विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 2010
(2010 का अधिनियम संख्यांक 42)
[26 सितम्बर, 2010]
कतिपय व्यष्टियों या संगमों या कंपनियों द्वारा विदेशी अभिदाय या विदेशी आतिथ्य स्वीकार
किए जाने और उपयोग किए जाने को विनियमित करने तथा राष्ट्रीय हित के लिए
हानिकारक किन्हीं क्रियाकलापों के लिए विदेशी अभिदाय या विदेशी आतिथ्य
स्वीकार करने और उपयोग करने को प्रतिषिद्ध करने से संबंधित विधि को
समेकित करने तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक
विषयों के लिए
अधिनियम
भारतीय गणराज्य के इकसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय 1
प्रारभिंक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 2010 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है और यह, -
(क) भारत के बाहर भारत के नागारिकों; और
(ख) भारत में रजिस्ट्रीकृत या निगमित कंपनियों अथवा निगम निकायों की भारत के बाहर सहयुक्त शाखाओं या समनुषंगियों, को भी लागू होगा ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करेः
परन्तु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) संगम" से व्यक्तियों का कोई ऐसा संगम, चाहे निगमित हो या न हो, अभिप्रेत है, जिसका भारत में कोई कार्यालय है और इसके अंतर्गत कोई सोसाइटी, चाहे सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो या न हो तथा कोई अन्य संगठन, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, भी है;
(ख) विदेशी मुद्रा का कारबार करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति" से विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 2 खंड (ग) में निर्दिष्ट प्राधिकृत व्यक्ति अभिप्रेत है;
(ग) बैंक" से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ग) में निर्दिष्ट बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है;
(घ) निर्वाचन-अभ्यर्थी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसे किसी विधान-मंडल के निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी के रूप में सम्यक्तः नामनिर्देशित किया गया है;
(ङ) प्रमाणपत्र" से धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन अनुदत्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्रेत है;
(च) कंपनी" का वही अर्थ होगा, जो आय-कर अधिनिमय, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (17) में है;
(छ) विदेशी कंपनी" से भारत के बाहर निगमित कोई कंपनी या संगम या व्यष्टियों का निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं, -
(i) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 591 के अर्थान्तर्गत कोई विदेशी कंपनी;
(ii) ऐसी कंपनी, जो किसी विदेशी कंपनी की समनुषंगी है;
(iii) उपखंड (i) में निर्दिष्ट किसी विदेशी कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या उसके कारबार का मुख्य स्थान या उपखंड (iii) में निर्दिष्ट कोई कंपनी;
(iv) बहुराष्ट्रीय निगम ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में निगमित कोई निगम बहुराष्ट्रीय निगम समझा जाएगा, यदि ऐसा निगम, -
(क) दो या अधिक देशों या राज्यक्षेत्रों में कोई समनुषंगी या कोई शाखा या कारबार का स्थान रखता है; या
(ख) दो या अधिक देशों या राज्यक्षेत्रों में कारबार करता है या अन्यथा प्रचालन करता है;
(ज) विदेशी अभिदाय" से किसी विदेशी स्रोत द्वारा किया गया निम्नलिखित का संदान, परिदान या अंतरण अभिप्रेत है, -
(i) कोई वस्तु, जो किसी व्यक्ति को उसके वैयक्तिक उपयोग के लिए दान के रूप में दी गई वस्तु नहीं है, यदि ऐसी वस्तु का भारत में, उस दान की तारीख को बाजार मूल्य उस राशि से अधिक नहीं है, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, समय-समय पर, इस निमित्त बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;
(ii) कोई करेंसी, चाहे वह भारतीय हो या विदेशी;
(iii) प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 2 के खंड (ज) में यथापरिभाषित कोई प्रतिभूति और इसके अंतर्गत विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 2 के खंड (ण) में यथापरिभाषित कोई विदेशी प्रतिभूति भी है ।
स्पष्टीकरण 1-इस खंड में निर्दिष्ट किसी वस्तु, करेंसी या विदेशी प्रतिभूति का, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसने उसे या तो सीधे ही या एक या अधिक व्यक्तियों की मार्फत, किसी विदेशी स्रोत से प्राप्त किया है, संदान, परिदान या अंतरण भी इस खंड के अर्थ के भीतर विदेशी अभिदाय समझा जाएगा ।
स्पष्टीकरण 2-धारा 17 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी बैंक में जमा किए गए विदेशी अभिदाय पर प्रोद्भूत ब्याज या विदेशी अभिदाय से व्युत्पन्न कोई अन्य आय या उस पर ब्याज भी इस खंड के अर्थ के भीतर विदेशी अभिदाय समझा जाएगा ।
स्पष्टीकरण 3-किसी व्यक्ति द्वारा भारत में किसी विदेशी स्रोत से भारत में या भारत से बाहर अपने कारबार, व्यापार या वाणिज्य के मामूली अनुक्रम में ऐसे व्यक्ति द्वारा दिए गए माल या सेवाओं के बदले में फीस के रूप में (जिसके अंतर्गत भारत में किसी शिक्षा संस्थान द्वारा विदेशी छात्र से प्रभारित फीस भी है) या उनकी लागत मद्दे प्राप्त कोई रकम या ऐसी फीस या लागत मद्दे विदेशी स्रोत के अभिकर्ता से प्राप्त कोई अभिदाय इस खंड के अर्थ के भीतर विदेशी अभिदाय की परिभाषा से अपवर्जित कर दिया जाएगा;
(झ) विदेशी आतिथ्य" से किसी विदेशी स्रोत द्वारा किसी व्यक्ति को किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में यात्रा खर्च या निःशुल्क भोजन, आवास, परिवहन या चिकित्सीय उपचार उपलब्ध कराने के लिए नकद या वस्तु रूप में की गई कोई प्रस्थापना अभिप्रेत है, जो विशुद्ध रूप से आकस्मिक नहीं है;
(ञ) विदेशी स्रोत" के अंतर्गत निम्नलिखित हैं, -
(i) किसी विदेश य विदेशी राज्यक्षेत्र की सरकार और ऐसी सरकार का कोई अभिकरण;
(ii) कोई अंतरराष्ट्रीय अभिकरण, जो संयुक्त राष्ट्र संघ या उसका कोई विशिष्ट अभिकरण नहीं है, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या ऐसा अन्य अभिकरण, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;
(iii) कोई विदेशी कंपनी;
(iv) विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में निगमित कोई निगम, जो विदेशी कंपनी नहीं है;
(v) खंड (छ) के उपखंड (iv) में निर्दिष्ट कोई बहुराष्ट्रीय निगम;
(vi) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ के भीतर कोई कंपनी और उसकी शेयर पूंजी के अभिहित मूल्य का आधे से अधिक निम्नलिखित में से एक या अधिक द्वारा या तो अकेले या संकलित रूप में धारित है, अर्थात्ः-
(अ) किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र की सरकार;
(आ) किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र के नागरिक;
(इ) किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में निगमित निगम;
(ई) किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में बनाए गए या रजिस्टर कराए गए न्यास, सोसाइटियों या व्यष्टियों के अन्य संगम (चाहे निगमित हों या नहीं);
(उ) विदेशी कंपनी;
(vii) किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में किसी व्यवसाय संघ, चाहे उस विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र में रजिस्ट्रीकृत हो या न हो;
(viii) किसी विदेशी न्यास अथवा किसी विदेशी प्रतिष्ठान, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो या ऐसे न्यास अथवा प्रतिष्ठान द्वारा, जो मुख्य रूप से किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र द्वारा वित्तपोषित है;
(ix) किसी सोसाइटी, क्लब या व्यष्टियों के अन्य संगम, जो भारत के बाहर बनाया गया है या रजिस्टर किया गया है;
(x) किसी विदेश का कोई नागरिक;
(ट) विधान-मंडल" से अभिप्रेत है-
(अ) संसद् के दोनों सदनों में से कोई सदन;
(आ) किसी राज्य की विधान सभा अथवा ऐसे राज्य की दशा में, जिसमें विधान परिषद् है, उस राज्य के विधान-मंडल के दोनों सदनों में से कोई सदन;
(इ) संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 29) के अधीन गठित किसी संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा;
(ई) दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 (1992 का 1) में निर्दिष्ट दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की विधान सभा;
(उ) संविधान के अनुच्छेद 243त के खंड (ङ) में यथापरिभाषित नगरपालिका;
(ऊ) असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में संविधान की छठी अनुसूची में यथाउपबंधित जिला परिषदें और प्रादेशिक परिषदें;
(ए) संविधान के अनुच्छेद 243 के खंड (घ) में यथापरिभाषित पंचायत; या
(ऐ) कोई अन्य निर्वाचित निकाय, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए;
(ठ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है और अधिसूचित" पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(ड) व्यक्ति" के अंतर्गत निम्नलिखित हैं, -
(i) कोई व्यष्टि,
(ii) कोई हिन्दू अविभक्त कुटुंब,
(iii) कोई संगम,
(iv) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 25 के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई कंपनी;
(ढ) राजनीतिक दल" से, -
(i) भारत के नागरिकों का ऐसा कोई संगम या व्यष्टि निकाय अभिप्रेत है, -
(अ) जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 29क के अधीन भारत के निर्वाचन आयोग में एक राजनीतिक दल के रूप में रजिस्ट्रीकृत है; या
(आ) जिसने किसी विधान-मंडल के निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी खड़े किए हैं, किन्तु जो निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण और आबंटन) आदेश, 1968 के अधीन इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत नहीं है या रजिस्ट्रीकृत नहीं समझा जाता है;
(ii) ऐसा राजनीतिक दल अभिप्रेत है, जो भारत के निर्वाचन आयोग की तत्समय प्रवृत्त अधिसूचना सं० 56/ज-क/02, तारीख 8 अगस्त, 2002 की सारणी 1 और सारणी 2 के स्तंभ (2) में वर्णित है;
(ण) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(त) विहित प्राधिकारी" से इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा इस प्रकार विनिर्दिष्ट प्राधिकारी अभिप्रेत है;
(थ) रजिस्ट्रीकृत समाचारपत्र" से प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई समाचारपत्र अभिप्रेत है;
(द) नातेदार" का वही अर्थ है, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 2 के खण्ड (41) में उसका है;
(ध) अनुसूचित बैंक" का वही अर्थ है, जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 1) की धारा 2 के खंड (ङ) में उसका है;
(न) समनुषंगी" और सहयुक्त" के वही हैं अर्थ जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में क्रमशः उनके हैं;
(प) व्यवसाय संघ" से व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ अभिप्रेत है ।
(2) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किन्तु लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) या विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे, जो उन अधिनियमों में क्रमशः उनके हैं ।
अध्याय 2
विदेशी अभिदाय और विदेशी आतिथ्य का विनियमन
3. विदेशी अभिदाय स्वीकार करने का प्रतिषेध-(1) कोई भी विदेशी अभिदाय निम्नलिखित द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा, -
(क) किसी निर्वाचन-अभ्यर्थी;
(ख) किसी रजिस्ट्रीकृत समाचारपत्र के संवाददाता, स्तंभ लेखक, व्यंग्य-चित्रकार, संपादक, स्वामी, मुद्रक या प्रकाशक;
(ग) न्यायाधीश, सरकारी सेवक या सरकार के नियंत्रणाधीन या स्वामित्वाधीन किसी निगम या किसी अन्य निकाय के कर्मचारी;
(घ) किसी विधान-मंडल के सदस्य;
(ङ) राजनीतिक दल या उसके पदधारी;
(च) राजनीतिक प्रकृति के ऐसे संगठन, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट किए जाएं;
(छ) ऐसे संगम या कंपनी, जो किसी इलैक्ट्रानिक पद्धति या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (द) में यथापरिभाषित किसी अन्य इलैक्ट्रानिक रूप या किसी अन्य जन संचार पद्धति के माध्यम से श्रव्य समाचारों या श्रव्य-दृश्य समाचारों या सामयिक कार्यकलाप के कार्यक्रमों के निर्माण या प्रसारण में लगी हुई है;
(ज) खंड (छ) में निर्दिष्ट संगम या कंपनी के संवाददाता, स्तंभ लेखक, व्यंग्य-चित्रकार, संपादक, स्वामी ।
स्पष्टीकरण-खंड (ग) में और धारा 6 में निगम" पद से सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन कोई निगम अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कंपनी भी है ।
(2) (क) कोई व्यक्ति, जो भारत में निवासी है और भारत का कोई नागरिक, जो भारत के बाहर निवासी है, किसी राजनीतिक दल या उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति की या दोनों की ओर से किसी विदेशी स्रोत से कोई विदेशी अभिदाय स्वीकार नहीं करेगा अथवा कोई करेंसी अर्जित नहीं करेगा या अर्जित करने का करार नहीं करेगा ।
(ख) कोई व्यक्ति, जो भारत में निवासी है, किसी करेंसी का, चाहे भारतीय हो या विदेशी, जो किसी विदेशी स्रोत से स्वीकार की गई है, किसी भी व्यक्ति को परिदान नहीं करेगा, यदि वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण है कि ऐसे अन्य व्यक्ति का आशय उस करेंसी का किसी राजनीतिक दल अथवा उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को परिदान करने का है या उसके द्वारा ऐसा किए जाने की संभावना है ।
(ग) भारत का कोई नागरिक, जो भारत के बाहर निवासी है, किसी करेंसी का, चाहे भारतीय हो या विदेशी, जो किसी विदेशी स्रोत से स्वीकार की गई है, निम्नलिखित को परिदान नहीं करेगा, -
(i) किसी राजनीतिक दल या उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति या दोनों को, या
(ii) किसी अन्य व्यक्ति को यदि वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण है कि ऐसे अन्य व्यक्ति का आशय ऐसी करेंसी का किसी राजनीतिक दल या उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अन्य व्यक्ति को या दोनों को परिदान करने का है या उसके द्वारा ऐसा किए जाने की संभावना है ।
(3) कोई व्यक्ति, जो किसी भी करेंसी को, चाहे भारतीय हो या विदेशी, धारा 9 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग की ओर से किसी विदेशी स्रोत से प्राप्त करता है, उस करेंसी का,
(क) ऐसे व्यक्ति से भिन्न किसी व्यक्ति को परिदान नहीं करेगा, जिसके लिए वह प्राप्त की गई थी, या
(ख) किसी अन्य व्यक्ति को परिदान नहीं करेगा, यदि वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण है कि ऐसे अन्य व्यक्ति का आशय ऐसी करेंसी का ऐसे व्यक्ति से भिन्न किसी व्यक्ति को, जिसके लिए वह करेंसी प्राप्त की गई थी, परिदान करने का है या उसके द्वारा ऐसा किए जाने की संभावना है ।
4. वे व्यक्ति, जिनको धारा 3 लागू नहीं होगी-धारा 3 की कोई बात उस धारा में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा किसी विदेशी अभिदाय को स्वीकार करने के बारे में उस दशा में लागू नहीं होगी, जहां उसके द्वारा ऐसा अभिदाय, धारा 10 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, -
(क) उसे या उसके अधीन काम कर रहे व्यक्तियों के किसी समूह को शोध्य वेतन, मजदूरी या अन्य पारिश्रमिक के रूप में किसी विदेशी स्रोत से स्वीकार किया जाता है या ऐसे विदेशी स्रोत द्वारा भारत में किए गए कारबार के सामान्य अनुक्रम में संदाय के रूप में स्वीकार किया जाता है; या
(ख) अंतरराष्ट्रीय व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में या उसके द्वारा भारत के बाहर किए गए कारबार के सामान्य अनुक्रम में संदाय के रूप में स्वीकार किया जाता है; या
(ग) ऐसे किसी विदेशी स्रोत द्वारा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के साथ किए गए किसी संव्यवहार के संबंध में विदेशी स्रोत के अभिकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाता है; या
(घ) किसी भारतीय शिष्ट-मंडल के सदस्य के रूप में उसे दिए गए दान या उपहार के रूप में स्वीकार किया जाता है :
परंतु यह तब जब कि ऐसा दान या उपहार केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे दान या उपहार को स्वीकार करने या अपने पास रखने के बारे में बनाए गए नियमों के अनुसार स्वीकार किया गया है; और
(ङ) अपने नातेदार से स्वीकार किया जाता है; या
(च) कारबार के सामान्य अनुक्रम में किसी सरकारी माध्यम, डाकघर या विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) के अधीन विदेशी मुद्रा का कारबार करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति को विप्रेषण के रूप में स्वीकार किया जाता है; या
(छ) किसी छात्रवृत्ति, वृत्तिका या समान प्रकृति के किसी संदाय के रूप में स्वीकार किया जाता हैः
परंतु धारा 3 के अधीन विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा इस धारा के अधीन विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए प्राप्त किसी विदेशी अभिदाय की दशा में, ऐसा अभिदाय धारा 3 के उपबंधों के उल्लंघन में प्राप्त किया गया समझा जाएगा ।
5. राजनीतिक स्वरूप के किसी संगठन को अधिसूचित करने की प्रक्रिया-(1) केन्द्रीय सरकार, संगठन के क्रियाकलापों या संगठन द्वारा प्रचारित विचारधारा या संगठन के कार्यक्रम या किसी राजनीतिक दल के क्रियाकलापों के साथ संगठन के संबंध को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे संगठन को धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (च) में निर्दिष्ट राजनीतिक स्वरूप के ऐसे संगठन के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जो राजनीतिक दल नहीं हैः
परंतु केन्द्रीय सरकार, उसके द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा, ऐसे आधार या आधारों को विनिर्दिष्ट करने वाले मार्गदर्शी सिद्धान्त विरचित कर सकेगी, जिन पर किसी संगठन को, राजनीतिक स्वरूप के संगठन के रूप में विनिर्दिष्ट किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार ऐसे संगठन को, जिसके संबंध में आदेश किया जाना प्रस्तावित है, उस आधार या उन आधारों के संबंध में लिखित में सूचना देगी, जिन पर ऐसे संगठन को उस उपधारा के अधीन राजनीतिक स्वरूप के संगठन के रूप में विनिर्दिष्ट किए जाने का प्रस्ताव है ।
(3) ऐसा संगठन, जिसे उपधारा (2) के अधीन सूचना की तामील की गई है, सूचना की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, केन्द्रीय सरकार को, ऐसे संगठन को उपधारा (1) के अधीन संगठन विनिर्दिष्ट नहीं किए जाने के लिए कारण देते हुए, अभ्यावेदन कर सकेगा:
परंतु केन्द्रीय सरकार, अभ्यावेदन को उक्त तीस दिन की अवधि के अवसान के पश्चात् ग्रहण कर सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि संगठन तीस दिन के भीतर अभ्यावेदन करने से पर्याप्त कारण से निवारित रहा था ।
(4) केन्द्रीय सरकार, यदि वह इसे समुचित समझती है, उपधारा (3) में निर्दिष्ट अभ्यावेदन को किसी प्राधिकारी को ऐसे अभ्यावेदन पर रिपोर्ट देने के लिए अग्रेषित कर सकेगी ।
(5) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (4) में निर्दिष्ट अभ्यावेदन और प्राधिकारी की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् ऐसे संगठन को राजनीतिक दल से भिन्न राजनीतिक प्रकृति के संगठन के रूप में विनिर्दिष्ट करेगी और उपधारा (1) के अधीन तदनुसार आदेश दे सकेगी ।
(6) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आदेश, उपधारा (2) के अधीन सूचना जारी किए जाने की तारीख से एक सौ बीस दिन की अवधि के भीतर, किया जाएगाः
परंतु एक सौ बीस दिन की उक्त अवधि के भीतर कोई आदेश न किए जाने की दशा में, केन्द्रीय सरकार, एक सौ बीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति से साठ दिन की अवधि के भीतर उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश, उसके लिए कारण अभिलिखित करते हुए, कर सकेगी ।
6. विदेशी आतिथ्य स्वीकार करने पर निर्बंधन-किसी विधान-मंडल का कोई सदस्य या किसी राजनीतिक दल का कोई पदधारी या न्यायाधीश या सरकारी सेवक या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगम या किसी अन्य निकाय का कोई कर्मचारी, भारत के बाहर किसी देश या राज्यक्षेत्र में यात्रा के दौरान किसी प्रकार का विदेशी आतिथ्य, केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के बिना, स्वीकार नहीं करेगाः
परंतु भारत के बाहर यात्रा के दौरान आकस्िमक रुग्णता के कारण आवश्यक तात्कालिक चिकित्सीय सहायता के लिए ऐसी अनुज्ञा अभिप्राप्त करना आवश्यक नहीं होगा, किन्तु जब ऐसा विदेशी आतिथ्य स्वीकार किया गया है तब उसे स्वीकार करने वाला व्यक्ति, उसे स्वीकार करने की तारीख से एक मास के भीतर, केन्द्रीय सरकार को ऐसा आतिथ्य स्वीकार करने के बारे में और इस बारे में सूचना देगा कि उसने ऐसा आतिथ्य किस स्रोत से और किस रीति में स्वीकार किया है ।
7. विदेशी अभिदाय का किसी अन्य व्यक्ति को अंतरण करने पर प्रतिषेध-कोई व्यक्ति जो, -
(क) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है और उसे रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है या उसने पूर्व अनुज्ञा प्राप्त की है; और
(ख) कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त करता है,
ऐसे विदेशी अभिदाय को किसी अन्य व्यक्ति को तब तक अंतरित नहीं करेगा जब तक कि ऐसा अन्य व्यक्ति भी इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत न हो और उसे प्रमाणपत्र न दिया गया हो या उसने पूर्व अनुज्ञा प्राप्त न की होः
परंतु ऐसा व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, ऐसे विदेशी अभिदाय के किसी भाग को ऐसे किसी अन्य व्यक्ति को अंतरित कर सकेगा, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार इस अधिनियम के अधीन प्रमाणपत्र अनुदत्त नहीं किया गया है या जिसने अनुमति प्राप्त नहीं की है ।
8. विदेशी अभिदाय का प्रशासनिक प्रयोजन के लिए उपयोग करने पर निर्बन्धन-(1) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है और जिसे प्रमाणपत्र दिया गया है या पूर्व अनुज्ञा दी गई है और वह कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त करता है-
(क) ऐसे अभिदाय का उन्हीं प्रयोजनों के लिए उपयोग करेगा, जिनके लिए वह अभिदाय प्राप्त किया गया हैः
परन्तु किसी विदेशी अभिदाय या उससे उद्भूत किसी आय का उपयोग किसी सट्टे वाले कारबार के लिए नहीं किया जाएगाः
परंतु यह और कि केन्द्रीय सरकार, नियमों द्वारा, ऐसे क्रियाकलाप या कारबार विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जिन्हें इस धारा के प्रयोजन के लिए सट्टे का कारबार समझा जाएगा;
(ख) किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त किए गए ऐसे अभिदाय के पचास प्रतिशत से अनधिक रकम का यथासंभव, प्रशासनिक व्ययों, यदि कोई हों, को चुकाने के लिए संदाय नहीं करेगा:
परंतु ऐसे अभिदाय के पचास प्रतिशत से अधिक प्रशासनिक व्ययों को केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से चुकाया जा सकेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार उन तत्त्वों को, जो प्रशासनिक व्ययों में सम्मिलित किए जाएंगे और वह रीति विहित कर सकेगी जिसमें उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रशासनिक व्यय संगणित किए जाएंगे ।
9. कतिपय मामलों में विदेशी अभिदाय, आदि प्राप्त करने को प्रतिषिद्ध करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, -
(क) किसी व्यक्ति या संगठन को, जो धारा 3 में विनिर्दिष्ट नहीं है, कोई विदेशी अभिदाय स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध कर सकेगी;
(ख) किसी व्यक्ति या वर्ग के व्यक्तियों से, जो धारा 6 में विनिर्दिष्ट नहीं है, किसी प्रकार का विदेशी आतिथ्य स्वीकार करने से पहले केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त करने की अपेक्षा कर सकेगी;
(ग) किसी व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्तियों से, जो धारा 11 में विनिर्दिष्ट नहीं है, यह अपेक्षा कर सकेगी कि वह उतने समय के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, इस बारे में सूचना दे कि, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति या ऐसे वर्ग के व्यक्तियों ने कितना विदेशी अभिदाय प्राप्त किया था और किस स्रोत से तथा किस रीति से प्राप्त किया था और ऐसे विदेशी अभिदाय को किस प्रयोजन के लिए और किस रीति से उपयोग किया गया था;
(घ) धारा 11 की उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उस उपधारा में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या वर्ग के व्यक्तियों से कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त करने की अपेक्षा कर सकेगी;
(ङ) किसी व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्तियों से, जो धारा 6 में विनिर्दिष्ट नहीं है, उतने समय के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, कोई विदेशी आतिथ्य स्वीकार करने के बारे में और इस बारे में सूचना देने की अपेक्षा कर सकेगी कि ऐसा आतिथ्य किस स्रोत से और किस रीति से स्वीकार किया गया था:
परंतु ऐसा कोई प्रतिषेध या ऐसी कोई अपेक्षा तब की जाएगी जब केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि, यथास्िथति, ऐसे व्यक्ति या वर्ग के व्यक्तियों द्वारा विदेशी अभिदाय स्वीकार किए जाने से अथवा ऐसे व्यक्ति द्वारा विदेशी आतिथ्य स्वीकार किए जाने से निम्नलिखित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है, अर्थात्ः-
(i) भारत की प्रभुता और अखंडता; या
(ii) लोकहित; या
(iii) किसी विधान-मंडल के लिए निर्वाचन की स्वंतत्रता या निष्पक्षता; या
(iv) किसी विदेशी राज्य के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों; या
(v) धार्मिक, मूलवंशीय, सामाजिक, भाषायी या प्रादेशिक समूहों, जातियों या समुदायों के बीच मेल-जोल ।
10. अधिनियम के उल्लंघन में प्राप्त करेंसी का संदाय प्रतिषिद्ध करने की शक्ति-जहां केन्द्रीय सरकार का, ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि कोई भारतीय या विदेशी वस्तु या करेंसी, जिसे किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करके स्वीकार किया है, किसी व्यक्ति की अभिरक्षा या नियंत्रण में है, वहां वह लिखित आदेश द्वारा, ऐसे व्यक्ति को उस वस्तु या करेंसी का संदाय, परिदान, अंतरण या उसके संबंध में कोई अन्य कार्रवाई, केन्द्रीय सरकार के लिखित आदेश के बिना करने से प्रतिषिद्ध कर सकेगी और ऐसे आदेश की एक प्रति उस व्यक्ति पर विहित रीति से तामील की जाएगी, जिसे प्रतिषिद्ध किया गया है, और तब विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (1967 का 37) की धारा 7 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी वस्तु या करेंसी को या उसके संबंध में लागू होंगे और उक्त उपधाराओं में धन, प्रतिभूतियों या जमाओं के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे ऐसी वस्तु या करेंसी के प्रति निर्देश है ।
अध्याय 3
रजिस्ट्रीकरण
11. कतिपय व्यक्तियों का केन्द्रीय सरकार के पास रजिस्ट्रीकरण-(1) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, ऐसा कोई व्यक्ति, जिसका कोई निश्िचत सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम हो, तब तक विदेशी अभिदाय स्वीकार नहीं करेगा, जब तक कि ऐसा व्यक्ति केन्द्रीय सरकार से रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त न कर लेः
परंतु विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 1976 (1976 का 49) की धारा 6 के अधीन, केन्द्रीय सरकार के पास रजिस्ट्रीकृत या उस धारा के अधीन पूर्व अनुज्ञा अनुदत्त कोई संगम, जैसे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व विद्यमान था, इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकृत किया गया या पूर्व अनुज्ञा अनुदत्त समझा जाएगा और ऐसा रजिस्ट्रीकरण इस धारा के प्रवर्तन में आने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए विधिमान्य होगा ।
(2) यदि इस उपधारा में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति केन्द्रीय सरकार के पास रजिस्ट्रीकृत नहीं है तो ऐसा व्यक्ति केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा प्राप्त करने के पश्चात् ही कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त कर सकेगा और ऐसी पूर्व अनुज्ञा उसी प्रयोजन के लिए और स्रोत से विधिमान्य होगी, जिसके लिए वह प्राप्त की गई है:
परन्तु यदि उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति इस अधिनियम या विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 1976 (1976 का 49) के किसी उपबंध के उल्लंघन का दोषी पाया गया है तो विदेशी अभिदाय की अनुपयोजित या अप्राप्त रकम केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, उपयोजित या प्राप्त नहीं की जाएगी ।
(3) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, -
(i) किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को, जो विदेशी अभिदाय को स्वीकार करने से पूर्व उसकी अनुज्ञा प्राप्त करेगा; या
(ii) ऐसा क्षेत्र या ऐसे क्षेत्रों को, जिनमें केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा से विदेशी अभिदाय प्राप्त किया जाएगा या उसका उपयोग किया जाएगा;
(iii) वह प्रयोजन या उन प्रयोजनों को, जिनके लिए विदेशी अभिदाय का केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा से उपयोग किया जाएगा;
(iv) ऐसे स्रोत या स्रोतों को, जिससे विदेशी अभिदाय केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा से स्वीकार किया जाएगा,
विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
12. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करना-(1) धारा 11 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा प्रमाणपत्र के अनुदान या पूर्व अनुज्ञा दिए जाने के लिए आवेदन केन्द्रीय सरकार को ऐसे प्ररूप और रीति में और ऐसी फीस के साथ किया जाएगा, जो विहित की जाए ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर, यदि आवेदन विहित प्ररूप में नहीं है या उस प्ररूप में विनिर्दिष्ट कोई विशिष्टियां अंतर्विष्ट नहीं हैं तो आदेश द्वारा आवेदन को नामंजूर कर देगी ।
(3) यदि प्रमाणपत्र के अनुदान या पूर्व अनुमति दिए जाने के लिए आवेदन की प्राप्ति पर और ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, यदि उसकी यह राय है कि उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा कर दिया गया है तो वह साधारणतया उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन के भीतर ऐसे व्यक्ति को रजिस्टर कर सकेगी और उसे ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, यथास्थिति, प्रमाणपत्र अनुदत्त कर सकेगी या पूर्व अनुमति दे सकेगीः
परन्तु केन्द्रीय सरकार द्वारा नब्बे दिन की उक्त अवधि के भीतर प्रमाणपत्र या पूर्व अनुमति न दिए जाने की दशा में वह आवेदक को उसके कारणों को संसूचित करेगीः
परन्तु यह और कि कोई व्यक्ति प्रमाणपत्र दिए जाने या पूर्व अनुमति प्रदान करने के लिए पात्र नहीं होगा, यदि उसके प्रमाणपत्र को निलंबित कर दिया गया है और उस प्रमाणपत्र का निलंबन आवेदन करने की तारीख को जारी रहता है ।
(4) उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित शर्तें होंगी, अर्थात्ः-
(क) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण या पूर्व अनुमति के अनुदान का आवेदन करने वाला व्यक्ति, -
(i) काल्पनिक या बेनामी नहीं है;
(ii) उसे धार्मिक विश्वास से किसी दूसरे में प्रत्यक्ष रूप से उत्प्रेरणा या बल द्वारा परिवर्तन के लिए लक्षित क्रियाकलापों में संलिप्त होने के लिए अभियोजित या दोषसिद्ध नहीं किया गया है;
(iii) उसे देश के किसी विनिर्दिष्ट जिले या किसी अन्य भाग में सामुदायिक तनाव या असामंजस्य पैदा करने के लिए अभियोजित या दोषसिद्ध नहीं किया गया है;
(iv) उसे उसकी निधियों के उपयोजन या दुरुपयोग का दोषी नहीं पाया गया है;
(v) वह राजद्रोह के प्रचार में या हिंसात्मक पद्धतियों का समर्थन करने में संलिप्त नहीं है या उसके संलिप्त होने की संभावना नहीं है;
(vi) उसके द्वारा विदेशी अभिदाय का व्यक्तिगत लाभों के लिए उपयोग करने अथवा उसे अवांछनीय प्रयोजनों के लिए उपयोजित करने की संभावना नहीं है;
(vii) उसने इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन नहीं किया है;
(viii) उसे विदेशी अभिदाय प्राप्त करने से प्रतिषिद्ध नहीं किया गया है;
(ख) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति ने उस सोसाइटी के, जिसके लिए विदेशी अभिदाय का उपयोग किए जाने का प्रस्ताव है, फायदे के लिए उसके चयनित क्षेत्र में युक्तियुक्त क्रियाकलाप किया है;
(ग) उपधारा (1) के अधीन पूर्व अनुमति देने के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति ने उस सोसाइटी के, जिसके लिए विदेशी अभिदाय का उपयोग करने का प्रस्ताव है फायदे के लिए युक्तियुक्त परियोजना तैयार की है;
(घ) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो व्यष्टि है, ऐसे व्यक्ति को न तो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अभियोजित किया गया है, न ही उसके विरुद्ध किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन लंबित है;
(ङ) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो व्यष्टि से भिन्न है, उसके निदेशकों या पदाधिकारियों में से किसी को न तो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अभियोजित किया गया है, न ही उसके विरुद्ध किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन लंबित है;
(च) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा विदेशी अभिदाय स्वीकार करने से निम्नलिखित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है-
(i) भारत की प्रभुता और अखंडता; या
(ii) राज्य की सुरक्षा, उसके रणनीति संबंधी, वैज्ञानिक या आर्थिक हित; या
(iii) लोकहित; या
(iv) किसी विधान-मंडल के लिए निर्वाचन की स्वंतत्रता या ऋजुता; या
(v) किसी विदेशी राज्य के साथ मैत्री संबंध; या
(vi) धार्मिक, वंश संबंधी, सामाजिक, भाषा संबंधी, प्रादेशिक समूहों, जातियों या समुदायों के बीच सामंजस्य;
(छ) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विदेशी अभिदाय की स्वीकृति के कारण, -
(i) किसी अपराध का उद्दीपन नहीं होगा;
(ii) किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरा नहीं होगा ।
(5) जहां केन्द्रीय सरकार प्रमाणपत्र देने से इंकार करती है या पूर्व अनुमति नहीं देती है वहां वह अपने आदेश में उसके कारण अभिलिखित करेगी और उसकी एक प्रति आवेदक को देगीः
परन्तु केन्द्रीय सरकार, उन दशाओं में इस धारा के अधीन आवेदक को प्रमाणपत्र मंजूर करने से इंकार किए जाने या पूर्व अनुमति न दिए जाने के कारण संसूचित नहीं कर सकेगी, जहां सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का 22) के अधीन कोई सूचना या दस्तावेज या अभिलेख या कागज-पत्र देने की बाध्यता नहीं है ।
(6) उपधारा (3) के अधीन प्रदान किया गया प्रमाणपत्र पांच वर्ष की अवधि के लिए विधिमान्य होगा और पूर्व अनुमति, यथास्िथति, निर्दिष्ट प्रयोजन अथवा प्राप्त किए जाने के लिए प्रस्तावित विदेशी अभिदाय की विनिर्दिष्ट रकम के लिए विधिमान्य होगी ।
13. प्रमाणपत्र का निलंबन-(1) जहां केन्द्रीय सरकार का, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से यह समाधान हो जाता है कि धारा 14 की उपधारा (1) में वर्णित किसी आधार पर प्रमाणपत्र रद्द करने के प्रश्न पर विचार किए जाने तक, ऐसा करना आवश्यक है, तो वह लिखित आदेश द्वारा, आदेश में यथाविनिर्दिष्ट एक सौ अस्सी दिन से अनधिक अवधि के लिए प्रमाणपत्र को निलंबित कर सकेगी ।
(2) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसका रजिस्ट्रीकरण निलंबित किया गया है, -
(क) प्रमाणपत्र के निलंबन की अवधि के दौरान कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त नहीं करेगाः
परन्तु केन्द्रीय सरकार, ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर, यदि वह उचित समझे, ऐसे व्यक्ति को, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह विनिर्दिष्ट करे, कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगी;
(ख) अपनी अभिरक्षा में किसी विदेशी अभिदाय का उपयोग विहित रीति से, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से करेगा ।
14. प्रमाणपत्र का रद्द किया जाना-(1) केन्द्रीय सरकार, यदि उसका ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, समाधान हो जाता है, आदेश द्वारा, प्रमाणपत्र रद्द कर सकेगी यदि-
(क) प्रमाणपत्र धारक ने रजिस्ट्रीकरण के अनुदान या उसके नवीकरण के लिए किए गए आवेदन में या उसके संबंध में कोई ऐसा कथन किया है जो गलत है या मिथ्या है; या
(ख) प्रमाणपत्र धारक ने प्रमाणपत्र या उसके नवीकरण के किन्हीं निबंधनों और शर्तों का उल्लंघन किया है; या
(ग) केन्द्रीय सरकार की राय में प्रमाणपत्र का रद्द किया जाना लोकहित में आवश्यक है; या
(घ) प्रमाणपत्र धारक ने इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या किए गए आदेश के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन किया है;
(ङ) यदि प्रमाणपत्र धारक लगातार दो वर्षों के लिए सोसाइटी के फायदे के लिए अपने चयनित क्षेत्र में किसी युक्तियुक्त क्रियाकलाप में नहीं लगा रहा है या निष्क्रिय हो गया है ।
(2) इस धारा के अधीन प्रमाणपत्र के रद्दकरण का कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक संबद्ध व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
(3) ऐसा व्यक्ति, जिसका प्रमाणपत्र इस धारा के अधीन रद्द किया गया है, ऐसे प्रमाणपत्र के रद्दकरण की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए रजिस्ट्रीकरण या पूर्व अनुज्ञा दिए जाने के लिए पात्र नहीं होगा ।
15. ऐसे व्यक्ति, जिनका प्रमाणपत्र रद्द किया गया है, के विदेशी अभिदाय का प्रबंध-(1) ऐसे प्रत्येक व्यक्ति, जिसका प्रमाणपत्र धारा 14 के अधीन रद्द किया गया है, की अभिरक्षा में विदेशी अभिदाय और विदेशी अभिदाय से सृजित आस्तियां ऐसे प्राधिकारी में निहित हो जाएंगी, जो विहित किया जाए ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, यदि वह आवश्यक और लोकहित में समझता है, उस उपधारा में निर्दिष्ट व्यक्ति के क्रियाकलापों का प्रबंध, ऐसी अवधि के लिए और ऐसी रीति से जो केन्द्रीय सरकार निदेश दे, कर सकेगा और ऐसा प्राधिकारी, ऐसे क्रियाकलाप चलाने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध न होने की दशा में, विदेशी अभिदाय का उपयोग कर सकेगा या उससे सृजित आस्तियों का व्ययन कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी उस उपधारा के अधीन उसे निहित विदेशी अभिदाय और आस्तियां को उस उपधारा में निर्दिष्ट व्यक्ति को लौटाएगा यदि ऐसे व्यक्ति को बाद में इस अधिनियम के अधीन रजिस्टर किया जाता है ।
16. प्रमाणपत्र का नवीकरण-(1) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जिसे धारा 12 के अधीन प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है, ऐसे प्रमाणपत्र की अवधि की समाप्ति से पूर्व छह मास के भीतर प्रमाणपत्र को नवीकृत कराएगा ।
(2) प्रमाणपत्र के नवीकरण का आवेदन, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से और ऐसी फीस के साथ, जो विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार को किया जाएगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार, प्रमाणपत्र का नवीकरण, साधारणतया प्रमाणपत्र के नवीकरण के लिए आवेदन की प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन के भीतर ऐसी शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए करेगी, जो वह ठीक समझे और रजिस्ट्रीकरण के नवीकरण का प्रमाणपत्र पांच वर्ष की अवधि के लिए अनुदत्त कर सकेगी:
परंतु यदि केन्द्रीय सरकार प्रमाणपत्र को नब्बे दिन की उक्त अवधि के भीतर नवीकृत नहीं करती है तो वह उसके कारणों को आवेदक को संसूचित करेगी:
परंतु यह और कि केन्द्रीय सरकार, उस दशा में प्रमाणपत्र का नवीकरण करने से इंकार कर सकेगी, जहां किसी संगम ने इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों का अतिक्रमण किया है ।
अध्याय 4
लेखा, संसूचना, संपरीक्षा और आस्तियों का व्ययन, आदि
17. अनुसूचित बैंक के माध्यम से विदेशी अभिदाय-(1) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जिसे धारा 12 के अधीन प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है या पूर्व अनुज्ञा दी गई है, किसी अनुसूचित बैंक की ऐसी किसी एक शाखा के माध्यम से ही किसी एकल खाते में विदेशी अभिदाय प्राप्त करेगा, जो वह ऐसे प्रमाणपत्र के अनुदान के लिए अपने आवेदन में विनिर्दिष्ट करेः
परंतु ऐसा व्यक्ति उसके द्वारा प्राप्त विदेशी अभिदाय का उपयोग करने के लिए एक या अधिक अनुसूचित बैंकों में एक या अधिक खाते खोल सकेगाः
परंतु यह और कि ऐसे खाते या खातों में, विदेशी अभिदाय से भिन्न कोई निधि प्राप्त नहीं की जाएगी या जमा नहीं की जाएगी ।
(2) प्रत्येक बैंक या विदेशी अभिदाय प्राप्त करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति ऐसे प्राधिकारी को, जो विहित किया जाए, निम्नलिखित के संबंध में रिपोर्ट, ऐसे प्ररूप में और रीति से, जो विहित की जाए, करेगा, -
(क) विदेशी विप्रेषण की विहित रकम;
(ख) वह स्रोत और रीति, जिसमें विदेशी विप्रेषण प्राप्त किया गया था; और
(ग) कोई अन्य विशिष्टियां ।
18. संसूचना-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है या पूर्व अनुज्ञा दी गई है, विहित किए जाने वाले समय के भीतर और रीति से, केंद्रीय सरकार और ऐसे अन्य प्राधिकारी को, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए, उसके द्वारा प्राप्त प्रत्येक विदेशी अभिदाय की प्रत्येक रकम, उस स्रोत, जिससे और ऐसी रीति, जिसमें ऐसा विदेशी अभिदाय प्राप्त किया गया है और वे प्रयोजन, जिनके लिए और रीति, जिसमें ऐसे विदेशी अभिदाय का उसके द्वारा उपयोग किया गया है, के संबंध में संसूचना देगा ।
(2) विदेशी अभिदाय प्राप्त करने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक विवरण की प्रति प्रस्तुत करेगा जिसमें प्राप्त विदेशी अभिदाय की विशिष्टियां उपदर्शित की जाएंगी जो बैंक के अधिकारी या विदेशी मुद्रा में कारबार करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा सम्यक् रूप से प्रमाणित की जाएंगी और उसे केन्द्रीय सरकार को उपाधारा (1) के अधीन संसूचना के साथ अग्रेषित करेगा ।
19. लेखाओं का रखा जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है या पूर्व अनुज्ञा दी गई है, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए-
(क) उसके द्वारा प्राप्त किए गए किसी विदेशी अभिदाय का लेखा रखेगा; और
(ख) उस रीति का, जिसमें उसने ऐसे अभिदाय का उपयोग किया है, अभिलेख रखेगा ।
20. लेखाओं की संपरीक्षा-जहां कोई व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है या पूर्व अनुज्ञा दी गई है, इस अधिनियम के अधीन कोई संसूचना उतने समय के भीतर, जो उसके लिए विनिर्दिष्ट किया गया है, देने में असफल रहता है अथवा इस प्रकार दी गई संसूचना विधि के अनुसार नहीं है अथवा यदि ऐसी संसूचना के निरीक्षण के पश्चात् केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कोई युक्तियुक्त कारण है कि इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन किया गया है या किया जा रहा है तो केन्द्रीय सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, केन्द्रीय सरकार के अधीन समूह स्त्र्कऱ् पद धारण करने वाले ऐसे राजपत्रित अधिकारी को या किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकारी या संगठन को, जिसे वह ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति द्वारा रखी गई या बनाए रखी गई किन्हीं लेखाबहियों की संपरीक्षा करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी तथा तब ऐसे प्रत्येक अधिकारी को सूर्योदय के पश्चात् और सूर्यास्त के पूर्व किसी युक्तियुक्त समय पर किसी परिसर में उक्त लेखाबहियों की संपरीक्षा करने के प्रयोजन के लिए प्रवेश करने का अधिकार होगाः
परंतु ऐसी संपरीक्षा से अभिप्राप्त कोई जानकारी गोपनीय रखी जाएगी और इस अधिनियम के प्रयोजनों के सिवाय प्रकट नहीं की जाएगी ।
21. निर्वाचन-अभ्यर्थी द्वारा संसूचना-प्रत्येक निर्वाचन-अभ्यर्थी, जिसने कोई विदेशी अभिदाय प्राप्त किया है, उस तारीख से, जिसको वह ऐसे अभ्यर्थी के रूप में सम्यक्तः नामनिर्दिष्ट किया जाता है, ठीक पूर्ववर्ती एक सौ अस्सी दिन के भीतर किसी समय, ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी या दोनों को इस बात की संसूचना देगा कि उसने कितना विदेशी अभिदाय प्राप्त किया है, ऐसा अभिदाय किस स्रोत से और किस रीति से प्राप्त किया है और उसने ऐसे विदेशी अभिदाय का किन प्रयोजनों के लिए और किस रीति से उपयोग किया है ।
22. विदेशी अभिदाय से सृजित आस्तियों का व्ययन-जहां ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन विदेशी अभिदाय प्राप्त करने के लिए अनुज्ञात किया गया था, अस्तित्व में नहीं रहा है या निष्क्रिय हो गया है, वहां ऐसे व्यक्ति की सभी आस्तियों का तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार व्ययन किया जाएगा, जिसके अधीन व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृत या निगमित किया गया था और केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन प्राप्त विदेशी अभिदाय से सृजित सभी आस्तियों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचना द्वारा यह विनिर्दिष्ट कर सकेगी कि ऐसी सभी आस्तियों का व्ययन ऐसे प्राधिकारी द्वारा जो विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी रीति से और ऐसी प्रक्रिया से किया जाएगा, जो विहित की जाए ।
अध्याय 5
निरीक्षण, तलाशी और अभिग्रहण
23. लेखाओं या अभिलेखों का निरीक्षण-यदि केन्द्रीय सरकार के पास, किसी कारण से, जो लेखबद्ध किया जाएगा, यह संदेह करने का आधार है कि इस अधिनियम के किसी उपबंध का-
(क) किसी राजनैतिक दल द्वारा, या
(ख) किसी व्यक्ति द्वारा, या
(ग) किसी संगठन द्वारा, या
(घ) किसी संगम द्वारा,
उल्लंघन किया गया है या किया जा रहा है तो वह साधारण या विशेष आदेश द्वारा, केन्द्रीय सरकार के अधीन समूह “क” पद धारण करने वाले ऐसे राजपत्रित अधिकारी को, या ऐसे किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकारी या संगठन को, जिसे वह ठीक समझे (जिसे इसमें इसके पश्चात् निरीक्षण अधिकारी कहा गया है), यथास्थिति, ऐसे राजनैतिक दल, व्यक्ति, संगठन या संगम द्वारा रखे जाने वाले किसी लेखे या अभिलेख का निरीक्षण करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी और तब प्रत्येक ऐसे निरीक्षण अधिकारी को उक्त लेखे या अभिलेख का निरीक्षण करने के प्रयोजन के लिए सूर्यास्त से पहले और सूर्योदय के पश्चात् किसी भी उचित समय पर किसी परिसर में प्रवेश करने का अधिकार होगा ।
24. लेखाओं या अभिलेखों का अभिग्रहण-धारा 23 में निर्दिष्ट लेखे या अभिलेख का निरीक्षण करने के पश्चात् यदि निरीक्षण अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कोई युक्तियुक्त कारण है कि इस अधिनियम या विदेशी मुद्रा से संबंधित किसी अन्य विधि के किसी उपबंध का उल्लंघन किया गया है या किया जा रहा है तो वह ऐसे लेखे या अभिलेख का अभिग्रहण कर सकेगा और उसे ऐसे न्यायालय, प्राधिकारी या अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकेगा, जिसमें ऐसे उल्लंघन के लिए कोई कार्यवाही की जाती हैः
परन्तु यदि ऐसे लेखे या अभिलेख द्वारा प्रकटित उल्लंघन के लिए ऐसे अभिग्रहण की तारीख से छह मास के भीतर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है तो निरीक्षण अधिकारी ऐसे लेखे या अभिलेख को उस व्यक्ति को लौटा देगा जिससे उन्हें अभिगृहीत किया गया था ।
25. अधिनियम के उल्लंघन में प्राप्त वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति का अभिग्रहण-यदि केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी राजपत्रित अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी व्यक्ति के कब्जे में या उसके नियंत्रणाधीन धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ज) के उपखंड (i) में विनिर्दिष्ट मूल्य से अधिक मूल्य की कोई वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति है, चाहे भारतीय हो या विदेशी, जिसके संबंध में इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन किया गया है या किया जा रहा है तो वह ऐसी वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति का अभिग्रहण कर सकेगा ।
26. अभिगृहीत वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति का व्ययन-(1) केन्द्रीय सरकार उक्त वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति के मूल्य, चोरी होने के संबंध में उनकी असुरक्षित स्िथति या किसी अन्य सुसंगत बात को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचना द्वारा, ऐसी वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति को विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जो अभिग्रहण किए जाने के, यथाशीघ्र, पश्चात् उस अधिकारी द्वारा ऐसी रीति में व्ययनित की जाएगी, जो केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, इसमें इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए अवधारित करे ।
(2) अभिगृहीत कोई वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति अनावश्यक विलम्ब के बिना, ऐसे अधिकारी को अग्रेषित की जाएगी जो विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(3) जहां कोई वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति अभिगृहीत की गई है और ऐसे अधिकारी को अग्रेषित की गई है, वहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी ऐसी वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति की एक सूची तैयार करेगा, जिसमें उनके वर्णन, मूल्य या ऐसी अन्य पहचानपरक विशिष्टियां अंतर्विष्ट होंगी, जो उस उपधारा में निर्दिष्ट अधिकारी उस वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति की पहचान के लिए सुसंगत समझे तथा किसी मजिस्ट्रेट को इस प्रकार तैयार की गई सूची की शुद्धता प्रमाणित करने के प्रयोजनार्थ आवेदन करेगा ।
(4) जहां उपधारा (2) के अधीन कोई आवेदन किया गया है, वहां मजिस्ट्रेट, यथासंभव शीघ्र, आवेदन को अनुज्ञात करेगा ।
(5) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाला प्रत्येक न्यायालय, मजिस्ट्रेट द्वारा यथा प्रमाणित सूची को ऐसे अपराध की बाबत प्राथमिक साक्ष्य समझेगा ।
(6) उपधारा (3) के अधीन कार्य करने वाला प्रत्येक अधिकारी, अभिग्रहण की रिपोर्ट तुरन्त उस सेशन न्यायाधीश या सहायक सेशन न्यायाधीश के न्यायालय को भेजेगा, जिसको धारा 29 के अधीन अधिहरण का न्यायनिर्णयन करने की अधिकारिता है ।
27. अभिग्रहण का 1974 के अधिनियम सं० 2 के अनुसार किया जाना-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के उपबंध, इस अधिनियम के अधीन किए गए सभी अभिग्रहणों को वहां तक लागू होंगे, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं ।
अध्याय 6
न्यायनिर्णयन
28. अधिनियम के उल्लंघन में अभिप्राप्त वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति का अधिहरण-कोई वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति जिसका धारा 25 के अधीन अभिग्रहण किया गया है, उस दशा में अधिहरण किए जाने के दायित्वाधीन होगी, जब ऐसी वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति के बारे में धारा 29 के अधीन यह न्यायनिर्णयन किया गय है कि वह अधिनियम के उल्लंघन में प्राप्त या अभिप्राप्त की गई है ।
29. अधिहरण का न्यायनिर्णयन-(1) धारा 28 में निर्दिष्ट किसी अधिहरण का न्यायनिर्णयन-
(क) किसी प्रकार की सीमा के बिना उस सेशन न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर अभिग्रहण किया गया था; और
(ख) ऐसी सीमाओं के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, ऐसे अधिकारी द्वारा किया जा सकेगा, जो सहायक सेशन न्यायाधीश की पंक्ति से नीचे का न हो और जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित् विनिर्दिष्ट करे ।
(2) जब, उपधारा (1) के अधीन न्यायनिर्णयन, यथास्िथति, सेशन न्यायाधीश या सहायक सेशन न्यायाधीश द्वारा पूरा कर दिया जाता है, तब सेशन न्यायाधीश या सहायक सेशन न्यायाधीश, यथास्िथति, अभिगृहीत वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति का, इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किए जाने के लिए प्रयुक्त वस्तु का अधिहरण करके या उसके कब्जे का हकदार होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति को परिदान करके या अन्यथा व्ययन के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा, जो वह उचित समझे ।
30. अधिहरण की प्रक्रिया-अधिहरण के न्यायनिर्णयन का कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उस व्यक्ति को, जिससे किसी वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति का अभिग्रहण किया गया है, ऐसे अधिहरण के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।
अध्याय 7
अपील और पुनरीक्षण
31. अपील-(1) धारा 29 के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश की उसको संसूचना की तारीख से एक मास के भीतर निम्नलिखित को अपील कर सकेगा, अर्थात्ः-
(क) जहां आदेश सेशन न्यायालय द्वारा किया गया है, वहां उस उच्च न्यायालय को, जिसके अधीनस्थ ऐसा न्यायालय है; या
(ख) जहां आदेश धारा 29 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन विनिर्दिष्ट किसी अधिकारी द्वारा किया गया है, वहां उस सेशन न्यायालय को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर अधिहरण के न्यायनिर्णयन का ऐसा आदेश किया गया थाः
परन्तु यदि अपील न्यायालय का समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी एक मास की उक्त अवधि के भीतर अपील करने से उचित कारणों से निवारित हुआ था तो वह एक मास की अतिरिक्त अवधि के भीतर ऐसी अपील करने की अनुज्ञा दे सकेगा, किन्तु उसके पश्चात् नहीं ।
(2) धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (च) में निर्दिष्ट कोई संगठन या धारा 6 या धारा 9 में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति या संगठन, जो धारा 5 के अनुसरण में किए गए किसी आदेश से अथवा इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञा देने से इंकार करने वाले केन्द्रीय सरकार के किसी आदेश से अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा, यथास्िथति, धारा 12 की उपधारा (2) या उपधारा (4) अथवा धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित है, ऐसे आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर, ऐसे आदेश के विरुद्ध उस उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर अपीलार्थी मामूली तौर पर निवास करता है या कारबार करता है अथवा वैयक्तिक रूप से अभिलाभ के लिए काम करता है अथवा अपीलार्थी के संगठन या संगम होने की दशा में, ऐसे संगठन या संगम का प्रधान कार्यालय अवस्थित है ।
(3) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक अपील मूल डिक्री से की गई अपील समझी जाएगी और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908(1908 का 5) की पहली अनुसूची के आदेश 41 के उपबन्ध, जहां तक संभव हो उसे उसी प्रकार लागू होंगे, जैसे वे मूल डिक्री से की गई अपील को लागू होते हैं ।
32. केन्द्रीय सरकार द्वारा आदेशों का पुनरीक्षण-(1) केन्द्रीय सरकार, स्वप्रेरण से या इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति द्वारा पुनरीक्षण के लिए आवेदन किए जाने पर, इस अधिनियम के अधीन ऐसी किसी कार्यवाही का अभिलेख मंगा सकेगी और उसकी जांच कर सकेगी जिसमें उसके द्वारा कोई ऐसा आदेश पारित किया गया है और ऐसी कोई जांच कर सकेगी या ऐसी जांच करा सकेगी और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगी, जो वह उचित समझे ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन कोई आदेश उस दशा में स्वप्रेरणा से पुनरीक्षित नहीं करेगी, यदि वह आदेश एक वर्ष से अधिक समय पूर्व किया गया है ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए किसी आवेदन की दशा में, आवेदन उस तारीख से, जिसको प्रश्नगत आदेश उसे संसूचित किया गया था या उस तारीख से, जिसको उसे अन्यथा रूप से इसकी जानकारी हुई थी, जो भी पूर्वतर हो, एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए:
परंतु केन्द्रीय सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति पर्याप्त कारणों से उक्त अवधि के भीतर आवेदन करने से निवारित रहा था तो वह, उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् आवेदन ग्रहण कर सकेगी ।
(4) केन्द्रीय सरकार किसी आदेश को वहां पुनरीक्षित नहीं करेगी, जहां आदेश के विरुद्ध कोई अपील तो होती है, किन्तु वह नहीं की गई है और वह समय, जिसके भीतर ऐसी अपील की जा सकती है, समाप्त नहीं हुआ है या ऐसे व्यक्ति ने अपील करने के अपने अधिकार का अधित्यजन नहीं किया है या अपील इस अधिनियम के अधीन फाइल की गई है ।
(5) इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए प्रत्येक आवेदन के साथ ऐसी फीस दी जाएगी, जो विहित की जाए ।
स्पष्टीकरण-केन्द्रीय सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने से इंकार करने संबंधी कोई आदेश, इस धारा के प्रयोजनों के लिए, ऐसा आदेश नहीं माना जाएगा जो ऐसे व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है ।
अध्याय 8
अपराध और शास्तियां
33. मिथ्या कथन, घोषणा करना या मिथ्या लेखे परिदत्त करना-कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन जानबूझकर, -
(क) धारा 9 की उपधारा (ग) या धारा 18 के अधीन मिथ्या जानकारी देगा; या
(ख) कपटपूर्ण, मिथ्या व्यपदेशन के माध्यम से या तात्त्विक तथ्य को छिपाकर पूर्व अनुज्ञा या रजिस्ट्रीकरण प्राप्त करेगा,
तो वह किसी न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराए जाने पर, कारावास का जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने का अथवा दोनों का भागी होगा ।
34. धारा 10 के उल्लंघन में अभिप्राप्त वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जिस पर धारा 10 के अधीन किसी प्रतिषेधात्मक आदेश की तामील की गई है, किसी वस्तु या करेंसी या प्रतिभूति का, चाहे भारतीय हो या विदेशी, ऐसे प्रतिषेधात्मक आदेश का उल्लंघन करके संदाय करेगा, परिदान, अन्तरण करेगा या उसके संबंध में कोई अन्य कार्रवाई करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडित किया जाएगा; तथा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे उल्लंघन का विचारण करने वाला न्यायालय सिद्धदोष व्यक्ति पर उतना अतिरिक्त जुर्माना भी अधिरोपित कर सकेगा जितना उस वस्तु के बाजार मूल्य के या उस करेंसी या प्रतिभूति की रकम के जिसके संबंध में प्रतिषेधात्मक आदेश का उसने उल्लंघन किया है, या उसके इतने भाग के बराबर हो जो न्यायालय ठीक समझे ।
35. अधिनियम के किसी उपबंध के उल्लंघन के लिए दंड-जो कोई इस अधिनियम के अथवा इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश के किसी उपबंध के उल्लंघन में किसी विदेशी स्रोत से कोई विदेशी अभिदाय या कोई करेन्सी या प्रतिभूति स्वीकार करेगा अथवा उसे स्वीकार करने में किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल या संगठन की सहायता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडित किया जाएगा ।
36. जहां वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति अधिहरण के लिए उपलब्ध न हो वहां अतिरिक्त जुर्माना अधिरोपित करने की शक्ति-यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति के, चाहे भारतीय हो या विदेशी, सम्बन्ध में कोई ऐसा कार्य करेगा या उसे करने में लोप करेगा, जो कार्य या लोप ऐसी वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति को इस अधिनियम के अधीन अधिहरणीय बना देगा तो उस व्यक्ति का विचारण करने वाला न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, पूर्वोक्त कार्य या लोप के लिए ऐसे व्यक्ति की दोषसिद्धि पर, यदि ऐसी वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति अधिहरण के लिए उपलब्ध नहीं है, उस व्यक्ति पर, उस वस्तु या करेन्सी या प्रतिभूति के मूल्य के पांच गुने से अनधिक या एक हजार रुपए का, इनमें से जो भी अधिक हो, जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा और इस प्रकार अधिरोपित जुर्माना ऐसे किसी अन्य जुर्माने के अतिरिक्त होगा, जो ऐसे व्यक्ति पर इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित किया जा सकता है ।
37. जिन अपराधों के लिए अलग से दंड का उपबंध नहीं किया गया है उनके लिए शास्ति-जो कोई इस अधिनियम के ऐसे किसी उपबंध का, जिसके लिए अलग से शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है, अनुपालन करने में असफल रहेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडित किया जाएगा ।
38. विदेशी अभिदाय स्वीकार करने का प्रतिषेध-इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जो कोई धारा 35 या धारा 37 के अधीन किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराए जाने पर, जहां तक ऐसे अपराध का संबंध विदेशी अभिदाय स्वीकार करने या उसका उपयोग करने से है, ऐसे अपराध का पुनः सिद्धदोष ठहराया जाएगा तो वह पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए कोई विदेशी अभिदाय स्वीकार नहीं करेगा ।
39. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारोबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगेः
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध को किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म, सोसाइटी, व्यवसाय संघ या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा
(ख) फर्म, सोसाइटी, व्यवसाय संघ या व्यष्टियों के अन्य संगम के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भगीदार या ऐसी सोसाइटी, व्यवसाय संघ अथवा व्यष्टियों के अन्य संगम का सदस्य अभिप्रेत है ।
40. अधिनियम के अधीन अपराधों के अभियोजन का वर्जन-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार अथवा उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा ।
41. कतिपय अपराधों का शमन-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का (चाहे वह किसी व्यष्टि द्वारा किया गया हो या किसी संगम या उसके किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा), जो केवल कारावास से दंडनीय अपराध नहीं है, कोई अभियोजन संस्थित किए जाने से पहले, ऐसे अधिकारियों या प्राधिकारियों द्वारा और ऐसी धनराशि के लिए, जो केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, शमन किया जा सकेगा ।
(2) उपधारा (1) की कोई बात, किसी व्यष्टि या संगम या उसके अधिकारी या अन्य कर्मचारी द्वारा उस तारीख से तीन वर्ष की अवधि के भीतर किए गए किसी अपराध को लागू नहीं होगी, जिसको उसके या उनके द्वारा किए गए समान अपराध का इस धारा के अधीन शमन किया गया था ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उस तारीख से, जिसको कोई अपराध पूर्व में शमनित किया गया था, तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् किया गया कोई दूसरा या पश्चात्वर्ती अपराध, प्रथम अपराध समझा जाएगा ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक अधिकारी या प्राधिकारी, केन्द्रीय सरकार के निदेश, नियंत्रण और अधीक्षण के अधीन रहते हुए, किसी अपराध का शमन करने की शक्तियों का प्रयोग करेगा ।
(4) किसी अपराध का शमन करने के लिए प्रत्येक आवेदन उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी या प्राधिकारी को ऐसे प्ररूप और रीति में, ऐसी फीस के साथ किया जाएगा, जो विहित की जाए ।
(5) जहां किसी अपराध का कोई अभियोजन संस्थित किए जाने से पूर्व शमन किया जाता है वहां ऐसे अपराधी के विरुद्ध, जिसके संबंध में अपराध का इस प्रकार शमन किया गया है, ऐसे अपराध के संबंध में कोई अभियोजन संस्थित नहीं किया जाएगा ।
(6) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक अधिकारी या प्राधिकारी, इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुपालन में व्यतिक्रम के किसी अपराध का शमन करने के किसी प्रस्ताव पर कार्रवाई करते समय, जिसके बारे में, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी के पास कोई विवरणी, लेखे या अन्य दस्तावेज फाइल या रजिस्टर करने या उसे परिदत्त करने या भेजने के लिए किसी व्यष्टि या संगम या उसके अधिकारी या अन्य कर्मचारी द्वारा अपेक्षा की जाती है, किसी व्यष्टि या संगम या उसके अधिकारी या अन्य कर्मचारी को, लिखित आदेश द्वारा, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, ऐसे समय के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी विवरणी, लेखे या अन्य दस्तावेज फाइल या रजिस्टर करने का निदेश दे सकेगा ।
अध्याय 9
प्रकीर्ण
42. जानकारी या दस्तावेज मांगने की शक्ति-धारा 23 में निर्दिष्ट कोई निरीक्षण अधिकारी जो, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत है, इस अधिनियम के किसी उपबंध के उल्लंघन के संबंध में किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति, संगठन या संगम द्वारा रखे गए किसी लेखे या अभिलेख के किसी निरीक्षण के अनुक्रम में-
(क) अपना यह समाधान करने के प्रयोजन के लिए कि क्या इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश के उपबंधों का उल्लंघन हुआ है, किसी व्यक्ति से कोई जानकारी मांग सकेगा;
(ख) किसी व्यक्ति से ऐसे निरीक्षण के लिए उपयोगी या सुसंगत किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने या परिदत्त करने की अपेक्षा सकेगा;
(ग) मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित किसी व्यक्ति की परीक्षा कर सकेगा ।
43. अधिनियम के अधीन मामलों का अन्वेषण-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अन्वेषण ऐसे प्राधिकारी द्वारा भी किया जा सकेगा, जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे और इस प्रकार विनिर्दिष्ट प्राधिकारी को वे सब शक्तियां प्राप्त होंगी, जो किसी संज्ञेय अपराध का अन्वेषण करते समय पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को प्राप्त होती हैं ।
44. विहित प्राधिकारी द्वारा केन्द्रीय सरकार को विवरणियों का दिया जाना-विहित प्राधिकारी केन्द्रीय सरकार को, ऐसे समय पर और प्ररूप में तथा ऐसी रीति से, ऐसी विवरणियां और विवरण देगा, जो विहित किए जाएं ।
45. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुई या हो सकने वाली किसी हानि या नुकसान के बारे में कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां केन्द्रीय सरकार या धारा 44 में निर्दिष्ट प्राधिकारी या उसके किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होंगी ।
46. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के संबंध में किसी अन्य प्राधिकारी या किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को ऐसे निदेश दे सकेगी, जो वह आवश्यक समझे ।
47. शक्तियों का प्रत्यायोजन-केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों और कृत्यों का, धारा 48 के अधीन नियम बनाने की शक्ति के सिवाय, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे प्राधिकारी द्वारा, जो विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रयोग किया जा सकेगा ।
48. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(क) उस वस्तु का मूल्य, जो धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ज) के उपखंड (i) के अधीन विनिर्दिष्ट की जाए;
(ख) वह प्राधिकारी, जिसे धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (त) के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाए;
(ग) धारा 4 के खंड (घ) के अधीन दान या उपहार स्वीकार करना या प्रतिधारित करना;
(घ) वह या वे आधार विनिर्दिष्ट करने वाले मार्गदर्शी सिद्धांत, जिन पर धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन किसी संगठन को राजनीतिक स्वरूप के संगठन के रूप में विनिर्दिष्ट किया जा सकेगा;
(ङ) ऐसे क्रियाकलाप या कारबार, जिनका यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे धारा 8 की उपधारा (1) के खंड (क) के परन्तुक के अधीन सट्टे के कारबार हैं;
(च) वह रीति, जिसमें धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन प्रशासनिक व्यय संगणित किए जा सकेंगे;
(छ) वह समय, जिसके भीतर और वह रीति, जिसमें किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के किसी वर्ग या किसी संगम से धारा 9 के खंड (ग) के अधीन प्राप्त विदेशी अभिदाय की रकम के बारे में संसूचना देने की अपेक्षा की जा सकेगी;
(ज) वह समय जिसके भीतर और वह रीति, जिसमें धारा 9 के खंड (ङ) के अधीन किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के किसी वर्ग से विदेशी आतिथ्य के बारे में संसूचना देने की अपेक्षा की जा सकेगी;
(झ) वह रीति, जिसमें धारा 10 के अधीन किसी व्यक्ति पर केन्द्रीय सरकार के आदेश की प्रति तामील की जाएगी;
(ञ) वह प्ररूप और वह रीति, जिसमें धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करने या पूर्व अनुज्ञा देने के लिए आवेदन दिया जा सकेगा;
(ट) धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन के साथ दी जाने वाली फीस;
(ठ) धारा 12 की उपधारा (3) के खंड (छ) के अधीन प्रमाणपत्र अनुदत्त करने या पूर्व अनुज्ञा देने के लिए निबंधन और शर्तें;
(ड) धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन विदेशी अभिदाय का उपयोग करने की रीति;
(ढ) वह प्राधिकारी, जिसमें धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन विदेशी अभिदाय निहित होगा;
(ण) वह अवधि, जिसके भीतर और वह रीति, जिसमें धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन विदेशी अभिदाय का प्रबंध किया जाएगा;
(त) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के नवीकरण के लिए आवेदन किया जाएगा;
(थ) धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन प्रमाणपत्र के नवीकरण के लिए आवेदन के साथ दी जाने वाली फीस;
(द) धारा 17 की उपधारा (2) के अधीन विदेशी विप्रेषण की विहित रकम, वह प्ररूप और रीति, जिसमें प्रत्येक बैंक या विदेशी मुद्रा में कारबार करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा प्राप्त विदेशी विप्रेषण की रिपोर्ट की जाएगी;
(ध) वह समय, जिसके भीतर और वह रीति, जिसमें वह व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है या पूर्व अनुज्ञा प्रदान की गई है, धारा 18 के अधीन संसूचना देगा;
(न) वह प्ररूप और वह रीति, जिसमें विदेशी अभिदाय का और उस रीति का, जिसमें धारा 19 के अधीन ऐसे अभिदाय का उपयोग किया गया है, लेखा रखा जाएगा;
(प) वह समय, जिसके भीतर और वह रीति, जिसमें कोई निर्वाचन अभ्यर्थी धारा 21 के अधीन संसूचना देगा;
(फ) धारा 22 के अधीन आस्ति के व्ययन में अनुसरित की जाने वाली रीति और प्रक्रिया;
(ब) वे सीमाएं, जिनके अधीन रहते हुए धारा 29 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन किसी अधिहरण को न्यायनिर्णीत किया जा सकेगा;
(भ) धारा 32 की उपधारा (5) के अधीन पुनरीक्षण के लिए प्रत्येक आवेदन के साथ दी जाने वाली फीस;
(म) धारा 41 की उपधारा (4) के अधीन किसी अपराध का शमन करने के लिए आवेदन करने का प्ररूप और रीति तथा उसके लिए फीस;
(य) वह प्ररूप और रीति, जिसमें और वह समय, जिसके भीतर, धारा 44 के अधीन विहित प्राधिकारी द्वारा विवरणियां और विवरण दिए जाने हैं;
(यक) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
49. आदेशों और नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-धारा 5 के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश और इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश या नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह आदेश या नियम नहीं किया या बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगा । किन्तु आदेश या नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभावी होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
50. कतिपय मामलों में छूट देने की शक्ति-यदि केन्दीय सरकार की यह राय हो कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह किसी व्यक्ति या किसी संगम या संगठन (जो राजनीतिक दल नहीं है), या किसी व्यष्टि को (जो निर्वाचन अभ्यर्थी नहीं है) इस अधिनियम के सभी उपबंधों या उनमें से किसी के प्रवर्तन से, आदेश द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, छूट दे सकेगी, और जितनी ही बार आवश्यक हो ऐसे आदेश को प्रतिसंहृत या परिवर्तित कर सकेगी ।
51. अधिनियम का कतिपय सरकारी संव्यवहारों को लागू न होना-इस अधिनियम की कोई बात, भारत सरकार और किसी विदेश या विदेशी राज्यक्षेत्र की सरकार के बीच हुए किसी संव्यवहार को लागू नहीं होगी ।
52. अन्य विधियों के लागू होने का वर्जित न होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।
53. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत होते हों:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
54. निरसन और व्यावृत्ति-(1) विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 1976 (1976 का 49) (जिसे इसमें इसके पश्चात् निरसित अधिनियम कहा गया है) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, -
(क) निरसित अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई बात या कार्रवाई, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी;
(ख) राजनीतिक स्वरूप का कोई संगठन, जो राजनीतिक दल नहीं है और जिसको निरसित अधिनियम की धारा 5 के अधीन पूर्व अनुज्ञा प्रदान की गई थी, इस अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (च) के अधीन राजनीतिक स्वरूप का संगठन, जो राजनीतिक दल नहीं है, तब तक बना रहेगा जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी अनुज्ञा वापस नहीं ले ली जाती है;
(ग) निरसित अधिनियम की धारा 9 के अधीन दी गई विदेशी आतिथ्य स्वीकार करने की अनुज्ञा, इस अधिनियम की धारा 6 के अधीन तब तक दी गई अनुज्ञा समझी जाएगी जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी अनुज्ञा वापस नहीं ले ली जाती है;
(घ) निरसित अधिनियम की धारा 10 के खंड (क) के अधीन किसी विदेशी अभिदाय को स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध कोई संगम, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम की धारा 9 के अधीन किसी विदेशी अभिदाय को स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध संगम समझा जाएगा;
(ङ) निरसित अधिनियम की धारा 10 के खंड (ख) के अधीन प्राप्त अनुज्ञा, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, तब तक अनुज्ञा समझी जाएगी जब तक ऐसी अनुज्ञा केन्द्रीय सरकार द्वारा वापस नहीं ले ली जाती है;
(च) निरसित अधिनियम की धारा 12 के अधीन जारी किया गया कोई आदेश इस अधिनियम की धारा 10 के अधीन जारी किया गया आदेश समझा जाएगा;
(छ) निरसित अधिनियम की धारा 31 के अधीन जारी किया गया किसी संगम या किसी व्यष्टि को छूट प्रदान करने वाला कोई आदेश इस अधिनियम की धारा 50 के अधीन आदेश तब तक माना जाएगा जब तक ऐसा आदेश परिवर्तित या प्रतिसंहृत नहीं कर दिया जाता है ।
(3) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, उस उपधारा में विशिष्ट विषयों के वर्णन को निरसन के प्रभाव के संबंध में, साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के साधारण प्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला या प्रभावित करने वाला नहीं ठहराया जाएगा ।
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