बन्दी (न्यायालयों में उपस्थिति) अधिनियम, 1955
(1955 का अधिनियम संख्यांक 32)
[20 सितम्बर, 1955]
कारागारों में परिरुद्ध व्यक्तियों की, उनका साक्ष्य प्राप्त
करने या आपराधिक आरोप का उत्तर देने
के लिए, न्यायालयों में उपस्थिति
का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारण गणराज्य के छठे वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बन्दी (न्यायालयों में उपस्थिति) अधिनियम, 1955 है ।
(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, -
(क) कारागार में परिरोध"-किसी कारागार में परिरोध के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत, चाहे वे किन्हीं भी शब्दों में व्यक्त किए गए हों, निवारक निरोध का उपबन्ध करने वाली किसी विधि के अधीन किसी कारागार में परिरोध या निरोध के प्रति निर्देश भी है;
(ख) कारागार" के अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं,-
(I) ऐसा स्थान, जिसे राज्य सरकार ने, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, उपकारागार घोषित किया है; और
(II) कोई सुधारालय, बोर्स्टल संस्था या उसी प्रकार की अन्य संस्था;
[(ग) राज्य सरकार" से, किसी संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में, उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।]
3. साक्ष्य देने या आरोप का उत्तर देने के लिए बन्दियों को हाजिर करने की अपेक्षा करने की न्यायालय की शक्ति-(1) यदि कोई सिविल या दांडिक न्यायालय यह समझता है कि किसी कारागार में परिरुद्ध किसी व्यक्ति का साक्ष्य उस न्यायालय के समक्ष लम्बित किसी मामले में तात्त्विक है तो वह प्रथम अनुसूची में दिए गए प्ररूप में एक आदेश करेगा जो कारागार के भारसाधक अधिकारी को निदिष्ट होगा :
परन्तु कोई भी सिविल न्यायालय इस उपधारा के अधीन कोई आदेश उस राज्य के, जिसमें न्यायालय लगता है, बाहर स्थित किसी कारागार में परिरुद्ध किसी व्यक्ति के लिए नहीं करेगा ।
(2) यदि किसी कारागार में परिरुद्ध व्यक्ति के विरुद्ध किसी दांडिक न्यायालय में किसी अपराध का आरोप लगाया गया है या लम्बित है तो वह न्यायालय द्वितीय अनुसूची में दिए गए प्ररूप में एक आदेश करेगा जो उस कारागार के भारसाधक अधिकारी को निदिष्ट होगा ।
(3) किसी ऐसे सिविल न्यायालय द्वारा, जो किसी जिला न्यायाधीश के अधीनस्थ हो, इस धारा के अधीन दिया गया कोई भी आदेश तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि उस पर उस जिला न्यायाधीश ने प्रतिहस्ताक्षर न कर दिए हों; और किसी ऐसे दाण्डिक न्यायालय द्वारा, जो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर है, इस धारा के अधीन दिया गया कोई भी आदेश तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि उस पर उस जिला मजिस्ट्रेट ने प्रतिहस्ताक्षर न कर दिए हों जिसके अधीनस्थ वह न्यायालय है या जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह न्यायालय स्थित है ।
(4) किसी प्रेसिडेन्सी नगर के या हैदराबाद शहर के बाहर का कोई लघुवाद न्यायालय, उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए, उस जिला न्यायाधीश के अधीनस्थ समझा जाएगा जिसकी अधिकारिता की सीमाओं के भीतर वह न्यायालय स्थित है ।
4. कतिपय व्यक्तियों को धारा 3 के प्रवर्तन से छूट देने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट मामलों को ध्यान में रखते हुए, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि कोई भी व्यक्ति या व्यक्तियों का वर्ग उस कारागार से नहीं हटाया जाएगा जिसमें वे परिरुद्ध हों, और तब, जब तक कि वह आदेश प्रवृत्त रहता है, धारा 3 के उपबन्ध उस व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को लागू नहीं होंगे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश करने से पूर्व, राज्य सरकार निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेगी, अर्थात् :-
(क) उस अपराध की प्रकृति, जिसके लिए, अथवा वे आधार, जिन पर, उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों के वर्ग की बाबत परिरोध का आदेश दिया गया है;
(ख) यदि उस व्यक्ति को या उन व्यक्तियों के वर्ग को कारागार से हटाने दिया जाता है तो सार्वजनिक व्यवस्था में विघ्न पड़ने की संभाव्यता;
(ग) साधारणतया, लोक हित ।
5. बन्दियों का लाया जाना-धारा 3 के अधीन किए गए आदेश को उस कारागार के भारसाधक अधिकारी को दे दिए जाने पर, जिसमें आदेश में नामित व्यक्ति परिरुद्ध है, वह अधिकारी उसे उस न्यायालय में, जिसमें उसकी उपस्थिति अपेक्षित है, इस प्रकार भिजवाएगा कि वह उस न्यायालय में, उक्त आदेश में उल्लिखित समय पर, उपस्थित हो जाए, और उसे तब तक उस न्यायालय में या उसके समीप अभिरक्षा में निरुद्ध रखवाएगा जब तक उसकी परीक्षा नहीं हो जाती या वह न्यायाधीश या न्यायालय का पीठासीन अधिकारी उसे उस कारागार को, जिसमें वह परिरुद्ध था, वापस भेजे जाने के लिए प्राधिकृत नहीं कर देता ।
6. आदेश का पालन करने से कारागार का भारसाधक अधिकारी कब प्रविरत रहेगा-जहां ऐसा व्यक्ति, जिसकी बाबत धारा 3 के अधीन कोई आदेश किया गया है,-
(क) इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार, उस कारागार से, जहां वह परिरुद्ध है, बीमारी या अन्य अंगशैथिल्य के कारण हटाए जाने के अयोग्य घोषित कर दिया गया है; अथवा
(ख) विचारण के लिए सुपुर्द किया गया है; अथवा
(ग) विचारण या प्रारम्भिक अन्वेषण लम्बित रहने तक प्रतिप्रेषण के अधीन है; अथवा
(घ) उस अवधि तक अभिरक्षा में है, जो इस अधिनियम के अधीन उसे हटाए जाने तथा उस कारागार में, जिसमें वह परिरुद्ध है, वापस लाने के लिए अपेक्षित समय की समाप्ति के पूर्व ही समाप्त हो जाएगी,
तो कारागार का भारसाधक अधिकारी उस आदेश का पालन करने से प्रवरित रहेगा और उस न्यायालय को, जहां से आदेश जारी किया गया था, इस प्रकार प्रविरत रहने के कारणों का विवरण भेजेगा :
परन्तु यथापूर्वोक्त अधिकारी उस दशा में इस प्रकार प्रविरत नहीं होगा, जब-
(I) आदेश किसी दाण्डिक न्यायालय द्वारा किया गया हो; और
(II) आदेश में नामित व्यक्ति विचारण के लिए सुपुर्दगी के अधीन, अथवा विचारण या प्रारम्भिक अन्वेषण लम्बित रहने तक, प्रतिप्रेषण के अधीन परिरुद्ध है और इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार, उस कारागार से, जहां वह परिरुद्ध है, बीमारी या अन्य अंगशैथिल्य के कारण हटाए जाने के अयोग्य घोषित नहीं किया गया है; और
(III) वह स्थान, जहां आदेश में नामित व्यक्ति का साक्ष्य अपेक्षित है, उस कारागार से, जिसमें वह परिरुद्ध है पांच मील से अधिक दूरी पर नहीं है ।
7. बन्दियों की परीक्षा के लिए कमीशन-निम्नलिखित मामलों में से किसी में भी, अर्थात् :-
(क) जहां किसी सिविल न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि किसी कारागार में परिरुद्ध व्यक्ति का साक्ष्य उसके समक्ष लम्बित किसी मामले में तात्त्विक है और यह कि न्यायालय में ऐसे व्यक्ति को धारा 6 के उपबन्धों के कारण, अथवा धारा 4 के अधीन किए गए किसी आदेश के कारण, अथवा हटाए जाने से सम्बन्धित किसी आदेश पर धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन प्रतिहस्ताक्षर करने से जिला न्यायाधीश के इन्कार करने के कारण उपस्थित नहीं किया जा सकता ; अथवा
(ख) जहां यथापूर्वोक्त किसी सिविल न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि किसी ऐसे कारागार में, जो उस राज्य के बाहर स्थित है, जिसमें या उस स्थान से पचास मील से अधिक दूर है, जहां वह न्यायालय लगता है, परिरुद्ध किसी व्यक्ति का साक्ष्य ऐसे किसी मामले में तात्त्विक है,
वहां यदि न्यायालय ठीक समझता है तो, वह उस कारागार में, जिसमें वह व्यक्ति परिरुद्ध है, उसकी परीक्षा के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के उपबन्धों के अधीन एक कमीशन निकाल सकेगा ।
8. दंड प्रक्रिया संहिता तथा सिविल प्रक्रिया संहिता के कतिपय उपबंधों का लागू होना-इस अधिनियम में तथा तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, यथास्थिति, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबन्ध, किसी कारागार में परिरुद्ध किसी व्यक्ति की, कमीशन पर या अन्यथा, परीक्षा करने के सम्बन्ध में यथाशक्य वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी अन्य व्यक्ति की कमीशन पर परीक्षा के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।
9. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा-
(क) धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश पर प्रतिहस्ताक्षर प्राप्त करने की प्रक्रिया;
(ख) वह प्राधिकारी जिसके द्वारा और वह रीति जिससे यह घोषणा की जा सकेगी कि कारागार में परिरुद्ध व्यक्ति वहां से हटाए जाने के अयोग्य है;
(ग) वे शर्तें, जिनके अन्तर्गत खर्चों और प्रभारों का संदाय भी है, और जिनके अधीन रहते हुए किसी सिविल न्यायालय द्वारा धारा 3 के अधीन किया गया कोई आदेश निष्पादित किया जा सकेगा;
(घ) वह रीति जिससे किसी न्यायालय से जारी की गई कोई आदेशिका, जो कारागार में परिरुद्ध किसी व्यक्ति के विरुद्ध निदिष्ट हो, उस पर तामील की जा सकेगी;
(ङ) किसी कारागार में परिरुद्ध जिन व्यक्तियों की उपस्थिति अपेक्षित है उन्हें न्यायालयों को ले जाने और वहां से लाने के लिए तथा ऐसी उपस्थिति की अवधि के दौरान उनकी अभिरक्षा के लिए अनुरक्षक;
(च) ऐसे अनुरक्षकों के व्यय और प्रभारों के लिए अनुज्ञात की जाने वाली रकम; और
(छ) इस अधिनियम के प्रवर्तन से सम्बद्ध अन्य सभी मामलों में अधिकारियों का मार्गदर्शन ।
10. निरसन-(1) प्रिजनर्स ऐक्ट, 1900 (1900 का 3) का भाग 9 तथा उक्त अधिनियम की प्रथम और द्वितीय अनुसूचियां इसके द्वारा निरसित की जाती हैं ।
(2) यदि इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व किसी भाग-ख राज्य में, जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है, इस अधिनियम के उपबंधों की तत्स्थानी कोई विधि प्रवृत्त है तो वह विधि, जहां तक उसका सम्बन्ध इस अधिनियम में दिए गए मामलों से है, ऐसे प्रारम्भ पर निरसित हो जाएगी :
परन्तु ऐसी किसी विधि के अधीन किया गया कोई कार्य या की गई कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबन्धों के अधीन किया गया या की गई समझी जाएगी, और जब तक कि उसे इस अधिनियम के अधीन की गई किसी बात या कार्रवाई द्वारा अधिक्रान्त नहीं कर दिया जाता तब तक तद्नुसार प्रभावी बना रहेगा या बनी रहेगी ।
प्रथम अनुसूची
[धारा 3 की उपधारा (1) देखिए]
-------------------------------------------------------------------- का न्यायालय
-------------------------------------------------------------------- (कारागार का नाम लिखिए) का भारसाधक अधिकारी ।
आपसे इसके द्वारा यह अपेक्षा की जाती है कि आप ---------------------- को, जो इस समय------------- में परिरुद्ध है, ------------ में ----------- के न्यायालय के समक्ष आगामी ---------------- के ------------- दिन, उस दिन के पूर्वाह्न -----------बजे तक, उक्त न्यायालय के समक्ष इस समय लम्बित एक मामले में साक्ष्य देने के लिए, सुरक्षित और सुनिश्चित रूप से लाकर पेश करें, और उक्त --------- द्वारा वहीं उक्त न्यायालय के समक्ष अपना साक्ष्य दिए जा चुकने के पश्चात्, या उक्त न्यायालय द्वारा उसे आगे की उपस्थिति से छूट दिए जाने के पश्चात्, उसे उक्त कारागार को सुरक्षित और सुनिश्चित रूप से वापस ले जाएं ।
------------------के ----------------------- का -------------------दिन ।
क० ख०
(प्रतिहस्ताक्षरित) ग० घ०
द्वितीय अनुसूची
[धारा 3 की उपधारा (2) देखिए]
----------------------------------------------- का न्यायालय
----------------------------------------------- (कारागार का नाम लिखिए) का भारसाधक अधिकारी ।
आपसे इसके द्वारा यह अपेक्षा की जाती है कि आप --------------------------------------------------------- को, जो इस समय------------------में परिरुद्ध है, ------------------------- में------------------------ के न्यायालय के समक्ष आगामी ----------------------------- के ------------- दिन, उस दिन के पूर्वाह्न ---------------------- बजे तक, उक्त न्यायालय के समक्ष इस समय लम्बित आरोप का उत्तर देने के लिए, सुरक्षित और सुनिश्चित रूप से लाकर पेश करें, और उक्त आरोप का निपटारा हो जाने के पश्चात्, या उक्त न्यायालय द्वारा उसे आगे की उपस्थिति से छूट दिए जाने के पश्चात्, उसे उक्त कारागार को सुरक्षित और सुनिश्चित रूप से वापस ले जाएं ।
----------------के ------------------------ का --------------------दिन ।
क० ख०
(प्रतिहस्ताक्षरित) ग० घ०
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