खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954
(1954 का अधिनियम संख्यांक 37)
[29 सितम्बर, 1954]
खाद्य के अपमिश्रण के निवारणार्थ
उपबन्ध बनाने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पांचवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 है ।
(2) इसका विस्तार *** सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
[(i) “अपद्रव्य” से कोई सामग्री अभिप्रेत है जिसके उपयोग अपमिश्रण के प्रयोजनों के लिए किया जाता है या किया जा सकता है;]
[(i क))] अपमिश्रितञ्ज्-कोई खाद्य पदार्थ अपमिश्रित समझा जाएगा-
(क) यदि किसी विक्रेता द्वारा विक्रीत वह पदार्थ ऐसे स्वरूप, तत्त्व या क्वालिटी का नहीं है जैसा क्रेता द्वारा मांगा गया है और उसके लिए हानिकर है अथवा ऐसे स्वरूप, तत्त्व या क्वालिटी का नहीं है जैसा होना वह तात्पर्यित या व्यपदिष्ट है;
(ख) यदि उस पदार्थ में कोई अन्य चीज है जो उसके स्वरूप, तत्त्व या क्वालिटी को हानिकर रूप से प्रभावित करती है अथवा यदि वह पदार्थ इस प्रकार प्रसंस्कृत है कि उसका हानिकर प्रभाव पड़ता है;
(ग) यदि उस पदार्थ के स्थान पर पूर्णतः या भागतः कोई घटिया या अपेक्षाकृत सस्ती चीज प्रतिस्थापित की गई है जिससे उसके स्वरूप, तत्त्व या क्वालिटी पर हानिकर प्रभाव पड़ता है;
(घ) यदि उस पदार्थ के किसी घटक को पूर्णतः या भागतः निकाल लिया गया है जिससे उसके स्वरूप, तत्त्व या क्वालिटी पर हानिकर प्रभाव पड़ता है;
(ङ) यदि उस पदार्थ को अस्वचछ परिस्थितियों में बनाया, पैदा किया या रखा गया है जिससे वह संदूषित या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो गया है;
(च) यदि वह पदार्थ पूर्णतः या भागतः गंदे, दूषित, *** सड़े गले या रुग्ण पशुजन्य या वनस्पतिजन्य तत्त्व से बना है या कीटग्रस्ट है या अन्यथा मानव उपयोग के अनुपयुक्त है;
(छ) यदि वह पदार्थ रुग्ण पशु से अभिप्राप्त हैः
(ज) यदि उस पदार्थ में कोई ऐसा विषैला या अन्य संघटक अन्तर्विष्ट है जो उसे स्वास्थ्य के लिए हानिकर बना देता है;
(झ) यदि उस पदार्थ का आधान पूर्णतः या भागतः किसी ऐसे विषैले या हानिकारक तत्त्व से बना है जो उसकी अन्तर्वस्तुओं को स्वास्थ्य के लिए हानिकर बना देता है;
[(ञ) यदि उस पदार्थ में उसके लिए विहित से भिन्न कोई रंजक द्रव्य विद्यमान है या यदि विहित रंजक द्रव्य की मात्रा जो उस पदार्थ में विद्यमान है, मान्य भिन्नता की विहित सीमा के अन्दर नहीं है;]
(ट) यदि उस पदार्थ में कोई ऐसी परिरक्षी हैं जो प्रतिषिद्ध है या अनुज्ञात परिरक्षी विहित सीमाओं से अधिक है;
[(ठ) यदि उस पदार्थ की क्वालिटी या शुद्धता विहित मान से कम है या उसके घटक इतने परिमाण में विद्यमान हैं जो मान्य भिन्नता की विहित सीमा के अन्दर नहीं है जिससे वह स्वास्थ्य के लिए हानिकर बन जाता है;]
(ड) यदि उस पदार्थ की क्वालिटी या शुद्धता विहित मान से कम है या उसके घटक इतने परिमाण में विद्यमान हैं जो मान्य भिन्नता की विहित सीमा के अन्दर नहीं है किन्तु जिससे वह स्वास्थ्य के लिए हानिकर नहीं बनाता है :
परन्तु जहां किसी ऐसे पदार्थ की जो प्राथमिक खाद्य है, क्वालिटी या शुद्धता, विहित मान से कम है या उसके घटक इतने परिमाण में विद्यमान हैं जो मान्य भिन्नता की विहित सीमा के अन्दर नहीं हैं और इन दोनों ही दशाओं में ऐसा केवल प्राकृतिक कारणों से होता है और मानवीय नियंत्रण के बाहर है तब ऐसे पदार्थ को इस उपखण्ड के अर्थ में अपमिश्रित नहीं समझा जाएगा ।
स्पष्टीकरण-(i) जहां दो या अधिक प्राथमिक खाद्य पदार्थ मिला दिए जाते हैं और उनसे बनने वाला खाद्य पदार्थ-
(क) ऐसे नाम से भंडार में रखा जाता है या उसका विक्रय या वितरण किया जाता है जिससे उसके संघटकों का द्योतक होता है, और
(ख) स्वास्थ्य के लिए हानिकर नहीं है,
वहां ऐसे बना हुआ पदार्थ इस खण्ड के अर्थ में अपमिश्रित नहीं समझा जाएगा;
(ii) “केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला” से धारा 4 के अधीन स्थापित या विनिर्दिष्ट कोई प्रयोगशाला या संस्थान अभिप्रेत है;
(iii) “समिति” से धारा 3 के अधीन गठित केन्द्रीय खाद्य मानक समिति अभिप्रेत है;
(iv) “केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक” से केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक के रूप में केन्द्रीय सरकार द्वारा, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है, और इस अधिनियम के अधीन निदेशक के सब या किन्हीं कृत्यों को करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा तत्समान रीति से नियुक्त कोई व्यक्ति इसके अन्तर्गत है :
[परन्तु इस खण्ड के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को निदेशक नियुक्त नहीं किया जाएगा जिसका किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण, आयात या विक्रय में किसी प्रकार का वित्तीय हित है;]
[(v) “खाद्य” से औषधि और जल से भिन्न ऐसा कोई पदार्थ अभिप्रेत है जो खाद्य या पेय के रूप में मानव उपभोग के लिए उपयोग में लाया जाता है और इसके अन्तर्गत-
(क) ऐसा काई पदार्थ है जो मानवखाद्य की रचना या निर्माण में सामान्यतः मिश्रित होता है या उपयोग में लाया जाता है,
(ख) कोई वासक या स्वादवर्धक द्रव्य है, और
(ग) कोई ऐसा अन्य पदार्थ है जिसे केन्द्रीय सरकार उसके उपयोग, स्वरूप, उसकी अन्तर्वस्तु या क्वालिटी का ध्यान रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए खाद्य घोषित करे ;]
[(vi) “खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारीञ्ज् से किसी राज्य में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा निदेशक या स्वास्थ्य प्रशासन का भारसाधक मुख्य अधिकारी अभिप्रेत है, चाहे वह किसी भी पदनाम से ज्ञात हो, और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा अधिकारी भी है जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे स्थानीय क्षेत्र के सम्बन्ध में जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, इस अधिनियम के अधीन खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारी की शक्तियों का प्रयोग और उसके कर्तव्यों का पालन करने के लिए सशक्त किया जाता है;]
(vii) “स्थानीय क्षेत्र” से कोई नगरीय या ग्राम्य क्षेत्र, अभिप्रेत है, जिसे [केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार] ने शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए स्थानीय क्षेत्र घोषित किया हो;
(viii) “स्थानीय प्राधिकारी” से-
(1) किसी ऐसे स्थानीय क्षेत्र की दशा में, जो-
(क) नगरपालिका है, नगरपालिका बोर्ड या नगरपालिका निगम अभिप्रेत है;
(ख) छावनी है, छावनी प्राधिकारी अभिप्रेत है;
(ग) अधिसूचित क्षेत्र है, अधिसूचित क्षेत्र समिति अभिप्रेत है;
(2) अन्य स्थानीय क्षेत्र की दशा में ऐसा प्राधिकारी अभिप्रेत है, जो 1[केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार] द्वारा इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाए;
[(viiiक) किसी स्थानीय क्षेत्र के संबंध में “स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी” से ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उस क्षेत्र में ऐसे पदनाम से जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए स्वास्थ्य प्रशासन का भारसाधक नियुक्त किया जाता है;
(viiiख) “विनिर्माण” के अन्तर्गत किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण की प्रासंगिक या आनुषंगिक कोई प्रक्रिया भी है;]
(ix) “मिथ्या छाप वाला” कोई खाद्य पदार्थ मिथ्या छाप वाला समझा जाएगा-
(क) यदि वह किसी अन्य खाद्य पदार्थ की, जिसके नाम से वह विक्रय किया जाता है, नकल है या उसके स्थान पर प्रतिस्थापित है या उससे इस प्रकार मिलता जुलता है कि धोखा हो जाए और उस पर उसका असली रूप उपदर्शित करने के लिए स्पष्ट और सहजदृश्य रूप से लेबल नहीं लगाया गया है;
(ख) यदि उसे मिथ्या रूप से किसी स्थान या देश की उपज कहा जाता है;
(ग) यदि वह ऐसे नाम से विक्रीत किया जाता है जो किसी अन्य खाद्य पदार्थ का है;
(घ) यदि वह इस प्रकार रंजित, वासित या विलेपित, चूर्णकृत या पालिशकृत है कि यह बात छिप जाती है कि वह खराब है अथवा यदि वह पदार्थ उससे अच्छा और अधिक मूल्य का प्रकट किया जाता है जैसा कि वह वास्तव में है;
(ङ) यदि लेबल पर या अन्यथा उसके बारे में मिथ्या दावे किए जाते हैं;
(च) यदि, ऐसे पैकेजों में विक्रय किए जाने पर जो विनिर्माता या उत्पादक के द्वारा या उसके कहने पर मोहरबन्द या तैयार किए गए हैं और जिनमें उसका नाम और पता है, इस अधिनियम के अधीन मान्य भिन्नताओं के अन्दर पैकेज की अन्तर्वस्तुओं को उसके बाहर सहजदृश्य और सही रूप से कथित नहीं किया जाता है;
(छ) यदि उसको अन्तर्विष्ट करने वाले पैकेज या उस पैकेज के लेबल में उसमें अन्तर्विष्ट संघटकों या तत्वों के बारे में कोई ऐसा कथन, डिजाइन या अभिलक्षण है जो किसी सारवान् विशिष्टि में मिथ्या या भुलावा देने वाली है; या यदि पैकेज अपनी अन्तर्वस्तुओं के बारे में अन्यथा धोखा देने वाला है;
(ज) यदि उसको अन्तर्विष्ट करने वाले पैकेज या उस पैकेज के लेबल में उस पदार्थ के विनिर्माता या उत्पादक के रूप में किसी कल्पित व्यक्ति या कम्पनी का नाम है;
(झ) यदि उसका विशेष आहार के रूप में उपयोग होना तात्पर्यित है या व्यपदिष्ट है तो सिवाय उस दशा के जिसमें उसके विटामिन, खनिज या अन्य आहार तत्त्वों के बारे में ऐसी जानकारी, जैसी विहित की जाए ऐसे उपयोगों के लिए उसके गुणों के बारे में उसके क्रेता को पर्याप्त रूप से सूचित करने के लिए उसके लेबल में दी गई है;
(ञ) यदि उसमें कोई कृत्रिम वासक/कृत्रिम रंजक या रासायनिक परिरक्षी उस तथ्य का कथन करने वाले घोषणात्मक लेबल के बिना या इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं के उल्लंघन में अन्तर्विष्ट है;
(ट) यदि उस पर इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं के अनुसार लेबल नहीं लगाया गया है;
(x) “पैकेज” से ऐसा बक्स, बोतल, संदूकची, टिन, बैरल, डिब्बा, पात्र, बोरी, थैला, रैपर या कोई अन्य चीज अभिप्रेत है जिसमें खाद्य पदार्थ रखा या पैक किया जाता है;
(xi) “परिसर” के अन्तर्गत कोई ऐसी दुकान, स्टाल या स्थान है, जहां कोई खाद्य पदार्थ विक्रीत किया जाता है या विक्रय के लिए विनिर्मित किया जाता है या भंडार में रखा जाता है;
(xii) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
[(xiiक) “प्राथमिक खाद्य” से ऐसा कोई खाद्य पदार्थ अभिप्रेत है जो प्राकृतिक रूप में कृषि या बागवानी की उपज है;]
(xiii) अपने व्याकरिणक रूपों और सजातीय पदों सहित “विक्रय” से मानव उपभोग या उपयोग के लिए या विश्लेषण के लिए किसी खाद्य पदार्थ का विक्रय अभिप्रेत है चाहे वह नकद या उधार पर हो या विनिमय के रूप में हो, या थोक में या फुटकर में हो, और किसी ऐसे पदार्थ के विक्रय के लिए करार करना या विक्रय के लिए प्रस्थापना करना या उसे विक्रय के लिए अभिदर्शित करना या विक्रय के लिए कब्जे में रखना इसके अन्तर्गत है और किसी ऐसे पदार्थ को विक्रीत करने का प्रयत्न भी इसके अन्तर्गत आता है;
(xiv) “नमूने” से किसी खाद्य पदार्थ का नमूना अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबंधों के अधीन लिया गया है;
(xv) “अस्वास्थ्यकर” और हानिकरञ्ज् शब्दों से जब वे किसी खाद्य पदार्थ के संबंध में प्रयुक्त हों क्रमशः अभिप्रेत है कि वह पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अपहानिकर या मानव उपयोग के विरुद्ध है ।
[2क. अर्थान्वयन का नियम-इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त न हो निर्देश का उस राज्य के संबंध में यह अर्थ किया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है ।
केन्द्रीय खाद्य मानक समिति और केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला
3. केन्द्रीय खाद्य मानक समिति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, इस अधिनियम के प्रशासन से पैदा होने वाले मामलों पर केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को सलाह देने के लिए और इस अधिनियम के अधीन उसे सौंपे गए अन्य कृत्यों को करने के लिए केन्द्रीय खाद्य मानक समिति कहलाई जाने वाली एक समिति बनाएगी ।
(2) समिति निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) स्वास्थ्य-सेवा-महानिदेशक, पदेन, अध्यक्ष होगा;
[(ख) केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक या उस दशा में जब एक से अधिक केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला स्थापित की जाती हैं, ऐसी प्रयोगशालाओं के निदेशक, पदेन;]
(ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट दो विशेषज्ञ;
[(घ) केन्द्रीय खाद्य और कृषि मंत्रालय के खाद्य और कृषि विभागों में से प्रत्येक का एक प्रतिनिधि और केन्द्रीय वाणिज्य, रक्षा, उद्योग और पूर्ति तथा रेल मंत्रालय में से प्रत्येक का एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट होगा;]
(ङ) प्रत्येक राज्य की सरकार *** द्वारा नामनिर्दिष्ट एक-एक प्रतिनिधि;
(च) [संघ राज्यक्षेत्रों] का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट दो प्रतिनिधि;
[(छ) कृषि, वाणिज्य और उद्योग में से प्रत्येक के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट एक-एक प्रतिनधि;
(छछ) उपभोक्ताओं के हितों का प्रतिनधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट पांच प्रनिनिधि जिनमें एक होटल उद्योग से होगा;]
(ज) भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट चिकित्सा वृत्ति का एक प्रतिनिधि;
[(झ) भारतीय मानक संस्थान (प्रमाणीकरण चिह्न) अधिनियम, 1952 (1952 का 36) की धारा 2 के खण्ड (ङ) में निर्दिष्ट भारतीय मानक संस्थान द्वारा नामनिर्दिष्ट एक प्रतिनिधि ।]
(3) समिति के उपधारा (2) के खंड (ग), (घ), (ङ), (च) [ (छ), (छछ), (ज) और (झ)] में निर्दिष्ट सदस्य, जब तक कि उनके स्थान त्यागपत्र द्वारा, मृत्यु द्वारा या अन्यथा, पहले ही रिक्त न हो जाएं, तीन वर्ष के लिए पद धारण करने के हकदार होंगे और पुनर्नामनिर्देशन के लिए पात्र होंगे ।
(4) समिति में किसी रिक्तता के होते हुए भी उसके कृत्य किए जा सकेंगे ।
(5) समिति ऐसी और इतनी उपसमितियां नियुक्त कर सकेगी जैसी और जितनी वह ठीक समझती है और उनमें ऐसे व्यक्तियों को जो समिति के सदस्य नहीं हैं ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्त कर सकेगी जैसे उन्हें समिति द्वारा ऐसी शर्तों के अध्यधीन, यदि कोई हों, जैसी समिति अधिरोपित करे, प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(6) समिति अपनी प्रक्रिया के विनियमन के और अपने कामकाज के संव्यवहार के प्रयोजन के लिए उपविधियां, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के अध्यधीन रहते हुए, बना सकेगी ।
[3क. सचिव और अन्य कर्मचारिवृन्द की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार समिति का एक सचिव नियुक्त करेगी जो समिति के नियंत्रण और निदेश के अधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं या समिति द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(2) केन्द्रीय सरकार समिति के लिए इतने लिपिकीय और अन्य कर्मचारी देगी जितने वह सरकार आवश्यक समझे ।
4. केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला- [(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला या प्रयोगशालाएं उन कृत्यों का निष्पादन करने के लिए स्थापित कर सकेगी जो इस अधिनियम द्वारा या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों द्वारा केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला को सौंपे जाएं :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी प्रयोगशाला या संस्थान को भी इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।]
(2) केन्द्रीय सरकार समिति से परामर्श करके, निम्नलिखित को विहित करने वाले नियम बना सकेगी,-
[(क) केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला के कृत्य और वह स्थानीय क्षेत्र या वे स्थानीय क्षेत्र जिनके अन्दर ऐसे कृत्यों का निष्पादन किया जा सकेगा;]
(ख) विश्लेषण या परख के लिए उक्त प्रयोगशाला को खाद्य पदार्थों के नमूने दिए जाने की प्रक्रिया उन पर प्रयोगशाला की रिपोर्टों के प्ररूप और ऐसी रिपोर्टों के बारे में देय फीसें;
(ग) ऐसी अन्य बातें जो उक्त प्रयोगशाला को अपने कृत्यों को करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक या समीचीन हों ।
खाद्य के बारे में साधारण उपबन्ध
5. कतिपय खाद्य पदार्थों के आयात का प्रतिषेध-कोई व्यक्ति निम्नलिखित का भारत में आयात नहीं करेगा-
(i) कोई अपमिश्रित खाद्य;
(ii) कोई मिथ्या छाप वाला खाद्य;
(iii) कोई खाद्य पदार्थ जिसके आयात के लिए अनुज्ञप्ति विहित की गई हो, इसकी अनुज्ञप्ति की शर्तों के अनुसरण से अन्यथा; और
(iv) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के उल्लंघन में कोई खाद्य पदार्थ ।
6. सागर सीमाशुल्क और सीमाशुल्क अधिकारियों की शक्तियों से सम्बद्ध विधि का लागू होना-(1) सागर सीमाशुल्कों से और ऐसे मालों से, जिनका आयात सागर सीमाशुल्क अधिनियम, 1878 (1878 का 8) की धारा 18 द्वारा प्रतिषिद्ध है, सम्बद्ध तत्समय प्रवृत्त विधि, इस अधिनियम की धारा 16 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए उन खाद्य पदार्थों के बारे में लागू होगी जिनका आयात इस अधिनियम की धारा 5 के अधीन प्रतिषिद्ध किया गया है और सीमाशुल्क अधिकारियों और ऐसे अधिकारियों की, जो तद्द्वारा [सीमाशुल्क आयुक्त] और अन्य सीमाशुल्क अधिकारियों पर अधिरोपित कर्तव्यों के पालन के लिए उस अधिनियम के अधीन सशक्त है, शक्तियां ऐसे खाद्य पदार्थों के बारे में वे ही होंगी, जो कि उनकी पूर्वोक्त जैसे माल के बारे में तत्समय हैं ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना [सीमाशुल्क आयुक्त] या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत सरकार का कोई अधिकारी किसी ऐसे आयात पैकेज को निरुद्ध कर सकेगा जिसके बारे में उसे संदेह है कि उसके भीतर कोई ऐसा खाद्य पदार्थ अन्तर्विष्ट है, जिसका आयात इस अधिनियम की धारा 5 के अधीन प्रतिषिद्ध है और ऐसे निरोध की रिपोर्ट केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक से तत्काल करेगा और यदि उसके द्वारा अपेक्षित किया जाए तो उस पैकेज को या उसमें पाए गए किसी सन्देहजनक खाद्य पदार्थ के नमूने को उक्त प्रयोगशाला को भेजेगा ।
7. कतिपय खाद्य पदार्थों के विनिर्माण, विक्रय आदि का प्रतिषेध-कोई व्यक्ति स्वयं या अपने निमित्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित का विक्रयार्थ विनिर्माण, या भंडारकरण, विक्रय या वितरण नहीं करेगा-
(i) कोई अपमिश्रित खाद्य;
(ii) कोई मिथ्या छाप वाला खाद्य;
(iii) कोई खाद्य पदार्थ जिसके विक्रय के लिए अनुज्ञप्ति विहित की गई है, उस अनुज्ञप्ति की शर्तों के अनुसार से अन्यथा;
(iv) कोई खाद्य पदार्थ जिसका तत्समय विक्रय [सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित मेंट खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारी द्वारा प्रतिषिद्ध किया गया है;] ***
(v) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के उल्लंघन में, कोई खाद्य पदार्थ; [या]
4[(vi) कोई अपद्रव्य ।
[स्पष्टीकरण-यदि कोई व्यक्ति किसी अपमिश्रित खाद्य या मिथ्या छाप वाले खाद्य अथवा खण्ड (iii) या खण्ड (iv) या खण्ड (v) में निर्दिष्ट किसी खाद्य पदार्थ का, उससे विक्रयार्थ किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण के लिए, भंडारकरण करता है तो इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि उसने ऐसे खाद्य का भंडारकरण किया है ।]
खाद्य विश्लेषण
[8. लोक विश्लेषक-केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विहित अर्हताओं वाले ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझती है, ऐसे स्थानीय क्षेत्रों के लिए लोक विश्लेषक नियुक्त कर सकेगी जैसे उन्हें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा सौंपे जाएं :
परन्तु इस धारा के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को लोक विश्लेषक नियुक्त नहीं किया जाएगा जिसका किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण, आयात या विक्रय में कोई वित्तीय हित है :
[परन्तु यह और कि विभिन्न खाद्य पदार्थों के लिए विभिन्न लोक विश्लेषक नियुक्त किए जा सकेंगे ।]
9. खाद्य निरीक्षक-(1) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विहित अर्हताओं वाले ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझती है, ऐसे स्थानीय क्षेत्रों के लिए खाद्य निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी जैसे उन्हें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा सौंपे जाएं :
परन्तु इस धारा के अधीन किसी भी ऐसे व्यक्ति को खाद्य निरीक्षक नियुक्त नहीं किया जाएगा जिसका किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण, आयात या विक्रय में कोई वित्तीय हित है ।
(2) प्रत्येक खाद्य निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा और ऐसे प्राधिकारी का शासकीय रूप से अधीनस्थ होगा जिसे उसे नियुक्त करने वाली सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।]
10. खाद्य निरीक्षकों की शक्तियां-(1) खाद्य निरीक्षक की निम्नलिखित शक्तियां होंगी-
(क) निम्नलिखित से किसी खाद्य पदार्थ के नमूने लेना-
(i) ऐसे पदार्थ का विक्रय करने वाला कोई व्यक्ति;
(ii) ऐसा कोई व्यक्ति जो ऐसे पदार्थ को किसी क्रेता या परेषिती के पास पहुंचाने, उसे परिदान करने या परिदान के लिए तैयार करने में लगा है;
(iii) कोई परेषिती जबकि कोई ऐसा पदार्थ उसे परिदत्त हो गया हो; और
(ख) ऐसे नमूने को उस स्थानीय क्षेत्र के, जिसके अन्दर ऐसा नमूना लिया गया है, लोक विश्लेषक के पास विश्लेषणार्थ भेजना;
[(ग) सम्बन्धित स्थानीय क्षेत्र में अधिकारिता रखने वाले स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी के पूर्व अनुमोदन से या खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारी के पूर्व अनुमोदन से, सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में, किसी खाद्य पदार्थ का विक्रय प्रतिषिद्ध करना ।
[स्पष्टीकरण-जो व्यक्ति किसी खाद्य पदार्थ को अपने ही उपभोग के लिए क्रय करता है या प्राप्त करता है, वह खण्ड (क) के उपखंड (iii) के प्रयोजनों के लिए परेषितीञ्ज् के अन्तर्गत नहीं है ।]
[(2) कोई खाद्य निरीक्षक ऐसे किसी स्थान में जहां कोई खाद्य पदार्थ विनिर्मित किया जाता है या विक्रय के लिए भंडार में रखा जाता है अथवा विक्रय के लिए किसी अन्य खाद्य पदार्थ के विनिर्माण के लिए भंडार में रखा जाता है अथवा विक्रय के लिए अभिदर्शित या प्रदर्शित किया जाता है अथवा जहां कोई अपद्रव्य विनिर्मित किया जाता है या रखा जाता है, प्रवेश कर सकेगा, और उसका निरीक्षण कर सकेगा तथा ऐसे खाद्य पदार्थ या अपद्रव्य के नमूने विश्लेषण के लिए ले सकेगा :
परन्तु यदि कोई खाद्य पदार्थ, जो प्राथमिक खाद्य पदार्थ है, ऐसे खाद्य के रूप में विक्रय के लिए आशयित नहीं है तो इस उपधारा के अधीन उसका कोई नमूना नहीं लिया जाएगा ।]
(3) जहां उपधारा (1) के खण्ड (क) या उपधारा (2) के अधीन कोई नमूना लिया गया है, वहां उस दर पर, जिस पर वह पदार्थ लोगों को प्रायः विक्रीत किया जाता है उसका परिकलित दाम उस व्यक्ति को दिया जाएगा जिससे वह लिया गया है ।
(4) यदि खाद्य के लिए आशयित कोई पदार्थ किसी खाद्य निरीक्षक को अपमिश्रित या मिथ्या छाप वाला प्रतीत हो, तो वह ऐसे पदार्थ को इसलिए अभिगृहीत कर सकेगा और ले जा सकेगा, या विक्रेता की सुरक्षित अभिरक्षा में रखा सकेगा कि उसके बारे में ऐसी कार्यवाही की जा सके जैसी इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित है, 2[और इनमें से प्रत्येक दशा में वह ऐसे पदार्थ का नमूना लेगा और उसे विश्लेषण के लिए लोक विश्लेषक को भेजेगा] :
[परन्तु जहां खाद्य निरीक्षक ऐसे पदार्थ को विक्रेता की सुरक्षित अभिरक्षा में रखता है वहां वह ऐसे पदार्थ के मूल्य के बराबर धनराशि के लिए एक या अधिक प्रतिभुओं सहित जैसा खाद्य निरीक्षक ठीक समझे एक बन्धपत्र देने के लिए विक्रेता से अपेक्षा कर सकेगा और विक्रेता तदनुसार बंधपत्र देगा ।]
2[(4क) जहां उपधारा (4) के अधीन अभिगृहीत किया गया कोई खाद्य पदार्थ विनश्वर प्रकृति का है और स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि ऐसे खाद्य पदार्थ का इतना क्षय हो गया है कि वह मानव उपभोग के उपयुक्त नहीं है वहां उक्त प्राधिकारी विक्रेता को लिखित सूचना देकर, उसे नष्ट करा सकेगा ।]
(5) इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्ति के अन्तर्गत ऐसे किसी पैकेज को, जिसमें कोई खाद्य पदार्थ अन्तर्विष्ट है, तोड़ कर खोलने या ऐसे किन्हीं परिसरों के द्वार को, जहां कोई खाद्य पदार्थ विक्रयार्थ रखा है, तोड़ कर खोल लेने की शक्ति भी है :
[परन्तु पैकेज या द्वार को तोड़ कर खोलने की शक्ति का प्रयोग तभी किया जाएगा जब, यथास्थिति, पैकज का स्वामी या उसका भारसाधक या परिसर का अधिभोगी कोई अन्य व्यक्ति, जो वहां उपस्थित है, पैकज या द्वार खोलने के लिए कहे जाने पर उसे खोलने से इन्कार करे और इन दोनों दशाओं में से किसी में भी ऐसा करने के कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् ही ऐसा किया जाएगा :ट
परन्तु यह और कि इस धारा के अधीन किसी स्थान में प्रवेश और इसके निरीक्षक की शक्तियों का प्रयोग करने में खाद्य निरीक्षण [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के उन उपबंधों का यावत्साध्य अनुसरण करेगा जो उस संहिता के अधीन निकाले गए तलाशी वारण्ट का निष्पादन करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा किसी स्थान की तलाशी या निरीक्षण से सम्बद्ध है ।
(6) [खाद्य निरीक्षण किसी अपद्रव्य का, जो किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माता या वितरक या व्यवहारी के कब्जे में या उस हैसियत में उसके अधिभोगाधीन किसी परिसर में पाया जाएट और जिसके कब्जे के बारे में वह खाद्य निरीक्षक को समाधानप्रद लेखा-जोखा देने में असमर्थ हो 7[तथा किन्हीं लेखाबहियों और अन्य दस्तावेजों का, जो उसके कब्जे या नियंत्रण में पाई जाएं और जो इस अधिनियम के अधीन किसी अन्वेषण या कार्यवाही के लिए उपयोगी या सुसंगत हों, अभिगृहीत कर सकेगाट और 7[ऐसे अपद्रव्य का एक नमूनाट विश्लेषण के लिए लोक विश्लेषक को भेजा जा सकेगा :
[परन्तु खाद्य निरीक्षक ऐसी लेखाबहियों या अन्य दस्तावजों का अभिग्रहण उस प्राधिकारी के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं करेगा जिसके वह शासकीय रूप से अधीनस्थ है ।]
(7) जहां खाद्य निरीक्षक उपधारा (1) के खण्ड (क), उपधारा (2), उपधारा (4) या उपधारा (6) के अधीन कोई कार्यवाही करता है, [वहां वह एक या अधिक व्यक्तियों को उस समय जब कार्यवाही की जानी है उपस्थित होने के लिए कहेगा और उसके या उनके हस्ताक्षर कराएगा ] ।
[(7क) जहां उपधारा (6) के अधीन किन्हीं लेखाबहियों या अन्य दस्तावेजों का अभिग्रहण किया जाता है वहां खाद्य निरीक्षक, अभिग्रहण की तारीख के अधिक से अधिक तीस दिन की अवधि के अन्दर उन्हें उस व्यक्ति को, जिससे, उनका अभिग्रहण किया गया था, उस व्यक्ति द्वारा ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, प्रमाणित उनकी प्रतियां या उनके उद्धरण लेने के पश्चात् लौटा देगा :
परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति इस प्रकार प्रमाणित करने से इन्कार करता है और उसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन अभियोजन चलाया जाता है वहां ऐसी लेखाबहियां या अन्य दस्तावेजें उसको तभी लौटाई जाएंगी जब न्यायालय द्वारा प्रमाणित उनकी प्रतियां या उनके उद्धरण ले लिए गए हों ।
(7ख) जब किसी अपद्रव्य का अभिग्रहण उपधारा (6) के अधीन किया जाता है तब यह साबित करने का भार कि वह अपद्रव्य अपमिश्रण के प्रयोजनों के लिए आशयित नहीं है उस व्यक्ति पर होगा जिसके कब्जे से ऐसे अपद्रव्य का अभिग्रहण किया गया था ।]
(8) कोई खाद्य निरीक्षक उस व्यक्ति का, जिससे कोई नमूना लिया गया है, या खाद्य पदार्थ अभिगृहीत किया गया है, सही नाम और निवास-स्थान अभिनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 42 के अधीनट पुलिस अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा ।
(9) इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन शक्तियों का प्रयोग करने वाला कोई ऐसा खाद्य निरीक्षक जो-
(क) तंग करने के लिए और संदेह के किन्हीं युक्तियुक्त आधारों के बिना किसी खाद्य पदार्थ 3[या अपद्रव्य को अभिगृहीत करेगा; या]
(ख) किसी व्यक्ति को क्षतिकर कोई अन्य कार्य अपने पास यह विश्वास करने का कारण हुए बिना करेगा कि ऐसा कार्य उसके अपने कर्तव्य के निर्वहन के लिए आवश्यक है,
वह इस अधिनियम के अधीन अपराध का दोषी होगा और ऐसे अपराध के लिए 3[जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगाट दण्डनीय होगा ।
11. खाद्य निरीक्षकों द्वारा अनुसरणीय प्रक्रिया- [(1) जब कोई खाद्य निरीक्षक खाद्य का नमूना विश्लेषण के लिए है तब वह-
(क) उसका ऐसे विश्लेषण कराने के अपने आशय की लिखित सूचना उसी समय और वहीं उस व्यक्ति को जिससे उसने वह नमूना लिया है तथा उस व्यक्ति को, यदि कोई हो, जिसका नाम, पता और अन्य विशिष्टियां धारा 14क के अधीन प्रकट की गई हैं, देगा;
(ख) इस अधिनियम के अधीन नियमों द्वारा उपबंधित विशेष मामलों के सिवाय, नमूने के उसी समय और वहीं अलग-अलग तीन भाग कर लेगा और प्रत्येक भाग को ऐसी रीति से, जैसी उसकी प्रकृति के अनुकूल हो चिह्नित और मुहरबन्द करेगा या बांधेगा और उस व्यक्ति का जिससे वह नमूना लिया गया है हस्ताक्षर या उसके अंगूठे की छाप ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से लेगा जो विहित की जाए;
परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति हस्ताक्षर करने या अंगूठे की छाप लगाने से इन्कार करता है वहां खाद्य निरीक्षक एक या अधिक साक्षियों को बुलाएगा और ऐसे व्यक्ति के हस्ताक्षर या अंगूठे की छाप के बदले उसके या उनके, यथास्थिति, हस्ताक्षर या अंगूठे की छाप लेगा :
(ग) (i) एक भाग को, स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को सूचना देते हुए, विश्लेषण के लिए लोक विश्लेषक को भेजेगा; और
(ii) शेष दो भागों को इस धारा की उपधारा (2) तथापि धारा 13 की उपधारा (2क) और (2ङ) के प्रयोजनों के लिए स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को भेजेगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के खण्ड (ग) के उपखण्ड (i) के अधीन लोक विश्लेषक को भेजे गए नमूने का भाग खो जाता है या खराब हो जाता है वहां लोक विश्लेषक या खाद्य निरीक्षक द्वारा अध्यपेक्षा की जाने पर स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी उक्त खण्ड (ग) के उपखंड (ii) के अधीन उसे भेजे गए नमूने के भागों में से एक भाग को विश्लेषण के लिए लोक विश्लेषक को भेजेगा ।
(3) जब धारा 10 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी खाद्य पदार्थ [या अपद्रव्य] का नमूना लिया जाए, [तब खाद्य निरीक्षक ठीक बाद के कार्य दिवस तक, यथास्थिति, उस खाद्य पदार्थ या अपद्रव्य का या दोनों का नमूना] नमूनाकरण के लिए विहित नियमों के अनुसार संबंधित स्थानीय क्षेत्र के लोक विश्लेषक को भेजेगा ।
[(4) धारा 10 की उपधारा (4) के अधीन अभिगृहीत कोई खाद्य पदार्थ, यदि वह उस धारा की उपधारा (4क) के अधीन नष्ट नहीं किया गया है तो और उस धारा की उपधारा (6) के अधीन अभिगृहीत कोई अपद्रव्य यथासंभव शीघ्रता से और हर हालत में लोक विश्लेषक की रिपोर्ट मिलने के पश्चात् सात दिन के अन्दर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा :]
परन्तु यह *** कि यदि उस व्यक्ति द्वारा, जिससे कोई खाद्य पदार्थ अभिगृहीत किया गया है मजिस्ट्रेट से इस निमित्त आवेदन किया गया है तो मजिस्ट्रेट खाद्य निरीक्षक को लिखित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे पदार्थ को इतने समय के अन्दर, जितना आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, उसके समक्ष पेश करे ।
[(5) यदि मजिस्ट्रेट को ऐसा साक्ष्य लेने पर, जैसा लेना वह आवश्यक समझे, यह प्रतीत होता है कि-
(क) उपधारा (4) के अधीन उसके समक्ष पेश किया गया खाद्य पदार्थ अपमिश्रित या मिथ्या छाप वाला है तो वह आदेश दे सकेगा कि-
(i) उसे, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी के पक्ष में समपहृत कर दिया जाए; या
(ii) उसे स्वामी के या उस व्यक्ति के जिससे वह अभिगृहीत किया गया था, खर्चे पर नष्ट कर दिया जाए जिससे मानव खाद्य के रूप में उसका उपयोग न हो सके; या
(iii) उसका इस प्रकार व्ययन किया जाए जिससे प्रवचंक नाम से उसको पुनः विक्रय के लिए अभिदर्शित न किया जा सके या उसका खाद्य के लिए उपयोग न हो सके; या
(iv) उसे उसके समुचित नाम से विक्रय किए जाने के लिए या जहां मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि वह खाद्य पदार्थ पुनः प्रसंस्करण के पश्चात् मानव उपभोग के लिए विहित मान के अनुरूप बनाए जा सकने के योग्य है वहां ऐसे अधिकारी के, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, पर्यवेक्षण के अधीन पुनः प्रसंस्करण के पश्चात् विक्रय किए जाने के लिए स्वामी को उसके द्वारा प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित किए जाने पर वापस कर दिया जाए;
(ख) धारा 10 की उपधारा (6) के अधीन अभिगृहीत और उसके समक्ष पेश किया गया अपद्रव्य प्रकटतः इस प्रकार का है कि उसका उपयोग अपमिश्रण के प्रयोजन के लिए किया जा सकता है और उसके कब्जे की बाबत, यथास्थिति विनिर्माता, वितरक या व्यवहारी समाधानप्रद लेखा-जोखा देने में असमर्थ है तो वह उसे, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी के पक्ष में सपमहृत करने का आदेश दे सकेगा ।]
(6) 2[यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि कोई ऐसा-
(क) खाद्य पदार्थ अपमिश्रित नहीं है, या
(ख) अपद्रव्य जिसका अपद्रव्य होना तात्पर्यित है, अपद्रव्य नहीं है,
तो वह व्यक्ति जिसके कब्जे से वह खाद्य पदार्थ या अपद्रव्य लिया गया थाट उसका प्रत्यावर्तन कराने के लिए हकदार होगा और जो वास्तविक हानि उसने उठाई है, उससे अधिक न होने वाला इतना प्रतिकर, जितना मजिस्ट्रेट उचित समझता है, ऐसी निधि में से जैसी राज्य सरकार इस निमित्त निर्दिष्ट करे, ऐसे व्यक्ति को दिलाना मजिस्ट्रेट के विवेकाधीन होगा ।
12. क्रेता द्वारा खाद्य का विश्लेषण कराया जा सकना-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के बारे में यह अभिधारित नहीं किया जाएगा कि वह किसी खाद्य पदार्थ के क्रेता को जो खाद्य निरीक्षक न हो [या मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम हो और चाहे क्रेता उस संगम का सदस्य हो या नहीं । ऐसी फीस देकर जैसी विहित की जाए, ऐसे पदार्थ का लोक विश्लेषण कराने और लोक विश्लेषक से उसके विश्लेषण की रिपोर्ट प्राप्त करने से रोकती है :
परन्तु तब जबकि ऐसा [क्रेता या मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम] ऐसे पदार्थ का इस प्रकार विश्लेषण कराने के अपने आशय की इत्तिला क्रय के समय विक्रेता को दे देता है :
परन्तु यह और कि धारा 11 की उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबन्ध खाद्य पदार्थ के ऐसे 1[क्रेता या मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम को जो ऐसे पदार्थ का इस प्रकार विश्लेषण कराने का आशय रखता है, यावत्साध्य ऐसे लागू होंगे जैसे वे ऐसे खाद्य निरीक्षक को लागू हैं जो खाद्य का नमूना विश्लेषणार्थ लेता है :
परन्तु यह और भी कि यदि लोक विश्लेषक की रिपोर्ट यह दर्शित करती है कि खाद्य पदार्थ अपमिश्रित है, तो 1[क्रेता या मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगमट इस धारा के अधीन अपने द्वारा दी गई फीसों का प्रतिदाय पाने का हकदार होगा ।
[स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 20 के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगमञ्ज् से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्वैच्छिक उपभोक्ता संगम अभिप्रेत है ।]
13. लोक विश्लेषक की रिपोर्ट- [(1) लोक विश्लेषक विश्लेषण के लिए उसे भेजे गए किसी खाद्य पदार्थ के विश्लेषण के परिणाम की रिपोर्ट, ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को देगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन विश्लेषण के परिणाम की इस आशय की रिपोर्ट मिलने पर कि खाद्य पदार्थ अपमिश्रित है, स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी उस व्यक्ति के जिससे खाद्य पदार्थ के नमूने लिए गए थे तथा उस व्यक्ति के, यदि कोई हो, जिसका नाम, पता और अन्य विशिष्टियां धारा 14क के अधीन प्रकट की गई हों, विरुद्ध अभियोजन चलाने के पश्चात्, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति को या व्यक्तियों को विश्लेषण के परिणाम की रिपोर्ट की एक प्रति ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को यह सूचित करते हुए भेजेगा कि वे दोनों या उनमें से कोई यदि चाहे तो रिपोर्ट की प्रति मिलने की तारीख से दस दिन की अवधि के अन्दर न्यायालय को यह आवेदन कर सकते हैं कि स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी द्वारा रखे गए खाद्य पदार्थ के नमूने का केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला से विश्लेषण कराया जाए ।
(2क) जब न्यायालय को उपधारा (2) के अधीन आवेदन किया जाता है तब न्यायालय स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी से अपेक्षा करेगा कि वह नमूने के उस भाग या उन भागों को जो उक्त प्राधिकारी द्वारा रखे गए हों, भेज दे तथा ऐसी अध्यपेक्षा की जाने पर उक्त प्राधिकारी उस अध्यपेक्षा के मिलने की तारीख से पांच दिन की अवधि के अन्दर न्यायालय को नमूने के भाग भेजा देगा ।
(2ख) उपधारा (2क) के अधीन स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी से नमूने के भाग या भागों के मिलने पर न्यायालय पहले यह अभिनिश्चित करेगा कि धारा 11 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) में यथा उपबन्धित चिह्न और मुहर या बंधन ज्यों के त्यों हैं और, यथास्थिति, हस्ताक्षर या अंगूठे की छाप को बिगाड़ा नहीं गया है और वह, यथास्थिति, नमूने के भाग या भागों में से एक भाग को अपनी मुहर लगाकर केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक को भेजेगा जो तब नमूने के भाग की प्राप्ति की तारीख से एक मास के अन्दर विहित प्ररूप में न्यायालय को एक प्रमाणपत्र भेजेगा जिसमें विश्लेषण का परिणाम विनिर्दिष्ट होगा ।
(2ग) जहां न्यायालय को नमूने के दो भाग भेजे गए हैं और न्यायालय द्वारा उपधारा (2ख) के अधीन केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक को नमूने का केवल एक ही भाग भेजा गया है वहां न्यायालय यथाशक्यशीघ्र शेष भाग को स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को वापस कर देगा और वह प्राधिकारी न्यायालय द्वारा केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक से प्रमाणपत्र प्राप्त किए जाने के पश्चात् उस भाग को नष्ट कर देगा :
परन्तु जहां न्यायालय द्वारा केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक को भेजा गया नमूने का भाग खो जाता है या खराब हो जाता है वहां न्यायालय स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी से अपेक्षा करेगा कि वह नमूने के भाग को, यदि कोई हो, जिसे उसने प्रतिधारित किया हो, न्यायालय को भेज दे और उसकी प्राप्ति पर न्यायालय उपधारा (2ख) में उपबंधित रीति से कार्यवाही करेगा ।
(2घ) न्यायालय अभियोजन के सम्बन्ध में उसके समक्ष लम्बित किन्हीं कार्यवाहियों को तब तक आगे जारी नहीं रखेगा जब तक केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक से विश्लेषण के परिणाम का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता ।
(2ङ) यदि खाद्य निरीक्षक की कोई रिपोर्ट है और उस पर विचार करने के पश्चात् या अन्यथा स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी की यह राय है कि उपधारा (1) के अधीन लोक विश्लेषक द्वारा दी गई रिपोर्ट गलत है तो उक्त प्राधिकारी नमूने के भागों में से, जो उसने रखे हों, एक भाग को विश्लेषण के लिए किसी अन्य लोक विश्लेषक को भेजेगा और यदि उस अन्य लोक विश्लेषक की उस नमूने के उस भाग के विश्लेषण के परिणाम की रिपोर्ट इस आशय की है कि वह खाद्य पदार्थ अपमिश्रित है तो उपधारा (2) से लेकर उपधारा (2घ) तक के उपबन्ध यावत्शक्य लागू होंगे ।]
(3) केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक द्वारा [उपधारा (2ख) के अधीन] दिया गया प्रमाणपत्र लोक विशेषक द्वारा उपधारा (1) के अधीन दी गई रिपोर्ट को अतिष्ठित कर देगा ।
(4) जहां केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक से [उपधारा (2ख) के अधीन] अभिप्राप्त प्रमाणपत्रइस अधिनियम या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 272 से लेकर 276 तक की धाराओं के अधीन किसी कार्यवाही में पेश किया जाता है, वहां विश्लेषणार्थ लिए गए खाद्य के नमूने के किसी भाग को ऐसी कार्यवाही में पेश करना आवश्यक नहीं होगा ।
(5) कोई दस्तावेज जो लोक विश्लेषक द्वारा हस्ताक्षरित रिपोर्ट तात्पर्यित है जब तक वह उपधारा (3) के अधीन अतिष्ठित न हो चुकी हो या कोई दस्तावेज जो केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र होनी तात्पर्यित है इस अधिनियम के अधीन या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 272 से लेकर 276 तक की धाराओं के अधीन किसी कार्यवाही में उन तथ्यों के साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त की जा सकेगी जो उसमें वर्णित हो :
[परन्तु धारा 16क उपधारा (1क) के परन्तुक में निर्दिष्ट किसी खाद्य पदार्थ के नमूने के भाग के विश्लेषण के सम्बन्ध में प्रमाणपत्र न होने वालीट कोई दस्तावेज, जो केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र होनी तात्पर्यित है, उसमें वर्णित तथ्यों का अन्तिम और निश्चायक साक्ष्य होगी ।]
[स्पष्टीकरण-इस धारा में और धारा 16 की उपधारा (1) के खण्ड (च) में केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक” के अन्तर्गत वह अधिकारी भी होगा जो इस धारा के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार से मान्यता प्राप्त किसी खाद्य प्रयोगशाला का उस समय भारसाधक है (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) ।]
प्रकीर्ण
[14. विनिर्माताओं, वितरकों और व्यवहारियों द्वारा वारण्टी दिया जाना-किसी खाद्य पदार्थ का कोई भी [विनिर्माता या वितरक या व्यवहारी] ऐसा पदार्थ किसी विक्रेता को तब तक विक्रय नहीं करेगा जब तक कि वह भी ऐसे पदार्थ की प्रकृति और क्वालिटी के बारे में विहित प्ररूप में लिखित वारण्टी विक्रेता को नहीं दे देता :
[परन्तु किसी खाद्य पदार्थ के विक्रय के सम्बन्ध में कोई बिल, कैश मेमो या बीजक, जो ऐसे पदार्थ के विनिर्माता या वितरक या व्यवहारी ने उसके विक्रेता को दिया हो, इस धारा के अधीन ऐसे विनिर्माता, वितरक या व्यवहारी द्वारा दी गई वारण्टी समझा आएगा ।]
स्पष्टीकरण-इस धारा में, धारा 19 की उपधारा (2) में और धारा 20क में वितरकञ्ज् शब्द के अन्तर्गत कमीशन अभिकर्ता भी होगा ।
14क. विक्रेता द्वारा उस व्यक्ति का नाम आदि प्रकट किया जाना जिससे खाद्य पदार्थ क्रय किया गया था-किसी खाद्य पदार्थ का प्रत्येक विक्रेता यदि उससे अपेक्षा की जाए, तो खाद्य निरीक्षक को उस व्यक्ति का नाम, पता और अन्य विशिष्टियां प्रकट करेगा जिससे उसने वह खाद्य पदार्थ क्रय किया ।]
15. खाद्य विषाक्तता की अधिसूचना- [केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार] शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे चिकित्सा व्यवसायियों से जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी स्थानीय क्षेत्र में अपनी वृत्ति कर रहे हों यह अपेक्षा कर सकेगी कि वे अपने संज्ञान में आने वाली खाद्य विषाक्तता की उन घटनाओं की रिपोर्ट ऐसे अधिकारी को दें जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
16. शास्तियां- [(1) उपधारा (1क) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि यदि कोई व्यक्ति-
(क) चाहे स्वयं या अपने निमित्त किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा किसी ऐसे खाद्य पदार्थ का-
(i) जो धारा 2 के खण्ड (त्क) के उपखण्ड (ड) के अर्थ में अपमिश्रित है या उस धारा के खण्ड (ix) के अर्थ में मिथ्या छाप वाला है अथवा जिसका विक्रय इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्धों के अधीन अथवा खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारी के आदेश से प्रतिषिद्ध है;
(ii) जो उपखण्ड (त्) में निर्दिष्ट खाद्य पदार्थ से भिन्न है, इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन करते हुए,
भारत में आयात करेगा या विक्रयार्थ विनिर्माण करेगा या भंडारकरण, विक्रय या वितरण करेगा; या
(ख) चाहे स्वयं या अपने निमित्त किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा किसी ऐसे अपद्रव्य का जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है भारत में आयात करेगा या विक्रयार्थ विनिर्माण करेगा या भण्डारकरण, विक्रय या वितरण करेगा; या
(ग) किसी खाद्य निरीक्षक को इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत रूप से नमूने लेने से रोकेगा; या
(घ) किसी खाद्य निरीक्षक को इस अधिनियम के द्वारा या अधीन उसे प्रदत्त किसी अन्य शक्ति का प्रयोग करने से रोकेगा; या
(ङ) किसी खाद्य पदार्थ का विनिर्माता होते हुए किसी अपद्रव्य की जो स्वास्थ्य के लिए हानिकर नहीं है, अपने कब्जे में या अपने अधिभोगाधीन किसी परिसर में रखेगा, या
(च) केन्द्रीय खाद्य प्रयोगशाला निदेशक द्वारा या किसी लोक विश्लेषक द्वारा की गई किसी परख या विश्लेषण की किसी रिपोर्ट या प्रमाणपत्र का अथवा उसके किसी उद्धरण का उपयोग किसी खाद्य पदार्थ के विज्ञापन के प्रयोजनों के लिए करेगा, या
(छ) चाहे स्वयं या अपने निमित्त किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा किसी ऐसे खाद्य पदार्थ के सम्बन्ध में, जो उसके द्वारा विक्रय किया गया हो, मिथ्या वारंटी विक्रेता को देगा,
तो वह उस किसी शास्ति के अतिरिक्त, जिससे वह धारा 6 के उपबन्धों के अधीन दण्डनीय हो, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम नहीं होगी किन्तु तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो एक हजार रुपए से कम नहीं होगा, दण्डनीय होगा :
परन्तु यह कि-
(i) यदि अपराध खण्ड (क) के उपखण्ड (त्) के अधीन है और ऐसे कारणों से, जो मानवीय नियंत्रण के बाहर हैं, अपमिश्रित ऐसे पदार्थ के सम्बन्ध में है, जो प्राथमिक खाद्य है या धारा 2 के खण्ड (ix) के उपखण्ड (ट) के अर्थ में मिथ्या छाप वाले खाद्य पदार्थ के सम्बन्ध में है; या
(ii) यदि अपराध खण्ड (क) के उपखण्ड (त्त्) के अधीन है, किन्तु धारा 23 की उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (छ) के अधीन अथवा धारा 24 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन बनाए गए किसी नियम के उल्लंघन के सम्बन्ध में अपराध नहीं है,
तो न्यायालय, किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों, से, जिनका निर्णय में उल्लेख किया जाएगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम न होगी किन्तु दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो पांच सौ रुपए से कम नहीं होगा, दण्डित कर सकेगा :
परन्तु यह और कि यदि अपराध खण्ड (क) के उपखण्ड (ii) के अधीन है तथा धारा 23 की उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (छ) के अधीन अथवा धारा 24 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन के संबंध में है तो न्यायालय, किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों के लिए जिनका निर्णय में उल्लेख किया जाएगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित कर सकेगा ।
[(1क) यदि कोई व्यक्ति चाहे स्वयं या अपने निमित्त किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा-
(i) किसी खाद्य पदार्थ का जो धारा 2 के खण्ड (iक) के उपखण्ड (ङ) से लेकर उपखण्ड (ठ) तक में से किसी के अर्थ में अपमिश्रित है; या
(ii) किसी अपद्रव्य का जो स्वास्थ्य के लिए हानिकर है,
भारत में आयात करेगा या विक्रयार्थ विनिर्माण करेगा या भंडारकरण, विक्रय या वितरण करेगा तो वह उस किसी शास्ति के अतिरिक्त, जिससे वह धारा 6 के उपबन्धों के अधीन दण्डनीय हो, कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम न होगी किन्तु छह वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो दो हजार रुपए से कम न होगा, दण्डनीय होगा :
परन्तु यदि ऐसे खाद्य पदार्थ या अपद्रव्य के किसी व्यक्ति द्वारा उपभोग किए जाने पर उसकी मृत्यु होना सम्भाव्य है या उसके शरीर को ऐसी हानि होना सम्भाव्य है जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 320 के अर्थ में घोर उपहति होगी तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम न होगी किन्तु आजीवन हो सकेगी और जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए से कम नहीं होगा, दण्डनीय होगा ।]
[(1कक)] यदि कोई व्यक्ति जिसकी सुरक्षित अभिरक्षा में कोई खाद्य पदार्थ धारा 10 की उपधारा (4) के अधीन रखा गया है ऐसे पदार्थ को बिगाड़ेगा या उसमें किसी अन्य रीति से हस्तक्षेप करेगा तो वह ऐसी अवधि के लिए कारावास से जो छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु जो दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो एक हजार रुपए से कम नहीं होगा, दण्डनीय होगा ।
[(1ख) यदि कोई व्यक्ति जिसकी सुरक्षित अभिरक्षा में कोई खाद्य पदार्थ धारा 10 की उपधारा (4) के अधीन रखा गया है ऐसे पदार्थ का विक्रय या वितरण करेगा जो उस मजिस्ट्रेट द्वारा जिसके समक्ष वह पेश किया जाता है धारा 2 के खण्ड (iक) के उपखण्ड (ज) के अर्थ में अपमिश्रित पाया जाता है और जिसके किसी व्यक्ति द्वारा उपभोग किए जाने पर उसकी मृत्यु होना सम्भाव्य है या उसके शरीर को ऐसी हानि होना सम्भाव्य है जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 320 के अर्थ में घोर उपहति होगी तो उपधारा (1कक) में किसी बात के होते हुए भी वह कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम न होगी किन्तु आजीवन हो सकेगी और जुर्माने से जो पांच हजार रुपए से कम न होगा, दण्डनीय होगा ।
(1ग) यदि कोई व्यक्ति धारा 14 या धारा 14क के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह ऐसी अवधि के लिए कारावास से जो छह मास तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो पांच सौ रुपए से कम नहीं होगा, दण्डनीय होगा ।
(1घ) यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से सिद्धदोष कोई व्यक्ति तत्पश्चात् वैसा ही अपराध करेगा जो उपधारा (2) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना वह न्यायालय, जिसके समक्ष द्वितीय या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि हो इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई अनुज्ञप्ति को, यदि कोई हो रद्द करने का आदेश दे सकता है और तब ऐसी अनुज्ञप्ति, इस अधिनियम में या इसके अधीन बनाए गए नियमों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी रद्द हो जाएगी ।
(2) यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से सिद्धदोष कोई व्यक्ति तत्पश्चात् वैसा ही अपराध करेगा तो उस न्यायालय के लिए जिसके समक्ष द्वितीय या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि हो यह विधिसम्मत होगा कि वह अपराधी के नाम और निवास-स्थान, अपराध और अधिरोपित शास्ति के अपराधी के व्यय पर ऐसे समाचारपत्रों में और ऐसी अन्य रीति से प्रकाशित कराए जैसी वह न्यायालय निदिष्ट करे । ऐसे प्रकाशन के व्यय दोषसिद्धि पर होने वाले खर्च का भाग समझे जाएंगे और उसी रीति से वसूल किए जा सकेंगे जैसे जुर्माना किया जाता है ।
[16क. न्यायालय की मामलों का संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन सभी अपराधों का संक्षेपतः विचारण प्रथम वर्ग के किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त किया गया हो अथवा किसी महानगर मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा और उक्त संहिता की धारा 262 से लेकर धारा 265 तक की धाराओं के उपबन्ध ऐसे विचारण को यावत्शक्य लागू होंगे :
परन्तु इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में दोषसिद्धि की दशा में मजिस्ट्रेट के लिए यह विधिसम्मत होगा कि वह इतनी अवधि के लिए जो एक वर्ष से अधिक की न हो, कारावास का दण्डादेश पारित करे :
परन्तु यह और कि यदि इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के प्रारंभ में या उसके दौरान मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि मामले की प्रकृति ऐसी है कि एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए कारावास का दण्डादेश पारित करना पड़े या किसी अन्य कारण से मामले का संक्षेपतः विचारण करना अवांछनीय है तो मजिस्ट्रेट पक्षकारों को सुनने के पश्चात् उस भाव का आदेश लेखबद्ध करेगा और तत्पश्चात् किसी भी साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी हो, पुनः बुलाएगा और मामले को उक्त संहिता द्वारा उपबन्धित रीति से सुनने या पुनः सुनने के लिए अग्रसर होगा ।]
[17. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां-
(क) (i) ऐसा व्यक्ति, यदि कोई है जो उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी होने के लिए उपधारा (2) के अधीन नामनिर्देशित किया गया है (जिसे इसमें इसके पश्चात् उत्तरदायी व्यक्ति कहा गया है), अथवा
(ii) जहां ऐसा कोई व्यक्ति नामनिर्देशित नहीं किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उस के उत्तरदायी था; तथा
(ख) वह कम्पनी,
अपराध की दोषी समझी जाएगी तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने की भागी होगी :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था और उसने ऐसे अपराध का किया जाना निवारित करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) कोई कम्पनी, लिखित आदेश द्वारा, अपने निदेशकों या प्रबन्धकों में से किसी को (जो प्रबन्धक मुख्यतया प्रबन्धकीय या पर्यवेक्षकीय हैसियत में नियोजित हो) ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसी सभी कार्यवाहियां करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का कम्पनी द्वारा किया जाना निवारित करने के लिए आवश्यक या समीचीन हों तथा स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए यह सूचना कि उसने ऐसे निदेशक या प्रबन्धक को उत्तरदायी व्यक्ति के रूप में नामनिर्देशित किया है, ऐसे निदेशक या प्रबन्धक की इस प्रकार नामनिर्देशित किए जाने के लिए लिखित सहमति के सहित दे सकेगी ।
स्पष्टीकरण-जब किसी कम्पनी के विभिन्न स्थापन या शाखाएं अथवा किसी स्थापन या शाखा में विभिन्न यूनिटें हों तब विभिन्न स्थापनों या शाखाओं या यूनिटों के लिए विभिन्न व्यक्ति इस उपधारा के अधीन नामनिर्देशित किए जा सकेंगे और किसी स्थापन, शाखा या यूनिट के सम्बन्ध में नामनिर्देशित व्यक्ति को ऐसे स्थापन, शाखा या यूनिट के सम्बन्ध में उत्तरदायी व्यक्ति समझा जाएगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन नामनिर्देशित व्यक्ति, जब तक-
(i) स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को ऐसा नामनिर्देशित रद्द करने की अतिरिक्त सूचना कम्पनी से नहीं मिल जाती है, अथवा
(ii) उस कम्पनी के, यथास्थिति, निदेशक या प्रबन्धक के पद पर उसका बना रहना समाप्त नहीं हो जाता है अथवा
(iii) वह कम्पनी को सूचित करते हुए स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी से लिखित रूप में यह निवेदन नहीं करता है कि उसका नामनिर्देशन रद्द कर दिया जाए [जिस निवेदन को स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी द्वारा स्वीकार किया जाएगा],
इसमें जो भी सब से पहले हो, तब तक उत्तरदायी व्यक्ति बना रहेगा :
परन्तु जब ऐसे व्यक्ति का उस कम्पनी के, यथास्थिति, निदेशक या प्रबंधक के पद पर बना रहना समाप्त हो जाता है तब वह ऐसी समाप्ति की सूचना स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को देगा :
परन्तु यह और कि जब ऐसा व्यक्ति खण्ड (iii) के अधीन निवेदन करता है तब स्थानीय (स्वास्थ्य) अधिकारी ऐसे नामनिर्देशन को उस तारीख से, जिसमें निवेदन किया जाता है, पहले की किसी तारीख से रद्द नहीं करेगा ।
(4) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की [जो उपधारा (2) के अधीन नामनिर्देशित व्यक्ति नहीं है] सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) “कम्पनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है;
(ख) फर्म के सम्बन्ध में “निदेशक” से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है; और
(ग) होटल उद्योग में लगी हुई किसी कम्पनी के सम्बन्ध में, “प्रबन्धक” के अन्तर्गत उसके द्वारा चलाए जाने वाले या उसके प्रबंधाधीन किसी होटल के खानपान विभाग का भारसाधक व्यक्ति भी है ।
18. सम्पत्ति का समपहरण-जहां कोई व्यक्ति इस अधिनियम या इसके अधीन किसी नियम के किन्हीं भी उपबन्धों के उल्लंघन के लिए इस अधिनियम के अधीन सिद्धदोष किया गया है, वहां वह खाद्य पदार्थ जिसके बारे में वह उल्लंघन किया गया है, सरकार को समपहृत कर दिया जाएगा :
[परन्तु जहां न्यायालय का समाधान हो जाता है कि वह खाद्य पदार्थ पुनः प्रसंस्करण के पश्चात् मानव उपभोग के लिए विहित मान के अनुरूप बनाए जा सकने योग्य है, तो न्यायालय आदेश दे सकेगा कि वह खाद्य पदार्थ ऐसे अधिकारी के जो उसमें विनिर्दिष्ट हो पर्यवेक्षण से पुनः प्रसंस्करण के पश्चात् उस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन विक्रय किए जाने के लिए स्वामी को उसके द्वारा प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करने पर वापस कर दिया जाए ।]
19. इस अधिनियम के अधीन अभियोजनों में अनुज्ञात किए जा सकने या न किए जा सकने वाले प्रतिवाद-(1) किसी अपमिश्रित या मिथ्या छाप वाले खाद्य पदार्थ के विक्रय से संबंधित किसी अपराध के अभियोजन में केवल यह अभिकथन प्रतिवाद न होगा कि विक्रेता अपने द्वारा विक्रीत खाद्य की प्रकृति, तत्व या क्वालिटी से अनभिज्ञ था या किसी पदार्थ के विश्लेषण के लिए क्रेता द्वारा क्रय किए जाने से वह विक्रय द्वारा प्रतिकूल प्रभावित नहीं हुआ ।
[(2) कोई विक्रेता किसी अपमिश्रित या मिथ्या छाप वाले खाद्य पदार्थ के विक्रय से सम्बद्ध अपराध करने वाला नहीं समझा जाएगा यदि यह साबित कर दे कि-
(क) उसने उस खाद्य पदार्थ का क्रय-
(i) उस दशा में जिसमें उसके विक्रय के लिए अनुज्ञप्ति विहित है, किसी सम्यक्तःः अनुज्ञप्त विनिर्माता वितरक या व्यवहारी से,
(ii) किसी अन्य दशा में किसी विनिर्माता, वितरक या व्यवहारी से,
विहित प्ररूप में लिखित वारंटी सहित किया है, और
(ख) जब खाद्य पदार्थ उसके पास था तब वह उचित रूप से भंडार में रखा था और उसने उसे उसी अवस्था में विक्रय किया जिसमें उसे उसने क्रय किया ।]
(3) कोई व्यक्ति जिसके द्वारा ऐसी वारंटी जैसी [धारा 14 में] निर्दिष्ट है दी गई अभिकथित है सुनवाई पर उपस्थित होने और साक्ष्य देने का हकदार होगा ।
20. अपराधों का संज्ञान और विचारण-(1) [इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए जो धारा 14 या धारा 14क के अधीन अपराध नहीं है] कोई भी अभियोजन, [केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार *** अथवा इस निमित्त साधारण या विशेष आदेश द्वारा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार 4*** द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वाराट या उसकी लिखित सम्मति से संस्थित किए जाने के सिवाय संस्थित नहीं किया जाएगा :
परन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन, धारा 12 में निर्दिष्ट क्रेता [या मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संगम] द्वारा संस्थित किया जा सकेगा यदि वह परिवाद के साथ लोक विश्लेषक की रिपोर्ट की एक प्रति न्यायालय में पेश करता है ।
[(2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी धारा 16 की उपधारा (1कक) के अधीन दण्डनीय कोई अपराध संज्ञेय और अजमानतीय होगा ।]
[20क. विनिर्माता आदि को अभियोजित करने की न्यायालय की शक्ति-जहां इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के, जिसका ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना अभिकथित है जो किसी खाद्य पदार्थ का विनिर्माता, वितरक या व्यवहारी नहीं है विचारण के दौरान किसी समय न्यायालय का अपने समक्ष पेश किए गए साक्ष्य पर समाधान हो जाता है कि ऐसा विनिर्माता, वितरक या व्यवहारी भी उस अपराध से संबंधित है वहां न्यायालय [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 319 की उपधारा (3) में या धारा 20 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उसके विरुद्ध ऐसी कार्यवाही चला सकेगा मानो उसके विरुद्ध धारा 20 के अधीन अभियोजन संस्थित किया गया हो ।]
[20कक. अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 तथा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 360 का लागू होना-अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) अथवा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 360 में अन्तर्विष्ट कोई बात इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किए गए व्यक्ति को तभी लागू होगी जब वह व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है अन्यथा नहीं ।]
[21. मजिस्ट्रेट की वर्धित शास्तियां अधिरोपित करने की शक्ति-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 29 में किसी बात के होते हुए भी किसी महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए यह विधि सम्मत होगा कि वह आजीवन कारावास या छह वर्ष से अधिक की अवधि के लिए कारावास के दण्डादेश के सिवाय, इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई भी दण्डादेश पारित करे जो उक्त धारा के अधीन उसकी शक्तियों से अधिक हो ।]
22. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने लिए आशयित किसी भी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
[22क. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के सब उपबन्धों या उनमें से किसी का निष्पादन करने के बारे में किसी राज्य सरकार को ऐसे निदेश दे सकेगी जैसे वह आवश्यक समझे और वह राज्य सरकार ऐसे निदेशों का अनुपालन करेगी ।]
23. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति- [(1) केन्द्रीय सरकार, समिति से परामर्श करके और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा पूर्व प्रकाशन के पश्चात् इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी :
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं जिनमें यह आवश्यक हो गया है कि ऐसे परामर्श के बिना नियम बनाए जाएं तो समिति से परामर्श करना आवश्यक नहीं होगा किन्तु ऐसी दशा में नियमों के बनाए जाने के छह मास के अन्दर समिति से परामर्श किया जाएगा और केन्द्रीय सरकार ऐसे सुझावों पर विचार करेगी जो समिति उक्त नियमों के संशोधन के बारे में दे ।
[(1क)] [विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-]
(क) उन खाद्य पदार्थों या खाद्य वर्गों को विनिर्दिष्ट करना जिनके आयात के लिए अनुज्ञप्ति अपेक्षित है और ऐसी अनुज्ञप्ति के प्ररूप और शर्तें, उसे देने के लिए सशक्त प्राधिकारी, [उसके लिए संदेय फीस, अनुज्ञप्ति की शर्तों के पालन के लिए प्रतिभूति के रूप में किसी राशि का निक्षेप और वे परिस्थितियां जिनके अधीन ऐसी अनुज्ञप्ति या प्रतिभूति रद्द या समपहृत की जा सकेगी, विहित करना];
(ख) किसी खाद्य पदार्थ के लिए क्वालिटी के मानक परिनिश्चित करना और उसके सम्बन्ध में अनुज्ञेय मान्य भिन्नता की सीमाएं नियत करना;
(ग) किसी खाद्य पदार्थ या खाद्य पदार्थों के वर्ग के, जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, उत्पादन, वितरण और विक्रय पर कठोर नियन्त्रण अधिरोपित करने के लिए विशेष उपबन्ध अधिकथित करना जिसके अन्तर्गत उन परिसरों का जहां वे विनिर्मित किए जाते हैं रजिस्ट्रीकरण, परिसरों को स्वच्छ दशा में रखना और ऐसे पदार्थ या ऐसे वर्ग के पदार्थों के उत्पादन, वितरण और विक्रय से सहयोजित मनुष्यों को स्वच्छ बनाए रखना भी है;
(घ) किसी खाद्य पदार्थ को पैक करने और उस पर लेबल लगाने तथा ऐसे किसी पैकेज या लेबल के डिजाइन को निर्बन्धित करना जिससे उस पदार्थ के स्वरूप, क्वालिटी या परिमाण के बारे में जनता या क्रेता के धोखे या भुलावे में पड़ने का [या अपमिश्रण का निवारण] हो जाए;
(ङ) खाद्य निरीक्षकों और लोक विश्लेषकों की अर्हताओं, शक्तियों और कर्तव्यों को परिनिश्चित करना;
4[(ङङ) उन प्रयोगशालाओं को परिनिश्चित करना जिनमें इस अधिनियम के अधीन लोक विश्लेषकों द्वारा खाद्य पदार्थों या अपद्रव्यों का विश्लेषण किया जा सकेगा;]
(च) किसी ऐसी चीज के, जो खाद्य के रूप में प्रयुक्त किए जाने पर स्वास्थ्य के लिए हानिकर हो, विक्रय को प्रतिषिद्ध करना या विक्रय की शर्तों को परिनिश्चित करना अथवा किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण में संघटक के रूप में उसके प्रयोग को किसी रीति से निर्बन्धित करना या किसी खाद्य पदार्थ के विनिर्माण या विक्रय की अनुज्ञप्तियां जारी करके विनियमित करना;
(छ) सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में, किसी खाद्य पदार्थ के विक्रय की शर्तों को या विक्रयार्थ अनुज्ञप्ति के लिए शर्तों को परिनिश्चित करना;
(ज) वह रीति विनिर्दिष्ट करना जिसमें विश्लेषण के लिए विक्रीत खाद्यों के नमूनों के आधानों को मुहरबन्द किया या बांधा जाएगा;
4[(जज) विश्लेषण की पद्धतियों को परिनिश्चित करना;]
(झ) साधारण नमक और चीनी से भिन्न उन अनुज्ञेय परिरक्षियों की, जो केवल परिरक्षित फलों, सब्जियों या उनके उत्पादों अथवा किसी अन्य खाद्य पदार्थ में प्रयुक्त किए जाएंगे, सूची तथा प्रत्येक परिरक्षी का अधिकतम परिमाण, विनिर्दिष्ट करना;
(ञ) वह रंजक द्रव्य और उसकी अधिकतम मात्राएं विनिर्दिष्ट करना जिसका प्रयोग किसी खाद्य पदार्थ में किया जा सकेगा;
(ट) किसी खाद्य पदार्थ या पदार्थों के वर्ग को इस अधिनियम के या इसमें अन्तर्विष्ट किन्हीं अपेक्षाओं के और ऐसी शर्तों के यदि कोई हों, जैसी विनिर्दिष्ट की जाएं, अध्यधीन छूट के लिए उपबन्ध करना;
(ठ) किसी ऐसे खाद्य पदार्थ के, जिसका खाद्य के अपमिश्रक के रूप में प्रयुक्त किया जाना ज्ञात है, विनिर्माण, परिवहन या विक्रय को प्रतिषिद्ध या विनियमित करना;
(ड) निम्नलिखित को प्रतिषिद्ध या विनियमित करना-
(i) किसी खाद्य पदार्थ में किसी जल या अन्य तनुकारक या अपमिश्रक का परिवर्धन;
(ii) किसी खाद्य पदार्थ से कोई संघटक निकालना;
(iii) किसी ऐसे खाद्य पदार्थ का विक्रय जिसमें ऐसा परिवर्धन या जिससे ऐसा निष्कासन किया गया हो या जिससे अन्यथा कृत्रिम रूप से व्यवहृत किया गया हो;
(iv) दो या अधिक ऐसे खाद्य पदार्थों का मिश्रण जो प्रकृति या स्वरूप में वैसे ही हों;
(ढ) ऐसे खाद्य पदार्थों को विनष्ट करने के लिए उपबन्ध करना जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुकूल नहीं हैं ।
[(2) [इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पूर्व उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । ]
24. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार समिति के साथ परामर्श करने के पश्चात् और पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन, उन बातों के लिए, जो धारा 23 के क्षेत्र के अन्दर नहीं आती हैं, इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम-
(क) [इस अधिनियम के अधीन खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारी, स्थानीय प्राधिकारी और स्थानीय (स्वास्थ्य) प्राधिकारी की शक्तियां और कर्तव्य परिनिश्चित कर सकेंगे]; ***
(ख) खाद्य पदार्थों या किसी विनिर्दिष्ट खाद्य पदार्थ या खाद्य पदार्थों के वर्ग के विक्रयार्थ विनिर्माण के लिए, भंडारकरण के लिए, विक्रय के लिए और वितरण के लिए अनुज्ञप्तियों के प्ररूप, ऐसी अनुज्ञप्तियों के लिए आवेदन का प्ररूप, वे शर्तें, जिनके अधीन ऐसी अनुज्ञप्तियां दी जा सकेंगी, उन्हें देने के लिए सशक्त प्राधिकारी, [उनके लिए देय फीसें, अनुज्ञप्तियों की शर्तों के पालन के लिए प्रतिभूति के रूप में किसी राशि का निक्षेप और वे परिस्थितियां जिनके अधीन ऐसी अनुज्ञप्ति या प्रतिभूति, [निलंबित, रद्द या समपहृत की जा सकेगी, विहित कर सकेंगे]];
(ग) यह निर्दिष्ट कर सकेंगे कि किसी खाद्य पदार्थ के विश्लेषण के लिए या ऐसी किसी बात के लिए जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन फीस विहित की जा सकती हो, फीस दी जाए;
(घ) यह निर्दिष्ट कर सकेंगे कि इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित सब जुर्माने या उनका कोई भाग वसूल किए जाने पर स्थानीय प्राधिकारी को दे दिया जाएगा;
(ङ) राज्य सरकार या खाद्य (स्वास्थ्य) प्राधिकारी को इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों और कृत्यों को अधीनस्थ प्राधिकारियों या स्थानीय प्राधिकारियों को प्रत्यायोजित किए जाने के लिए उपबन्ध कर सकेंगे ।
(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए सब नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संबंधित राज्य विधान-मंडलों के समक्ष रखे जाएंगे ।
25. निरसन और व्यावृत्ति-(1) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व ऐसे किसी राज्य में, जिसमें इस अधिनियम का विस्तार है, इस अधिनियम की तत्स्थानी कोई विधि प्रवृत्त हो तो वह विधि ऐसे प्रारम्भ पर निरसित हो जाएगी ।
(2) इस अधिनियम द्वारा किसी तत्समान विधि का निरसन किए जाने पर भी ऐसी तत्समान विधि के अधीन बनाए गए वे सब नियम, विनियम और उपविधियां, जो खाद्य में अपमिश्रण का निवारण करने से संबद्ध हैं और जो इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व प्रवृत्त हों वहां और उतने के सिवाय, जहां और जितने तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से अंसगत और विरुद्ध हों, तब तक प्रवृत्त बनी रहेगी, जब तक वे इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा परिवर्तित, संशोधित या निरसित नहीं कर दी जाती ।
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