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दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अभिसमय (आतंकवाद दमन) अधिनियम, 1993 ( SAARC Convention (Suppression of Terrorism) Act, 1993 )


 

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अभिसमय (आतंकवाद दमन) अधिनियम, 1993

(1993 का अधिनियम संख्यांक 36)

[26 अप्रैल, 1993]

आतंकवाद के दमन पर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग

संगठन के अभिसमय को प्रभावी करने के

लिए और उससे संबंधित या उसके

आनुषंगिक विषयों के लिए

अधिनियम

4 नवम्बर, 1987 को काठमांडू में भारत सरकार की ओर से आतंकवाद के दमन पर एक अभिसमय पर हस्ताक्षर किए गए थे ;

और भारत ने, उक्त अभिसमय का अनुसमर्थन कर दिया है, अतः उसको प्रभावी करने के लिए और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों के लिए उपबन्ध किए जाएं ;

भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अभिसमय (आतंकवाद दमन) अधिनियम, 1993 है । 

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है और धारा 6 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यह किसी व्यक्ति द्वारा भारत के बाहर इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध को भी लागू होता है । 

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,- 

(क) अभिसमय" से 4 नवम्बर, 1987 को काठमांडू में हस्ताक्षरित आतंकवाद के दमन पर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अभिसमय अभिप्रेत है, जो अनुसूची में उपवर्णित है ; 

(ख) अभिसमय देश" से वह देश अभिप्रेत है, जिसमें उस समय अभिसमय प्रवृत्त है । 

3. अभिसमय का लागू होना-किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, अभिसमय के अनुच्छेद 1 से अनुच्छेद 8 के उपबन्ध, भारत में विधि का बल रखेंगे ।

4. बंधक बनाना-(1) जो कोई बल द्वारा या बल की धमकी द्वारा अथवा किसी अन्य प्रकार के अधित्रास द्वारा इस आशय से किसी व्यक्ति को बन्दी बनाता है या निरुद्ध करता है और उस व्यक्ति का वध करने या उसे क्षति पहुंचाने की धमकी देता है कि किसी अभिसमय देश से ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधनस्वरूप कोई कार्य कराया जाए या करने से प्रविरत रहने दिया जाए, वह बन्धक बनाने का अपराध करता है । 

(2) जो कोई बन्धक बनाने का अपराध करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।

5. प्रत्यर्पण अधिनियम के बारे में उपबन्ध-प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 (1962 का 34) के प्रयोजनों के लिए, किसी अभिसमय देश के संबंध में, धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध या अभिसमय के अनुच्छेद 1 में विनिर्दिष्ट कोई अन्य अपराध, राजनैतिक प्रकृति का अपराध नहीं समझा जाएगा । 

6. भारत के बाहर किए गए अपराध-(1) जब धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध या अभिसमय के अनुच्छेद 1 में विनिर्दिष्ट कोई अन्य अपराध, भारत के बाहर,-

(क) भारत के किसी नागरिक द्वारा, चाहे खुले समुद्र पर या अन्यत्र ; 

(ख) किसी व्यक्ति द्वारा, जो ऐसा नागरिक नहीं है, भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या वायुयान पर ; या 

(ग) किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो ऐसा नागरिक नहीं है, किसी अभिसमय देश में,

किया जाता है, तब उस अपराध के बारे में उसके विरुद्ध ऐसी कार्यवाही की जा सकेगी, मानो वह भारत के भीतर उस स्थान पर किया गया हो, जहां वह पाया जाए । 

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगी कि धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अपराध की या अभिसमय के अनुच्छेद 1 में विनिर्दिष्ट किसी अन्य अपराध की भारत के भीतर किसी भी स्थान पर जांच की जा सकेगी या उसका विचारण किया जा सकेगा । 

7. अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी का आवश्यक होना-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए कोई भी अभियोजन, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से ही संस्थित किया जाएगा, अन्यथा नहीं और इस धारा के अधीन दी गई मंजूरी के बारे में यह समझा जाएगा कि वह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 188 के अधीन दी गई मंजूरी है । 

8. सद्भापूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या होने संभाव्य किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध नहीं होगी ।

अनुसूची

[धारा 2(क) देखिए]

आंतकवाद के दमन पर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अभिसमय

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) के सदस्य राज्यों ने,-

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन चार्टर में उल्लिखित सहयोग के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ;

इस बात का स्मरण करते हुए कि 7 दिसम्बर और 8 दिसम्बर, 1985 को ढाका शिखर सम्मेलन में राज्याध्यक्षों या दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य राज्यों की सरकारों ने आंतकवाद की समस्या की गंभीरता को इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता पर प्रभाव पड़ता है ;

17 नवम्बर, 1986 के बंगलौर शिखर सम्मेलन की घोषणा का भी स्मरण करते हुए , जिसमें राज्याध्यक्ष या दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य राज्यों की सरकारें इस बात पर सहमत थीं कि यदि क्षेत्र में आतंकवाद को रोकना और समाप्त करना है तो दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के राज्यों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण है ; जिसमें आंतकवाद के सभी कार्यों, तरीकों तथा आचरणों की आपराधिक कार्य के रूप में सुस्पष्टतः निन्दा की गई थी तथा जीवन और संपत्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, राजनैतिक स्थिरता, क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय शांति तथा सहयोग पर पड़ रहे इसके प्रभार पर दुःख प्रकट किया गया था और संयुक्त राष्ट्र संकल्प 262 (न्न्ध्) में अधिकथित उन सिद्धांतों के महत्व को भी स्वीकार किया गया था जिनके द्वारा अन्य बातों के साथ-साथ यह अपेक्षा की गई थी कि प्रत्येक राज्य के कार्य अन्य राज्य में सिविल संघर्ष या आंतकवादी कार्य करने, उसके लिए उकसाने, उनमें सहायता करने या भाग लेने से या अपने राज्यक्षेत्र के भीतर ऐसे कार्यों के किए जाने की दिशा में संगठित क्रियाकलापों में उपमत होने से विरत रहें ;

आतंकवाद के फैलने से उत्पन्न हुए खतरे के प्रति तथा शांति, सहयोग, मित्रता और पड़ोसियों से अच्छे संबंधों पर अपहानिकर प्रभाव के प्रति जिनसे राज्यों की प्रभुता और प्रादेशिक अखंडता भी जोखित में पड़ सकती है, सतर्क रहते हुए ;

यह सुनिश्चित करने के लिए कि आतंकवादी कार्य करने वाले, अभियोजन और दण्ड से न बच निकलें, उनके प्रत्यर्पण या अभियोजन के लिए उपबन्ध करके प्रभावपूर्ण उपाय करने का संकल्प किया है, और इसी उद्देश्य से, निम्नलिखित करार किया है :-

अनुच्छेद 1

                प्रत्यर्पण विधि को समग्र अपेक्षाओं के अधीन रहते हुए, निम्नलिखित में से किसी भी अपराध वाला आचरण, संविदाकारी राज्य की विधि के अनुसार, आतंकवादी माना जाएगा और प्रत्यर्पण के प्रयोजन के लिए, राजनैतिक अपराध के रूप में या राजनैतिक अपराध से संबंधित अपराध के रूप में या राजनतिक हेतुओं द्वारा प्रेरित अपराध के रूप में नहीं माना जाएगा :-

(क) हेग में 16 दिसम्बर, 1970 को हस्ताक्षरित वायुयान विधिविरुद्ध अभिग्रहण दमन अभिसमय के प्रविषय के भीतर अपराध ; 

(ख) मांट्रियल में 23 सितम्बर, 1971 को हस्ताक्षरित सिविल विमानन सुरक्षा विधिविरुद्ध कार्य दमन अभिसमय के प्रविषय के भीतर अपराध ; 

(ग) न्यूयार्क में 14 दिसम्बर, 1973 को हस्ताक्षरित अंतरराष्ट्रीय रूप में संरक्षित व्यक्तियों के विरुद्ध जिनके अंतर्गत राजनयिक अभिकर्ता हैं ; अपराधों के निवारण और दण्ड अभिसमय के प्रविषय के भीतर अपराध ;

(घ) ऐसे किसी अभिसमय के प्रविषय के भीतर अपराध, जिसके दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन से संबंधित सदस्य राज्य पक्षकार हैं और जो पक्षकारों को अभियोजन करने या प्रत्यर्पण प्रदान करने के लिए बाध्य करती है ;

(ङ) हत्या, मानववध, शारीरिक अपहानि कारित करने वाला हमला, व्यपहरण, बंधक बनाना तथा अग्न्यायुधों, शस्त्रों, विस्फोटकों और खतरनाक पदार्थों से संबंधित अपराध, जब उनका अंधाधुंध हिंसा, जिसमें मृत्यु या व्यक्तियों को गम्भीर शारीरिक क्षति या संपत्ति को गंभीर नुकसान अंतर्वलित हैं, फैलाने के माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाए ;

(च) उपपैरा (क) से उपपैरा (ङ) में वर्णित अपराध करने का प्रयत्न या षड्यंत्र, ऐसे किसी अपराध के किए जाने में सहायता करना, उसका दुष्प्रेरण करना या परामर्श देना या इस प्रकार वर्णित अपराधों में सह-अपराधी के रूप में भाग लेना । 

अनुच्छेद 2

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य राज्यों के बीच प्रत्यर्पण के प्रयोजन के लिए, कोई दो या अधिक संविदाकारी राज्य, करार द्वारा, हिंसा अंतर्वलित करने वाले किसी ऐसे अन्य गंभीर अपराध को सम्मिलित करने का विनिश्चय कर सकेंगे जो राजनैतिक अपराध के रूप में या राजनैतिक अपराध से संबंधित अपराध के रूप में या राजनैतिक हेतुओं द्वारा प्रेरित अपराध के रूप में नहीं माना जाएगा । 

अनुच्छेद 3

1. संविदाकारी राज्यों के बीच लागू सभी प्रत्यर्पण संधियों और ठहरावों के उपबन्ध, संविदाकारी राज्यों के बीच, उस मात्रा तक संशोधित किए जाते हैं जहां तक वे इस अभिसमय से असंगत हैं । 

2. इस अभिसमय के प्रयोजन के लिए और उस मात्रा तक कि यदि अनुच्छेद 1 में निर्दिष्ट या अनुच्छेद 2 के निबंधनों के अनुसार तय पाया गया कोई अपराध, संविदाकारी राज्यों के बीच विद्यमान किसी प्रत्यर्पण संधि में प्रत्यर्पणीय अपराध के रूप में सूचीबद्ध नहीं है तो वह उसमें उस रूप में सम्मिलित किया गया समझा जाएगा । 

3. संविदाकारी राज्य, अपने बीच की जाने वाली किसी भावी प्रत्यर्पण संधि में इन अपराधों को प्रत्यर्पणीय अपराध के रूप में सम्मिलित करने का वचनबंध करते हैं ।

4. यदि कोई ऐसा संविदाकारी राज्य, जो किसी संधि की विद्यमानता को प्रत्यर्पण की शर्त बनाता है, किसी दूसरे संविदाकारी राज्य से, जिसके साथ उसकी प्रत्यर्पण संधि नहीं है, प्रत्यर्पण के लिए कोई प्रार्थना प्राप्त करता है तो प्रार्थित राज्य, अपने विकल्प पर, इस अभिसमय को, अनुच्छेद 1 में उपवर्णित या अनुच्छेद 2 के निबंधनों के अनुसार, तय पाए गए अपराधों की बाबत प्रत्यर्पण के लिए आधार मान सकेगा । प्रत्यर्पण प्रार्थित राज्य की विधि के अधीन होगा । 

5. ऐसे संविदाकारी राज्य, जो किसी संधि की विद्यमानता को प्रत्यर्पण के लिए शर्त नहीं बनाते हैं, अनुच्छेद 1 में उपवर्णित या अनुच्छेद 2 के निबंधनों के अनुसार तय पाए गए अपराधों को, प्रार्थित राज्य की विधि के अधीन रहते हुए, परस्पर प्रत्यर्पणीय अपराधों के रूप में मान्यता देंगे ।  

अनुच्छेद 4

कोई ऐसा संविदाकारी राज्य, जिसके राज्यक्षेत्र में ऐसा व्यक्ति पाया जाता है जिसके बारे में यह संदेह है कि उसने अनुच्छेद 1 में निर्दिष्ट या अनुच्छेद 2 के निबंधनों के अनुसार तय पाया गया अपराध किया है और जिसे दूसरे संविदाकारी राज्य से प्रत्यर्पण के लिए कोई प्रार्थना प्राप्त हुई है, यदि वह उस व्यक्ति का प्रत्यर्पण नहीं करता है, तो ऐसे मामले को बिना अपवाद के और अविलंब, अपने समक्ष प्राधिकारियों को भेजेगा जिससे कि अभियोजन पर विचार किया जा सके । ये प्राधिकारी उसी रीति से अपना विनिश्चय करेंगे जिससे कि उस राज्य की विधि के अधीन किसी गंभीर प्रकृति के किसी अपराध की दशा में किया जाता है । 

अनुच्छेद 5

अनुच्छेद 4 के प्रयोजन के लिए, प्रत्येक संविदाकारी राज्य अनुच्छेद 1 के अधीन या अनुच्छेद 2 के निबंधनों के अनुसार तय पाए गए अपराध की दशा में अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए, पारस्परिकता के अधीन रहते हुए, अपनी राष्ट्रीय विधियों से सुसंगत, ऐसे उपाय कर सकेगा जो वह समुचित समझे । 

अनुच्छेद 6

ऐसा संविदाकारी राज्य, जिसके राज्यक्षेत्र में कोई अभिकथित अपराधी पाया जाता है, किसी अन्य संविदाकारी राज्य में प्रत्यर्पण की प्रार्थना प्राप्त होने पर, अपनी राष्ट्रीय विधियों के अधीन रहते हुए, ऐसे समुचित उपाय करेगा जिससे कि प्रत्यर्पण या अभियोजन के प्रयोजनों के लिए अपराधी की उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके । ऐसे उपायों की सूचना तुरन्त प्रार्थी राज्य को दी जाएगी ।

अनुच्छेद 7

संविदाकारी राज्य प्रत्यर्पण करने के लिए बाध्य नहीं होंगे, यदि प्रार्थित राज्य को यह प्रतीत होता है कि मामले की तुच्छ प्रकृति के कारण या इस कारण कि प्रपलायी अपराधी के अभ्यर्पण या वापसी की प्रार्थना सद्भावपूर्वक या न्याय के हित में नहीं की गई है या किसी अन्य कारण, प्रपलायी अपराधी का अभ्यर्पित या वापस किया जाना या अनुचित या समीचीन है ।

 

अनुच्छेद 8

1. संविदाकारी राज्य, अपनी राष्ट्रीय विधियों के अधीन रहते हुए, अनुच्छेद 1 में निर्दिष्ट या अनुच्छेद 2 के निबंधनों के अनुसार तय पाए गए अपराधों की बाबत की जाने वाली कार्यवाही के संबंध में एक दूसरे को अधिकतम पारस्परिक सहायता प्रदान करेंगे, जिसके अन्तर्गत कार्यवाहियों के लिए आवश्यक उनके नियंत्रण में के सभी साक्ष्य का प्रदाय करना है ।

 2. संविदाकारी राज्य, पूर्वावधानिक उपायों के माध्यम से आतंकवादी क्रियाकलापों को निवारण की दृष्टि से, समुचित अभिकरणों के बीच परामर्श के माध्यम से, जानकारी, आसूचना और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान और ऐसे अन्य सहकारी उपायों के माध्यम से, जो समुचित हों, अपनी राष्ट्रीय विधियों द्वारा अनुज्ञात मात्रा तक, आपस में सहयोग करेंगे । 

अनुच्छेद 9

1. यह अभिसमय कठमांडू स्थित दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन सचिवालय में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य राज्यों के हस्ताक्षर के लिए रखा जाएगा । 

2. यह अनुसमर्थन के अधीन होगा । अनुसमर्थन की लिखतें दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के महासचिव के पास निक्षिप्त की जाएंगी । 

अनुच्छेद 10

यह अभिसमय, अनुसमर्थन की सातवीं लिखत के दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के महासचिव के पास निक्षिप्त किए जाने की तारीख के पश्चात् पन्द्रहवें दिन प्रवृत्त होगा । 

अनुच्छेद 11

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का महासचिव इस अभिसमय का निक्षेपधारी होगा और वह इस अभिसमय पर हस्ताक्षर किए जाने और अनुसमर्थन की लिखतों की सभी निक्षिप्तियों की सूचना सदस्य राज्यों को देगा । महासचिव, ऐसी लिखतों की प्रमाणित प्रतियां प्रत्येक सदस्य राज्यों को भेजगा । महासचिव, सदस्य राज्यों को वह तारीख भी सूचित करेगा जिसको यह अभिसयम अनुच्छेद 10 के अनुसार प्रवृत्त होगा ।

इसके साक्ष्यस्वरूप निम्न हस्ताक्षरकर्ताओं ने, जो अपनी-अपनी सरकारों द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत हैं, इस अभिसमय पर हस्ताक्षर कर दिए हैं । 

आज 4 नवम्बर, 1987 को काठमांडू में निष्पादित किया गया है, अंग्रेजी भाषा के सभी आठ मूल पाठ, समान रूप से प्रमाणिक हैं ।

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