Saturday, 02, May, 2026
 
 
 
Expand O P Jindal Global University
 

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 ( Government of National Capital Territory of Delhi Act, 1991 )


 

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991

(1992 का अधिनियम संख्यांक 1)

[2 जनवरी, 1992]

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के लिए विधान सभा और

मंत्रि-परिषद् से संबंधित संविधान के उपबंधों

की अनुपूर्ति के लिए और उससे संसक्त

या उसके आनुषंगिक

विषयों के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के बयालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

भाग 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 है ।

                (2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे :

                परन्तु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबन्ध में इस अधिनियम के प्रारंभ के संबंध में किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उस उपबंध के प्रवृत्त होने के बारे में निर्देश हैं ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,- 

                (क) अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है;

(ख) सभा निर्वाचन-क्षेत्र" से विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए इस अधिनियम के अधीन उपबंधित निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है;

(ग) राजधानी" से दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है; 

(घ) निर्वाचन आयोग" से अनुच्छेद 324 में निर्दिष्ट निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है;

(ङ) विधान सभा" से दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की विधान सभा अभिप्रेत है;

(च) राजधानी के संबंध में अनुसूचित जाति" से ऐसी जातियां, मूलवंश या जनजातियां अथवा ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें, राजधानी के संबंध में, अनुच्छेद 341 के अधीन अनुसूचित जातियां समझा जाता है ।

भाग 2

विधान सभा

3. विधान सभा और उसकी संरचना-(1) विधान सभा में प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए व्यक्तियों द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या सत्तर होगी ।

                (2) विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए, राजधानी को इस अधिनियम के भाग 3 के उपबंधों के अनुसार एकल-सदस्य सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में ऐसी रीति में विभाजित किया जाएगा कि प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र की जनसंख्या समस्त राजधानी में यथासाध्य एक ही हो ।

                (3) विधान सभा में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए जाएंगे और इस प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात विधान सभा में स्थानों की कुल संख्या से यथाशक्य वही होगा जो राजधानी में अनुसूचित जातियों की जनंसख्या का अनुपात राजधानी की कुल जनसंख्या से है और ऐसे आरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 334 के उपबंध लागू होंगे ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में जनसंख्या" पद से ऐसी अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना में अभिनिश्चित की गई जनसंख्या अभिप्रेत है जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं :

                 [परन्तु इस स्पष्टीकरण में अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना के प्रति, जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं, निर्देश का, जब तक सन् 2026 के पश्चात् की गई पहली जनगणना के सुसंगत आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते हैं, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह 2001 की जनगणना के प्रति निर्देश है :]

                 [परंतु यह और कि परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) के अधीन परिसीमन आयोग द्वारा 2001 की जनगणना के आधार पर राजधानी के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन में कोई पुनःसमायोजन उस तारीख से प्रभावी होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और ऐसे पुनः समायोजन के प्रभावी होने तक, विधान सभा के लिए कोई निर्वाचन ऐसे पुनः समायोजन से पूर्व विद्यमान प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के आधार पर कराया जा सकेगा ।]

4. विधान सभा की सदस्यता के लिए अर्हता-कोई व्यक्ति विधान सभा के किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए अर्हित तभी होगा जब-

(क) वह भारत का नागरिक है और निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ लेता है या प्रतिज्ञान करता है और उस पर अपने हस्ताक्षर करता है;

(ख) वह कम से कम पच्चीस वर्ष की आयु का है; और

(ग) उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं हैं जो इस निमित्त संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाएं ।

5. विधान सभा की अवधि-विधान सभा, यदि पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती है तो, अपने प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं और पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति का परिणाम विधान सभा का विघटन होगा :

                परन्तु उक्त अवधि को, जब अनुच्छेद 352 के खंड (1) के अधीन निकाली गई आपात-उद्घोषणा प्रवर्तन में है, तब राष्ट्रपति आदेश द्वारा ऐसी अवधि के लिए बढ़ा सकेगा जो एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं होगी और उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रह जाने के पश्चात् किसी भी दशा में उसका विस्तार छह मास की अवधि से अधिक नहीं होगा ।

6. विधान सभा का सत्र, सत्रावसान और विघटन-(1) उपराज्यपाल, समय-समय पर, विधान सभा को ऐसे समय और स्थान पर, जो वह ठीक समझे, अधिवेशन के लिए आहूत करेगा, किंतु उसके एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख के बीच छह मास का अंतर नहीं होगा ।

                (2) उपराज्यपाल, समय-समय पर,-

                                (क) विधान सभा का सत्रावसान कर सकेगा;

                                (ख) विधान सभा का विघटन कर सकेगा ।

7. विधान सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-(1) विधान सभा, यथाशक्यशीघ्र, अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी और जब-जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद रिक्त होता है तब-तब विधान सभा किसी अन्य सदस्य को, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुनेगी ।

                (2) विधान सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण करने वाला सदस्य,-

                                (क) यदि विधान सभा का सदस्य नहीं रहता है तो अपना पद रिक्त कर देगा,

(ख) किसी भी समय, यदि वह सदस्य अध्यक्ष है तो उपाध्यक्ष को संबोधित और यदि वह सदस्य उपाध्यक्ष है तो अध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; और

(ग) विधान सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा :

                परन्तु खंड (ग) के प्रयोजन के लिए कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो :

                परन्तु यह और कि जब कभी विधान सभा का विघटन किया जाता है तो विघटन के पश्चात् होने वाले विधान सभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा ।

                (3) जब अध्यक्ष का पद रिक्त है तब उपाध्यक्ष या यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है तो विधान सभा का ऐसा सदस्य जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा ।

                (4) विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो सभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।

(5) विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को ऐसे वेतन और भत्तों का जो विधान सभा, विधि द्वारा, नियत करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्तों का जो उपराज्यपाल राष्ट्रपति के अनुमोदन से, आदेश द्वारा, अवधारित करे, संदाय किया जाएगा ।

8. जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन होना-(1) विधान सभा की किसी बैठक में, जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष, या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचारधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा और धारा 7 की उपधारा (4) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अनुपस्थित है ।

(2) जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधान सभा में विचाराधीन है तब उसको विधान सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा और वह धारा 13 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर प्रथमतः ही मत देने का हकदार होगा किन्तु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा ।

9. विधान सभा में अभिभाषण का और उसको संदेश भेजने का उपराज्यपाल का अधिकार-(1) उपराज्यपाल विधान सभा में अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा ।

(2) उपराज्यपाल विधान सभा में उस समय लम्बित किसी विधेयक के संबंध में संदेश या कोई अन्य संदेश भेज सकेगा और जब ऐसा कोई संदेश इस प्रकार भेजा जाता है तब विधान सभा उस संदेश द्वारा विचार करने के लिए अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करेगी ।

10. उपराज्यपाल का विशेष अभिभाषण-(1) उपराज्यपाल विधान सभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात् प्रथम सत्र के आरंभ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में विधान सभा में अभिभाषण करेगा और विधान सभा को उसके आह्वान के कारण बताएगा ।

(2) विधान सभा की प्रकिया का विनियमन करने वाले नियमों द्वारा, जो उस सभा द्वारा बनाए जाएंगे, ऐसे अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों की चर्चा के लिए समय नियत करने के लिए उपबंध किया जाएगा ।

11. विधान सभा के बारे में मंत्रियों के अधिकार-प्रत्येक मंत्री को यह अधिकार होगा कि वह विधान सभा में बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले और विधान सभा की किसी समिति की कार्यवाही में, जिसमें उसका नाम सदस्य के रूप में दिया गया है, बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले, किंतु इस धारा के आधार पर वह मत देने का हकदार नहीं होगा ।

12. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान-विधान सभा का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, उपराज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।

13. सभा में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सभा की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति-(1) इस अधिनियम में यथा अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, विधान सभा की बैठक में सभी प्रश्नों का अवधारण अध्यक्ष या उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति को छोड़कर, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा ।

(2) अध्यक्ष या उस  रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति प्रथमतः मत नहीं देगा, किंतु मत बराबर होने की दशा में उसका निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।

(3) विधान सभा की सदस्यता में कोई रिक्ति होने पर भी, उस सभा को कार्य करने की शक्ति होगी और यदि बाद में यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति जो ऐसा करने का हकदार नहीं था, कार्यवाहियों में उपस्थित रहा है या उसने मत दिया है या अन्यथा भाग लिया है तो भी विधान सभा की कार्यवाही विधिमान्य होगी ।

(4) विधान सभा का अधिवेशन गठित करने के लिए गणपूर्ति सभा के सदस्यों की कुल संख्या का एक-तिहाई भाग होगी ।

(5) यदि विधान सभा के अधिवेशन में किसी समय गणपूर्ति नहीं है तो अध्यक्ष अथवा उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि वह सभा को स्थगित कर दे या अधिवेशन को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक गणपूर्ति नहीं हो जाती है ।

14. स्थानों का रिक्त होना-(1) कोई व्यक्ति संसद् तथा विधान सभा दोनों का सदस्य नहीं होगा और यदि कोई व्यक्ति संसद् तथा ऐसी सभा, दोनों का सदस्य चुन लिया जाता है तो ऐसी अवधि की समाप्ति के पश्चात्, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) और राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 101 के खंड (2) तथा अनुच्छेद 190 के खंड (2) में या उसके अधीन विनिर्दिष्ट की जाए, उस व्यक्ति का संसद् में स्थान रिक्त हो जाएगा, जब तक कि उसने विधान सभा में अपने स्थान को पहले ही नहीं त्याग      दिया है ।

(2) यदि विधान सभा का कोई सदस्य,-

                (क) सभा की सदस्यता के लिए धारा 15 या धारा 16 में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो जाता है; या

(ख) अध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने स्थान का त्याग कर देता है और उसका त्यागपत्र अध्यक्ष द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है,

तो ऐसा होने पर उसका स्थान रिक्त हो जाएगा :

                परंतु खंड (ख) में निर्दिष्ट त्यागपत्र की दशा में, यदि प्राप्त जानकारी से या अन्यथा और ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, यथास्थिति, अध्यक्ष का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा त्यागपत्र स्वैच्छिक या असली नहीं है तो वह ऐसे त्यागपत्र को स्वीकार नहीं करेगा ।

                (3) यदि विधान सभा का सदस्य साठ दिन की अवधि तक सभा की अनुज्ञा के बिना उसके सभी अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है तो सभा उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकेगी :

                परंतु साठ दिन की उक्त अवधि की संगणना करने में किसी ऐसी अवधि को हिसाब में नहीं लिया जाएगा जिसके दौरान सभा सत्रावसित या निरंतर चार से अधिक दिनों के लिए स्थगित रहती है ।

15. सदस्यता के लिए निरर्हता-(1) कोई व्यक्ति विधान सभा का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा,-

(क) यदि वह भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के या किसी संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर जिसके धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद् द्वारा या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा या राजधानी या किसी अन्य संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है,

(ख) यदि वह अनुच्छेद  102 के खंड (1) के उपखंड (ख), उपखंड (ग) या उपखंड (घ) के उपबंधों के अधीन अथवा उस अनुच्छेद के अनुसरण में बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन संसद् के दोनों सदनों में से किसी सदन का सदस्य चुने जाने और होने के लिए तत्समय निरर्हित है ।

                (2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति केवल इस कारण भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार या किसी संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या ऐसे राज्य का या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र का मंत्री है ।

                (3) यदि यह प्रश्न उठता है कि विधान सभा का कोई सदस्य उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन ऐसा सदस्य होने के लिए निरर्हित हो गया है या नहीं, तो वह प्रश्न राष्ट्रपति के विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।

                (4) ऐसे किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने से पहले राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा ।

16. दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता-संविधान की दसवीं अनुसूची के उपबंध, आवश्यक उपांतरों के अधीन रहते हुए (जिसके अंतर्गत यह उपांतरण भी है कि उसमें राज्य की विधान सभा, अनुच्छेद 188, अनुच्छेद 194 और अनुच्छेद 212 के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे, क्रमशः विधान सभा, और इस अधिनियम की धारा 12, धारा 18 और धारा 37 के प्रति निर्देश हैं) विधान सभा के सदस्यों को और उनके संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे राज्य की विधान सभा के सदस्यों को और उनके संबंध में लागू होते हैं, और तद्नुसार :-

                                (क) इस प्रकार उपांतरित उक्त दसवीं अनुसूची इस अधिनियम का भाग समझी जाएगी; और

(ख) कोई व्यक्ति विधान सभा का सदस्य होने से निरर्हित होगा यदि वह इस प्रकार उपांतरित उक्त दसवीं अनुसूची के अधीन इस प्रकार निरर्हित है ।

17. शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या अर्हित होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति-यदि विधान सभा में कोई व्यक्ति धारा 12 की अपेक्षाओं का अनुपालन करने से पहले या यह जानते हुए कि वह उसकी सदस्यता के लिए अर्हित नहीं है या निरर्हित कर दिया गया है, सदस्य के रूप में बैठता है या मत देता है तो वह प्रत्येक दिन के लिए जब वह इस प्रकार बैठता है या मत देता है, पांच सौ रुपए की शास्ति का भागी  होगा जो संघ को देय ऋण के रूप में वसूल की जाएगी ।

18. सदस्यों की शक्तियां, विशेषाधिकार, आदि-(1) इस अधिनियम के उपबंधों और विधान सभा की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन रहते हुए, विधान सभा में वाक्-स्वातंत्र्य होगा ।

                (2) विधान सभा या उसकी किसी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और किसी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी विधान सभा के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी प्रतिवेदन पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में इस प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी । 

                (3) अन्य बातों में विधान सभा और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां ऐसी होंगी होंगी जिनका उपयोग लोक सभा और उसके सदस्यों तथा समितियों द्वारा तत्समय किया जा रहा है ।

                (4) जिन व्यक्तियों को इस अधिनियम के आधार पर विधान सभा या उसकी किसी समिति में बोलने का और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार है, उनके संबंध में उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उस विधान सभा के सदस्यों के संबंध में लागू होते हैं ।

19. सदस्यों के वेतन और भत्ते-विधान सभा के सदस्य ऐसे वेतन और भत्ते, जिन्हें विधान सभा, समय-समय पर, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस संबंध में इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्ते, जो उपराज्यापाल, राष्ट्रपति के अनुमोदन से, आदेश द्वारा, अवधारित करे, प्राप्त करने के हकदार होंगे ।

20. संघ की संपत्ति को करों से छूट-वहां तक के सिवाय जहां तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंध करे, विधान सभा द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन या राजधानी में प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन अधिरोपित सभी करों से संघ की संपत्ति को छूट होगी :

                परन्तु इस धारा की कोई बात जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, राजधानी के भीतर किसी प्राधिकारी को संघ की किसी संपत्ति पर कोई ऐसा कर, जिसका दायित्व संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले ऐसी संपत्ति पर था या माना जाता था, उद्गृहीत, करने से तब तक नहीं रोकेगी जब तक वह कर राजधानी में उद्गृहीत होता रहता है ।

21. कतिपय विषयों की बाबत विधान सभा द्वारा पारित विधियों पर निर्बन्धन-(1) अनुच्छेद 286, अनुच्छेद 287 और अनुच्छेद 288 के उपबंध विधान सभा द्वारा उन अनुच्छेदों में, निर्दिष्ट विषयों में से किसी की बाबत पारित किसी विधि के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा उन विषयों की बाबत पारित किसी विधि के संबंध में लागू होते हैं ।

                (2) अनुच्छेद 304 के उपबंध, आवश्यक उपांतरणों सहित, विधान सभा द्वारा उस अनुच्छेद में निर्दिष्ट विषयों में से किसी की बाबत पारित किसी विधि के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे राज्य के विधान-मंडल द्वारा उन विषयों की बाबत पारित किसी विधि के संबंध में लागू होते हैं ।

22. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध-(1) कोई विधेयक या संशोधन उपराज्यपाल की सिफारिश से ही विधान सभा में पुरःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा यदि ऐसा विधेयक या संशोधन निम्नलिखित विषयों में से किसी की बाबत उपबंध करता है, अर्थात् :-

                                (क) किसी कर का अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन;

(ख) राजधानी की सरकार द्वारा अपने ऊपर ली गई या ली जाने वाली किन्हीं वित्तीय बाध्यताओं से संबंधित विधि का संशोधन;

(ग) राजधानी की संचित निधि में से धन का विनियोग;

(घ) किसी व्यय को राजधानी की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना;

 [(ङ) राजधानी की संचित निधि या राजधानी के लोक लेखा मद्दे धन की प्राप्ति अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निकाला जाना या राजधानी के लेखाओं की संपरीक्षा :] 

परंतु किसी कर के घटाने या उत्सादन के लिए उपबंध करने वाले किसी संशोधन के प्रस्ताव के लिए इस उपधारा के अधीन सिफारिश की अपेक्षा नहीं होगी ।

                (2) कोई विधेयक या संशोधन पूर्वोक्त विषयों में से किसी के लिए उपबंध करने वाला केवल इस कारण नहीं समझा जाएगा कि वह जुर्मानों या अन्य धनीय शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञप्तियां के लिए फीसों की या की गई सेवाओं के लिए फीसों की मांग का या उसके संदाय का उपबंध करता है अथवा इस कारण नहीं समझा जाएगा कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपबंध करता है ।

                (3) जिस विधेयक को अधिनियमित और प्रवर्तित किए जाने पर राजधानी की संचित निधि में से व्यय करना पड़ेगा वह विधेयक विधान सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक ऐसे विधेयक पर विचार करने के लिए उस सभा से उपराज्यपाल ने सिफारिश नहीं की है ।

23. विधेयकों के व्यपगत होने के संबंध में प्रक्रिया-(1) विधान सभा में लंबित विधेयक विधान सभा के सत्रावसान के कारण व्यपगत नहीं होगा ।

                (2) वह विधान सभा में लंबित विधेयक, विधान सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाएगा ।

24. विधेयकों पर अनुमति-जब कोई विधेयक विधान सभा द्वारा पारित कर दिया गया है तब वह उपराज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा और उपराज्यपाल घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है अथवा वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है :

                परन्तु उपराज्यपाल अनुमति के लिए अपने समक्ष विधेयक प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र उस विधेयक को, यदि वह धन विधेयक नहीं है तो, विधान सभा को इस संदेश के साथ लौटा सकेगा कि विधान सभा विधेयक पर या उसके किन्हीं विनिर्दिष्ट उपबंधों पर पुनर्विचार करे और विशिष्टतया किन्हीं ऐसे संशोधनों के पुरःस्थापन की वांछनीयता पर विचार करे जिनकी उसने अपने संदेश में सिफारिश की है और जब विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब विधान सभा विधेयक पर तद्नुसार पुनर्विचार करेगी और यदि विधेयक संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है और उपराज्यपाल के समक्ष अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो उपराज्यपाल घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है :

                परन्तु यह और कि उपराज्यपाल उस विधेयक पर अनुमति नहीं देगा किंतु उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखेगा,-

(क) जिस विधेयक से, उसके विधि बन जाने पर, उपराज्यपाल की राय में, उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण होगा कि वह स्थान, जिसकी पूर्ति के लिए वह न्यायालय इस संविधान द्वारा परिकल्पित है, संकटापन्न हो जाएगा; या

(ख) जो विधेयक राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, अपने विचार के लिए आरक्षित रखने का निदेश दे; या

(ग) जो विधेयक धारा 7 की उपधारा (5) या धारा 19 या धारा 34 या धारा 43 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट विषयों से संबंधित है ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 25 के प्रयोजनों के लिए, कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा यदि उसमें केवल धारा 22 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं विषयों से या उन विषयों में से किसी के आनुंषगिक किसी विषय से संबंधित उपबंध हैं और दोनों दशाओं में से किसी में, विधान सभा के अध्यक्ष का यह प्रमाणपत्र कि वह धन विधेयक है उस पर पृष्ठांकित है, और उसके द्वारा हस्ताक्षरित है ।

25. विचार के लिए आरक्षित विधेयक-जब कोई विधेयक उपराज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है :

                परन्तु जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है वहां राष्ट्रपति उपराज्यपाल को यह निदेश दे सकेगा कि वह विधेयक को विधान सभा को ऐसे संदेश के साथ, जो धारा 24 के पहले परंतुक में वर्णित है, लौटा दे और जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा संदेश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर विधान सभा द्वारा उस पर तद्नुसार पुनः विचार किया जाएगा और यदि वह उस सभा द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्तुत किया जाएगा ।

26. मंजूरी, आदि के संबंध में अपेक्षाएं-विधान सभा का कोई अधिनियम और किसी ऐसे अधिनियम का कोई उपबंध, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित कोई पूर्व मंजूरी नहीं दी गई थी या सिफारिश नहीं की गई थी, यदि उस अधिनियम को उपराज्यपाल द्वारा, या, राष्ट्रपति के विचार के लिए उपराज्यपाल द्वारा आरक्षित रख लिए जाने पर, राष्ट्रपति द्वारा, अनुमति दे दी गई थी ।

27. वार्षिक वित्तीय विवरण-(1) उपराज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में विधान सभा के समक्ष, राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से, उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में वार्षिक वित्तीय विवरण" कहा गया है ।

                (2) वार्षिक वित्तीय विवरण में दिए हुए व्यय के प्राक्कलनों में,-

(क) इस अधिनियम में राजधानी की संचित निधि पर भारित व्यय के रूप में वर्णित व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां; और

(ख) राजधानी की संचित निधि में से किए जाने के लिए प्रस्थापित अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां,

पृथक्-पृथक् दिखाई जाएंगी और राजस्व लेखे से होने वाले व्यय का अन्य व्यय से भेद किया जाएगा ।

                (3) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, निम्नलिखित व्यय राजधानी की संचित निधि पर भारित व्यय होगा, अर्थात् :-

(क) उपराज्यपाल की उपलब्धियां और भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय जो राष्ट्रपति द्वारा, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, अवधारित किया जाए; 

(ख) राजधानी को भारत की संचित निधि में से दिए गए उधारों की बाबत संदेय-भार, जिनके अंतर्गत ब्याज, निक्षेप निधि-भार और मोचन-भार तथा उससे संबंधित अन्य व्यय;

(ग) विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते;

(घ) दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतनों और भत्तों के संबंध में व्यय;

(ङ) किसी न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए अपेक्षित कोई राशियां;

(च) कोई अन्य व्यय, जो संविधान द्वारा या संसद्  द्वारा या विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि द्वारा इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है ।

28. विधान सभा में प्राक्कलनों के संबंध में प्रक्रिया-(1) प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन राजधानी की संचित निधि पर भारित व्यय से संबंधित हैं वे विधान सभा में मतदान के लिए नहीं रखे जाएंगे, किंतु इस उपधारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह विधान सभा में उन प्राक्कलनों में से किसी प्राक्कलन पर चर्चा को निवारित करती है ।

                (2) उक्त प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन अन्य व्यय से संबंधित हैं वे विधान सभा के समक्ष अनुदानों की मांगों के रूप में रखे जाएंगे और विधान सभा को शक्ति होगी कि वह किसी मांग को अनुमति दे या अनुमति देने से इंकार कर दे अथवा किसी मांग को, उसमें विनिर्दिष्ट रकम को कम करके, अनुमति दे ।

                (3) किसी अनुदान की मांग उपराज्यपाल की सिफारिश पर ही की जाएगी, अन्यथा नहीं ।

29. विनियोग विधेयक-(1) विधान सभा द्वारा धारा 28 के अधीन अनुदान किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, राजधानी की संचित निधि में से-

                                (क) विधान सभा द्वारा इस प्रकार किए गए अनुदानों की, और

(ख) राजधानी की संचित निधि पर भारित, किंतु विधान सभा के समक्ष पहले रखे गए विवरण में दर्शित रकम से किसी भी दशा में अनधिक व्यय की,

पूर्ति के लिए अपेक्षित सभी धनराशियों के विनियोग का उपबंध करने के लिए विधेयक पुरःस्थापित किया जाएगा ।

                (2) इस प्रकार किए गए किसी अनुदान की रकम में परिवर्तन करने या अनुदान के लक्ष्य को बदलने अथवा राजधानी की संचित निधि पर भारित व्यय की रकम में परिवर्तन करने का प्रभाव रखने वाला कोई संशोधन, ऐसे किसी विधेयक में विधान सभा में प्रस्थापित नहीं किया जाएगा और पीठासीन व्यक्ति का इस बारे में विनिश्चय अंतिम होगा कि कोई संशोधन इस उपधारा के अधीन अग्राह्य है या नहीं ।

                (3) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, राजधानी की संचित निधि में से इस धारा के उपबंधों के अनुसार पारित विधि द्वारा किए गए विनियोग के अधीन ही कोई धन निकाला जाएगा, अन्यथा नहीं ।

30. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान-(1) यदि-

(क) धारा 29 के उपबंधों के अनुसार बनाई गई किसी विधि द्वारा किसी विशिष्ट सेवा पर चालू वित्तीय वर्ष के लिए व्यय किए जाने के लिए प्राधिकृत कोई रकम उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाती है या उस वर्ष के वार्षिक वित्तीय विवरण में अनुध्यात न की कोई किसी नई सेवा पर अनुपूरक या अतिरिक्त व्यय की चालू वित्तीय वर्ष के दौरान आवश्यकता पैदा हो गई है, या

(ख) किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष और उस सेवा के लिए अनुदान की गई रकम से अधिक कोई धन व्यय हो गया है,

तो उपराज्यपाल, राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से, यथास्थिति, विधान सभा के समक्ष उस व्यय की प्राक्कलित रकम को दर्शित करने वाला दूसरा  विवरण रखवाएगा या ऐसे पूर्व अनुमोदन से विधान सभा में ऐसे आधिक्य के लिए मांग प्रस्तुत करवाएगा ।

                (2) ऐसे किसी विवरण और व्यय या मांग के संबंध में तथा राजधानी की संचित निधि में से ऐसे व्यय या ऐसी मांग से संबंधित अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली किसी विधि के संबंध में भी, धारा 27, धारा 28 और धारा 29 के उपबंध वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे वार्षिक वित्तीय विवरण और उसमें वर्णित व्यय के संबंध में या किसी अनुदान की किसी मांग के संबंध में और राजधानी की संचित निधि में से ऐसे व्यय या अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली विधि के संबंध में प्रभावी हैं ।

31. लेखानुदान-(1) इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, विधान सभा को किसी वित्तीय वर्ष के भाग के लिए प्राक्कलित व्यय के संबंध में कोई अनुदान, उस अनुदान के लिए मतदान करने के लिए धारा 28 में विहित प्रक्रिया के पूरा होने तक और उस व्यय के संबंध में धारा 29 के उपबंधों के अनुसार विधि के पारित होने तक, अग्रिम देने की, शक्ति होगी और जिन प्रयोजनों के लिए उक्त अनुदान किए गए हैं उनके लिए राजधानी की संचित निधि में से धन निकालना विधि द्वारा प्राधिकृत करने की विधान सभा को शक्ति होगी ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन किए जाने वाले किसी अनुदान और उस उपधारा के अधीन बनाई जाने वाली किसी विधि के संबंध में धारा 28 और धारा 29 के उपबंध वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे वार्षिक वित्तीय विवरण में वर्णित किसी व्यय के बारे में कोई अनुदान करने के संबंध में और राजधानी की संचित निधि में से ऐसे व्यय की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली विधि के संबंध में प्रभावी हैं ।

32. विधान सभा द्वारा व्यय की मंजूरी दिए जाने तक व्यय को प्राधिकृत किया जाना-इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, उपराज्यपाल राजधानी की संचित निधि में से ऐसा व्यय प्राधिकृत कर सकेगा जो वह राजधानी की संचित निधि के गठन की तारीख से प्रारंभ होने वाली छह मास से अनधिक अवधि के लिए, विधान सभा द्वारा ऐसे व्यय की मंजूरी दिए जाने तक, आवश्यक समझे ।

33. प्रक्रिया के नियम-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विधान सभा अपनी प्रक्रिया तथा अपने कार्य संचालन के विनियमन के लिए नियम बना सकेगी :

                परन्तु उपराज्यपाल, विधान सभा के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात् तथा राष्ट्रपति के अनुमोदन से,-

                                (क) वित्तीय कार्य का समय के भीतर पूरा करना सुनिश्चित करने के लिए;

(ख) किसी वित्तीय विषय से या राजधानी की संचित निधि में से धन का विनियोग करने वाले किसी विधेयक से संबंधित विधान सभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन का विनियमन करने के लिए;

(ग) जहां तक इस अधिनियम या किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उपराज्यपाल से स्वविवेकानुसार कार्य करने की अपेक्षा की जाती है वहां तक उसके कृत्यों के निर्वहन पर प्रभाव डालने वाली किसी बात पर विचार-विमर्श करने का या प्रश्न पूछने का प्रतिषेध करने के लिए,

नियम बना सकेगा ।

                (2) जब तक उपधारा (1) के अधीन नियम नहीं बनाए जाते हैं तब तक विधान सभा में इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पहले, उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के संबंध में जो प्रक्रिया के नियम और स्थायी आदेश प्रवृत्त थे वे ऐसे उपांतरणों और अनुकूलनों के अधीन रहते हुए विधान सभा के संबंध में प्रभावी होंगे जिन्हें उपराज्यपाल उनमें करे ।

34. राजधानी की राजभाषा या राजभाषाएं तथा उसकी विधान सभा में प्रयोग होने वाली भाषा या भाषाएं-(1) विधान सभा, विधि द्वारा, राजधानी में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिन्दी को राजधानी के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली राजभाषा या राजभाषाओं के रूप में अंगीकार कर सकेगी :

                परन्तु राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगा कि-

(i) संघ की राजभाषा राजधानी के ऐसे शासकीय प्रयोजनों के लिए अंगीकृत की जाएगी जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं;

(ii) कोई अन्य भाषा भी संपूर्ण राजधानी में या उसके ऐसे भाग में राजधानी के शासकीय प्रयोजनों में से ऐसे प्रयोजनों के लिए अंगीकृत की जाएगी जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि राजधानी की जनसंख्या का पर्याप्त भाग ऐसे सभी प्रयोजनों या उनमें से किसी प्रयोजन के लिए, उस अन्य भाषा के प्रयोग की वांछा करता है ।

                (2) विधान सभा में कार्य राजधानी की राजभाषा या राजभाषाओं में या हिन्दी में या अग्रेंजी में किया जाएगा :

                परन्तु, यथास्थिति, विधान सभा का अध्यक्ष या उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को, जो पूर्वोक्त भाषाओं में से किसी भाषा में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है, अपनी मातृभाषा में सभा को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा ।

35. विधेयकों, अधिनियमों, आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा-धारा 34 में किसी बात के होते हुए, जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक जो-

(क) विधान सभा में पुरःस्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके सभी संशोधनों के;

(ख) विधान सभा द्वारा पारित सभी अधिनियमों के; और

(ग) विधान सभा द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के,

प्राधिकृत पाठ अग्रेंजी भाषा में होंगे :

                परन्तु जहां विधान सभा ने उस विधान सभा में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा विधान सभा द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहां राजपत्र में उपराज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद अंग्रेजी भाषा में उसका प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा ।

36. विधान सभा में चर्चा पर निर्बन्धन-उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए आचरण के विषय में विधान सभा में कोई चर्चा नहीं होगी ।

37. न्यायालय द्वारा विधान सभा की कार्यवाहियों की जांच किया जाना-(1) विधान सभा की किसी कार्यवाही की विधिमान्यता को प्रक्रिया की किसी अभिकथित अनियमितता के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

                (2) विधान सभा का कोई अधिकारी या सदस्य, जिसमें इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उस विधान सभा में प्रक्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की अथवा व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियां निहित हैं, उन शक्तियों के अपने द्वारा प्रयोग के विषय में किसी न्यायालय की अधिकारिता के अधीन नहीं होगा

भाग 3

निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन

38. निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करना-(1) निर्वाचन आयोग, धारा 3 के अधीन विधान सभा के लिए समनुदिष्ट स्थानों को एक-सदस्यीय प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में, इसमें उपबन्धित रीति से, वितरित करेगा और उनका परिसीमन निम्नलिखित उपबंधों को ध्यान में रखते हुए करेगा, अर्थात् :-

(क) सभी निर्वाचन-क्षेत्रों का, यथासाध्य, ऐसी रीति से परिसीमन किया जाएगा कि राजधानी की कुल जनसंख्या का ऐसे प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र की जनसंख्या से अनुपात एक ही हो; और

(ख) वे निर्वाचन-क्षेत्र जिनमें अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए जाते हैं, यथासाध्य, उन क्षेत्रों में अवस्थित होंगे जहां उनकी जनसंख्या का अनुपात कुल जनसंख्या से अपेक्षाकृत अधिक हो ।

(2) निर्वाचन आयोग,-

(क) निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाएं, राजपत्र में और ऐसी अन्य रीति से भी, जैसी आयोग ठीक समझे, प्रकाशित करेगा और साथ-साथ एक सूचना भी प्रकाशित करेगा जिसमें प्रस्थापनाओं के सम्बन्ध में आक्षेप और सुझाव आमंत्रित किए गए हों और वह तारीख विनिर्दिष्ट की गई हो जिसको या जिसके पश्चात् प्रस्थापनाओं पर उसके द्वारा आगे विचार किया जाएगा;

(ख) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करेगा जो उसे उस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख से पहले प्राप्त हुए हों;

(ग) इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पहले उसे प्राप्त हुए सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात्, एक या अधिक आदेशों द्वारा, निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन अवधारित करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को राजपत्र में प्रकाशित करवाएगा; और ऐसे प्रकाशन पर वह आदेश या वे आदेश विधि का पूर्ण बल रखेगा या रखेंगे और उसे या उन्हें किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

39. निर्वाचन आयोग की परिसीमन आदेश को प्रवर्तन रखने की शक्ति-निर्वाचन आयोग, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, समय-समय पर,-

(क) धारा 38 के अधीन किए गए किसी आदेश में की किसी मुद्रण सम्बन्धी भूल को या अनवधानता से हुई भूल या लोप से उसमें हुई किसी गलती को शुद्ध कर सकेगा; 

(ख) वहां, जहां कि उस किसी आदेश में उल्लिखित किसी प्रादेशिक खंड को सीमाओं या नाम परिवर्तित कर दिए जाते हैं, का ऐसे संशोधान कर सकेगा जो उस आदेश को अद्यतन बनाने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।

40. विधान सभा के लिए निर्वाचन-(1) धारा 38 के अधीन सभी सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करने के पश्चात् विद्यमान विधान सभा का गठन करने के प्रयोजन के लिए यथाशीघ्र साधारण निर्वाचन कराया जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, उपराज्यपाल, राजपत्र में प्रकाशित एक या अधिक अधिसूचनाओं द्वारा, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) और उसके अधीन बनाए गए नियमों या जारी किए गए आदेशों के, जो उपधारा (3) के अधीन लागू हैं, उपबंधों के अनुसार उक्त सभी सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से सदस्यों के निर्वाचन की अपेक्षा करेगा ।

                (3) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) और उक्त अधिनियमों के अधीन बनाए गए नियम या निकाले गए आदेश तथा निर्वाचनों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त सभी अन्य विधियां, आवश्यक उपांतरणों सहित (जिनमें उसमें अर्थान्वयन करने के लिए राज्य, राज्य सरकार और राज्यपाल के प्रति निर्देशों को क्रमशः राजधानी, राजधानी की सरकार और उपराज्यपाल के प्रति निर्देश के रूप में सम्मिलित उपांतरण भी हैं) उपधारा (1) में निर्दिष्ट साधारण निर्वाचन को या उसके संबंध में लागू होंगी ।

भाग 4

उपराज्यपाल और मंत्रियों से संबंधित कतिपय उपबंध

41. वे विषय जिनमें उपराज्यपाल स्वविवेकानुसार कार्य करेगा-(1) उपराज्यपाल किसी ऐसे मामले में स्वविवेकानुसार कार्य करेगा-

(i) जो विधान सभा की प्रवृत्त शक्तियों के परिक्षेत्र के बाहर आता है किन्तु जिसकी बाबत राष्ट्रपति द्वारा उसे शक्तियां या कृत्य न्यस्त या प्रत्यायोजित किए जाते हैं; या

(ii) जिसमें किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वविवेकानुसार कार्य करे या किन्हीं न्यायिक या न्यायिककल्प कृत्यों का निर्वहन करे ।

                (2) यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं है जिसके संबंध में किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उपराज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह स्वविवेकानुसार कार्य करे तो उस पर उपराज्यपाल का विनिश्चय अंतिम होगा ।

                (3) यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं है जिसके संबंध में किसी विधि द्वारा उपराज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह किन्हीं न्यायिक या न्यायिककल्प कृत्यों का निर्वहन करे तो उस पर उपराज्यपाल का विनिश्चय अंतिम होगा ।

42. मंत्रियों द्वारा सलाह-इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने उपराज्यपाल को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी ।

43. मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध-(1) किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले उपराज्यपाल अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूपों के अनुसार उसको पद की और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा ।

                (2) कोई मंत्री, जो निरन्तर छह मास की किसी अवधि तक विधान सभा का सदस्य नहीं है उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा ।

                (3) मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो विधान सभा, विधि द्वारा, समय-समय पर अवधारित करे और जब तक विधान सभा इस प्रकार अवधारित नहीं करती है तब तक ऐसे होंगे जो राष्ट्रपति के अनुमोदन से उपराज्यपाल द्वारा अवधारित किए जाएं ।

44. कार्य संचालन-(1) राष्ट्रपति-

(क) मंत्रियों में कार्य के आबंटन के लिए, जहां तक कि वह उस कार्य से संबंधित है जिसकी बाबत उपराज्यपाल से अपनी मंत्रि-परिषद् की सहायता और सलाह पर कार्य करने की अपेक्षा की जाती है; तथा

(ख) मंत्रियों के साथ कार्य अधिक सुविधापूर्वक किए जाने के लिए, जिसमें उपराज्यपाल तथा मंत्रि-परिषद् या किसी मंत्री के बीच मतभेद के मामले में अंगीकृत की जाने वाली प्रक्रिया भी है, 

नियम बनाएगा ।

(2) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, उपराज्यपाल की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई, चाहे अपने मंत्रियों की सलाह पर या अन्यथा की गई हो, उपराज्यपाल के नाम से की हुई कही जाएगी ।

(3) उपराज्यपाल के नाम से किए गए और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा जो उपराज्यपाल द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह उपराज्यपाल द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है ।

45. उपराज्यपाल को जानकारी देने, आदि के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य-मुख्यमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि वह-

(क) राजधानी के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रि-परिषद् के सभी विनिश्चय उपराज्यपाल को संसूचित करे;

(ख) राजधानी के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी जो जानकारी उपराज्यपाल मांगे, वह दे; और

(ग) किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रि-परिषद् ने विचार नहीं किया है, उपराज्यपाल द्वारा अपेक्षा किए जाने पर मंत्रि-परिषद् के समक्ष विचार के लिए रखे ।

भाग 5

प्रकीर्ण तथा संक्रमणकालीन उपबंध

46. राजधानी की संचित निधि-(1) ऐसी तारीख से जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, किसी ऐसे विषय के संबंध में, जिसकी बाबत विधान सभा को विधियां बनाने की शक्ति है, भारत सरकार को या उपराज्यपाल को राजधानी में प्राप्त सभी राजस्व तथा  [भारत की संचित निधि में से राजधानी को दिए गए सभी अनुदान तथा सभी उधार और भारत सरकार या उपराज्यपाल द्वारा राजधानी की संचित निधि की प्रतिभूति पर लिए गए सभी उधार] तथा उधारों के प्रतिसंदाय में राजधानी को प्राप्त सभी धनराशियों की एक, संचित निधि बनेगी जो दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की संचित निधि" के नाम से ज्ञात होगी (जिसे इस अधिनियम में राजधानी की संचित निधि कहा गया है) ।

                (2) राजधानी की संचित निधि में से कोई धनराशियां इस अधिनियम के अनुसार और उसमें उपबंधित प्रयोजनों के लिए और रीति से ही विनियोजित की जाएंगी, अन्यथा नहीं ।

                (3) राजधानी की संचित निधि की अभिरक्षा, ऐसी निधि में से धनराशियों के संदाय, उससे धनराशियों के निकाले जाने का तथा उन विषयों से संबंधित या उनके आनुषंगिक अन्य सभी विषयों का विनियमन, राष्ट्रपति के अनुमोदन से उपराज्यपाल द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा किया जाएगा ।

 [46क. राजधानी का लोक लेखा और उसमें जमा किया गया धन-(1) उस तारीख से जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त, नियत करे, उपराज्यपाल द्वारा या उसकी ओर से प्राप्त किए गए अन्य सभी लोक धन राजधानी का लोक लेखा" नाम से ज्ञात लोक लेखा में जमा किए जाएंगे ।

                (2) उपराज्यपाल द्वारा या उसकी ओर से प्राप्त लोक धन की जो राजधानी की संचित निधि या दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी संघ राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि में जमा किए गए धन से भिन्न है, अभिरक्षा, राजधानी के लोक लेखा में उनका संदाय और ऐसे लेखा से धन का निकाला जाना और पूर्वोक्त विषयों से संसक्त या सहायक अन्य सभी विषय राष्ट्रपति के अनुमोदन से उपराज्यपाल द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनियमित किए जाएंगे ।]

47. राजधानी की आकस्मिकता निधि-(1) अग्रदाय के स्वरूप की एक आकस्मिकता निधि स्थापित की जाएगी जो दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि" के नाम से ज्ञात होगी जिसमें राजधानी की संचित निधि में से ऐसी राशियां जमा की जाएंगी जो, समय-समय पर, विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि द्वारा अवधारित की जाएं और ऐसी निधि में से अग्रिम धन देने के लिए उपराज्यपाल को समर्थ बनाने के लिए उक्त निधि उपराज्यपाल द्वारा धारित की जाएगी ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट आकस्मिकता निधि में से कोई अग्रिम धन किसी अनवेक्षित व्यय का विधि द्वारा किए गए विनियोजनों के अधीन विधान सभा द्वारा प्राधिकृत किया जाना लंबित रहने तक ऐसे व्यय की पूर्ति के प्रयोजनों के लिए ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

                (3) उपराज्यपाल, पूर्वोक्त आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, उसमें धनराशियों के संदाय तथा उससे धनराशियों के निकाले जाने से संबंधित या उसके आनुषंगिक सभी विषयों का विनियमन करने के लिए नियम बना सकेगा ।

 [47क. राजधानी की संचित निधि की प्रतिभूति पर उधार लेना-(1) संघ की कार्यपालिका शक्ति, राजधानी की संचित निधि की प्रतिभूति पर ऐसी सीमाओं के भीतर, यदि कोई हों, जो संसद्, विधि द्वारा, समय-समय पर, नियत करे, उधार लेने और ऐसी सीमाओं के भीतर, यदि कोई हों, जो इस प्रकार नियत की जाएं, प्रत्याभूति देने तक विस्तारित है :

                परन्तु इस उपधारा के अधीन भारत सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियां उपराज्यपाल द्वारा भी, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जिन्हें भारत सरकार अधिरोपित करना ठीक समझे, प्रयोक्तव्य होंगी ।

                (2) प्रत्याभूति देने के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित कोई रकम राजधानी की संचित निधि पर भारित होगी ।

47ख. राजधानी के लेखाओं का प्ररूप-राजधानी के लेखाओं को ऐसे प्ररूप में रखा जाएगा जो उपराज्यपाल, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सलाह अभिप्राप्त करने के पश्चात् और राष्ट्रपति के अनुमोदन से, नियमों द्वारा, विहित करे ।]

48. संपरीक्षा प्रतिवेदन-भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की धारा 46 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट तारीख की पश्चात्वर्ती किसी अवधि के लिए राजधानी के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को उपराज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको विधान सभा के समक्ष रखवाएगा ।

49. उपराज्यपाल तथा उसके मंत्रियों का राष्ट्रपति से संबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, उपराज्यपाल और उसकी मंत्रि-परिषद् राष्ट्रपति के साधारण नियंत्रण के अधीन होगी तथा ऐसे विशिष्ट निदेशों का, यदि कोई हों, अनुपालन करेगी जो राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर दिए जाएं ।

50. अनुच्छेद 239कख के अधीन किए गए आदेश की अवधि और संसद् द्वारा उसका अनुमोदन-(1) अनुच्छेद 239कख के अधीन राष्ट्रपति द्वारा किया गया प्रत्येक आदेश, आदेश किए जाने की तारीख से एक वर्ष का अंत होने पर समाप्त हो जाएगा और अनुच्छेद 356 के खंड (2) और खंड (3) के उपबंध, यथासाध्य, ऐसे आदेश को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा को लागू होते हैं ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति पूर्वोक्त आदेश की अवधि को उपधारा (1) के अधीन आदेश की समाप्ति की तारीख से अधिक से अधिक दो वर्ष की अवधि के लिए इस शर्त के अधीन रहते हुए और बढ़ा सकेगा कि एक वर्ष की समाप्ति के परे किसी अवधि के लिए उक्त आदेश के प्रत्येक विस्तार का अनुमोदन संसद् के दोनों सदनों के संकल्प द्वारा किया जाएगा ।

51. राष्ट्रपति द्वारा व्यय का प्राधिकृत किया जाना-जहां विधान सभा अनुच्छेद 239कख के अधीन राष्ट्रपति द्वारा किए गए किसी आदेश के कारण विघटित कर दी जाती है या ऐसी विधान सभा के रूप में उसके कृत्य निलंबित कर दिए जाते हैं वहां, तब जब लोक सभा सत्र में न हो, व्यय की संसद् द्वारा मंजूरी लंबित रहने तक राजधानी की संचित निधि में से ऐसे व्यय को प्राधिकृत करने की राष्ट्रपति की क्षमता होगी ।

52. संविदाएं और वाद-शंकाओं के निराकरण के लिए यह घोषित किया जाता है कि-

(क) राजधानी के प्रशासन से संबंधित सभी संविदाएं, संघ की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए की गई संविदाएं हैं; और

(ख) राजधानी के प्रशासन से संबंधित तभी वादों को तथा कार्यवाहियों को भारत सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित किया जाएगा ।

53. कठिनाइयां दूर करने की राष्ट्रपति की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम द्वारा निरसित किसी विधि के उपबंधों के संक्रमण के संबंध में या इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में तथा विशिष्टतया विधान सभा के गठन के संबंध में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राष्ट्रपति, ऐसे आदेश द्वारा, जो संविधान के या इस अधिनियम के उपबंधों के असंगत न हो, कोई भी बात कर सकेगा जो उसे उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो :

                परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश प्रथम विधान सभा के गठन की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

54. नियमों का विधान सभा के समक्ष रखा जाना-उपराज्यपाल द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।

 [55. 1950 के अधिनियम संख्यांक 43 की धारा 27का संशोधन-लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 27क की उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात् :-

(3) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए निर्वाचकगण उस राज्यक्षेत्र के लिए दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 के अधीन गठित विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनेगा ।"]

56. 1966 के अधिनियम संख्यांक 19 का निरसन-दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 निरसित किया जाता है ।

अनुसूची

(धारा 4, धारा 12 और धारा 43 देखिए)

शपथ या प्रतिज्ञान के प्ररूप

1

विधान सभा के निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी द्वारा ली जाने वाली शपथ या किए जाने वाले प्रतिज्ञान का प्ररूप :-

                मैं, अमुक, जो विधान सभा में स्थान भरने के लिए अभ्यर्थी के रूप में नामनिर्देशित हुआ हूं,  ईश्वर की शपथ लेता हूं  कि मैं

    सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं

विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा और मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा ।"

2

विधान सभा के सदस्य द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान का प्ररूप :-

 

मैं, अमुक, जो विधान सभा  का  सदस्य  निर्वाचित  हुआ हूं   ईश्वर की शपथ लेता हूं   कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के

                       सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं

संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूं उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूंगा ।" ।

3

मंत्रि-परिषद् के सदस्य के लिए पद की शपथ का प्ररूप :-

                मैं, अमुक,  ईश्वर की शपथ लेता हूं  कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूगां,

                           सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं

मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा, मैं मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूगां तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा ।" ।

4

मंत्रि-परिषद् के सदस्य के लिए गोपनीयता की शपथ का प्ररूप :-

मैं, अमुक,  ईश्वर की शपथ लेता हूं  कि जो विषय मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा

                         सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं

उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को, तब के सिवाय जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक् निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में संसूचित या प्रकट नहीं करूंगा ।" ।

______________

Download the LatestLaws.com Mobile App
 
 
Latestlaws Newsletter
 

Publish Your Article

 

Campus Ambassador

 

Media Partner

 

Campus Buzz

 

LatestLaws Guest Court Correspondent

LatestLaws Guest Court Correspondent Apply Now!
 

LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026

 

LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!

 
 
 

LatestLaws Partner Event : Smt. Nirmala Devi Bam Memorial International Moot Court Competition

 
 
Latestlaws Newsletter