त अधिकरण का कोई सदस्य अभिप्रेत है;
(ण) सदस्य" से अधिकरण का न्यायिक सदस्य या तकनीकी सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है ;
(त) सदस्य" से धारा 3 की उपधारा (5) के खंड (ख) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत सदस्य सचिव भी है;
(थ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(द) प्रवर्धन सामग्री" से कोई पौधा या उसका घटक या उसका कोई भाग अभिप्रेत है जिसके अन्तर्गत ऐसा आशयित बीज या ऐसा बीज है जो पौधे के रूप में पुनरुत्पादन के लिए समर्थ या उपयुक्त है;
(ध) रजिस्टर" से धारा 13 में निर्दिष्ट राष्ट्रीय पौधा किस्म रजिस्टर अभिप्रेत है;
(न) रजिस्ट्रार" से धारा 12 की उपधारा (4) के अधीन नियुक्त पौधा किस्म रजिस्ट्रार अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत महारजिस्ट्रार है;
(प) महारजिस्ट्रार" से 12 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त पौधा किस्म महारजिस्ट्रार अभिप्रेत है;
(फ) रजिस्ट्री" से धारा 12 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट पौधा किस्म रजिस्ट्री अभिप्रेत है;
(ब) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;
(भ) बीज" से जीवित भ्रूण या प्रवर्ध्य की ऐसी कोई किस्म अभिप्रेत है जो पुनरुत्पादन में समर्थ हो और ऐसे पौधे को जन्म दे सके जो वस्तुतः उसी प्रकार का हो;
(म) अधिकरण" से धारा 54 के अधीन स्थापित पौधा किस्म संरक्षण अपील अधिकरण अभिप्रेत है;
(य) तकनीकी सदस्य" से अधिकरण का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जो न्यायिक सदस्य नहीं है;
(यक) किस्म" से निम्नतम ज्ञात रैंक के एकल वनस्पतिक वर्ग के भीतर आने वाले सूक्ष्म जीवाणु के सिवाय पौधे का समूह अभिप्रेत है, जो-
(i) उन लक्षणों की अभिव्यंजना द्वारा परिभाषित किया जा सकता है जो उस पौधा समूह को दी गई समजीनी का परिणाम है
(ii) उक्त मूल लक्षणों के कम से कम एक लक्षण की अभिव्यंजना द्वारा किसी अन्य पौधा समूह से विभक्त किया जा सकता है; और
(iii) प्रवर्धन करने के लिए, जो ऐसे प्रवर्धन के पश्चात् अपरिवर्तित रहता है, उसकी उपयुक्तता के संबंध में एक इकाई के रूप में माना जा सकता है,
और इसके अन्तर्गत ऐसी किस्म विद्यमान किस्म, ट्रांसजीनी किस्म, कृषक किस्म, और अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म की प्रवर्धन सामग्री भी है ।
अध्याय 2
पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण तथा रजिस्ट्री
पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण
3. प्राधिकरण की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण के नाम से ज्ञात एक प्राधिकरण की स्थापना करेगी ।
(2) प्राधिकरण पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और जिसे जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा वह उक्त नाम से वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) प्राधिकरण का प्रधान कार्यालय ऐसे स्थान पर होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे और प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से भारत में अन्य स्थानों पर शाखा कार्यालय स्थापित कर सकेगा ।
(4) प्राधिकरण अध्यक्ष और पन्द्रह सदस्यों से मिलकर बनेगा ।
(5) (क) अध्यक्ष, केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा जो, पौधा किस्म अनुसंधान या कृषि विकास क्षेत्र में विशेष रूप से उस सरकार के समाधानप्रद रूप में उत्कृष्ट रूप से योग्य और विख्यात व्यक्ति तथा दीर्घ व्यावहारिक अनुभव वाला होगा ।
(ख) प्राधिकरण के सदस्य, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, निम्न प्रकार होंगे, अर्थात्: -
(i) कृषि आयुक्त, भारत सरकार, कृषि और सहकारिता विभाग, नई दिल्ली, पदेन;
(ii) उपमहानिदेशक फसल विज्ञान भारसाधक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली, पदेन;
(iii) संयुक्त सचिव, बीज भारसाधक, भारत सरकार कृषि और सहकारिता विभाग, नई दिल्ली, पदेन;
(iv) उद्यान कृषि आयुक्त, भारत सरकार, कृषि और सहकारिता विभाग, नई दिल्ली, पदेन;
(v) निदेशक, राष्ट्रीय पौधा आनुवंशिक संपदा ब्यूरो, नई दिल्ली, पदेन;
(vi) भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सदस्य, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, पदेन;
(vii) भारत सरकार के पर्यावरण और वन से संबंधित मामलों के मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सदस्य, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, पदेन;
(viii) भारत सरकार के विधि, न्याय और कंपनी कार्य मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सदस्य, जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, पदेन;
(ix) किसी राष्ट्रीय या राज्य स्तर के कृषक संगठन से एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(x) किसी जनजातीय संगठन से एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(xi) बीज उद्योग से एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(xii) किसी कृषि विश्वविद्यालय से एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(xiii) कृषि क्रियाकलापों से सहयोजित किसी राष्ट्रीय या राज्य स्तर के महिला संगठनों से एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(xiv) चक्रानुक्रम के आधार पर राज्य सरकार के दो प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे;
(ग) महारजिस्ट्रार, प्राधिकरण का पदेन सदस्य-सचिव होगा ।
(6) अध्यक्ष की पदावधि और पद को भरने की रीति वह होगी जो विहित की जाए ।
(7) अध्यक्ष, पांच सदस्यों की एक स्थायी समिति नियुक्त करेगा जिनमें से एक सदस्य, ऐसा होगा जो कृषकों के अधिकारों सहित सभी मुद्दों पर प्राधिकरण को सलाह देने के लिए किसी कृषक संगठन का प्रतिनिधि होगा ।
(8) अध्यक्ष ऐसे वेतन और भत्तों का हकदार होगा और छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि तथा अन्य विषयों से संबंधित सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होगा जो विहित की जाएं । प्राधिकरण के अधिवेशन में उपस्थित होने के लिए किन्हीं गैर-सरकारी सदस्यों के भत्ते वे होंगे जो विहित किए जाएं ।
(9) अध्यक्ष केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में त्यागपत्र की सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्यागपत्र स्वीकार किए जाने पर यह समझा जाएगा कि उसने पद रिक्त कर दिया है ।
(10) अध्यक्ष द्वारा त्यागपत्र दिए जाने या किसी कारण से अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर, केन्द्रीय सरकार, सदस्यों में से किसी एक सदस्य को अध्यक्ष के रूप में, उपधारा (5) के खंड (क) के अनुसार नियमित अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक, कार्यवहन करने के लिए नियुक्त कर सकेगी ।
4. प्राधिकरण के अधिवेशन-(1) प्राधिकरण ऐसे समय और स्थान पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में [जिसके अन्तर्गत उसके अधिवेशनों में गणपूर्ति और धारा 3 की उपधारा (7) के अधीन नियुक्त उसकी स्थायी समिति के कारबार का संव्यवहार भी है] कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगा, जो विहित किए जाएं ।
(2) प्राधिकरण का अध्यक्ष, प्राधिकरण के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा ।
(3) यदि किसी कारण अध्यक्ष प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उपस्थिति होने में असमर्थ हो तो प्राधिकरण का ऐसा कोई सदस्य, जो अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया हो, अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(4) ऐसी सभी प्रश्नों का, जो अधिकरण के किसी अधिवेशन के समक्ष आते हैं, विनिश्चय अधिकरण के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में प्राधिकरण के अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में, अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का दूसरा या निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।
(5) प्रत्येक सदस्य, जो किसी भी रूप में चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से या वैयक्तिक रूप से किसी मामले में, जो अधिवेशन में विनिश्चित किया जाना है, संबद्ध है या हितबद्ध है, अपने सरोकर या हित की प्रकृति को प्रकट करेगा और ऐसे प्रकटीकरण के पश्चात् सदस्य, जो संबद्ध या हितबद्ध है, उस अधिवेशन में हाजिर नहीं होगा ।
(6) प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण से ही अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
(ख) प्राधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में कार्यरत किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है ; या
(ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में ऐसी कोई अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।
5. प्राधिकरण की समितियां-(1) प्राधिकरण, ऐसी समितियां नियुक्त कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन उसके कर्तव्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन और उसके कृत्यों के अनुपालन के लिए आवश्यक हों ।
(2) उपधारा (1) के अधीन समिति के सदस्यों के रूप में नियुक्त व्यक्ति, समिति के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए ऐसे भत्ते और फीस प्राप्त करने के हकदार होंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियत किए जाएं ।
6. प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी-ऐसे नियंत्रण और निर्बन्धन के अधीन रहते हुए जो विहित किए जाएं प्राधिकरण ऐसे अन्य अधिकारी और अन्य कर्मचारी नियुक्त कर सकेगा, जो उसके कृत्यों के दक्षतापूर्ण अनुपालन के लिए आवश्यक हों और प्राधिकरण के ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति की रीति, वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।
7. अध्यक्ष का मुख्य कार्यपालन होना-अध्यक्ष प्राधिकरण का मुख्य कार्यपालक होगा और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं ।
8. प्राधिकरण के साधारण कृत्य-(1) प्राधिकरण का यह कर्तव्य होगा कि, वह ऐसे अध्युपायों द्वारा, जिन्हें वह ठीक समझे, पौधों की नई किस्मों के प्रोत्साहन और विकास का संप्रवर्तन करे और पौधों की उन किस्मों के संबंध में कृषकों और प्रजनकों के अधिकारों का संरक्षण करे ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अध्युपाय निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे-
(क) ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए और ऐसी रीति में जो विहित की जाए, पौधों की विद्यमान किस्मों का रजिस्ट्रीकरण;
(ख) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्मों का विकास, स्वरूप और प्रलेखीकरण;
(ग) कृषकों की किस्मों का प्रलेखीकरण, अनुक्रमणिका बनाना और सूचीकरण करना;
(घ) पौधों की सभी किस्मों के लिए अनिवार्य सूचीकरण सुविधाएं;
(ङ) यह सुनिश्चित करना कि कृषकों को इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्मों के बीज उपलब्ध हों और यदि ऐसी किस्मों के संवर्धक या इस अधिनियम के अधीन ऐसी किस्म का उत्पादन करने का हकदार कोई अन्य व्यक्ति, बीजों के उत्पादन और विक्रय की व्यवस्था ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, नहीं करता है तो ऐसी किस्मों के अनिवार्य अनुज्ञापन के लिए उपबंध करना;
(च) संकलन और प्रकाशन के लिए पौधा किस्मों के संबंध में, जिनके अन्तर्गत भारत में या किसी अन्य देश में किसी पौधा किस्म के क्रमिक विकास या परिवर्धन में किसी समय किसी व्यक्ति का योगदान भी है, आंकड़े एकत्रित करना;
(छ) रजिस्टर के अनुरक्षण को सुनिश्चित करना ।
9. प्राधिकरण के आदेशों आदि का प्राधिकृत किया जाना-प्राधिकरण के सभी आदेश और विनिश्चय, अध्यक्ष या इस निमित्त प्राधिकरण द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर द्वारा प्राधिकृतकिए जाएंगे ।
10. प्रत्यायोजन-प्राधिकरण, लिखित रूप से साधारण या विशेष आदेश द्वारा प्राधिकरण के अध्यक्ष, किसी सदस्य या अधिकारी को ऐसी शर्तों या परिसीमाओं के अधीन, यदि कोई हों, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को (धारा 94 के अधीन विनियम बनाने की शक्ति के सिवाय) प्रत्योजित कर सकेगा जो वह आवश्यक समझे ।
11. प्राधिकरण की शक्ति-इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के समक्ष सभी कार्यवाहियों में, -
(क) यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार को साक्ष्य प्राप्त करने, शपथ दिलाने, साक्षियों को उपस्थित कराने, दस्तावेजों की तलाशी कराने और उन्हें प्रस्तुत कराने तथा साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालने के प्रयोजनों के लिए किसी सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी;
(ख) प्राधिकरण या रजिस्ट्रार, इस अधिनियम के अधीन इस निमित्त बनाए गए किसी नियम के अधीन रहते हुए, लागत के बारे में ऐसे आदेश कर सकेगा जो वह युक्तियुक्त समझे और कोई ऐसा आदेश किसी सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होगा ।
रजिस्ट्री
12. रजिस्ट्री और उसके कार्यालय-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पौधा किस्म रजिस्ट्री के नाम से एक रजिस्ट्री स्थापित करेगी ।
(2) पौधा किस्म रजिस्ट्री का प्रधान कार्यालय प्राधिकरण के प्रधान कार्यालय में अवस्थित होगा और पौधा किस्मों में रजिस्ट्रीकरण को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए, ऐसे स्थानों पर जिन्हें प्राधिकरण ठीक समझे, रजिस्ट्री के शाखा कार्यालय स्थापित किए जा सकेंगे ।
(3) प्राधिकरण पौधा किस्मों का एक महारजिस्ट्रार नियुक्त करेगा जो ऐसे वेतन और भत्तों का हकदार होगा और छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि और ऐसे ही अन्य मामलों के संबंध में सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होगा, जो विहित की जाएं ।
(4) प्राधिकरण इस अधिनियम के अधीन महारजिस्ट्रार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन पौधा किस्मों के रजिस्ट्रीकरण के लिए उतने रजिस्ट्रार नियुक्त कर सकेगा जो वह आवश्यक समझे और उनके कर्तव्यों और अधिकारिता के संबंध में विनियम बना सकेगा ।
(5) रजिस्ट्रारों की पदावधि और सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं ।
(6) प्राधिकरण, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उन राज्यक्षेत्रीय सीमाओं को परिभाषित कर सकेगा जिनके भीतर रजिस्ट्री का कोई शाखा कार्यालय अपने कृत्यों का प्रयोग कर सकेगा ।
(7) पौधा किस्म रजिस्ट्री की एक मुद्रा होगी ।
13. राष्ट्रीय पौधा किस्म रजिस्टर-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राष्ट्रीय पौधा किस्म रजिस्टर के नाम से ज्ञात एक रजिस्टर रजिस्ट्री के प्रधान कार्यालय में रखा जाएगा जिसमें सभी रजिस्ट्रीकृत पौधा किस्मों के नाम उनके अपने-अपने प्रजनकों के नामों और पतों सहित, रजिस्ट्रीकृत किस्मों के संबंध में ऐसे संवर्धकों के अधिकार, प्रत्येक रजिस्ट्रीकरण किस्म के अभिधान की विशिष्टियां, उसके बीज या उसके प्रमुख लक्षण के विनिर्देश के साथ अन्य प्रर्वधन सामग्री और अन्य विषय जो विहित किए जाएं, प्रविष्ट किए जाएंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन रजिस्टर, प्राधिकरण के नियंत्रण और प्रबंध के अधीन रखा जाएगा
(3) रजिस्ट्री के प्रत्येक शाखा कार्यालय में रजिस्टर की एक प्रति और ऐसे अन्य दस्तावेज, जिनका केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे, रखे जाएंगे ।
अध्याय 3
पौधा किस्मों और अनिवार्य रूप से व्युत्पन्न किस्मों का रजिस्ट्रीकरण
रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन
14. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन-धारा 16 में विनिर्दिष्ट कोई व्यक्ति किसी ऐसी किस्म के-
(क) जो ऐसे जीन और जातियों की हैं जो धारा 29 की उपधारा (2) के अधीन विनिर्दिष्ट हैं; या
(ख) जो कोई विद्यमान किस्म है; या
(ग) जो कृषक किस्म है, रजिस्ट्रीकरण के लिए रजिस्ट्रार को आवेदन कर सकेगा ।
15. रजिस्ट्रीकरण योग्य किस्म-(1) इस अधिनियम के अधीन नई किस्म तभी रजिस्टर की जाएगी यदि वह विलक्षणता, सुभिन्नता, एकरूपता और स्थिरता की कसौटी के अनुरूप है ।
(2) उपधारा (1) में अतंर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई वर्तमान किस्म इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर रजिस्टर नहीं की जाएगी यदि वह सुभिन्नता, एकरूपता और स्थिरता के ऐसे मानदंड के अनुरूप न हो जो विनियमों के अधीन विनिर्दिष्ट किए जाएंगे ।
(3) यथास्थिति, उपधारा (1) और उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए नई किस्म, -
(क) विलक्षण सामग्री समझी यदि संरक्षण के लिए रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख को ऐसी किस्म के उपयोग के प्रयोजनों के लिए उसके प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी द्वारा या उसकी सहमति से ऐसी किस्म की प्रवर्धन या फसल सामग्री का विक्रय या अन्यथा व्ययन-
(i) भारत में, एक वर्ष से पूर्व; या
(ii) भारत के बाहर वृक्षों या लताओं के मामले में छह वर्ष से पूर्व या किसी अन्य मामले में चार वर्ष से पूर्व,
ऐसा आवेदन फाइल करने की तारीख से पूर्व, नहीं किया गया है:
परन्तु ऐसी किसी नई किस्म का परीक्षण, जिसका विक्रय या अन्यथा व्ययन नहीं हुआ है, संरक्षण के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा:
परन्तु यह और कि यह तथ्य कि रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख को ऐसी किस्म की प्रवर्धन या फसल सामग्री, पूर्वोक्त रीति के माध्यम से भिन्न सामान्य ज्ञान की बात हो गई है, ऐसी किस्म के लिए विलक्षणता की कसौटी को प्रभावित नहीं करेगी;
(ख) सुभिन्न समझी जाएगी यदि वह किसी अन्य ऐसी किस्म से, जिसकी विद्यमानता आवेदन फाइल करने के समय किसी देश में सामान्य बात है, कम से कम एक आवश्यक लक्षण द्वारा स्पष्ट रूप से सुभेद्य है ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं के निराकरण के लिए, यह घोषित किया जाता है कि किसी नई किस्म के लिए प्रजनक के अधिकार को मंजूर करने के लिए या किसी अभिसमय देश में ऐसी किस्म को शासकीय रजिस्टर में प्रविष्ट करने के लिए किसी आवेदन का फाइल करना उस किस्म को आवेदन की तारीख से सामान्य ज्ञान की बात होना समझा जाएगा यदि आवेदन से, यथास्थिति, संवर्धक का अधिकार मंजूर हो जाता है या ऐसी किस्म को ऐसे शासकीय रजिस्टर में प्रविष्ट कर दिया जाता है;
(ग) एकरूप समझी जाएगी यदि वह ऐसे फेरफार के अधीन रहते हुए जिसकी उसके प्रवर्धन के विशिष्ट लक्षणों से प्रत्याशा की जाती है अपने आवश्यक लक्षणों में पर्याप्त रूप से एकरूप है;
(घ) स्थिर समझी जाएगी यदि उसके आवश्यक लक्षण बार-बार के प्रवर्धन के पश्चात् या प्रवर्धन के विशिष्ट चक्र के मामले में ऐसे प्रत्येक चक्र के अंत में, अपरिवर्तित रहते हैं ।
(4) कोई नई किस्म इस अधिनियम के अधीन रजिस्टर नहीं होगी यदि ऐसी किस्म को दिया गया अभिधान-
(i) ऐसी किस्म की पहचान कराने में समर्थ नहीं है; या
(ii) मात्र आंकड़े समाविष्ट करता है; या
(iii) ऐसी किस्म के लक्षणों, मूल्य पहचान या ऐसी किस्म के प्रजनक की पहचान के संबंध में भुलावा देने वाला या भ्रम पैदा करने वाला है; या
(iv) ऐसे किसी भी अभिधान से भिन्न नहीं है जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत वैसी ही वनस्पति जातियों या घनिष्ठ रूप से संबंधित जातियों की किसी किस्म को अभिहित करता है; या
(v) ऐसी किस्म की पहचान के संबंध में जनता में प्रवंचना या भ्रम पैदा होने की संभावना है; या
(vi) भारत के नागरिकों के क्रमशः किसी वर्ग या प्रवर्ग की धार्मिक भावनाओं को क्षति पहुंचने की संभावना है; या
(vii) संप्रतीक और नाम (अनुसूचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950 (1950 का 12) की धारा 3 में वर्णित प्रयोजनों में से किसी के लिए कोई नाम या संप्रतीक के रूप में उपयोग के लिए प्रतिषिद्ध है; या
(viii) पूर्णतः या भागतः कोई भौगोलिक नाम है:
परन्तु रजिस्ट्रार ऐसी किस्म को रजिस्टर कर सकेगा जिसके अभिधान में पूर्णतः या भागतः भौगोलिक नाम समाविष्ट है यदि वह ऐसी किस्म के संबंध में ऐसे अभिधान के उपयोग का, उस मामले की परिस्थितियों में, सद्भावी उपयोग समझता है
16. व्यक्ति जो आवेदन कर सकते हैं-(1) धारा 14 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन निम्नलिखित द्वारा किया जाएगा-
(क) किस्म का प्रजनक होने का दावा करने वाला व्यक्ति; या
(ख) किस्म के प्रजनक का कोई उत्तराधिकारी; या
(ग) ऐसा व्यक्ति जो ऐसा आवेदन करने के अधिकार के संबंध में किस्म के प्रजनक का समनुदेशिती है; या
(घ) किस्म के संवर्धक के रूप में दावा करने वाला कोई कृषक या कृषकों का समूह या कृषकों का समुदाय;
(ङ) कोई व्यक्ति जो खंड (क) से खंड (घ) में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा उसकी ओर से आवेदन करने के लिए, विहित रीति में, प्राधिकृत किया गया है;
(च) कोई विश्वविद्यालय या सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित कृषि संस्था जो उस किस्म का प्रजनक होने का दावा कर रही है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन उसमें निर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी के द्वारा वैयक्तिक रूप से या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से किया जा सकेगा ।
17. अनिवार्य किस्म अभिधान-(1) प्रत्येक आवेदक ऐसी किसी किस्म को, जिसके संबंध में वह इस अधिनियम के अधीन विनियमों के अनुसार रजिस्ट्रीकरण की वांछा करता है, एक या भिन्न अभिधान समनुदेशित करेगा ।
(2) प्राधिकरण, किसी ऐसे अन्तरराष्ट्रीय अभिसमय या संधि के, जिसमें भारत एक पक्षकार बन गया है, उपबंधों पर विचार करके किसी पौधा किस्म को अभिधान के समनुदेशन को शासित करने के लिए विनियम बनाएगी ।
(3) जहां किस्म का समनुदेशित अभिधान, विनियमों में विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता है वहां रजिस्ट्रार आवेदक से, ऐसे समय के भीतर जो ऐसे विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, कोई दूसरा अभिधान प्रस्तावित करने की अपेक्षा कर सकेगा ।
(4) व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (1999 का 47) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी किस्म को समनुदेशित अभिधान उस अधिनियम के अधीन व्यापार चिह्न के रूप में रजिस्टर नहीं किया जाएगा ।
18. आवेदन का प्ररूप-(1) धारा 14 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन-
(क) किसी किस्म के संबंध में होगा;
(ख) आवेदक द्वारा ऐसी किस्म को समनुदेशित अभिधान का कथन करेगा;
(ग) आवेदक के इस शपथ पत्र के साथ होगा कि ऐसी किस्म में, कोई जीन या जीन अनुक्रम जिसमें समापक प्रौद्योगिकी है, अन्तर्विष्ट नहीं है;
(घ) ऐसे प्ररूप में होगा जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए;
(ङ) उस मूल उद्गम का होगा जिससे ऐसी किस्म व्युत्पन्न की गई है और भारत में भौगोलिक अवस्थान का, जहां से आनुवंशिक सामग्री ली गई है संपूर्ण पासपोर्ट डाटा और उस किस्म के प्रजनन, क्रम विकास या विकास करने में किसी कृषक, ग्राम समुदाय, संस्था या संगठन का योगदान, यदि कोई है, से संबंधित सभी ऐसी जानकारी, अन्तर्विष्ट करेगा;
(च) विवरण के साथ होगा जिसमें ऐसी किस्म का संक्षिप्त ब्यौरा होगा जिससे उसकी विलक्षणता, सुभिन्नता, एकरूपता और स्थिरता संबंधी अभिलक्षण जो रजिस्ट्रीकरण के लिए अपेक्षित हैं, प्रकट हों;
(छ) ऐसी फीस के साथ होगा जो विहित की जाए;
(ज) ऐसी घोषणा के साथ होगा कि किस्म का संवर्धन, क्रम विकास या विकास करने के लिए अर्जित आनुवंशिक सामग्री या मूल सामग्री विधिपूर्वक अर्जित की गई है; और
(झ) ऐसी अन्य विशिष्टियों सहित होगा, जो विहित की जाएं;
परन्तु उस दशा में, जिसमें आवेदन कृषक की किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए है खंड (ख) से खंड (झ) में अंतर्विष्ट कोई बात आवदेन की बाबत लागू नहीं होगी और आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा, जो विहित किया जाए ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक आवेदन रजिस्ट्रार के कार्यालय में फाइल किया जाएगा ।
(3) जहां ऐसा आवेदन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने के अधिकार के उत्तराधिकार या समनुदेशन के आधार पर किया गया है वहां आवेदन करने के समय या आवेदन करने के पश्चात् ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, आवेदन करने के अधिकार का सबूत प्रस्तुत किया जाएगा ।
19. किए जाने वाले परीक्षण-(1) प्रत्येक आवेदक, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन के साथ रजिस्ट्रार को ऐसी किस्म के, जिसके रजिस्ट्रीकरण के लिए ऐसा आवेदन किया गया है, बीज की ऐसी मात्रा, यह मूल्यांकन करने का परीक्षण करने के प्रयोजन के लिए, उपलब्ध कराएगा कि ऐसी किस्म मूल सामग्री के साथ उन मानकों के अनुरूप है जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं:
परन्तु रजिस्ट्रार या कोई व्यक्ति या परीक्षण केन्द्र जिसे ऐसा बीज परीक्षण के लिए भेजा गया है, ऐसे बीज को अपने कब्जे के दौरान ऐसी रीति और ऐसी दशा में रखेगा जिससे उसकी जीवन क्षमता और क्वालिटी अपरिवर्तित बनी रहे ।
(2) आवेदक उपधारा (1) में निर्दिष्ट परीक्षण करने के लिए ऐसी फीस जमा करेगा जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट परीक्षण ऐसी रीति से और ऐसे ढंग से किया जाएगा जो विहित किया जाए ।
20. आवेदन या उसके संशोधन की स्वीकृति-(1) धारा 14 के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर, रजिस्ट्रार ऐसे आवेदन में अन्तर्विष्ट विशिष्टियों के संबंध में ऐसी जांच करने के पश्चात् जिसे वह उचित समझता है आवेदन को पूर्ण रूप से या ऐसी शर्तों या परिसीमाओं के अधीन जो वह उचित समझता है, स्वीकार कर सकेगा ।
(2) जहां रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाता है कि आवेदन इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं करता है वहां वह-
(क) आवेदक से अपने समाधानप्रद रूप में आवेदन को संशोधित करने की अपेक्षा कर सकेगा; या
(ख) आवेदन को नामंजूर कर सकेगा:
परन्तु कोई आवेदन तब तक नामंजूर नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक को अपना मामला प्रस्तुत करने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
21. आवेदन का विज्ञापन-(1) जब किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन, धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन पूर्ण रूप से या शर्तों अथवा परिसीमाओं के अधीन स्वीकार कर लिया गया है तब रजिस्ट्रार उसकी स्वीकृति के पश्चात् यथाशीघ्र ऐसे आवेदन को ऐसी शर्तों अथवा परिसीमाओं के साथ, यदि कोई हों, जिनके अधीन वह स्वीकार किया गया है और उस किस्म के विनिर्देश, जिसके रजिस्ट्रीकरण के लिए ऐसा आवेदन किया गया है, उसके फोटोचित्र या रेखाचित्र सहित उस मामले में हितबद्ध व्यक्तियों से आक्षेप आमंत्रित करते हुए, विहित रीति में विज्ञाप्ति कराएगा ।
(2) कोई व्यक्ति, रजिस्ट्रीकरण के आवेदन के विज्ञापन की तारीख से तीन मास के भीतर विहित फीस का संदाय करके विहित रीति से लिखित रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए अपने विरोध की सूचना रजिस्ट्रार को दे सकेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण का विरोध निम्नलिखित आधारों में से किसी एक आधार पर किया जा सकेगा, अर्थात् यह कि: -
(क) आवेदन का विरोध करने वाला व्यक्ति आवेदक के मुकाबले प्रजनक के अधिकार का हकदार है;
(ख) किस्म इस अधिनियम के अधीन रजिस्टर किए जाने योग्य नहीं है; या
(ग) रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रमाणपत्र प्रदान किया जाना लोकहित में नहीं होगा; या
(घ) किस्म का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है ।
(4) रजिस्ट्रार विरोध की सूचना की एक प्रति को रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदक पर तामील करेगा और आवेदक द्वारा विरोध की सूचना की ऐसी प्रति की प्राप्ति से दो मास के भीतर आवेदक, रजिस्ट्रार को विहित रीति में उन आधारों का एक प्रतिकथन भेजेगा जिन पर वह अपने आवेदन के लिए निर्भर करता है और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो यह समझा जाएगा कि उसने अपने आवेदन का परित्याग कर दिया है ।
(5) यदि आवेदक ऐसा प्रतिकथन भेजता है तो रजिस्ट्रार उसकी एक प्रति की विरोध की सूचना देने वाले व्यक्ति पर तामील करेगा ।
(6) ऐसा कोई साक्ष्य जिस पर विरोधकर्ता और आवेदक निर्भर है रजिस्ट्रार को विहित रीति में और विहित समय के भीतर पेश किया जाएगा और रजिस्ट्रार, यदि वह ऐसा चाहता है तो, उन्हें सुनवाई का अवसर प्रदान करेगा ।
(7) रजिस्ट्रार पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यदि ऐसी अपेक्षा हो, और साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् यह विनिश्चित करेगा कि क्या और किन शर्तो और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, अधीन रजिस्ट्रीकरण अनुज्ञात किया जाए और आक्षेप के आधार पर विचार कर सकेगा, चाहे विरोधकर्ता उस पर निर्भर है या नहीं ।
(8) जहां विरोध की सूचना देने वाला कोई व्यक्ति या ऐसी सूचना की प्रति की प्राप्ति के पश्चात् प्रतिकथन भेजने वाला कोई आवेदक न तो भारत में निवास करता है और न ही कारबार करता है, वहां रजिस्ट्रार उसके समक्ष की कार्यवाहियों के खर्च के लिए उससे प्रतिभूति देने की अपेक्षा कर सकेगा और ऐसी प्रतिभूति के सम्यक् रूप से दिए जाने में व्यतिक्रम होने पर उसे, यथास्थिति, विरोध या आवेदन के परित्याग किए जाने के रूप में मान सकेगा ।
(9) रजिस्ट्रार, निवेदन किए जाने पर ऐसे निबंधनों पर जिन्हें वह ठीक समझता है, विरोध की सूचना या प्रतिकथन में किसी त्रुटि के सुधार या किसी संशोधन को अनुज्ञात कर सकेगा ।
22. रजिस्ट्रार का विरोध के आधारों पर विचार करना-रजिस्ट्रार, ऐसे सभी आधारों पर विचार करेगा जिन पर आवेदन का विरोध किया गया है और अपने विनिश्चय के कारण देने के पश्चात् आदेश द्वारा विरोध को मान्य ठहराएगा या नामंजूर करेगा ।
अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म का रजिस्ट्रीकरण
23. अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म का रजिस्ट्रीकरण-(1) धारा 29 की उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट जीनस या जातियों की अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, रजिस्ट्रार को धारा 14 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से और धारा 18 में विनिर्दिष्ट रीति में इस प्रकार किया जाएगा मानो उसमें किस्म" शब्द के स्थान पर अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म" शब्द रखे गए हैं और उसके साथ ऐसे दस्तावेज और फीस होगी जो विहित किए जाएं ।
(2) जब रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) की अपेक्षाओं का पालन उसके समाधानप्रद रूप में हो गया है तो वह आवेदन को, अपनी रिपोर्ट और सभी सुसंगत दस्तावेजों के साथ, प्राधिकरण को अग्रेषित करेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर, प्राधिकरण ऐसी अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म की यह अवधारित करने के लिए परीक्षा करवाएगा कि क्या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म ऐसी किस्म है जो मूल किस्म से, ऐसा परीक्षण करके और ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करके, जो विहित की जाए, व्युत्पन्न किस्म है ।
(4) जब प्राधिकरण का उपधारा (3) में निर्दिष्ट परीक्षण रिपोर्ट से वह समाधान हो जाता हैं कि अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म मूल किस्म से व्युत्पन्न की गई है तो वह रजिस्ट्रार को ऐसी अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म को रजिस्टर करने का निदेश दे सकेगा और रजिस्ट्रार अधिकरण के निदेश का पालन करेगा ।
(5) जहां अधिकरण का उपधारा (3) में निर्दिष्ट परीक्षण रिपोर्ट पर यह समाधान नहीं होता है कि अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म मूल किस्म से व्युत्पन्न की गई है तो वह आवेदन को नामंजूर कर देगा ।
(6) धारा 28 में अन्तर्विष्ट किसी किस्म के प्रजनक के अधिकार, अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म के प्रजनक को लागू होंगे:
परन्तु मूल किस्म के प्रजनक द्वारा धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म के प्रजनक को प्राधिकार ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन होगा जिन पर दोनों पक्षकार आपस में सहमत हों ।
(7) अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म इस धारा के अधीन तब तक रजिस्टर नहीं की जाएगी जब तक कि धारा 15 की अपेक्षाओं का समाधान इस प्रकार नहीं हो जाता कि मानो उसमें किस्म" शब्द के स्थान पर अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म" शब्द रखे गए हैं ।
(8) जब कोई अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म उपधारा (4) के अधीन प्राधिकरण के निदेश के अनुपालन में रजिस्ट्रार द्वारा रजिस्टर कर ली गई है तब रजिस्ट्रार आवेदक को विहित प्ररूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा और रजिस्ट्री की मुद्रा से मुद्रांकित करेगा और उसकी एक प्रति प्राधिकरण और ऐसे अन्य प्राधिकारी को, जो विहित किए जाएं, सूचना के लिए भेजेगा ।
अध्याय 4
रजिस्ट्रीकरण की अवधि और प्रभाव और फायदे में हिस्सा बटाना
24. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का जारी किया जाना-(1) जब किसी किस्म (अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म से भिन्न) के रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन स्वीकार कर लिया गया है और-
(क) आवेदन का विरोध नहीं किया गया है और विरोध की सूचना के लिए समय समाप्त हो गया है; या
(ख) आवेदन का विरोध किया गया है और विरोध नांमजूर कर दिया गया है, तब रजिस्ट्रार किस्म को रजिस्टर करेगा ।
(2) किस्म (अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म से भिन्न) का रजिस्ट्रीकरण हो जाने पर, रजिस्ट्रार आवेदक को विहित प्ररूप में और रजिस्ट्री की मुद्रा से मुद्रांकित रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा और एक प्रति फायदे का हिस्सा बटाने का अवधारण करने के लिए प्राधिकरण को और ऐसे अन्य प्राधिकारी को जानकारी के लिए भेजेगा, जो विहित किया जाए । किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख से रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करने के लिए रजिस्ट्रार द्वारा अपेक्षित अधिकतम समय वह होगा जो विहित किया जाए ।
(3) जहां किसी किस्म (अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म से भिन्न) का रजिस्ट्रीकरण आवेदक की ओर से किसी व्यतिक्रम के कारण आवेदन की तारीख से बारह मास के भीतर पूरा नहीं होता है वहां रजिस्ट्रार आवेदक को विहित रीति से सूचना देने के पश्चात् यह मान सकेगा कि आवेदन का परित्याग कर दिया गया है जब तक कि उसे सूचना में उस निमित्त विनिर्दिष्ट समय के भीतर पूरा नहीं कर दिया जाता है ।
(4) रजिस्ट्रार किसी लेखन गलती या स्पष्ट भूल का सुधार करने के प्रयोजन के लिए रजिस्टर या रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में संशोधन कर सकेगा ।
(5) रजिस्ट्रार को ऐसे निदेश जारी करने की शक्ति होगी जो रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन फाइल करने और ऐसे आवेदन पर प्राधिकरण द्वारा किए गए विनिश्चय की अवधि के दौरान किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अनुचित कार्य के विरुद्ध प्रजनक के हित का संरक्षण करने के लिए हों ।
(6) इस धारा या धारा 23 की उपधारा (8) के अधीन जारी किया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र वृक्षों और लताओं की दशा में नौ वर्षों के लिए और अन्य फसलों की दशा में छह वर्षों के लिए विधिमान्य होगा और शेष अवधि के लिए ऐसी फीस के संदाय पर, जो इस निमित्त बनाए गए नियमों द्वारा नियत की जाए, इस शर्त के अधीन पुनरीक्षित या नवीकृत किया जा सकेगा, कि विधिमान्यता की कुल अवधि-
(i) वृक्षों और लताओं की दशा में, किस्म के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से अट्ठारह वर्ष से अधिक नहीं होगी;
(ii) विद्यमान किस्म की दशा में, केन्द्रीय सरकार द्वारा बीज अधिनियम, 1966 (1966 का 54) की धारा 5 के अधीन उस किस्म की अधिसूचना की तारीख से पन्द्रह वर्ष से अधिक नहीं होगी; और
(iii) अन्य दशाओं में किस्म के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से पन्द्रह वर्ष से अधिक नहीं होगी ।
25. किस्मों की सूची का प्रकाशन-प्राधिकरण, ऐसे अंतरालों के भीतर जिन्हें वह समुचित समझे, उन किस्मों की जो उस अंतराल के दौरान रजिस्टर की गई हैं, सूची प्रकाशित करेगा ।
26. प्राधिकरण द्वारा फायदे का हिस्सा बटाने का अवधारण-(1) धारा 23 की उपधारा (8) या धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की प्रति की प्राप्ति पर, प्राधिकरण प्रमाणपत्र की ऐसी अन्तर्वस्तु को प्रकाशित करेगा और ऐसी किस्म में, जो ऐसे प्रमाणपत्र में रजिस्ट्रीकृत है, ऐसी रीति से जो विहित की जाए, फायदे का हिस्सा बटाने के दावों को आमंत्रित करेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन दावों के आंमत्रण पर, कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह या फर्म या सरकारी या गैर-सरकारी संगठन, ऐसी किस्म में फायदे का हिस्सा बटाने के अपने दावे को विहित प्ररूप में ऐसे समय के भीतर और ऐसी फीस के साथ जो विहित की जाए, प्रस्तुत करेगा:
परन्तु ऐसा दावा निम्नलिखित के द्वारा ही प्रस्तुत किया जाएगा, -
(i) व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह, यदि ऐसा व्यक्ति या ऐसे समूह का गठन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक है; या
(ii) फर्म या सरकारी गैर सरकारी संगठन, यदि ऐसी फर्म या कोई ऐसा संगठन भारत में बनाया या स्थापित किया गया है ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किसी दावे की प्राप्ति पर, प्राधिकरण ऐसे दावों की एक प्रति, ऐसे प्रमाणपत्र के अधीन रजिस्ट्रीकृत ऐसी किस्म के प्रजनक को भेजेगा और प्रजनक, ऐसी प्रति की प्राप्ति पर ऐसे दावे पर अपना विरोध ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, प्रस्तुत कर सकेगा ।
(4) प्राधिकरण पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् उपधारा (2) के अधीन प्राप्त दावों का निपटारा करेगा ।
(5) उपधारा (4) के अधीन दावे का निपटारा करते समय, प्राधिकरण अपने आदेश में स्पष्ट रूप से फायदे का हिस्सा बटाने की रकम, यदि कोई हो, जिसके लिए दावेदार हकदार होगा, उपदर्शित करेगा, और निम्नलिखित विषयों पर विचार करेगा, अर्थात्: -
(क) उस किस्म के, जिसके संबंध में फायदे में हिस्सा बटाने का दावा किया गया है, विकास में दावेदार की आनुवंशिकी सामग्री के उपयोग का परिमाण और प्रकृति;
(ख) उस किस्म की जिसके संबंध में फायदे का हिस्सा बटाने का दावा किया गया है, बाजार में वाणिज्यिक उपयोगिता और मांग ।
(6) इस धारा के अधीन अवधारित किसी किस्म में फायदे का हिस्सा बटाने की रकम ऐसी किस्म के प्रजनक द्वारा धारा 45 की उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट रीति से राष्ट्रीय जीन निधि में जमा की जाएगी ।
(7) इस धारा के अधीन अवधारित फायदे का हिस्सा बटाने की रकम, प्राधिकरण द्वारा विहित रीति से किए गए निर्देश पर ऐसे जिला मजिस्ट्रेट द्वारा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमा के भीतर हिस्सा बटाने के लिए दायी संवर्धक निवास करता है, भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जाएगी ।
27. प्रजनक द्वारा बीज या प्रवर्धन सामग्री का जमा किया जाना-(1) प्रजनक से अपेक्षित होगा कि वह बीज या प्रवर्धन सामग्री की ऐसी मात्रा, जिसके अन्तर्गत ऐसे राष्ट्रीय जीन बैंक में रजिस्ट्रीकृत किस्म के मूल पंक्ति के बीज हैं, जो विनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रजनक के व्यय पर ऐसे समय के भीतर जो उस विनियम में विनिर्दिष्ट किया जाए, पुनरुत्पादन के प्रयोजनों के लिए जमा करने का निदेश दे सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निक्षिप्त किए जाने वाले बीज या प्रवर्धक सामग्री या मूल पंक्ति के बीज प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट राष्ट्रीय जीन बैंक में निक्षिप्त किए जाएंगे ।
28. अधिकार प्रदान करने का रजिस्ट्रीकरण-(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन जारी की गई किसी किस्म के लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी, उसके अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी को ऐसी किस्म का उत्पादन, विक्रय, विपणन, वितरण, आयात या निर्यात करने का अनन्य अधिकार प्रदान करेगा:
परन्तु विद्यमान किस्म की दशा में जब तक कि प्रजनक या उसका उत्तराधिकारी अपना अधिकार सिद्ध न करे, केन्द्रीय सरकार को और उस दशा में, जिसमें ऐसी विद्यमान किस्म बीज अधिनियम, 1966 (1966 का 54) की धारा 5 के अधीन किसी राज्य या उसके किसी क्षेत्र के लिए अधिसूचित है, राज्य सरकार को ऐसे अधिकार का स्वामी समझा जाएगा ।
(2) प्रजनक किसी व्यक्ति को विनियमों में विनिर्दिष्ट, परिसीमाओं और शर्तों के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्म का उत्पादन, विक्रय, विपणन या उसके साथ अन्यथा व्यवहार करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक प्राधिकार ऐसे प्ररूप में होगा जो विनियमों में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(4) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी किसी किस्म का उत्पादन, विक्रय, विपणन, वितरण, आयात या निर्यात करने का हकदार हो जाता है वहां वह विहित रीति से और विहित फीस के साथ रजिस्ट्रार को अपना हक रजिस्टर करने के लिए आवेदन करेगा और रजिस्ट्रार, आवेदन की प्राप्ति पर और अपने समाधानप्रद रूप में हक का सबूत होने पर उसे ऐसी किस्म के संबंध में, जिसके लिए वह ऐसे अधिकार का हकदार है, यथास्थिति, अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी के रूप में रजिस्टर करेगा और ऐसी हकदारी की विशिष्टियां और शर्तें या निर्बंधन, यदि कोई हों, जिनके अधीन रहते हुए ऐसी हकदारी दी गई है, रजिस्टर में प्रविष्ट कराएगा :
परन्तु जब पक्षकारों के बीच ऐसी हकदारी की विधिमान्यता पर विवाद हो तब रजिस्ट्रार हकदारी को रजिस्टर करने से इंकार कर सकेगा और विहित रीति से मामले को प्राधिकरण को निर्दिष्ट कर सकेगा तथा जब तक प्राधिकरण द्वारा इस प्रकार निर्दिष्ट विवाद में पक्षकारों के अधिकार का अवधारण नहीं कर दिया जाता तब तक ऐसी हकदारी का रजिस्ट्रीकरण रोक सकेगा ।
(5) रजिस्ट्रार उपधारा (4) के अधीन आवेदक को ऐसे रजिस्ट्रीकरण के पश्चात् रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा और प्रमाणपत्र में हकदारी की संक्षिप्त शर्तें, यदि कोई हों, विहित रीति में प्रविष्ट करेगा और ऐसा प्रमाणपत्र ऐसी हकदारी और उसकी शर्तों या निर्बंधनों का, यदि कोई हो, निश्चायक सबूत होगा ।
(6) पक्षकारों के बीच विद्यमान किसी करार के अधीन रहते हुए, उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म पर अधिकार रखने वाला अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी, प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी से उसके अतिलंघन को रोकने की कार्यवाही करने के लिए अपेक्षा करने का हकदार होगा और यदि प्रजनक या उसका उत्तराधिकारी ऐसी अपेक्षा किए जाने के पश्चात् तीन मास के भीतर ऐसा करने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है तो ऐसा रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी को प्रतिवादी बनाते हुए अपने नाम से अतिलंघन के लिए कार्यवाही उसी प्रकार संस्थित कर सकेगा मानो वह प्रजनक हो ।
(7) किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, प्रतिवादी के रूप में इस प्रकार जोड़ा गया कोई प्रजनक या उसका उत्तराधिकारी किसी खर्चे के लिए तब तक दायी नहीं होगा जब तक कि वह कार्यवाहियों में उपस्थित नहीं होता है और भाग नहीं लेता है ।
(8) इस धारा की कोई बात किसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी को ऐसे अधिकार को, उसके और आगे अंतरित करने का कोई अधिकार प्रदत्त नहीं करती है ।
(9) उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीकरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, रजिस्ट्रीकरण के निबंधन-
(क) रजिस्ट्रार द्वारा ऐसी किस्म के संबंध में जिससे वे संबंधित हैं या किसी ऐसी शर्त या निबंधन के संबंध में जिसके अधीन वे प्रभाव रखते हैं ऐसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी के विहित रीति से आवेदन की प्राप्ति पर परिवर्तित किए जा सकेंगे;
(ख) रजिस्ट्रार द्वारा, ऐसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी के या, ऐसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी के विहित रीति से आवेदन की प्राप्ति पर रद्द किए जा सकेंगे;
(ग) रजिस्ट्रार द्वारा प्रजनक, उसके उत्तराधिकारी, रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी से भिन्न किसी व्यक्ति के विहित रीति से आवेदन पर निम्नलिखित आधारों में से किसी पर रद्द किए जा सकेंगे, अर्थात्: -
(i) किसी किस्म के प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी या ऐसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी ने उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन से तात्त्विक, कुछ ऐसे तथ्यों का दुर्व्यपदेशन किया है या उन्हें प्रकट करने में असफल रहा है, जिन्हें यदि ठीक-ठीक व्यपदिष्ट या प्रकट किया गया होता तो वे रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन के अस्वीकृत करने को न्यायोचित ठहराते;
(ii) रजिस्ट्रीकरण, किसी ऐसी संविदा के आधार पर, जिसके अनुपालन में वह हितबद्ध है, आवेदक में निहित अधिकार को ध्यान में रखते हुए प्रभावी नहीं किया जाना चाहिए;
(घ) रजिस्ट्रार द्वारा, किसी रजिस्ट्रीकृत किस्म के प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी के विहित रीति में आवेदन करने पर इस आधार पर रद्द किए जा सकेंगे कि, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी के और किसी ऐसी किस्म के संबंध में, जिसके लिए ऐसा अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी रजिस्ट्रीकृत है, ऐसे प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी के बीच करार के किसी अनुबंध को प्रवर्तित नहीं किया जा रहा है या उसका अनुपालन नहीं किया जा रहा है;
(ङ) रजिस्ट्रार द्वारा किसी व्यक्ति के विहित रीति से आवेदन पर इस आधार पर रद्द किए जा सकेंगे कि रजिस्ट्रीकरण से संबंधित किस्म अब विद्यमान नहीं है ।
(10) रजिस्ट्रार इस धारा के अधीन प्रत्येक आवेदन पर किसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत प्रजनक या उसके उत्तराधिकारी और ऐसी किस्म के प्रत्येक रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी (जो आवेदक नहीं है) को विहित रीति से सूचना जारी करेगा ।
(11) रजिस्ट्रार, उपधारा (9) के अधीन कोई आदेश करने से पूर्व, उस निमित्त किए गए आवेदन को, किसी पक्षकार द्वारा उपधारा (10) के अधीन सूचना के पश्चात् प्राप्त किसी आक्षेप के साथ प्राधिकरण को विचार के लिए अग्रेषित करेगा और प्राधिकरण, ऐसी जांच के पश्चात् जो वह उचित समझे, रजिस्ट्रार को ऐसे निदेश जारी करेगा जो वह उचित समझे और रजिस्ट्रार ऐसे निदेशों के अनुसार आवेदन का निपटारा करेगा ।
29. कतिपय किस्मों का अपवर्जन-(1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन किसी किस्म का रजिस्ट्रीकरण उन दशाओं में नहीं किया जाएगा जिनमें ऐसी किस्म के वाणिज्यिक शोषण का निवारण लोक व्यवस्था या लोक नैतिकता या मानव, पशु तथा पौधे के जीवन और स्वास्थ्य का संरक्षण करने के लिए या पर्यावरण पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से बचाने के लिए आवश्यक है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन विद्यमान किस्मों और कृषक की किस्मों से भिन्न किस्मों के रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजनों के लिए जीन्स या जातियों को विनिर्दिष्ट करेगी ।
(3) उपधारा (2) और धारा 15 की उपधारा (1) और उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसी किसी जीन्स या जातियों की, जिनमें ऐसी प्रौद्योगिकी अंतर्वलित है, जो मानव, पशुओं या पौधों के जीवन या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, किसी किस्म का इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण नहीं किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी प्रौद्योगिकी" पद के अंतर्गत आनुवंशिकी उपयोग निर्बंधन प्रौद्योगिकी और समापक प्रौद्योगिकी हैं ।
(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (2) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट जीन्स या जातियों की सूची में से किसी जीन्स या जातियों को लोकहित में के सिवाय नहीं हटाएगी ।
(5) कोई ऐसी किस्म, जो उपधारा (4) के अधीन अपवर्जित जीन्स या जातियों की है, इस अधिनियम के अधीन किसी संरक्षण की पात्र नहीं होगी ।
30. अनुसंधानकर्ता के अधिकार-इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई बात निम्नलिखित का निवारण नहीं करेगी-
(क) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म का, ऐसी किस्म का प्रयोग या अनुसंधान करने के लिए उपयोग करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा उपयोग, और
(ख) अन्य किस्मों का सृजन करने के प्रयोजनार्थ किस्मों के प्रारंभिक स्रोत के रूप में किसी व्यक्ति द्वारा, किसी किस्म का उपयोग:
परन्तु यह कि उस दशा में किसी रजिस्ट्रीकृत किस्म के प्रजनक का प्राधिकार अपेक्षित होगा जहां वैसी अन्य नव-विकसित किस्म के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए ऐसी किस्म की जनकीय लाइन का आवर्ती उपयोग आवश्यक हो ।
31. अभिसमय देशों के नागरिकों से रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदनों से संबंधित विशेष उपबंध-(1) भारत से बाहर के किसी देश से किसी ऐसी संधि, अभिसमय या ठहराव को पूर्ण करने की दृष्टि से जिसके द्वारा भारत के नागरिकों को वैसे ही विशेषाधिकार, अनुदत्त किए जाएं जो उसके अपने नागरिकों के हों, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे देश को इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ एक अभिसमय देश घोषित करेगी ।
(2) जहां किसी व्यक्ति ने किसी किस्म के प्रति प्रजनक के अधिकार के अनुदान के लिए या ऐसी किस्म को किसी अभिसमय देश में किस्मों के शासकीय रजिस्टर में प्रविष्ट कराने के लिए आवेदन किया है और धारा 14 या धारा 23 के अधीन उसकी ओर से आवेदन करने का हकदार कोई व्यक्ति उस तारीख के पश्चात्, जिसको आवेदन अभिसमय देश में किया गया है, बारह मास के भीतर भारत में ऐसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करता है तो उसे, यदि वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है तो उस तारीख को रजिस्ट्रीकृत किया जाएगा जिसको आवेदन अभिसमय देश में किया गया था और वह तारीख इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए रजिस्ट्रीकरण की तारीख समझी जाएगी ।
(3) जहां किसी किस्म के लिए प्रजनक के अधिकार के अनुदान के लिए अथवा ऐसी किस्म को दो या अधिक अभिसमय देशों में किस्मों के शासकीय रजिस्टर में प्रविष्ट करने के लिए आवेदन किए गए हैं वहां उपधारा (2) में निर्दिष्ट बारह मास की अवधि उस तारीख से संगणित की जाएगी जिसको उनमें से पूर्वतर या पूर्वतम आवेदन किया गया है ।
(4) इस अधिनियम की कोई बात किसी रजिस्ट्रीकृत किस्म के प्रजनक को, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के आवेदन की तारीख से पूर्व होने वाले इस अधिनियम के अधीन संरक्षित से भिन्न अधिकारों के किसी अतिलंघन के लिए हकदार नहीं बनाएगी ।
32. व्यतिकारिता के लिए उपबंध-जहां केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त घोषित कोई देश, किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण के संबंध में भारत के नागरिकों को वही अधिकार नहीं देता जो वह अपने राष्ट्रिकों को देता है तो ऐसे देश का कोई राष्ट्रिक एकल रूप से या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से, इस अधिनियम के अधीन किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने अथवा किसी किस्म का रजिस्ट्रीकरण करवाने का हकदार नहीं होगा ।
अध्याय 5
प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण और प्रतिसंहरण तथा रजिस्टर परिशोधन और शुद्धि
33. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण-(1) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म का प्रजनक, रजिस्ट्रार को विहित रीति से सूचना देने के पश्चात् किसी भी समय अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को अभ्यर्पित करने की प्रस्थापना कर सकता है ।
(2) जहां ऐसी कोई प्रस्थापना की जाए, वहां रजिस्ट्रार विहित रीति से ऐसे प्रमाणपत्र से संबंधित प्रत्येक रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी को अधिसूचित करेगा ।
(3) ऐसा कोई अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी, ऐसी अधिसूचना के पश्चात् विहित अवधि के भीतर, अभ्यर्पण के प्रति अपने विरोध की सूचना रजिस्ट्रार को दे सकता है और जहां ऐसी कोई सूचना दी जाती है, वहां रजिस्ट्रार ऐसी किस्म के प्रजनक को ऐसी सूचना की अंतर्वस्तु प्रज्ञापित करेगा ।
(4) यदि आवेदक और सभी विरोधियों की, यदि वे सुनवाई के लिए इच्छुक हों सुनवाई के पश्चात्, रजिस्ट्रार का समाधान हो जाता है कि वह रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र उचित रूप से अभ्यर्पित किया जा सकता है तो वह उस प्रस्थापना को स्वीकार कर सकता है और आदेश द्वारा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण कर सकता है ।
34. कतिपय आधारों पर संरक्षण का प्रतिसंहरण-इस अधिनियम में अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी किस्म के संबंध में प्रजनक को अनुदत्त संरक्षण, हितबद्ध किसी व्यक्ति द्वारा विहित रीति से आवेदन किए जाने पर प्राधिकरण द्वारा निम्नलिखित में से किसी आधार पर प्रतिसंहृत किया जा सकता है, अर्थात्: -
(क) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का अनुदान आवेदक द्वारा दी गई गलत जानकारी पर आधारित हैं;
(ख) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसे व्यक्ति को अनुदत्त किया गया है जो इस अधिनियम के अधीन संरक्षण का पात्र नहीं है;
(ग) प्रजनक ने, रजिस्ट्रार को इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए यथा अपेक्षित जानकारी, दस्तावेज या सामग्री उपलब्ध नहीं कराई थी;
(घ) जहां रजिस्ट्रार को उपलब्ध कराई गई किसी किस्म का पूर्ववर्ती अभिधान इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अनुज्ञेय नहीं है वहां प्रजनक, रजिस्ट्रार को उस किस्म का, जो रजिस्ट्रीकरण की विषय-वस्तु है, आनुकल्पिक अभिधान उपलब्ध कराने में असफल रहा है;
(ङ) प्रजनक ने उस व्यक्ति को, जिसे उक्त किस्म के संबंध में धारा 47 के अधीन अनिवार्य अनुज्ञप्ति जारी की गई है, जिसके संबंध में उस प्रजनक को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी किया गया है आवश्यक बीज या प्रवर्धन सामग्री उपलब्ध नहीं कराई थी;
(च) प्रजनक ने इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों का पालन नहीं किया है;
(छ) प्रजनक, इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए प्राधिकरण के निदेशों का पालन करने में असफल रहा है;
(ज) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का अनुदान लोकहित में नहीं है:
परन्तु यह कि ऐसा संरक्षण तब तक प्रतिसंहृत नहीं किया जाएगा जब तक प्रजनक को आक्षेप दाखिल करने और उस विषय में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दिया गया हो ।
35. वार्षिक फीस का संदाय और उसके व्यतिक्रम पर रजिस्ट्रीकरण का समपहरण-(1) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के प्रत्येक प्रजनक, अभिकर्ता और उसके अनुज्ञप्तिधारी द्वारा प्रतिवर्ष संदत्त की जाने वाली ऐसी फीस अधिरोपित कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन उनके रजिस्ट्रीकरण के प्रतिधारण के लिए, किस्म के संबंध में, यथास्थिति, ऐसे प्रजनक, अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी द्वारा प्राप्त फायदे या स्वामित्व के आधार पर अवधारित की जाए ।
(2) यदि कोई प्रजनक, अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी उपधारा (1) में निर्दिष्ट उक्त उपधारा के अधीन उस पर अधिरोपित फीस का निक्षेप विहित रीति से दो वर्ष तक लगातार करने में असफल रहता है तो प्राधिकरण, ऐसे प्रजनक, अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी को सूचना जारी करेगा और ऐसी सूचना की तामील होने पर यदि वह उक्त सूचना में के निदेश का पालन करने में असफल रहता है तो प्राधिकरण ऐसे प्रजनक या अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी को जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अधीन अनुज्ञेय सभी संरक्षण समपहृत घोषित कर देगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन अधिरोपित फीस के बकाया को भू-राजस्व का बकाया समझा जाएगा और तद्नुसार उसकी वसूली की जाएगी ।
36. रजिस्ट्रीकरण को रद्द या परिवर्तित करने तथा रजिस्टर के परिशोधन की शक्ति-(1) किसी व्यथित व्यक्ति द्वारा, रजिस्ट्रार को विहित रीति से किए गए आवेदन पर, रजिस्ट्रार, इस अधिनियम के उपबंधों के किसी उल्लंघन के आधार पर या ऐसी किसी शर्त का पालन करने में असफल रहने पर जिसके अधीन रहते हुए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी किया गया था, इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए किसी के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को रद्द करने या परिवर्तित करने का ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(2) कोई व्यक्ति जो रजिस्टर में किसी प्रविष्टि की अनुपस्थिति या लोप या पर्याप्त कारण के बिना रजिस्टर में की गई किसी प्रविष्टि द्वारा या किसी प्रविष्टि के रजिस्टर में गलत रूप से बने रहने के कारण व्यथित है, रजिस्ट्रार को विहित रीति में आवेदन कर सकेगा और रजिस्ट्रार उक्त प्रविष्टि के किए जाने, निकालने या परिवर्तित किए जाने के लिए ऐसा आदेश करेगा जो वह ठीक समझे ।
(3) रजिस्ट्रार इस धारा के अधीन किसी कार्यवाही में ऐसे किसी प्रश्न का विनिश्चय कर सकेगा जो रजिस्टर के परिशोधन के संबंध में आवश्यक या समीचीन हो ।
(4) रजिस्ट्रार, स्वप्रेरणा से, संबंधित पक्षकारों को विहित रीति में सूचना देने के पश्चात् और उन्हें सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट आदेश कर सकेगा ।
37. रजिस्टर का संशोधन-(1) रजिस्ट्रार, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के प्रजनक द्वारा विहित रीति में किए गए किसी आवेदन पर, -
(क) रजिस्टर में, ऐसे प्रजनक के नाम, पते या वर्णन से संबंधित किसी त्रुटि का या, उस किस्म से संबंधित किसी अन्य प्रविष्टि में संशोधन कर सकेगा;
(ख) रजिस्टर में ऐसे प्रजनक के नाम, पते या वर्णन में किसी परिवर्तन की प्रविष्टि करेगा;
(ग) रजिस्टर में उस किस्म की उस प्रविष्टि को रद्द कर सकेगा जिसके संबंध में ऐसा आवेदन किया गया है, और रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में पारिणामिक संशोधन या परिवर्तन कर सकेगा और इस प्रयोजनार्थ रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के उसके समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा कर सकेगा ।
(2) रजिस्ट्रार, उक्त किस्म के किसी रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी द्वारा विहित रीति में किए गए आवेदन पर और ऐसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत प्रजनक को सूचना देने के पश्चात्, यथास्थिति, इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में या रजिस्टर में ऐसे रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी के नाम, पते या वर्णन में किसी त्रुटि का संशोधन कर सकेगा अथवा कोई परिवर्तन प्रविष्ट कर सकेगा ।
38. किसी रजिस्ट्रीकृत किस्म के अभिधान में परिवर्तन-(1) अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म का प्रजनक रजिस्ट्रार को विहित रीति में आवेदन कर सकेगा कि वह ऐसी किस्म के अभिधान के किसी भाग में लोप या परिवर्धन या परिवर्तन ऐसी रीति से करे जिससे उसकी पहचान पर सारभूत प्रभाव न पड़े और रजिस्ट्रार ऐसी इजाजत से इन्कार कर सकता है या ऐसे निबंधनों पर और ऐसी परिसीमाओं के अधीन रहते हुए उसे अनुदत्त कर सकता है, जो वह ठीक समझे जिससे कि इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्मों के अन्य प्रजनकों के अधिकारों के साथ किसी विरोध को बचाया जा सके ।
(2) रजिस्ट्रार इस धारा के अधीन किसी आवेदन का किसी ऐसी दशा में, जहां उसे ऐसा करना समीचीन प्रतीत हो, विहित रीति में विज्ञापन करवा सकता है और जहां वह ऐसा करता है, यदि विज्ञापन की तारीख से विहित समय के भीतर कोई व्यक्ति रजिस्ट्रार को विहित रीति में आवेदन के विरोध की सूचना देता है तो रजिस्ट्रार यदि अपेक्षित हो, पक्षकरों की सनुवाई के पश्चात् मामले का विनिश्चय कर सकेगा ।
(3) जहां इस धारा के अधीन इजाजत अनुदत्त की जाती है वहां उक्त किस्म के यथापरिवर्तित अभिधान का, यदि आवेदन का उपधारा (2) के अधीन पहले ही विज्ञापन नहीं दिया गया हो तो विहित रीति में विज्ञापन देगा ।
अध्याय 6
कृषक अधिकार
39. कृषक अधिकार-(1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, -
(i) ऐसा कृषक जिसने नई किस्म का प्रजनन या विकास किया है, इस अधिनियम के अधीन उस किस्म के प्रजनक के रूप में उसी तरह रजिस्ट्रीकरण और अन्य संरक्षण का हकदार होगा,
(ii) कृषक की किस्म रजिस्ट्रीकरण की हकदार होगी यदि आवेदन में धारा 18 की उपधारा (1) के खंड (ज) में विनिर्दिष्ट रूप में घोषणा अंतर्विष्ट है,
(iii) ऐसा कृषक जो भू-प्रजातियों के आनुवंशिक स्रोतों और आर्थिक पौधों के जंगली अन्योन्याप्रयी के संरक्षण में और चयन के माध्यम से उनके सुधार और परिरक्षण में लगा हुआ है, मान्यता के लिए विहित रीति में राष्ट्रीय जीव निधि से प्रतिफल का हकदार होगा:
परन्तु यह तब जब कि इस प्रकार चयन की गई और परिरक्षित सामग्री का इस अधिनियम के अधीन रजिस्टर किए जाने योग्य किस्मों में जीन के दाता के रूप में उपयोग किया गया हो,
(iv) कोई कृषक अपने फार्म उत्पाद जिसके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन संरक्षित किस्म का बीज भी है, को सुरक्षित रखने, उसका उपयोग, रोपने पुनः रोपने, विनिमय करने, बांटने, विक्रय करने का उसी रीति में हकदार होगा जिसमें वह इस अधिनियम के प्रवर्तन में आने से पूर्व हकदार था:
परंतु इस अधिनियम के अधीन संरक्षित ब्रांडयुक्त बीज के विक्रय करने का हकदार नहीं होगा ।
स्पष्टीकरण-खंड (iv) के प्रयोजनों के लिए ब्रांडयुक्त बीज" से ऐसा कोई बीज अभिप्रेत है जो ऐसी रीति से किसी पैकेज या किसी अन्य आधान में रखा गया है और उस पर ऐसा लेबल लगा है जिससे यह उपदर्शित होता हो कि इस अधिनियम के अधीन संरक्षित किस्म का बीज है ।
(2) जहां, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्म की प्रवर्धक सामग्री का कृषक या कृषकों के समूह या कृषकों के किसी संगठन को विक्रय किया गया है वहां ऐसी किस्म का प्रजनक, यथास्थिति, उक्त कृषक या कृषकों के समूह या कृषकों के संगठन को, दी गई शर्तों के अधीन प्रत्याशित निष्पादन का प्रकटन करेगा और यदि ऐसी प्रवर्धक सामग्री विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन ऐसा निष्पादन करने में असफल रहती है तो, यथास्थिति, उक्त किसान या किसानों का समूह या किसानों का संगठन, प्राधिकरण के समक्ष विहित रीति में प्रतिकार का दावा कर सकेगा और प्राधिकरण, उक्त किस्म के प्रजनक को सूचना देने के पश्चात् और विहित रीति में, विरोध फाइल करने का उसे अवसर प्रदान करने के पश्चात् तथा पक्षकारों को सुनने के पश्चात् उक्त किस्म के प्रजनक को, यथास्थिति, कृषक या कृषकों के समूह या कृषकों के संगठन को ऐसे प्रतिकर का जिसे वह ठीक समझे, संदाय करने का निदेश दे सकेगा ।
40. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन के लिए कतिपय सूचना का दिया जाना-(1) अध्याय 3 के अधीन किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने वाला प्रजनक या अन्य व्यक्ति आवेदन में ऐसी किस्म के प्रजनन या विकास में लगे किसी जनजाति या ग्रामीण कुटुम्बों द्वारा संरक्षित आनुवंशिक सामग्री के उपयोग के संबंध में सूचनाओं का प्रकटन करेगा ।
(2) यदि प्रजनक या अन्य व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन कोई सूचना प्रकट करने में असफल रहता है, तो रजिस्ट्रार, यह समाधान हो जाने पर कि ऐसे प्रजनक या अन्य व्यक्ति ने स्वैच्छया और जानते हुए ऐसी सूचना छिपायी है, रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन को खारिज कर सकेगा ।
41. समुदायों के अधिकार-(1) कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह (चाहे वह सक्रिय रूप से कृषि कार्य मे लगा हो या नहीं) या कोई सरकारी या गैर सरकारी संगठन, भारत में किसी गांव या किसी स्थानीय समुदाय की ओर से, प्राधिकरण द्वारा केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से राजपत्र में अधिसूचित किसी केन्द्र में ऐसे गांव या स्थानीय समुदाय की ओर से दावा करने के प्रयोजन हेतु ऐसा दावा फाइल कर सकेगा जो, यथास्थिति, उस गांव या स्थानीय समुदाय के व्यक्तियों का किसी किस्म के विकास में योगदान माना जा सकता है ।
(2) जहां, उपधारा (1) के अधीन कोई दावा किया जाता है, वहां उस उपधारा के अधीन अधिसूचित केन्द्र ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह या ऐसे सरकारी या गैर-सरकारी संगठन द्वारा किए गए दावे को ऐसी रीति से जिसे वह ठीक समझे, सत्यापित कर सकेगा और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे गांव या स्थानीय समुदाय ने इस अधिनियम के अधीन रजिस्टर की गई किस्म के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है तो वह अपने निष्कर्षों की रिपोर्ट प्राधिकरण को करेगा ।
(3) जहां, प्राधिकरण का, उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट पर ऐसी जांच के पश्चात् जिसे वह ठीक समझे, समाधान हो जाता है कि वह किस्म जिससे रिपोर्ट संबंधित है, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रजिस्टर की गई है, वहां वह उस किस्म के प्रजनक को विहित रीति में सूचना जारी कर सकेगा और ऐसे प्रजनक को विहित रीति में आक्षेप फाइल करने और सुनवाई का अवसर प्रदान करने के पश्चात् वह केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किसी सीमा के अधीन रहते हुए, आदेश द्वारा, उक्त व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह या सरकारी या गैर-सरकारी संगठन को जिसने उपधारा (1) के अधीन दावा किया है, प्रतिकर की ऐसी रकम, जिसे वह ठीक समझे, अनुदत्त कर सकेगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन अनुदत्त कोई प्रतिकर उक्त किस्म के प्रजनक द्वारा जीन निधि में निक्षिप्त किया जाएगा ।
(5) उपधारा (3) के अधीन अनुदत्त प्रतिकर भू-राजस्व के बकाया के रूप में समझा जाएगा और तद्नुसार प्राधिकरण द्वारा वसूल किया जाएगा ।
42. निर्दोषता अतिलंघन का संरक्षण-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी-
(i) इस अधिनियम के अधीन स्थापित अधिकार को कृषक द्वारा अतिलंघन के रूप में नहीं समझा जाएगा यदि वह ऐसे अतिलंघन के समय ऐसे अधिकार की विद्यमानता की जानकारी नहीं रखता था; और
(ii) कोई अनुतोष, जिसे कोई न्यायालय धारा 65 में निर्दिष्ट अतिलंघन के लिए किसी वाद में अनुदत्त कर सकता है, ऐसे न्यायालय द्वारा अनुदत्त नहीं किया जाएगा और न ही ऐसे उल्लंघन के लिए इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान किया जाएगा जो किसी ऐसे कृषक के विरुद्ध हो, जो न्यायालय के समक्ष यह साबित कर देता है कि अतिलंघन के समय वह इस प्रकार अतिलंघन किए गए अधिकार की विद्यमानता के बारे में अवगत नहीं था ।
43. कृषकों की किस्म का प्राधिकार-(1) धारा 23 की उपधारा (6) और धारा 28 में किसी बात के होते हुए भी, जहां अनिवार्यतः व्युत्पन्न कोई किस्म कृषकों की किसी किस्म से व्युत्पन्न हुई है, वहां धारा 28 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकार, ऐसे कृषकों की किस्म के प्रजनकों द्वारा, ऐसे कृषकों या कृषकों के समूह अथवा कृषक समुदाय की सहमति के बिना, जिन्होंने ऐसी किस्म के संरक्षण और विकास में योगदान दिया है, नहीं दिया जाएगा ।
44. फीस से छूट-कोई कृषक या कृषकों का समूह अथवा ग्रामीण समुदाय इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन प्राधिकरण या रजिस्ट्रार या अधिकरण या उच्च न्यायालय के समक्ष किसी कार्रवाई में कोई फीस संदाय करने का दायी नहीं होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी कार्रवाई के लिए फीस" में इस अधिनियम के अधीन या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन किसी दस्तावेज का निरीक्षण करने या किसी विनिश्चय या आदेश अथवा दस्तावेज की प्रति अभिप्राप्त करने के लिए संदेय कोई फीस सम्मिलित है ।
45. जीन निधि-(1) केन्द्रीय सरकार, राष्ट्रीय जीन निधि नामक एक निधि का गठन करेगी और उसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा-
(क) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म के प्रजनक से अथवा, यथास्थिति, ऐसी किस्म या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म की प्रवर्धन सामग्री से विहित रीति में प्राप्त फायदे का हिस्सा;
(ख) धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन स्वामिस्व के रूप में प्राधिकरण को संदेय वार्षिक फीस;
(ग) धारा 41 की उपधारा (4) के अधीन जीन निधि में निक्षिप्त प्रतिकर;
(घ) राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन और अन्य स्रोतों से अंशदान ।
(2) जीन निधि का उपयोग निम्नलिखित के लिए विहित रीति से किया जाएगा-
(क) धारा 26 उपधारा (5) के अधीन फायदे में हिस्से के रूप में संदाय की जाने वाली कोई रकम;
(ख) धारा 41 की उपधारा (3) के अधीन संदेय प्रतिकर;
(ग) स्व स्थाने और बाह्य स्थाने संग्रहणों सहित जीन संसाधनों का संरक्षण, और संपोषणीय उपयोग करने के लिए व्यय और पंचायतों की ऐसे संरक्षण और संपोषणीय उपयोग को कार्यान्वित करने में क्षमता को मजबूत करना;
(घ) धारा 46 के अधीन विरचित फायदों के हिस्से से संबंधित ऐसी स्कीमों के व्यय ।
46. स्कीम आदि का बनाना-(1) केंद्रीय सरकार धारा 41 और धारा 45 की उपधारा (2) के खंड (घ) के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या एक से अधिक स्कीमें बनाएगी ।
(2) विशिष्टतया और उपधारा (1) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, स्कीम में निम्नलिखित सभी या किसी विषय के संबंध में उपबंध हो सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 41 के प्रयोजनों के लिए स्कीम के अधीन दावों का रजिस्ट्रीकरण और ऐसे रजिस्ट्रीकरण से संबंधित सभी विषय;
(ख) प्रवर्तन सुरक्षित करने के लिए दावों का प्रसंस्करण और उससे संबंधित विषय;
(ग) ऐसे दावों से संबंधित अभिलेखों और रजिस्टरों का अनुरक्षण;
(घ) ऐसे दावों के समाधान में प्राप्त किसी रकम का संवितरण (इसमें प्रभाजन भी है) द्वारा या अन्यथा उपयोग;
(ङ) ऐसे दावों से संबंधित विवाद की दशा में प्राधिकारी द्वारा संवितरण या प्रभाजन के लिए प्रक्रिया;
(च) किस्मों के संवर्धन, खोज या विकास से संबंधित प्रयोजनों के लिए फायदे में हिस्सा बटाने का उपयोग;
(छ) खंड (घ) में निर्दिष्ट रकमों की बाबत लेखाओं का अनुरक्षण और संपरीक्षा ।
अध्याय 7
अनिवार्य अनुज्ञप्ति
47. कतिपय परिस्थितियों में अनिवार्य अनुज्ञप्ति का आदेश करने की प्राधिकारी की शक्ति-(1) किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के जारी किए जाने की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् किसी समय, कोई हितबद्ध व्यक्ति यह अभिकथित करते हुए प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा कि बीजों या उस किस्म की अन्य प्रवर्धन सामग्री के लिए जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाओं का समाधान नहीं किया गया है अथवा यह कि बीज या अन्य प्रवर्धन सामग्री जनता को युक्तियुक्त कीमत पर उपलब्ध नहीं है और यह प्रार्थना कर सकेगा कि उक्त बीज या उस किस्म की अन्य प्रवर्धन सामग्री का उत्पादन, वितरण या विक्रय करने के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति का अनुदान किया जाए ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन में आवेदक के हित की प्रकृति के कथन के साथ विहित की जाने वाली विशिष्टियां और वे तथ्य जिन पर आवेदन आधारित हैं अन्तर्विष्ट होंगे ।
(3) प्राधिकरण केंद्रीय सरकार से परामर्श के पश्चात् और उक्त किस्म के प्रजनक को विरोध दाखिल करने का अवसर देने के पश्चात् यदि इस विषय पर इसका समाधान हो जाए कि उस किस्म के बारे में जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाओं का समाधान नहीं हुआ है या वह किस्म या उसकी प्रवर्धक सामग्री युक्तियुक्त कीमत पर जनता को उपलब्ध नहीं है तो वह उक्त प्रजनक को, आवेदक को ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो वह उचित समझे, अनुज्ञप्ति अनुदत्त करने का आदेश कर सकेगा और ऐसे आदेश की एक प्रति रजिस्ट्रार को धारा 28 की उपधारा (4) के अधीन अनुज्ञप्तिधारी के रूप में उस आवेदक की हकदारी को उक्त उपधारा में यथा निर्दिष्ट आवेदक द्वारा संदेय फीस पर रजिस्ट्रीकरण करने के लिए भेज सकेगा ।
48. जनता की अपेक्षा का समाधान न होना कब समझा जाएगा-(1) धारा 47 की उपधारा (1) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री के बीजों के लिए जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाओं का समाधान हुआ है या नहीं के प्रश्न के अवधारण के समय, प्राधिकरण निम्नलिखित को संगणना में लेगा-
(i) उस किस्म की प्रकृति, उक्त किस्म के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अनुदान के पश्चात् कितना समय व्यतीत हुआ है उक्त किस्म के बीच की कीमत, उक्त किस्म की जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रजनक या किसी रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी द्वारा किए गए उपाय; और
(ii) आवेदक द्वारा जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए उक्त किस्म का उत्पादन और विपणन करने की आवेदक की सामर्थ्य, योग्यता और तकनीकी क्षमता ।
49. अनिवार्य अनुज्ञप्ति के अनुदान के लिए आवेदन का स्थगन-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी ऐसी किस्म, जिसके संबंध में प्राधिकरण के समक्ष कोई आवेदन धारा 47 के अधीन लंबित है, प्रजनक प्राधिकरण को लिखित निवेदन इस आधार पर करता है कि किसी युक्तियुक्त कारक के कारण ऐसा प्रजनक बीज या उस किस्म की प्रवर्धन सामग्री का, ऐसे निवेदन करने की तारीख तक, वाणिज्यिक स्तर पर पर्याप्त सीमा तक उत्पादन करने में असमर्थ रहा है तो प्राधिकरण अपना यह समाधान होने पर कि उक्त उधार युक्तियुक्त है ऐसे आवेदन की सुनवाई की कुल मिलाकर बारह मास से अनधिक की उतनी अवधि के लिए स्थगित कर सकता है जितनी वह उस प्रजनक द्वारा, यथास्थिति, उक्त बीज या ऐसी किस्म की प्रवर्धन सामग्री के अधिकतम उत्पादन के लिए पर्याप्त समझे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन का कोई स्थगन तब तक अनुदत्त नहीं किया जाएगा जब तक कि प्राधिकरण का समाधान न हो जाए कि उस किस्म के, जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है और जिसके संबंध में यह आवेदन किया गया है, प्रजनक ने बीजों या उस किस्म की अन्य प्रवर्धन सामग्री के लिए जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए अव्यवहित उपाय किए हैं ।
50. अनिवार्य अनुज्ञप्ति की अवधि-(1) प्राधिकरण इस अध्याय के अधीन अनुदत्त अनिवार्य अनुज्ञप्ति की अवधि का अवधारण करेगा और यह अवधि विभिन्न मामलों में, गर्भावधि तथा अन्य सुसंगत कारकों को ध्यान में रखते हुए भिन्न-भिन्न होगी किन्तु किसी भी मामले में उस किस्म के संरक्षण की कुल शेष अवधि से अधिक नहीं होगी और जब कोई अनिवार्य अनुज्ञप्ति अनुदत्त की जाती है तो विहित प्राधिकारी, ऐसी अनिवार्य अनुज्ञप्ति के अनुज्ञप्तिधारी को अनिवार्य अनुज्ञप्ति से संबंधित और राष्ट्रीय जीन बैंक या किसी अन्य केन्द्र में भंडारित उक्त किस्म की पुनरुत्पादन सामग्री विहित रीति से उपलब्ध कराएगा ।
51. प्राधिकरण द्वारा अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों का परिनिर्धारण-(1) प्राधिकरण इस अध्याय के उपबंधों के अधीन अनिवार्य अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों का अवधारण करते समय, निम्नलिखित को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा: -
(i) उस किस्म की प्रकृति, ऐसे प्रजनक द्वारा उक्त किस्म के प्रजनन या उसके विकास में उपगत व्यय और अन्य सुसंगत कारकों को, ध्यान में रखते हुए अनिवार्य अनुज्ञप्ति से संबंधित, उक्त किस्म के प्रजनक के लिए युक्तियुक्त प्रतिकर;
(ii) उक्त किस्म का अनिवार्य अनुज्ञप्तिधारी, ऐसी किस्म के बीज या अन्य प्रवर्धन सामग्री को कृषकों को समय पर और युक्तियुक्त बाजार कीमत पर उपलब्ध कराने के पर्याप्त साधन रखता है ।
(2) प्राधिकरण द्वारा अनुदत्त कोई अनिवार्य अनुज्ञप्ति अनुज्ञप्तिधारी को उक्त अनुज्ञप्ति से संबंधित उक्त किस्म या अन्य प्रवर्धन सामग्री या किसी बीज को विदेश से आयात करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी जहां ऐसे आयात से उक्त किस्म के प्रजनक के अधिकारों का अतिलंघन होगा ।
52. अनिवार्य अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण-(1) प्राधिकरण, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति द्वारा विहित प्ररूप में किए गए आवेदन पर यदि उसका समाधान हो जाए कि इस अध्याय के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी अनिवार्य अनुज्ञप्तिधारी ने अपनी अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों का अतिक्रमण किया है अथवा लोकहित में ऐसी अनुज्ञप्ति को और बनाए रखना समीचीन नहीं है तो वह उक्त अनुज्ञप्तिधारी को अपना विरोध दाखिल करने और सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ऐसी अनुज्ञप्ति के प्रतिसंहरण का आदेश कर सकता है ।
(2) जहां प्राधिकरण के आदेश द्वारा उपधारा (1) के अधीन कोई अनुज्ञप्ति प्रतिसंहृत की जाती है वहां प्राधिकरण ऐसे आदेश की एक प्रति रजिस्ट्रार को प्रविष्टि के परिशोधन या ऐसे प्रतिसंहरण के संबंध में रजिस्टर का संशोधन करने के लिए भेजेगा और रजिस्ट्रार प्रविष्टि का परिशोधन या तद्नुसार रजिस्टर का परिशोधन करेगा ।
53. अनिवार्य अनुज्ञप्ति का उपांतरण-प्राधिकरण, स्वप्रेरणा से या अनिवार्य अनुज्ञप्ति के अनुज्ञप्तिधारी से आवेदन पर, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत और उक्त अनिवार्य अनुज्ञप्ति से संबंधित उक्त किस्म के प्रजनक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् यदि लोकहित में ऐसा करना उचित समझता है तो उक्त निबंधनों और शर्तों को आदेश द्वारा जैसा वह उचित समझे, उपांतरित करेगा और उक्त आदेश की एक प्रति रजिस्ट्रार को, प्रविष्टियों के संशोधन और ऐसे उपांतरणों के अनुसार रजिस्ट्रीकरण का संशोधन करने के लिए भेजेगा तथा रजिस्ट्रार यह सुनिश्चित करेगा कि तद्नुसार ऐसे संशोधन किए जाएं ।
अध्याय 8
पौधा किस्म संरक्षण अपील अधिकरण
54. अधिकरण-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसे प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए एक अधिकरण की स्थापना करेगा जिसे पौधा किस्म संरक्षण अपील अधिकरण कहा जाएगा ।
55. अधिकरण की संरचना-(1) अधिकरण एक अध्यक्ष और उतने न्यायिक सदस्यों तथा तकनीकी सदस्यों से मिलकर बनेगा जितने केन्द्रीय सरकार नियुक्त करना ठीक समझे ।
(2) न्यायिक सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जो भारत के राज्यक्षेत्र में कम-से-कम दस वर्ष तक कोई न्यायिक पद धारण कर चुका है या जो भारतीय विधि सेवा का सदस्य रहा है और जिसने उस सेवा की श्रेणी-2 में कोई पद या कोई समतुल्य या उच्चतर पद कम-से-कम तीन वर्ष तक धारण किया है या जो कम-से-कम बारह वर्ष तक अधिवक्ता रहा है ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए-
(i) उस अवधि की संगणना करने में, जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद धारण किया है, कोई न्यायिक पद उसके द्वारा धारित करने के पश्चात् की ऐसी कोई अवधि सम्मिलित होगी जिसके दौरान व्यक्ति अधिवक्ता रहा है या किसी अधिकरण के सदस्य का पद अथवा संघ या किसी राज्य के अधीन विधि के विशेष ज्ञान की अपेक्षा करने वाला कोई पद धारित किया है;
(ii) उस अवधि की संगणना करने में, जिसके दौरान व्यक्ति अधिवक्ता रहा है, ऐसी कोई अवधि सम्मिलित होगी जिसके दौरान उस व्यक्ति ने न्यायिक पद या किसी अधिकरण के सदस्य का पद अथवा उसके अधिवक्ता बन जाने के पश्चात् संघ या किसी राज्य के अधीन विधि के विशेष ज्ञान की अपेक्षा करने वाला कोई पद धारित किया है ।
(3) तकनीकी सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जो पौधा प्रजनन और आनुवंशिकी के क्षेत्र में विख्यात कृषि विज्ञानी है और उसके पास कम से कम बीस वर्ष का पौधा किस्म या बीज विकास क्रियाकलाप के संबंध में कार्रवाई करने का अनुभव है या जिसने केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार में भारत सरकार के संयुक्त सचिव के समतुल्य पौधा किस्म या बीज विकास के संबंध में कार्रवाई करने वाला पद कम से कम तीन वर्ष तक धारण किया है और उसके पास पौधा प्रजनन और आनुवंशिकी के क्षेत्र में विशेष ज्ञान है ।
(4) केन्द्रीय सरकार अधिकरण के किसी न्यायिक सदस्य को उसका अध्यक्ष नियुक्त करेगी ।
(5) केन्द्रीय सरकार अधिकरण के किसी सदस्य को उसका ज्येष्ठ सदस्य नियुक्त कर सकेगी ।
(6) ज्येष्ठ सदस्य या कोई सदस्य अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और उसके ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जो अध्यक्ष द्वारा, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
56. अधिकरण को अपीलें-(1) अपील, विहित अवधि के भीतर-
(क) किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के आदेश या विनिश्चय; या
(ख) किसी किस्म के अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी के रूप में रजिस्ट्रीकरण के संबंध में रजिस्ट्रार का आदेश या विनिश्चय; या
(ग) फायदे में हिस्सा बंटाने के दावे के संबंध में प्राधिकरण का आदेश या विनिश्चय; या
(घ) अनिवार्य अनुज्ञप्ति के प्रतिसंहरण या अनिवार्य अनुज्ञप्ति के उपांतरण के संबंध में प्राधिकरण के आदेश या विनिश्चय; या
(ङ) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन प्रतिकर के संदाय के संबंध में प्राधिकरण के आदेश या विनिश्चय, के विरुद्ध अधिकरण को की जाएगी ।
(2) प्रत्येक ऐसी अपील लिखित रूप में अर्जी द्वारा की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसमें ऐसी विशिष्टियां अंतर्वर्णित होंगी जो विहित की जाएं ।
(3) इस धारा के अधीन अपील का निपटारा करने में अधिकरण को कोई भी ऐसा आदेश करने की शक्ति होगी जो प्राधिकरण या रजिस्ट्रार इस अधिनियम के अधीन कर सकता है ।
57. अधिकरण के आदेश-(1) अधिकरण, अपील के दोनों पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(2) अधिकरण आदेश की तारीख के तीस दिन के भीतर किसी भी समय, अभिलेख में प्रकट भूल का परिशोधन करने की दृष्टि से उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा पारित किसी आदेश का संशोधन कर सकेगा और यदि भूल को अपीलार्थी या विरोधी पक्षकार द्वारा उसकी जानकारी में लाया जाता है तो ऐसा संशोधन कर सकेगा ।
(3) प्रत्येक अपील में, अधिकरण, जहां यह संभव हो, ऐसी अपील की, अपील फाइल करने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर सुनवाई करेगा और उसका विनिश्चय करेगा ।
(4) अधिकरण इस धारा के अधीन पारित किन्हीं आदेशों की एक प्रति रजिस्ट्रार को भेजेगा ।
(5) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण के आदेश सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होंगे ।
58. अधिकरण की प्रक्रिया-(1) अधिकरण की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन, अधिकरण के अध्यक्ष द्वारा उसके सदस्यों में से गठित न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ।
(2) न्यायपीठ एक न्यायिक सदस्य और एक तकनीकी सदस्य से मिलकर बनेगी ।
(3) यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी मुद्दे पर मतभेद हो तो वे उस मुद्दे या मुद्दों का कथन करेंगे जिन पर उनका मतभेद है और मामले को एक या अधिक अन्य सदस्यों द्वारा ऐसे मुद्दे या मुद्दों पर सुनवाई के लिए अध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जाएगा और ऐसे मुद्दे या मुद्दों का विनिश्चय ऐसे सदस्यों की, जिन्होंने उस मामले की सुनवाई की है, जिसके अंतर्गत वे भी हैं जिन्होंने प्रथमतः उसकी सुनवाई की थी, बहुसंख्या की राय के अनुसार किया जाएगा ।
(4) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण को उसकी शक्तियों के प्रयोग या उसके कृत्यों के निर्वहन से उद्भूत सभी विषयों में, जिसके अंतर्गत वे स्थान भी हैं जहां न्यायपीठें अपनी बैठकें करेंगी स्वयं अपनी प्रक्रिया और उसकी न्यायपीठों की प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्ति होगी ।
(5) अधिकरण को अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए वे सभी शक्तियां होंगी जो धारा 11 के अधीन रजिस्ट्रार में निहित हैं और अधिकरण के समक्ष कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और अधिकरण दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(6) इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के किन्हीं अन्य उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी अंतरिम आदेश (चाहे व्यादेश या रोकादेश के रूप में हो या किसी अन्य रीति में हो) किसी अपील में या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि-
(क) ऐसी अपील और ऐसे अंतरिम आदेश की दलील के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतियां उस पक्षकार को नहीं दे दी जाती हैं जिसके विरुद्ध ऐसी अपील की गई है या किए जाने के लिए प्रस्तावित है;
(ख) ऐसे पक्षकार को उस मामले में सुने जाने का अवसर नहीं दे दिया जाता है ।
59. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, धारा 54 के अधीन अधिकरण की स्थापना होने तक, व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (1999 का 47) की धारा 83 के अधीन स्थापित बौद्धिक संपदा अपील बोर्ड इस अधिनियम के अधीन अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का इस उपांतरण के अधीन रहते हुए प्रयोग करेगा कि इस धारा के प्रयोजनों के लिए गठित बौद्धिक संपदा अपील बोर्ड की किसी पीठ में, व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 84 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट तकनीकी सदस्य के लिए, तकनीकी सदस्य इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया जाएगा और उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए धारा 84 की उपधारा (2) के अधीन पीठ का गठन करने के लिए तकनीकी सदस्य समझा जाएगा ।
अध्याय 9
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
60. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्राधिकरण को अनुदानों और ऋणों के रूप में ऐसी धनराशियों का संदाय करेगी, जो केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए ठीक समझे ।
61. प्राधिकरण निधि-(1) पौधा किस्म संरक्षण प्राधिकरण लेखा नामक एक निधि गठित की जाएगी और उसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा-
(क) धारा 60 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण को दिए गए सभी अनुदान और ऋण;
(ख) प्राधिकरण और रजिस्ट्रार द्वारा प्राप्त सभी फीसें जिनमें धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन फायदे या स्वामित्व के आधार पर अवधारित वार्षिक फीस नहीं है;
(ग) प्राधिकरण द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चित किए जाने वाले अन्य स्रोतों से प्राप्त सभी राशियां ।
(2) पौधा किस्म संरक्षण प्राधिकरण लेखा का उपयोग निम्नलिखित के लिए किया जाएगा-
(क) प्राधिकरण के अध्यक्ष, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य पारिश्रमिक और सदस्यों को संदेय भत्ते, यदि कोई हों;
(ख) इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ और अपने कृत्यों के निर्वहन के संबंध में प्राधिकरण के अन्य व्यय ।
62. बजट, लेखा और संपरीक्षा-(1) प्राधिकरण बजट बनाएगा, उचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख (इसमें जीन निधि के लेखे और अन्य सुसंगत लेखे भी हैं) रखेगा और लेखाओं का वार्षिक विवरण, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे ।
(2) प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय, प्राधिकरण द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के और प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति के, उस संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के साधारणतया सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियों, लेखाओं, संबंधित वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों के पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित प्राधिकरण के लेखे उस पर संपरीक्षा रिपोर्ट सहित केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष भेजे जांएगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
63. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष प्राधिकरण के कृत्यों पर ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा जो विहित की जाएं: परन्तु अध्यक्ष को अपनी ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को जो वह ठीक समझे, प्राधिकरण के किसी सदस्य या किसी अन्य अधिकारी को प्रत्यायोजित करने का अधिकार होगा किन्तु यह इस शर्त के अधीन रहते हुए होगा कि ऐसा सदस्य या अधिकारी ऐसी प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते समय अध्यक्ष के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन रहेगा ।
अध्याय 10
अतिलंघन, अपराध, शास्तियां और प्रक्रिया
अतिलंघन
64. अतिलंघन-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन स्थापित किसी अधिकार का निम्नलिखित व्यक्ति द्वारा अतिलंघन होगा: -
(क) जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म का प्रजनक या उक्त किस्म का रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी नहीं है और उक्त किस्म का, उसके प्रजनक की अनुज्ञा के बिना अथवा, यथास्थिति, उक्त रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी या रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता की अनुज्ञा के बिना रजिस्ट्रीकृत या अनुज्ञप्ति या रजिस्ट्रीकृत अभिकरण के विस्तार के भीतर विक्रय करता है, निर्यात करता है, आयात करता है या उत्पादन करता है;
(ख) जो किसी अन्य किस्म का उस किस्म को इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्म के सदृश अभिधान या उस अभिधान के इतना समरूप अभिधान, जिससे धोखा हो जाए, देते हुए ऐसी रीति से जिससे कि साधारण जनता के मन में इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत उक्त किस्म को पहचानने में भ्रम हो जाए, उपयोग, विक्रय, निर्यात, आयात या उत्पादन करता है ।
65. अतिलंघन, आदि के लिए वाद-(1) कोई वाद, -
(क) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के अतिलंघन के लिए; या
(ख) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म में किसी अधिकार के संबंध में, वाद का विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले जिला न्यायालय से निम्नतर किसी न्यायालय में संस्थित नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के खंड (क) और खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए, अधिकारिता रखने वाला जिला न्यायालय" से ऐसा जिला न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वाद हेतुक उद्भूत होता है ।
66. अतिलंघन के वादों में राहत-(1) धारा 65 में निर्दिष्ट अतिलंघन के किसी वाद में किसी न्यायालय द्वारा अनुदत्त किए जाने वाली राहत में व्यादेश और वादी के विकल्प पर नुकसान या लाभ का एक अंश सम्मिलित है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन व्यादेश के आदेश में निम्नलिखित विषयों में से किसी में एकपक्षीय व्यादेश या कोई अंतरवर्ती आदेश भी है, अर्थात्: -
(क) दस्तावेजों की खोज;
(ख) अतिलंघनकारी किस्म या वाद की विषय-वस्तु से संबंधित दस्तावेज या अन्य साक्ष्य के परिरक्षण;
(ग) प्रतिवादी की ऐसी संपत्ति की कुर्की जिसे न्यायालय ऐसी नुकसानी, खर्चों या अन्य धनीय उपचारों को वसूल करने के लिए आवश्यक समझे, जो वादी को अंतिम रूप में अधिनिर्णीत किए जा सकेंगे ।
67. वैज्ञानिक सलाहकार की राय-(1) जहां न्यायालय को किसी तथ्य के प्रश्न पर या किसी वैज्ञानिक विषय पर, अपनी राय बनानी है वहां वह न्यायालय, वांछित राय बनाने में उसे समर्थ बनाने के लिए, सुझाव देने के लिए या उस विषय में जांच करने और अपनी रिपोर्ट देने के लिए एक स्वंतत्र वैज्ञानिक सलाहकार को नियुक्त कर सकेगा ।
(2) उस वैज्ञानिक सलाहकार को ऐसा पारिश्रमिक या व्ययों का संदाय किया जा सकेगा जो न्यायालय नियत करे ।
अपराध, शास्तियां और प्रक्रिया
68. किसी रजिस्ट्रीकृत किस्म के अभिधान के उपयोजन का प्रतिषेध-(1) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के प्रजनक या उसके रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी या रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता से भिन्न कोई व्यक्ति उस किस्म के अभिधान का यथाविहित रीति से उपयोग नहीं करेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के अभिधान का किसी व्यक्ति द्वारा उपयोजन किया गया समझा जाएगा, जो, -
(क) उक्त किस्म के लिए ही उसका उपयोजन करता है; या
(ख) ऐसे किसी पैकेज पर उपयोजन करता है जिसमें या जिसके साथ उक्त किस्म का विक्रय किया जाता है या विक्रय के लिए प्रदर्शन किया जाता है अथवा विक्रय के लिए व्यापार अथवा उत्पादन के किसी प्रयोजन के लिए ऐसा पैकेज कब्जे में रखता है; या
(ग) ऐसी किस्म को, जिसका विक्रय किया जाता है या विक्रय के लिए प्रदर्शन किया जाता है या जो विक्रय अथवा व्यापार या उत्पादन के किसी प्रयोजन के लिए उसके कब्जे में है, किसी ऐसे पैकेज या अन्य वस्तु में या उसके साथ रखता है, संलग्न करता है या उपाबद्ध करता है, जिसे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत ऐसी किस्म का अभिधान उपयोजित किया गया है; या
(घ) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत उक्त किस्म के अभिधान का ऐसी रीति से उपयोग करता है जिसके द्वारा युक्तियुक्त रूप से ऐसा विश्वास किए जाने की संभावना हो कि, उक्त किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री जिसके संबंध में उसका उपयोग किया गया है, को उक्त अभिधान से अभिहित या वर्णित किया गया है; या
(ङ) उक्त किस्म के संबंध में उक्त अभिधान का किसी विज्ञापन, बीजक, सूचीपत्र, कारोबारी पत्र, कारोबारी कागज, मूल्य सूची या अन्य वाणिज्यिक दस्तावेज में उपयोग करता है और ऐसी किस्म इस प्रकार उपयोग किए गए अभिधान के प्रति निर्देश से किए गए किसी अनुरोध या आदेश के अनुसरण में किसी व्यक्ति को परिदत्त की जाती है ।
(3) कोई अभिधान, किसी किस्म पर उपयोजित किया गया समझा जाएगा, यदि वह ऐसी किस्म या किसी पैकेज या अन्य वस्तु में चाहे बुना हुआ है, या उस पर मुद्रांकित है या उसमें किसी अन्य रूप में खुदा हुआ है या संलग्न है या चिपकाया हुआ है
69. किसी रजिस्ट्रीकृत किस्म के अभिधान के मिथ्या उपयोजन का अर्थ-(1) कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के अभिधान का मिथ्या उपयोजन करने वाला समझा जाएगा जो ऐसी किस्म के प्रजनक की सहमति के बिना, -
(क) किसी किस्म या ऐसे किसी पैकेज पर, जिसमें उक्त किस्म है, उस अभिधान या उसके इतने समरूप, अभिधान का जिससे धोखा हो जाए, उपयोजन करता है;
(ख) ऐसे पैकेज का, जिस पर ऐसा अभिधान है जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के अभिधान के समरूप या इतने समरूप है कि जिससे धोखा हो जाए, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म से भिन्न किस्म को उसमें पैक करने, भरने या लपेटने के प्रयोजन के लिए उपयोग करता है ।
(2) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्म के किसी अभिधान का उपधारा (1) में वर्णित रूप में मिथ्या उपयोग इस अधिनियम में निर्दिष्ट मिथ्या अभिधान समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के अभिधान के मिथ्या उपयोजन के लिए किसी अभियोजन में, उक्त किस्म के प्रजनक की सहमति साबित करने का भार अभियुक्त पर होगा ।
70. मिथ्या अभिधान, आदि के उपयोजन के लिए शास्ति-(1) कोई व्यक्ति जो-
(क) किसी किस्म पर मिथ्या अभिधान का उपयोजन करेगा; या
(ख) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के देश या स्थान अथवा प्रजनक का मिथ्या नाम और पता ऐसी किस्म के व्यापार के दौरान उपदर्शित करेगा,
जब तक कि यह साबित न करे कि उसने धोखा देने के आशय के बिना कार्य किया था, ऐसे कारावास से जिसकी अवधि तीन मास से कम नहीं होगी किंतु जो दो वर्ष तक की हो सकेगी; या ऐसे जुर्माने से जो पचास हजार रुपए से कम नहीं होगा किंतु पांच लाख रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
71. ऐसी किस्मों के विक्रय के लिए शास्ति जिन पर मिथ्या अभिधान का उपयोजन, आदि किया गया हो-कोई व्यक्ति जो ऐसी किस्म का, जिस पर मिथ्या अभिधान का उपयोजन किया गया है या जिस पर उस देश या स्थान का उपदर्शन किया गया है जहां वह किस्म बनी या उत्पादित की गई है या इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत उक्त किस्म के प्रजनक का नाम और पता मिथ्या लिखा गया है, विक्रय करता है या विक्रय के लिए प्रदर्शित करता है अथवा जो विक्रय या व्यापार या उत्पादन के प्रयोजनार्थ उसके कब्जे में है, जब तक वह यह साबित न कर दे कि-
(क) इस धारा में वर्णित अपराध के किए जाने के विरुद्ध सभी युक्तियुक्त पूर्वावधानियां बरतने पर, अधिकथित अपराध किए जाने के समय उसके पास, ऐसी किस्म के अभिधान की असलियत पर संदेह करने का कोई कारण नहीं था अथवा इस बारे में कि उस देश या स्थान के उपदर्शन के संबंध में, जिसमें इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत उक्त किस्म बनाई या उत्पादित की गई है अथवा ऐसी किस्म के प्रजनक के नाम और पते के उपदर्शन के संबंध में कोई अपराध किया गया है;
(ख) अभियोजक द्वारा या उसकी ओर से मांग किए जाने पर उसने, उस व्यक्ति के संबंध में जानकारी जो उसके पास थी, दे दी है जिससे उसने उक्त किस्म अभिप्राप्त की थी; या
(ग) अन्यथा उसने निर्दोषतः कार्य किया था, कारावास से जिसकी अवधि छह मास से कम नहीं होगी किंतु जो दो वर्ष तक की हो सकेगी; या जुर्माने से जो पचास हजार रुपए से कम नहीं होगा किंतु पांच लाख रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
72. किसी किस्म को रजिस्ट्रीकृत रूप में, मिथ्या रूप से व्यपदिष्ट करने के लिए शास्ति-जो कोई ऐसी किसी किस्म के या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री नहीं है, अभिधान के संबंध में इस आशय का कोई व्यपदेशन करेगा कि वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई किस्म है, अथवा इस अधिनियम के अधीन अरजिस्ट्रीकृत किसी किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री के संबंध में इस आशय का व्यपदेशन करेगा कि वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है, कारावास से जिसकी अवधि छह मास से कम नहीं होगी किंतु जो तीन वर्ष तक की हो सकेगी; जुर्माने से जो एक लाख रुपए से कम नहीं होगा किंतु पांच लाख रुपए तक हो सकेगा; या दोनों से, दंडनीय होगा ।
73. पश्चात्वर्ती अपराध के लिए शास्ति-जो कोई इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किया जा चुका है, उक्त अपराध के लिए पुनः दोषिसिद्ध किया जाता है, वह दूसरे और प्रत्येक पश्चात्वर्ती अपराध के लिए कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष से कम नहीं होगी किंतु जो तीन वर्ष तक की हो सकेगी; या जुर्माने से जो दो लाख रुपए से कम नहीं होगा किंतु बीस लाख रुपए तक हो सकेगा; या दोनों से, दंडनीय होगा ।
74. कतिपय मामलों में कोई अपराध न होना-अपराधों से संबंधित इस अधिनियम के उपबंध इस अधिनियम द्वारा यथा मान्यता प्राप्त सृजित अधिकार के अधीन रहते हुए होंगे और कोई कार्य या लोप इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन अपराध नहीं समझा जाएगा यदि ऐसा कार्य या लोप इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञेय है ।
75. कारबार के साधारण अनुक्रम में नियोजित कतिपय व्यक्तियों को छूट-जहां इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त कोई व्यक्ति यह साबित कर देता है कि अपने नियोजन के साधारण अनुक्रम में, उसने अपराध करने के किसी आशय के बिना कार्य किया है और आरोपित अपराध करने के विरुद्ध सभी युक्तियुक्त पूर्वावधानियां उसने की थी और अधिकथित अपराध के किए जाने के समय, अपराध के रूप में आरोपित कार्य को असलियत पर संदेह करने का उसके पास कोई कारण नहीं था तथा अभियोजक द्वारा या उसकी ओर से मांग किए जाने पर उसने उन व्यक्तियों के संबंध में जिनके निमित्त वह अपराध किया गया था अपने पास की सभी सूचना उसने दी थी, तो उसे दोषमुक्त कर दिया जाएगा ।
76. अभियुक्त द्वारा रजिस्ट्रीकरण की अविधिमान्यता का अभिवचन करने पर प्रक्रिया-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन आरोपित अपराध, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकत किसी किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री अथवा अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री से संबंधित है और अभियुक्त यह अभिवचन करता है कि, यथास्थिति, उक्त किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री की या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री का रजिस्ट्रीकरण अविधिमान्य है और न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उक्त अपराध प्रथमदृष्ट्या मान्य नहीं है तो वह उस आरोप के संबंध में आगे कार्यवाही नहीं करेगा और कार्यवाहियों को उस तारीख से जिसको अभियुक्त का अभिवचन लेखबद्ध किया जाता है तीन मास के लिए स्थगित कर देगा जिससे कि अभियुक्त इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रार के समक्ष इस आधार पर कि रजिस्ट्रीकरण अविधिमान्य है, रजिस्टर के परिशोधन के लिए आवेदन फाइल करने में समर्थ हो सके ।
(2) यदि अभियुक्त न्यायालय में यह प्रमाणित कर देता है कि उसने परिसीमित समय के भीतर अथवा उतने और समय के भीतर जो न्यायालय पर्याप्त कारणवश अनुज्ञात करे, आवेदन किया था तो अभियोजन की कार्यवाहियां परिशोधन के ऐसे आवेदन के निपटान तक स्थगित हो जाएगी ।
(3) यदि अभियुक्त तीन मास की अवधि के भीतर अथवा उतने और समय के भीतर जो न्यायालय द्वारा अनुज्ञात किया जाए रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर के परिशोधन के लिए आवेदन करने में असफल रहता है तो न्यायालय उक्त मामले में इस प्रकार कार्यवाही करेगा जैसे कि रजिस्ट्रीकरण विधिमान्य हो ।
(4) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अपराध के परिवाद के संस्थापन से पूर्व, यथास्थिति, प्रश्नगत किस्म के या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री के रजिस्ट्रीकरण की अविधिमान्यता के आधार पर रजिस्टर के परिशोधन के लिए आवेदन पहले ही उचित तौर पर किया जा चुका है और रजिस्ट्रार के समक्ष लंबित है, तो न्यायालय पूर्वोक्त आवेदन के निपटान के लंबित रहने तक आगे कार्यवाहियां रोक देगा और परिशोधन के आवेदन के परिणाम के अनुरूप अभियुक्त के विरुद्ध आरोप का अवधारण करेगा ।
77. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाला व्यक्ति कोई कंपनी है, तो कंपनी और ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध किए जाने के समय उसके कारबार के संचालन के लिए भारसाधक है या कंपनी के प्रति उत्तरदायी है, अपराध का दोषी समझा जाएगा और अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए तथा तद्नुसार दंडित किए जाने के लिए दायी होगा:
परंतु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को किसी दंड के लिए दायी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि वह अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने उक्त अपराध के किए जाने को निवारित करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में अतंर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया हो और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति से या मौनानुकूलता से किया गया हो अथवा उनकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता हो तो ऐसे निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी को भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और वे अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और तद्नुसार दंडित किए जाने के लिए दायी होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और उसमें कोई फर्म या व्यक्तियों का अन्य संगम भी है; और
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से अभिप्रेत है किसी फर्म का भागीदार ।
अध्याय 11
प्रकीर्ण
78. भारत की सुरक्षा का संरक्षण-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार-
(क) इस अधिनियम के अधीन किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण या किसी किस्म के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित किसी आवेदन से संबंधित किसी ऐसी जानकारी को प्रकट नहीं करेगा जिसे वह भारत की सुरक्षा के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली समझता है; और
(ख) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत ऐसी किस्मों के रजिस्ट्रीकरण के रद्दकरण से संबंधित कोई कार्रवाई करेगा जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, भारत की सुरक्षा के हित में, विनिर्दिष्ट करे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, भारत की सुरक्षा" पद से अभिप्रेत है भारत की सुरक्षा के लिए आवश्यक ऐसी कोई कार्रवाई, जो प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः युद्ध या सैनिक स्थापन के प्रयोजनों के लिए या अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में युद्ध या अन्य आपात प्रयोजनों के लिए इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म के किसी उत्पादन के उपयोग से संबंधित है ।
79. रजिस्ट्रीकृत किस्म के विक्रय पर विवक्षित वारंटी, आदि-जहां इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत, किसी किस्म के या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न सामग्री या उसकी प्रवर्धन सामग्री के अभिधान को, यथास्थिति, विक्रय पर या किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न सामग्री या उसकी प्रवर्धन सामग्री को अथवा किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न सामग्री या उसकी प्रवर्धन सामग्री के विक्रय की संविदा को लागू किया गया हो तो विक्रेता द्वारा यह वारंटी दी गई समझी जाएगी कि अभिधान असली अभिधान है न कि मिथ्या के रूप से लागू किया गया है, जब तक कि वे विक्रेता द्वारा या उसकी ओर से उसके प्रतिकूल कुछ लिखित में अभिव्यक्त न किया गया हो और, यथास्थिति, उक्त किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्य रूप से व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री के विक्रय के समय क्रेता को संविदा पर परिदत्त न किया गया हो और क्रेता द्वारा स्वीकार न किया गया हो ।
80. कार्यवाही के पक्षकार की मृत्यु-यदि किसी व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही (जो किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं है) का पक्षकार है, कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो, यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार, निवेदन किए जाने पर और ऐसे प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के समाधानप्रद रूप में प्रमाणित किए जाने पर कि मृतक व्यक्ति के हित का पारेषण हो गया है, कार्यवाहियों में उसके स्थान पर उसके हित में उत्तराधिकारी को प्रतिस्थापित कर देगा अथवा यदि प्राधिकरण या रजिस्ट्रार का यह मत हो कि मृतक व्यक्ति के हित का उत्तरजीवी पक्षकार द्वारा पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व हो रहा है तो वह उसके हित में उत्तराधिकारी के प्रतिस्थापन के बिना कार्यवाहियों को जारी रखे जाने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
81. रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता और रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी का वाद संस्थित करने का अधिकार-इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री का रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी, यथास्थिति, ऐसी किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म या उसकी प्रवर्धन सामग्री के प्रजनक की ओर से, यदि ऐसे अभिकर्ता या अनुज्ञप्तिधारी को ऐसे प्रजनक द्वारा ऐसा करने के लिए विहित रीति से प्राधिकृत किया गया हो तो, इस अधिनियम के अधीन न्यायालय में समुचित कार्यवाहियां संस्थित कर सकेगा ।
82. रजिस्टर में की प्रविष्टि आदि और प्राधिकरण तथा रजिस्ट्रार द्वारा की गई किसी बात का साक्ष्य-(1) रजिस्टर में किसी प्रविष्टि या इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए किसी दस्तावेज की प्रति जो प्राधिकरण या रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणित तात्पर्यित हो और, यथास्थिति, उस पर उक्त प्राधिकरण या रजिस्ट्रार की मुद्रा अंकित हो, सभी न्यायालयों में और सभी कार्यवाहियों में किसी अन्य प्रमाण के बिना या मूल पेश किए जाने के बिना साक्ष्य में ग्राह्य होगी ।
(2) किसी प्रविष्टि, विषय या बात के संबंध में, यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर से जारी तात्पर्यित प्रमाणपत्र कि उक्त प्राधिकरण या रजिस्ट्रार इस अधिनियम या नियमों द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधिकृत है, इस बात का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगा कि वह प्रविष्टि और उसकी अन्तर्वस्तु या वह विषय या बात की गई है या नहीं की गई है ।
83. प्राधिकरण, रजिस्ट्रार तथा अन्य अधिकारी रजिस्टर, आदि पेश करने के लिए बाध्य न होंगे-प्राधिकरण या रजिस्ट्रार या, यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के अधीन कार्य करने वाला कोई अधिकारी किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में अपनी अभिरक्षा में के किसी रजिस्टर या किसी अन्य दस्तावेज, जिसकी अंतर्वस्तु इस अधिनियम के अधीन विहित रीति से जारी की गई किसी प्रमाणित प्रति को पेश करके साबित की जा सकती हो, को पेश करने के लिए अथवा उसमें अभिलिखित किसी विषय को प्रमाणित करने के लिए साक्षी के रूप में हाजिर होने के लिए बाध्य नहीं होंगे जब तक कि किसी विशेष मामले में न्यायालय द्वारा वैसा आदेश न किया गया हो ।
84. लोक निरीक्षण के लिए खुला दस्तावेज-कोई व्यक्ति, यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार को आवेदन करके और ऐसी फीस के संदाय पर जो विहित की जाए, रजिस्टर में की किसी प्रविष्टि अथवा ऐसे प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के समक्ष लंबित इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में के किसी दस्तावेज की प्रमाणित प्रति अभिप्राप्त कर सकता है या ऐसी प्रविष्टि अथवा दस्तावेज का निरीक्षण कर सकता है ।
85. प्राधिकरण की रिपोर्ट का संसद् के समक्ष रखा जाना-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण के कार्य से संबंधित रिपोर्ट को प्रति वर्ष संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
86. सरकार का बाध्य होना-इस अधिनियम के उपबंध सरकार के लिए आबद्धकर होंगे ।
87. प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के समक्ष कार्यवाहियां-इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, किसी किस्म या अनिवार्यतः व्युत्पन्न किस्म के रजिस्ट्रीकरण, अभिकर्ता के रजिस्ट्रीकरण या अनिवार्य अनुज्ञापन के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित, यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के समक्ष सभी कार्यवाहियां धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 196 के प्रयोजनार्थ न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी और, यथास्थिति, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनार्थ सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
88. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-केन्द्रीय सरकार या अध्यक्ष या सदस्य या रजिस्ट्रार या इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन ऐसी सरकार, प्राधिकरण या रजिस्ट्रार के अधीन कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, स्कीम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाहियां नहीं लाई जाएंगी ।
89. अधिकारिता का वर्जन-ऐसे किसी विषय की बाबत जिसका प्राधिकरण या रजिस्ट्रार या अधिकरण इस अधिनियम या इसके अधीन अवधारण करने के लिए सशक्त है, किसी सिविल न्यायालय को अधिकारिता नहीं होगी ।
90. प्राधिकरण, आदि के सदस्यों और कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना-प्राधिकरण का अध्यक्ष, सदस्य, अधिकारी और अन्य कर्मचारी तथा महारजिस्ट्रार और उसके अधीन कार्य करने वाले अन्य अधिकारी और कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ।
91. धन और आय पर कर से छूट-धन कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या धन, आय, लाभ या अभिलाभ से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी प्राधिकरण, अपने धन, आय, व्युत्पन्न लाभ या अभिलाभ पर धन कर, आय-कर या कोई अन्य कर देने के लिए दायी नहीं होगा ।
92. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंधों का, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि अथवा इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के कारण प्रभावी किसी अन्य लिखत में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होगा ।
93. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार प्राधिकरण को ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों और विनियमों के किन्हीं उपबंधों के अधीन प्राधिकरण के सभी या किसी कृत्य के निष्पादन के लिए लोकहित में आवश्यक समझे ।
94. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उबपंधों से असंगत न हो, और कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हो:
परंतु इस धारा के अधीन कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
95. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकर के पूर्व अनुमोदन से राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी विषय के बारे में उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) धारा 12 की उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रारों के कर्तव्य और उनकी अधिकारिता;
(ख) धारा 12 की उपधारा (5) के अधीन रजिस्ट्रारों की पदावधि और सेवा की शर्तें;
(ग) धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन विद्यमान किस्म के रजिस्ट्रीकरण के लिए सुभिन्नता, एकरूपता और स्थायित्व का मापमान;
(घ) वह रीति जिसमें धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन आवेदक द्वारा किसी किस्म के एकल और सुभिन्न अभिधान समनुदेशित किए जाएंगे;
(ङ) धारा 17 की उपधारा (2) के अधीन किसी किस्म के अभिधान का समनुदेशन करने वाले विषय;
(च) वह समय जिसके भीतर रजिस्ट्रार धारा 17 की उपधारा (3) के अधीन आवेदक से कोई अन्य अभिधान प्रस्तावित करने की अपेक्षा कर सकेगा;
(छ) धारा 18 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन आवेदन का प्ररूप;
(ज) धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन परीक्षणों के दौरान बीजों के मूल्यांकन के लिए मानक;
(झ) प्रजनक द्वारा निक्षेप किए जाने वाले मूल बीजों सहित बीजों की मात्रा या अन्य प्रवर्धन सामग्री और वह समय, जो धारा 27 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ञ) वे परिसीमाएं और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए प्रजनक धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन किसी व्यक्ति को किस्मों का उत्पादन, विक्रय, विपणन या अन्यथा संव्यवहार करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा;
(ट) धारा 28 की उपधारा (3) के अधीन प्राधिकार का प्ररूप ।
96. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किसी विषय के बारे में उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(i) धारा 3 की उपधारा (6) के अधीन अध्यक्ष की पदावधि और उक्त पद को भरे जाने की रीति;
(ii) धारा 3 की उपधारा (8) के अधीन अध्यक्ष का वेतन और भत्ते तथा छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि और अन्य विषयों की बाबत सेवा की शर्तें और अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए गैर सरकारी सदस्यों के भत्ते;
(iii) प्राधिकरण के अधिवेशनों का समय और स्थान तथा उसके अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन प्रक्रिया के नियम [इसमें उसके अधिवेशनों में गणपूर्ति और धारा 3 की उपधारा (7) के अधीन नियुक्त स्थायी समिति के कारबार का संव्यवहार भी है];
(iv) धारा 6 के अधीन प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित नियंत्रण और निर्बंधन और ऐसी नियुक्ति की रीति, वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें;
(v) धारा 7 के अधीन अध्यक्ष की शक्तियां और कर्तव्य;
(vi) वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए तथा वह रीति जिसमें धारा 8 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट उपाय, उस धारा की उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन विद्यमान नई किस्मों के रजिस्ट्रीकरण के लिए उपबंध कर सकेंगे;
(vii) धारा 8 की उपधारा (2) के खंड (ङ) के अधीन बीजों के उत्पादन और विक्रय की व्यवस्था की रीति;
(viii) धारा 11 के खंड (ख) के अधीन प्राधिकरण या रजिस्ट्रार द्वारा लागत के बारे में आदेश;
(ix) पौधा किस्म के महारजिस्ट्रार का वेतन और भत्ते तथा धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन उसकी छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि और अन्य विषयों के संबंध में सेवा की शर्तें;
(x) धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय पौधा किस्म रजिस्टर में सम्मिलित किए जाने वाले विषय;
(xi) धारा 16 की उपधारा (1) के खंड (ङ) के अधीन किसी व्यक्ति को प्राधिकृत करने की रीति;
(xii) धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन जिसके साथ खंड (छ) के अधीन फीस और खंड (झ) के अधीन अन्य विशिष्टियां होंगी;
(xiii) धारा 18 की उपधारा (1) के परन्तुक के अधीन आवेदन का प्ररूप;
(xiv) वह अवधि जिसके भीतर धारा 18 की उपधारा (3) के अधीन आवेदन करने के पश्चात् अधिकार का सबूत पेश किया जाएगा;
(xv) धारा 19 की उपधारा (2) के अधीन आवेदक द्वारा निक्षिप्त की जाने वाली फीस;
(xvi) धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन परीक्षण करने की रीति और ढंग;
(xvii) धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए किस्म के आवेदन, शर्तों या परिसीमाओं और विनिर्देशों को विज्ञाप्ति करने की रीति जिसके अंतर्गत फोटोग्राफ या आरेखन भी हैं;
(xviii) धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन सूचना देने की रीति और उसके लिए संदेय फीस;
(xix) धारा 21 की उपधारा (4) के अधीन प्रतिकथन भेजने की रीति;
(xx) धारा 21 की उपधारा (6) के अधीन साक्ष्य प्रस्तुत करने की रीति और वह समय जिसके भीतर ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सकेगा;
(xxi) धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन दस्तावेज और फीस तथा उपधारा (3) के अधीन किए जाने वाले परीक्षण और अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;
(xxii) धारा 23 की उपधारा (8) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्ररूप और अन्य प्राधिकारी जिसको उसकी प्रति भेजी जाएगी;
(xxiii) धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्ररूप और अन्य प्राधिकारी जिसको उसकी प्रति भेजी जाएगी और रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी किए जाने के लिए अधिकतम समय;
(xxiv) धारा 24 की उपधारा (3) के अधीन आवेदक को सूचना देने की रीति;
(xxv) धारा 24 की उपधारा (6) के अधीन पुनर्विलोकन और नवीकरण के लिए फीस;
(xxvi) धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन प्रमाणपत्र की अंतर्वस्तु और ऐसी अंतर्वस्तु के प्रकाशन रीति तथा फायदों में हिस्सा बटाने के दावे आमंत्रित करने की रीति;
(xxvii) धारा 26 की उपधारा (2) के अधीन फायदे में हिस्सा बटाने के लिए दावा प्रस्तुत करने का प्ररूप और उसके साथ संदेय फीस;
(xxviii) वह रीति और समय जिसके भीतर धारा 26 की उपधारा (3) के अधीन दावों का विरोध प्रस्तुत किया जाएगा;
(xxix) धारा 26 की उपधारा (7) के अधीन निर्देश करने की रीति;
(xxx) धारा 28 की उपधारा (4) के अधीन हक के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने की रीति और उसके साथ संदेय फीस;
(xxxi) धारा 28 की उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन हक के रजिस्ट्रीकरण के संबंध में विवादों को निर्दिष्ट करने की रीति;
(xxxii) धारा 28 की उपधारा (5) के अधीन हक की संक्षिप्त शर्तों को प्रमाणपत्र में प्रविष्ट करने की रीति;
(xxxiii) धारा 28 की उपधारा (9) के खंड (क) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के निबंधनों में परिवर्तन के लिए आवेदन करने की रीति;
(xxxiv) धारा 28 की उपधारा (9) के खंड (ख) के अधीन रजिस्ट्रीकृत प्रजनक और कतिपय अन्य द्वारा रजिस्ट्रीकरण के निबंधनों के रद्दकरण के लिए आवेदन करने की रीति;
(xxxv) धारा 28 की उपधारा (9) के खंड (ग) के अधीन प्रजनक, उसके उत्तराधिकारी, रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा रजिस्ट्रीकरण के निबंधनों के रद्दकरण के लिए आवेदन करने की रीति;
(xxxvi) धारा 28 की उपधारा (9) के खंड (घ) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के निबंधनों के रद्दकरण के लिए आवेदन करने की रीति;
(xxxvii) धारा 28 की उपधारा (9) के खंड (ङ) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के निबंधनों के रद्दकरण के लिए आवेदन करने की रीति;
(xxxviii) धारा 28 की उपधारा (10) के अधीन किसी किस्म के रजिस्ट्रीकृत संवर्धक या उसके उत्तराधिकारी या ऐसे प्रत्येक रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी को (जो आवेदक न हो) सूचना जारी करने की रीति;
(xxxix) धारा 33 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रार को सूचना देने की रीति;
(xl) धारा 33 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी को अधिसूचित करने की रीति;
(xli) वह अवधि जिसके भीतर धारा 33 की उपधारा (3) के अधीन विरोध की सूचना दी जा सकेगी;
(xlii) धारा 34 के अधीन आवेदन करने की रीति;
(xliii) धारा 35 की उपधारा (2) के अधीन फीस निक्षेप करने की रीति;
(xliv) धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन करने की रीति;
(xlv) धारा 36 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रार को आवेदन करने की रीति;
(xlvi) धारा 36 की उपधारा (4) के अधीन सूचना देने की रीति;
(xlvii) धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन की रीति;
(xlviii) धारा 37 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन करने की रीति;
(xlix) धारा 38 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रार को आवेदन करने की रीति;
(l) धारा 38 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन को विज्ञापित करने और रजिस्ट्रार को सूचना देने की रीति तथा विज्ञापन की तारीख से वह समय जिसके भीतर कोई व्यक्ति ऐसी सूचना दे सकेगा;
(li) धारा 38 की उपधारा (3) के अधीन किस्म के अभिधान के विज्ञापन की रीति;
(lii) धारा 39 की उपधारा (1) के खंड (iii) के अधीन जीन निधि की मान्यता और उससे प्रतिफल देने की रीति;
(liii) धारा 39 की उपधारा (2) के अधीन प्रतिकर का दावा करने और विरोध दाखिल करने की रीति;
(liv) धारा 41 की उपधारा (3) के अधीन सूचना जारी करने और आक्षेप फाइल करने की रीति;
(lv) धारा 45 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन फायदे में हिस्सा प्राप्त करने की रीति;
(lvi) धारा 45 की उपधारा (2) के अधीन जीन निधि का उपयोजन करने की रीति;
(lvii) धारा 47 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन में अंतर्विष्ट की जाने वाली विशिष्टियां;
(lviii) प्राधिकरण और वह रीति जिसमें ऐसा प्राधिकरण धारा 50 के अधीन अनिवार्य अनुज्ञप्तिधारी को किस्म की पुनरोत्पादन सामग्री उपलब्ध कराएगा;
(lix) धारा 52 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन करने का प्ररूप;
(lx) वह अवधि जिसके भीतर धारा 56 की उपधारा (1) के अधीन अपील की जाएगी;
(lxi) अर्जी का प्ररूप और वे विशिष्टियां जो धारा 56 की उपधारा (2) के अधीन ऐसी अर्जी में अंतर्विष्ट होगी;
(lxii) धारा 62 की उपधारा (1) के अधीन लेखाओं का वार्षिक विवरण तैयार करने का प्ररूप;
(lxiii) धारा 63 के अधीन अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वाली वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां;
(lxiv) धारा 68 की उपधारा (1) के अधीन किस्म के अभिधान का उपयोग करने की रीति;
(lxv) धारा 81 के अधीन रजिस्ट्रीकृत अभिकर्ता या रजिस्ट्रीकृत अनुज्ञप्तिधारी को प्राधिकृत करने की रीति;
(lxvi) धारा 83 के अधीन रजिस्टर या किसी अन्य दस्तावेज की अन्तर्वस्तु की प्रमाणित प्रति जारी करने की रीति;
(lxvii) धारा 84 के अधीन रजिस्टर या किसी अन्य दस्तावेज में किसी प्रविष्टि की प्रमाणित प्रति अभिप्राप्त करने या निरीक्षण करने के लिए संदेय फीस;
(lxviii) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना हो या विहित किया जाए अथवा जिसके संबंध में इस अधिनियम में कोई उपबंध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबंध किया गया है और केन्द्रीय सरकार की राय के उक्त उपबंध इस अधिनियम के उचित कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हैं ।
97. नियमों, विनियमों और स्कीमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम और स्कीम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । वह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम या स्कीम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम या स्कीम नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किंतु नियम या विनियम या स्कीम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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