राष्ट्रीय सुरक्षक अधिनियम, 1986
(1986 का अधिनियम संख्यांक 47)
[22 सितम्बर, 1986]
आन्तरिक उपद्रव से राज्यों की संरक्षा करने की दृष्टि से आतंकवादी
क्रियाकलापों का मुकाबला करने के लिए संघ के
सशस्त्र बल के गठन और विनियमन
का और उससे संबंधित विषयों
का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय सुरक्षक अधिनियम, 1986 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति के संबंध में, सक्रिय ड्यूटी" से सुरक्षक के सदस्य के रूप में उसकी उस अवधि के दौरान की ड्यूटी अभिप्रेत है जब वह-
(i) आतंकवादी या संघ के विरुद्ध किसी उद्धतायुध व्यक्ति के विरुद्ध संक्रियाओं में लगे हुए; या
(ii) आतंकवादी क्रियाकलापों का मुकाबला करने के संबंध में पिकेट को संक्रियाएं कर रहे या गश्ती या कोई अन्य ड्यूटी करने में लगे हुए, सुरक्षक के किसी यूनिट से सम्बद्ध है या उसका अंग है ;
(ख) सहायक कमाण्डर" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे सहायक कमाण्डर श्रेणी 1, सहायक कमाण्डर श्रेणी 2 या सहायक कमाण्डर श्रेणी 3 के रूप में नियुक्त किया गया है या जो उस रूप में वेतन पाता है ;
(ग) सिविल अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो किसी दण्ड न्यायालय द्वारा या दण्ड विधि संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 46) के अधीन नियुक्त किसी विशेष न्यायाधीश द्वारा विचारणीय है ;
(घ) सिविल कारागार" से ऐसा जेल या स्थान अभिप्रेत है जिसका उपयोग किसी आपराधिक बंदी के निरोध के लिए कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किया जाता है ;
(ङ) योधक कारीगर" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे योधक कारीगर के रूप में नियुक्त किया गया है या जो उस रूप में वेतन पाता है ;
(च) कमाण्डर" से, जब इसका प्रयोग इस अधिनियम के किसी उपबन्ध में सुरक्षक के किसी यूनिट के प्रति निर्देश से किया जाए, ऐसा आफिसर अभिप्रेत है जिसका कर्तव्य उस यूनिट की बाबत उस उपबन्ध में निर्दिष्ट प्रकार के विषयों के संबंध में कमाण्डर के कृत्यों का निर्वहन करना है ;
(छ) दण्ड न्यायालय" से भारत के किसी भाग में मामूली दण्ड न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत दण्ड विधि संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 46) के अधीन नियुक्त किसी विशेष न्यायाधीश का न्यायालय भी है ;
(ज) उप महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त सुरक्षक का उप महानिरीक्षक अभिप्रेत है ;
(झ) महानिदेशक" और अपर महानिदेशक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त क्रमशः सुरक्षक का महानिदेशक और कोई अपर महानिदेशक अभिप्रेत है ;
(ञ) ग्रुप" से केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रुप के रूप में गठित सुरक्षक का कोई यूनिट अभिप्रेत है ;
(ट) ग्रुप कमाण्डर" से धारा 5 के अधीन नियुक्त सुरक्षक का ग्रुप कमाण्डर अभिप्रेत है ;
(ठ) महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त सुरक्षक का महानिरीक्षक अभिप्रेत है ;
(ड) जज अटर्नी जनरल", अपर जज अटर्नी जनरल", उप जज अटर्नी जनरल" और जज अटर्नी" से केन्द्रीय सरकार द्वारा समुचित रैंक में क्रमशः नियुक्त सुरक्षक का जज अटर्नी जनरल, अपर जज अटर्नी जनरल, उप जज अटर्नी जनरल और कोई जज अटर्नी अभिप्रेत है ;
(ढ) सुरक्षक का सदस्य" से कोई आफिसर, सहायक कमाण्डर, रेंजर या योधक कारीगर अभिप्रेत है ;
(ण) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
(त) अपराध" से इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई कार्य या लोप अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत सिविल अपराध भी है ;
(थ) आफिसर" से सुरक्षक के आफिसर के रूप में नियुक्त या वेतन पाने वाला कोई व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(द) विहित" से नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ध) रेंजर" से सुरक्षक का रेंजर श्रेणी 1 और रेंजर श्रेणी 2 अभिप्रेत है ;
(न) नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाया गया नियम अभिप्रेत है ;
(प) सुरक्षक" से राष्ट्रीय सुरक्षक अभिप्रेत है ;
(फ) सुरक्षक न्यायालय" से धारा 61 में निर्दिष्ट न्यायालय अभिप्रेत है ;
(ब) सुरक्षक अभिरक्षा" से नियमों के अनुसार सुरक्षक के किसी सदस्य की गिरफ्तारी या परिरोध अभिप्रेत है ;
(भ) वरिष्ठ आफिसर" से, जब इसका प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में किया जाए जो इस अधिनियम के अधीन है, अभिप्रेत है-
(i) सुरक्षक का कोई ऐसा सदस्य, जिसके कमान में वह व्यक्ति नियमों के अनुसरण में तत्समय उसके अधीन है ;
(ii) उच्चतर रैंक या वर्ग का कोई आफिसर, और जब ऐसा व्यक्ति आफिसर नहीं है तब इसके अन्तर्गत उच्चतर रैंक या वर्ग का सहायक कमांडर या रेंजर है ।
(म) आतंकवादी" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो विधि द्वारा स्थापित सरकार को आतंकित करने या जनता या जनता के किसी वर्ग में आतंक फैलाने या जनता के किसी वर्ग को पृथक् करने या जनता के विभिन्न वर्गों के बीच सौहार्द्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के आशय से, बमों, डायनामाइट या अन्य विस्फोटक पदार्थों या ज्वलनशील पदार्थों या अग्न्यायुधों या अन्य प्राणहर आयुधों या विषों का या अपायकर गैसों या अन्य रसायनों या परिसंकटमय प्रकृति के किन्हीं अन्य पदार्थों का (चाहे वे जैव हों या अन्यथा), ऐसी रीति से उपयोग करके जिससे किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों की मृत्यु या उन्हें क्षति या संपत्ति को नुकसान या उसका विनाश अथवा समुदाय के जीवन के लिए आवश्यक किन्हीं प्रदायों या सेवाओं में विघ्न कारित होता है या कारित होने की संभावना है, कोई कार्य या बात करता है ;
(य) उन सभी शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में परिभाषित हैं वही अर्थ होंगे जो संहिता में हैं ।
(2) इस अधिनियम के किसी ऐसी विधि के प्रति जो किसी राज्य में प्रवृत्त नहीं है निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति निर्देश है ।
3. इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति-(1) सुरक्षक में नियुक्त निम्नलिखित व्यक्ति (चाहे वे प्रतिनियुक्ति पर हों या किसी अन्य रीति से नियुक्त किए गए हों) चाहे वे कहीं भी हों, इस अधिनियम के अधीन होंगे, अर्थात् :-
(क) आफिसर और सहायक कमांडर, और
(ख) रेंजर और योधक कारीगर ।
(2) प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, इस प्रकार तब तक अधीन बना रहेगा जब तक कि वह इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अनुसार सुरक्षक से संप्रत्यावर्तित नहीं कर दिया जाता है, सेवानिवृत्त नहीं हो जाता है, निर्मुक्त नहीं कर दिया जाता है, उन्मुक्त नहीं कर दिया जाता है, हटा नहीं दिया जाता है या पदच्युत नहीं कर दिया जाता है ।
अध्याय 2
सुरक्षक का गठन और सुरक्षक के सदस्यों की सेवा की शर्तें
4. सुरक्षक का गठन-(1) संघ का एक सशस्त्र बल होगा जिसे राष्ट्रीय सुरक्षक कहा जाएगा और जो आन्तरिक उपद्रव से राज्यों की संरक्षा करने की दृष्टि से आतंकवादी के क्रियाकलापों का मुकाबला करेगा ।
(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सुरक्षक का गठन ऐसी रीति से किया जाएगा जो विहित की जाए और सुरक्षक के सदस्यों की सेवा की शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।
5. नियंत्रण, निदेशन आदि-(1) सुरक्षक का साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण केन्द्रीय सरकार में निहित होगा और वही उसका प्रयोग करेगी और उसके तथा इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए सुरक्षक का समादेशन और पर्यवेक्षण ऐसे आफिसर में निहित होगा जिसे केन्द्रीय सरकार सुरक्षक के महानिदेशक के रूप में नियुक्त करे ।
(2) इस अधिनियम के अधीन महानिदेशक के कर्तव्यों के निर्वहन में उसकी सहायता करने के लिए उतने अपर महानिदेशक, महानिरीक्षक, उपमहानिरीक्षक ग्रुप कमांडर और अन्य आफिसर होंगे, जितने केन्द्रीय सरकार नियुक्त करे ।
6. भारत के बाहर सेवा करने का दायित्व-सुरक्षक का प्रत्येक सदस्य भारत के किसी भाग में तथा भारत के बाहर भी सेवा करने के दायित्व के अधीन होगा ।
7. पद-त्याग और पद से अलग होना-विहित प्राधिकारी की लिखित पूर्व अनुज्ञा के बिना, सुरक्षक के किसी सदस्य को,-
(क) अपने नियोजन की अवधि के दौरान अपना पद त्याग करने की ; या
(ख) अपने पद के सभी या उनमें से किन्हीं कर्तव्यों से अलग होने की, स्वतंत्रता नहीं होगी ।
8. अधिनियम के अधीन सेवा की अवधि-सुरक्षक का प्रत्येक सदस्य, जो इस अधिनियम के अधीन है, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
9. केन्द्रीय सरकार द्वारा सेवा का पर्यवसान-इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति को सेवा से पदच्युत कर सकेगी या हटा सकेगी ।
10. महानिदेशक और अन्य आफिसरों द्वारा पदच्युत किया जाना, हटाया जाना या अवनत किया जाना-(1) महानिदेशक, कोई अपर महानिदेशक या कोई महानिरीक्षक इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति को, जो आफिसर नहीं है, सेवा से पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा या निम्नतर ग्रेड या रैंक या रैंकों में अवनत कर सकेगा ।
(2) कोई आफिसर, जो किसी उप माहनिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, या कोई विहित आफिसर, अपने कमान के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को, जो आफिसर या सहायक कमांडर नहीं है, सेवा से पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा ।
(3) उपधारा (2) में वर्णित कोई आफिसर अपने कमान के अधीन किसी व्यक्ति को, जो आफिसर या सहायक कमांडर नहीं है, निम्नतर ग्रेड या रैंक या रैंकों में अवनत कर सकेगा ।
(4) इस धारा के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए किया जाएगा ।
11. सेवा की समाप्ति का प्रमाणपत्र-किसी सहायक कमांडर, या रेंजर या योधक कारीगर को, जिसे सेवा से निवृत्त, उन्मुक्त कर दिया गया है, हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है, उस आफिसर द्वारा, जिसके कमान के अधीन वह है, एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा जिसमें निम्नलिखित बातें होंगी-
(क) उसकी सेवा को समाप्त करने वाला प्राधिकारी ;
(ख) ऐसी सेवा की समाप्ति के कारण ; और
(ग) सुरक्षक में उसकी सेवा की पूर्ण अवधि ।
12. संगम बनाने, वाक्-स्वातंत्र्य आदि के अधिकार के संबंध में निर्बंधन-(1) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी को लिखित पूर्व मंजूरी के बिना ;-
(क) किसी व्यापार संघ, श्रम संघ, राजनीतिक संगम का न तो सदस्य होगा और न उससे या उनके किसी वर्ग से किसी प्रकार सहयोजित होगा ; या
(ख) किसी सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन का, जिसे सुरक्षक के भाग के रूप में मान्यताप्राप्त नहीं है या जो केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोदात्मक या धार्मिक स्वरूप का नहीं है न तो सदस्य होगा और न उससे किसी प्रकार से सहयोजित होगा ; या
(ग) प्रेस से न तो पत्र-व्यवहार करेगा और न कोई पुस्तक, पत्र या अन्य दस्तावेज प्रकाशित करेगा, न प्रकाशित कराएगा, किन्तु उस दशा में ऐसा कर सकेगा जबकि ऐसा पत्र-व्यवहार या प्रकाशन उसके कर्तव्यों के सद्भावपूर्वक निर्वहन के लिए है बिल्कुल साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक प्रकृति का है या विहित प्रकृति का है ।
स्पष्टीकरण-यदि इस बारे में कोई प्रश्न उठता है कि इस धारा के खंड (ख) के अधीन कोई सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन बिल्कुल सामाजिक, आमोद-प्रमोदात्मक या धार्मिक स्वरूप का है या नहीं तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(2) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे किसी अधिवेशन में न तो भाग लेगा और न उसे संबोधित करेगा, न ऐसे किसी प्रदर्शन में भाग लेगा जो किन्हीं राजनीतिक प्रयोजनों से या ऐसे अन्य प्रयोजनों से, जो विहित किए जाएं, व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा संगठित किया गया है ।
13. आफिसरों से भिन्न व्यथित व्यक्तियों के लिए उपचार-(1) किसी आफिसर से भिन्न कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन है, जो समझता है कि उसके साथ किसी वरिष्ठ या अन्य आफिसर द्वारा अन्याय किया गया है, उस आफिसर को जिसके कमान में यह सेवारत है, शिकायत कर सकेगा ।
(2) जब वह आफिसर, जिसके विरुद्ध शिकायत की गई है, ऐसा आफिसर है, जिसको कोई शिकायत, उपधारा (1) के अधीन की जानी चाहिए तो व्यथित व्यक्ति ऐसे आफिसर से अगले वरिष्ठ आफिसर को शिकायत कर सकेगा ।
(3) ऐसी शिकायत प्राप्त करने वाला प्रत्येक आफिसर उसका ऐसे पूर्ण अन्वेषण करेगा जो शिकायतकर्ता को पूर्ण प्रतितोष देने के लिए संभव हो अथवा जब आवश्यक हो तो शिकायत को वरिष्ठ प्राधिकारी को निर्दिष्ट करेगा ।
(4) महानिदेशक पूर्वगामी उपधाराओं में से किसी के अधीन किए गए किसी विनिश्चय का पुनरीक्षण कर सकेगा किन्तु उसके अधीन रहते हुए ऐसा विनिश्चय अंतिम होगा ।
14. व्यथित आफिसरों के लिए उपचार-कोई आफिसर, जो समझता है कि उसके कमांडर या किसी अन्य वरिष्ठ आफिसर द्वारा उसके साथ अन्याय किया गया है और जो अपने कमांडर या ऐसे अन्य वरिष्ठ आफिसर को किए गए सम्यक् आवेदन पर ऐसा प्रतितोष प्राप्त नहीं करता है जिसका वह स्वयं को हकदार समझता है, उचित प्रणाली से महानिदेशक या केन्द्रीय सरकार को शिकायत कर सकेगा ।
अध्याय 3
अपराध
15. संघ के विरुद्ध आतंकवादियों और अन्य उद्यतायुध व्यक्तियों से संबंधित अपराध, जो मृत्यु से दंडनीय है-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) अपने कर्तव्य स्थान को लज्जास्पद रूप से छोड़ देगा या ऐसी रीति से कदाचार करेगा जिससे संक्रिया के दौरान कायरता दर्शित हो ;
(ख) किसी आतंकवादी या किसी उद्यतायुध व्यक्ति से संघ के विरुद्ध विश्वासघातपूर्वक पत्राचार करेगा या उसे आसूचना देगा ; या
(ग) किसी आतंकवादी की धन, आयुध, गोलाबारूद, सामान या प्रदाय से या किसी अन्य रीति से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सहायता करेगा; या
(घ) यह जानते हुए कोई ऐसा कार्य करेगा जो सुरक्षक या भारत के सैनिक, नौसैनिक, वायुसेना बलों को या किन्हीं अन्य सशस्त्र बलों की या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों या ऐसे बलों के किसी भाग की सफलता को संकट में डालने के लिए परिकल्पित हो,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर मृत्यु दण्ड का या ऐसे लघुतर दण्ड का जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
16. अन्य समयों की अपेक्षा सक्रिय ड्यूटी पर होने के समय अधिक कठोर रूप में दण्डनीय अपराध-यदि कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी रक्षोपाय का अतिक्रमण करेगा या किसी संतरी का अतिक्रमण करेगा या उस पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा ; या
(ख) लूटपाट करने के लिए किसी गृह या अन्य स्थान में अनधिकृत प्रवेश करेगा ; या
(ग) संतरी होते हुए अपनी चौकी पर सौ जाएगा या नशे मे होगा ;
(घ) अपने वरिष्ठ आफिसर के आदेशों के बिना अपनी गारद, पिकेट पेट्रोल या चौकी को छोड़ेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर,-
(i) उस दशा में जब कि वह ऐसा कोई अपराध सक्रिय ड्यूटी पर रहते हुए करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा, और
(ii) उस दशा में जब कि वह ऐसा कोई अपराध सक्रिय ड्यूटी पर न रहते हुए करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
17. विद्रोह-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् : -
(क) सुरक्षक में या भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायुसेना बलों में या उससे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों में विद्रोह आरम्भ करेगा, उद्दीप्त करेगा, कारित करेगा, या विद्रोह करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ षड्यंत्र करेगा; या
(ख) ऐसे किसी विद्रोह में सम्मिलित होगा; या
(ग) ऐसे किसी विद्रोह में उपस्थित होते हुए, उसे दबाने के लिए अपने अधिकतम प्रयास नहीं करेगा; या
(घ) यह जानते हुए या इस बात का विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा कोई विद्रोह या ऐसा विद्रोह करने का आशय या ऐसा कोई षड्यंत्र अस्तित्व में है उसकी इत्तिला अपने कमांडर या अन्य वरिष्ठ आफिसर को अविलंब नहीं देगा; या
(ङ) सुरक्षक के या भारत के सैनिक, नौसैनिक, वायुसेना बलों के या उससे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों के किसी व्यक्ति को उसके कर्तव्य से या संघ के प्रति उसकी राजनिष्ठा से विचलित करने का प्रयास करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर मृत्यु दंड का या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
18. अभित्यजन और अभित्यजन में सहायता करना-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, सेवा का अभित्यजन करेगा या अभित्यजन करने का प्रयत्न करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर-
(क) उस दशा में जबकि वह ऐसा अपराध सक्रिय ड्यूटी पर रहते हुए करेगा या सक्रिय ड्यूटी पर जाने के आदेश के अधीन होते हुए करेगा, मृत्यु दंड का या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा; और
(ख) उस दशा में जबकि वह ऐसा अपराध किन्हीं अन्य परिस्थितियों में करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, जानबूझकर ऐसे किसी अभित्याजक को संश्रय देगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
(3) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी अभित्यजन का या अभित्यजन करने के प्रयत्न का संज्ञान रखते हुए तत्काल अपने या किसी अन्य वरिष्ठ आफिसर को सूचना नहीं देगा या ऐसे व्यक्ति को पकड़वाने के लिए अपनी शक्ति में की कोई कार्रवाई नहीं करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
(4) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति अभित्यजन करेगा-
(क) यदि वह अपने यूनिट या कर्तव्य स्थान से किसी भी समय ऐसे यूनिट या स्थान को वापस रिपोर्ट न करने के आशय से अनुपस्थित रहेगा या जो किसी भी समय और किसी भी परिस्थिति में जब वह अपने यूनिट या कर्तव्य स्थान से अनुपस्थित हो ऐसा कोई कार्य करेगा जो दर्शित करता है कि उसका ऐसे यूनिट या कर्तव्य स्थान को वापस रिपोर्ट करने का आशय नहीं है ;
(ख) यदि वह किसी सक्रिय ड्यूटी से बचने के आशय से छुट्टी के बिना अनुपस्थित रहेगा ।
19. छुट्टी के बिना अनुपस्थिति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) छुट्टी बिना अनुपस्थित रहेगा; या
(ख) उसे मंजूर की गई छुट्टी के उपरांत पर्याप्त हेतुक के बिना अनुपस्थित रहेगा; या
(ग) अनुपस्थिति छुट्टी पर होते हुए समुचित प्राधिकारी से यह इत्तिला मिलने पर कि किसी यूनिट या उसके भाग को जिसका वह अंग है, सक्रिय ड्यूटी पर जाने का आदेश दिया गया है पर्याप्त हेतुक के बिना काम पर अविलंब वापस आने में असफल रहेगा; या
(घ) पर्याप्त हेतुक के बिना परेड में या अभ्यास या ड्यूटी के लिए नियत स्थान पर नियत समय पर हाजिर होने में असफल रहेगा; या
(ङ) उस दौरान जब वह परेड में या मार्च की लाइन में है; पर्याप्त हेतुक के बिना या अपने वरिष्ठ आफिसर से इजाजत लिए बिना परेड या मार्च की लाइन छोड़ देगा; या
(च) जब वह कैंप में या अन्यत्र है, तब किसी साधारण या स्थानीय या अन्य आदेश द्वारा नियत किन्हीं परिसीमाओं के परे या किसी प्रतिषिद्ध स्थान में, पास के बिना या अपने वरिष्ठ आफिसर की लिखित इजाजत के बिना पाया जाएगा; या
(छ) जब उसे किसी स्कूल में हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से आदेश दिया जाता है तब अपने वरिष्ठ आफिसर की इजाजत के बिना या सम्यक् हेतुक के बिना उससे अनुपस्थित रहेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
20. वरिष्ठ आफिसर पर आघात करना या उसे धमकी देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) अपने वरिष्ठ आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा, या ।
(ख) ऐसे आफिसर के प्रति धमकी भरी भाषा का प्रयोग करेगा, या
(ग) ऐसे आफिसर के प्रति अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर,-
(i) उस दशा में जब कि ऐसा आफिसर उस समय अपने पद का निष्पादन कर रहा है या उस दशा में जबकि अपराध सक्रिय ड्यूटी पर किया जाता है, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और
(ii) अन्य दशाओं में, कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा :
परन्तु खंड (ग) में विनिर्दिष्ट अपराध की दशा में कारावास पांच वर्ष से अधिक का नहीं होगा ।
21. वरिष्ठ आफिसर की अवज्ञा-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा अपने पद के निष्पादन में स्वयं दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की, चाहे वह मौखिक रूप से या लिखित रूप में या संकेत द्वारा या अन्यथा दिया गया हो, ऐसी रीति से अवज्ञा करेगा, जिससे प्राधिकारी का जानबूझकर किया गया तिरस्कार दर्शित होता है, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
22. हमला और बाधा-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी झगड़े, दंगे या उपद्रव में संपृक्त होते हुए, किसी ऐसे आफिसर की, भले ही वह निम्नतर रैंक का हो, जो उसकी गिरफ्तारी का आदेश देता है, आज्ञा का पालन करने से इंकार करेगा या ऐसे किसी आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा; या
(ख) किसी ऐसे व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा, जिसकी अभिरक्षा में उसे विधिपूर्वक रखा गया है, चाहे वह व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन है या नहीं और चाहे वह उसका वरिष्ठ आफिसर है या नहीं; या
(ग) ऐसे अनुरक्षक का प्रतिरोध करेगा जिसका कर्तव्य उसे पकड़ना या अपने भारसाधन में लेना है ; या
(घ) बैरकों, कैंप या क्वार्टरों से अनधिकृत रूप से निकलेगा; या
(ङ) किसी साधारण, स्थानीय या अन्य आदेश का पालन करने से इंकार करेगा ;
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि उन अपराधों की दशा में, जो खंड (घ) और (ङ) में विनिर्दिष्ट हैं दो वर्ष तक की, और उन अपराधों की दशा में, जो अन्य खडों में विनिर्दिष्ट हैं, दस वर्ष तक की हो सकेगी या इन दोनों दशाओं में से किसी दशा में ऐसे लघुतर दंड का जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
23. कलंकास्पद आचरण के कुछ प्रकार-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) क्रूर, अशिष्ट या अप्राकृतिक प्रकार के किसी कलंकास्पद आचरण का दोषी होगा ; या
(ख) कर्तव्य से बचने के लिए रोगी बन जाएगा या रोग होने का ढोंग करेगा या अपने में रोग या अंगशैथिल्य होने का बहाना करेगा या निरोग होने में साशय विलंब करेगा या अपने रोग या अंगशैथिल्य को गुरुतर बनाएगा; या
(ग) अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को सेवा के अयोग्य बनाने के आशय से अपने आपको या उस व्यक्ति को स्वेच्छा से उपहति कारित करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
24. अधीनस्थ के साथ बुरा बर्ताव करना-कोई आफिसर, सहायक कमांडर या रेंजर श्रेणी 1, जो किसी ऐसे व्यक्ति पर, जो रैंक या पद में उसके अधीनस्थ है और जो इस अधिनियम के अधीन है, आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव करेगा, वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम मे वर्णित है, भागी होगा ।
25. मत्तता-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, मत्तता की हालत में पाया जाएगा, चाहे वह ड्यूटी पर है या नहीं, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम मे वर्णित है, भागी होगा ।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति मत्तता की हालत में समझा जाएगा यदि वह अल्कोहल या किसी ओषधि के अकेले या किसी अन्य पदार्थ के सम्मिश्रण के साथ असर के कारण अपनी ड्यूटी या कोई ऐसी ड्यूटी सौंपे जाने के लिए जिसका पालन करने के लिए कहा जाए, अयोग्य है या विच्छृंखल रीति से या ऐसी रीति से व्यवहार करता है, जिससे सुरक्षक के बदनाम होने की संभावना है ।
26. अभिरक्षा में से किसी व्यक्ति को निकल भागने देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) उस दौरान, जब वह किसी गारद, पिकेट, पेट्रोल, टुकड़ी या चौकी का समादेशक है, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है, उचित प्राधिकार के बिना, चाहे जानबूझकर या उचित प्रतिहेतु के बिना, निर्मुक्त करेगा या किसी बंदी या ऐसे सुपुर्द किए गए व्यक्ति को लेने से इंकार करेगा; या
(ख) ऐसे व्यक्ति को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है, या जिसे रखना या जिस पर पहरा रखना उसका कर्तव्य है, जानबूझकर या उचित प्रतिहेतु के बिना निकल भागने देगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर उस दशा में जिसमें उसने जानबूझकर ऐसा कार्य किया है, कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा और उस दशा में जबकि उसने जानबूझकर कार्य नहीं किया है, कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
27. गिरफ्तारी या परिरोध के संबंध में अनियमितता-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी गिरफ्तार या परिरुद्ध व्यक्ति को विचारण के लिए लाए बिना अनावश्यक रूप से निरुद्ध रखेगा या उसका मामला अन्वेषण के लिए उचित प्राधिकारी के समक्ष लाने में असफल रहेगा, या
(ख) किसी व्यक्ति को सुरक्षक की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द करके, ऐसी सुपुर्दगी के समय या यथासाध्य शीघ्र और किसी भी दशा में तत्पश्चात् अड़तालीस घंटों के अंदर उस आफिसर या अन्य व्यक्ति को जिसकी अभिरक्षा में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को सुपुर्द किया गया है, उस अपराध का जिसका कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति पर आरोप है, लिखित और स्वहस्ताक्षरित वृत्तांत परिदत्त करने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा, दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
28. अभिरक्षा से निकल भागना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, विधिपूर्ण अभिरक्षा में होते हुए निकल भागेगा या निकल भागने का प्रयत्न करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
29. संपत्ति की बाबत अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) सरकार की या किसी सुरक्षक मैस, बैंड या संस्था की या किसी ऐसे व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी संपत्ति की चोरी करेगा; या
(ख) ऐसी किसी संपत्ति का बेइमानी से दुर्विनियोग करेगा या उसको अपने उपयोग के लिए संपरिवर्तित करेगा; या
(ग) ऐसी किसी संपत्ति की बाबत आपराधिक न्यास-भंग करेगा; या
(घ) ऐसी किसी संपत्ति को, जिसकी बाबत खंड (क), खंड (ख) और खंड (ग) के अधीन अपराधों में से कोई अपराध किया गया है, यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा अपराध किया गया है, बेइमानी से प्राप्त करेगा या रखे रहेगा; या
(ङ) सरकार की किसी संपत्ति को, जो उसे सौंपी गई है, जानबूझकर नष्ट करेगा या उसको क्षति पहुंचाएगा; या
(च) कपट-वंचित करने के या किसी व्यक्ति को सदोष अभिलाभ या किसी अन्य व्यक्ति को सदोष हानि पहुंचाने के आशय से कोई अन्य बात करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
30. उद्दापन और आहरण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) उद्दापन करेगा; इस
(ख) उचित प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति से धन, रसद या सेवा का आहरण करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
31. उपस्कर गायब कर देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किन्हीं आयुधों, गोलाबारूद, उपस्कर, उपकरणों, औजारों, कपड़ों या किसी अन्य वस्तु को, जो सरकार की संपत्ति होते हुए उसे अपने उपयोग के लिए दी गई है या उसे सौंपी गई है, गायब कर देगा या गायब कर देने में संपृक्त होगा; या
(ख) खण्ड (क) में वर्णित किसी वस्तु को उपेक्षा में गंवा देगा, या
(ग) अपने को अनुदत्त किसी पदक या अलंकरण का विक्रय करेगा, गिरवी रखेगा, नष्ट करेगा, या विरूपित करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में दस वर्ष तक की और अन्य खण्डों में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या इन दोनों दशाओं में से किसी दशा में ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
32. संपत्ति को क्षति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 31 के खण्ड (क) में वर्णित किसी संपत्ति या किसी सुरक्षक के मैस, बैड या संस्था की या किसी ऐसे व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई सम्पत्ति नष्ट करेगा या उसको क्षति पहुंचाएगा, या
(ख) कोई ऐसा कार्य करेगा जिसके कारण अग्नि से या किसी भी अन्य रीति से सरकार की किसी सम्पत्ति को नुकसान होता है या वह नष्ट होती है, या
(ग) अपने को सौंपे गए किसी जीवजन्तु को मार देगा, क्षति पहुंचाएगा, गायब कर देगा, उससे बुरा बर्ताव करेगा या उसे गंवा देगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में, जिसमें उसने जानबूझकर ऐसा कार्य किया है, कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा, और उस दशा में, जबकि उसने उचित प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य किया है, कारावास का, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
33. मिथ्या अभियोग लगाना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई मिथ्या अभियोग, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाएगा कि वह अभियोग मिथ्या है, या
(ख) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई परिवाद करने में कोई ऐसा कथन, जिससे ऐसे व्यक्ति के चरित्र पर प्रभाव पड़ता है, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि ऐसा कथन मिथ्या है या जानते हुए और जानबूझकर किसी तात्विक तथ्य को छिपाएगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
34. शासकीय दस्तावेजों का मिथ्याकरण तथा मिथ्या घोषणाएं करना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों मे से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) अपने द्वारा तैयार की गई या हस्ताक्षरित किसी ऐसी रिपोर्ट, विवरणी, सूची, प्रमाणपत्र, पुस्तक या अन्य दस्तावेज में या उसकी विषय-वस्तु में जिसकी यथार्थता अभिनिश्चित करना उसका कर्तव्य है, जानते हुए कोई मिथ्या या कपटपूर्ण कथन करेगा या करने में संसर्गी होगा; या
(ख) कपट-वंचन करने के आशय से, खण्ड (क) में वर्णित प्रकार के किसी दस्तावेज में, जानते हुए कोई लोप करेगा या करने में संसर्गी होगा; या
(ग) जानते हुए और किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के आशय से या जानते हुए और कपट-वंचन करने के आशय से किसी ऐसी दस्तावेज को, जिसे परिरक्षित रखना या प्रस्तुत करना उसका कर्तव्य है, छिपा लेगा, विरूपित करेगा, परिवर्तित करेगा या उसे गायब कर देगा; या
(घ) जहां किसी बात के बारे में घोषणा करना उसका पदीय कर्तव्य है वहां जानते हुए मिथ्या घोषणा करेगा; या
(ङ) ऐसे कथन से, जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान है या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, अथवा किसी पुस्तक या अभिलेख में कोई मिथ्या प्रविष्टि करके या उसमें की मिथ्या प्रविष्टि का उपयोग करके, अथवा मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाला कोई दस्तावेज बनाकर अथवा कोई सही प्रविष्टि करने में या सही कथन अन्तर्विष्ट करने वाला दस्तावेज बनाने में लोप करके, अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई पेंशन, भत्ता या अन्य फायदा या विशेषाधिकार अभिप्राप्त करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
35. नियुक्ति पर मिथ्या घोषणा-इस अधिनियम के अधीन आने वाला कोई व्यक्ति, जिसके बारे में यह पता लगता है कि उसने नियुक्ति के समय अपनी नियुक्ति के संबंध में जानबूझकर मिथ्या कथन या घोषणा की है, सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
36. सुरक्षक न्यायालय के संबंध में अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी सुरक्षक न्यायालय के समक्ष साक्षी के रूप में हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से समन या आदिष्ट किए जाने पर हाजिर होने में जानबूझकर या उचित प्रतिहेतु के बिना व्यतिक्रम करेगा; या
(ख) ऐसी कोई शपथ लेने से या प्रतिज्ञान करने से इंकार करेगा, जिसके किए जाने या किए जाने की सुरक्षक न्यायालय द्वारा वैध रूप से अपेक्षा की गई है; या
(ग) अपनी शक्ति या नियंत्रण में के ऐसा कोई दस्तावेज पेश या परिदत्त करने से इंकार करेगा जिसे पेश या परिदत्त किए जाने की सुरक्षक न्यायालय द्वारा वैध रूप से अपेक्षा की गई है; या
(घ) जब वह साक्षी है तब किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करेगा जिसका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा आबद्ध है; या
(ङ) सुरक्षक न्यायालय के लिए अपमानजनक या धमकी भरी भाषा का प्रयोग करके, या उसकी कार्यवाहियों में कोई अवरोध या विघ्न कारित करके उस न्यायालय के अपमान का दोषी होगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
37. मिथ्या साक्ष्य-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षक न्यायालय या किसी ऐसे अधिकारी के समक्ष, जो शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने के लिए इस अधिनियम के अधीन सक्षम है या इस अधिनियम के अधीन गठित जांच न्यायालय के समक्ष सम्यक् रूप से शपथ लेकर या प्रतिज्ञान करके कोई ऐसा कथन करेगा जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
38. वेतन का विधिविरुद्धतया रोका जाना-यदि कोई आफिसर, सहायक कमाण्डर या रेंजर श्रेणी 1, जो ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, वेतन प्राप्त करके, उसके शोध्य होने पर उसे विधिविरुद्धतया रोक रखेगा या देने से इन्कार करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
39. अशोभनीय आचरण-कोई आफिसर या सहायक कमाण्डर जो ऐसी रीति से व्यवहार करेगा जो उसके पद और उससे अपेक्षित आचरण की दृष्टि से अशोभनीय है, पदच्युत किए जाने का या ऐसा लघुतर दण्ड पाने का जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
40. सुव्यवस्था और अनुशासन का अतिक्रमण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षक की सुव्यवस्था और अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले ऐसे कार्य या लोप का दोषी होगा जो इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट नहीं है, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
41. प्रकीर्ण अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-
(क) किसी टुकड़ी या किसी चौकी का या मार्च का समादेशन करते हुए और यह परिवाद प्राप्त करने पर कि उसके कमान के अधीन के किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को पीटा है या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव किया है या उसे सताया है या किसी सार्वजनिक स्थान में विघ्न डाला है या कोई बल्वा या अतिचार किया है, क्षतिग्रस्त व्यक्ति को हानि की सम्यक् पूर्ति कराने या मामले की रिपोर्ट उचित प्राधिकारी से करने में असफल रहेगा; या
(ख) पूजा के किसी स्थान को अपवित्र करके या अन्यथा किसी व्यक्ति के धर्म का साशय अपमान करेगा या उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा ; या
(ग) आत्महत्या करने का प्रयास करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के किए जाने की दिशा में कोई कार्य करेगा; या
(घ) सहायक कमाण्डर के रैंक से नीचे का होते हुए, जब वह ड्यूटी पर न हो, तब कैंप में या उसके आसपास अथवा किसी नगर में या उसके आसपास जाते हुए या उससे वापस आते हुए कोई राइफल, तलवार या अन्य आक्रामक शस्त्र उचित प्राधिकार के बिना ले जाते हुए देखा जाएगा; या
(ङ) किसी व्यक्ति की नियुक्ति या सेवा में किसी व्यक्ति के लिए अनुपस्थिति, छुट्टी, प्रोन्नति या कोई अन्य फायदा या अनुग्रह प्राप्त कराने के लिए हेतु या इनाम के रूप में कोई परितोष अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत होगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा; या
(च) उस देश के, जिसमें वह सेवा कर रहा है, किसी वासी या निवासी की सम्पत्ति या उसके शरीर के विरुद्ध कोई अपराध करेगा,
तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
42. प्रयत्न-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 41 में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के किए जाने की दिशा में कोई कार्य करेगा, सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जिसमें ऐसे प्रयत्न के दण्ड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है,-
(क) यदि कोई प्रयतित अपराध मृत्यु से दण्डनीय है तो कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा; और
(ख) यदि प्रयतित अपराध कारावास से दण्डनीय है तो कारावास का, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
43. किए गए अपराधों का दुष्प्रेरण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 41 में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जबकि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, उस अपराध के लिए उपबंधित दंड का या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
44. ऐसे अपराधों का दुष्प्रेरण जो नहीं किए गए हैं-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15, धारा 17 और धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन मृत्यु से दंडनीय किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जिससे वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 41 में (जिसमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट और कारावास से दण्डनीय अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जब कि वह अपराध ऐसे दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, कारावास का, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
45. सिविल अपराध-धारा 46 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, भारत में या भारत से बाहर किसी स्थान पर कोई सिविल अपराध करेगा तो उसे इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध का दोषी समझा जाएगा और यदि उस पर, वह अपराध इस धारा के अधीन आरोपित किया जाता है तो वह सुरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने का और दोषसिद्धि पर निम्नलिखित रूप से दंडित किए जाने का भागी होगा, अर्थात् :-
(क) यदि अपराध ऐसा है जो भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन मृत्यु से दंडनीय है, तो वह किसी ऐसे दंड का, जो ऐसे अपराध के लिए पूर्वोक्त विधि द्वारा नियत किया गया है, और ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा; और
(ख) किसी अन्य दशा में, वह किसी ऐसे दंड का, जो उस अपराध के लिए भारत में प्रवृत्त विधि द्वारा नियत किया गया है, या कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष त की ही सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।
46. सिविल अपराध, जो सुरक्षक न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन नहीं है, हत्या का या हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध का या ऐसे व्यक्ति से बलात्संग करने का अपराध करेगा, तो उसे इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का दोषी नहीं समझा जाएगा और सुरक्षक न्यायालय द्वारा उसका विचारण तभी किया जाएगा जब वह उक्त अपराधों में से कोई अपराध-
(क) सक्रिय ड्यूटी पर रहने के दौरान करता है ; या
(ख) भारत के बाहर किसी स्थान पर करता है ।
अध्याय 4
दण्ड
47. सुरक्षक न्यायालयों द्वारा अधिनिर्णेय दण्ड-(1) ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन हैं और जो सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किए गए हैं, किए गए अपराधों के बारे में निम्नलिखित मापमान के अनुसार दंड दिए जा सकेंगे, अर्थात् :-
(क) मृत्यु ;
(ख) कारावास, जो आजीवन या किसी अन्य लघुतर अवधि का हो सकेगा, किन्तु इसके अन्तर्गत सुरक्षक की अभिरक्षा में तीन मास से अनधिक अवधि का कारावास नहीं है ;
(ग) सेवा से पदच्युति ;
(घ) सुरक्षक की अभिरक्षा में तीन मास से अनधिक अवधि का कारावास ;
(ङ) रेंजर श्रेणी 1 की दशा में, सामान्य सैनिक के रूप में या निम्नतर रैंक या श्रेणी में अवनति ;
(च) रैंक में ज्येष्ठता का समपहरण और प्रौन्नति के प्रयोजन के लिए सेवा की पूर्ण अवधि या उसके किसी भाग का समपहरण जहां प्रौन्नति सेवाकाल पर निर्भर करती है ;
(छ) वेतन वृद्धि या पेंशन या अन्य विहित प्रयोजन के लिए सेवा की अवधि का समपहरण ;
(ज) रेंजर श्रेणी 1 के रैंक के नीचे वाले व्यक्तियों को छोड़ कर तीव्र धिग्दंड या धिग्दंड ;
(झ) सेवा से पदच्युति से दंडित व्यक्ति की दशा में, वेतन और भत्तों की सब बकाया और अन्य लोक धन का समपहरण, जो ऐसी पदच्युति के समय उसको शोध्य हो ;
(ञ) वेतन और भत्तों की कटौती उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति के लिए जो इस अपराध के कारण हुआ है जिसके लिए उसे दोषसिद्ध ठहराया गया है ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक दंड उपर्युक्त मापमान में उस पूर्ववर्ती प्रत्येक दंड से कोटि में निम्नतर समझा जाएगा ।
48. सुरक्षक न्यायालय द्वारा अधिनिर्णेय आनुकल्पिक दण्ड-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सुरक्षक न्यायालय ऐसे किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 44 में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी के लिए दोषसिद्ध किए जाने पर, या तो वह विशिष्ट दंड जिससे उक्त अपराध के दंडनीय होने का कथन धाराओं में है या उसके बदले में धारा 47 में दिए गए दंडों में से कोई निम्नतर मापमान का दंड अपराध की प्रकृति और मात्रा को ध्यान में रखते हुए, अधिनिर्णीत कर सकेगा ।
49. दण्डों का संयोजन-सुरक्षक न्यायालय के दंडादेश द्वारा, किसी अन्य दंड के अतिरिक्त या उसके बिना, धारा 47 की उपधारा (1) के खंड (ग) में विनिर्दिष्ट दंड और उस उपधारा के खंड (ङ) से खंड (ञ) तक में (जिनमें ये दोनों खंड भी सम्मिलित है) विनिर्दिष्ट दंडों में से कोई एक या अधिक दंड अधिनिर्णीत किए जा सकेंगे ।
50. सुरक्षक न्यायालय द्वारा दण्डित किए जाने से अन्यथा दण्डित किया जाना-ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन हैं, किए गए अपराधों के बारे में दंड सुरक्षक न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना धारा 51 और धारा 53 में कथित रीति से भी दिए जा सकेंगे ।
51. छोटे दण्ड-(1) धारा 52 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ग्रुप कमांडर के रैंक या और उससे ऊपर के रैंक का कोई कमांडर ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन है और जो आफिसर या सहायक कमांडर नहीं है और जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड विहित विस्तार तक अधिनिर्णीत कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) सुरक्षक की अभिरक्षा में अट्ठाईस दिन तक का कारावास ;
(ख) अट्ठाईस दिन तक का निरोध ;
(ग) अट्टाईस दिन तक का लाइनों में परिरोध ;
(घ) अतिरिक्त पहरा या ड्यूटी ;
(ङ) किसी कार्यकारी रैंक से वंचित करना, परन्तु यह तब जबकि उसने ऐसा रैंक दो वर्ष से अधिक धारित नहीं किया है,
(च) तीव्र धिग्दंड या धिग्दंड ;
(छ) उसके वेतन और भत्तों में से किसी ऐसी राशि की कटौती जो ऐसी हानि या नुकसान की पूर्ति के लिए अपेक्षित हो, जो उस अपराध से कारित हुआ है, जिसके लिए वह दंडित किया गया है ।
(2) यदि ऐसे किसी ग्रुप को स्क्वाड्रन कमांडर के या टीम कमांडर के रैंक के आफिसर द्वारा अस्थायी रूप से समादेश किया जाता है तो ऐसे आफिसर को उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कमांडर की पूर्ण शक्तियां प्राप्ति होंगी ।
(3) धारा 52 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, स्क्वाड्रन कमांडर या किसी स्क्वाड्रन या टीम या किसी टुकड़ी को समादेश करने वाले टीम कमांडर किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन है और जो आफिसर या सहायक कमांडर नहीं है और जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को उपधारा (1) के खण्ड (क) से खण्ड (घ) में और खण्ड (छ) में विनिर्दिष्ट दण्डों में से एक या अधिक दंड विहित विस्तार तक अधिनिर्णीत कर सकेगा परन्तु खण्ड (क), खण्ड (ख) और खण्ड (ग) में से प्रत्येक के अधीन अधिनिर्णीत दण्ड की अधिकतम सीमा चौदह दिन से अधिक नहीं होगी ।
52. धारा 51 के अधीन दंडों की परिसीमा-(1) धारा 51 की उपधारा (1) के खण्ड (क), खण्ड (ख), खण्ड (ग), और खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट दंडों में से दो या अधिक के अधिनिर्णय की दशा में, खण्ड (ग) या खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट दण्ड खण्ड (क) या खण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट दण्ड के खत्म होने पर ही प्रभावशील होंगे ।
(2) जब किसी व्यक्ति को उक्त खण्ड (क), खण्ड (ख) और खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट दण्डों में से दो या अधिक दण्ड संयुक्ततः अधिनिर्णीत किए गए हों, या जब उक्त दंडों में से एक या अधिक पहले से ही भोग रहा हो, तक उन दण्डों का सम्पूर्ण विस्तार कुल मिलाकर छप्पन दिन से अधिक नहीं होगा ।
(3) उक्त खण्ड (क), खण्ड (ख), और खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट दण्ड किसी ऐसे व्यक्ति को अधिनिर्णीत नहीं किए जाएंगे जो रेंजर श्रेणी 1 के रैंक का है या जो उस अपराध को करते समय, जिसके लिए उसे दंडित किया जाता है, ऐसे रैंक का था ।
(4) धारा 51 की उपधारा (1) के खण्ड (च) में विनिर्दिष्ट दण्ड रेंजर श्रेणी 1 के रैंक से नीचे के किसी व्यक्ति को अधिनिर्णीत नहीं किया जाएगा ।
53. स्क्वाड्रन कमांडरों के रैंक के या उनसे नीचे के रैंक के आफिसरों को ऐसे आफिसरों द्वारा दण्ड, जो महानिरीक्षक के रैंक से नीचे के न हों-ऐसा आफिसर जो महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, स्क्वाड्रन कमाण्डर के रैंक के या उसके रैंक से नीचे के किसी ऐसे आफिसर के विरुद्ध जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और निम्नलिखित दण्डों में से एक या अधिक दण्ड दे सकेगा, अर्थात् :-
(क) ज्येष्ठता का समपहरण, या उनमें से किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में जिसकी प्रौन्नति सेवाकाल की लम्बाई पर निर्भर है, एक वर्ष से अनधिक की अवधि के सेवाकाल का प्रौन्नति के प्रयोजन के लिए समपहरण, किन्तु यह बात दण्ड अधिनिर्णीत किए जाने के पूर्व अभियुक्त के यह निर्वाचन करने के अधिकार के अधीन होगी कि उनका विचारण जनरल सुरक्षक न्यायालय द्वारा किया जाए ;
(ख) तीव्र धिग्दण्ड या धिग्दण्ड ;
(ग) वेतन और भत्तों में से किसी ऐसी राशि की कटौती, जो उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति करने के लिए अपेक्षित हो, जो उस अपराध के कारण हुआ है, जिसके लिए उसे दोषसिद्ध किया गया है ।
54. सहायक कमांडर के रैंक के व्यक्तियों को दण्ड-(1) ऐसा आफिसर, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, सहायक कमाण्डर के रैंक के किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और उसे निम्नलिखित दण्डों में से एक या अधिक दण्ड दे सकेगा, अर्थात् :-
(क) ज्येष्ठता का समपहरण, या उनमें से किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में जिसकी प्रौन्नति सेवाकाल की लम्बाई पर निर्भर है, एक वर्ष से अनधिक की अवधि के सेवाकाल का प्रौन्नति के प्रयोजन के लिए समपहरण किन्तु यह बात दंड अधिनिर्णीत किए जाने के पूर्व अभियुक्त के यह निर्वाचन करने के अधिकार के अधीन होगी कि उनका विचारण जनरल सुरक्षक न्यायालय द्वारा किया जाए;
(ख) तीव्र धिन्दण्ड या धिन्दण्ड ;
(ग) वेतन और भत्तों में से किसी ऐसी राशि की कटौती, जो उस साबित हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति करने के लिए अपेक्षित हो, जो उस अपराध के कारण हुआ है, जिसके लिए उसे दोषसिद्ध किया गया है ।
(2) ग्रुप कमाण्डर के रैंक के नीचे का कोई आफिसर, किसी सहायक कमाण्डर के रैंक के ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और निम्नलिखित दण्डों में से कोई एक या दोनों दण्ड दे सकेगा, अर्थात् :-
(क) तीव्र धिग्दण्ड या धिग्दण्ड ;
(ख) वेतन और भत्तों में से किसी ऐसी राशि की कटौती, जो उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति करने के लिए अपेक्षित हो, जो उस अपराध के कारण हुआ है, जिसके लिए उसे दोषसिद्ध किया गया है ।
अध्याय 5
गिरफ्तारी और विचारण के पूर्व की कार्यवाहियां
55. अपराधियों की अभिरक्षा-(1) यदि किसी व्यक्ति पर, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी अपराध का आरोप है, तो उसे किसी वरिष्ठ आफिसर के आदेश से सुरक्षक की अभिरक्षा में लिया जा सकेगा ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई आफिसर किसी ऐसे अन्य आफिसर को, जो झगड़ा, दंगा या उपद्रव करने में लगा हो, भले ही वह उच्चतर रैंक का हो, सुरक्षक की अभिरक्षा में ले लेने का आदेश दे सकेगा ।
56. निरोध के संबंध में कमांडर का कर्तव्य-(1) प्रत्येक कमाण्डर का इस बात की सतर्कता बरतने का कर्तव्य होगा कि अपने कमान के अधीन के किसी व्यक्ति को जब उस पर किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है तब, आरोप का अन्वेषण किए बिना, उस समय के पश्चात्, जब ऐसे व्यक्ति को अभिरक्षा में सुपुर्द किए जाने की रिपोर्ट उसे की गई है अड़तालीस घंटे से अधिक के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध तभी किया जाए जब उस व्यक्ति के अन्दर ऐसे अन्वेषण का किया जाना लोक सेवा की दृष्टि से उसे असाध्य प्रतीत होता है, अन्यथा नहीं ।
(2) कमाण्डर ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के मामले की, जिसे अड़तालीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध किया गया है और ऐसे निरुद्ध रखे जाने के कारणों की रिपोर्ट अगले उच्चतर अधिकारी को देगा ।
(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अड़तालीस घंटों की अवधि की गणना करने में, रविवार और अन्य लोक अवकाश दिन नहीं गिने जाएंगे ।
(4) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार उस रीति और उस अवधि का उपबन्ध करने वाले नियम बना सकेगी जिस रीति से और जिस अवधि के लिए कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है उसके द्वारा किए गए किसी अपराध के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा विचारण लंबित रहने तक सुरक्षक अभिरक्षा में लिया जा सकेगा और निरुद्ध किया जा सकेगा ।
57. सुपुर्दगी और विचारण किए जाने के बीच का अन्तराल-ऐसे प्रत्येक मामले में, जिसमें कोई ऐसा व्यक्ति, जो धारा 55 में वर्णित है और सक्रिय ड्यूटी पर नहीं है, उसके विचारण के लिए सुरक्षक न्यायालय संयोजित किए बिना, ऐसी अभिरक्षा में आठ दिन से दीर्घतर अवधि के लिए रहता है, उसके कमाण्डर द्वारा विलम्ब का कारण बताने वाली एक विशेष रिपोर्ट की जाएगी और ऐसी ही रिपोर्ट हर आठ दिन के अन्तरालों पर तब तक भेजी जाएगी जब तक सुरक्षक न्यायालय संयोजित न कर लिया जाए या उस व्यक्ति को अभिरक्षा से निर्मुक्त न कर दिया जाए ।
58. सिविल प्राधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी-जब कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है, मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर की आधिकारिता के अन्दर है, वह मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर उस व्यक्ति के कमाण्डर द्वारा या ऐसे आफिसर द्वारा, जिसे कमाण्डर ने इस निमित्त प्राधिकृत किया है, हस्ताक्षरित उस भाव का लिखित आवेदन प्राप्त होने पर उस व्यक्ति के पकड़े जाने और सुरक्षक की अभिरक्षा में दिए जाने में सहायता करेगा ।
59. अभित्याजकों को पकड़ना-(1) जब कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन करता है, तब उस यूनिट का, जिसका वह सदस्य है, कमाण्डर ऐसे अभित्यजन की इत्तिला ऐसे सिविल प्राधिकारियों को देगा जो उसकी राय में अभित्याजक को पड़कने में सहायता देने के लिए समर्थ है, और तब वे प्राधिकारी उक्त अभित्याजक को पकड़ने के लिए उसी रीति से कार्रवाई करेंगे मानो वह ऐसा व्यक्ति है जिसे पकड़ने के लिए किसी मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट निकाला गया है और अभित्याजक को पकड़ लिए जाने पर उसे सुरक्षक की अभिरक्षा में दे देंगे ।
(2) कोई भी पुलिस आफिसर किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके बारे में युक्तियुक्त रूप से यह विश्वास है कि वह इस अधिनियम के अधीन है और अभित्याजक है, बिना वारण्ट गिरफ्तार कर सकेगा और उसके साथ विधि के अनुसार बरते जाने के लिए उसे अविलंब निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष लाएगा ।
60. छुट्टी के बिना अनुपस्थित रहने की जांच-(1) जब कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, सम्यक् प्राधिकार के बिना तीस दिन की अवधि पर्यन्त अपने कर्तव्य से अनुपस्थित रहा है तब एक जांच न्यायालय यथासाध्य शीघ्र ऐसे आफिसर द्वारा जो जो ग्रुप कमांडर के रैंक से नीचे का न हो और जिसके कमान के अधीन वह तत्समय सेवारत है नियुक्त किया जाएगा; और वह न्यायालय उस व्यक्ति की अनुपस्थिति के बारे में और उसे देखरेख के लिए सौंपी गई सरकारी संपत्ति में या किन्हीं आयुधों, गोलाबारूद, उपस्कर, उपकरणों, कपड़ों या आवश्यक वस्तुओं में हुई कमी के, यदि कोई हो, बारे में जांच विहित रीति से दिलाई गई शपथ या कराए गए प्रतिज्ञान पर करेगा और यदि उसका इस तथ्य की बाबत समाधान हो जाता है कि ऐसी अनुपस्थिति सम्यक् प्राधिकार या अन्य पर्याप्त हेतुक के बिना हुई है तो न्यायालय उस अनुपस्थिति और उसकी अवधि की तथा उक्त कमी की, यदि कोई हो, घोषणा करेगा और जांच न्यायालय की कार्यवाही को, जांच न्यायालय की नियुक्ति करने वाले आफिसर के पास आगे की कार्रवाई के लिए पारेषित करेगा ।
(2) यदि वह व्यक्ति, जिसे अनुपस्थित घोषित किया गया है, तत्पश्चात् न तो अर्भ्यपण करता है और न पकड़ा जाता है तो उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभित्याजक समझा जाएगा ।
अध्याय 6
सुरक्षक न्यायालय
61. सुरक्षक न्यायालयों के प्रकार-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सुरक्षक न्यायालय तीन प्रकार के होंगे, अर्थात् :-
(क) जनरल सुरक्षक न्यायालय ;
(ख) पैटी सुरक्षक न्यायालय ; तथा
(ग) समरी सुरक्षक न्यायालय ।
62. जनरल सुरक्षक न्यायालय संयोजित करने की शक्ति-जनरल सुरक्षक न्यायालय केन्द्रीय सरकार द्वारा या महानिदेशक द्वारा या महानिदेशक के अधिपत्र से इस निमित्त सशक्त किए गए किसी आफिसर द्वारा संयोजित किया जा सकेगा ।
63. पैटी सुरक्षक न्यायालय संयोजित करने की शक्ति-पैटी सुरक्षक न्यायालय जनरल सुरक्षक न्यायालय संयोजित करने की शक्ति करने रखने वाले आफिसर द्वारा या ऐसे किसी आफिसर के अधिपत्र से इस निमित्त सशक्त किए गए आफिसर द्वारा संयोजित किया जा सकेगा ।
64. धारा 62 और धारा 63 के अधीन निकाले गए अधिपत्रों की अंतर्वस्तुएं-धारा 62 या धारा 63 के अधीन निकाले गए अधिपत्र में ऐसे निर्बंधन, आरक्षण या शर्तें हो सकेंगी जो उसे निकालने वाला आफिसर ठीक समझे ।
65. जनरल सुरक्षक न्यायालय की संरचना-जनरल सुरक्षक न्यायालय कम से कम पांच आफिसरों से मिलकर बनेगा ।
66. पैटी सुरक्षक न्यायालय की संरचना-पैटी सुरक्षक न्यायालय कम से कम तीन आफिसरों से मिलकर बनेगा ।
67. समरी सुरक्षक न्यायालय-(1) समरी सुरक्षक न्यायालय सुरक्षक की किसी यूनिट के कमाण्डर द्वारा अधिविष्ट किया जा सकेगा और वह न्यायालय अकेले उससे ही गठित होगा ।
(2) कार्यवाहियों में दो अन्य ऐसे व्यक्ति आरंभ से अंत तक हाजिर रहेंगे जो आफिसर या सहायक कमाण्डर या दोनों में से एक-एक होंगे और जिन्हें उस रूप में न तो शपथ दिलाई जाएगी और न प्रतिज्ञान कराया जाएगा :
परंतु किसी आफिसर के विचारण के लिए न्यायालय में हाजिर रहने वाले व्यक्ति उस आफिसर के रैंक से नीचे के रैंक के नहीं होंगे जब तक कि संयोजन आफिसर की राय में जो संयोजन आदेश में अभिलिखित की गई हो ऐसे रैंक के आफिसर लोक सेवा की अभ्यावश्यकताओं का सम्यक् ध्यान रखते हुए उपलब्ध नहीं है ।
68. सुरक्षक न्यायालय का विघटन-(1) यदि विचारण प्रारम्भ होने के पश्चात् किसी सुरक्षक न्यायालय के उन आफिसरों की संख्या, उस न्यूनतम संख्या से जो इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित है, कम हो जाती है तो उसे विघटित कर दिया जाएगा ।
(2) यदि निष्कर्ष के पहले, यथास्थिति, सम्बन्धित जज अटर्नी या उप जज अटर्नी जनरल या अपर जज अटर्नी-जनरल या अभियुक्त की रुग्णता के कारण विचारण चलाते रहना असम्भव हो जाता है तो सुरक्षक न्यायालय को विघटित कर दिया जाएगा ।
(3) यदि उस प्राधिकारी या आफिसर को जिसने सुरक्षक न्यायालय संयोजित किया है यह प्रतीत होता है कि सेवा की अभ्यावश्यकताओं या अनुशासनिक आवश्यकताओं के कारण उक्त सुरक्षक न्यायालय का चालू रहना असम्भव या असमीचीन हो गया है तो वह ऐसे न्यायालय को विघटित कर सकेगा ।
(4) जहां सुरक्षक न्यायालय को इस धारा के अधीन विघटित कर दिया जाता है वहां अभियुक्त का विचारण फिर से किया जा सकेगा ।
69. जनरल सुरक्षक न्यायालय की शक्तियां-जनरल सुरक्षक न्यायालय को किसी ऐसे व्यक्ति का जो इस अधिनियम के अधीन है ऐसे अपराध के लिए जो उसके अधीन दंडनीय है विचारण करने और उसके द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश पारित करने की शक्ति होगी ।
70. पैटी सुरक्षक न्यायालय की शक्तियां-पैटी सुरक्षक न्यायालय का आफिसर या सहायक कमांडर से भिन्न किसी व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे अपराध के लिए, जो उसके अधीन दण्डनीय है, विचारण करने की तथा इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई ऐसा दंडादेश पारित करने की, जो मृत्यु या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के दण्डादेश से भिन्न है, शक्ति होगी ।
71. समरी सुरक्षक न्यायालय की शक्तियां-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, समरी सुरक्षक न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी भी अपराध का विचारण कर सकेगा ।
(2) जब तुरन्त कार्रवाई के लिए कोई गंभीर कारण नहीं है और अनुशासन का अहित किए बिना अभिकथित अपराधी के विचारण के लिए उस आफिसर को निर्देश किया जा सकता है जो पैटी सुरक्षक न्यायालय संयोजित करने के लिए सशक्त है तब समरी सुरक्षक न्यायालय अधिविष्ट करने वाला आफिसर, धारा 15, धारा 17, और धारा 45 में से किसी के अधीन दंडनीय किसी भी अपराध का या न्यायालय अधिविष्ट करने वाले आफिसर के विरुद्ध किसी अपराध का विचारण ऐसे निर्देश के बिना नहीं करेगा ।
(3) समरी सुरक्षक न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति का विचारण कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन है, और जो न्यायालय को अधिविष्ट करने वाले आफिसर के कमान के अधीन है, किन्तु किसी आफिसर या सहायक कमाण्डर का विचारण नहीं कर सकेगा ।
(4) समरी सुरक्षक न्यायालय मृत्यु या उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट परिसीमा से अधिक की अवधि के कारावास के दंडादेश से भिन्न कोई भी ऐसा दंडादेश पारित कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन पारित किया जा सकता है ।
(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट परिसीमा,-
(क) उस दशा में एक वर्ष होगी जब सुरक्षक न्यायालय को अधिविष्ट करने वाला आफिसर ग्रुप कमाण्डर के नीचे का रैंक नहीं धारण करता है ;
(ख) किसी अन्य दशा में तीन मास की होगी ।
72. द्वितीय विचारण का प्रतिषेध-(1) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षक न्यायालय द्वारा या दंड न्यायालय द्वारा किसी अपराध से दोषमुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध कर दिया गया है या उसके बारे में धारा 51 या धारा 53 या धारा 54 के अधीन कार्यवाही की गई है तब वह उसी अपराध के लिए सुरक्षक न्यायालय द्वारा पुनः विचारण किए जाने या उक्त धाराओं के अधीन पुनः कार्यवाही किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।
(2) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षक न्यायालय द्वारा किसी अपराध से दोषमुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध कर दिया गया है या उसके बारे में धारा 51 या धारा 53 या धारा 54 के अधीन कार्यवाही कर दी गई है तब वह उसी अपराध के लिए या उन्हीं तथ्यों पर किसी दंड न्यायालय द्वारा पुनः विचारण किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।
73. विचारण के लिए परिसीमाकाल-(1) उपधारा (2) द्वारा उपबंधित के सिवाय, किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है सुरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण ऐसे अपराध की तारीख से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् प्रारंभ नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबंध अभित्यजन के अपराध के लिए या धारा 17 में वर्णित अपराधों में से किसी के लिए विचारण को लागू नहीं होंगे ।
(3) उपधारा (1) में वर्णित समय की अवधि की संगणना करने में ऐसे व्यक्ति द्वारा अपराध करने के पश्चात् गिरफ्तारी से बचने में व्यतीत किया गया समय नहीं लिया जाएगा ।
74. उस अपराधी का विचारण, आदि जो इस अधिनियम के अधीन नहीं रह जाता है-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया गया था जब वह इस अधिनियम के अधीन था और अब वह ऐसे अधीन नहीं रह गया है वहां उसे सुरक्षक की अभिरक्षा में ऐसे ले लिया और रखा जा सकेगा तथा ऐसे अपराध के लिए उसका ऐसे विचारण और उसे दंडित किया जा सकेगा मानो वह ऐसे अधीन बना रहा हो ।
(2) ऐसे किसी व्यक्ति का किसी अपराध के लिए विचारण तभी किया जाएगा जब उसका विचारण उसके इस अधिनियम के अधीन न रह जाने के पश्चात् छह मास के अन्दर प्रारंभ हो जाए, अन्यथा नहीं :
परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात अभित्यजन के अपराध के लिए या धारा 17 में वर्णित अपराधों में से किसी के लिए ऐसे व्यक्ति के विचारण को न तो लागू होगी और न ऐसे किसी अपराध का विचारण करने की दंड न्यायालय की अधिकारिता पर प्रभाव डालेगी जो ऐसे न्यायालय द्वारा तथा सुरक्षक न्यायालय द्वारा भी विचारणीय है ।
75. दंडादेश की अवधि के दौरान अधिनियम का लागू होना-(1) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई सुरक्षक न्यायालय कारावास का दंडादेश देता है तब यह अधिनियम उसके दंडादेश की अवधि के दौरान उसे लागू होगा, भले ही उसे सुरक्षक से पदच्युत कर दिया गया है या वह अन्यथा इस अधिनियम के अधीन नहीं रह गया है और उसे ऐसे रखा, हटाया या कारावासित और दंडित किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के अधीन बना रहा है ।
(2) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षक न्यायालय द्वारा मुत्यु का दंडादेश दिया जाता है, तब यह अधिनियम उसे तब तक लागू होगा जब तक कि वह दंडादेश कार्यान्वित नहीं कर दिया जाता ।
76. विचारण का स्थान-किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो इस अधिनियम के विरुद्ध कोई अपराध करता है, ऐसे अपराध के लिए किसी भी स्थान पर विचारण किया जा सकेगा और उसे दंडित किया जा सकेगा ।
77. दंड न्यायालय और सुरक्षक न्यायालय में से किसी एक का चयन-जब किसी अपराध के संबंध में दंड न्यायालय और सुरक्षक न्यायालय में से प्रत्येक को अधिकारिता है तब यह विनिश्चय करना कि कार्यवाहियां किस न्यायालय के समक्ष संस्थित की जाएं उस महानिदेशक या महानिरीक्षक या उप महानिरीक्षक के, जिसके कमान में अभियुक्त व्यक्ति सेवा कर रहा है, या ऐसे अन्य आफिसर के, जो विहित किया जाए, विवेकाधीन होगा और यदि वह आफिसर यह विनिश्चय करता है कि कार्यवाहियां सुरक्षक न्यायालय के समक्ष संस्थित की जाएं तो यह निदेश देना कि अभियुक्त व्यक्ति को सुरक्षक न्यायालय की अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाए, उसके विवेकाधीन होगा ।
78. दंड न्यायालय की यह अपेक्षा करने की शक्ति कि अपराधी सौंपा जाए-(1) जब अधिकारिता रखने वाले दंड न्यायालय की यह राय है कि किसी अभिकथित अपराध के बारे में कार्यवाहियां उसी के समक्ष संस्थित की जानी चाहिएं तब वह लिखित सूचना द्वारा धारा 77 में निर्दिष्ट आफिसर से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह स्वविकल्प पर या तो अपराधी को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए निकटतम मजिस्ट्रेट को सौंप दे या केन्द्रीय सरकार को निर्देश किए जाने तक कार्यवाहियों को मुल्तवी कर दे ।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में उक्त आफिसर या तो उस अध्यपेक्षा के अनुपालन में अपराधी को सौंप देगा या इस प्रश्न को कि कार्यवाहियां किस न्यायालय के समक्ष संस्थित की जानी हैं, केन्द्रीय सरकार को उसके द्वारा अवधारण के लिए तत्काल निर्देशित करेगा और ऐसे निर्देश पर केन्द्रीय सरकार का आदेश अंतिम होगा ।
अध्याय 7
सुरक्षक न्यायालयों की प्रक्रिया
79. पीठासीन आफिसर-प्रत्येक जनरल सुरक्षक न्यायालय या पैटी सुरक्षक न्यायालय में ज्येष्ठ सदस्य पीठासीन आफिसर होगा ।
80. जज अटर्नी आदि-जज अटर्नी या उप जज अटर्नी जनरल या कोई अपर जज अटर्नी जनरल या यदि ऐसा कोई आफिसर उपलब्ध नहीं है तो जज अटर्नी जनरल द्वारा या, जज अटर्नी जनरल द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी आफिसर द्वारा अनुमोदित कोई आफिसर प्रत्येक जनरल सुरक्षक न्यायालय में हाजिर रहेगा और प्रत्येक पैटी सुरक्षक न्यायालय में हाजिर रह सकेगा ।
81. आक्षेप-(1) जनरल सुरक्षक न्यायालय या पैटी सुरक्षक न्यायालय द्वारा सभी विचारणों में, जैसे ही न्यायालय समवेत हो वैसे ही, पीठासीन आफिसर और सदस्यों के नाम अभियुक्त को पढ़कर सुनाए जाएंगे और तब उससे यह पूछा जाएगा कि क्या वह न्यायालयासीन किसी आफिसर द्वारा अपना विचारण किए जाने पर आक्षेप करता है ।
(2) यदि अभियुक्त ऐसे किसी आफिसर के बारे में आक्षेप करता है तो उसका आक्षेप और उस पर उस आफिसर का, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, उत्तर भी सुना और अभिलिखित किया जाएगा और न्यायालय के बाकी आफिसर उस आक्षेप पर उस आफिसर की अनुपस्थिति में, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, विनिश्चय करेंगे ।
(3) यदि आक्षेप मतदान करने के हकदार आफिसरों में से आधे या उससे अधिक आफिसरों के मतों से मंजूर किया जाता है तो आक्षेप मंजूर किया जाएगा और वह सदस्य जिसके बारे में आक्षेप किया गया है निवृत्त हो जाएगा और उस रिक्ति को विहित रीति से किसी अन्य आफिसर से इस शर्त के अधीन रहते हुए भरा जाएगा कि अभियुक्त को उसके बारे में भी आक्षेप करने का वही अधिकार होगा ।
(4) जब कोई आक्षेप नहीं किया गया है या जब आक्षेप किया गया है और वह नामंजूर कर दिया गया है या ऐसे प्रत्येक आफिसर का स्थान, जिसके बारे में सफलतापूर्वक आक्षेप किया गया है, किसी अन्य ऐसे आफिसर से भर दिया गया है जिसके बारे में कोई आक्षेप नहीं किया गया है या मंजूर नहीं किया गया है तब न्यायालय विचारण के लिए अग्रसर होगा ।
82. सदस्यों, जज अटर्नी और साक्षी को शपथ दिलाना-(1) विचारण के प्रारंभ के पूर्व, प्रत्येक सुरक्षक न्यायालय के प्रत्येक सदस्य को और, यथास्थिति, जज अटर्नी या उप जज अटर्नी जनरल या अपर जज अटर्नी जनरल या धारा 80 के अधीन अनुमोदित आफिसर को विहित रीति से शपथ दिलाई जाएगी या उससे प्रतिज्ञान कराया जाएगा ।
(2) सुरक्षक न्यायालय के समक्ष साक्ष्य देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा विहित प्ररूप में सम्यक् रूप से उसे शपथ दिलाने या उससे प्रतिज्ञान कराने के पश्चात् की जाएगी ।
(3) उपधारा (2) के उपबन्ध वहां लागू नहीं होंगे जहां साक्षी बारह वर्ष से कम आयु का बालक है और सुरक्षक न्यायालय की यह राय है कि यद्यपि साक्षी सत्य बोलने के कर्तव्य को समझता है तथापि वह शपथ या प्रतिज्ञान की प्रकृति को नहीं समझता ।
83. सदस्यों द्वारा मतदान-(1) उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सुरक्षक न्यायालय का प्रत्येक विनिश्चय स्पष्ट बहुमत से पारित किया जाएगा और जहां निष्कर्ष या दंडादेश के बारे में मत बराबर हैं वहां विनिश्चय अभियुक्त के पक्ष में होगा ।
(2) जनरल सुरक्षक न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडादेश उस न्यायालय के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति के बिना पारित नहीं किया जाएगा ।
(3) आक्षेप या निष्कर्ष या दंडादेश के मामलों से भिन्न मामलों में पीठासीन आफिसर को निर्णायक मत देने का अधिकार होगा ।
84. साक्ष्य के बारे में साधारण नियम-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सुरक्षक न्यायालय के समक्ष की सब कार्यवाहियों को लागू होगा ।
85. न्यायिक अवेक्षा-सुरक्षक न्यायालय किसी ऐसी बात की न्यायिक अवेक्षा कर सकेगा जो सुरक्षक के आफिसरों के रूप में सदस्यों के साधारण ज्ञान में होती है ।
86. साक्षियों को समन करना-(1) संयोजक आफिसर, सुरक्षक न्यायालय का पीठासीन आफिसर, यथास्थिति, जज अटर्नी या उप जज अटर्नी जनरल या अपर जज अटर्नी जनरल या धारा 80 के अधीन अनुमोदित आफिसर या अभियुक्त व्यक्ति का कमाण्डर स्वस्हताक्षरित समन द्वारा किसी व्यक्ति की, या साक्ष्य देने के लिए या कोई दस्तावेज या अन्य वस्तु पेश करने के लिए उस समय और स्थान पर, जो समन में उल्लिखित किया जाए, हाजिरी की अपेक्षा कर सकेगा ।
(2) किसी ऐसे साक्षी की दशा में, जो इस अधिनियम के अधीन है, समन उसके कमाण्डेण्ट को भेजा जाएगा और वह आफिसर उसकी तद्नुसार उस पर तामील करेगा ।
(3) किसी अन्य साक्षी की दशा में, समन उस मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा जिसकी अधिकारिता के भीतर वह है या निवास करता है और वह मजिस्ट्रेट समन को ऐसे कार्यान्वित करेगा मानो साक्षी से उस मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आने की अपेक्षा की गई हो ।
(4) जब किसी साक्षी से उसके कब्जे या शक्ति में की किसी विशिष्ट दस्तावेज की या अन्य वस्तु को पेश करने की अपेक्षा की जाती है तब समन में उचित प्रमितता के साथ उसका वर्णन किया जाएगा ।
87. पेश किए जाने से छूट-प्राप्त दस्तावेजें-(1) धारा 86 की कोई भी बात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली अथवा डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में किसी पत्र, पोस्टकार्ड, तार या अन्य दस्तावेज को लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी ।
(2) यदि किसी जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय की राय में ऐसी अभिरक्षा में के किसी दस्तावेज की किसी सुरक्षक न्यायालय के प्रयोजन के लिए आवश्यकता है तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसे दस्तोवज ऐसे व्यक्ति को परिदत्त करें जिसे वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय निदिष्ट करे ।
(3) यदि किसी अन्य मजिस्ट्रेट या किसी पुलिस आयुक्त या जिला पुलिस अधीक्षक की राय में किसी ऐसे दस्तावेज की ऐसे ही किसी प्रयोजन के लिए आवश्यकता है तो वह, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसे दस्तावेज की तलाश कराएं और उसे ऐसे किसी जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय के आदेश होने तक रोक रखें ।
88. साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन-(1) जब कभी सुरक्षक न्यायालय द्वारा किए जा रहे विचारण के दौरान न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि साक्षी की परीक्षा की जाए और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतने विलम्ब, व्यय या असुविधा के बिना, जो मामले की परिस्थितियों में अनुचित होगा, नहीं कराई जा सकती है, तब ऐसा न्यायालय जज अटर्नी जनरल को आदेश में लिख सकेगा कि उस साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए कमीशन निकाला जाए ।
(2) उसके पश्चात् यदि जज अटर्नी जनरल आवश्यक समझता है तो वह साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए किसी ऐसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के नाम, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह साक्षी निवास करता है, कमीशन निकाल सकेगा ।
(3) वह मजिस्ट्रेट या आफिसर जिसके नाम कमीशन निकाला गया है या, यदि वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है तो वह या ऐसा प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जिसे उसने इस निमित्त नियुक्त किया है, उस स्थान पर जाएगा जहां साक्षी है या साक्षी को अपने समक्ष आने के लिए समन करेगा और उसका साक्ष्य उसी रीति से लिखेगा और इस प्रयोजन के लिए उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन वारंट मामलों के विचारण के लिए हैं ।
(4) जब साक्षी किसी जनजाति क्षेत्र में या भारत से बाहर किसी स्थान पर निवास करता है तब कमीशन उस रीति से निकाला जा सकेगा जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 23ख में विनिर्दिष्ट है ।
89. साक्षी की कमीशन पर परीक्षा-किसी ऐसे मामले में, जिसमें धारा 88 के अधीन कमीशन निकाला गया है, अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति क्रमशः कोई ऐसे लिखित परिप्रश्न भेज सकेंगे जिन्हें न्यायालय विवाद्यक से सुसंगत समझे और ऐसे कमीशन का निष्पादन करने वाला मजिस्ट्रेट या आफिसर ऐसे परिप्रश्नों पर साक्षी की परीक्षा करेगा ।
(2) अभियोजक और काउंसेल की मार्फत अभियुक्त व्यक्ति या, उस दशा को छोड़कर जबकि अभियुक्त व्यक्ति अभिरक्षा में है, ऐसे मजिस्ट्रेट या आफिसर के समक्ष स्वयं उपसंजात हो सकेंगे और उस साक्षी की, यथास्थिति, परीक्षा, प्रति परीक्षा और पुनःपरीक्षा की जा सकेगी ।
(3) धारा 88 के अधीन निकाले गए कमीशन के सम्यक् रूप से निष्पादित किए जाने के पश्चात्, उसे साक्षी के अभिसाक्ष्य सहित, जिसकी उसके अधीन परीक्षा की गई है, जज अटर्नी जनरल को लौटा दिया जाएगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन लौटाए गए कमीशन और अभिसाक्ष्य की प्राप्ति पर जज अटर्नी जनरल उसे उस न्यायालय को, जिसकी प्रेरणा पर वह कमीशन निकाला गया था, या यदि वह न्यायालय विघटित कर दिया गया है तो, अभियुक्त व्यक्ति के विचारण के लिए संयोजित किसी अन्य न्यायालय को अग्रेषित करेगा और वह कमीशन, तत्संबंधी विवरण और अभिसाक्ष्य अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति द्वारा निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे और सब न्यायसंगत अपवादों के अधीन रहते हुए, मामलों में या तो अभियोजक द्वारा या अभियुक्त द्वारा साक्ष्य में पढ़े जा सकेंगे और न्यायालय की कार्यवाही के भाग रूप होंगे ।
(5) ऐसे प्रत्येक मामले में, जिसमें धारा 88 के अधीन कमीशन निकाला गया है, विचारण ऐसे विनिर्दिष्ट समय के लिए, जो कमीशन के निष्पादन और लौटाए जाने के लिए उचित रूप से पर्याप्त हो, स्थगित किया जा सकेगा ।
90. ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि जिसका आरोप न लगाया गया हो-वह व्यक्ति, जिस पर सुरक्षक न्यायालय के समक्ष-
(क) अभित्यजन का आरोप लगाया गया है, अभित्यजन करने का प्रयत्न करने या छुट्टी के बिना अनुपस्थित होने का दोषी ठहराया जा सकेगा ;
(ख) अभित्यजन करने का प्रयत्न करने का आरोप लगाया गया है, छुट्टी के बिना अनुपस्थित होने का दोषी ठहराया जा सकेगा ;
(ग) आपराधिक बल का प्रयोग करने का आरोप लगाया गया है, हमले का दोषी ठहराया जा सकेगा ;
(घ) धमकी भरी भाषा का प्रयोग करने का आरोप लगाया गया है, अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करने का दोषी ठहराया जा सकेगा ;
(ङ) धारा 29 के खण्ड (क), खण्ड (ग) और खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी एक का आरोप लगाया गया है, इन अपराधों में से किसी ऐसे अन्य अपराध का दोषी ठहराया जा सकेगा जिसका उस पर आरोप लगाया जा सकता था ;
(च) धारा 45 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का आरोप लगाया गया है, किसी ऐसे अन्य अपराध का दोषी ठहराया जा सकेगा जिसका उसे उस दशा में दोषी ठहराया जा सकता था जब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबन्ध लागू होंगे ;
(छ) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप लगाया गया है, अपराध के ऐसी परिस्थितियों में किए जाने का, जिनमें अधिक कठोर दण्ड अंतवर्लित है, सबूत न होने पर उसी अपराध के ऐसी परिस्थितियों में, जिनमें कम कठोर दंड अंतर्वलित है, किए जाने का दोषी ठहराया जा सकेगा ;
(ज) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप लगाया गया है, उस अपराध के प्रयत्न का या दुष्प्रेरण का दोषी ठहराया जा सकेगा, चाहे प्रयत्न या दुष्प्रेरण का आरोप पृथक्तः न लगाया गया हो ।
91. हस्ताक्षरों के बारे में उपधारणा-इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही में ऐसा कोई आवेदन, प्रमाणपत्र, वारंट, उत्तर या अन्य दस्तावेज, जिसका सरकार की सेवा में के किसी आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, पेश किए जाने पर उसके बारे में, जब तक तत्प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, यह उपधारणा की जाएगी कि वह उस व्यक्ति द्वारा और उस हैसियत से सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित है जिनके द्वारा और जिस हैसियत में उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है ।
92. नियुक्ति-पत्र-कोई नियुक्ति-पत्र जो किसी नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों में इस बात का साक्ष्य होगा कि नियुक्त व्यक्ति ने प्रश्नों के वही उत्तर दिए थे, जिनका उसके द्वारा दिया जाना उसमें व्यपदिष्ट है ।
(2) ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति को उसके मूल नियुक्ति-पत्र या उसकी ऐसी प्रतिलिपि को जो नियुक्ति-पत्र को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होना तात्पर्यित है, पेश करके साबित किया जा सकेगा ।
93. कुछ दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-(1) सुरक्षक के किसी यूनिट में किसी व्यक्ति के सेवा में होने या ऐसे यूनिट से किसी व्यक्ति की पदच्युति या उन्मुक्ति के संबंध में या किसी व्यक्ति को इन परिस्थितियों के बारे में कि उसने सुरक्षक के किसी यूनिट में सेवा नहीं की है, या वह उसका अंग नहीं था, कोई पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज उस दशा में, जबकि उसका केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक द्वारा या उसकी ओर से या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, उन तथ्यों का साक्ष्य होगा जिनका कथन उस पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज में है ।
(2) राष्ट्रीय सुरक्षक सूची या राजपत्र, जिसका प्राधिकार से प्रकाशित होना तात्पर्यित है, उसमें वर्णित आफिसरों और सहायक कमाण्डरों की प्रास्थिति तथा रैंक का और उनके द्वारा धारित किसी नियुक्ति का और सुरक्षक के उस ग्रुप या यूनिट या शाखा का, जिसके वे अंग हैं, साक्ष्य होगा ।
(3) जहां इस अधिनियम या किन्हीं नियमों के अनुसरण में या अन्यथा शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में कोई अभिलेख किसी यूनिट पुस्तक में लेखबद्ध किया गया है और कमाण्डर द्वारा या उस आफिसर द्वारा, जिसका कर्तव्य ऐसा अभिलेख लेखबद्ध करना है, हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, वहां ऐसा अभिलेख उन तथ्यों का साक्ष्य होगा जिनका उसमें कथन किया गया है ।
(4) किसी यूनिट पुस्तक में से किसी अभिलेख की प्रतिलिपि, जो ऐसी पुस्तक को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होना तात्पर्यित है, ऐसे अभिलेख का साक्ष्य होगी ।
(5) जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के आरोप पर विचारण हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, या सुरक्षक के किसी यूनिट की अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या उसे ऐसे आफिसर या व्यक्ति द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र जिसका, यथास्थिति, ऐसे आफिसर द्वारा या उस यूनिट के, जिसका कि वह व्यक्ति अंग है, कमांडर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा इस बात का कथन है कि उसका पहनावा कैसा था, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।
(6) जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के आरोप पर विचारण हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी ऐसे पुलिस आफिसर की, जो किसी पुलिस थाने के भारसाधक आफिसर से नीचे के रैंक का नहीं है, अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या उसे ऐसे आफिसर द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र जिसका ऐसे पुलिस आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा इस बात का कथन है कि उसका पहनावा कैसा था, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।
(7) (क) कोई दस्तावेज, जिसका किसी सरकारी वैज्ञानिक विशेषज्ञ द्वारा, जिसको यह उपधारा लागू होती है, हस्ताक्षरित ऐसी रिपोर्ट होना तात्पर्यित है, जो ऐसे पदार्थ या चीज के बारे में है, जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के अनुक्रम में परीक्षा या विश्लेषण और रिपोर्ट के लिए उसे सम्यक् रूप से भेजी गई थी, इस अधिनियम के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त किया जा सकेगा ।
(ख) सुरक्षक न्यायालय, यदि वह ठीक समझता है तो, किसी ऐसे विशेषज्ञ को उसकी रिपोर्ट की विषय-वस्तु के बारे में समन कर सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा ।
(ग) जहां किसी ऐसे विशेषज्ञ को सुरक्षक न्यायालय द्वारा समन किया जाता है और वह स्वयं हाजिर होने में असमर्थ है तो वह, जब तक कि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उसे स्वयं उपसंजात होने के लिए निदेशित नहीं किया हो, न्यायालय में हाजिर होने के लिए अपने साथ कार्य करने वाले किसी जिम्मेदार व्यक्ति को प्रतिनियुक्त कर सकेगा यदि ऐसा आफिसर मामले के तथ्यों से अवगत है और उसकी ओर से न्यायालय का समाधानप्रद रूप में अभिसाक्ष्य दे सकता है ।
(घ) यह उपधारा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 293 की उपधारा (4) में तत्समय विनिर्दिष्ट सरकारी वैज्ञानिक विशेषज्ञों को लागू होती है ।
94. अभियुक्त द्वारा सरकारी आफिसर को निर्देश-(1) यदि अभित्यजन के या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के, छुट्टी के उपरान्त अनुपस्थिति के या सेवा के लिए बुलाए जाने पर वापस न आने के लिए किए जा रहे किसी विचारण में अभियुक्त व्यक्ति अपनी अप्राधिकृत अनुपस्थिति के लिए किसी पर्याप्त या युक्तियुक्त प्रतिहेतु का कथन अपनी प्रतिरक्षा में करता है और उसके समर्थन में सरकार की सेवा में के किसी आफिसर के प्रति निर्देश करता है या यदि ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिरक्षा में उक्त कथन के किसी ऐसे आफिसर द्वारा साबित या नासाबित किए जाने की संभावना है तो न्यायालय ऐसे आफिसर को लिखेगा और कार्यवाहियों को तब तक के लिए स्थगित कर देगा जब तक उसका उत्तर प्राप्त न हो जाए ।
(2) ऐसे निर्देशित आफिसर का लिखित उत्तर, यदि वह उसके द्वारा हस्ताक्षरित है तो, साक्ष्य में लिया जाएगा और उसका वैसा ही प्रभाव होगा मानो वह न्यायालय के समक्ष शपथ पर दिया गया हो ।
(3) यदि ऐसे उत्तर की प्राप्ति के पूर्व न्यायालय का विघटन हो जाता है या यदि न्यायालय इस धारा के उपबंधों का अनुवर्तन करने का लोप करता है तो संयोजक आफिसर कार्यवाहियों को स्वविवेकानुसार बातिल कर सकेगा और नए विचारण का आदेश दे सकेगा ।
95. पूर्व दोषसिद्धियों और साधारण शील का साक्ष्य-(1) जब किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षक न्यायालय ने किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया है तब वह सुरक्षक न्यायालय ऐसे व्यक्ति की किसी सुरक्षक न्यायालय या दण्ड न्यायालय द्वारा की गई पूर्व दोषसिद्धियों की धारा 51 या धारा 53 या धारा 54 के अधीन किए गए किसी पूर्व दण्ड अधिनिर्णय की जांच कर सकेगा और उसका साक्ष्य प्राप्त तथा लेखबद्ध कर सकेगा और इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति के साधारण शील की तथा ऐसी बातों की, जो विहित की जाएं, जांच कर सकेगा और उन्हें लेखबद्ध कर सकेगा ।
(2) इस धारा के अधीन प्राप्त किया गया साक्ष्य या तो मौखिक या सुरक्षक न्यायालय की पुस्तकों या अन्य अभिलेखों की प्रविष्टियों के रूप में या उनमें से प्रमाणित उद्धरण के रूप में हो सकेगा और उस व्यक्ति को, जिसका विचारण किया गया है, विचारण के पूर्व यह सूचना देना आवश्यक नहीं होगा कि उसकी पूर्व दोषसिद्धियों या शील के बारे में साक्ष्य लिया जाएगा ।
(3) यदि समरी सुरक्षक न्यायालय में विचारण करने वाला आफिसर ठीक समझता है तो वह अपराधी के विरुद्ध हुई किन्हीं पूर्व दोषसिद्धियों को, उसके साधारण शील को और ऐसी अन्य बातों को जो विहित की जाएं, इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन साबित किए जाने की अपेक्षा करने के बदले अपने ज्ञान के रूप में अभिलिखित कर सकेगा ।
96. अभियुक्त का पागलपन-(1) जब कभी सुरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण के दौरान न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति, जिस पर आरोप है, चित्तविकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है या उसने अभिकथित कार्य किया है किन्तु वह चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रवृत्ति को जानने में या यह जानने में कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, असमर्थ था, तब न्यायालय तद्नुसार निष्कर्ष लेखबद्ध करेगा ।
(2) न्यायालय का पीठासीन आफिसर या, समरी सुरक्षक न्यायालय की दशा में, विचारण करने वाला आफिसर मामले की रिपोर्ट, यथास्थिति, पुष्टिकर्ता आफिसर को या उस प्राधिकारी को तत्काल करेगा जो उसके निष्कर्ष पर धारा 121 के अधीन कार्यवाही करने के लिए सशक्त है ।
(3) यदि पुष्टिकर्ता आफिसर, जिसको मामले की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है, निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करता है तो वह अभियुक्त व्यक्ति का, उस अपराध के लिए जिसका उस पर आरोप लगाया गया था, विचारण उसी या किसी अन्य सुरक्षक न्यायालय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ।
(4) वह प्राधिकारी, जिसको समरी सुरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है, और पुष्टिकर्ता आफिसर, जो ऐसे मामले में, जिसकी रिपोर्ट उसको की गई है, निष्कर्ष की पुष्टि करता है, अभियुक्त व्यक्ति को विहित रीति से अभिरक्षा में रखे जाने का आदेश देगा तथा केन्द्रीय सरकार के आदेशों के लिए मामले की रिपोर्ट करेगा ।
(5) उपधारा (4) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार अभियुक्त व्यक्ति को किसी पागलखाने में या सुरक्षित अभिरक्षा के अन्य उपयुक्त स्थान में निरुद्ध किए जाने का आदेश दे सकेगी ।
97. पागल अभियुक्त का आगे चलकर विचारण के लिए उपयुक्त हो जाना-जहां कोई अभियुक्त व्यक्ति चित्तविकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाए जाने पर धारा 96 के अधीन अभिरक्षा या निरोध में है, वहां इस निमित्त विहित कोई आफिसर-
(क) यदि ऐसा व्यक्ति धारा 96 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सीय आफिसर की इस रिपोर्ट पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है, या
(ख) यदि ऐसा व्यक्ति धारा 96 की उपधारा (5) के अधीन किसी जेल में निरुद्ध है तो कारागारों के महानिरीक्षक के इस प्रमाणपत्र पर और यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा के अधीन किसी पागलखाने में निरुद्ध है तो उस पागलखाने के परिदर्शकों में से किन्हीं दो या अधिक के इस प्रमाणपत्र पर और यदि उस उपधारा के अधीन वह किसी अन्य स्थान में निरुद्ध है तो विहित प्राधिकारी के इस प्रमाणपत्र पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है,
उस व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसका आरोप उस पर मूलतः लगाया गया था, उसी या किसी अन्य सुरक्षक न्यायालय द्वारा या, यदि अपराध सिविल अपराध है, तो दण्ड न्यायालय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ।
98. धारा 97 के अधीन किए गए आदेशों का केन्द्रीय सरकार को पारेषण-अभियुक्त के विचारण के लिए किसी आफिसर द्वारा धारा 97 के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रतिलिपि केन्द्रीय सरकार को तत्काल भेज दी जाएगी ।
99. पागल अभियुक्त की निर्मुक्ति-जहां कोई व्यक्ति धारा 96 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (5) के अधीन निरोध में है वहां-
(क) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सक आफिसर की ऐसी रिपोर्ट पर, या
(ख) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (5) के अधीन निरोध में है तो धारा 97 के खण्ड (ख) में वर्णित प्राधिकारियों में से किसी के ऐसे प्रमाणपत्र पर कि उस आफिसर या प्राधिकारी के विचार में उस व्यक्ति की निर्मुक्ति उसके द्वारा स्वयं अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने के संकट के बिना की जाती है,
केन्द्रीय सरकार यह आदेश दे सकेगी कि ऐसे व्यक्ति को निर्मुक्त कर दिया जाए या अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाए, या, यदि उसे पहले ही किसी ऐसे लोक पागलखाने में नहीं भेज दिया गया है तो, उसे ऐसे लोक पागलखाने में स्थानांतरित कर दिया जाए ।
100. पागल अभियुक्त का उसके नातेदारों को सौंपा जाना-जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो धारा 96 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (5) के अधीन निरोध में है, कोई नातेदार या मित्र चाहता है कि उसे उसकी देखरेख और अभिरक्षा में रखे जाने के लिए उसको सौंप दिया जाए, वहां केन्द्रीय ससकार, ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर उस सरकार के समाधानप्रद रूप में ऐसी प्रतिभूति उसके द्वारा दिए जाने पर कि सौंपे गए व्यक्ति की समुचित देखरेख की जाएगी और उसे स्वयं अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने से निवारित रखा जाएगा तथा सौंपे गए व्यक्ति को ऐसे आफिसर के समक्ष और ऐसे समय पर और स्थान पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा निदिष्ट किया जाए, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा, ऐसे व्यक्ति को ऐसे नातेदार या मित्र को सौंप दिए जाने का आदेश दे सकेगी ।
101. विचारण लंबित रहने तक सम्पत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के लिए आदेश-जब कोई संपत्ति, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए उपयोग में लाई गई प्रतीत होती है, किसी सुरक्षक न्यायालय के समक्ष विचारण के दौरान पेश की जाती है, तब न्यायालय विचारण की समाप्ति होने तक के लिए ऐसी सम्पत्ति की उचित अभिरक्षा के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे और यदि सम्पत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है, तो ऐसा साक्ष्य जो वह आवश्यक समझे लेखबद्ध करने के पश्चात्, उसका विक्रय या अन्यथा व्ययन करने का आदेश दे सकेगा ।
102. जिस सम्पत्ति के बारे में अपराध किया गया है उसके व्ययन के लिए आदेश-(1) किसी सुरक्षक न्यायालय के समक्ष विचारण की समाप्ति के पश्चात्, वह न्यायालय या उस सुरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष या दण्डादेश की पुष्टि करने वाला आफिसर या ऐसे आफिसर से वरिष्ठ कोई प्राधिकारी या, ऐसे समरी सुरक्षक न्यायालय की दशा में जिसके निष्कर्ष या दण्डादेश की पुष्टि अपेक्षित नहीं है, ऐसा आफिसर जो उस उपमहानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है जिसके कमान में विचारण किया गया था, ऐसी किसी सम्पत्ति या दस्तावेज को, जो उस न्यायालय के समक्ष पेश की गई है या उसकी अभिरक्षा में है या जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए प्रयुक्त की गई है, नष्ट करके, अधिग्रहण करके, ऐसे किसी व्यक्ति को परिदत्त करके जो उसके कब्जे का हकदार होने का दावा करता है, अन्यथा व्ययनित करने के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश ऐसी सम्पत्ति के बारे में किया गया है, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, वहां आदेश करने वाले प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित उस आदेश की प्रतिलिपि, चाहे विचारण भारत के अन्दर हुआ हो या न हुआ हो, ऐसे मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी, जिसकी अधिकारिता में वह सम्पत्ति उस समय स्थित है और तब वह मजिस्ट्रेट उस आदेश को ऐसे कार्यान्वित कराएगा मानो वह उसके द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अधीन पारित आदेश हो ।
(3) इस धारा में, संम्पत्ति" पद के अन्तर्गत उस सम्पत्ति की दशा में जिसके बारे में अपराध किया गया प्रतीत होता है, न केवल वह सम्पत्ति आती है, जो मूलतः किसी व्यक्ति के कब्जे में या नियंत्रण में रही है, बल्कि वह सम्पत्ति भी आती है जिसमें या जिसके बदले में उसका संपरिवर्तन या विनिमय किया गया है और वह सब कुछ आता है जो ऐसे संपरिवर्तन या विनिमय द्वारा तुरन्त या अन्यथा अर्जित किया गया है ।
103. इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के संबंध में सुरक्षक न्यायालय की शक्तियां-सुरक्षक न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किया गया विचारण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और सुरक्षक न्यायालय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के अर्थ में न्यायालय समझा जाएगा ।
अध्याय 8
पुष्टि और पुनरीक्षण
104. निष्कर्ष और दंडादेश का तभी विधिमान्य होना जब उसकी पुष्टि कर दी जाए-किसी जनरल सुरक्षक न्यायालय या पैटी सुरक्षक न्यायालय का कोई भी निष्कर्ष या दंडादेश वहीं तक विधिमान्य होगा जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार पुष्ट कर दिया जाता है ।
105. जनरल सुरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष और दंडादेश की पुष्टि करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार या कोई ऐसा आफिसर जिसे केन्द्रीय सरकार के अधिपत्र द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, जनरल सुरक्षक न्यायालयों के निष्कर्षों और दंडादेशों की पुष्टि कर सकेगा ।
106. पैटी सुरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष और दंडादेश की पुष्टि करने की शक्ति-जनरल सुरक्षक न्यायालय को संयोजित करने की शक्ति रखने वाला प्राधिकारी या आफिसर या कोई ऐसा आफिसर जो ऐसे प्राधिकारी या आफिसर के अधिपत्र द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, पैटी सुरक्षक न्यायालयों के निष्कर्षों और दंडादेशों की पुष्टि कर सकेगा ।
107. पुष्टिकर्ता प्राधिकारी की शक्तियों की परिसीमा-धारा 105 या धारा 106 के अधीन निकाले गए अधिपत्र में ऐसे निर्बन्धन, आरक्षण या शर्तें हो सकेंगी जो उसे निकालने वाला प्राधिकारी ठीक समझे ।
108. पुष्टिकर्ता प्राधिकारी की दंडादेश में कमी करने, उसका परिहार करने या उसका लघुकरण करने की शक्ति-ऐसे निर्बन्धनों, आरक्षणों या शर्तें के, जो धारा 105 या धारा 106 के अधीन निकाले गए किसी अधिपत्र में हो, अधीन रहते हुए पुष्टिकर्ता प्राधिकारी किसी सुरक्षक न्यायालय के दंडादेश की पुष्टि करते समय उस दंड में, जो उसके द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है, कमी कर सकेगा या उसका परिहार कर सकेगा या उस दंड की धारा 47 में अधिकथित निम्नतर मापमान के किसी दंड या किन्हीं दंडों में लघुकरण कर सकेगा या विचारण की कार्यवाहियों को, यदि अवैध पायी जाएं तो, अपास्त कर सकेगा ।
109. निष्कर्ष या दंडादेश का पुनरीक्षण-(1) सुरक्षक न्यायालय का निष्कर्ष या दंडादेश जिसकी पुष्टि अपेक्षित है, पुष्टिकर्ता प्राधिकारी के आदेश से एक बार पुनरीक्षित किया जा सकेगा और ऐसे पुनरीक्षण पर न्यायालय, यदि वह पुष्टिकर्ता प्राधिकारी द्वारा ऐसा करने के लिए निदेशित किया गया है तो, अतिरिक्त साक्ष्य ले सकेगा ।
(2) पुनरीक्षण पर, न्यायालय उन्हीं आफिसरों से जो उस समय उपस्थित थे जब मूल विनिश्चय पारित किया गया था, मिलकर गठित होगा किन्तु तब नहीं जबकि उन आफिसरों में से कोई अपरिवर्जनीयतः अनुपस्थित हों ।
(3) ऐसी अपरिवर्जनीय अनुपस्थिति की दशा में उसका हेतुक कार्यवाही में सम्यक् रूप से प्रमाणित किया जाएगा और न्यायालय पुनरीक्षण करने के लिए अग्रसर होगा परन्तु यह तब जबकि, यदि वह जनरल सुरक्षक न्यायालय है तो, पांच आफिसरों से या, यदि वह पैटी सुरक्षक न्यायालय है तो, तीन आफिसरों से मिलकर, उस समय भी गठित हो ।
110. समरी सुरक्षक न्यायालय का निष्कर्ष और दंडादेश-समरी सुरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष और दंडादेश की पुष्टि अपेक्षित नहीं होगी, बल्कि उसे तत्काल कार्यान्वित किया जा सकेगा ।
111. समरी सुरक्षक न्यायालय की कार्यवाहियों का पारेषण-प्रत्येक समरी सुरक्षक न्यायालय की कार्यवाहियां उस आफिसर को, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है और जिसके कमान में विचारण किया गया था, या विहित आफिसर को अविलंब भेजी जाएंगी, और ऐसा आफिसर या महानिदेशक या उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई आफिसर, मामले के गुणागुण पर आधारित कारणों से, न कि केवल तकनीकी आधारों पर, कार्यवाहियों को अपास्त कर सकेगा या उस दंडादेश को किसी अन्य ऐसे दंडादेश तक घटा सकेगा जो वह न्यायालय पारित कर सकता था ।
112. कुछ मामलों में निष्कर्ष या दंडादेश को परिवर्तित किया जाना-(1) जहां किसी सुरक्षक न्यायालय द्वारा दोषी होने का ऐसा निष्कर्ष, जिसकी पुष्टि हो चुकी है या जिसकी पुष्टि होनी अपेक्षित नहीं है, किसी कारण से अविधिमान्य पाया जाता है या साक्ष्य से उसका समर्थन नहीं किया जा सकता है वहां वह प्राधिकारी जिसे यदि निष्कर्ष विधिमान्य होता, तो दंडादेश द्वारा अधिनिर्णीत दंड को लघुकृत करने की शक्ति धारा 124 के अधीन होती, उसके स्थान पर नया निष्कर्ष प्रतिस्थापित कर सकेगा और ऐसे निष्कर्ष में विनिर्दिष्ट या अंतर्वलित अपराध के लिए दंडादेश पारित कर सकेगा :
परन्तु ऐसा कोई प्रतिस्थापन तभी किया जाएगा जब सुरक्षक न्यायालय उस आरोप पर ऐसा निष्कर्ष विधिमान्यतया निकाल सकता था और जब यह प्रतीत हो कि उक्त अपराध साबित करने वाले तथ्यों के बारे में सुरक्षक न्यायालय का समाधान अवश्य हो जाना चाहिए था, अन्यथा नहीं ।
(2) जहां सुरक्षक न्यायालय द्वारा पारित ऐसा दंडादेश, जिसकी पुष्टि हो चुकी है या जिसकी पुष्टि होनी अपेक्षित नहीं है, किन्तु जो उपधारा (1) के अधीन प्रतिस्थापित नए निष्कर्ष के अनुसरण में पारित दंडादेश नहीं है किसी कारण से अविधिमान्य पाया जाता है, वहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी विधिमान्य दंडादेश पारित कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन पारित दंडादेश द्वारा अधिनिर्णीत दंड, दंडों के मापमान में उस दंड से उच्चतर नहीं होगा और न उस दंड से अधिक होगा जो उस दंडादेश द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है जिसके लिए इस धारा के अधीन नया दंडादेश प्रतिस्थापित किया गया है ।
(4) इस धारा के अधीन प्रतिस्थापित कोई निष्कर्ष या पारित कोई दंडादेश इस अधिनियम और नियमों के प्रयोजनों के लिए ऐसे प्रभावी होगा मानो वह किसी सुरक्षक न्यायालय का, यथास्थिति, निष्कर्ष या दंडादेश हो ।
113. सुरक्षक न्यायालय के आदेश, निष्कर्ष या दंडादेश के विरुद्ध उपचार-(1) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो किसी सुरक्षक न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश से अपने को व्यथित समझता है, उस आफिसर या प्राधिकारी को, जो उस सुरक्षक न्यायालय के किसी निष्कर्ष या दंडादेश की पुष्टि करने के लिए सशक्त है, अर्जी दे सकेगा और पुष्टिकर्ता प्राधिकारी, पारित आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में या जिस कार्यवाही से वह आदेश संबद्ध है, उसकी नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के लिए ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जैसी आवश्यक समझी जाए ।
(2) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो किसी सुरक्षक न्यायालय के ऐसे निष्कर्ष या दंडादेश से, जिसकी पुष्टि की जा चुकी है, अपने को व्यथित समझता है, केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक या कमान में उस आफिसर से, जिसने उस निष्कर्ष या दंडादेश की पुष्टि की है, वरिष्ठ किसी विहित आफिसर को अर्जी दे सकेगा और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक या विहित आफिसर उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
114. कार्यवाहियों का बातिल किया जाना-केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक या महानिरीक्षक किसी सुरक्षक न्यायालय की कार्यवाहियों को इस आधार पर बातिल कर सकेगा कि वे अवैध या अनुचित हैं ।
अध्याय 9
दंडादेशों का निष्पादन, क्षमा, परिहार, आदि
115. मृत्यु दंडादेश का रूप-सुरक्षक न्यायालय मृत्यु का दंडादेश अधिनिर्णीत करने में स्वविवेकानुसार निदेश देगा कि अपराधी की मृत्यु ऐसे घटित की जाए कि जब तक वह मर न जाए तब तक उसे गर्दन में फांसी लगाकर लटकाए रखा जाए या उसे गोली से मार दिया जाए ।
116. कारावास के दंडादेश का प्रारम्भ-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन किसी सुरक्षक न्यायालय द्वारा कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है तब उस दण्डादेश की अवधि, चाहे उसे पुनरीक्षित किया गया हो या नहीं, उस दिन प्रारम्भ हुई मानी जाएगी जिस दिन मूल कार्यवाहियों पर पीठासीन आफिसर द्वारा या समरी सुरक्षक न्यायालय की दशा में, उस न्यायालय द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे :
परन्तु उस मामले के, जिसमें उसे दण्डादेश दिया जाता है, अन्वेषण, जांच या विचारण के दौरान किसी अभियुक्त व्यक्ति द्वारा बिताई गई और उस तारीख के पूर्व जिसकी मूल कार्यवाहियों पर हस्ताक्षर किए गए थे, निरोध या परिरोध की अवधि का उसके दण्डादेश की अवधि के विरुद्ध मुजरा किया जाएगा और ऐसे व्यक्ति का कारावास में रहने का दायित्व उसके दण्डादेश की शेष अवधि तक, यदि कोई हो, निर्बन्धित होगा ।
117. कारावास के दण्डादेश का निष्पादन-(1) जब कभी सुरक्षक न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन कारावास का कोई दण्डादेश पारित किया जाता है या जब कभी मृत्यु के दण्डादेश को कारावास के रूप में लघुकृत किया जाता है तब पुष्टिकर्ता आफिसर या समरी सुरक्षक न्यायालय की दशा में न्यायालय अधिविष्ट करने वाला आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उपधारा (3) और उपधारा (4) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसे छोड़कर, यह निदेश देगा कि दण्डादेश किसी सिविल कारागार में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा ।
(2) जब उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया गया है, तब दण्डादेश के अधीन व्यक्ति का कमान्डर या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को, जिसमें ऐसे व्यक्ति को परिरोध में रखा जाना है, विहित प्ररूप में अधिपत्र भेजेगा और अधिपत्र के साथ उसे उस कारागार को भेजने की व्यवस्था करेगा ।
(3) अधिक से अधिक तीन मास की अवधि के और सुरक्षक न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन पारित कारावास के दण्डादेश के मामले में, उपधारा (1) के अधीन समुचित आफिसर यह निदेश दे सकेगा कि दण्डादेश को किसी सिविल कारागार के बजाय सुरक्षक की अभिरक्षा में परिरोध करके कार्यान्वित किया जाए ।
(4) सक्रिय ड्यूटी पर कारावास का दण्डादेश ऐसे स्थान में परिरोध करके कार्यान्वित किया जा सकेगा जिसे वह उप महानिरीक्षक जिसके कमान में दण्डादिष्ट व्यक्ति सेवारत है या कोई विहित आफिसर समय-समय पर नियत करे ।
118. अपराधी की अस्थायी अभिरक्षा-जहां यह निदेश दिया गया है कि कारावास का दण्डादेश सिविल कारागार में भोगा जाए, वहां अपराधी को उस समय तक जब तक कि उसे किसी सिविल कारागार में भेजना संभव नहीं है सुरक्षक की अभिरक्षा में या किसी अन्य उचित स्थान में रखा जा सकेगा ।
119. विशेष दशाओं में कारावास के दण्डादेश का निष्पादन-जब कभी किसी ऐसे आफिसर की राय में, जो उस उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है जिसके कमान में विचारण किया गया है, कारावास का कोई दण्डादेश या कारावास के दण्डादेश का कोई भाग विशेष कारणों से धारा 117 के उपबंधों के अनुसार सुरक्षक की अभिरक्षा में सुविधापूर्वक कार्यान्वित नहीं किया जा सकता तब वह आफिसर निदेश दे सकेगा कि वह दण्डादेश या उस दण्डादेश का वह भाग किसी सिविल कारागार या अन्य उचित स्थान में परिरोध करके कार्यान्वित किया जाए ।
120. बंदी को एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाना-किसी ऐसे व्यक्ति को जो कारावास के दण्डादेश के अधीन है, एक स्थान से दूसरे स्थान को उसे ले जाए जाने के दौरान या जब वह पोत, वायुयान के फलक पर या अन्यथा है, ऐसे अवरोध के अधीन होगा जो उसके सुरक्षित रूप से ले जाए जाने और वहां से हटाए जाने के लिए आवश्यक है ।
121. कुछ आदेशों का कारागार अफिसरों को सूचित किया जाना-जब कभी किसी ऐसे दण्डादेश, आदेश या अधिपत्र को, जिसके अधीन कोई व्यक्ति सिविल कारगार में परिरुद्ध है, अपास्त करने या उसमें फेरपार करने का कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से किया जाता है तब ऐसे आदेश के अनुसार एक अधिपत्र ऐसा आदेश करने वाले आफिसर या उसके स्टाफ आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को भेजा जाएगा जिसमें वह व्यक्ति परिरुद्ध है ।
122. जुर्माने के दंडादेश का निष्पादन-जब सुरक्षक न्यायालय द्वारा धारा 45 के अधीन जुर्माने का दण्डादेश अधिरोपित किया जाता है तब ऐसे दण्डादेश की पुष्टिकर्ता आफिसर द्वारा या जहां पुष्टि अपेक्षित नहीं है वहां विचारण करने वाले आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित एक प्रति भारत में किसी मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी और तब वह मजिस्ट्रेट उस जुर्माने को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबन्धों के अनुसार ऐसे वसूल कराएगा मानो वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित जुर्माने का दण्डादेश है ।
123. आदेश या अधिपत्र में अप्ररूपिता या गलती-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है और वह उस दण्डादेश को किसी ऐसे स्थान या रीति में भोग रहा है, जिसमें वह इस अधिनियम के अनुसरण में किसी विधिपूर्ण आदेश या अधिपत्र के अधीन परिरुद्ध किया जा सकता है, तब ऐसे व्यक्ति का परिरोध केवल इस कारण अवैध नहीं समझा जाएगा कि उस आदेश, अधिपत्र या अन्य दस्तावेज या उस प्राधिकार में या उसके संबंध में जिसके द्वारा या जिसके अनुसरण में वह व्यक्ति ऐसे स्थान में लाया गया था या परिरुद्ध है, कोई अप्ररूपिता या गलती है और ऐसे किसी आदेश, अधिपत्र या दस्तावेज में तद्नुसार संशोधन किया जा सकेगा ।
124. क्षमा और परिहार-जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षक न्यायालय द्वारा किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है तब केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक या ऐसे दण्डादेश की दशा में, जिसे वह पुष्ट कर सकता था या जिसकी पुष्टि अपेक्षित नहीं थी, ऐसा आफिसर जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का न हो और जिसके कमान में वह व्यक्ति दोषसिद्धि के समय सेवा कर रहा था, या विहित आफिसर-
(क) या तो उन शर्तों के सहित या उनके बिना जिन्हें दण्डादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करता है, उस व्यक्ति को क्षमा कर सकेगा या अधिनिर्णीत संपूर्ण दण्ड या उसके किसी भाग का परिहार कर सकेगा ; या
(ख) अधिनिर्णीत दण्ड में कमी कर सकेगा; या
(ग) ऐसे दण्ड को इस अधिनियम में वर्णित किसी कम दण्ड या दण्डों में लघुकृत कर सकेगा; या
(घ) या तो उन शर्तों के सहित या उनके बिना जिन्हें दण्डादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करता है, उस व्यक्ति को पैरोल पर निर्मुक्त कर सकेगा ।
125. सशर्त क्षमा, पैरोल पर निर्मुक्ति या परिहार को रद्द करना-(1) यदि कोई शर्तें, जिस पर किसी व्यक्ति को क्षमा या पैरोल पर निर्मुक्त किया गया है या जिस पर किसी दण्ड का परिहार किया गया है, उस प्राधिकारी की राय में जिसने क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त किया था, पूरी नहीं की गई है तो प्राधिकारी उस क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार को रद्द कर सकेगा और तब न्यायालय का दण्डादेश ऐसे क्रियान्वित किया जाएगा मानो ऐसी क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त नहीं किया गया था ।
(2) वह व्यक्ति, जिसके कारावास का दण्डादेश उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन क्रियाविन्त किया जाता है अपने दण्डादेश का केवल अनवसित भाग ही भोगेगा ;
126. कारावास के दण्डादेश का निलंबन-(1) जहां किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षक न्यायालय द्वारा कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक या जनरल सुरक्षक न्यायालय संयोजित करने के लिए सशक्त कोई आफिसर दण्डादेश को निलंबित कर सकेगा, चाहे अपराधी को कारागार में या सुरक्षक की अभिरक्षा में पहले ही सुपुर्द कर दिया गया हो या नहीं ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर ऐसे दण्डादिष्ट अपराधी की दशा में निदेश दे सकेगा कि जब तक ऐसे प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाएं तब तक अपराधी को कारागार में या सुरक्षक की अभिरक्षा में सुपुर्द नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे दण्डादेश की दशा में किया जा सकेगा जिसकी पुष्टि की जा चुकी है या जो घटा दिया गया है या लघुकृत कर दिया जाएगा ।
127. निलंबन के लम्बित रहने तक आदेश-(1) जहां धारा 126 में निर्दिष्ट दण्डादेश, समरी सुरक्षक न्यायालय से भिन्न सुरक्षक न्यायालय द्वारा अधिरोपित किया जाता है वहां पुष्टिकर्ता आफिसर दण्डादेश की पुष्टि करते समय निदेश दे सकेगा कि अपराधी को कारागार के या सुरक्षक की अभिरक्षा के सुपुर्द तब तक न किया जाए जब तक कि धारा 126 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाएं ।
(2) जहां कारावास का दण्डादेश किसी समरी सुरक्षक न्यायालय द्वारा अधिरोपित किया जाता है वहां विचारण करने वाला आफिसर उपधारा (1) में निर्दिष्ट निदेश दे सकेगा ।
128. निलम्बन पर निर्मुक्ति-जहां कोई दण्डादेश धारा 126 के अधीन निलम्बित किया जाता है वहां अपराधी को अभिरक्षा से तत्काल निर्मुक्त कर दिया जाएगा ।
129. निलम्बन की अवधि की संगणना-वह अवधि जिसके दौरान दण्डादेश निलम्बित है, उस दण्डादेश की अवधि का भाग मानी जाएगी ।
130. निलम्बन के पश्चात् आदेश-धारा 126 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर दण्डादेश निलम्बित रहने के दौरान किसी भी समय आदेश दे सकेगा कि-
(क) अपराधी उस दण्डादेश के अनवसित भाग को भोगने के लिए सुपुर्द किया जाए; या
(ख) दण्डादेश का परिहार किया जाए ।
131. निलम्बन के पश्चात् मामले पर पुनर्विचार-(1) जहां कोई दण्डादेश निलम्बित किया गया है, वहां धारा 126 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा अथवा धारा 126 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, मामले पर पुनर्विचार किसी भी समय किया जा सकेगा और अधिक से अधिक चार मास के अन्तरालों पर किया जाएगा ।
(2) जहां ऐसे प्राधिकृत आफिसर को ऐसे पुनर्विचार पर यह प्रतीत होता है कि अपराधी का आचरण दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसा रहा है कि दण्डादेश का परिहार करना न्यायोचित होगा, वहां वह मामले को धारा 126 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर को निर्देशित करेगा ।
132. निलम्बन के पश्चात् नया दण्डादेश-जहां किसी अपराधी को, उस समय के दौरान जब उसका दण्डादेश इस अधिनियम के अधीन निलम्बित है, किसी अन्य अपराध के लिए दण्डादिष्ट किया जाता है, वहां-
(क) यदि अतिरिक्त दण्डादेश भी इस अधिनियम के अधीन निलम्बित किया जाता है तो वह दोनों दण्डादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे ;
(ख) यदि अतिरिक्त दण्डादेश तीन मास या उससे अधिक की अवधि के लिए है और उसे इस अधिनियम के अधीन निलम्बित नहीं किया जाता है तो अपराधी पूर्ववर्ती दण्डादेश के अनवसित भाग के लिए भी कारागार या सुरक्षक की अभिरक्षा में रखा जाएगा किन्तु दोनों दण्डादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे ;
(ग) यदि अतिरिक्त दण्डादेश तीन मास से कम की अवधि के लिए है और उसे इस अधिनियम के अधीन निलम्बित नहीं किया जाता है तो अपराधी केवल उसी दण्डादेश पर ऐसे सुपुर्द किया जाएगा और पूर्ववर्ती दण्डादेश किसी ऐसे आदेश के अधीन रहते हुए निलम्बित बना रहेगा जो धारा 130 या धारा 131 के अधीन पारित किया जाए ।
133. निलम्बन की शक्ति की परिधि-धारा 126 और धारा 130 द्वारा प्रदत्त शक्तियां, कमी करने, परिहार करने और लघुकरण की शक्ति के अतिरिक्त होंगी, न कि उसके अल्पीकरण में ।
134. निलम्बन और परिहार का पदच्युति पर प्रभाव-(1) जहां सुरक्षक न्यायालय द्वारा किसी अन्य दण्डादेश के अतिरिक्त पदच्युति का दण्ड अधिनिर्णीत किया जाता है और ऐसा अन्य दण्डादेश धारा 126 के अधीन निलम्बित किया जाता है वहां ऐसी पदच्युति तब तक प्रभावशील नहीं होगी जब तक कि धारा 126 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा वैसा आदेश नहीं कर दिया जाता ।
(2) यदि धारा 130 के अधीन ऐसे अन्य दण्डादेश का परिहार किया जाता है तो पदच्युति के दण्ड का भी परिहार कर दिया जाएगा ।
अध्याय 10
प्रकीर्ण
135. रैंक संरचना-(1) सुरक्षक के आफिसरों और अन्य सदस्यों को उनके रैंकों के अनुसार निम्नलिखित प्रवर्गों में वर्गीकृत किया जाएगा, अर्थात् :-
(क) आफिसर
(i) महानिदेशक
(ii) अपर महानिदेशक
(iii) महानिरीक्षक
(iv) उप महानिरीक्षक
(v) ग्रुप कमांडर
(vi) स्क्वाड्रन कमांडर
(vii) टीम कमांडर
(ख) सहायक कमांडर-
(viii) सहायक कमांडर श्रेणी-1
(ix) सहायक कमांडर श्रेणी-2
(x) सहायक कमांडर श्रेणी-3
(ग) आफिसरों और सहायक कमांडरों से भिन्न व्यक्ति
(xi) रेंजर श्रेणी-1
(xii) रेंजर श्रेणी-2
(xiii) योधक कारीगर
(2) एक ही रैंक के व्यक्तियों की आपस में ज्येष्ठता से संबंधित विषयों का अवधारण ऐसे नियमों के अनुसार किया जाएगा जो विहित किया जाएं ।
(3) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, महानिदेशक इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रूप में केन्द्रीय सरकार द्वारा पुष्टि किए जाने के अधीन रहते हुए, किसी आफिसर या सहायक कमांडर श्रेणी- 1 को, स्थानीय रैंक के रूप में उपधारा (1) के खंड (क) में वर्णित रैंक, जब कभी वह सुरक्षक के बेहतर कृत्यकरण के हित में आवश्यक समझे, दे सकेगा ।
(4) स्थानीय रैंक धारण करने वाला आफिसर या सहायक कमांडर श्रेणी-1-
(क) वह रैंक धारण करने वाले किसी आफिसर के कमान का प्रयोग करेगा और उसमें उसकी शक्ति भी निहित होगी ।
(ख) वह रैंक धारण नहीं करेगा यदि ऐसा रैंक दिए जाने की केन्द्रीय सरकार द्वारा एक मास के भीतर पुष्टि नहीं की जाती है या जब महानिदेशक द्वारा ऐसा आदेश दिया जाए या जब वह उस नियुक्ति को धारण न करे जिसके लिए वह रैंक दिया गया था ;
(ग) ऐसा स्थानीय रैंक धारण करने के आधार पर अन्य आफिसरों के ऊपर किसी ज्येष्ठता का दावा करने का हकदार नहीं होगा;
(घ) ऐसा रैंक धारण करने के लिए किसी अतिरिक्त वेतन का हकदार नहीं होगा ।
136. वेतन और भत्तों से कटौती-(1) उपधारा (4) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी आफिसर के वेतन और भत्तों में से निम्नलिखित कटौतियां की जा सकेंगी, अर्थात् :-
(क) छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के हर दिन के लिए और किसी दंड न्यायालय या सुरक्षक न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत कारावास के हर दिन के लिए किसी आफिसर को देय सभी वेतन और भत्ते, जब तक कि उस महानिरीक्षक को, जिसके अधीन वह तत्समय सेवारत है, समाधानप्रद स्पष्टीकरण न दे दिया गया हो और वह उसके द्वारा स्वीकार न कर लिया गया हो ;
(ख) किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन है, उस वेतन की जिसे आफिसर ने विधिविरुद्ध रूप से प्रतिधृत कर रखा है या जिसे देने से उसने विधिविरुद्ध रूप से इंकार कर दिया है, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित कोई राशि;
(ग) किसी दंड न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माने के रूप में संदाय के लिए अपेक्षित कोई राशि ;
(घ) लोक संपत्ति या सुरक्षक की संपत्ति की ऐसी हानि, नुकसान या नाश की जिसकी बाबत उस महानिरीक्षक को, जिसके अधीन आफिसर तत्समय सेवारत है, सम्यक् अन्वेषण के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि वह उस आफिसर के सदोष कार्य से या उपेक्षा से घटित हुआ है, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित कोई राशि ;
(ङ) केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा उसकी पत्नी या उसकी धर्मज या अधर्मज या सौतेली संतान के भरणपोषण के लिए दिए जाने के लिए या उक्त सरकार द्वारा उक्त पत्नी या संतान को दी गई सहायता के खर्च हेतु दिए जाने के लिए अपेक्षित कोई राशि ।
(2) उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, आफिसर से भिन्न किसी भी व्यक्ति के जो इस अधिनियम के अधीन है वेतन और भत्तों में से निम्नलिखित कटौतियां की जा सकेंगी, अर्थात् :-
(क) अभित्यजन पर या छुट्टी बिना अनुपस्थिति के हर दिन के लिए और किसी दंड न्यायालय, सुरक्षक न्यायालय या किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो अधिनियम की धारा 51 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है, अधिनिर्णीत कारावास के हर दिन के लिए सब वेतन और भत्ते, जब तक कि उसके कमाण्डर को समाधानप्रद स्पष्टीकरण न दे दिया गया हो और वह उसके द्वारा स्वीकार न कर लिया गया हो ;
(ख) किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन है, उस वेतन की जिसे उसने विधिविरुद्ध रूप से प्रतिधृत कर रखा है या जिसे देने से उसने विधिविरुद्ध रूप से इंकार कर दिया है, प्रतिभूति के लिए अपेक्षित कोई राशि ;
(ग) केन्द्रीय सरकार को या किसी भवन या संपत्ति को या सुरक्षक की प्राइवेट निधि को उसके द्वारा कारित किसी व्यय, हानि, नुकसान या नाश के लिए ऐसे प्रतिकर की प्रतिभूति के लिए, जो उसके कमांडर द्वारा अधिनिर्णीत किया जाए, अपेक्षित कोई राशि ;
(घ) किसी दंड न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माने के रूप में संदाय के लिए अपेक्षित कोई राशि ;
(ङ) केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा उसकी पत्नी या धर्मज या अधर्मज संतान या सौतेली संतान के भरणपोषण के लिए दिए जाने के लिए या उक्त सरकार द्वारा उक्त पत्नी या संतान को दी गई सहायता के खर्चे हेतु दिए जाने के लिए अपेक्षित कोई राशि ।
(3) (i) किसी भी व्यक्ति को एक दिन के लिए अनुपस्थिति के रूप में या कारावास में तब तक नहीं माना जाएगा जब तक कि अनुपस्थिति या कारावास, चाहे पूर्णतः एक दिन में या भागतः एक दिन में और भागतः किसी अन्य दिन में लगातार छह या अधिक घंटों तक न रहा हो ।
(ii) एक दिन से कम की अनुपस्थिति या कारावास को एक दिन की अनुपस्थिति या कारावास गिना जा सकेगा यदि ऐसी अनुपस्थिति या कारावास ने उस अनुपस्थित व्यक्ति को सुरक्षक के ऐसे सदस्य के रूप में किसी कर्तव्य की पूर्ति करने से निवारित किया है, जो उस कारण किसी अन्य सदस्य पर डाल दिया गया है ।
(4) किसी व्यक्ति के वेतन और भत्तों में से उपधारा (1) के खंड (ख) से (ङ) तक के अधीन या उपधारा (2) के खंड (ख) से (ङ) तक के अधीन की गई कुल कटौतियां तब के सिवाय जब कि वह पदच्युति से दंडादिष्ट किया गया हो, किसी एक मास में उसके एक मास के वेतन और भत्तों के आधे से अधिक नहीं होंगी ।
(5) किसी व्यक्ति के वेतन और भत्तों में से काटी जाने के लिए इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई राशि, उसे वसूल करने के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना पेंशन से भिन्न किसी ऐसे लोक धन में से काटी जा सकेगी जो उसे शोध्य है ।
(6) इस अधिनियम के अधीन वेतन और भत्तों में से कटौती किए जाने का आदेश देने के लिए निम्नलिखित सक्षम प्राधिकारी होंगे, अर्थात् :-
(क) आफिसरों से भिन्न व्यक्तियों की दशा में कमांडर, जो ग्रुप कमाण्डर से नीचे के रैंक का न हो;
(ख) आफिसरों की दशा में महानिरीक्षक ।
(7) इस अधिनियम के अधीन किसी कटौती का आदेश देने वाले किसी प्राधिकारी से वरिष्ठ कोई प्राधिकारी उक्त संपूर्ण कटौती या उसके किसी भाग को परिहार करने के लिए सक्षम होगा ।
(8) इस धारा के उपबन्धों के द्वारा किसी आफिसर को प्रदत्त किसी शक्ति का प्रथम वर्णित आफिसर से कमान में वरिष्ठ किसी आफिसर या प्राधिकारी द्वारा प्रयोग किया जा सकेगा ।
137. सुरक्षक के सदस्यों को प्रदान किए जाने योग्य शक्तियां और उन पर अधिरोपित किए जाने योग्य कर्तव्य-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, सुरक्षक का कोई सदस्य किसी केन्द्रीय अधिनियम के अधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग या कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं और जो ऐसी शक्तियां और कर्तव्य हैं जिनका प्रयोग या निर्वहन केन्द्रीय सरकार की राय में कोई तत्स्थानी या निम्नतर रैंक का आफिसर ऐसे केन्द्रीय अधिनियम द्वारा उक्त प्रयोजनों के लिए कर सकता है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा संबंधित राज्य सरकार की सहमति से उन शक्तियों या कर्तव्यों में से, जिनका प्रयोग या निर्वहन किसी पुलिस आफिसर द्वारा राज्य के किसी अधिनियम के अधीन किया जा सकता है, कोई शक्ति या कर्तव्य सुरक्षा के किसी ऐसे सदस्य को, जो केन्द्रीय सरकार की राय में तत्समान या उससे उच्चतर रैंक का है, प्रदान या उस पर अधिरोपित कर सकेगी ।
(3) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्ववर्ती आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह आदेश नहीं निकाला जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु आदेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
138. सुरक्षक के सदस्यों के कार्यों के लिए संरक्षण-(1) किसी सक्षम प्राधिकारी के अधिपत्र या आदेश के अनुसरण में सुरक्षक के किसी सदस्य द्वारा किए गए किसी कार्य के लिए उसके विरुद्ध किसी वाद या कार्यवाही में उसके लिए यह अभिवाक् करना विधिपूर्ण होगा कि उसने ऐसा कार्य ऐसे अधिपत्र या आदेश के प्राधिकार के अधीन किया था ।
(2) ऐसा कोई अभिवाक् उस कार्य का निदेश देने वाले अधिपत्र या आदेश को पेश करके साबित किया जा सकेगा और यदि उसे इस प्रकार साबित कर दिया जाता है तो सुरक्षक के सदस्य को, उसके द्वारा इस प्रकार किए गए कार्य के बारे में दायित्व से, उस प्राधिकारी की अधिकारिता में, जिसने ऐसा अधिपत्र या आदेश जारी किया है, कोई त्रुटि होते हुए भी उन्मोचित कर दिया जाएगा ।
(3) उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई विधिक कार्यवाही (चाहे सिविल हो या दांडिक) जो सुरक्षक के किसी सदस्य के विरुद्ध इस अधिनियम या नियमों के किसी उपबन्ध द्वारा या उसके अनुसरण में प्रदत्त शक्तियों के अधीन किए गए या किए जाने के लिए आशयित कार्य के लिए विधिपूर्वक लाई जाए, उस कार्य के, जिसकी शिकायत की गई है, किए जाने के पश्चात् तीन मास के भीतर प्रारम्भ की जाएगी, अन्यथा नहीं और ऐसी कार्यवाही की और उसके हेतुक की लिखित सूचना प्रतिवादी को या उसके वरिष्ठ आफिसर को ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ के कम से कम एक मास पूर्व दी जाएगी ।
139. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी विषय के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह रीति जिससे सुरक्षक का गठन किया जाएगा और धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन उसके सदस्यों की सेवा की शर्तें ;
(ख) पुस्तक या पत्र या अन्य दस्तावेज की प्रकृति जिसकी संसूचना या प्रकाशन धारा 12 की उपधारा (1) के द्वारा निर्बन्धित नहीं किया जाएगा ;
(ग) राजनीतिक प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजन, जिनके लिए इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति धारा 12 की उपधारा (2) के अधीन किसी अधिवेशन या प्रदर्शन में भाग नहीं लेगा या उसे सम्बोधित नहीं करेगा ;
(घ) प्रयोजन जिसके लिए दण्ड के रूप में सेवा का समपहरण धारा 47 की उपधारा (1) के अधीन किया जा सकेगा ;
(ङ) वह रीति जिससे आफिसरों के विरुद्ध धारा 53 और धारा 54 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन कार्यवाही की जा सकेगी ;
(च) वह रीति जिससे और वह अवधि जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति को धारा 56 की उपधारा (4) के अधीन उसका विचारण लम्बित रहने तब सुरक्षक की अभिरक्षा में लिया जा सकेगा और निरुद्ध रखा जा सकेगा ;
(छ) वह रीति जिससे किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति की जांच करने वाला कोई जांच न्यायालय धारा 60 की उपधारा (1) के अधीन शपथ दिलवा सकेगा या प्रतिज्ञान करा सकेगा ;
(ज) वह रीति जिससे किसी रिक्ति की धारा 81 की उपधारा (3) के अधीन जनरल सुरक्षक न्यायालय या पैटी सुरक्षक न्यायालय के सदस्य की सेवा-निवृत्ति पर भरा जा सकेगा ;
(झ) वह रीति जिससे धारा 82 की उपधारा (1) के अधीन सुरक्षक न्यायालयों के सदस्यों और जज अटर्नी, आदि की शपथ दिलाई जा सकेगी या प्रतिज्ञान कराया जा सकेगा ;
(ञ) वह रीति जिससे सुरक्षक न्यायालय के समक्ष साक्ष्य देने वाले किसी व्यक्ति को धारा 82 की उपधारा (2) के अधीन शपथ दिलाई जा सकेगी या प्रतिज्ञान कराया जा सकेगा ;
(ट) वह रीति जिससे सुरक्षक न्यायालय किसी व्यक्ति को दोष सिद्ध करते समय धारा 95 की उपधारा (1) के अधीन जांच कर सकेगा ;
(ठ) वह रीति जिससे कोई अभियुक्त व्यक्ति धारा 96 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में रखा जाएगा ;
(ड) उस अधिपत्र का प्ररूप जो उस कारागार के भारसाधक आफिसर को भेजा जाएगा जिसमें कारावास के दंडादेश के अधीन किसी व्यक्ति को धारा 117 की उपधारा (2) के अधीन परिरोध में रखा जाएगा ;
(ढ) वह व्यक्ति जो धारा 121 के अधीन सिविल कारागार में किसी व्यक्ति के परिरोध के लिए अधिपत्र भेजेगा ;
(ण) धारा 135 की उपधारा (2) के अधीन एक ही रैंक के व्यक्तियों की आपस में ज्येष्ठता से संबंधित विषय ;
(त) धारा 7, धारा 10 की उपधारा (2), धारा 12 की उपधारा (1), धारा 77, धारा 97, धारा 111, धारा 113 की उपधारा (2), धारा 117 की उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (4) तथा धारा 124 के अधीन विहित किए जाने वाले प्राधिकारी या आफिसर ;
(थ) कोई अन्य बात जो विहित की जानी है या विहित की जाए या जिसके बारे में इस अधिनियम में कोई उपबंध नहीं है या अपर्याप्त उपबंध है और केन्द्रीय सरकार की राय में इस अधिनियम के उचित कार्यान्वयन के लिए उपबंध आवश्यक है ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
140. विद्यमान राष्ट्रीय सुरक्षक के संबंध में उपबंध-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर विद्यमान राष्ट्रीय सुरक्षक को इस अधिनियम के अधीन गठित समझा जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर विद्यमान राष्ट्रीय सुरक्षक के सदस्य इस अधिनियम के अधीन उस रूप में नियुक्त किए गए समझे जाएंगे ।
(3) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व उपधारा (1) में निर्दिष्ट राष्ट्रीय सुरक्षक के गठन के संबंध में, उसमें नियुक्त किसी व्यक्ति के संबंध में की गई कोई बात या कार्रवाई विधि में वैसी ही विधिमान्य और प्रभावी होगी मानो वह बात या कार्रवाई इस अधिनियम के अधीन की गई थी :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व उसके द्वारा की गई या किए जाने से लोप की गई किसी बात के बारे में किसी अपराध के लिए दोषी नहीं बनाएगी ।
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