सिविल विमानन सुरक्षा विधिविरुद्ध कार्य दमन अधिनियम, 1982
(1982 का अधिनियम संख्यांक 66)
[6 नवम्बर, 1982]
सिविल विमानन की सुरक्षा के प्रति विधिविरुद्ध कार्यों के
दमन के लिए कन्वेंशन को प्रभावी करने
और उससे संबंधित
विषयों के लिए
अधिनियम
सिविल विमानन की सुरक्षा के प्रति विधिविरुद्ध कार्यों के दमन के लिए कन्वेंशन पर 23 सितम्बर, 1971 को मांट्रियल में हस्ताक्षर किए गए थे ;
और यह समीचीन है कि भारत उक्त कन्वेंशन को मान ले और उसे प्रभावी करने और उससे सम्बन्धित विषयों के लिए उपबन्ध करे ;
अतः भारत गणराज्य के तैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सिविल विमानन सुरक्षा विधिविरुद्ध कार्य दमन अधिनियम, 1982 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है और जैसा कि इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय यह धारा 3 के अधीन किसी ऐसे अपराध को भी लागू होता है जो किसी व्यक्ति द्वारा भारत के बाहर किया गया है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) वायुयान" से ऐसा वायुयान अभिप्रेत है, चाहे वह भारत में रजिस्ट्रीकृत हो या नहीं, जो सैनिक वायुयान अथवा सीमाशुल्क या पुलिस सेवा में प्रयुक्त वायुयान से भिन्न है ;
(ख) भारत में रजिस्ट्रीकृत वायुयान" से ऐसा वायुयान अभिप्रेत है जो तत्समय भारत में रजिस्ट्रीकृत है ;
[(खख) विमानपत्तन" से वायुयान अधिनियम, 1934 (1934 का 22) की धारा 2 के खंड (2) में यथापरिभाषित कोई विमान-क्षेत्र अभिप्रेत है ;]
(ग) कन्वेंशन देश" से ऐसा देश अभिप्रेत है जिसमें तत्समय मांट्रियल कन्वेंशन प्रवृत्त है ;
(घ) सैनिक वायुयान" से किसी देश की नौसेना, थल सेना, वायुसेना या किन्हीं अन्य सशस्त्र बलों का वायुयान अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत प्रत्येक ऐसा वायुयान भी है जो तत्समय ऐसे बल के किसी व्यक्ति द्वारा समादेशित किया गया है जिसे उस प्रयोजन के लिए लगाया गया है ;
(ङ) मांट्रियल कन्वेंशन" से सिविल विमानन की सुरक्षा के प्रति विधिविरुद्ध कार्यों के दमन के लिए वह कन्वेंशन अभिप्रेत है जिस पर 23 सितम्बर, 1971 को मांट्रियल में हस्ताक्षर किए गए थे ।
(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए,-
(क) किसी वायुयान को किसी भी समय उस क्षण से, जब उसके सभी बाहरी द्वार उड़ान के लिए यात्रियों के चढ़ जाने के पश्चात् बन्द कर दिए जाते हैं, उस क्षण तक जब तक ऐसा कोई द्वार उड़ान के पश्चात् यात्रियों के उतरने के लिए खोल नहीं दिया जाता है, उड़ानरत समझा जाएगा तथा किसी वायुयान के विवश होकर उतरने की दशा में, उड़ान को तब तक जारी समझा जाएगा जब तक कि उस देश के, जिसमें इस प्रकार विवश होकर उतरना पड़ता है, सक्षम प्राधिकारी उस वायुयान की तथा उस पर के व्यक्तियों और सम्पत्ति की जिम्मेदारी नहीं सम्भाल लेते हैं ;
(ख) किसी वायुयान को भू-कर्मचारिवृन्द द्वारा या कर्मीदल द्वारा किसी विनिर्दिष्ट उड़ान के लिए वायुयान की उड़ान-पूर्व तैयारी के आरम्भ से लेकर वायुयान के उतरने के पश्चात् चौबीस घंटे तक सेवारत समझा जाएगा और ऐसी सेवा की अवधि के अन्तर्गत वह समस्त अवधि भी होगी जिसके दौरान वायुयान उड़ानरत है ।
अध्याय 2
अपराध
3. उड़ानरत वायुयान पर हिंसा करने का अपराध, आदि-(1) जो कोई विधिविरुद्धतया और साशय-
(क) उड़ानरत किसी वायुयान पर किसी व्यक्ति के प्रति हिंसा का ऐसा कार्य करता है जिससे ऐसे वायुयान की सुरक्षा के संकटापन्न होने की संभवना है ; या
(ख) सेवारत किसी वायुयान को नष्ट करता है या ऐसे वायुयान को किसी ऐसी रीति में नुकसान पहुंचाता है जिससे वह उड़ान के अयोग्य हो जाए या जिससे उड़ान में उसकी सुरक्षा के संकटापन्न होने की संभावना है ; या
(ग) सेवारत किसी वायुयान पर किसी प्रकार की कोई ऐसी युक्ति या पदार्थ रखता है या रखवाता है जिससे उस वायुयान के नष्ट होने की संभावना है या उसे ऐसे नुकसान पहुंचाता है जिससे वह उड़ान के अयोग्य हो जाता है या उसे इस प्रकार नुकसान पहुंचाता है जिससे उड़ान में उसकी सुरक्षा के संकटापन्न होने की सम्भावना है ; या
(घ) ऐसी जानकारी, जिसके बारे में वह यह जानता है कि वह मिथ्या है, संसूचित करता है जिससे उड़ानरत वायुयान की सुरक्षा संकटापन्न हो जाती है,
वह आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध करने का प्रयत्न करता है या उसके किए जाने का दुष्प्रेरण करता है उसकी बाबत भी यह समझा जाएगा कि उसने ऐसा अपराध किया है और उसे वही दण्ड दिया जाएगा जो ऐसे अपराध के लिए उपबन्धित है ।
[3क. विमानपत्तन पर अपराध-(1) जो कोई, किसी विमानपत्तन पर विधिविरुद्धतया और साशय किसी युक्ति, पदार्थ या आयुध का उपयोग करते हुए :-
(क) हिंसा का ऐसा कार्य करता है जिससे किसी व्यक्ति को घोर उपहति कारित होने या उसकी मृत्यु होने की संभावना है ; या
(ख) किसी विमानपत्तन पर किसी वायुयान या सुविधा को नष्ट करता है या उसे गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है या विमानपत्तन की किसी सेवा को भंग करता है,
जिससे उस विमानपत्तन पर सुरक्षा संकटापन्न होती है या संकटापन्न होने की आशंका है वह आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
(2) जो कोई, उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध को करने का प्रयत्न करता है या करने के लिए दुष्प्रेरित करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने ऐसा अपराध किया है और उसे ऐसे अपराध के लिए उपबंधित दंड दिया जाएगा ।]
4. विमान चालन सुविधाओं को नष्ट करना या नुकसान पहुंचाना-(1) जो कोई विधिविरुद्धतया और साशय विमान चालन सविधाओं को नष्ट करता है या नुकसान पहुंचाता है या उनके प्रचालन में ऐसी रीति में हस्तक्षेप करता है जिससे उड़ानरत वायुयान की सुरक्षा के संकटापन्न होने की सम्भावना है, वह आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध करने का प्रयत्न करता है या उसके किए जाने का दुष्प्रेरण करता है उसकी बाबत भी यह समझा जाएगा कि उसने ऐसा अपराध किया है और उसे वही दण्ड दिया जाएगा जो ऐसे अपराध के लिए उपबन्धित है ।
5. अधिकारिता-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए जहां धारा 3 के अधीन कोई अपराध भारत के बाहर किया गया है वहां ऐसा अपराध करने वाले व्यक्ति के साथ उसकी बाबत उसी प्रकार कार्रवाई की जा सकेगी मानो ऐसा अपराध भारत में किसी ऐसे स्थान पर, जहां वह पाया जाए, किया गया है ।
(2) कोई भी न्यायालय धारा 3 के अधीन दण्डनीय किसी ऐसे अपराध का, जो भारत के बाहर किया गया है, संज्ञान नहीं करेगा जब तक कि-
(क) ऐसा अपराध भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान पर नहीं किया जाता है ;
(ख) ऐसा अपराध किसी ऐसे वायुयान पर नहीं किया जाता है जो तत्समय ऐसे पट्टेदार को, बिना कर्मीदल के पट्टे पर दिया गया है, जिसका अपने कारबार का मुख्य स्थान या जहां उसका ऐसा कोई कारबार का स्थान नहीं है, वहां उसका स्थायी निवास स्थान भारत में है ; अथवा
(ग) अभिकथित अपराधी भारत का नागरिक नहीं है या उस वायुयान पर नहीं है जिसके सम्बन्ध में ऐसा अपराध तब किया गया है जब वह भारत में उतरता है या भारत में पाया जाता है ।
[5क. अन्वेषण आदि की शक्तियों का प्रदान किया जाना-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अधीन किसी पुलिस अधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य गिरफ्तारी, अन्वेषण और अभियोजन की शक्तियां केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी को प्रदान कर सकेगी ।
(2) पुलिस के सभी अधिकारियों तथा सरकार के सभी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है और उन्हें इस बात के लिए सशक्त किया जाता है कि वे इस अधिनियम के या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के उपबंधों के निष्पादन में उपधारा (1) में निर्दिष्ट केन्द्रीय सरकार के अधिकारी की सहायता करें ।
5ख. अभिहित न्यायालय-(1) राज्य सरकार, शीघ्र विचारण का उपबंध करने के प्रयोजन के लिए, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी सेशन न्यायालय को अभिहित न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट करेगी ।
(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी अभिहित न्यायालय, यथासाध्य, दिन-प्रतिदिन के आधार पर विचारण करेगा ।
5ग. अभिहित न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी-
(क) इस अधिनियम के अधीन सभी अपराध धारा 5ख की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अभिहित न्यायालय द्वारा ही विचारणीय होंगे ;
(ख) जहां ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है या जिसके द्वारा अपराध के किए जाने का संदेह है, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 167 की उपधारा (2) या उपधारा (2क)के अधीन किसी मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है वहां ऐसा मजिस्ट्रेट, ऐसे व्यक्ति का ऐसी अभिरक्षा में निरोध, जैसा वह ठीक समझे, कुल मिलाकर पन्द्रह दिन से अनधिक अवधि के लिए, जहां ऐसा मजिस्ट्रेट न्यायिक मजिस्ट्रेट है और कुल मिलाकर सात दिन से अनधिक अवधि के लिए जहां ऐसा मजिस्ट्रेट कार्यपालक मजिस्ट्रेट है, प्राधिकृत कर सकेगा :
परन्तु जहां ऐसा मजिस्ट्रेट यह समझता है कि-
(i) जब ऐसा व्यक्ति उसके पास पूर्वोक्त रूप से भेजा जाता है ; या
(ii) उसके द्वारा प्राधिकृत निरोध की अवधि की समाप्ति पर या उससे पूर्व किसी समय,
ऐसे व्यक्ति का निरोध अनावश्यक है वहां वह ऐसे व्यक्ति को अभिहित न्यायालय के पास भेजने का आदेश कर सकेगा ;
(ग) अभिहित न्यायालय, खंड (ख) के अधीन उसके पास भेजे गए व्यक्ति के संबंध में उसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा जो वह मजिस्ट्रेट, जिसे मामले के विचारण की अधिकारिता है, ऐसे मामले में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 167 के अधीन किसी ऐसे अभियुक्त व्यक्ति के संबंध में, जो उसके पास उस धारा के अधीन भेजा गया हो, प्रयोग करता;
(घ) अभिहित न्यायालय, इस निमित्त प्राधिकृत, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा किए गए किसी परिवाद के परिशीलन पर उस अपराध का संज्ञान अभियुक्त को विचारण के लिए सुपुर्द किए बिना कर सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय अभिहित न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से भिन्न किसी अपराध का भी जिससे अभियुक्त उसी विचारण में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन आरोपित किया जा सकता है, विचारण सकेगा ।
5घ. किसी अभिहित न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को संहिता का लागू होना-इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध अभिहित न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और अभिहित न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाले व्यक्ति को लोक अभियोजक समझा जाएगा ।]
अध्याय 3
प्रकीर्ण
6. प्रत्यर्पण के बारे में उपबन्ध-(1) धारा 3 और धारा 4 के अधीन अपराध प्रत्यर्पणीय अपराधों के रूप में सम्मिलित किए गए और उन सभी प्रत्यर्पण संधियों में उपबन्धित किए गए समझे जाएंगे जो भारत द्वारा कन्वेंशन देशों के साथ की गई हैं और जिनका विस्तार इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को भारत पर है और जो भारत पर आबद्धकर हैं ।
(2) इस अधिनियम के अधीन अपराधों को प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962(1962 का 64) के लागू किए जाने के प्रयोजनों के लिए ऐसे वायुयान के बारे में, जो किसी कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत है, किसी भी समय, जब वह वायुयान उड़ानरत है, यह समझा जाएगा कि वह उसी देश की अधिकारिता के भीतर है चाहे वह तत्समय किसी अन्य देश की अधिकारिता के भीतर भी हो या न हो ।
[6क. जमानत के बारे में उपबंध-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973(1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अभियुक्त कोई व्यक्ति, यदि वह अभिरक्षा में है तो जमानत पर या अपने स्वयं के बंधपत्र पर तब तक नहीं छोड़ा जाएगा, जब तक कि :-
(क) लोक अभियोजक को ऐसे छोड़े जाने के लिए आवेदन का विरोध करने के लिए कोई अवसर न दिया गया हो ;
(ख) जहां लोक अभियोजक ऐसे आवेदन का विरोध करता है, और न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार है कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और उससे, जबकि वह जमानत पर है कोई अपराध किए जाने की संभावना नहीं है ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट जमानत मंजूर किए जाने पर निर्बंधन दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जमानत मंजूर किए जाने पर निर्बंधन के अतिरिक्त है ।
(3) इस धारा में की गई कोई बात दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 439 के अधीन जमानत की बाबत उच्च न्यायालय की विशेष शक्तियों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।]
7. कन्वेंशन के संविदाकारी पक्षकार-केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह प्रमाणित कर सकेगी कि मांट्रियल कन्वेंशन के संविदाकारी पक्षकार कौन-कौन हैं और उन्होंने कन्वेंशन के उपबन्धों का किस विस्तार तक उपयोग किया है और ऐसी कोई भी अधिसूचना उसमें प्रमाणित विषयों के बारे में निश्चायक साक्ष्य होगी ।
8. कतिपय वायुयानों को कन्वेंशन देशों में रजिस्ट्रीकृत समझने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी वायुयान के सम्बन्ध में मांट्रियल कन्वेंशन के अनुच्छेद 9 की अपेक्षाओं की पूर्ति हो गई है तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसा वायुयान उस कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत समझा जाएगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
9. अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी का आवश्यक होना-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से ही संस्थित किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
[9क. धारा 3, धारा 3क और धारा 4 के अधीन अपराधों के बारे में उपधारणा-धारा 3, धारा 3क और धारा 4 के अधीन किसी अपराध के अभियोजन में यदि यह साबित कर दिया जाता है कि :-
(क) अभियुक्त के कब्जे से आयुध, गोला-बारूद या विस्फोटक बरामद किए गए थे और यह विश्वास करने का कारण है कि इसी प्रकार के आयुध, गोला-बारूद या विस्फोटक ऐसे अपराध के किए जाने में उपयोग में लाए गए थे ; या
(ख) इस बात का साक्ष्य है कि ऐसे अपराध के किए जाने के संबंध में अभियुक्त ने किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा की थी,
तो अभिहित न्यायालय, जब तक इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता है यह उपधारणा करेगा कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है ।]
10. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किए गए या किए जाने के लिए संभाव्य किसी नुकसान के लिए केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध न होगी ।
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