Tuesday, 28, Apr, 2026
 
 
 
Expand O P Jindal Global University
 

चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अधिनियम, 1949 ( Chartered Accountants Act, 1949 )


 

चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अधिनियम, 1949

(1949 का अधिनियम संख्यांक 38)1

[1 मई, 1949]

2[चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की वृत्ति] के विनियमन के लिए

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

2[चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की वृत्ति] के विनियमन के लिए और उस प्रयोजनार्थ चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट संस्थान स्थापित करने के लिए उपबन्ध करना समीचीन है;

अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

 

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अधिनियम, 1949 है

 3[(2) इस विस्तार 4॥। समस्त भारत पर है ]

(3) यह ऐसी तारीख5 को लागू होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे

 

2. निर्वचन-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध हो, -

                () “सहयुक्त" से संस्थान का सहयुक्त सदस्य अभिप्रेत है;

                 6[(कक) “प्राधिकरण" से धारा 22 के अधीन गठित अपील प्राधिकरण अभिप्रेत है;

(ककक) “बोर्ड" से धारा 28 के अधीन गठित क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड अभिप्रेत है;]

                () “चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो संस्थान का सदस्य है; 7॥।

                () “परिषद्" से संस्थान की परिषद् अभिप्रेत है;

                 8[(गक) “फर्म" का वही अर्थ होगा, जो भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) की धारा 4 में है और इसके अंतर्गत संस्थान में रजिस्ट्रीकृत, -

(i) सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम, 2008 (2009 का 6) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में यथा परिभाषित सीमित दायित्व भागीदारी; या

(ii) एकमात्र स्वत्वधारी, भी है;]

 

() “निर्बन्धित प्रमाणपत्र धारक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो निर्बन्धित प्रमाणपत्र नियम, 1932 के अधीन राज्य सरकार द्वारा अनुदत्त स्थायी या अस्थायी निर्बन्धित प्रमाणपत्र धारण कर रहा है;

 

() “संस्थान" से इस अधिनियम के अधीन गठित भारतीय चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट संस्थान अभिप्रेत है;

  1. इसका विस्तार दादरा और नागर हवेली पर 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा; पांडिचेरी पर 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा; गोवा, दमण और दीव पर 1963 के विनियम सं० 11 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा और लक्षदीव पर 1963 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किया गया है

यह अधिनियम, अधिसूचना सं० का०आ० 699(), तारीख 1-9-1980, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2, खंड 3(त्त्), पृष्ठ 1298 द्वारा, सिक्किम राज्य में प्रवृत्त हुआ

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 2 द्वारा (1-7-1959 से) अकाउन्टेण्टों की वृत्ति के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा मूल उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. 1968 के अधिनियम सं० 25 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-8-1968 से) जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय शब्दों का लोप किया गया
  4. 1 जुलाई, 1949, देखिए अधिसूचना सं० 10 (4)/49श्न्तारीख 1 जून, 1949; भारत का राजपत्र (अंग्रेजी); असाधारण, पृष्ठ 904
  5. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित
  6. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 3 द्वारा (1-7-1959 से) और जो व्यवसाय कर रहा हो शब्दों का लोप किया गया
  7. 2012 के अधिनियम सं० 3 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित

6[(ङक) “अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है;]

 

1[(ङख) “भागीदार" का वही अर्थ होगा जो, यथास्थिति, भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) की धारा 4 या सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम, 2008 (2009 का 6) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में है;

 

(ङग) “भागीदारी" से निम्नलिखित अभिप्रेत है-

 

() भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) की धारा 4 में यथा परिभाषित भागीदारी; या

 

() ऐसी कोई सीमित दायित्व भागीदारी, जिसमें कोई कंपनी उसके भागीदारी के रूप में नहीं है;]

 

() विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

 

() “रजिस्टर" से इस अधिनियम के अधीन रखा गया सदस्यों का रजिस्टर अभिप्रेत है;

 

() रजिस्ट्रीकृत अकाउन्टेण्ट" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसका नाम संपरीक्षक प्रमाणपत्र नियम, 1932 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा रखे गए अकाउन्टेण्टों के रजिस्टर में प्रविष्ट है;

 

 2[(जक) “विनिर्दिष्ट" से इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट अभिप्रेत है;

 

1[(जकक) “एकमात्र स्वत्वधारी" से ऐसा कोई व्यष्टि अभिप्रेत है, जो अपने को लेखाकर्म के व्यवसाय में लगाता है या जो

 

उपधारा (2) के खंड (ii) से खंड (iv) में निर्दिष्ट सेवाओं को करने की प्रस्थापना करता है;]

 

(जख) “अधिकरण" से धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित अधिकरण अभिप्रेत है;]

 

() “वर्ष" से वह कालावधि अभिप्रेत है जो किसी वर्ष की पहली अप्रैल को प्रारंभ होती है और उत्तरवर्ती वर्ष के 31 मार्च को समाप्त होती है

 

(2) जबकि संस्थान का कोई सदस्य वैयक्तिक रूप से या 3[व्यवसायरत] चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों 1[या ऐसे अन्य मान्यता प्राप्त व्यवसायों के, जो विहित किए जाएं, सदस्यों] के साथ भागीदारी में प्राप्त हुए या प्राप्त होने वाले पारिश्रमिक के प्रतिफलस्वरूप, -

               

(i) अपने को लेखाकर्म के व्यवसाय में लगाता है; या

               

(ii) ऐसी सेवाएं जिनमें वित्तीय संव्यवहारी, बहियों, लेखाओं या अभिलेखों की संपरीक्षा या सत्यापन करना अथवा वित्तीय लेखा और सम्बद्ध कथनों की तैयारी, सत्यापन या प्रमाणीकरण अन्तर्वलित है, करने की प्रस्थापना करता है या वैसी सेवाएं करता है या उनका पालन करता है या अपने को लोक साधारण के समक्ष अकाउन्टेण्ट के रूप में प्रकट करता है; या

               

(iii)) लेखा प्रक्रिया से सम्बन्धित सैद्धान्तिक बातों या ब्यौरे के बारे में अथवा वित्तीय तथ्यों या आंकड़ों के अभिलेखन, प्रस्तुतीकरण या प्रमाणन के लिए अपनी वृत्तिक सेवाएं या सहायता करता है; या

 

 

  1. 2012 के अधिनियम सं० 3 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित
  3. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 3 द्वारा (1-7-1959 से) अंतःस्थापित

(iv) ऐसी अन्य सेवाएं करता है, जिनकी बाबत परिषद् की राय है कि वे 3[व्यवसाय करने वाले] चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट द्वारा की जाती हैं या की जा सकती हैं,

 

तब उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि वह व्यवसाय कर रहा है," तथा व्यवसाय कर रहा है" शब्दों का उनके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित तद्नुसार अर्थान्वयन किया जाएगा

 

 

स्पष्टीकरण-संस्थान का जो कोई सहयोगी या अध्येता 3[व्यवसाय करने वाले] किसी चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट या  [ऐसे चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की फर्म या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउंटेंट और विहित अर्हताओं वाले किसी अन्य वृत्तिक निकाय के सदस्यों से मिलकर बनी फर्म] का संबलम्ग्राही कर्मचारी है, उसकी बाबत यह बात कि वह व्यवसाय कर रहा हैं  [आबद्ध सहायकों को प्रशिक्षण] देने के सीमित प्रयोजन के लिए समझी जाएगी

अध्याय 2

भारतीय चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट संस्थान

 

3. संस्थान का निगमन-(1) वे सभी व्यक्ति, जिनका नाम इस अधिनियम के प्रारंभ पर रजिस्टर में प्रविष्ट है और वे सभी व्यक्ति, जिन्होंने अपने नाम इसके पश्चात् इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर में प्रविष्ट करवा लिए हों, एतद्द्वारा भारतीय चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट संस्थान के नाम से उस समय तक एक निगमित निकाय रहेंगे, जब तक वे अपने नाम उक्त रजिस्टर में बने रहने देते हैं और ऐसे सभी व्यक्ति संस्थान के सदस्यों के रूप में जाने जाएंगे

 

(2) संस्थान का शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उसे जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की सम्पत्ति को अर्जित करने, धारण करने और व्ययन करने की शक्ति प्राप्त होगी, और वह अपने नाम से वाद चला सकेगा या उसके नाम से उसके विरुद्ध वाद चलाया जा सकेगा

 

 

4. रजिस्टर में नामों की प्रविष्टि-(1) निम्नलिखित व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति इस रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाने का हकदार होगा, अर्थात्: -

 

 

(i) ऐसा कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रारंभ पर रजिस्ट्रीकृत अकाउन्टेण्ट या निर्बन्धित प्रमाणपत्र धारक है;

 

(ii) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है और ऐसा प्रशिक्षण पूरा कर लिया है जैसा संस्थान के सदस्यों के लिए विहित किया जाए;

 

(iii)) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने लेखाकर्म सम्बन्धी सरकारी डिप्लोमा की परीक्षा या ऐसी परीक्षा, जिसे इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व लेखाकर्म में सरकारी डिप्लोमा देने के लिए नियमों द्वारा उसके समतुल्य के रूप में मान्यता दी गई है, उत्तीर्ण की है, और जो, संपरीक्षक प्रमाणपत्र नियम, 1932 के अधीन अकाउन्टेण्ट के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने के लिए सम्यक् रूप से अर्हित होते हुए भी, ऐसी शर्तों की पूर्ति करता है जिन्हें केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;

 

 

(iv) ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के प्रारंभ में किसी भाग राज्य में लेखाकर्म के व्यवसाय में लगा है और जो संपरीक्षक प्रमाणपत्र नियम, 1932 के अधीन अकाउन्टेण्ट के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने के लिए अपेक्षित अर्हताएं रखते हुए भी, ऐसी शर्तें पूरी करता है, जिन्हें केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;

  1. 2012 के अधिनियम सं० 3 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित

1[(v) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने भारत के बाहर ऐसी अन्य परीक्षा उत्तीर्ण की है और ऐसा अन्य प्रशिक्षण पूरा किया है जिसे केन्द्रीय सरकार ने या परिषद् ने संस्थान के सदस्यों के लिए विहित परीक्षा और प्रशिक्षण के समतुल्य के रूप में मान्यता दी है:

परन्तु ऐसे किसी व्यक्ति के मामले में, जो स्थायी रूप से भारत में निवास नहीं कर रहा है, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या परिषद् ऐसी अतिरिक्त शर्तें अधिरोपित कर सकेगी, जैसी वह ठीक समझे;]

(vi) भारत में अधिवसित कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के प्रारंभ पर किसी विदेशी परीक्षा के लिए अध्ययन कर रहा है और साथ-साथ, चाहे भारत में या भारत के बाहर, प्रशिक्षण ले रहा है, या जो ऐसी विदेशी परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इस अधिनियम के प्रारंभ पर, चाहे भारत में या चाहे भारत के बाहर, प्रशिक्षण ले रहा हैः

परन्तु यह तब जब कि इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व संपरीक्षक प्रमाणपत्र नियम, 1932 के अधीन अकाउन्टेण्ट के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने के अधिकार को प्रदान करने के प्रयोजन के लिए, ऐसी कोई परीक्षा या ऐसा कोई प्रशिक्षण मान्यताप्राप्त है, और इसके अतिरिक्त इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् पांच वर्ष के अन्दर, ऐसा व्यक्ति उस परीक्षा को उत्तीर्ण कर लेता है या उस प्रशिक्षण को पूरा कर लेता है

(2) उपधारा (1) के खण्ड (i) में वर्णित वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति, कोई प्रवेश फीस दिए बिना, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाएगा

 

 2[(3) उपधारा (1) के खंड (ii), खंड (iii)), खंड (iv), खंड (v) और खंड (vi) में वर्णित वर्गों में से किसी वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति विहित रीति से आवेदन किए जाने और उसके मंजूर किए जाने पर और ऐसी फीस के संदाय पर, जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा, अवधारित की जाए जो तीन हजार रुपए से अधिक की नहीं होगी, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाएगाः

परन्तु परिषद्, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, तीन हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में छह हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ]

(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के खण्ड (i) में वर्णित वर्ग के सभी व्यक्तियों के नामों को रजिस्टर में प्रविष्ट करवाने के लिए ऐसी कार्यवाही करेगी जैसी इस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो

 

5. अध्येता और सहयुक्त-(1) संस्थान के सदस्यों को दो वर्गों में विभाजित किया जाएगा जिनको क्रमशः सहयुक्त और अध्येता अभिहित किया गया है

(2) किसी व्यक्ति का नाम रजिस्टर में प्रविष्ट हो जाने पर यह समझा जाएगा कि वह संस्थान का सहयुक्त सदस्य हो गया है और वह अपने नाम के आगे ए०सी०ए० अक्षरों को यह उपदर्शित करने के लिए प्रयोग करने का हकदार होगा कि वह व्यक्ति चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट संस्थान का सहयुक्त सदस्य है

 3[(3) ऐसा कोई भी सदस्य जो सहयुक्त है और जो चाहे इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या पश्चात् या चाहे भागतः इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व और भागतः उसके पश्चात् भारत में काम-से-कम पांच वर्ष तक लगातार व्यवसाय करता रहा है तथा ऐसा कोई सदस्य जो कम-से-कम पांच वर्ष की कालावधि तक लगातार सहयुक्त रहा है और साथ ही जिसकी ऐसी अर्हताएं हैं जैसी परिषद् यह सुनिश्चित करने की दृष्टि से विहित करे कि उसका अनुभव चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में पांच वर्ष की कालावधि तक के लगातार व्यवसाय करने के परिणामस्वरूप प्रसामान्यतः हो जाने वाले अनुभव के समतुल्य है, ऐसी फीस के संदाय पर, जो परिषद् द्वारा अधिसूचना द्वारा अवधारित की जाए, जो पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होगी और विहित रीति से आवेदन किए जाने और अनुज्ञात होने पर रजिस्टर में संस्थान के अध्येता के रूप में प्रविष्ट किया जाएगा और वह अपने नाम के आगे एफसीए अक्षरों का यह उपदर्शित करने के लिए प्रयोग करने का हकदार होगा कि वह व्यक्ति चार्टर्ड अकाउंटेंट संस्थान का अध्येता हैः

परंतु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से पांच हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में दस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ]

  1. 1955 के अधिनियम सं० 40 की धारा 2 द्वारा मूल खंड (v) के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित
  3. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित

6. व्यवसाय-प्रमाणपत्र-(1) संस्थान का कोई भी सदस्य, 1[चाहे भारत में या अन्यत्र] तब तक व्यवसाय करने का हकदार नहीं होगा, जब तक कि उसने परिषद् से व्यवसाय-प्रमाण पत्र अभिप्राप्त कर लिया हो

                 2[(2) प्रत्येक ऐसा सदस्य अपने प्रमाणपत्र के लिए ऐसी वार्षिक फीस देगा, जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा, अवधारित की जाए, जो तीन हजार रुपए से अधिक नहीं होगी और ऐसी फीस हर वर्ष में पहली अप्रैल को या उसके पूर्व देय होगीः

                परंतु परिषद् केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से तीन हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में छह हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ]

                 3[(3) उपधारा (1) के अधीन अभिप्राप्त किया गया व्यवसाय का प्रमाणपत्र परिषद् द्वारा ऐसी परिस्थितियों के अधीन, जो विहित की जाएं, रद्द किया जा सकेगा ]

 

7. सदस्यों का चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अभिधान से ज्ञान होना- 4[संस्थान का हर सदस्य, जो व्यवसाय कर रहा है, चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अभिधान प्रयुक्त करेगा और अन्य कोई सदस्य, यह अभिधान प्रयुक्त कर सकेगा और ऐसे अभिधान का प्रयोग करने वाला कोई सदस्य अन्य किसी अभिवर्णन का प्रयोग नहीं करेगा, भले ही वह उसके अतिरिक्त हो, या उसके बदले में हो:]

परन्तु इस धारा की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे किसी व्यक्ति को, ऐसे अन्य लेखाकर्म संस्थान की, चाहे वह भारत में हो या अन्यत्र हो, जो कि परिषद् द्वारा मान्यताप्राप्त हो, सदस्यता या अन्य कोई अर्हता जो उसके पास हो उपदर्शित करने के लिए अपने नाम के साथ किसी अन्य अभिवर्णन या अक्षर जोड़ने से प्रतिषिद्ध करती है, या किसी फर्म को जिसके सभी भागीदार संस्थान के सदस्य हैं और व्यवसाय कर रहे हैं, चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट फर्म के नाम से ज्ञात होने से प्रतिषिद्ध करती है

 

8. निर्योग्यताएं-धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट कराने या बनाए रखने का हकदार उस दशा में नहीं होगा जिसमें कि-

 

(i) उसने रजिस्टर में अपने नाम के प्रविष्ट किए जाने के लिए दिए गए आवेदन के समय पर इक्कीस वर्ष की आयु पूरी नहीं कर ली है, या

               

 5[(ii) वह विकृतचित्त है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा इस प्रकार न्यायनिर्णीत किया हुआ है, या]

               

(iii)) वह अनुन्मुक्त दिवालिया है, या

               

(iv) उसने उन्मोचित दिवालिया होने पर भी, न्यायालय ने ऐसा कथन करने वाला प्रमाणपत्र नहीं अभिप्राप्त किया है कि उसका दिवाला दुर्भाग्य से और उसके किसी अवचार के बिना निकला था, या

 

                (v) उसे, चाहे भारत में के या भारत के बाहर के किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, जिसमें नैतिक अधमता अन्तर्वलित है और जो निर्वासन, या कारावास से, दण्डनीय है या ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जो नाम को ही अपराध नहीं है, और जिसे उसने अपनी वृत्तिक हैसियत में किया है, तब के सिवाय, जब कि किए गए अपराध के बारे में या तो उसे क्षमा दे दी गई है या इस निमित्त उसके द्वारा दिए गए आवेदन पर केन्द्रीय सरकार ने लिखित आदेश द्वारा उस निर्योग्यता को दूर कर दिया है, या

 

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 5 द्वारा (1-7-1959 से) अंतःस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित
  3. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित
  4. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 6 द्वारा (1-7-1959 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित
  5. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 7 द्वारा (1-7-1959 से) पूर्ववर्ती खंड (ii) के स्थान पर प्रतिस्थापित

1[(vi) जांच पर यह निष्कर्ष निकलने पर कि वह वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है, उसे संस्थान की सदस्यता से हटा दिया गया हैः

परन्तु ऐसा व्यक्ति, जिसे किसी विनिर्दिष्ट कालावधि के लिए सदस्यता से हटा दिया गया है, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार तब तक नहीं होगा जब तक कि ऐसी कालावधि का अवसान हो गया हो ]

अध्याय 3

संस्थान की परिषद्

               

9. संस्थान की परिषद् का गठन-(1) संस्थान के कार्यकलाप के प्रबन्ध के लिए और इस अधिनियम के अधीन उसे समनुदेशित कृत्यों का निर्वहन करने के लिए एक परिषद् होगी

                 2[(2) परिषद् का गठन निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-

() बत्तीस से अनधिक व्यक्ति, जिनका निर्वाचन संस्थान के सदस्यों द्वारा संस्थान के उन अध्येताओं में से किया जाएगा जो ऐसी रीति से और ऐसे प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से चुने गए हैं जो विनिर्दिष्ट किए जाएंः

परंतु संस्थान का कोई अध्येता जिसे किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी पाया गया है और उसका नाम रजिस्टर से हटा दिया गया है या उस पर जुर्माने की शास्ति अधिनिर्णीत की गई है, यथास्थिति, रजिस्टर से नाम को हटाने की अवधि की समाप्ति से या जुर्माने के संदाय पर,-

(i) इस अधिनियम की पहली अनुसूची के अधीन आने वाले अवचार की दशा में तीन वर्ष की अवधि के लिए;

(ii) इस अधिनियम की दूसरी अनुसूची के अधीन आने वाले अवचार की दशा में, छह वर्ष की अवधि के लिए,

निर्वाचन लड़ने के लिए पात्र नहीं होगा;

() आठ से अनधिक व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट रीति में नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ]

                 3[(3) केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के अधीन पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति उपधारा (2) के खंड () के अधीन परिषद् के लिए निर्वाचन के लिए पात्र नहीं होगा

(4) ऐसा कोई व्यक्ति जो संस्थान का लेखापरीक्षक रहा है, उपधारा (2) के खंड () के अधीन परिषद् के निर्वाचन के लिए उसके लेखापरीक्षक रहने के पश्चात् तीन वर्ष की अवधि तक निर्वाचन के लिए पात्र नहीं होगा ]

 

 4[10. परिषद् के लिए पुनः निर्वाचन या पुनः नामानिर्देशन-धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन निर्वाचित या नामानिर्देशित परिषद् का कोई सदस्य, यथास्थिति, पुनःनिर्वाचन या पुनःनामनिर्देशन के लिए पात्र होगा :

                परंतु कोई भी सदस्य तीन से अधिक आनुक्रमिक अवधियों के लिए पद धारण नहीं करेगाः

                परंतु यह और कि परिषद् का ऐसा कोई सदस्य जो धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया जाता है या किया गया है, परिषद् के सदस्य के रूप में निर्वाचन या नामनिर्देशन के लिए पात्र नहीं होगा ]

                 1[10. निर्वाचन से संबंधित विवाद का निपटारा-धारा 9 की उपधारा (2) के खंड () के अधीन किसी निर्वाचन से संबंधित किसी विवाद की दशा में, व्यथित व्यक्ति निर्वाचन के परिणाम की घोषणा की तारीख से तीस दिन के भीतर संस्थान के सचिव को आवेदन कर सकेगा, जो उस आवेदन को केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित करेगी

 

10. अधिकरण की स्थापना-(1) धारा 10 के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे विवाद का विनिश्चय करने के लिए पीठासीन अधिकारी और दो अन्य सदस्यों से मिलकर बनने वाले अधिकरण की स्थापना करेगी और ऐसे अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा

(2) कोई व्यक्ति,-

() अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारतीय विधिक सेवा का सदस्य रहा है और उसने उस सेवा की श्रेणी 1 में कम से कम तीन वर्ष तक पद धारण किया है;

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 7 द्वारा (1-7-1959 से) पूर्ववर्ती खंड (ध्त्) के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित
  3. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 6 द्वारा अंतःस्थापित
  4. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित

() सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह परिषद् का कम से कम एक पूरी कालावधि के लिए सदस्य रहा है और जो परिषद् का आसीन सदस्य नहीं है या जो विवादाधीन निर्वाचन में कोई उम्मीदवार नहीं रहा है; या

 

() सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत सरकार के संयुक्त सचिव का पद या केंद्रीय सरकार के अधीन ऐसा कोई अन्य पद धारण कर रहा है जिसका वेतनमान भारत सरकार के सयुंक्त सचिव के वेतनमान से कम नहीं है

 

(3) अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें, उनके अधिवेशनों के स्थान और भत्ते वे होंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं

 

(4) अधिकरण के व्यय परिषद् द्वारा वहन किए जाएंगे ]

 

11. निर्वाचन या नामनिर्देशन किए जाने पर नामनिर्देशन-यदि धारा 9 में निर्दिष्ट व्यक्तियों का कोई निकाय परिषद् के सदस्यों में से ऐसे किसी का निर्वाचन करने में असफल रहता है जिसको वह उस धारा के अधीन निर्वाचित करने के लिए सशक्त है, तो रिक्ति की पूर्ति के लिए केन्द्रीय सरकार सम्यक् रूप से अर्हित व्यक्ति को नामनिर्देशित कर सकेगी और इस प्रकार नामनिर्देशित व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह परिषद् का ऐसे ही सदस्य है मानो उसका निर्वाचन सम्यक् रूप से हुआ हो

 

12. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-(1) परिषद् अपने पहले अदिवेशन में अपने सदस्यों में से दो सदस्यों को, क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष निर्वाचित करेगी, और जब-जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो, तब-तब परिषद् दूसरे व्यक्ति को, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में चुनेगीः

 

                परन्तु परिषद् के प्रथम गठन के समय केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित परिषद् का सदस्य, अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन तब तक करेगा, जब तक कि इस उपधारा के उपबन्धों के अधीन अध्यक्ष का निर्वाचन नहीं हो जाता

               

(2) अध्यक्ष परिषद् का मुख्य कार्यपालक प्राधिकारी होगा

               

(3) अध्यक्ष या उपाध्यक्ष उस तारीख से, जिसको उसे चुना गया है, एक वर्ष की कालावधि के लिए पद धारण करेगा, किन्तु यह कालावधि परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी पदावधि से आगे तक विस्तारित नहीं होगी और इस शर्त पर कि सुसंगत समय पर वह परिषद् का सदस्य हो, 2[वह उपधारा (1) के अधीन वह पुनर्निवाचन का पात्र होगा ]

 

1[(4) परिषद् के कार्यकाल के अवसान पर, परिषद् का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, जो ऐसे अवसान के समय अपने पद धारण किए हुए हैं अपने पद धारण किए रहेंगे तथा ऐसे प्रशासनिक और अन्य कर्तव्यों का जैसे विहित किए जाएं उस समय तक निर्वहन करते रहेंगे जिस समय तक नए अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का निर्वाचन नहीं हो जाता और वे अपने कर्तव्यों का भार नहीं संभाल लेते ]

 

13. सदस्यता से त्यागपत्र और आकस्मिक रिक्तियां-(1) परिषद् का कोई सदस्य अध्यक्ष को संबोधित हस्ताक्षरित लिखित पत्र द्वारा अपनी सदस्यता त्याग सकेगा, और ऐसे सदस्य का स्थान तब रिक्त हो जाएगा जब ऐसा त्यागपत्र राजपत्र में अधिसूचित किया गया हो

               

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित

 

 (2) परिषद् के सदस्य के बारे में यह बात कि उसने अपना स्थान रिक्त कर दिया है उस दशा में समझी जाएगी जिसमें कि परिषद् ने उसकी बाबत यह घोषणा कर ली हो कि पर्याप्त प्रतिहेतु के बिना वह परिषद् के तीन क्रमवर्ती 1[अधिवेशनों से अनुपस्थित रहा है, या वह किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी पाया गया है और उस पर जुर्माने की शास्ति अधिनिश्चित की गई है] अथवा धारा 20 के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर से उसका नाम किसी हेतुक से हटा दिया गया है

                (3) परिषद् में हुई आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, सम्बद्ध निर्वाचन-क्षेत्र से नए निर्वाचन के द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशन करके भरी जाएगी और रिक्ति भरने के लिए निर्वाचित या नामनिर्देशित व्यक्ति परिषद् का विघटन होने तक अपना पद धारण किए रहेगा:

                 2[परन्तु परिषद् के कार्यकाल के अवसान की तारीख से पूर्वगामी 1[एक वर्ष] के अन्दर होने वाली आकस्मिक रिक्ति भरने के लिए कोई निर्वाचन नहीं किया जाएगा, किन्तु ऐसी रिक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा परिषद् के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात् नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी ]

                (4) परिषद् द्वारा किया गया कोई कार्य परिषद् में कोई रिक्ति विद्यमान होने या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के आधार मात्र पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा

               

 

14. परिषद् का कार्यकाल और उसका विघटन- 3[(1)] इस अधिनियम के अधीन गठित किसी परिषद् का कार्यकाल उसके पहले अधिवेशन की तारीख से तीन वर्ष का होगा, जिसके अवसान पर परिषद् का विघटन हो जाएगा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार एक नई परिषद् गठित की जाएगी

                 4[(2) परिषद् के (जिसे इसमें इसके पश्चात् पूर्ववर्ती परिषद् कहा गया है) कार्यकाल का अवसान हो जाने पर भी पूर्ववर्ती परिषद् तब तक अपने कृत्यों का पालन करती रहेगी, जब तक कि इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार नई परिषद् गठित नहीं हो जाती तथा ऐसे गठन पर पूर्ववर्ती परिषद् विघटित हो जाएगी ]

               

 5[15. परिषद् के कृत्य-(1) संस्थान परिषद् के संपूर्ण नियंत्रण, मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण के अधीन कृत्य करेगा और इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने का कर्तव्य परिषद् में निहित होगा

               

(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिषद् के कर्तव्यों में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे :-

                                () शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और उनकी अंतर्वस्तुओं का अनुमोदन करना;

                                () नामावली में नाम प्रविष्ट किए जाने वाले अभ्यर्थियों की परीक्षा और उसके लिए फीस विहित करना;

                                () आबद्ध सहायकों और संपरीक्षा सहायकों के नियोजन और प्रशिक्षण का विनियमन;

                                () रजिस्टर में प्रविष्टि के लिए अर्हताएं विहित करना;

                                () नामावली में नाम प्रविष्ट किए जाने के प्रयोजन के लिए विदेशी अर्हताओं और प्रशिक्षण को मान्यता देना;

                                () इस अधिनियम के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अनुदत्त करना या इंकार करना;

               

() चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों के रूप में व्यवसाय करने के लिए अर्हित व्यक्तियों के रजिस्टर रखा जाना और उसका प्रकाशन;

                                () सदस्यों, परीक्षार्थियों और अन्य व्यक्तियों से फीस का उद्ग्रहण और संग्रहण;

                                () इस अधिनियम के अधीन समुचित प्राधिकारियों के आदेशों के अधीन रहते हुए रजिस्टर से नामों को काटना और रजिस्टर में ऐसे नामों को पुनः दर्ज करना, जिनको काट दिया गया है;

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 10 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 11 द्वारा (1-7-1959 से) जोड़ा गया
  3. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 12 द्वारा (1-7-1959 से) उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित
  4. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 12 द्वारा (1-7-1959 से) अंतःस्थापित
  5. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 11 द्वारा प्रतिस्थापित

() संस्थान के सदस्यों की वृत्तिक अर्हताओं की प्रतिष्ठा और स्तर को विनियमित करना और बनाए रखना;

                                () परिषद् के सदस्यों से भिन्न किन्हीं व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देकर या किसी अन्य रीति से लेखाकर्म में अनुसंधान कराना;

                                () किसी पुस्तकालय का अनुरक्षण और लेखाकर्म से संबंधित पुस्तकों और नियतकालिक पत्रिकाओं का प्रकाशन;

                                () निदेशक (अनुशासन), इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन गठित अनुशासन बोर्ड, अनुशासन समिति और अपील प्राधिकरण के कार्यकरण को समर्थ बनाना;

                                () क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड के कार्यकरण को समर्थ बनाना;

                                () धारा 28 के खंड () के अधीन की गई क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड की सिफारिशों पर विचार करना और अपनी वार्षिक रिपोर्ट में उस पर की गई कार्रवाई का ब्यौरा देना;

                                () इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में और समय-समय पर संस्थान को सौंपे गए अन्य कानूनी कर्तव्यों के अनुपालन में संस्थान के कार्यकरण को सुनिश्चित करना ]

               

 

 1[15. विश्वविद्यालयों और अन्य निकायों द्वारा शिक्षा प्रदान किया जाना-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विधि द्वारा स्थापित कोई विश्वविद्यालय या संस्थान से सहबद्ध कोई निकाय संस्थान के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के अंतर्गत आने वाले विषयों पर शिक्षा प्रदान कर सकेगा

 

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विश्वविद्यालय या निकाय, डिग्री, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र प्रदान करते समय या कोई पदनाम देते समय, यह सुनिश्चित करेंगे कि उक्त प्रमाणपत्र या पदनाम संस्थान द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र या पदनाम के सदृश हों या उसके समरूप हों

 

(3) इस धारा की कोई बात किसी विश्वविद्यालय या निकाय को ऐसा नाम या नामपद्धति अंगीकार करने के लिए समर्थ नहीं बनाएगी जो किसी रूप में संस्थान के नाम या नामपद्धति के समरूप है ]

               

 

 2[16. अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते आदि-(1) परिषद्, अपने कर्तव्यों के दक्षतापूर्ण पालन के लिए, -

() सचिव की ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्ति करेगी जो विहित किए जाएं;

                                () एक निदेशक (अनुशासन) की, ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्ति करेगी जो उसे इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों और विनियमों के अधीन समनुदेशित किए जाएं

 

(2) परिषद्, -

() ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को भी नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह आवश्यक समझे;

() सचिव से या किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी से अपने कर्तव्यों के सम्यक् पालन के लिए ऐसी प्रतिभूति की भी अपेक्षा कर सकेगी और ले सकेगी जिसे परिषद् आवश्यक समझे;

() अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, फीस, भत्ते और उनकी सेवा के निबंधन और शर्तें भी विहित कर सकेगी;

() केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से परिषद् के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों तथा अपनी समितियों के सदस्यों के भत्ते भी नियत कर सकेगी

               

(3) परिषद् का सचिव परिषद् के अधिवेशनों में भाग लेने का हकदार होगा, किन्तु उसमें वह मत देने का हकदार नहीं होगा ]

 

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 12 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 13 द्वारा प्रतिस्थापित

17. परिषद् की समितियां-(1) परिषद् अपने सदस्यों में से निम्नलिखित स्थायी समितियां गठित करेगी, अर्थात्ः-

(i) कार्यपालक समिति,

(ii) परीक्षा समिति, और

(iii)) 1[वित्त समिति ]

 

 2[(2) परिषद् अपने सदस्यों में से ऐसी अन्य समितियां भी बना सकेगी जो वह इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे और इस प्रकार बनाई गई कोई समिति, परिषद् की मंजूरी से समिति के एक तिहाई सदस्यों से अनधिक संस्थान के ऐसे अन्य सदस्यों को सहयोजित कर सकेगी जो वह ठीक समझे और इस प्रकार सहयोजित कोई सदस्य समिति के किसी सदस्य के सभी अधिकारों का प्रयोग करने का हकदार होगा

 

(3) प्रत्येक स्थायी समिति अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदेन और परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित किए जाने वाले कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक पांच सदस्यों से मिलकर बनेगी ]

 

(4) परिषद् का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष स्थायी समितियों में से हर एक का क्रमश= सभापति और उपसभापति होगा

 

(5) स्थायी समिति के सभापति और उपसभापति से भिन्न प्रत्येक सदस्य अपने निर्वाचन की तारीख से एक वर्ष के लिए पद धारण करेगा, किन्तु यदि वह परिषद् का सदस्य है तो वह पुनः निर्वाचन के लिए पत्र होगा

 

(6) स्थायी समितियां ऐसे कृत्यों का पालन करेंगी और उनके पालन में ऐसी शर्तों के अधीन रहेंगी जो विहित हों

 

18. परिषद् के वित्त-(1) परिषद् के प्रबन्ध और नियंत्रण के अधीन एक निधि स्थापित की जाएगी जिसमें वे सब धन-राशियां जो परिषद् को प्राप्त हुई हैं, जमा की जाएंगी और जिसमें से वे सब व्यय और दायित्व चुकाए जाएंगे जो परिषद् ने उचित रूप से उपगत किए हों

 

(2) परिषद् ऐसी कोई धनराशि जो तत्समय निधि खाते में जमा है किसी सरकारी प्रतिभूति में या किसी अन्य प्रतिभूति में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है, विनिहित कर सकेगी

 

 2[(3) परिषद् पूंजी को राजस्व से सुभिन्न करते हुए निधि का उचित लेखा विहित रीति में रखेगी

(4) परिषद् वित्तीय वर्ष के प्रारंभ होने से पूर्व, एक वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) विहित रीति में तैयार करेगी और उसका अनुमोदन करेगी जिसमें आगामी वर्ष के लिए उसके प्रत्याशित सभी राजस्व तथा तभी प्रस्तावित व्ययों को उपदर्शित किया जाएगा

(5) परिषद् के वार्षिक लेखे ऐसी रीति में तैयार किए जाएंगे जो विहित की जाए और वे परिषद् द्वारा हर वर्ष नियुक्त किए जाने वाले व्यवसायरत चार्टर्ड अकाउन्टेंट द्वारा संपरीक्षा किए जाने के अधीन होंगे:

परन्तु परिषद् का कोई सदस्य या ऐसा कोई व्यक्ति जो पिछले चार वर्ष के दौरान परिषद् का सदस्य रहा है या ऐसा व्यक्ति जो ऐसे सदस्य का भागीदार रहा है, इस उपधारा के अधीन लेखापरीक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगाः

परन्तु यह और कि यदि परिषद् की जानकारी में यह बात लाई जाती है कि परिषद् के लेखे उसके वित्त की सही और उचित स्थिति प्रदर्शित नहीं करते हैं तो परिषद् स्वयं एक विशेष लेखा संपरीक्षा करवा सकेगी:

परन्तु यह भी कि यदि केन्द्रीय सरकार द्वारा परिषद् को ऐसी सूचना भेजी जाती है कि परिषद् के लेखे उसकी वित्तीय स्थिति की सही और उचित स्थिति प्रदर्शित नहीं करते हैं तो परिषद्, जहां भी उपयुक्त हो, उसकी विशेष संपरीक्षा करा सकेगी या ऐसी अन्य कार्रवाई कर सकेगी जिन्हें वह आवश्यक समझे और उस पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को देगी

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 14 द्वारा प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 15 द्वारा प्रतिस्थापित

1[(5) परिषद् प्रत्येक वर्ष के अन्त में यथासाध्यशीघ्र अपने सदस्यों को कम-से-कम पंद्रह दिन पहले संपरीक्षित लेखे परिचालित करेगी और इस प्रयोजन के लिए बुलाए गए विशेष अधिवेशन में इन लेखाओं पर विचार करेगी और उनका                     अनुमोदन करेगी

 

(5) परिषद् आगामी वर्ष की सितम्बर की 30 तारीख के अपश्चात् परिषद् द्वारा सम्यक् रूप से अनुमोदित उस वर्ष की परिषद् की संपरीक्षित लेखे और रिपोर्ट की प्रति प्रकाशित कराएगी और उक्त लेखाओं और रिपोर्ट की प्रतियां केन्द्रीय सरकार और संस्थान के सभी सदस्यों को भेजी जाएंगी ]

 

(6) परिषद्-

               

() पूंजी खाते वाले अपने दायित्वों को चुकाने के वास्ते आवश्यक कोई धनराशि निधि की प्रतिभूति पर अथवा ऐसे किन्हीं आस्तियों की, जो तत्समय उसकी है, प्रतिभूति पर, या

               

() आय की प्राप्ति होने तक चालू दायित्वों को चुकाने के प्रयोजन के लिए अस्थायी उधार या ओवरड्राफ्ट के तौर पर कोई धनराशि,

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में यथापरिभाषित किसी अनुसूचित बैंक से या केन्द्रीय सरकार से उधार                       ले सकेगी

 

अध्याय 4

 

सदस्यों का रजिस्टर

               

19. रजिस्टर-(1) परिषद् संस्थान के सदस्यों का रजिस्टर विहित रीति से रखेगी

               

(2) रजिस्टर में संस्थान के प्रत्येक सदस्य के बारे में निम्नलिखित विशिष्टियां सम्मिलित की जाएंगी, अर्थात्ः-

                               

() उसका पूरा नाम, जन्म की तारीख, अधिवास, निवास-स्थान सम्बन्धी तथा वृत्तिक पत्ते;

               

() वह तारीख जिसको उसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया;

               

() उसकी अर्हताएं;

                               

() क्या उसके पास व्यवसाय प्रमाणपत्र है; और

               

() अन्य कोई विशिष्टियां, जो विहित की जाएं

               

 2[(3) परिषद् उन सदस्यों की सूची जो हर वर्ष की पहली अप्रैल को संस्थान के हैं, ऐसी रीति से प्रकाशित करवाएगी, जैसी विहित की जाए और यदि ऐसे किसी सदस्य द्वारा उससे इस बात का अनुरोध किया जाता है तो वह 3[ऐसी सूची की एक प्रति उसको ऐसी रकम के संदाय पर, जो विहित की जाए भेजेगी ]

 

 

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 15 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 17 द्वारा (1-7-1959 से) मूल उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 16 द्वारा प्रतिस्थापित

3[(4) संस्थान का प्रत्येक सदस्य, रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट किए जाने पर ऐसी वार्षिक सदस्यता फीस का संदाय करेगा जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा अवधारित की जाए, जो पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होगीः

                परंतु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, पांच हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में दस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ]

 

1[20. रजिस्टर से नाम का काट दिया जाना-(1) परिषद् रजिस्टर से संस्थान के ऐसे सदस्य का नाम काट सकेगी-

() जो मर गया है, या

() जिससे इस आशय का अनुरोध प्राप्त हुआ है, या

() जिसने ऐसी विहित फीस नहीं दी है जिसकी बाबत यह अपेक्षित है कि वह उस द्वारा दी जाए, या

() जो उस समय, जब उसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया था या जो उसके पश्चात् किसी भी समय, उन निर्योग्यताओं में से जो धारा 8 में वर्णित हैं, किसी से ग्रस्त हो गया है, या जो किसी अन्य कारण से इस बात का हकदार नहीं रह गया है कि रजिस्टर में उसका नाम बनाए रखा जाए

 

(2) परिषद् ऐसे किसी सदस्य का नाम रजिस्टर में से काट सकेगी जिसकी बाबत इस अधिनियम के अधीन यह आदेश पारित किया गया है कि उसे संस्थान की सदस्यता से हटा दिया गया है ]

 2[(3) यदि किसी सदस्य का नाम उपधारा (1) के खंड () के अधीन रजिस्टर से हटा दिया गया है तो आवेदन की प्राप्ति पर उसका नाम, अवधारित वार्षिक फीस और प्रवेश फीस के बकाया तथा ऐसी अतिरिक्त फीस के संदाय पर, जो परिषद् द्वारा अधिसूचना द्वारा अवधारित की जाए, जो दो हजार रुपए से अधिक नहीं होगी, रजिस्टर में पुनः प्रविष्ट किया जा सकेगाः

परन्तु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, दो हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में चार हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ]

 

3[अध्याय 5

अवचार

 4[21. अनुशासन निदेशालय-(1) परिषद् अधिसूचना द्वारा अनुशासन निदेशालय की स्थापना करेगी जिसका प्रमुख निदेशक (अनुशासन) के रूप में अभिहित संस्थान का कोई अधिकारी होगा और उसको प्राप्त इत्तिला या शिकायत के संबंध में अन्वेषण करने के लिए ऐसे अन्य कर्मचारी होंगे

(2) निदेशक (अनुशासन) विहित फीस के साथ किसी इत्तिला या शिकायत की प्राप्ति पर अभिकथित अवचार के घटित होने के बारे में किसी प्रथमदृष्टया राय पर पहुंचेगा

(3) जहां निदेशक (अनुशासन) की यह राय है कि कोई सदस्य पहली अनसूची में वर्णित किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां वह अनुशासन बोर्ड के समक्ष मामले को रखेगा और जहां निदेशक (अनुशासन) की यह राय है कि कोई सदस्य दूसरी अनुसूची या दोनों अनुसूचियों में वर्णित किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां मामले को अनुशासन समिति के समक्ष रखेगा

(4) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन अन्वेषण करने के लिए अनुशासन निदेशालय ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो विनिर्दिष्ट की जाए

(5) जहां कोई परिवादी परिवाद को वापस लेता है वहां निदेशक (अनुशासन) इस प्रकार वापस लेने को, यथास्थिति, अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति के समक्ष रखेगा और उक्त बोर्ड या समिति, यदि उसकी यह राय है कि परिस्थितियों में ऐसा वांछनीय है तो उसे किसी भी प्रक्रम पर वापस लेने की अनुज्ञा दे सकेगी ]

 

 

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 18 द्वारा (1-7-1959 से) मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 17 द्वारा अंतःस्थापित
  3. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 19 द्वारा (1-7-1959 से) मूल अध्याय 5 के स्थान पर प्रतिस्थापित
  4. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 18 द्वारा प्रतिस्थापित

1[21. अनुशासन बोर्ड-(1) परिषद् अनुशासन बोर्ड का गठन करेगी जिसमें निम्नलिखित व्यक्ति होंगे,-

() विधि में अनुभव रखने वाला ऐसा व्यक्ति जिसके पास अनुशासनिक विषयों और वृत्तिक ज्ञान हो, जो उसका पीठासीन अधिकारी होगा;

() दो ऐसे सदस्य जिनमें से एक सदस्य परिषद् द्वारा निर्वाचित परिषद् का सदस्य होगा और अन्य सदस्य विधि अर्थशास्त्र, कारबार, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले विख्यात व्यक्तियों में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामानिर्देशित किया जाएगा;

() निदेशक (अनुशासन) बोर्ड के सचिव के रूप में कार्य करेगा

(2) अनुशासन बोर्ड अपने समक्ष सभी मामलों के संबंध में संक्षिप्त निपटान प्रक्रिया का अनुसरण करेगा

(3) जहां अनुशासन बोर्ड की यह राय है कि कोई सदस्य पहली अनुसूची में वर्णित वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है, वहां वह उसके विरुद्ध कोई आदेश करने से पूर्व उस सदस्य को सुनवाई का अवसर देगा और उसके पश्चात् निम्नलिखित में से कोई एक या अधिक कार्रवाई कर सकेगा, अर्थात्ः-

() सदस्य को धिग्दण्ड देना;

() सदस्य के नाम को तीन मास की अवधि तक के लिए रजिस्टर से हटाना;

() ऐसा जुर्माना अधिरोपित करना जिसे वह ठीक समझे, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा

(4) निदेशक (अनुशासन), जहां उसकी यह राय है कि कोई प्रथमदृष्टया मामला नहीं है वहां अनुशासन बोर्ड के समक्ष सभी इत्तिला और परिवाद रखेगा और यदि अनुशासन बोर्ड, निदेशक (अनुशासन) की राय से सहमत हो तो मामले को बंद कर सकेगा या असहमति की दशा में निदेशक (अनुशासन) को मामले में आगे अन्वेषण करने की सलाह दे सकेगा

 

21. अनुशासन समिति-(1) परिषद् एक अनुशासन समिति का गठन करेगी जो पीठासीन अधिकारी के रूप में परिषद् के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष और परिषद् के सदस्यों में से निर्वाचित किए जाने वाले दो सदस्यों और केन्द्रीय सरकार द्वारा विधि, अर्थशास्त्र, कारबार, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले विख्यात व्यक्तियों में से नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले दो सदस्यों से मिलकर बनेगीः

परन्तु परिषद्, जब भी वह उचित समझे, अधिक अनुशासन समितियों का गठन कर सकेगी

(2) अनुशासन समिति, उसके समक्ष रखे गए मामलों पर विचार करते समय, ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी जो विनिर्दिष्ट की जाए

(3) जहां अनुशासन समिति की यह राय है कि कोई सदस्य दूसरी अनुसूची में या पहली अनुसूची और दूसरी अनुसूची, दोनों में वर्णित वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां वह उसके विरुद्ध कोई आदेश करने से पूर्व उस सदस्य को सुनवाई का अवसर देगा और उसके पश्चात् निम्नलिखित कोई एक या अधिक कार्यवाही करेगी, अर्थात्,:-

() सदस्य को धिग्दण्ड देना;

() सदस्य के नाम को स्थायी रूप से या ऐसी अवधि के लिए, जो वह ठीक समझे, रजिस्टर से हटाना;

() ऐसा जुर्माना अधिपोपित करना जो वह ठीक समझे, जो पांच लाख रुपए तक का हो सकेगा

(4) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट सदस्यों को संदेय भत्ते वे होंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं

 

21. प्राधिकरण अनुशासन समिति, अनुशासन बोर्ड और निदेशक (अनुशासन) को सिविल न्यायालय की शक्तियों का होना-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन जांच करने के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अनुशासन बोर्ड और निदेशक (अनुशासन) को निम्नलिखित विषयों की बाबत वे ही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्ः-

() किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

() किसी दस्तावेज का प्रकटीकरण और उसे पेश कराना; या

() शपथपत्र पर साक्ष्य लेना

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 19 द्वारा अंतःस्थापित

स्पष्टीकरण-धारा 21, धारा 21, धारा 21, धारा 21 और धारा 22 के प्रयोजनों के लिए, संस्थान के सदस्य" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो अभिकथित अवचार की तारीख को संस्थान का सदस्य था भले ही वह जांच के समय संस्थान का सदस्य रहा हो

21. संक्रमणकालीन उपबंध-चार्टर्ड अकाउंटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारंभ से पूर्व परिषद् के समक्ष लंबित सभी परिवादों या अनुशासन समिति द्वारा आरंभ की गई किसी जांच या उच्च न्यायालय को किए गए किसी निर्देश या अपील का, इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा इस प्रकार शासित होना जारी रहेगा मानो यह अधिनियम, चार्टर्ड अकाउंटेंट (संशोधनट अधिनियम, 2006 द्वारा संशोधित किया गया हो ]

 1[22. परिभाषित वृत्तिक या अन्य अवचार-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए वृत्तिक या अन्य अवचार" पद के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत ऐसा कोई कार्य या लोप आता है जो अनुसूचियों में से किसी अनुसूची में उपबंधित है, किन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किन्हीं अन्य परिस्थितियों में संस्थान के किसी सदस्य के आचरण की जांच करने के लिए धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन निदेशक (अनुशासन) को प्रदत्त शक्ति या उस पर अधिरोपित कर्तव्य को सीमित या कम करती है ]

  2[22. अपील प्राधिकरण का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा अपील प्राधिकरण का गठन करेगी जिसमें,-

() ऐसा व्यक्ति, जो किसी उच्च न्यायालय का अध्यक्ष है या रहा है या न्यायाधीश होने के लिए अर्हित है, इसका अध्यक्ष होगा;

() दो सदस्य ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जो परिषद् में कम से कम एक पूरी कालावधि के लिए सदस्य रहे हों और जो परिषद् का कोई आसानी सदस्य हो;

() दो सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से नामनिर्देशित किए जाएंगे जिनके पास विधि, अर्थशास्त्र, कारबार, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में ज्ञान और व्यवहारिक अनुभव है

(2) अध्यक्ष और अन्य सदस्य अंशकालिक सदस्य होंगे

 

22. प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि-(1) अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, तीन वर्ष की कालावधि के लिए या जब तक वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेगा

(2) सदस्य के रूप में नियुक्त व्यक्ति उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, तीन वर्ष की कालावधि के लिए या जब तक वह बासठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता, इनमें से जो पूर्वतर हो, पद धारण करेगा

 

22. प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों के भत्ते और सेवा की शर्तें-अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय भत्ते और उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें तथा परिषद् और ऐसे अन्य प्राधिकारियों द्वारा प्राधिकरण के व्यय को पूरा करने की रीति, वह होगी, जो विनिर्दिष्ट की जाए

 

22. प्राधिकरण द्वारा विनियमित की जाने वाली प्रक्रिया-(1) प्राधिकरण का कार्यालय दिल्ली में होगा

(2) प्राधिकरण अपनी स्वयं की प्रक्रिया को विनियमित करेगा

(3) प्राधिकरण के सभी आदेश और विनिश्चय इस निमित्त अध्यक्ष द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा अधिप्रमाणित किए जाएंगे

 

22. प्राधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारिवृन्द-(1) परिषद्, प्राधिकरण को उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारिवृन्द के सदस्य उपलब्ध कराएगी जितने प्राधिकरण के कृत्यों के दक्ष अनुपालन के लिए आवश्यक हों

(2) प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृन्द के सदस्यों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 20 द्वारा प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 21 द्वारा प्रतिस्थापित

22. अध्यक्ष और सदस्यों का पदत्याग और उनका हटाया जाना-(1) अध्यक्ष या कोई सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर के अधीन लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगाः

 

परंतु अध्यक्ष या सदस्य, जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा अपना पद पहले त्यागने के लिए अनुमति नहीं दी जाती, अपना पद तब तक, जब तक कि ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास समाप्त नहीं हो जाते या उसके उत्तराधिकारी के रूप में सम्यक् रूप में नियुक्त व्यक्ति अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता या उसकी पदावधि समाप्त नहीं हो जाती, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, धारण करता रहेगा

 

 

(2) अध्यक्ष या सदस्य को अपने पद से साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर केंद्रीय सरकार के ऐसे आदेश के सिवाय नहीं हटाया जाएगा, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसे इस प्रयोजन के लिए नियुक्त किया जाए, की गई ऐसी जांच के पश्चात् किया गया हो, जिसमें संबंधित अध्यक्ष या सदस्य को उसके विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गई हो और ऐसे आरोपों के संबंध में सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो

 

 

22. प्राधिकरण को अपील-(1) धारा 21 की उपधारा (3) और धारा 21 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोई शास्ति उस पर अधिपोपित करने वाले अनुशासन बोर्ड या अनुशास समिति के किसी आदेश से व्यथित संस्थान का कोई सदस्य, उस तारीख से, नब्बे दिन के भीतर जिसको उसे आदेश संसूचित किया जाता है, प्राधिकरण को अपील कर सकेगा:

 

 

परन्तु निदेशक (अनुशासन), यदि परिषद् द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत किया गया हो, प्राधिकरण को अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति के विनिश्चय के विरुद्ध नब्बे दिन के भीतर अपील कर सकेगा:

 

 

परंतु यह और कि प्राधिकरण, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि समय के भीतर अपील फाइल करने के लिए पर्याप्त कारण था, नब्बे दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् कोई अपील ग्रहण कर सकेगा

 

 

(2) प्राधिकरण, किसी मामले के अभिलेख को मंगाने के पश्चात्, धारा 21 की उपधारा (3) और धारा 21 की उपधारा (3) के अधीन अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति द्वारा किए गए किसी आदेश को पुनरीक्षित कर सकेगा और-

 

 

() आदेश की पुष्टि कर सकेगा, उसे उपांतरित या अपास्त कर सकेगा;

 

 

() कोई शास्ति अधिरोपित कर सकेगा या आदेश द्वारा अधिरोपित शास्ति को अपास्त कर सकेगा, उसे कम कर सकेगा या उसमें वृद्धि कर सकेगा;

 

() मामले को अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति को ऐसी और जांच किए जाने के लिए प्रति प्रेषित कर सकेगा जिसे प्राधिकरण मामले की परिस्थितियों में उचित समझे; या

 

() ऐसा अन्य आदेश पारित कर सकेगा जिसे प्राधिकरण ठीक समझेः

परंतु प्राधिकरण कोई आदेश पारित करने के पूर्व संबंधित पक्षकारों को सुने जाने का अवसर देगा ]

 

अध्याय 6

प्रादेशिक परिषद्

23. प्रादेशिक परिषद् का गठन और उसके कृत्य-(1) 1[अपने कृत्यों में सम्बन्धित बातों के बारे में सलाह देने और सहायता करने के प्रयोजन के लिए परिषद्] उन प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में से जो केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 9 की उपधारा (2) के खण्ड () के अधीन विनिर्दिष्ट किए जाएं, एक या अधिक के लिए 1[प्रादेशिक परिषदें तब-तब गठित कर सकेगीट जब-जब वह ऐसा करना ठीक समझती है

 

(2) प्रादेशिक परिषद् ऐसी रीति से गठित की जाएंगी और ऐसे कृत्यों का पालन करेंगी जैसे विहित किए जाएं

 

अध्याय 7

शास्तियां

 

24. सदस्य, इत्यादि होने का झूठा दावा करने के लिए शास्ति-जो कोई व्यक्ति-

                (i) संस्थान का सदस्य होते हुए-

                                () यह व्यपदेशन करेगा कि मैं संस्थान का सदस्य हूं, या

                                () चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अभिधान प्रयुक्त करेगा, या

 

(ii) संस्थान का सदस्य होते हुए किन्तु व्यवसाय प्रमाणपत्र रखते हुए यह व्यपदेशन करेगा कि मैं चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट का व्यवसाय कर रहा हूं या उस रूप में व्यवसाय करता हूं,

वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा

 

2[24. परिषद् के नाम का प्रयोग करने, चार्टर्ड लेखाकार्य की डिग्रियां देने इत्यादि के लिए शास्ति-(1) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, कोई भी व्यक्ति-

 

(i) ऐसे नाम या सामान्य मुद्रा का प्रयोग नहीं करेगा, जो संस्थान के नाम या सामान्य मुद्रा के सर्वदा समान या उससे इतनी निकट से मिलती-जुलती है कि लोक साधारण धोखे में पड़ जाएंगे या उनका धोखे में पड़ जाना संभाव्य है;

 

(ii) ऐसी कोई उपाधि, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र नहीं देगा या ऐसा पदाभिधान प्रदान नहीं करेगा जिससे यह उपदर्शित होता है या उपदर्शित होना तात्पर्यित है कि ऐसी अर्हता या सक्षमता उसके पास है या उसने प्राप्त कर ली है जो संस्थान के सदस्य के अर्हता या सक्षमता के सदृश है; या

 

(iii)) किसी भी रीति से चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की वृत्ति को विनियमित करने का प्रयास नहीं करेगा

(2) ऐसा कोई व्यक्ति जिसने उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन किया है, किन्हीं अन्य कार्यवाहियों पर, जो उसके विरुद्ध की जा सकती हों, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जुर्माने से, जो प्रथम दोषसिद्धि पर एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और पश्चात्वर्ती किसी दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ]

1                                                                                                                                        

25. कम्पनियों का लेखाकर्म में लगना-(1) कोई भी कम्पनी, चाहे वह भारत में या अन्यत्र निगमित हो, चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों के रूप में व्यवसाय नहीं करेगी

 

 

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 20 द्वारा (1-7-1959 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 21 द्वारा (1-7-1959 से) अंतःस्थापित

2[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है किकंपनी" के अंतर्गत कोई ऐसी सीमित दायित्व भागीदारी भी होगी, जो इस धारा के प्रयोजनों के लिए उसके भागीदारों के रूप में कंपनी है ]

(2) यदि कोई कम्पनी उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगी तो ऐसी किन्हीं अन्य कार्यवाहियों पर, जो कम्पनी के विरुद्ध की जा सकती हों, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसका प्रत्येक निदेशक, प्रबन्धक, सचिव और अन्य कोई अधिकारी, जो ऐसे उल्लंघन का जानबूझकर पक्षकार है, जुर्माने से, जो प्रथम दोषसिद्धि पर एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा

 

26. अनर्हित व्यक्तियों द्वारा दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किया जाना-(1) संस्थान के सदस्य से भिन्न कोई व्यक्ति 3[व्यवसाय करने वाले किसी चार्टर्ड अकाउन्टेण्टट की ओर से या 4[ऐसे चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की फर्म] की ओर से अपनी या फर्म की वृत्तिक हैसियत में किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं करेगा

 5[(2) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन किया है, किन्हीं अन्य कार्रवाइयों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो उसके विरुद्ध की जा सकती हों, पहली दोषसिद्धि पर ऐसे जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, और दूसरी या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो दस लाख रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से दंडनीय होगा ]

 

27. शाखा कार्यालयों का रखा जाना-(1) जहां कि 1[व्यवसाय करने वाले किसी चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट] के या 2[ऐसे चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की फर्म] के एक से अधिक कार्यालय भारत में हैं वहां ऐसे कार्यालयों में से प्रत्येक कार्यालय संस्थान के किसी सदस्य के पृथक् भारसाधन में होगाः

परन्तु परिषद् 1[व्यवसाय करने वाले किसी चार्टर्ड अकाउन्टेंटट को या 2[ऐसे चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की फर्म] को इस उपधारा के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी

(2) 1[व्यवसाय करने वाला] या प्रत्येक 1[चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट] या 2[ऐसे चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों की फर्म] जो एक से अधिक कार्यालय रखते हों, परिषद् को कार्यालयों और उसके भारसाधन करने वाले व्यक्तियों की एक सूची भेजेगी और उनके सम्बन्ध में होने वाले परिवर्तनों से अवगत रखेगी

 

28. अभियोजन के लिए मंजूरी-इस अधिनियम के अधीन कोई व्यक्ति, परिषद् या केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए परिवाद पर या आदेश के अधीन अभियोजित किए जाने के सिवाय, अभियोजित नहीं किया जाएगा

6[अध्याय 7

क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड

28. क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड की स्थापना-(1) केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड का गठन करेगी जिसमें एक अध्यक्ष और दस अन्य सदस्य होंगे

(2) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति ऐसे विख्यात व्यक्तियों में से की जाएगी जो विधि, अर्थशास्त्र, कारबार, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में अनुभव रखते हों

(3) बोर्ड के पांच सदस्य परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे और अन्य पांच सदस्य केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे

28. बोर्ड के कृत्य-बोर्ड, निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्ः-

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 22 द्वारा लोप किया गया
  2. 2012 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित
  3. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 22 द्वारा (1-7-1959 से) चार्टर्ट अकाउंटेंट के स्थान पर प्रतिस्थापित
  4. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 22 द्वारा (1-7-1959 से) चार्टर्ड अकाउंटेंट की फर्म के स्थान पर प्रतिस्थापित
  5. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 23 द्वारा प्रतिस्थापित
  6. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 24 द्वारा अंतःस्थापित

() संस्थान के सदस्यों द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए क्वालिटी के संबंध में परिषद् को सिफारिश करना;

() संस्थान के सदस्यों द्वारा प्रदान की गई सेवाओं की, जिनके अंतर्गत संपरीक्षा सेवाएं भी हैं, क्वालिटी का पुनर्विलोकन करना; और

() सेवाओं की क्वालिटी में सुधार करने और विभिन्न कानूनी और अन्य विनियामक अपेक्षाओं का पालन करने के लिए संस्थान के सदस्यों का मार्गदर्शन करना

 

28. बोर्ड की प्रक्रिया-बोर्ड ऐसे समय और स्थान पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो विनिर्दिष्ट की जाए

 

28. बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें और उनका व्यय-(1) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें और उनके भत्ते वे होंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं

(2) बोर्ड का व्यय परिषद् द्वारा वहन किया जाएगा ]

 

अध्याय 8

प्रकीर्ण

 

29. पारस्परिकता-(1) जहां कि केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट कोई देश भारत में अधिवास करने वाले व्यक्तियों को भारत के चार्टर्ड अकाउन्टेण्टों के संस्थान के समान किसी संस्थान के सदस्य बनने से या लेखाकर्म की वृत्ति का व्यवसाय करने से निवारित करता है या उस देश में उनके प्रति अनुचित भेदभाव बरतता है, वहां ऐसे किसी देश का नागरिक भारत में संस्थान का सदस्य का होने या लेखाकर्म की वृत्ति का व्यवसाय करने के लिए हकदार नहीं होगा

 

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन होते हुए, परिषद् वे शर्तें, यदि कोई हों, विहित कर सकेगी, जिन पर लेखाकर्म संबंधी विदेशी अर्हताओं को रजिस्टर में प्रविष्ट किए जाने के प्रयोजन के लिए मान्यता दी जाएगी

 

 1[29. केंद्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी

 

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध सकेंगे, अर्थात्ः-

 

() धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन परिषद् के सदस्यों के निर्वाचन और नामनिर्देशन की रीति;

() धारा 10 की उपधारा (3) के अधीन अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें, अधिवेशनों के स्थान और उनको संदत्त किए जाने वाले भत्ते;

() धारा 21 की उपधारा (4) के अधीन अन्वेषण की प्रक्रिया;

() धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन अनुशासन समिति द्वारा मामलों पर विचार किए जाते समय प्रक्रिया और उपधारा (4) के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्यों के भत्तों का नियतन;

() धारा 22 के अधीन प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों के भत्ते और सेवा के निबंधन और शर्तें तथा परिषद् द्वारा व्यय को पूरा करने की रीति;

() धारा 28 के अधीन बोर्ड द्वारा अपने अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया; और

() धारा 28 की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें ]

 

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 25 द्वारा अंतःस्थापित

30. विनियम बनाने की शक्ति-(1) परिषद् इस अधिनियम के उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के लिए विनियम भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी 1॥।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी बातों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-

                () इस अधिनियम के अधीन परीक्षाओं का स्तर और संचालन;

                () संस्थान के सदस्य के रूप में रजिस्टर में किसी व्यक्ति का नाम प्रविष्ट करने के लिए अर्हताएं;

                () वे शर्तें, जिन पर किसी परीक्षा या प्रशिक्षण को संस्थान के सदस्यों के लिए विहित परीक्षा और प्रशिक्षण के समतुल्य समझा जाएगा;

() वे शर्तें, जिन पर किसी विदेशी अर्हता को मान्यता दी जा सकेगी;

() वह रीति, जिससे और वे शर्तें जिन पर रजिस्टर में प्रविष्ट किए जाने के लिए आवेदन किए जा सकेंगे;

() संस्थान की सदस्यता के लिए देय फीस और अपने प्रमाणपत्रों के बारे में संस्थान के सहयुक्तों और अध्येताओं द्वारा देय वार्षिक फीस;

() वह रीति, जिससे 2॥। प्रादेशिक परिषदों के लिए निर्वाचन किए जाने हैं;

() रजिस्टर में प्रविष्ट की जाने वाली विशिष्टियां;

() प्रादेशिक परिषदों के कृत्य;

 2[() आबद्ध 3[सहायकों] और संपरीक्षा 4[सहायकों] का प्रशिक्षण, वे सीमाएं नियत करना जिनके अन्दर आबद्ध 4[सहायकों] से शुल्क प्रभार्य किया जा सकेगा और अवचार या किसी अन्य पर्याप्त कारण से बन्धपत्रों का रद्द किया जाना और संपरीक्षा सेवा का पर्यवसान;]

() संस्थान के सदस्यों की वृत्तिक अर्हताओं की प्रतिष्ठा और स्तर का विनियमन और बनाए रखा जाना;

() लेखाकर्म में अनुसंधान;

() लेखाकर्म सम्बन्धी पुस्तकालय रखा जाना और पुस्तकों और नियतकालिक पत्रिकाओं का प्रकाशन;

() परिषद् की सम्पत्ति का प्रबन्ध और उसके लेखाओं का रखा जाना ओर उनकी संपरीक्षा;

() परिषद् के अधिवेशनों का बुलाया जाना और उनका किया जाना, ऐसे अधिवेशनों के समय और स्थान, उनमें किए जाने वाले कामकाज का संचालन और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्यों की संख्या;

() परिषद् के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां, कर्तव्य और कृत्य;

() स्थायी और अन्य समितियों के कृत्य और वे शर्तें जिन पर ऐसे कृत्यों का निर्वहन किया जाएगा;

() परिषद् के सचिव और अन्य अधिकारियों और सेवकों की पदावधियां, और शक्तियां, कर्तव्य और कत्य; 4[और]

5                                                                                                                                        

() कोई अन्य बात जिसका इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित की जाए

 

 (3) इस अधिनियम के अधीन परिषद् द्वारा बनाए गए सभी विनियम पूर्व प्रकाशन और केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन की शर्त के अधीन होंगे

 

(4) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी उन प्रयोजनों के लिए जो इस धारा में वर्णित हैं, केन्द्रीय सरकार सर्वप्रथम विनियम बना सकेगी, और ऐसे विनियमों को परिषद् द्वारा बनाया गया समझा जाएगा, और वे इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख से तब तक प्रवृत्त रहेंगे, जब तक कि परिषद् द्वारा उन्हें संशोधित, परिवर्तित या प्रतिसंहृत नहीं कर दिया जाता

 

  1. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 26 द्वारा लोप किया गया
  2. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 23 द्वारा (1-7-1959 से) मूल खंड () के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 26 द्वारा प्रतिस्थापित
  4. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 26 द्वारा अंतःस्थापित
  5. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 26 द्वारा लोप किया

 1[30. विनियम बनाने के लिए निदेश देने या विनियम बनाने या उन्हें संशोधित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्तियां-(1) जहां कि केन्द्रीय सरकार ऐसा करना समीचीन समझती है, वहां वह लिखित आदेश द्वारा परिषद् को यह निदेश दे सकेगी कि इतनी कालावधि के अन्दर, जैसी वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, विनियम बनाए जाएं या पहले से बने किन्हीं विनियमों को संशोधित या प्रतिसंहृत किया जाए

(2) यदि विनिर्दिष्ट कालावधि के अन्दर परिषद् ऐसे आदेश का अनुपालन करने में असफल रहती है या उसकी उपेक्षा करती है तो, यथास्थिति, या तो आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट प्ररूप में या उसमें ऐसे उपान्तरणों सहित जैसे केन्द्रीय सरकार ठीक समझती है, उक्त सरकार विनियम बना सकेगी या परिषद् द्वारा बनाए गए विनियमों को संशोधित या प्रतिसंहृत कर सकेगी ]

 2[30. नियमों, विनियमों और अधिसूचनाओं का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम और जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी यह अवधि एक सत्र अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, विनियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम, विनियम या अधिसूचना नहीं बनाया जाना चाहिए या जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा/जाएगी किन्तु नियम, विनियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

 3[31. केन्द्रीय सरकार की निदेश जारी करने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के किसी उपबंध में परिषद् द्वारा अननुपालन की दशा में केन्द्रीय सरकार परिषद् को ऐसे साधारण या विशेष निदेश दे सकेगी जो वह अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक समझे और परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में ऐसे निदेशों का पालन करेगी

(2) यदि, केन्द्रीय सरकार की राय में, परिषद् ने उपधारा (1) के अधीन जारी निदेशों को कार्यान्वित करने में लगातार व्यतिक्रम किया है तो वह परिषद् को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् अधिसूचना द्वारा परिषद् का विघटन कर सकेगी जिसके पश्चात् ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चित की जाए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नई परिषद् का गठन किया जाएगाः

परन्तु केन्द्रीय सरकार इसके विघटन की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार एक नई परिषद् के गठन को सुनिश्चित करेगी

(3) जहां केन्द्रीय सरकार ने उपधारा (2) के अधीन परिषद् का विघटन करने वाली अधिसूचना जारी की है वहां वह, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नई परिषद् के गठन के लंबित रहने के दौरान इस अधिनियम के अधीन परिषद् के कार्यों का प्रबंध करने और सभी या किन्हीं कृत्यों का निर्वहन करने के लिए किसी व्यक्ति को या पांच सदस्यों से अनधिक व्यक्ति निकाय को नामनिर्देशित करेगी

31. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, जारी की गई किसी अधिसूचना, निदेश या आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या परिषद् या प्राधिकरण या अनुशासन समिति या अधिकरण या बोर्ड या अनुशासन बोर्ड या अनुशासन निदेशालय या उस सरकार, परिषद्, प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अधिकरण, बोर्ड, अनुशासन बोर्ड या अनुशासन निदेशालय के किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी

 

31. सदस्यों आदि का लोक सेवक होना-प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अधिकरण, बोर्ड, अनुशासन बोर्ड या अनुशासन निदेशालय के अध्यक्ष, पीठासीन अधिकारी, सदस्य और अन्य अधिकारी और कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ]

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 24 द्वारा (1-7-1959 से) अंतःस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 27 द्वारा प्रतिस्थापित
  3. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 28 द्वारा अंतःस्थापित

1[31. निर्देशों का अर्थ लगाना-किसी अन्य विधि में या किसी भी दस्तावेज में, चाहे वह कैसी ही क्यों हो, जो कोई निर्देश चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट के प्रति या रजिस्ट्रीकृत अकाउन्टेण्ट के प्रति या प्रमाणित या अर्हित संपरीक्षक के प्रति हैं, उनका अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे इस अधिनियम के अर्थ के अन्दर व्यवसाय करने वाले चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट के प्रति निर्देश हैं ]

32. भाग राज्यों में इस प्रकार व्यवसाय करने के लिए लेखापालों के अधिकार पर यह अधिनियम कोई प्रभाव नहीं डालेगा-इस अधिनियम में किसी बात से किसी व्यक्ति के जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर स्वयं किसी भाग राज्य में लेखाकर्म के व्यवसाय में स्वंय लगने के वास्ते उस राज्य में प्रवृत्त विधि के अधीन हकदार है, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् भी लेखाकर्म का व्यवसाय चालू रखने के अधिकार पर प्रभाव नहीं पड़ेगा

33. [इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 की धारा 144 का संशोधन ] निरसन और संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का अधिनियम सं० 48) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित  

2[पहली अनुसूची

[धारा 21(3), धारा 21 (3) और धारा 22 देखिए]

भाग 1

व्यवसाय करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट के संबंध में वृत्तिक अवचार

व्यवसाय करने वाला कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट वृत्तिक अवचार का दोषी उस दशा में समझा जाएगा, जिसमें कि वह-

(1) किसी व्यक्ति को अपने नाम से किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में व्यवसाय करने के लिए तब अनुज्ञात करता है, जब कि ऐसा व्यक्ति भी व्यवसाय करने वाला चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं है और उसके साथ भागीदारी में या उसके नियोजन में नहीं है;

(2) संस्थान के सदस्य से या भागीदार से या भागीदारी से अलग हो गए किसी भागीदार से या किसी मृतक भागीदार के विधिक प्रतिनिधि से या किसी अन्य वृत्तिक निकाय के सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति को या ऐसी अर्हता जो भारत में या भारत से बाहर समय-समय पर ऐसी वृत्तिक सेवाएं देने के प्रयोजन के लिए विहित की जाएं, रखने वाले अन्य व्यक्ति को अपने वृत्तिक कारबार की फीस या लाभ में कोई अंश, कमीशन या दलाली प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संदाय करता है या संदाय करने के लिए अनुज्ञात करता है या संदाय करने या अनुज्ञात करने के लिए सहमत होता है

 

स्पष्टीकरण-इस मद मेंभागीदार" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति है जो भारत के बाहर निवासी है और जिसके साथ व्यवसाय करने वाला कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट ऐसी भागीदारी में शामिल हो गया है जो इस भाग की मद (4) का उल्लंघन नहीं करती है;

(3) किसी ऐसे व्यक्ति के, जो संस्थान का सदस्य नहीं है, वृत्तिक कार्य के लाभों का कोई भाग प्रतिगृहीत करता है या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत होता हैः

परन्तु इसमें अंतर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह, किसी सदस्य को, ऐसे वृत्तिक निकाय के किसी सदस्य या अन्य व्यक्ति के साथ, जिसके पास इस भाग की मद (2) में, निर्दिष्ट अर्हताएं हैं, लाभ में हिस्सा बंटाने या उसी प्रकार की अन्य व्यवस्था में जिसके अन्तर्गत फीसों में अंश, कमीशन या दलाली प्राप्त करना भी है, शामिल होने से प्रतिषिद्ध करने वाली है;

 

(4) व्यवसाय करने वाले किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से भिन्न किसी व्यक्ति के साथ या ऐसे अन्य व्यक्ति के साथ जो किसी अन्य वृत्तिक निकाय का सदस्य है और जिसके पास ऐसी अर्हताएं हैं, जो विहित की जाएं, जिसमें ऐसा निवासी भी है, जो कि विदेश में अपने निवास के कारण धारा 4 की उपधारा (1) के खंड (v) के अधीन संस्थान के सदस्य के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने का हकदार होता या जिसकी अर्हताओं को ऐसी भागीदारियों को अनुज्ञात करने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार या परिषद् द्वारा मान्यता दी गई है, भारत में या भारत से बाहर भागीदारी में शामिल होता है

(5) ऐसे व्यक्ति की जो ऐसे चार्टर्ड अकाउंटेंट का कोई कर्मचारी नहीं है या जो उसका भागीदार नहीं है, सेवाओं द्वारा या ऐसे साधनों द्वारा, जिन्हें उपयोग करना किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट के लिए अनुज्ञेय नहीं है, कोई वृत्तिक कारबार प्राप्त करता हैः

परन्तु इसमें अन्तर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि कि वह इस भाग की मद (2), मद (3) और मद (4) के निबंधनों के अनुसार किसी व्यवस्था को प्रतिषिद्ध करने वाला है; या

  1. 1959 के अधिनियम सं० 15 की धारा 25 द्वारा (1-7-1959 से) मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 2006 के अधिनियम सं० 9 की धारा 29 द्वारा प्रतिस्थापित

(6) परिपत्र, विज्ञापन, वैयक्तिक पत्र-व्यवहार या साक्षात्कार या किसी अन्य साधन द्वारा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यवहारी से या वृत्तिक कार्य के पाने के लिए याचना करता हैः

परन्तु इसमें अन्तर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि,-

                (i) किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट को, व्यवसाय करने वाले अन्य चार्टर्ड अकाउंटेंट से वृत्तिक कार्य के लिए आवेदन करने या अनुरोध करने या आमंत्रित करने या अभिप्राप्त करने से उसे;

                (ii) किसी सदस्य को समय-समय पर वृत्तिक सेवाओं के विभिन्न उपयोगकर्ताओं या संगठनों द्वारा जारी की गई निविदाओं या जांच का उत्तर देना और उसके परिणामस्वरूप वृत्तिक कार्य प्राप्त करने से,

निवारित या प्रतिषिद्ध करने वाली है;

                (7) अपनी वृत्तिक उपलब्धियों या सेवाओं का विज्ञापन या वृत्तिक दस्तावेजों, परिचय कार्डों, पत्र शीर्षकों या नाम पट्टों पर चार्टर्ड अकाउंटेंट से भिन्न अभिधान या पदों का प्रयोग तब करता है जब उसके पास वह भारत में विधि द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की या केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यताप्त प्राप्त उपाधि नहीं है या भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट संस्थान की या किसी अन्य संस्था की सदस्यता उपदर्शित करने वाली ऐसी उपाधि नहीं है जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यता दी गई है या जिसे परिषद् द्वारा मान्यता दी जाएः

                परन्तु व्यवसाय करने वाला कोई सदस्य उसके या उसकी फर्म द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाली सेवाओं और उसकी फर्म की विशिष्टियां, ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों के अधीन रहते हुए जो परिषद् द्वारा जारी किए जाएं, उपवर्णित करते हुए किसी लेख के माध्यम से विज्ञापन कर सकेगा;

                (8) लेखापरीक्षक के रूप में ऐसा कोई ओहदा, जो तत्पूर्व किसी अन्य चार्टर्ड अकाउंटेंट या किसी अधिप्रमाणित लेखापरीक्षक द्वारा धारित था, वे जिसे निर्बंधित प्रमाणपत्र नियम, 1932 के अधीन प्रमाणपत्र जारी किया गया था पहले उससे लिखित में उसे संसूचित किए बिना स्वीकार करता है;

                (9) किसी कंपनी से पहले यह सुनिश्चित किए बिना कि क्या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 225 की अपेक्षाओं का ऐसी नियुक्ति के संबंध में सम्यक् रूप से अनुपालन हो गया है उसके संपरीक्षक के रूप में कोई नियुक्ति स्वीकार करता है;

                (10) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी विनियम के अधीन अनुज्ञात के सिवाय किसी वृत्तिक नियोजन के संबंध में ऐसी फीस, जो लाभों के प्रतिशत पर आधारित है या जो ऐसे नियोजन के निष्कर्षों या परिणामों पर समाश्रित हैं, प्रभारित करता है या प्रभारित करने की प्रस्थापना करता है या प्रतिगृहीत करता है या प्रतिगृहीत करने की प्रस्थापना करता है;

                (11) चार्टर्ड अकाउंटेंट की वृत्ति से भिन्न किसी कारबार या उपजीविका में अपने को उस दशा में लगाता है जबकि परिषद् द्वारा ऐसा करने के लिए उसे अनुज्ञा नहीं दी गई हैः

                परन्तु इसमें अन्तर्विष्ट कोई बात, किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट को किसी कंपनी का निदेशक होने से (जो प्रबंध-निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक नहीं है) तब के सिवाय हक से वंचित नहीं करेगी जबकि वह या उसके भागीदार में से कोई भागीदार संपरीक्षक के रूप में ऐसी कंपनी में हितबद्ध नहीं है;

                (12) ऐसे व्यक्ति को, जो संस्थान का व्यवसाय करने वाला सदस्य नहीं है, या ऐसे सदस्य को, जो उसकी ओर से या अपनी फर्म की ओर से, किसी तुलन पत्र, लाभ और हानि लेखा, रिपोर्ट या वित्तीय विवरणों को हस्ताक्षरित करने के लिए, उसका भागीदार नहीं है, अनुज्ञात करता है

भाग 2

संस्थान के सेवारत सदस्यों के संबंधित वृत्तिक अवचार

यदि संस्थान का कोई सदस्य (जो व्यवसाय करने वाले सदस्य से भिन्न) किसी कंपनी, फर्म या व्यक्ति का कर्मचारी होते हुए-

(1) उसके द्वारा ग्रहण किए गए नियोजन की परिलब्धियों का कोई अंश, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी व्यक्ति को संदाय करता है या संदाय किए जाने को अनुज्ञात करता है, या संदाय किए जाने के लिए सहमत होता है;

(2) ऐसी कम्पनी, फर्म या व्यक्ति द्वारा या ऐसी कम्पनी, फर्म या व्यक्ति के अभिकर्ता या मुवक्किल द्वारा नियुक्त किसी विधि व्यवसायी, चार्टर्ड अकाउंटेंट या दलाल से, फीसों, लाभों या अभिलाभों का कोई भाग कमीशन या परितोष के रूप में प्रतिगृहीत करता है, या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत होता है,

तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा

भाग 3

संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः वृत्तिक अवचार

यदि संस्थान का कोई सदस्य, चाहे वह व्यवसाय कर रहा हो या नहीं, -

                (1) संस्थान का अध्येता होते हुए संस्थान के अध्येता के रूप में कार्य करता है;

(2) संस्थान, परिषद् या उसकी किन्हीं समितियों में से किसी समिति, निदेशक (अनुशासन), अनुशासन बोर्ड, अनुशासन समिति, क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड या अपील प्राधिकरण द्वारा मांगी गई जानकारी नहीं देता या उन अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं करता है, जिसके बारे में मांग की गई है;

                                (3) किसी अन्य चार्टर्ड अकाउंटेंट से वृत्तिक कार्य आमंत्रित करते समय या निविदाएं या परिप्रश्नों का उत्तर देते समय या किसी लेख के माध्यम से विज्ञापन देते समय या इस अनुसूची के भाग 1 की मद (6) और मद (7) में यथाउपबंधित कोई बात करते समय ऐसी सूचना देता है जिसके बारे में वह जानता है कि वह मिथ्या है,

तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा

भाग 4

संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः अन्य अवचार

                यदि संस्थान का कोई सदस्य चाहे वह व्यवसाय कर रहा हो या नहीं, -

                                (1) किसी सिविल या दण्ड न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, जो छह मास से अनधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय है;

(2) वह परिषद् की राय में, उसने अपने कार्यों से चाहे वे उसके वृत्तिक कार्य से संबंधित हों या नहीं, वृत्ति या संस्थान की प्रतिष्ठा गिराता है,

तो वह अन्य अवचार का दोषी समझा जाएगा

दूसरी अनुसूची

[धारा 21(3), धारा 21 (3) और धारा 22 देखिए]

भाग 1

व्यवसाय करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट से संबंधित वृत्तिक अवचार

यदि व्यवसाय करने वाला चार्टर्ड अकाउंटेंट-

(1) अपने मुवक्किल की सम्मति के बिना या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा यथा अपेक्षित से अन्यथा, अपने वृत्तिक कार्य के दौरान प्राप्त जानकारी अपने मुवक्किल, से जिसने उसे नियुक्त किया है, भिन्न किसी व्यक्ति को प्रकट करता है;

(2) वित्तीय विवरणों की परीक्षा की रिपोर्ट अपने नाम से या अपनी फर्म के नाम से तब के सिवाय जबकि ऐसे विवरणों और संबंधित अभिलेखों की परीक्षा, उसके द्वारा या उसकी फर्म के किसी भागीदार या कर्मचारी द्वारा या व्यवसाय करने वाले किसी अन्य चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा की गई है, प्रमाणित करता है या प्रस्तुत करता है;

(3) ऐसी रीति से जिससे यह विश्वास हो जाए कि वह पूर्वानुमान का ठीक होना प्रमाणित करता है, अपने नाम को या अपनी फर्म के नाम को, उन उपार्जनों के प्राक्कलन के संबंध में जो कि भविष्यवर्ती संव्यवहारों पर समाश्रित है, प्रयुक्त करने की अनुज्ञा देता है;

(4) किसी कारबार या उद्यम के वित्तीय विवरणों पर, जिसमें उसका, उसकी फर्म या उसकी फर्म के किसी भागीदार का कोई सारवान् हित है, अपनी राय अभिव्यक्त करता है;

(5) किसी वित्तीय विवरण में अपने को ज्ञात ऐसे तात्त्विक तथ्य को, जो किसी वित्तीय विवरण में प्रकट नहीं किया गया है, किन्तु जिसका ऐसा वित्तीय विवरण देने में प्रकट किया जाना आवश्यक है, जहां ऐसे कथन से उसका संबंध वृत्तिक हैसियत में है, प्रकट करने में असफल रहता है

(6) ऐसे किसी वित्तीय विवरण में, जिससे उसका वृत्तिक हैसियत में संबंध है, ऐसे किसी तात्त्विक अशुद्ध कथन की रिपोर्ट जो उसे ज्ञात है, प्रकट करने में असफल रहता है

(7) अपने वृत्तिक कर्तव्यों के निर्वहन में सम्यक् तत्परता नहीं बरतता है या घोर उपेक्षा करता है

(8) उतनी पर्याप्त जानकारी अभिप्राप्त करने में असफल रहता है जो किसी राय की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है या जिसके अपवाद राय की अभिव्यक्ति को नकारने के लिए पर्याप्त रूप से सारवान् है

(9) परिस्थितियों में साधारणतः स्वीकार्य संपरीक्षा की प्रक्रिया से किसी तात्त्विक विच्युति के प्रति ध्यान आकृष्ट करने में असफल रहता है

(10) फीस या परिलब्धि या खर्च किए जाने के लिए रखे गए रुपए-पैसे से भिन्न अपने मुवक्किल के रुपए-पैसे पृथक् बैंक खाते में नहीं रखता है या ऐसे रुपए-पैसे को युक्तियुक्त समय के भीतर उन प्रयोजनों के लिए प्रयोग नहीं करता है, जिनके लिए उसका प्रयुक्त किया जाना आशयित है

तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा

भाग 2

संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः वृत्तिक अवचार

यदि संस्थान का कोई सदस्य, चाहे वह व्यवसाय कर रहा हो, या नहींद्भद्भ 

(1) इस अधिनियम के उपबंधों या तद्धीन बनाए गए विनियमों या परिषद् द्वारा जारी किए गए किन्हीं मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है;

(2) किसी कंपनी, फर्म या व्यक्ति का कर्मचारी होते हुए, तब के सिवाय अपने नियोजन के अनुक्रम में प्राप्त गोपनीय सूचना को प्रकट करता है, जब तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाती है या नियोजक द्वारा अनुज्ञात किया जाता है

(3) संस्थान, परिषद् या उसकी किसी समिति, निदेशक (अनुशासन), अनुशासन बोर्ड, अनुशासन समिति, क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड या अपील प्राधिकरण को प्रस्तुत कोई सूचना, विवरण, विवरणी या प्ररूप में कोई विशिष्टियां सम्मिलित करता है जिसके बारे में वह जानता है कि वह मिथ्या है

(4) अपनी वृत्तिक हैसियत में प्राप्त धनराशि का गोलमाल या गबन करता है,

तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा

भाग 3

संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः अन्य अवचार

                संस्थान का कोई सदस्य चाहे व्यवसाय कर रहा हो या नहीं अन्य अवचार का दोषी समझा जाएगा जब उसे किसी सिविल या दण्ड न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, जो छह मास से अधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय है ]

----------------

Download the LatestLaws.com Mobile App
 
 
Latestlaws Newsletter
 

Publish Your Article

 

Campus Ambassador

 

Media Partner

 

Campus Buzz

 

LatestLaws Guest Court Correspondent

LatestLaws Guest Court Correspondent Apply Now!
 

LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026

 

LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!

 
 
 

LatestLaws Partner Event : IJJ

 
 
Latestlaws Newsletter