लाटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998
(1998 का अधिनियम संख्यांक 17)
[7 जुलाई, 1998]
लाटरियों के विनियमन और उनसे संबंधित और
उनके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के उनचासवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम लाटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर होगा ।
(3) यह 2 अक्तूबर, 1997 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो :-
(क) लाटरी का बम्पर ड्रॉ" से लाटरी का ऐसा विशेष ड्रॉ अभिप्रेत है जो किसी त्यौहार या अन्य विशेष अवसर पर या उसके दौरान निकाला जाता है जिसमें प्रस्थापित इनाम की धनराशि उस इनाम की धनराशि से अधिक होती है जो लाटरियों के अन्य सामान्य ड्रॉ की दशा में प्रस्थापित की जाती है ;
(ख) लाटरी" से उन व्यक्तियों को, जो टिकट क्रय करके किसी इनाम की संभावनाओं में भाग लेते हैं, लाट या संभावना द्वारा इनामों के वितरण के लिए किसी भी रूप में और किसी भी नाम से ज्ञात स्कीम अभिप्रेत है ;
(ग) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।
3. लाटरियों का प्रतिषेध-धारा 4 में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी राज्य सरकार, किसी लाटरी को आयोजित, संचालित या संप्रवर्तित नहीं करेगी ।
4. वे शर्तें जिनके अधीन लाटरियां आयोजित, आदि की जा सकेंगी-कोई राज्य सरकार, निम्नलिखित शर्तों के अधीन रहते हुए, किसी लाटरी को आयोजित, संचालित या संप्रवर्तित कर सकेगी, अर्थात् :-
(क) इनाम किसी पूर्व घोषित संख्यांक पर या किसी एकल अंक के आधार पर प्रस्थापित नहीं किए जाएंगे ;
(ख) राज्य सरकार, राज्य की मोहर और नाम वाले लाटरी टिकट, ऐसी रीति से मुद्रित कराएगी जिससे कि लाटरी के टिकट की प्रमाणिकता सुनिश्चित हो सके ;
(ग) राज्य सरकार, टिकटों का विक्रय या तो स्वयं करेगी या वितरकों या विक्रय अभिकर्ताओं की मार्फत कराएगी ;
(घ) लाटरियों की टिकटों के विक्रय के आगम राज्य के लोक लेखा में जमा किया जाएगा ;
(ङ) राज्य सरकार सभी लाटरियों के ड्रॉ स्वयं निकालेगी ;
(च) वह इनामी धन, जिसका दावा ऐसे समय के भीतर नहीं किया जाता है जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए या जिसका अन्यथा वितरण नहीं किया जाता है, उस सरकार की संपत्ति हो जाएगा ;
(छ) ड्रॉ का स्थान संबद्ध राज्य के भीतर अवस्थित होगा ;
(ज) किसी लाटरी के किसी सप्ताह में एक से अधिक ड्रॉ नहीं होंगे ;
(झ) सभी प्रकार की लाटरियों के ड्रॉ दिन की किसी ऐसी अवधि के बीच निकाले जाएंगे जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ;
(ञ) किसी लाटरी के बम्पर ड्रॉ की संख्या किसी कलैंडर वर्ष में छह से अधिक नहीं होगी ;
(ट) ऐसी अन्य शर्तें जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।
5. किसी राज्य में टिकट के विक्रय का प्रतिषेध-कोई राज्य सरकार, राज्य के भीतर प्रत्येक अन्य राज्य द्वारा आयोजित, संचालित या संप्रवर्तित किसी लाटरी के टिकटों के विक्रय का प्रतिषेध कर सकेगी ।
6. लाटरी के आयोजन, आदि का प्रतिषेध-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, धारा 4 के उपबंधों के उल्लंघन में आयोजित, संचालित या संप्रवर्तित किसी लाटरी का या वहां जहां ऐसी लाटरी के टिकटों का विक्रय धारा 5 के उपबंधों के उल्लंघन में किया जाता है, प्रतिषेध कर सकेगी ।
7. शास्ति-(1) जहां कोई लाटरी उस तारीख के पश्चात् जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, राज्य सरकार के किसी विभाग द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में आयोजित, संचालित या संप्रवर्तित की जाती है वहां उस विभाग का अध्यक्ष ऐसे कठोर कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडनीय होगा :
परंतु इस धारा की कोई बात उस विभाग के ऐसे अध्यक्ष को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि उक्त उल्लंघन उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई उल्लंघन सरकार के किसी विभाग द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि उक्त उल्लंघन उस विभाग के, अध्यक्ष से भिन्न किसी अधिकारी की सम्मति से या उसकी मौनानुकूलता से किया गया है या उस उल्लंघन का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है तो ऐसा अधिकारी भी उस उल्लंघन का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
(3) यदि कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में आयोजित, संचालित या संप्रवर्तित किसी लाटरी के किसी अभिकर्ता, संप्रवर्तक या व्यापारी के रूप में कार्य करेगा, या ऐसी लाटरी के टिकट का विक्रय, वितरण या क्रय करेगा तो वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
8. अपराधों का संज्ञेय और अजमानतीय होना-इस अधिनियम के अधीन अपराध संज्ञेय और अजमानतीय होंगे ।
9. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात, किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है ; और
(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
10. निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार को उस राज्य में इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम को या किए गए किसी आदेश को निष्पादित करने के बारे में निदेश दे सकेगी ।
11. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
12. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) धारा 4 के खंड (च) के अधीन इनामी धन का दावा करने के लिए समय नियत करना ;
(ख) धारा 4 के खंड (झ) के अधीन सभी लाटरियों के ड्रॉ निकाले जाने के लिए अवधि नियत करना ; और
(ग) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना अपेक्षित हो या विहित किया जाए ।
(3) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र जहां राज्य विधान-मंडल के दो सदन हैं, वहां प्रत्येक सदन के समक्ष, या जहां राज्य विधान-मंडल का एक सदन है, वहां उस सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
13. निरसन और व्यावृत्ति-(1) लाटरी (विनियमन) अध्यादेश, 1998 (1998 का अध्यादेश संख्यांक 6) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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