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होम्योपैथी केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1973 ( Homoeopathy Central Council Act, 1973 )


 

होम्योपैथी केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1973

(1973 का अधिनियम संख्यांक 59)

[19 दिसम्बर, 1973]

होम्योपैथी की एक केन्द्रीय परिषद् के गठन और होम्योपैथी का एक

केन्द्रीय-रजिस्टर रखे जाने तथा उनसे संबंधित विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के चौबीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम होम्योपैथी केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1973 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह किसी राज्य में उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस राज्य के लिए इस निमित्त नियत करे तथा विभिन्न राज्यों के लिए और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकती हैं ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) बोर्ड" से (किसी भी नाम से ज्ञात) होम्योपैथी का कोई बोर्ड, परिषद्, परीक्षा-निकाय या संकाय अभिप्रेत है जो होम्योपैथी की चिकित्सीय अर्हताएं प्रदान करने और होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों का रजिस्ट्रीकरण करने का विनियमन करने वाली किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन, किसी राज्य सरकार द्वारा, गठित किया गया है; 

(ख) केन्द्रीय परिषद्" से धारा 3 के अधीन गठित होम्योपैथी की केन्द्रीय परिषद् अभिप्रेत है;

(ग) होम्योपैथी का केन्द्रीय-रजिस्टर" से केन्द्रीय परिषद् द्वारा इस अधिनियम के अधीन रखा गया रजिस्टर अभिप्रेत है; 

(घ) होम्योपैथी” से चिकित्सा की होम्योपैथी पद्धति अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत जीव-रसायनिक उपचारों का उपयोग भी है;

(ङ) चिकित्सीय संस्था" से भारत के भीतर या बाहर स्थित ऐसी संस्था अभिप्रेत है जो होम्योपैथी में उपाधियां, डिप्लोमे या अनुज्ञप्तियां प्रदान करती है; 

(च) विहित" से विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;  

(छ) मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता" से द्वितीय या तृतीय अनुसूची में सम्मिलित होम्योपैथी की चिकित्सीय अर्हताओं में से कोई अभिप्रेत है; 

(ज) विनियम" से धारा 33 के अधीन बनाया गया विनियम अभिप्रेत है;

(झ) होम्योपैथी का राज्य-रजिस्टर" से अभिप्रेत है ऐसा रजिस्टर या ऐसे रजिस्टर जो किसी राज्य में होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों के रजिस्ट्रीकरण का विनियमन करने वाली तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रखा जाता है या रखे जाते हैं; 

(ञ) विश्वविद्यालय" से भारत में स्थित ऐसा विश्वविद्यालय अभिप्रेत है जो विधि द्वारा स्थापित किया गया है और जिसमें होम्योपैथी का संकाय है तथा इसके अन्तर्गत भारत में स्थित ऐसा विश्वविद्यालय भी है जो विधि द्वारा स्थापित किया गया है और जिसमें होम्योपैथी के शिक्षण, अध्यापन, प्रशिक्षण या अनुसंधान की व्यवस्था है ।  

(2) इस अधिनियम में, जम्मू-कश्मीर राज्य में अप्रवृत्त किसी विधि के प्रति किसी निर्देश का, उस राज्य के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति, यदि कोई है, निर्देश है ।

 

अध्याय 2

केन्द्रीय परिषद् और उसकी समितियां

3. केन्द्रीय परिषद् का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, एक केन्द्रीय परिषद्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, गठित करेगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-

(क) प्रत्येक ऐसे राज्य से, जिसमें होम्योपैथी का राज्य-रजिस्टर रखा जाता है, पांच से अनधिक उतने सदस्य जितने प्रथम अनुसूची के उपबन्धों के अनुसार केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं, जो उस रजिस्टर में होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों के रूप में नाम दर्ज व्यक्तियों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे; 

(ख) प्रत्येक विश्वविद्यालय से एक-एक सदस्य, जो उस विश्वविद्यालय के होम्योपैथी के (किसी भी नाम से ज्ञात) संकाय या विभाग के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किया जाएगा :

परन्तु जब तक होम्योपैथी का ऐसा कोई संकाय या विभाग कम से कम सात विश्वविद्यालयों में आरम्भ नहीं हो जाता है, केन्द्रीय सरकार भारत के भीतर स्थित चिकित्सीय संस्थाओं के शिक्षण कर्मचारिवृन्द में से सात से अनधिक उतने सदस्य नामनिर्देशित कर सकेगी जितने केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं; किन्तु इस खण्ड के अधीन ऐसे नामनिर्दिष्ट और निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या किसी भी दशा में सात से अधिक नहीं होगी ;  

(ग) खण्ड (क) और (ख) के अधीन निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या के चालीस प्रतिशत से अनधिक उतने सदस्य जितने केन्द्रीय सरकार उन व्यक्तियों में से, जिन्हें होम्योपैथी या अन्य संबंधित विषयों का विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव है, नामनिर्दिष्ट करें :

                परन्तु तब तक के लिए जब तक कि इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुसार, खण्ड (क) या खण्ड (ख) के अधीन सदस्यों का निर्वाचन नहीं हो जाता, केन्द्रीय सरकार उतने सदस्य नामनिर्दिष्ट करेगी जितने वह ठीक समझे और ये व्यक्ति, यथास्थिति, उक्त खण्ड (क) या खण्ड (ख) के अधीन इस रूप में चुने जाने के लिए अर्हित व्यक्ति होंगे; तथा इस अधिनियम में निर्वाचित सदस्यों के प्रति निर्देशों का अर्थ इस प्रकार लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत इस प्रकार नामनिर्दिष्ट सदस्यों के प्रति              निर्देश भी है ।

(2) केन्द्रीय परिषद् के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष केद्रीय परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने में से ऐसी रीति से निर्वाचित किए जाएंगे जो विहित की जाए :

परन्तु केन्द्रीय परिषद् के प्रथम गठन से दो वर्ष तक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्रीय परिषद् के सदस्यों में से नामनिर्देशित किए जाएंगे तथा इस प्रकार नामनिर्देशित अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, धारा 7 की उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेंगे । 

4. निर्वाचन का ढंग-(1) धारा 3 की उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ख) के अधीन निर्वाचन केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे नियमों के अनुसार संचालित किया जाएगा जो उसके द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं ।

(2) जहां केन्द्रीय परिषद् के लिए किसी निर्वाचन के बारे में कोई विवाद उठे, वहां उसे केन्द्रीय सरकार को निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।

5. निर्वाचनों और सदस्यता पर निर्बन्धन-(1) कोई व्यक्ति तब तक केन्द्रीय परिषद् के लिए निर्वाचित किए जाने का पात्र नहीं होगा जब तक उसके पास द्वितीय या तृतीय अनुसूची में सम्मिलित चिकित्सीय अर्हताओं में से कोई न हो, होम्योपैथी के किसी राज्य-रजिस्टर में उसका नाम दर्ज न हो और वह संबंधित राज्य में निवास न करता हो । 

(2) कोई व्यक्ति एक समय में एक से अधिक हैसियत में सदस्य के रूप में काम नहीं कर सकेगा ।

6. केन्द्रीय परिषद् का निगमन-केन्द्रीय परिषद् होम्योपैथी की केन्द्रीय परिषद् के नाम की शाश्वत् उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली एक निगमित निकाय होगी तथा उसे जंगम और स्थावर सम्पत्ति दोनों का ही अर्जन, धारण और व्ययन करने की तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उस पर वाद लाया जाएगा ।

7. केन्द्रीय परिषद् के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि-(1) केन्द्रीय परिषद् का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य, यथास्थिति, निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किए जाने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि पर्यन्त या जब तक उसका उत्तराधिकारी सम्यक् रूप से निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट नहीं हो जाता, जो भी अवधि दीर्घतर हो, पद धारण करेगा । 

(2) जो व्यक्ति केन्द्रीय परिषद् के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण करता है, या जिसने ऐसा पद धारण किया है, वह केवल एक ही बार उस पद पर पुनर्निर्वाचित होने का पात्र होगा ।

(3) केन्द्रीय परिषद् के सदस्य पुनःनिर्वाचन या पुनःनामनिर्देशन के पात्र होंगे ।

(4) यदि कोई निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट सदस्य, किसी ऐसे कारण के बिना, जो केन्द्रीय परिषद् की राय में पर्याप्त करण है, केन्द्रीय परिषद् के तीन क्रमवर्ती मामूली अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है अथवा, धारा 3 की उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन निर्वाचित सदस्य की दशा में, होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नाम दर्ज नहीं रह जाता, अथवा, यदि उस उपधारा के खण्ड (ख) के अधीन निर्वाचित सदस्य की दशा में, संबंधित विश्वविद्यालय के होम्योपैथी के (किसी भी नाम से ज्ञात) संकाय या विभाग का सदस्य नहीं रह जाता, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अपना स्थान रिक्त कर दिया है । 

(5) केन्द्रीय परिषद् में की आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, निर्वाचन या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और उस रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट व्यक्ति उस अवधि के अवशिष्ट भाग के लिए पद धारण करेगा जिसके लिए यह सदस्य, जिसका स्थान वह ले, निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किया गया था ।

(6) जब किसी सदस्य की बाबत पांच वर्ष की उक्त अवधि अवसित होने को हो तो उक्त अवधि के अवसान के पूर्व तीन मास के भीतर किसी भी समय एक उत्तराधिकारी निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किया जा सकता है किन्तु वह तब तक पद ग्रहण नहीं करेगा जब तक कि उक्त अवधि समाप्त नहीं हो जाती है ।

8. केन्द्रीय परिषद् के अधिवेशन-(1) केन्द्रीय परिषद् का अधिवेशन प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार ऐसे समय तथा स्थान पर होगा जो केन्द्रीय परिषद् द्वारा नियत किया जाए । 

(2)  जब तक अन्यथा विहित न किया जाए, गणपूर्ति केन्द्रीय परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से होगी और केन्द्रीय परिषद् के सब कार्यों का विनिश्चय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की बहुसंख्या द्वारा होगा ।

9. कार्यकारिणी समिति तथा अन्य समितियां-(1) केन्द्रीय परिषद् अपने सदस्यों में से एक कार्यकारिणी समिति और साधारण या विशेष प्रयोजनों के लिए अन्य ऐसी समितियां गठित करेगी जैसी वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझती है । 

(2) (i) कार्यकारिणी समिति (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् समिति कहा गया है), अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, जो पदेन सदस्य होंगे और पांच से अन्यून तथा सात से अनधिक ऐसे सदस्यों में मिलकर बनेगी जो केन्द्रीय परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित किए जाएंगे; 

(ii) अध्यक्ष और उपाध्यक्ष समिति के क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होंगे; 

(iii) समिति, इस अधिनियम द्वारा उसे प्रदत्त शक्तियों और उस पर अधिरोपित कर्तव्यों के अतिरिक्त, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगी जो केन्द्रीय परिषद् द्वारा, किन्हीं ऐसे विनियमों द्वारा जो इस निमित्त बनाए जाएं, उसे प्रदान की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं । 

10. समितियों के अधिवेशन-(1) धारा 9 के अधीन गठित समितियों के अधिवेशन प्रत्येक वर्ष में कम से कम दो बार ऐसे समयों तथा स्थानों पर होंगे जो केन्द्रीय परिषद् द्वारा नियत किए जाएं । 

(2) जब तक अन्यथा विहित न किया जाए, गणपूर्ति समिति के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से होगी और समिति के सब कार्यों का विनिश्चय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की बहुसंख्या द्वारा होगा ।

11. केन्द्रीय परिषद् के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-केन्द्रीय परिषद्-

(क) एक रजिस्ट्रार नियुक्ति करेगी जो सचिव के रूप में भी कार्य करेगा; 

(ख) अन्य ऐसे व्यक्तियों को नियोजित करेगी जिन्हें वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझे; 

(ग) रजिस्ट्रार से या किसी अन्य कर्मचारी से उसके कर्तव्यों के सम्यक् पालन के लिए उतनी प्रतिभूति की अपेक्षा करेगी और लेगी जितनी केन्द्रीय परिषद् आवश्यक समझे; तथा

(घ) केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से वे पारिश्रमिक और भत्ते नियत करेगी जो केन्द्रीय परिषद् के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों को तथा उसकी समितियों के सदस्यों को दिए जाएंगे, और केन्द्रीय परिषद् के कर्मचारियों की सेवा की शर्तें अवधारित करेगी ।  

12. केन्द्रीय परिषद् और उसकी समितियों में रिक्तियों से कार्यों, आदि का अविधिमान्य होना-केन्द्रीय परिषद् या उसकी किसी समिति का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत न होगी कि, यथास्थिति, केन्द्रीय परिषद् में या उस समिति में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी ।

 

[अध्याय 2

12क. नई चिकित्सा संस्था की स्थापना, नए अध्ययन पाठ्यक्रम, आदि के लिए अनुज्ञा-(1) इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के उपबंधों के अनुसार अभिप्राप्त की गई केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के सिवाय,-

(क) कोई व्यक्ति होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित नहीं करेगा; या 

(ख) कोई होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय,-

(i) अध्ययन या प्रशिक्षण का कोई नया उच्चतर पाठ्यक्रम (जिसके अंतर्गत अध्ययन या प्रशिक्षण का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी है) प्रारंभ नहीं करेगा जो प्रत्येक पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के विद्यार्थियों को, कोई मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता प्रदान किए जाने के लिए स्वयं को अर्हित करने में समर्थ बनाएगा; या 

(ii) अध्ययन या प्रशिक्षण के किसी पाठ्यक्रम (जिसके अंतर्गत अध्ययन या प्रशिक्षण का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी है) की अपनी प्रवेश क्षमता में वृद्धि नहीं करेगा ।  

स्पष्टीकरण 1-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, व्यक्ति" के अंतर्गत कोई विश्वविद्यालय या न्यास भी है किन्तु उसके अंतर्गत केन्द्रीय सरकार नहीं है ।  

स्पष्टीकरण 2-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी चिकित्सा संस्था में अध्ययन या प्रशिक्षण के किसी पाठ्यक्रम (जिसके अंतर्गत अध्ययन या प्रशिक्षण का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी है) के संबंध में प्रवेश क्षमता" से विद्यार्थियों की वह अधिकतम संख्या अभिप्रेत है जो केन्द्रीय परिषद् द्वारा समय-समय पर ऐसे पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण में प्रवेश दिए जाने के लिए विनिश्चित की जाए । 

(2) (क) प्रत्येक व्यक्ति या चिकित्सा संस्था, उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार को खंड (ख) के उपबंधों के अनुसार एक स्कीम प्रस्तुत करेगी और केन्द्रीय सरकार, उस स्कीम को केन्द्रीय परिषद् को उसकी सिफारिशों के लिए, निर्दिष्ट करेगी । 

(ख) खंड (क) में निर्दिष्ट स्कीम ऐसे प्ररूप में होगी और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी तथा ऐसी रीति में प्रस्तुत की जाएगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए । 

(3) उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार से स्कीम प्राप्त होने पर, केन्द्रीय परिषद्, सम्बद्ध व्यक्ति या चिकित्सा संस्था से ऐसी अन्य विशिष्टियां अभिप्राप्त कर सकेगी जो वह आवश्यक समझे, और तत्पश्चात् वह,-

(क) यदि स्कीम त्रुटिपूर्ण है और उसमें कोई आवश्यक विशिष्टियां नहीं हैं, तो सम्बद्ध व्यक्ति या चिकित्सा संस्था को लिखित अभ्यावेदन करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दे सकेगी और वह व्यक्ति या चिकित्सा संस्था केन्द्रीय परिषद् द्वारा विनिर्दिष्ट त्रुटियों को, यदि कोई हों, परिशोधित करने के लिए स्वतंत्र होगी; 

(ख) उपधारा (7) में निर्दिष्ट कारकों को ध्यान में रखते हुए स्कीम पर विचार कर सकेगी और उसे केन्द्रीय सरकार को, ऐसी अवधि के भीतर जो केन्द्रीय सरकार से निर्देश प्राप्त होने की तारीख से छह मास से अधिक न हो, उस पर अपनी सिफारिशों के साथ, प्रस्तुत करेगी । 

(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (3) के अधीन स्कीम और केन्द्रीय परिषद् की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात् और जहां आवश्यक हो, सम्बद्ध व्यक्ति या चिकित्सा संस्था से ऐसी और विशिष्टियां अभिप्राप्त करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे तथा उपधारा (7) में निर्दिष्ट कारकों को ध्यान में रखते हुए, स्कीम का या तो (ऐसी शर्तों सहित, यदि कोई हों, जो वह आवश्यक समझे) अनुमोदन कर सकेगी या उस स्कीम का अननुमोदन कर सकेगी और ऐसा कोई अनुमोदन उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा होगा : 

परंतु कोई स्कीम केन्द्रीय सरकार द्वारा सम्बद्ध व्यक्ति या चिकित्सा संस्था को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए बिना अननुमोदित नहीं की जाएगी :

परंतु यह और कि इस उपधारा की कोई बात ऐसे व्यक्ति या चिकित्सा संस्था को जिसकी स्कीम केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित नहीं की गई है, नई स्कीम प्रस्तुत करने से निवारित नहीं करेगी और इस धारा के उपबंध ऐसी स्कीम को उसी प्रकार लागू होंगे मानो ऐसी स्कीम उपधारा (2) के अधीन पहली बार प्रस्तुत की गई हो । 

(5) जहां उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार को स्कीम प्रस्तुत किए जाने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर, केन्द्रीय सरकार द्वारा स्कीम प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति या संस्था को कोई आदेश संसूचित नहीं किया जाता है वहां केन्द्रीय सरकार द्वारा उस स्कीम का अनुमोदन उसी रूप में किया गया समझा जाएगा जिसमें वह प्रस्तुत की गई थी और तद्नुसार, उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा भी प्रदत्त की गई समझी जाएगी ।

(6) उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट समय-सीमा की संगणना करते समय, सम्बद्ध व्यक्ति या चिकित्सा संस्था द्वारा स्कीम प्रस्तुत करने, और केन्द्रीय परिषद् द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा मांगी गई किन्हीं विशिष्टियों को प्रस्तुत करने में लिया गया समय अपवर्जित किया जाएगा । 

(7) केन्द्रीय परिषद्, उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन अपनी सिफारिशें करते समय और केन्द्रीय सरकार, उपधारा (4) के अधीन स्कीम का अनुमोदन या अननुमोदन करने वाला कोई आदेश पारित करते समय, निम्नलिखित बातों का सम्यक् ध्यान रखेगी, अर्थात्: -

(क) क्या प्रस्थापित चिकित्सा संस्था या विद्यमान चिकित्सा संस्था जो अध्ययन या प्रशिक्षण का कोई नया या उच्चतर पाठ्यक्रम प्रारंभ करना चाहती है, धारा 20 के अधीन केन्द्रीय परिषद् द्वारा यथाविहित चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम मानक प्रस्थापित करने की स्थिति में होगी; 

(ख) क्या उस व्यक्ति के पास, जो चिकित्सा संस्था स्थापित करना चाहता है या विद्यमान चिकित्सा संस्था के पास जो अध्ययन या प्रशिक्षण का कोई नया या उच्चतर पाठ्यक्रम प्रारंभ करना चाहती है अथवा अपनी प्रवेश क्षमता में वृद्धि करना चाहती है, पर्याप्त वित्तीय साधन हैं; 

(ग) क्या चिकित्सा संस्था के उचित कार्यकरण अथवा अध्ययन या प्रशिक्षण के नए पाठ्यक्रम का संचालन अथवा बढ़ाई गई प्रवेश क्षमता की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए कर्मचारिवृंद, उपस्कर, आवास, प्रशिक्षण, अस्पताल और अन्य सुविधाओं के संबंध में आवश्यक सुविधाओं का उपबंध किया गया है या स्कीम में विनिर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर किया जाएगा; 

(घ) क्या ऐसे विद्यार्थियों की संख्या को, जिनके ऐसी चिकित्सा संस्था या अध्ययन या प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम में या बढा़ई गई प्रवेश क्षमता के परिणामस्वरूप प्रवेश लेने की संभावना है, ध्यान में रखते हुए पर्याप्त अस्पताल सुविधाओं का उपबंध किया गया है या स्कीम में विनिर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर किया जाएगा; 

(ङ) क्या उन विद्यार्थियों को जिनके ऐसी चिकित्सा संस्था या अध्ययन या प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने की संभावना है, मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता रखने वाले व्यक्तियों द्वारा समुचित प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए कोई इंतजाम किया गया है या कोई कार्यक्रम तैयार किया गया है;

(च) चिकित्सा संस्था में होम्योपैथिक चिकित्सा के व्यवसाय के क्षेत्र में जनशक्ति की अपेक्षा; और 

(छ) कोई अन्य बात जो विहित की जाए । 

(8) जहां केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन किसी स्कीम का अनुमोदन या अननुमोदन करने के लिए कोई आदेश पारित करती है वहां आदेश की एक प्रति संबद्ध व्यक्ति या चिकित्सा संस्था को भेजी जाएगी ।

12ख. कतिपय मामलों में चिकित्सा अर्हताओं की अमान्यता-(1) जहां कोई चिकित्सा संस्था धारा 12क के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के बिना स्थापित की जाती है वहां ऐसी चिकित्सा संस्था के किसी विद्यार्थी को अनुदत्त चिकित्सा अर्हता इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता नहीं मानी जाएगी । 

(2) जहां कोई चिकित्सा संस्था धारा 12क के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के बिना अध्ययन या प्रशिक्षण का कोई नया या उच्चतर पाठ्यक्रम (जिसके अन्तर्गत अध्ययन या प्रशिक्षण का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी है) आरंभ करती है वहां ऐसे अध्ययन या प्रशिक्षण के आधार पर ऐसी संस्था के किसी विद्यार्थी को अनुदत्त चिकित्सा अर्हता इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता नहीं मानी जाएगी ।  

(3) जहां कोई चिकित्सा संस्था धारा 12क के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के बिना अध्ययन या प्रशिक्षण के किसी पाठ्यक्रम में अपनी प्रवेश क्षमता में वृद्धि करती है वहां उसकी प्रवेश क्षमता में वृद्धि के आधार पर ऐसी चिकित्सा संस्था के किसी विद्यार्थी को अनुदत्त चिकित्सा अर्हता, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता नहीं मानी जाएगी ।]

अध्याय 3

चिकित्सीय अर्हताओं को मान्यता

13. भारत स्थित कतिपय चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा प्रदत्त चिकित्सीय अर्हताओं को मान्यता-(1) भारत स्थित किसी विश्वविद्यालय, बोर्ड या अन्य चिकित्सीय संस्था द्वारा प्रदत्त चिकित्सीय अर्हताएं, जो द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित हैं, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हताएं होंगी ।

(2) भारत स्थित कोई विश्वविद्यालय, बोर्ड या अन्य चिकित्सीय संस्था, जो ऐसी कोई चिकित्सीय अर्हता प्रदान करती है जो द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित नहीं है, ऐसी किसी अर्हता को मान्यताप्राप्त कराने के लिए केन्द्रीय सरकार से आवदेन कर सकती है, और केन्द्रीय सरकार, केन्द्रीय परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, द्वितीय अनुसूची को इस प्रकार संशोधित कर सकेगी कि ऐसी अर्हता उसमें सम्मिलित हो जाए, और ऐसी कोई अधिसूचना यह निदेश भी दे सकेगी कि द्वितीय अनुसूची के अन्तिम स्तंभ में ऐसी चिकित्सीय अर्हता के सामने ऐसी प्रविष्टि की जाए जो यह घोषित करे कि वह मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् प्रदान की जाए । 

14. भारत के बाहर स्थित राज्यों या देशों की चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा प्रदत्त चिकित्सीय अर्हताओं को मान्यता-(1) भारत के बाहर स्थित उन चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा प्रदत्त चिकित्सीय अर्हताएं जो तृतीय अनुसूची में सम्मिलित हैं, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हताएं होंगी । 

(2) (क) केन्द्रीय परिषद् भारत के बाहर स्थित किसी राज्य या देश के किसी प्राधिकारी के साथ, जिसे उस राज्य या देश की विधि द्वारा होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों का रजिस्टर रखने का कार्य सौंपा गया है, होम्योपैथी में चिकित्सीय अर्हताओं की मान्यता के लिए व्यतिकर की स्कीम तय करने के लिए, बातचीत कर सकती है तथा ऐसी किसी स्कीम के अनुसरण में केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, तृतीय अनुसूची को इस प्रकार संशोधित कर सकेगी कि ऐसी चिकित्सा अर्हता उसमें सम्मिलित हो जाए जिसके लिए केन्द्रीय परिषद् ने यह विनिश्चय किया है कि उसे मान्यता प्रदान की जानी चाहिए, और ऐसी कोई अधिसूचना यह निदेश भी दे सकेगी कि तृतीय अनुसूची के अंतिम स्तम्भ में ऐसी चिकित्सीय अर्हता के सामने ऐसी प्रविष्टि की जाए जो यह घोषित करे कि वह मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् प्रदान की जाए । 

(ख) जहां परिषद् किसी ऐसी चिकित्सीय अर्हता की सिफारिश करने से इंकार कर देती है जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट किसी प्राधिकारी द्वारा मान्यताप्राप्त कराने के लिए प्रस्थापित की गई है और वह प्राधिकारी केन्द्रीय सरकार से इस निमित्त आवेदन करता है, वहां केन्द्रीय सरकार, ऐसे आवेदन पर विचार करने के पश्चात् और ऐसी किसी भी इंकारी के कारणों के बारे में परिषद् की रिपोर्ट, यदि कोई हो, अभिप्राप्त करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि ऐसी अर्हता मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता होगी और खण्ड (क) के उपबन्ध तदनुसार लागू होंगे । 

15. द्वितीय या तृतीय अनुसूची में सम्मिलित अर्हताएं रखने वाले व्यक्तियों का नाम दर्ज किए जाने का अधिकार-(1) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, द्वितीय या तृतीय अनुसूची में सम्मिलित कोई चिकित्सीय अर्हता होम्योपैथी के किसी राज्य-रजिस्टर में नाम दर्ज किए जाने के लिए पर्याप्त अर्हता होगी । 

(2) होम्योपैथी के ऐसे चिकित्सा व्यवसायी से, जो मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता रखता है और होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर या केन्द्रीय-रजिस्टर में नाम दर्ज है, भिन्न कोई व्यक्ति, -

(क) सरकार में या किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा चलाई जा रही किसी संस्था में होम्योपैथी चिकित्सक के रूप में कोई पद या (किसी भी नाम से ज्ञात) कोई अन्य पद धारण नहीं करेगा; 

(ख) किसी राज्य में होम्योपैथी चिकित्सा का व्यवसाय नहीं करेगा; 

(ग) चिकित्सीय या योग्यता का प्रमाणपत्र या कोई अन्य प्रमाणपत्र, जो सम्यक् रूप से अर्हित चिकित्सा व्यवसायी द्वारा हस्ताक्षरित और अधिप्रमाणित किए जाने के लिए किसी विधि द्वारा अपेक्षित है, हस्ताक्षरित या अधिप्रमाणित करने का हकदार नहीं होगा; 

(घ) किसी मृत्यु-समीक्षा पर या किसी न्यायालय में होम्योपैथी से संबंधित किसी विषय पर, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 45 के अधीन, विशेषज्ञ के रूप में साक्ष्य देने का हकदार नहीं होगा । 

(3) उपधारा (2) की किसी बात का, -

(क) होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नाम दर्ज होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायी के किसी राज्य में, होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करने के अधिकार पर केवल इस आधार पर प्रभाव नहीं पड़ेगा कि इस अधिनियम के प्रारम्भ पर वह मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता नहीं रखता था; 

(ख) होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नाम दर्ज किसी होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायी को किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों के रजिस्ट्रीकरण संबंधी किसी विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त विशेषाधिकारों पर (जिनके अन्तर्गत होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करने का अधिकार भी है) प्रभाव नहीं पड़ेगा; 

(ग) किसी ऐसे राज्य में, जिसमें इस अधिनियम के प्रारम्भ पर होम्योपैथी का राज्य-रजिस्टर नहीं रखा जाता है, होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करने के किसी व्यक्ति के अधिकार पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, यदि ऐसे प्रारम्भ पर वह पांच से अन्यून वर्षों तक होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करता रहा है; 

(घ) भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) या भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1970 (1970 का 48) द्वारा या उनके अधीन, ऐसे व्यक्तियों को, जो उक्त अधिनियमों की अनुसूचियों में सम्मिलित कोई अर्हताएं रखते हैं, प्रदत्त अधिकारों पर (जिनके अन्तर्गत उक्त अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (च) में यथापरिभाषित चिकित्सा व्यवसाय करने का अधिकार भी है) प्रभाव नहीं पड़ेगा । 

(4) कोई व्यक्ति जो उपधारा (2) के किसी उपबन्ध के उल्लंघन में कार्य करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा । 

16.  पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं के संबंध में जानकारी की अपेक्षा करने की शक्ति-भारत में स्थित प्रत्येक विश्वविद्यालय, बोर्ड या अन्य चिकित्सीय संस्था, जो मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता प्रदान करती है, ऐसी अर्हता अभिप्राप्त करने के लिए पूरे किए जाने वाले पाठ्यक्रमों और दी जाने वाली परीक्षाओं के बारे में, उस आयु के बारे में जिस पर ऐसे पाठ्यक्रमों का पूरा किया जाना और परीक्षाओं का दिया जाना अपेक्षित है और ऐसी अर्हता प्रदान की जाएं, और सामान्यतया ऐसी अर्हता अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षाओं के बारे में, ऐसी जानकारी देगी जिसकी केन्द्रीय परिषद्, समय-समय पर, अपेक्षा करे ।

17. परीक्षाओं में निरीक्षक-(1) केन्द्रीय परिषद्, किसी चिकित्सीय महाविद्यालय, अस्पताल या अन्य संस्था के, जहां होम्योपैथी की शिक्षा दी जाती है, निरीक्षण के लिए, या किसी विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था द्वारा ली जाने वाली परीक्षा में, उस विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था द्वारा प्रदान की जाने वाली चिकित्सीय अर्हताओं की मान्यता के लिए केन्द्रीय सरकार को सिफारिश करने के प्रयोजन हेतु उपस्थित होने के लिए, उतने चिकित्सीय निरीक्षक नियुक्त कर सकती है जितने वह आवश्यक समझे । 

(2) चिकित्सीय निरीक्षक किसी प्रशिक्षण या परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे किन्तु शिक्षा के स्तरों की पर्याप्तता के बारे में, जिनके अन्तर्गत कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वास-सुविधा, प्रशिक्षण और, यथास्थिति, होम्योपैथी की शिक्षा देने के लिए विहित अन्य सुविधाएं भी हैं, अथवा प्रत्येक परीक्षा की, जिसमें वे उपस्थित रहें, पर्याप्तता के बारे में केन्द्रीय परिषद् को रिपोर्ट देंगे ।

(3) केन्द्रीय परिषद् ऐसी किसी रिपोर्ट की प्रति संबंधित विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था को भेजेगी और उस पर उस विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था के टिप्पणों सहित एक प्रति केन्द्रीय सरकार को भी भेजेगी ।

18. परीक्षाओं में परिदर्शक-(1) केन्द्रीय परिषद् किसी चिकित्सीय महाविद्यालय, अस्पताल या अन्य संस्था के, जहां होम्योपैथी की शिक्षा दी जाती है, निरीक्षण के लिए अथवा मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता प्रदान करने के प्रयोजन के लिए किसी परीक्षा में उपस्थित होने के लिए उतने परिदर्शक नियुक्त कर सकती है जितने वह आवश्यक समझे । 

(2) कोई व्यक्ति, चाहे वह केन्द्रीय परिषद् का सदस्य है अथवा नहीं, इस धारा के अधीन परिदर्शक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है किन्तु किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसे किसी निरीक्षण या परीक्षा के लिए धारा 17 के अधीन निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया है, उस निरीक्षण या परीक्षा के लिए परिदर्शक के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा ।

(3) परिदर्शक किसी प्रशिक्षण या परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, किन्तु शिक्षा के स्तरों की, जिनके अन्तर्गत कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वाससुविधा, प्रशिक्षण तथा होम्योपैथी की शिक्षा देने के लिए विहित अन्य सुविधाएं भी हैं, पर्याप्तता के बारे में अथवा प्रत्येक परीक्षा की, जिसमें वे उपस्थित रहें, पर्याप्तता के बारे में केन्द्रीय परिषद् के अध्यक्ष को रिपोर्ट देंगे ।

(4) परिदर्शक की रिपोर्ट, तब के सिवाय जब केन्द्रीय परिषद् का अध्यक्ष किसी विशिष्ट मामले में अन्यथा निदेश दे, गोपनीय मानी जाएगी:

परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार परिदर्शक की रिपोर्ट की अपेक्षा करती है तो केन्द्रीय परिषद् उसे प्रस्तुत करेगी ।

19. मान्यता का वापस लिया जाना-(1) जब निरीक्षक या परिदर्शक की रिपोर्ट से केन्द्रीय परिषद् को यह प्रतीत हो कि- 

(क) किसी विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था में पूरे किए जाने वाले पाठ्यक्रम और दी जाने वाली परीक्षा अथवा उसके द्वारा ली गई परीक्षा में अभ्यर्थियों से अपेक्षित प्रवीणता, अथवा 

(ख) ऐसे विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था में या उस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध किसी महाविद्यालय या अन्य संस्था में कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वास-सुविधा, प्रशिक्षण तथा शिक्षण और प्रशिक्षण की अन्य सुविधाएं,

केन्द्रीय परिषद् द्वारा विहित स्तरों के अनुरूप नहीं हैं तब केन्द्रीय परिषद् उस आशय का अभ्यावेदन केन्द्रीय सरकार को करेगी । 

(2) ऐसे अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार उसे उस राज्य की सरकार को भेज सकती है जिसमें वह विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था स्थित है और वह राज्य सरकार उसे ऐसे टिप्पणों सहित, जैसे कि वह करना चाहे, उस विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था को, उस अवधि की प्रज्ञापना सहित जिसके भीतर वह विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था राज्य सरकार को अपना स्पष्टीकरण दे सकेगी, भेजेगी । 

(3) स्पष्टीकरण की प्राप्ति पर, अथवा, जहां नियत अवधि के भीतर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता वहां उस अवधि के अवसान पर, राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार को अपनी सिफारिशें करेगी । 

(4) केन्द्रीय सरकार, कोई ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझती है, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकती है कि द्वितीय अनुसूची में उक्त चिकित्सीय अर्हता के सामने ऐसी प्रविष्टि की जाए जो यह घोषित करे कि, यथास्थिति, वह अर्हता मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व प्रदान की जाए, अथवा यह कि, यदि उक्त चिकित्सीय अर्हता किसी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध विनिर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था के विद्यार्थियों को प्रदान की जाए, तो वह अर्हता मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख से पूर्व प्रदान की जाए, अथवा यह कि किसी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध विनिर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था के संबंध में उक्त चिकित्सीय अर्हता मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् प्रदान की जाए  । 

20. होम्योपैथी की शिक्षा के न्यूनतम स्तर-(1) केन्द्रीय परिषद् होम्योपैथी चिकित्सा की शिक्षा के ऐसे न्यूनतम स्तर विहित कर सकेगी जो भारत में स्थित विश्वविद्यालयों, बोर्डों या चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हताएं प्रदान करने के लिए अपेक्षित हों । 

(2) विनियमों के प्रारूपों और उनके सभी पश्चात्वर्ती संशोधनों की प्रतियां केन्द्रीय परिषद् द्वारा सभी राज्य सरकारों को दी जाएंगी और केन्द्रीय परिषद्, यथास्थिति, विनियमों या उनके किसी संशोधन को केन्द्रीय सरकार को मंजूरी के लिए भेजने के पूर्व, किसी राज्य सरकार की उन टीका-टिप्पणियों पर विचार करेगी जो पूर्वोक्त रूप में प्रतियों के दिए जाने से तीन मास के भीतर प्राप्त हों । 

अध्याय 4

होम्योपैथी का केन्द्रीय-रजिस्टर

21. होम्योपैथी का केन्द्रीय-रजिस्टर-(1) केन्द्रीय परिषद् होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों का एक रजिस्टर विहित रीति से रखवाएगी जो होम्योपैथी का केन्द्रीय-रजिस्टर कहलाएगा और जिसमें, -

(क) भाग 1 में, उन सभी व्यक्तियों के नाम होंगे जिनके नाम तत्समय होम्योपैथी के किसी राज्य-रजिस्टर में दर्ज हैं और जिनके पास मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हताओं में से कोई भी है;

(ख) भाग 2 में, भाग 1 में सम्मिलित व्यक्तियों से भिन्न, उन सभी व्यक्तियों के नाम होंगे जिनके नाम तत्समय होम्योपैथी के किसी राज्य-रजिस्टर में दर्ज हैं । 

(2) केन्द्रीय परिषद् के रजिस्ट्रार का यह कर्तव्य होगा कि वह इस अधिनियम के, और केन्द्रीय परिषद् द्वारा किए गए किन्हीं आदेशों के, उपबन्धों के अनुसार, और अन्य ऐसी रीति से जो विहित की जाए, होम्योपैथी का केन्द्रीय-रजिस्टर रखे और बनाए रखे और समय-समय पर रजिस्टर का पुनरीक्षण करे और उसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित करे । 

(3) ऐसा रजिस्टर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के अर्थ में लोक दस्तावेज समझा जाएगा और भारत के राजपत्र में प्रकाशित किसी प्रति द्वारा साबित किया जा सकेगा । 

22. होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर की प्रतियों का दिया जाना-प्रत्येक बोर्ड इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, और तत्पश्चात् प्रत्येक वर्ष के अप्रैल के प्रथम दिन के पश्चात्, केन्द्रीय परिषद् को होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर की तीन मुद्रित प्रतियां देगा, तथा प्रत्येक बोर्ड होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में समय-समय पर किए गए सभी परिवर्धनों और अन्य संशोधनों की इत्तिला केन्द्रीय परिषद् को अविलम्ब देगा ।

 23. होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण-केन्द्रीय परिषद् का रजिस्ट्रार होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में किसी व्यक्ति के रजिस्ट्रीकरण की रिपोर्ट की प्राप्ति पर अथवा किसी व्यक्ति द्वारा, विहित रीति से, किए गए आवेदन पर, उसका नाम होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर में दर्ज कर सकता है, परन्तु यह तब जब रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाए कि संबंधित व्यक्ति ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए इस अधिनियम के अधीन पात्र है ।

24. वृत्तिक आचरण-(1) केन्द्रीय परिषद्, होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों के लिए वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार के स्तर और आचार संहिता विहित कर सकती है । 

(2) केन्द्रीय परिषद् द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाए गए विनियम यह विनिर्दिष्ट कर सकेंगे कि उनका कौन सा अतिक्रमण वृत्ति के संबंध में गर्हित आचरण, अर्थात्, वृत्तिक अवचार है, और ऐसा उपबन्ध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होगा ।

25. होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर से नामों का हटाया जाना-(1) यदि होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नामदर्ज किसी व्यक्ति का नाम उस रजिस्टर में से, किसी राज्य में होम्योपैथी के चिकित्सा व्यवसायियों के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में, हटा दिया जाता है तो केन्द्रीय परिषद् होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर से ऐसे व्यक्ति का नाम हटाने का निदेश देगी । 

(2) जहां होम्योपैथी के राज्य-रजिस्ट्रार से किसी व्यक्ति का नाम उसके पास अपेक्षित चिकित्सीय अर्हताएं न होने के कारण से भिन्न किसी कारण से हटा दिया जाता है अथवा जहां किसी व्यक्ति का नाम होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में पुनः प्रविष्ट  करने के लिए उक्त व्यक्ति का आवेदन नामंजूर कर दिया जाता है वहां वह, विहित रीति से, और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, जिनके अन्तर्गत फीस के संदाय की शर्त भी है, केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकता है जिसका विनिश्चय, जो केन्द्रीय परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् किया जाएगा, राज्य सरकार तथा होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर की तैयारी से संबंधित प्राधिकारियों पर                    बाध्यकर होगा ।  

 

 [25क. व्यवसाय के लिए अनंतिम रजिस्ट्रीकरण-यदि होम्योपैथी में मान्यताप्राप्त चिकित्सा अर्हता अभिप्राप्त करने के लिए किए जाने वाले अध्ययन के पाठ्यक्रम में, किसी व्यक्ति द्वारा अर्हक परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के पश्चात् और ऐसी अर्हता उसे प्रदत्त किए जाने के पूर्व, प्रशिक्षण की कोई अवधि सम्मिलित है तो ऐसे किसी व्यक्ति को, उसके द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर, ऐसे प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ और किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं, पूर्वोक्त अवधि के लिए किसी अनुमोदित संस्था में होम्योपैथी का व्यवसाय करने में उसे समर्थ बनाने के लिए संबद्ध बोर्ड द्वारा होम्योपैथी के किसी राज्य रजिस्टर में अनंतिम रजिस्ट्रीकरण प्रदान किया जाएगा ।]

26. होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों के विशेषाधिकार-(1) मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हताएं रखने वाले व्यक्तियों द्वारा होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करने के संबंध में इस अधिनियम में दी गई शर्तों और निबन्धनों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक व्यक्ति, जिसका नाम होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर के भाग 1 में तत्समय है, अपनी अर्हताओं के अनुसार, भारत के किसी भी भाग में होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करने का तथा ऐसे व्यवसाय की बाबत कोई व्यय, औषधियों या अन्य साधित्रों की बाबत कोई प्रभार या फीस, जिनका वह हकदार हो, विधि के सम्यक् अनुक्रम में वसूल करने का हकदार होगा । 

(2) धारा 15 की उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए कोई व्यक्ति जिसका नाम होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर के भाग 2 में तत्समय है, उस राज्य से, जिसके राज्य-रजिस्टर में वह नामदर्ज है, भिन्न किसी राज्य में, जिस राज्य में होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय करने का उसका आशय है उस राज्य की सरकार के पूर्व अनुमोदन से होम्योपैथी का चिकित्सा व्यवसाय कर सकता है । 

27. अतिरिक्त अर्हताओं का रजिस्ट्रीकरण-(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम होम्योपैथी के केन्द्रीय रजिस्ट्रार में दर्ज है, होम्योपैथी में प्रवीणता के लिए कोई ऐसी उपाधि, डिप्लोमा या अन्य अर्हता अभिप्राप्त कर लेता है, जो मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता है, तो वह, विहित रीति से इस निमित्त किए गए आवेदन पर, इस बात का हकदार होगा कि वह होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर में अपने नाम के सामने, या तो पूर्वतर की गई किसी प्रविष्टि के स्थान पर या उसके अतिरिक्त, ऐसी प्रविष्टि करा ले जो ऐसी अन्य उपाधि, डिप्लोमा या अर्हता की द्योतक है ।  

(2) होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टार में ऐसे किसी व्यक्ति की बाबत प्रविष्टियां होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टार में किए गए परिवर्तनों के अनुसार परिवर्तित की जाएंगी ।

28. होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों द्वारा निवास तथा चिकित्सा-व्यवसाय के स्थान में परिवर्तन का सूचित किया जाना-होम्योपैथी के केन्द्रीय-रजिस्टर में रजिस्टर किया गया प्रत्येक व्यक्ति अपने निवास तथा चिकित्सा-व्यवसाय के स्थान की तब्दीली केन्द्रीय परिषद् को और संबंधित बोर्ड को, ऐसी तब्दीली के नब्बे दिन के भीतर, सूचित करेगा और ऐसा करने में असफलता की दशा में, केन्द्रीय परिषद् या बोर्ड के सदस्यों के निर्वाचन में भाग लेने का उसका अधिकार केन्द्रीय सरकार के आदेश से, या तो स्थायी रूप से या ऐसी अवधि के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, समपहृत किया जा सकता है । 

अध्याय 5

प्रकीर्ण

29. केन्द्रीय परिषद् द्वारा दी जाने वाली जानकारी और उसका प्रकाशन-(1) केन्द्रीय परिषद्, केन्द्रीय सरकार को ऐसी रिपोर्टें, अपने कार्यवृत्तों की प्रतिलिपियां, अपने लेखाओं की संक्षिप्तियां और अन्य जानकारी देगी जिनकी वह सरकार अपेक्षा करे । 

(2) केन्द्रीय सरकार, इस धारा या धारा 18 के अधीन, उसे दी गई कोई रिपोर्ट, प्रतिलिपि, संक्षिप्ति या अन्य जानकारी, ऐसी रीति से प्रकाशित कर सकती है जैसी वह ठीक समझे । 

30. जांच आयोग-(1) जब कभी केन्द्रीय सरकार को यह आभास कराया जाता है कि केन्द्रीय परिषद् इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी का अनुपालन नहीं कर रही है तब केन्द्रीय सरकार उस शिकायत की विशिष्टियां एक जांच आयोग को निर्देशित कर सकती है । ऐसे आयोग में तीन व्यक्ति होंगे जिनमें से दो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, जिनमें से एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होगा, तथा दूसरा केन्द्रीय परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा, और ऐसा आयोग परिवाद में आरोपित बातों की सत्यता के बारे में संक्षिप्त रीति से जांच करने के लिए तथा केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट देने के लिए अग्रसर होगा और यदि आयोग द्वारा यह पाया जाता है कि व्यतिक्रम या अनुचित कार्रवाई का कोई आरोप सिद्ध कर दिया गया है तो आयोग उन उपचारों की, यदि कोई हों, सिफारिश करेगा जो उसकी राय में आवश्यक हैं ।

(2) केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय परिषद् से अपेक्षा कर सकती है कि वह इस प्रकार सिफारिश किए गए उपचारों को ऐसे समय के भीतर अपनाए जो आयोग की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए वह ठीक समझती है और यदि केन्द्रीय परिषद् ऐसी किसी अपेक्षा का अनुपालन करने में असफल रहती है तो केन्द्रीय सरकार आयोग की सिफारिशों को प्रभावी करने के लिए केन्द्रीय परिषद् के विनियमों में संशोधन कर सकती है, या ऐसा उपबन्ध या आदेश कर सकती है या ऐसा अन्य कदम उठा सकती है जो आवश्यक प्रतीत हो ।

(3) जांच आयोग को, शपथ दिलाने, साक्षियों को हाजिर कराने तथा दस्तावेजों को पेश करने की शक्ति होगी तथा अपने द्वारा की जाने वाली जांच के प्रयोजन के लिए सब अन्य ऐसी आवश्यक शक्तियां होंगी जैसी सिविल न्यायालय द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन प्रयुक्त की जाती हैं । 

31. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए परित्राण-कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए अशयित किसी बात के लिए सरकार, केन्द्रीय परिषद् या बोर्ड या उसकी किसी समिति अथवा सरकार या केन्द्रीय परिषद् या पूर्वोक्त बोर्ड के किसी अधिकारी या सेवक के विरुद्ध नहीं होगी । 

32. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी । 

(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र में हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र में या दो क्रमवर्ती सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के, जिसमें वह ऐसे रखा गया हो, या ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई उपान्तर करने के लिए सहमत हो जाएं अथवा इस बात पर सहमत हो जाएं  कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो तत्पश्चात्, यथास्थिति, वह नियम ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई भी प्रभाव न होगा, किन्तु इस प्रकार कि ऐसा कोई उपान्तर या बातिलकरण उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले                  बिना होगा । 

33. विनियम बनाने की शक्ति- [(1)] केन्द्रीय परिषद् साधारण तौर पर इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए विनियम केन्द्रीय सरकार की 1[पूर्व मंजूरी से राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी] और, ऐसे विनियम, इस शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे: -

(क) केन्द्रीय परिषद् के अध्यक्ष और उपाध्यक्षों के निर्वाचन की रीति;

(ख) केन्द्रीय परिषद् की सम्पत्ति का प्रबन्ध तथा उसके लेखाओं का रखा जाना और संपरीक्षा; 

(ग) केन्द्रीय परिषद् के सदस्यों का त्यागपत्र; 

(घ) अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां और कर्तव्य; 

(ङ) केन्द्रीय परिषद् और उसकी समितियों के अधिवेशन बुलाना और संयोजित करना, वे समय जब और वे स्थान जहां ऐसे अधिवेशन किए जाने हैं, अधिवेशन में कार्य संचालन और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य संख्या; 

(च) धारा 9 के अधीन गठित समितियों के कृत्य; 

(छ) रजिस्ट्रार की तथा केन्द्रीय परिषद् के अन्य अधिकारियों और सेवकों की पदावधि तथा उनकी शक्तियां और कर्तव्य; 

 [(छक) धारा 12क की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन स्कीम का प्ररूप, ऐसी स्कीम में दी जाने वाली विशिष्टियां, वह रीति जिसमें स्कीम प्रस्तुत की जाएगी और स्कीम के साथ संदेय फीस; 

(छख) धारा 12क की उपधारा (7) के खंड (छ) के अधीन कोई अन्य बात;] 

(ज) निरीक्षकों और परिदर्शकों की अर्हताएं, नियुक्ति, शक्तियां और कर्तव्य तथा उनके द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया; 

(झ) किसी विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था में मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता प्रदान करने के लिए अनुसरण किए जाने वाले पाठ्यक्रम और व्यवहारिक प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम की अवधि, परीक्षा के विषय और उनमें अभिप्राप्त की जाने वाली प्रवीणता के स्तर; 

(ञ) होम्योपैथी की शिक्षा के लिए कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वाससुविधा, प्रशिक्षण और अन्य सुविधाओं के स्तर; 

(ट) वृत्तिक परीक्षाओं का संचालन, परीक्षकों की अर्हताएं तथा ऐसी परीक्षाओं में प्रवेश की शर्तें; 

(ठ) होम्योपैथी के व्यवसायियों द्वारा अनुपालन किए जाने वाले वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार के स्तर तथा आचार-संहिता; 

(ड) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदनों में कथित की जाने वाली विशिष्टियां और अर्हताओं का उनमें दिया जाने वाला सबूत; 

(ढ) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए अपील धारा 25 के अन्तर्गत की जा सकेगी; 

(ण) इस अधिनियम के अधीन आवेदनों तथा अपीलों पर दी जाने वाली फीसें; तथा

                                (त) कोई अन्य विषय जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन कोई उपबन्ध विनियमों द्वारा किया जा सकता है ।

 [(2) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन, बनाए गए प्रत्येक विनियम को, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधि मान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

प्रथम अनुसूची

[धारा 3(1) (क) देखिए]

  1. केन्द्रीय सरकार, केन्द्रीय परिषद् में प्रत्येक राज्य को आबंटित किए जाने वाले स्थानों की संख्या का अवधारण, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निम्नलिखित आधार पर करेगी, अर्थात्: -

(क) जहां होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों की संख्या 100 से अधिक हो किन्तु 10,000 से अधिक न हो.    .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .         . 

1 स्थान

(ख) जहां होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों की संख्या 10,000 से अधिक किन्तु 20,000 के अधिक न हो   .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .         .

2 स्थान

 

          (ग) जहां होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों की संख्या 20,000 से अधिक हो किन्तु 30,000 के अधिक न हो   .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .         .

3 स्थान

 

(घ) जहां होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों की संख्या 30,000 से अधिक हो किन्तु 40,000 से अधिक न हो    .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .      .         .

4 स्थान

 

(ङ) जहां होम्योपैथी के राज्य-रजिस्टर में नामदर्ज व्यक्तियों की संख्या 40,000 से अधिक हो.        .               

5 स्थान ।

2. केन्द्रीय परिषद् के लिए धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन प्रत्येक पश्चात्वर्ती निर्वाचन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, होम्योपैथी की केन्द्रीय परिषद् में आबंटित किए जाने वाले स्थानों की संख्या ऊपर पैरा 1 में दिए गए आधार पर अवधारित की जाएगी । 

द्वितीय अनुसूची

(धारा 13 देखिए)

भारत में स्थित विश्वविद्यालयों, बोर्डों या चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा

प्रदत्त होम्योपैथी में मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हताएं

विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था का नाम

मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता

रजिस्ट्रीकरण के लिए संक्षिप्ताक्षर

टिप्पणियां

1

2

3

4

आन्ध्र प्रदेश

1.  आन्ध्र प्राविन्शियल होम्योपैथी कालेज, गुडीवाड़ा

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन

डी०एच०एम०

अप्रैल, 1949 से मार्च, 1969 तक

2.  डा० गुरूराजू गवर्नमेंट होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, गुडीवाड़ा

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

अप्रैल, 1970 से

 

1

2

3

4

3.  बोर्ड आफ इंडियन मेडिसन, हैदराबाद

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

अक्तूबर, 1971 से

[3क. होम्योपैथिक मैडिकल कालेज, राजमुद्री (आन्ध्र प्रदेश)

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

मार्च, 1973 से दिसम्बर, 1986 तक]

बिहार

4.  बिहार स्टेट बोर्ड आफ होम्योपैथिक मेडिसन

डिप्लोमा इन मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एम०एम०

1961 से

 

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

1971 से

दिल्ली

5.  बोर्ड आफ होम्योपैथिक सिस्टम आफ मेडिसन, दिल्ली 

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक साइन्स

डी०एच०एम०

1965 से 1970-71 तक 

 

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

1971 से

कर्नाटक

6.  दि होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, बेलगांव 

लाइसेन्सिएट आफ दि कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी

एल०सी०आई०एच०

जून, 1971 से दिसम्बर, 1971 तक

7.  कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथिक एजुकेशन, बंगलूर

लाइसेन्सिएट आफ दि कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी

एल०सी०ई०एच०

जनवरी, 1973 से

 

ग्रेजुएट आफ दि कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी

जी०सी०ई०एच०

जनवरी, 1973 से

केरल

8.  बोर्ड आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी, गवर्नमेंट आफ केरल

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन

डी०एच०एम०

1962 से

9.  रायल कालेज आफ होम्योपैथिक फिजिशियन्स, अर्नाकुलम

लाइसेन्सिएट आफ रायल कालेज आफ होम्योपैथिक फिजिशियन्स

एल०आर०सी०एच०पी०

1966-67 तक

[9क. कालीकट विश्वविद्यालय, कालीकट, केरल 

बैचुलर आफ होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

बी०एच०एम०एस०

1982 और उसके बाद से]

मध्यप्रदेश

10. दि बोर्ड आफ होम्योपैथिक एण्ड   बायोकैमिक सिस्टम आफ मेडिसन, (म०प्र०)

डिप्लोमा इन होम्योपैथी एण्ड बायोकैमिस्ट्री

डी०एच०बी०

1960 से

महाराष्ट्र

11. दि कोर्ट आफ एग्जामिनर्स आफ होम्योपैथिक एण्ड बायोकैमिक सिस्टम आफ मेडिसन, मुम्बई

लाइसेन्सिएट आफ दि कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी

एल०सी०ई०एच०

दिसम्बर 1961 से

 

डिप्लोमा इन होम्योपैथी एण्ड बायोकैमिस्ट्री

डी०एच०बी०

अक्तूबर, 1955 से

 

1

2

3

4

12.कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी

फैलो आफ दि कोर्ट आफ एग्जामिनर्स इन होम्योपैथी

एल०सी०ई०एच०

केवल मई 1958 में

[12क. महाराष्ट्र होम्योपैथी परिषद्, मुंबई

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एंड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

1988 से आगे]

[12ख. पुणे विश्वविद्यालय

बैचलर ऑफ होम्योपैथी मेडिसिन एंड सर्जरी

बी०एच०एम०एस०

1988 से आगे

 

बैचलर ऑफ होम्योपैथी मेडिसिन एंड सर्जरी (ग्रेडेड डिग्री)

बी०एच०एम०एस० (ग्रेडेड)

1995 से केवल 2002 तक]

उड़ीसा

13.  उड़ीसा बोर्ड आफ होम्योपैथिक मेडिसन, भुवनेश्वर

डिप्लोमा इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एच०एम०एस०

1972 से

उत्तर प्रदेश 

14. स्टेट बोर्ड आफ होम्योपैथिक मेडिसन, यू०पी०, लखनऊ

[ग्रेजुएट आफ होम्योपैथिक मेडिसिन एण्ड सर्जरी

जी०एच०एम०एस०

1960 से 1964 तक

 

बैचलर आफ मेडिसिन एण्ड सर्जरी

बी०एम०एस०

1958 से 1985 तक

 

सर्टिफिकेट आफ होम्योपैथिक प्रैक्टिस

सी०एच०पी०

1956 से 1957 तक]

15. आगरा विश्वविद्यालय, आगरा

ग्रेजुएट आफ होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

जी०एच०एम०एस०

1965 से 1967 तक

16. कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर

ग्रेजुएट आफ होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

जी०एच०एम०एस०

1967 से

17. नेशनल होम्योपैथिक मेडिकल कालेज एण्ड हास्पिटल, लखनऊ 

- - -

एच०एल०एम०एस० एच०एम०डी०

एच०एम०बी०

बी०एम०एस०

1923 से 1936 तक

1925 से 1942 तक

1924 से 1949 तक

1950 से 1957 तक

 

18. होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, लखनऊ

- - -

एच०एम०बी०

1931 से 1936 तक

पश्चिमी बंगाल

19. दि काउन्सिल आफ होम्योपैथिक मेडिसन, पश्चिमी बंगाल

डिप्लोमा इन मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एम०एस०

1965 से

20. जनरल काउन्सिल एण्ड स्टेट फैकल्टी आफ होम्योपैथिक मेडिसन, पश्चिमी बंगाल

डिप्लोमा इन मेडिसन एण्ड सर्जरी

डी०एम०एस०

1943 से 1964 तक

21. कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल, कालेज, कलकत्ता

बैचलर आफ होम्योपैथिक मेडिसन

एच०एम०बी०

1936 तक

 

बैचलर आफ मेडसिन एण्ड बैचलर आफ सर्जरी

बी०एम०बी०एस०

1936 से 1942 तक

 

1

2

3

4

22. बंगाल एलेन होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, कलकत्ता

बैचलर आफ होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

बी०एच०एम०एस०

1942 तक

 

मास्टर आफ होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

एम०एच०एम०एस०

1942 तक

 

लाइसेन्सिएट इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

एल०एच०एम०एस०

1942 तक

23. डन्हैम होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, कलकत्ता

मेम्बर आफ डन्हैम कालेज आफ होम्योपैथी

एम०डी०सी०एच०

1942 तक

24. आशुतोष होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, कलकत्ता

प्रैक्टिशनर आफ रैशनल सिस्टम आफ मेडिसन

पी०आर०एस०एम०

1942 तक

 

प्रैक्टिशनर आफ हीलिंग आर्ट

पी०एच०ए०

1942 तक

25. हैरिंग होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, कलकत्ता

लाइसेन्सिएट आफ दि रैशनल होम्योपैथिक सोसाइटी

एल०आर०एच०एस०

1942 तक

26. रैग्यूलर होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, कलकत्ता

लाइसेन्सिएट इन होम्योपैथिक मेडिसन एण्ड सर्जरी

एल०एच०एम०एस०

1942 तक

27. सेन्ट्रल होम्योपैथिक कालेज, कलकत्ता

- - -

एच०एल०एम०एस०

एच०एम०बी०

1910

1910

 

28. बंगाल होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, कलकत्ता

बैचलर आफ होम्योपैथिक मेडिसन

एच०एम०बी०

1942 तक

[29. होम्योपैथिक चिकित्सा परिषद्, पश्चिम बंगाल

बेचूलर आफ मेडिसिन एंड बैचलर आफ सर्जरी

एम०बी०एस० (आनर्स)

1972 से 1975]

तृतीय अनुसूची

(धारा 14 देखिए)

भारत के बाहर स्थित चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा प्रदत्त अर्हताएं

विश्वविद्यालय, बोर्ड या चिकित्सीय संस्था का नाम              

मान्यताप्राप्त चिकित्सीय अर्हता

रजिस्ट्रीकरण के लिए संक्षिप्ताक्षर

टिप्पणियां

1

2

3

4

1. फैकल्टी आफ होम्योपैथी, लंदन

डिप्लोमा आफ दि फैकल्टी आफ होम्योपैथी

डी०एफ०होम०

- - -

2. फैकल्टी आफ होम्योपैथी, लंदन

मेम्बर आफ दि फैकल्टी आफ होम्योपैथी

एम०एफ०होम०  

- - -

3. फैकल्टी आफ होम्योपैथी, लंदन

फैलो आफ दि फैकल्टी आफ होम्योपैथी

एफ०एफ०होम० 

- - -

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