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भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 ( Telecom Regulatory Authority Of India Act, 1997 )


 

भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997

(1997 का अधिनियम संख्यांक 24)

[28 मार्च, 1997]

[दूर-संचार सेवाओं को विनियमित करने, विवादों को न्यायनिर्णीत करने,

अपीलों को निपटाने और दूर-संचार सेक्टर के सेवा प्रदाताओं और

उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करने, दूर-संचार सेक्टर के

सुव्यवस्थित विकास को संप्रवर्तित और सुनिश्चित करने

के लिए भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण

और दूर-संचार विवाद समाधान और अपील

अधिकरण] की स्थापना का और उससे

संबंधित या उसके आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के अड़तालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है । 

(3) यह 25 जनवरी, 1997 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा । 

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण स्थापित किया जाता है;

 [(कक) अपील अधिकरण" से धारा 14 के अधीन स्थापित दूर-संचार विवाद समाधान और अपील अधिकरण अभिप्रेत है;] 

(ख) प्राधिकरण" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण अभिप्रेत है; 

(ग) अध्यक्ष" से धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;  

(घ) निधि" से धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन गठित निधि अभिप्रेत है; 

(ङ) अनुज्ञप्तिधारी" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे विनिर्दिष्ट सार्वजनिक दूर-संचार सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) की धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति प्राप्त है; 

2[(ङक) अनुज्ञापक" से केन्द्रीय सरकार या तार प्राधिकरण अभिप्रेत है जो भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) की धारा 4 के अधीन कोई अनुज्ञप्ति प्रदान करता है;]

(च) सदस्य" से धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का कोई सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी हैं; 

(छ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है; 

(ज) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; 

(झ) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं; 

(ञ) सेवा प्रदाता" से [सेवा प्रदाता के रूप में सरकार] अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत अनुज्ञप्तिधारी भी है; 

(ट) दूर संचार सेवा" से किसी भांति की ऐसी सेवा (जिसके अन्तर्गत इलैक्ट्रानिक डाक, वाक डाक, आंकड़े सेवाएं, श्रव्य टेक्स सेवाएं, वीडियो टेक्स सेवाएं, रेडियो पेजिंग और सेलुलर चल टेलीफोन सेवाएं हैं) अभिप्रेत है जो उपभोक्ताओं को चिह्नों, प्रतीकों, लेखन, बिंबों और ध्वनियों के किसी पारेषण या अभिग्रहण अथवा तार, रेडियो, दृश्य या अन्य वैद्युत चुम्बकीय साधनों द्वारा किसी प्रकार की आसूचना के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है किन्तु इसके अन्तर्गत प्रसारण सेवाएं नहीं हैं: 

 [परंतु केन्द्रीय सरकार अन्य सेवा को जिसके अन्तर्गत प्रसारण सेवाएं भी हैं, दूर-संचार सेवा होना अधिसूचित कर सकेगी ।]

(2) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) में या भारतीय बेतार तार यांत्रिकी अधिनियम, 1933 (1933 का 17) में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो उन अधिनियमों में हैं । 

(3) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति निर्देश का, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, उस राज्य की बाबत यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में तत्स्थानी विधि के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश है ।

अध्याय 2

भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण

3. प्राधिकरण की स्थापना और निगमन-(1) ऐसी तारीख से जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी जिसे भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण कहा जाएगा ।

(2) प्राधिकरण पूर्वोक्त नाम का शाश्वत् उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी तथा वह उक्त नाम से वाद लाएगा या उस पर वाद लाया जाएगा ।

 [(3) प्राधिकरण एक अध्यक्ष, और दो से अनधिक पूर्णकालिक सदस्यों और दो से अनधिक अंशकालिक सदस्यों से मिलकर बनेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे ।] 

(4) प्राधिकरण का प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में होगा । 

 [4. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-प्राधिकरण का अध्यक्ष और अन्य सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जिन्हें दूर-संचार, उद्योग, वित्त, लेखाकर्म, विधि, प्रबंध या उपभोक्ता मामलों का विशेष ज्ञान और वृत्तिक अनुभव है:

परंतु कोई व्यक्ति जो सरकार की सेवा में है, या रहा है, सदस्य के रूप में तभी नियुक्त किया जाएगा जब ऐसे व्यक्ति ने भारत सरकार के सचिव या अपर सचिव का पद या अपर सचिव और सचिव का पद या केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार में कोई समतुल्य पद तीन वर्ष से अन्यून की अवधि के लिए धारण किया हो ।]

5. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की पदावधि, सेवा की शर्तें, आदि-(1) किसी व्यक्ति को अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार अपना यह समाधान कर लेगी कि उस व्यक्ति का कोई ऐसा वित्तीय या अन्य हित नहीं है जिससे ऐसे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना हो ।

 [(2) अध्यक्ष और अन्य सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त यथा अधिसूचित उस तारीख से जिसको वे अपने पद ग्रहण करते हैं तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेंगे ।

(3) भारतीय दूर-संचार विनियामक (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ के दिन, प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कोई व्यक्ति और सदस्य के रूप में नियुक्त और उस रूप में पद धारण कर रहा प्रत्येक अन्य व्यक्ति ऐसे प्रारंभ से ठीक पूर्व अपने पद रिक्त कर देंगे और ऐसा अध्यक्ष तथा ऐसे अन्य सदस्य अपनी पदावधि की या किसी अन्य सेवा संविदा की समयपूर्व समाप्ति के लिए तीन मास के वेतन और भत्ते से अनधिक प्रतिकर का दावा करने के लिए हकदार होंगे ।]

(4) =सरकारी कर्मचारी को, [अध्यक्ष या पूर्णकालिक सदस्य के रूप में उसका चयन होने पर, 1[यथास्थिति, अध्यक्ष या पूर्ण कालिक सदस्य के रूप में पद ग्रहण करने] से पूर्व सेवा से निवृत्त होना होगा ।

(5) अध्यक्ष और 1[पूर्णकालिक सदस्यों] को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।

(6) अध्यक्ष या किसी सदस्य के वेतन, भत्तों और उसकी सेवा की अन्य शर्तों में, उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

 [(6क) अशंकालिक सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो विहित किए जाएं ।]

(7) उपधारा (2) । । । में किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य, -

(क) केंद्रीय सरकार को कम-से-कम तीन मास की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा; या 

(ख) धारा 7 के उपबंधों के अनुसार अपने पद से हटाया जा सकेगा ।

 [(8) अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य, उस तारीख से जिसको वे इस प्रकार पद पर नहीं रह गए हैं, दो वर्ष की अवधि के लिए केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय, -

(क) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई नियोजन; या 

(ख) दूर-संचार सेवा के कारबार में किसी कंपनी में कोई नियुक्ति,

स्वीकार नहीं करेंगे ।] 

(9) अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के पद पर हुई कोई रिक्ति, उस तारीख से, जिसको ऐसी रिक्ति होती है, तीन मास की अवधि के भीतर भरी जाएगी ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

6. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां-(1) अध्यक्ष को प्राधिकरण के कार्यकलापों के संचालन में साधारण अधीक्षण और निदेश देने की शक्तियां होंगी और वह प्राधिकरण के अधिवेशनों की अध्यक्षता करने के अतिरिक्त, प्राधिकरण की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा और ऐसी अन्य शक्तियों और कृत्यों का निर्वहन करेगा जो विहित की जाएं । 

(2) केन्द्रीय सरकार सदस्यों में से किसी एक को प्राधिकरण का उपाध्यक्ष नियुक्त कर सकेगी जो अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जो प्राधिकरण द्वारा विहित किए जाएं या उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।

7. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का पद से हटाया जाना और निलंबन-(1) केन्द्रीय सरकार किसी ऐसे सदस्य को पद से हटा सकेगी, -

(क) जिसे दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या

(ख) जिसे किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या

(ग) जो शारीरिक या मानसिक रूप से सदस्य के रूप में कार्य करने आयोग्य हो गया है; या

(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल रूप से प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

(ङ) जिसने अपनी स्थिति का ऐसा दुरुपयोग किया है जिससे उसके पद पर बने रहने से लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । 

 [(2) ऐसा कोई सदस्य उपधारा (1) के खंड (घ) या खंड (ङ) के अधीन अपने पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे मामले में सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।]

8. अधिवेशन-(1) प्राधिकरण ऐसे समय और स्थानों पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में कार्य करने के संबंध में (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।

(2) अध्यक्ष या यदि वह किसी कारण से प्राधिकरण के अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो उपाध्यक्ष और उसकी अनुपस्थिति में उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया कोई अन्य सदस्य, उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(3) प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का, द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।

(4) प्राधिकरण अपने अधिवेशनों में कार्य करने के लिए विनियम बना सकेगा ।

9. रिक्तियों, आदि से प्राधिकरण की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी कि-

(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

(ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।

10. प्राधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) प्राधिकरण ऐसे अधिकारियों और उतने कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे । 

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी जो [विहित] की जाएं: 

 [परंतु दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ से पूर्व, प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्तों तथा सेवा की अन्य शर्तों की बाबत बनाया गया कोई विनियम, धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (गक) के अधीन बनाए गए नियमों के अधिसूचित होने पर तत्काल प्रभाव से प्रवर्तन में नहीं रह जाएगा ।]

अध्याय 3

प्राधिकरण की शक्तियां और कृत्य

11. प्राधिकरण के कृत्य- [(1) भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण के कृत्य निम्नलिखित होंगे, -

(क) निम्नलिखित विषयों के संबंध में स्वप्रेरणा से या अनुज्ञापक के अनुरोध पर सिफारिशें करना, अर्थात्: -  

(i) नए सेवा प्रदाता के प्रवेश की आवश्यकता और उसका समय निर्धारण;

(ii) सेवा प्रदाता की अनुज्ञप्ति के निबंधन और शर्तें;

(iii) अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों के अननुपालन के लिए अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण;

(iv) दूर-संचार सेवाओं के प्रचालन में प्रतियोगिता को सुकर बनाने और दक्षता वृद्धि के लिए उपाय करना जिससे कि ऐसी सेवाओं की अभिवृद्धि को सुकर बनाया जा सके;

(v) सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं में प्रौद्योगिक सुधार;

(vi) नेटवर्क में उपयोग किए गए उपस्कर के निरीक्षण के पश्चात् सेवा प्रदाताओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले उपस्कर की किस्म;

(vii) दूर-संचार प्रौद्योगिकी के विकास के लिए और दूर-संचार उद्योग के संबंध में साधारणतया अन्य विषय के लिए उपाय;

(viii) उपलब्ध परिदृश्य का दक्षतापूर्ण प्रबंधन;

(ख) निम्नलिखित कृत्यों का निर्वहन करना, अर्थात्: -

(i) अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों का अनुपालन सुनिश्चित करना;

(ii) दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ से पूर्व प्रदान की गई अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों में किसी बात के होते हुए भी सेवा प्रदाताओं के बीच अन्तःसम्बद्धता के निबंधन और शर्तें नियत करना;

(iii) विभिन्न सेवा प्रदाताओं के बीच तकनीकी संगतता और प्रभावी अन्तःसंबंध सुनिश्चित करना;

(iv) सेवा प्रदाताओं के बीच दूर-संचार सेवाएं उपलब्ध कराने से व्युत्पन्न उसकी आमदनी को बांटने संबंधी व्यवस्था का विनियमन करना;

(v) सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवा की क्वालिटी के मानक अधिकथित करना और सेवा की क्वालिटी सुनिश्चित करना तथा सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराई गई ऐसी सेवा का आवधिक सर्वेक्षण करना जिससे कि दूर-संचार सेवा के उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित किया जा सके;

(vi) विभिन्न सेवा प्रदाताओं के बीच दूर-संचार के स्थानीय और लम्बी दूरी वाले सर्किट उपलब्ध कराने के लिए समयावधि अधिकथित करना और सुनिश्चित करना;

(vii) अन्तःसम्बन्धित करारों का और सभी ऐसे अन्य विषयों के ऐसे रजिस्टर रखना जो विनियमों में उपबंधित किए जाएं; 

(viii) खंड (vii) के अधीन रखे गए रजिस्टर को ऐसी फीस के संदाय पर और ऐसी अन्य अपेक्षाओं के अनुपालन पर जो विनियमों में उपबंधित की जाएं, जनता के किसी व्यक्ति के निरीक्षण के लिए खुला रखना ;

(ix) सर्वव्यापी सेवा बाध्यताओं का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना;

(ग) ऐसी सेवाओं के संबंध में फीस और अन्य प्रभार ऐसी दरों पर उद्गृहीत करना जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए; 

(घ) ऐस अन्य कृत्यों का निर्वहन करना जिनके अन्तर्गत ऐसे प्रशासनिक और वित्तीय कृत्य भी हैं, जो उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा सौंपे जाएं या जो इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों: 

परंतु इस उपधारा के खंड (क) में विनिर्दिष्ट प्राधिकरण की सिफारिशें केन्द्रीय सरकार पर आबद्धकर नहीं होंगी: 

परंतु यह और कि केन्द्रीय सरकार किसी सेवा प्रदाता को जारी की जाने वाली नई अनुज्ञप्ति की बाबत इस उपधारा के खंड (क) के उपखंड (i) और उपखंड (ii) में विनिर्दिष्ट विषयों की बाबत प्राधिकरण से सिफारिशों की ईप्सा करेगी और प्राधिकरण अपनी सिफारिशें उस तारीख से, जिसको केन्द्रीय सरकार सिफारिशों की ईप्सा करती है, 60 दिन की अवधि के भीतर अग्रेषित करेगा:

परंतु यह भी कि प्राधिकरण केन्द्रीय सरकार से ऐसी जानकारी या दस्तावेज, जो इस उपधारा के खंड (क) के उपखंड (i) और उपखंड (ii) के अधीन सिफारिश किए जाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों, प्रस्तुत करने के लिए अनुरोध कर सकेगा और केन्द्रीय सरकार ऐसे अनुरोध की प्राप्ति से सात दिन की अवधि के भीतर ऐसी जानकारी का प्रदाय करेगी:

परंतु यह भी कि यदि दूसरे परंतुक में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर या ऐसी अवधि के भीतर जो केन्द्रीय सरकार और प्राधिकरण के बीच आपस में करार पाई जाए, प्राधिकरण से कोई सिफारिश प्राप्त नहीं होती है तो केन्द्रीय सरकार किसी सेवा प्रदाता को अनुज्ञप्ति जारी कर सकेगी:

परंतु यह भी कि यदि केन्द्रीय सरकार प्राधिकरण की उस सिफारिश पर विचार करने पर प्रथमदृष्टया इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि ऐसी सिफारिश स्वीकार नहीं की जा सकती या उसमें उपांतरण आवश्यक हैं, तो वह सिफारिश को प्राधिकरण को वापस पुनर्विचार के लिए निर्दिष्ट कर सकेगी और प्राधिकरण ऐसे निर्देश की प्राप्ति से पंद्रह दिन की अवधि के भीतर सरकार द्वारा किए गए निर्देश पर विचार करने के पश्चात् अपनी सिफारिश केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित कर सकेगा और सिफारिश के, यदि कोई हो, प्राप्त होने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार अंतिम विनिश्चय करेगी ।]

(2) भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण, समय-समय पर, आदेश द्वारा, उन दरों को राजपत्र में अधिसूचित कर सकेगा, जिन पर भारत में और भारत के बाहर दूर-संचार सेवाएं इस अधिनियम के अधीन उपलब्ध कराई जाएंगी, जिनके अंतर्गत वे दरें भी हैं, जिन पर संदेशों को भारत के बाहर किसी देश को पारेषित किया जाएगा:

परन्तु प्राधिकरण एक समान दूर-संचार सेवाओं की बाबत भिन्न-भिन्न व्यक्तियों या व्यक्तियों के वर्ग के लिए भिन्न-भिन्न दरें अधिसूचित कर सकेगा और जहां पूर्वोक्त रूप में भिन्न-भिन्न दरें नियत की जाती हैं वहां प्राधिकरण उसके लिए कारण अभिलिखित करेगा ।

(3) प्राधिकरण, [उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन] अपने कृत्यों का निर्वहन करते समय, भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता के विरुद्ध कृत्य नहीं करेगा । 

(4) प्राधिकरण अपनी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करते समय पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा ।

12. जानकारी मांगने, अन्वेषण करने आदि की प्राधिकरण की शक्तियां-(1) जहां प्राधिकरण के लिए ऐसा करना समीचीन है वहां वह लिखित आदेश द्वारा, - 

(क) किसी सेवा प्रदाता से किसी भी समय लिखित रूप में अपने कार्यकलाप से संबंधित ऐसी जानकारी या स्पष्टीकरण मांग सकेगा जो प्राधिकरण अपेक्षा करे; या  

(ख) किसी सेवा प्रदाता के कार्यकलाप से संबंधित कोई जांच करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा; और 

(ग) किसी सेवा प्रदाता की लेखाबहियों या अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करने के लिए अपने अधिकारियों या कर्मचारियों में से किसी को निदेश दे सकेगा ।

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी सेवा प्रदाता के कार्यकलापों के संबंध में कोई जांच की गई है वहां, -

                (क) यदि ऐसा सेवा प्रदाता सरकार का कोई विभाग है तो सरकारी विभाग का प्रत्येक अधिकारी;

                (ख) यदि ऐसा सेवा प्रदाता कोई कंपनी है तो प्रत्येक निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी; या

                (ग) यदि ऐसा सेवा प्रदाता कोई फर्म है तो प्रत्येक भागीदार, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी; या

                (घ) ऐसा प्रत्येक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय जिसका खंड (ख) और खंड (ग) में उल्लिखित व्यक्तियों में से किसी के साथ कारबार अनुक्रम में संबंध रहा था,

जांच करने वाले प्राधिकरण के समक्ष अपनी अभिरक्षा या नियंत्रण में की ऐसी सभी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेज, जो ऐसी जांच की विषय-वस्तु से संबंधित है, पेश करने के लिए और प्राधिकरण को, यथास्थिति, उससे संबंधित, ऐसा विवरण या जानकारी भी जिसकी उससे उपेक्षा की जाए, ऐसे समय के भीतर जो विनिर्दिष्ट किया जाए, देने के लिए आबद्ध होगा ।

                (3) प्रत्येक सेवा प्रदाता ऐसी लेखाबहियां या अन्य दस्तावेज रखेगा जो विहित किए जाएं ।

(4) प्राधिकरण को सेवा प्रदाताओं को ऐसे निदेश देने की शक्ति होगी, जो वह सेवा प्रदाताओं द्वारा उचित कृत्यकरण के लिए आवश्यक समझे । 

13. निदेश देने की प्राधिकरण की शक्ति-(1) प्राधिकरण, धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए, सेवा प्रदाताओं को, समय-समय पर, ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह आवश्यक समझे: 

 [परंतु धारा 12 की उपधारा (4) के अधीन या इस धारा के अधीन कोई निदेश, धारा 11 की उपधारा (1) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट विषयों के सिवाय जारी नहीं किया जाएगा ।]

[अध्याय 4

अपील अधिकरण

14. अपील अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा, -

(क) (i) अनुज्ञापक या किसी अनुज्ञप्तिधारी के बीच;

(ii) दो या अधिक सेवा प्रदाताओं के बीच;

(iii) सेवा प्रदाता और उपभोक्ताओं के समूह के बीच,

किसी विवाद को न्यायनिर्णीत करने के लिए, दूर-संचार विवाद समाधान और अपील अधिकरण नामक अपील अधिकरण की स्थापना कर सकेगी:

                                परंतु इस खंड की कोई बात निम्नलिखित से संबंधित विषयों की बाबत लागू नहीं होगी-

(क) एकाधिकार व्यापारिक व्यवहार, अवरोधक व्यापारिक व्यवहार और अनुचित व्यापारिक व्यवहार जो एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम, 1969 (1969 का 59) की धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार आयोग की अधिकारिता के अधीन है; 

(ख) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (1986 का 68) की धारा 9 के अधीन स्थापित उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ या किसी उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग या राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के समक्ष चलाने योग्य किसी व्यक्तिगत उपभोक्ता विवाद प्रतितोष का परिवाद;

 (ग) भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) की धारा 7ख की उपधारा (1) में निर्दिष्ट तार प्राधिकारी और किसी अन्य व्यक्ति के बीच विवाद;

(ख) इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण के किसी निदेश, विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध अपील की सुनवाई और उसका निपटारा करना ।

14क. विवाद के निपटारे के लिए आवेदन और अपील अधिकरण को अपील-(1) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या कोई स्थानीय प्राधिकरण या कोई व्यक्ति 14 के खंड (क) में निर्दिष्ट किसी विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए अपील अधिकरण को आवेदन कर सकेगा । 

                (2) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या कोई स्थानीय प्राधिकरण या प्राधिकरण के किसी निदेश, विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको प्राधिकरण द्वारा दिए गए निदेश या किए गए आदेश या विनिश्चय की प्रति केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकरण या किसी व्यथित व्यक्ति को प्राप्त होती है तीस दिन के भीतर की जा सकेगी और वह ऐसे प्ररूप में, ऐसी रीति में सत्यापित और ऐसी फीस के साथ होगी जो विहित की जाए:

परंतु अपील अधिकरण उक्त अवधि के अवसान के पश्चात् भी किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर इसके फाइल न किए जाने के पर्याप्त कारण थे । 

(4) अपील अधिकरण, उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन या उपधारा (2) के अधीन किसी अपील के प्राप्त होने पर, विवाद या अपील के पक्षकारों को सुने जाने का अवसर दिए जाने के पश्चात् उसके ऊपर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जिसे वह ठीक समझे । 

(5) अपील अधिकरण, यथास्थिति, विवाद या अपील के पक्षकारों और प्राधिकरण को उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की प्रति भेजेगा ।

(6) उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन या उपधारा (2) के अधीन की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा, यथास्थिति, आवेदन या अपील की प्राप्ति से नब्बे दिन की अवधि के भीतर आवेदन या अपील का अंतिम रूप से निपटारा किए जाने का प्रयास किया जाएगा:

परंतु जहां ऐसे आवेदन या अपील का निपटारा उक्त नब्बे दिन की अवधि के भीतर नहीं किया जा सकता है वहां अपील अधिकरण उक्त अवधि के भीतर किसी आवेदन या अपील के निपटारा नहीं किए जाने के कारणों को लेखबद्ध करेगा । 

(7) अपील अधिकरण उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आवेदन में किसी विवाद या उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के किसी निदेश या आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध की गई अपील की वैधता या औचित्य या सत्यता का परीक्षण करने के प्रयोजन के लिए, स्वप्रेरणा से या अन्यथा ऐसे आवेदन या अपील के निपटारे से सुसंगत अभिलेखों को मंगाएगा और ऐसे आदेश करेगा, जो वह ठीक समझे । 

14ख. अपील अधिकरण की संरचना-(1) अपील अधिकरण अध्यक्ष और दो से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा नियुक्त किए जाएंगे । 

(2) अपील प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से किया जाएगा । 

(3) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, -

(क) अपील अधिकरण की अधिकारिता उसकी न्यायपीठों द्वारा प्रयोग की जा सकेगी;

(ख) किसी न्यायपीठ का गठन अपील अधिकरण का अध्यक्ष ऐसे अधिकरण के एक या दो सदस्यों से करेगा, जिसे अध्यक्ष ठीक समझे;

(ग) अपील अधिकरण की न्यायपीठें सामान्यतया नई दिल्ली और ऐसे अन्य स्थानों पर अधिविष्ट होंगी, जो केन्द्रीय सरकार, अपील अधिकरण के अध्यक्ष के परामर्श से अधिसूचित करे; 

(घ) केन्द्रीय सरकार उन क्षेत्रों को अधिसूचित करेगी जिनके संबंध में अपील अधिकरण की प्रत्येक न्यायपीठ अपनी अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी ।

(4) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण का अध्यक्ष, ऐसे अधिकरण के किसी सदस्य को एक न्यायपीठ से दूसरी न्यायपीठ में स्थानान्तरित कर सकेगा । 

(5) यदि किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत होता है कि मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है कि वह दो सदस्यों वाली न्यायपीठ द्वारा सुना जाना चाहिए, तो ऐसा मामला या विषय अध्यक्ष द्वारा ऐसी न्यायपीठ को स्थानान्तरित किया जा सकेगा, जिसे अध्यक्ष ठीक समझे । 

14ग. अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए कोई व्यक्ति तभी अर्हित होगा जब वह, -

(क) अध्यक्ष की दशा में, उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा है; 

(ख) सदस्य की दशा में, जिसने भारत सरकार में सचिव का पद या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार में कोई समतुल्य पद दो वर्ष से अन्यून अवधि के लिए धारण किया हो या ऐसा व्यक्ति जो प्रौद्योगिकी, दूर-संचार उद्योग, वाणिज्य या प्रशासन के क्षेत्र में विशेष अनुभव रखता हो । 

14घ. पदावधि-अपील अधिकरण का अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य ऐसी तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए उस रूप में पद धारण करेगा:

परंतु कोई अध्यक्ष या अन्य सदस्य, - 

(क) अध्यक्ष की दशा में, सत्तर वर्ष की आयु; 

(ख) किसी अन्य सदस्य की दशा में, पैंसठ वर्ष की आयु,

प्राप्त करने के पश्चात् पद धारण नहीं करेगा । 

14ङ. सेवा के निबंधन और शर्तें-अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं:

परंतु अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के वेतन और भत्तों या सेवा के अन्य निबंधन और शर्तों में नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

14च. रिक्तियां-यदि अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य के पद में अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न किसी अन्य कारण से कोई रिक्ति किसी भी कारण हो जाती है तो केन्द्रीय सरकार किसी अन्य व्यक्ति को उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त करेगी और कार्यवाही उस प्रक्रम से, जब रिक्ति भर दी जाती है, अपील अधिकरण के समक्ष चालू रखी जा सकेंगी ।    

14छ. पद से हटाया जाना और त्यागपत्र-(1) केन्द्रीय सरकार अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य को पद से हटा सकेगी जो, -

                (क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया हो; या

                (ख) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या

                (ग) अध्यक्ष या सदस्य के रूप में कार्य करने में शारीरिक या मानसिक रूप से अयोग्य हो गया है ; या

                (घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिससे अध्यक्ष या किसी सदस्य के उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

                (ङ) जिसने अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिससे उसके पद पर बने रहने से लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य को उस उपधारा के खंड (घ) या खंड (ङ) में विनिर्दिष्ट आधारों पर उसके पद से तभी हटाया जाएगा जब उच्चतम न्यायालय ने केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त निर्दिष्ट किए जाने पर, ऐसी प्रक्रिया के अनुसार, जिसे वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, जांच किए जाने पर यह रिपोर्ट दे दी हो कि अध्यक्ष या सदस्य को ऐसे आधार या आधारों पर हटा दिया जाना चाहिए । 

(3) केन्द्रीय सरकार उपधारा (2) के अधीन अपील अधिकरण के ऐसे अध्यक्ष या किसी सदस्य को जिसकी बाबत उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है तभी निलंबित कर सकेगी जब केन्द्रीय सरकार ने ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय से रिपोर्ट प्राप्त होने पर आदेश पारित किया हो । 

14ज. अपील अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार अपील अधिकरण के लिए ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी जो वह ठीक समझे ।

(2) अपील अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी, अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।

(3) अपील अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारी के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।

14झ. न्यायपीठों के बीच कार्य का वितरण-जहां न्यायपीठों का गठन हो गया है, वहां अपील अधिकरण का अध्यक्ष, समय-समय पर अधिसूचना द्वारा, न्यायपीठों के बीच अपील अधिकरण के कार्य के वितरण का उपबंध कर सकेगा और मामलों का भी उपबंध कर सकेगा जिनको प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा निपटाया जाएगा ।

14ञ. मामलों को अन्तरण करने की अध्यक्ष की शक्ति-किसी भी पक्षकार के आवेदन पर और पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् तथा पक्षकारों में से ऐसे पक्षकारों की जिनकी वह सुनवाई करना चाहता है, सुनवाई करने के पश्चात् या ऐसी सूचना दिए बिना स्वप्रेरणा से, अध्यक्ष एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले को निपटाए जाने के लिए किसी अन्य न्यायपीठ में अन्तरण कर सकेगा । 

14ट. बहुमत द्वारा विनिश्चय किया जाना-यदि किसी ऐसी न्यायपीठ, जो दो सदस्यों से मिलकर बनी है, के सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद है, तो वे ऐसे प्रश्नों का, जिन पर उनमें मतभेद है, उल्लेख करेंगे और अपील अधिकरण के अध्यक्ष को निर्दिष्ट करेंगे जो स्वयं प्रश्न या प्रश्नों पर सुनवाई करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का उस बहुमत के, जिन्होंने मामले की सुनवाई की है जिसके अन्तर्गत वे भी हैं जहां इसे प्रथम बार सुना गया था, अनुसार विनिश्चय किया जाएगा ।

14ठ. सदस्यों आदि का लोक सेवक होना-अपील अधिकरण का अध्यक्ष, सदस्य और अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक होंगे ।

14ड. लंबित मामलों का अन्तरण-इस अधिनियम के अधीन अधिकरण की स्थापना से ठीक पहले अधिकरण से समक्ष विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए लंबित सभी आवेदन उस तारीख को ऐसे अधिकरण को अन्तरित हो जाएंगे: 

परंतु अध्याय 4 के उपबंधों के अधीन न्यायनिर्णीत किए जाने वाले सभी विवाद जो दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2000 के ठीक पूर्व विद्यमान थे तब तक अधिकरण द्वारा उस अध्याय में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अनुसार न्यायनिर्णीत किए जाते रहेंगे जब तक कि इस अधिनियम के अधीन अपील अधिकरण की स्थापना नहीं हो जाती: 

परंतु यह और कि प्रथम परंतुक में निर्दिष्ट सभी मामले प्राधिकरण द्वारा अपील अधिकरण को धारा 14 के अधीन उसके स्थापित किए जाने पर अन्तरित हो जाएंगे ।

14ढ. अपीलों का अन्तरण-(1) दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ से ठीक पूर्व उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित सभी अपीलें, अपील अधिकरण को धारा 14 के अधीन उसकी स्थापना पर अन्तरित हो जाएंगी । 

(2) जहां उच्च न्यायालय से उपधारा (1) के अधीन कोई अपील अन्तरित की जाती है, वहां- 

(क) उच्च न्यायालय, ऐसे अन्तरण के पश्चात् यथाशीघ्र ऐसी अपील के अभिलेख अपील अधिकरण को अग्रेषित करेगा; और 

(ख) अपील अधिकरण, ऐसे अभिलेखों के प्राप्त होने पर, ऐसी अपीलों का उस प्रक्रम से, जिस पर वह ऐसे अन्तरण से पूर्व थे या किसी अन्य पूर्वतर प्रक्रम से या नए सिरे से, जो भी अपील अधिकरण ठीक समझे, कार्रवाई करेगा । 

15. सिविल न्यायालय की अधिकारिता होना-किसी सिविल न्यायालय की ऐसे किसी वाद या कार्यवाहियों को ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी जिनकी बाबत अपील अधिकरण इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अवधारित करने के लिए सशक्त है और इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली कार्रवाई की बाबत किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण द्वारा व्यादेश प्रदान नहीं किया जाएगा । 

16. अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अपील अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा, किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए अपील अधिकरण को स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।

(2) अपील अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्: -

                (क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा उसकी शपथ पर परीक्षा करना;

                (ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

                (ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

                (घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख की प्रति या दस्तावेज मांगना; 

                (ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

                (च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

                (छ) किसी आवेदन को त्रुटि के कारण खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना; और

                (ज) त्रुटि के कारण किसी आवेदन के खारिज करने के आदेश को या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किए गए किसी आदेश को अपास्त करना; और

                (झ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

                (3) अपील अधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी और अपील अधिकरण दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा । 

17. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार-आवेदक या अपीलकर्ता अपील अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए या तो स्वयं हाजिर हो सकेगा या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउंटेंट या कंपनी सचिवों या लागत अकाउंटेंटों को या विधि व्यवसायियों को या अपने अधिकारियों में से किसी अधिकारी को प्राधिकृत कर सकेगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) चार्टर्ड अकाउंटेंट" से चार्टर्ड अकाउटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथा परिभाषित ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिप्रेत है, जिससे उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किया है;

(ख) कंपनी सचिव" से कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 (1980 का 32) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ग) में यथा परिभाषित ऐसा कंपनी सचिव अभिप्रेत है, जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किया है; 

(ग) लागत अकाउंटेंट" से लागत और संकर्म अकाउंटेंट अधिनियम, 1959 (1959 का 23) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथा परिभाषित ऐसा कोई लागत अकाउंटेंट अभिप्रेत है, जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किया है; 

(घ) विधि व्यवसायी" से कोई अधिवक्ता, वकील या उच्च न्यायालय का कोई अटार्नी अभिप्रेत है और जिसके अन्तर्गत व्यवसायरत प्लीडर भी है ।

18. उच्चतम न्यायालय को अपील-सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) या किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण के किसी आदेश के विरुद्ध जो अन्तर्वर्ती आदेश नहीं है, उस संहिता की धारा 100 में निर्दिष्ट किसी एक या अधिक आधारों पर उच्चतम न्यायालय को अपील होगी । 

(2) अपील अधिकरण द्वारा पक्षकारों की सहमति से किए गए किसी विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी ।

(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील, उस विनिश्चय या आदेश की तारीख से जिसके विरुद्ध अपील की गई है, नब्बे दिन की अवधि के भीतर की जाएगी:

परन्तु उच्चतम न्यायालय, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय से अपील करने में पर्याप्त हेतुक से निवारित हो गया था तो नब्बे दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा ।

19. अपील अधिकरण द्वारा पारित आदेश का डिक्री के रूप में निष्पाद्य होना-(1) इस अधिनियम के अधीन अपील अधिकरण द्वारा पारित कोई आदेश, अपील अधिकरण द्वारा सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पाद्य होगा और इस प्रयोजन के लिए अपील अधिकरण को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी ।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अपील अधिकरण, उसके द्वारा किए गए किसी आदेश को स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को संप्रेषित कर सकेगा और ऐसा सिविल न्यायालय वह आदेश इस प्रकार निष्पादित करेगा मानो वह उस न्यायालय द्वारा दी गई डिक्री हो ।

20. अपील अधिकरण के आदेश का पालन करने में जानबूझकर की गई असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर अपील अधिकरण के आदेश का पालन करने में असफल रहता है तो वह जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा और दूसरे या पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, जुर्माने से जो दो लाख रुपए तक हो सकेगा और उल्लंघन जारी रहने की दशा में, अतिरिक्त जुर्माने से जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा व्यक्तिक्रम जारी रहता है, अतिरिक्त जुर्माने से जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।]

 

 

अध्याय 5

वित्त, लेखा और संपरीक्षा

21. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा विधि द्वारा इस निमित्त किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्राधिकरण को ऐसी धनराशियों का अनुदान जो अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्तों और प्रशासनिक व्ययों के लिए, जिनके अन्तर्गत प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय या उनके संबंध में वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, अपेक्षित हैं, दे सकेगी ।

22. निधि-(1) भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण साधारण निधि के नाम से एक निधि का गठन किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, अर्थात्: -

                (क) प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन प्राप्त सभी अनुदान, फीस और प्रभार; और

                (ख) प्राधिकरण द्वारा ऐसे अन्य स्रोतों से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चित किए जाएं, प्राप्त सभी राशियां ।

(2) निधि का उपयोजन निम्नलिखित की पूर्ति के लिए किया जाएगा, अर्थात्: -

                (क) अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा प्रशासनिक व्यय, जिसके अंतर्गत प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय या उनके संबंध में वेतन, भत्ते और पेंशन हैं; और

                (ख) इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत उद्देश्यों के संबंध में और प्रयोजनों के लिए व्यय ।

23. लेखा और संपरीक्षा-(1) प्राधिकरण, उचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा तथा लेखाओं का वार्षिक विवरण ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे । 

(2) प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय प्राधिकरण द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।

 [स्पष्टीकरण-शंकाओं के निराकरण के लिए यह घोषित किया जाता है कि प्राधिकरण द्वारा, धारा 11 की उपधारा (1) के खंड (ख) और उपधारा (2) तथा धारा 13 के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन में किए गए विनिश्चय, अपील अधिकरण को अपील योग्य मामले होने के कारण, इस धारा के अधीन संपरीक्षा के अधीन नहीं होंगे ।] 

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के, और प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के, उस संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो साधारणतया, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में हैं, और उसे विशिष्टतया, बहियां, लेखा से संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित प्राधिकरण के लेखे, उसकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ प्रति वर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।   

24. विवरणियां, आदि का केन्द्रीय सरकार को दिया जाना-(1) प्राधिकरण केन्द्रीय सरकार को ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप में, तथा ऐसी रीति से जो विहत की जाए या जो केन्द्रीय सरकार निदेश दे, दूर-संचार सेवाओं के संवर्धन और विकास के लिए किसी प्रस्थापित या विद्यमान कार्यक्रम के संबंध में ऐसी विवरणियां और विवरण तथा विशिष्टियां देगा जो केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे ।

(2) प्राधिकरण, प्रत्येक वर्ष में एक बार वार्षिक रिपोर्ट ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए, तैयार करेगा जिसमें पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का संक्षिप्त विवरण होगा और रिपोर्ट की प्रतियां केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित की जाएंगी । 

(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट की एक प्रति, प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

25. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, प्राधिकरण को ऐसे निदेश दे सकेगी जिन्हें वह भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता के हित में आवश्यक समझे ।

(2) पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण, अपनी शक्तियों के प्रयोग या अपने कृत्यों के पालन में, नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में दे: 

परन्तु इस उपधारा के अधीन, प्राधिकरण को कोई निदेश दिए जाने के पूर्व, जहां तक साध्य हो, अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाएगा ।

(3)  कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, इस बारे में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

26. प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के सभी सदस्य, अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जब वे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या जब उनका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे । 

27. अधिकारिता का वर्जन-किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे मामले की बाबत जिसका अवधारण करने के लिए इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्राधिकरण सशक्त है, अधिकारिता नहीं होगी । 

28. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार के या प्राधिकरण के अथवा केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारियों के विरुद्ध नहीं होगी ।

29. प्राधिकरण के निदेशों के उल्लंघन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति प्राधिकरण के निदेशों का अतिक्रमण करता है तो ऐसा व्यक्ति जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा और दूसरे या पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में जुर्माने से, जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा और उल्लंघन जारी रहने की दशा में, अतिरिक्त जुर्माने से, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान व्यक्तिक्रम जारी रहता है, दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

30. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध, उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।  

(2)  उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, - 

(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और 

(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है । 

31. सरकारी विभागों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, सरकार के किसी विभाग द्वारा किया जाता है वहां उक्त विभाग का प्रधान उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा जब तक कि वह यह साबित नहीं कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक्, तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध सरकार के किसी विभाग द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध विभाग के प्रधान से भिन्न किसी अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा । 

32. धन और आय पर कर से छूट-धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या धन, आय, लाभ या अभिलाभ पर कर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण अपने व्युत्पन्न धन, आय, लाभ या अभिलाभ की बाबत धन-कर, आय-कर, या किसी अन्य कर का संदाय करने का दायी नहीं होगा ।

33. प्रत्यायोजन-प्राधिकरण, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा, प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को, ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों का (अध्याय 4 के अधीन विवाद का निपटारा करने और धारा 36 के अधीन विनियम बनाने की शक्ति को छोड़कर) जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।

34. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान प्राधिकरण द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं । 

(2) मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

35. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) धारा 5 की उपधारा (5) के अधीन अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें, 

 [(कक) धारा 5 की उपधारा (6क) के अधीन अंशकालिक सदस्यों को संदेय भत्ते;]  

(ख) धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन अध्यक्ष की शक्तियां और कृत्य; 

(ग) धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन जांच करने की प्रक्रिया; 

1[(गक) धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें;]

(घ) ऐसी लेखाबहियों या अन्य दस्तावेजों का प्रवर्ग जिनका धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन रखा जाना अपेक्षित है; 

1[(घक) धारा 14क की उपधारा (3) के अधीन प्ररूप, उसके सत्यापन की रीति और फीस; 

(घख) धारा 14ङ के अधीन अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(घग) धारा 14ज की उपधारा (3) के अधीन अपील अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें;

(घघ) धारा 16 की उपधारा (2) के खंड (झ) के अधीन विहित की जाने के लिए अपेक्षित सिविल न्यायालय की कोई अन्य शक्ति;] 

(ङ) वह अवधि जिसके भीतर धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया जाएगा; 

(च) वह रीति जिससे धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के लेखे रखे जांएगे;

(छ) वह समय जिसके भीतर और वह प्ररूप जिसमें तथा वह रीति जिससे धारा 24 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार को विवरणियां और रिपोर्टें दी जाएगी;

(ज) कोई अन्य विषय, जिसे विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए अथवा जिसकी बाबत नियमों द्वारा उपबंध किया जाना है ।

36. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के अधिवेशनों का समय तथा स्थान और ऐसे अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत कार्य करने के लिए आवश्यक गणपूर्ति भी है; 

(ख) धारा 8 की उपधारा (4) के अधीन प्राधिकरण के अधिवेशनों में कार्य करना; 

 ।                                ।                                ।                               ।                                ।                                   ।

(घ) वे विषय जिनकी बाबत धारा 11 की उपधारा (1) के [खंड (ख) के उपखंड (vii) के अधीनट प्राधिकरण द्वारा रजिस्टर रखा जाएगा; 

(ङ) फीस का उद्ग्रहण और ऐसी अन्य अपेक्षाएं अधिकथित करना जिनके पूरा करने पर धारा 11 की उपधारा (1) के 1[खंड (ख) के उपखंड (viii) के अधीनट रजिस्टर की प्रति प्राप्त की जा सकेगी; 

(च) धारा 11 की उपधारा (1) के 1[खंड (ग) के अधीनट फीस और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण ।

37. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोकत आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

38. कतिपय विधियों का लागू होना-इस अधिनियम के उपबंध, भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) और भारतीय बेतार तार यांत्रिकी अधिनियम, 1933 (1933 का 17) के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे और विशिष्टतया इस अधिनियम की कोई बात किसी ऐसी अधिकारिता, शक्तियों और कृत्यों पर प्रभाव नहीं डालेगी जिनका प्रयोग या पालन ऐसे प्राधिकरण की अधिकारिता के भीतर आने वाले किसी क्षेत्र के संबंध में तार प्राधिकरण द्वारा किया जाना अपेक्षित है । 

39. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों: 

परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा । 

40. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भारतीय दूर-संचार विनियामक प्राधिकरण अध्यादेश, 1997 (1997 का अध्यादेश संख्यांक 11) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।  

(2) ऐसे निरसन के होते भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

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