Saturday, 25, Apr, 2026
 
 
 
Expand O P Jindal Global University
 

समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 ( Equal Remuneration Act, 1976 )


 

समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976

(1976 का अधिनियम संख्यांक 25)

[11 फरवरी, 1976]

पुरुष और स्त्री कर्मकारों को समान पारिश्रमिक का संदाय करने और नियोजन में

लिंग के आधार पर स्त्रियों के विरुद्ध विभेद किए जाने का निवारण

करने और उससे सम्बद्ध या आनुषंगिक

विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के सत्ताईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे, किन्तु यह तारीख अधिनियम के पारित किए जाने से तीन वर्ष के बाद की नहीं होगी और विभिन्न स्थापनों या नियोजनों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकती हैं ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) समुचित सरकार" से-

(i) केन्द्रीय सरकार या किसी रेल प्रशासन द्वारा या उनके प्राधिकार के अधीन चलाए जाने वाले किसी नियोजन के सम्बन्ध में या बैंककारी कंपनी, खान, तेलक्षेत्र या महापत्तन या केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या के अधीन स्थापित किसी निगम के सम्बन्ध में, केन्द्रीय सरकार, और

(ii) किसी अन्य नियोजन के सम्बन्ध में, राज्य सरकार, अभिप्रेत है ;

(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ" से, किसी स्थापन या नियोजन के सम्बन्ध में, वह तारीख अभिप्रेत है जिसको यह अधिनियम उस स्थापन या नियोजन के बारे में प्रवृत्त होता है ;

(ग) नियोजक" का वही अर्थ है जो उसका उपदान संदाय अधिनियम, 1972 (1972 का 39) की धारा 2 के खण्ड (च) में है ;

(घ) पुरुष" और स्त्री" से किसी आयु का क्रमशः मानव नर और नारी अभिप्रेत है ;

(ङ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(छ) पारिश्रमिक" से वह आधारिक मजदूरी या वेतन और अतिरिक्त उपलब्धियां, चाहे वे नकद या वस्तु रूप में संदेय हों, अभिप्रेत हैं, जो नियोजित व्यक्ति को नियोजन के सम्बन्ध में या ऐसे नियोजन में किए गए काम के सम्बन्ध में नियोजन-संविदा के अभिव्यक्त या विवक्षित निबन्धन पूरे कर दिए जाने पर संदेय हैं ;

(ज) एक ही काम या समान प्रकृति का काम" से ऐसा काम अभिप्रेत है जिसके बारे में अपेक्षित कौशल, प्रयत्न तथा उत्तरदायित्व उस समय एक जैसे हैं जब काम करने की एक जैसी दशाओं में वह काम पुरुष या स्त्री द्वारा किया जाता है और यदि पुरुष से अपेक्षित कौशल, प्रयत्न तथा उत्तरदायित्व और स्त्री से अपेक्षित कौशल, प्रयत्न तथा उत्तरादायित्व में कोई अन्तर है तो नियोजन के निबन्धनों और शर्तों के सम्बन्ध में उसका कोई व्यवहारिक महत्व नहीं है ;

(झ) कर्मकार" से किसी ऐसे स्थापन या नियोजन में कोई कर्मकार अभिप्रेत है जिसके सम्बन्ध में यह अधिनियम प्रवृत्त हो गया है ;

(ञ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ।

3. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध इस बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे कि किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् के किसी अधिनियम, करार या सेवा-संविदा के निबन्धनों में अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन प्रभावी किसी लिखत में उनसे असंगत कोई बात है ।

अध्याय 2

पुरुष और स्त्री कर्मकारों को समान दरों पर पारिश्रमिक का संदाय और अन्य विषय

4. पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए समान वेतन का संदाय करने के लिए नियोजक का कर्तव्य-(1) कोई नियोजक किसी स्थापन या नियोजन में अपने द्वारा नियोजित किसी कर्मकार को पारिश्रमिक, चाहे वह नकद या वस्तु रूप में संदेय हो, उस दर से कम दर पर नहीं देगा जिस दर पर उसके द्वारा उस कर्मकार से भिन्न लिंग के कर्मकार को उस स्थापन या नियोजन में एक ही काम या समान प्रकृति के काम के किए जाने के लिए संदाय किया जाता है ।

                (2) कोई नियोजक उपधारा (1) के उपबन्धों का पालन करने के प्रयोजन के लिए किसी कर्मकार के पारिश्रमिक की दर नहीं घटाएगा ।

                (3) जहां किसी स्थापन या नियोजन में, इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व, पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए संदेय पारिश्रमिक की दरें केवल लिंग के आधार पर भिन्न-भिन्न हैं वहां, यथास्थिति, ऐसी दरों में से उच्चत्तर दर (जहां केवल दो दरें हैं) या उच्चत्तर दर (जहां दो से अधिक दरें हैं) वह दर होगी जिस दर पर पारिश्रमिक इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही ऐसे पुरुष और स्त्री कर्मकारों को संदेय होगा :

                परन्तु इस उपधारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी पुरुष या स्त्री कर्मकार को इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व उसके द्वारा की गई किसी सेवा के सम्बन्ध में उसे संदेय पारिश्रमिक की दर का पुनरीक्षण करा सकने का हक प्रदान करती है ।

5. पुरुष और स्त्री कर्मकारों की भर्ती करते समय कोई विभेद किया जाना-इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, कोई नियोजक एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए भर्ती करते समय  [या भर्ती के पश्चात् सेवा की किसी भी शर्त में, जैसे प्रोन्नति, प्रशिक्षण या स्थानांतरण] स्त्रियों के विरुद्ध कोई विभेद नहीं करेगा, सिवाय उस दशा में जिसमें ऐसे काम में स्त्रियों का नियोजन तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या के अधीन प्रतिषिद्ध या निर्बन्धित है :

                परन्तु इस धारा के उपबन्ध, किसी स्थापन या नियोजन में पदों की भर्ती के मामले में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों, भूतपूर्व सैनिकों, छंटनी किए गए कर्मचारियों या किसी अन्य वर्ग या प्रवर्ग के व्यक्तियों के लिए किसी प्राथमिकता या आरक्षण को प्रभावित नहीं करेंगे ।

6. सलाहकार समिति-(1) समुचित सरकार नियोजन में स्त्रियों को अधिक अवसर प्रदान करने के प्रयोजन के लिए एक या एक से अधिक सलाहकार समितियां उसको इस बारे में सलाह देने के लिए गठित करेगी कि किस विस्तार तक स्त्रियों को ऐसे स्थापनों या नियोजनों में, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, नियोजित किया जाए ।

                (2) प्रत्येक सलाहकार समिति में कम से कम दस व्यक्ति होंगे जो समुचित सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जिनमें से आधी स्त्रियां होंगी ।

                (3) सलाहकार समिति अपनी सलाह देने में सम्बद्ध स्थापन या नियोजन में नियोजित स्त्रियों की संख्या, काम की प्रकृति, काम के घंटे, यथास्थिति, नियोजन के लिए स्त्रियों की उपयुक्तता, स्त्रियों को नियोजन के, जिसके अन्तर्गत अंशकालिक नियोजन भी है, अधिक अवसर प्रदार करने की आवश्यकता और ऐसी अन्य सुसंगत बातों का, जिन्हें सलाहकार समिति ठीक समझे, ध्यान रखेगी ।

                (4) सलाहकार समिति अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करेगी ।

                (5) समुचित सरकार उस सलाह पर विचार करने के पश्चात्, जो उसे सलाहकार समिति द्वारा दी जाए, और स्थापन या नियोजन में सम्बद्ध व्यक्तियों को अभ्यावेदन करने का अवसर देने के पश्चात् स्त्री कर्मकारों के नियोजन के बारे में ऐसे निदेश जारी कर सकती है जो समुचित सरकार ठीक समझे ।

7. दावों और परिवादों की सुनवाई और विनिश्चय करने के लिए प्राधिकारियों को नियुक्त करने की समुचित सरकार की शक्ति-(1) समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा, श्रम अधिकारी से अनिम्न पंक्ति के ऐसे अधिकारियों को जिन्हें वह ठीक समझे,-

(क) इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के उल्लंघन के सम्बन्ध में परिवाद ; तथा

(ख) पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए समान दरों पर मजदूरी का संदाय न किए जाने से उद्भूत होने वाले दावे,

की सुनवाई और उनके विनिश्चय के प्रयोजन के लिए प्राधिकारी नियुक्त कर सकती है और उसी या पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा उन स्थानीय सीमाओं को परिनिश्चित कर सकती है जिनमें ऐसा प्रत्येक प्राधिकारी अपनी अधिकारिता का प्रयोग करेगा ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक परिवाद या दावा ऐसी रीति से किया जाएगा जैसी विहित की जाए ।

                (3) यदि इस बारे में कोई प्रश्न उठता है कि क्या दो या दो से अधिक काम एक ही प्रकृति के हैं या समान प्रकृति के हैं तो इसका विनिश्चय उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा ।

                (4) जहां कोई परिवाद या दावा उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी को किया जाता है वहां वह प्राधिकारी आवेदक और नियोजक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, यह निदेश दे सकता है कि,-

(i) ऐसे दावे की दशा में, जो पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए समान दरों पर मजदूरी का संदाय न किए जाने से उद्भूत हो, कर्मकार को उतनी रकम का संदाय किया जाए जितनी उसे संदेय मजदूरी, उसे वास्तव में संदत्त रकम से अधिक हो ;

(ii) परिवाद की दशा में, नियोजक द्वारा ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे यह सुनिश्चित हो जाए कि इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन नहीं होता है ।

(5) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रत्येक प्राधिकारी को साक्ष्य लेने के लिए, साक्षियों को हाजिर कराने के लिए और दस्तावेजों को पेश करने के लिए विवश करने के प्रयोजन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और ऐसा प्रत्येक प्राधिकारी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

(6) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी द्वारा किसी परिवाद या दावे पर किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई नियोजक या कर्मकार, ऐसे आदेश की तारीख से तीस दिन के अन्दर ऐसे प्राधिकारी को, जिसे समुचित सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अपील कर सकता है और वह प्राधिकारी अपील की सुनवाई करने के पश्चात् उस आदेश को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट कर सकता है, उपान्तरित कर सकता है या उलट सकता है और ऐसे प्राधिकारी द्वारा किए गए आदेश के विरुद्ध कोई और अपील नहीं होगी ।

                (7) यदि उपधारा (6) में निर्दिष्ट प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी उपधारा (6) में विनिर्दिष्ट अवधि के अन्दर अपील करने में पर्याप्त हेतुक से निवारित कर दिया गया था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के अन्दर अपील करने की अनुज्ञा दे सकता है किन्तु उसके पश्चात् नहीं ।

                (8) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 33ग की उपधारा (1) के उपबन्ध किसी नियोजक से ऐसे देय धन की वसूली के लिए लागू होंगे जो इस धारा के अधीन नियुक्त प्राधिकारी के विनिश्चय से उद्भूत हो ।

अध्याय 3

प्रकीर्ण

8. रजिस्टरों को बनाए रखने के लिए नियोजकों के कर्तव्य-इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही प्रत्येक नियोजक अपने द्वारा नियोजित कर्मकारों के सम्बन्ध में ऐसे रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों को बनाए रखेगा, जिन्हें विहित किया जाए ।

9. निरीक्षक-(1) समुचित सरकार यह अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए कि क्या इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों का नियोजकों द्वारा पालन किया जा रहा है, अधिसूचना द्वारा, ऐसे व्यक्तियों को निरीक्षक नियुक्त कर सकती है जिन्हें वह ठीक समझे और उन स्थानीय सीमाओं को परिनिश्चित कर सकती है जिनमें निरीक्षक ऐसा अन्वेषण कर सकता है ।

(2) प्रत्येक निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

(3) कोई निरीक्षक अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर किसी भी स्थान में,-

(क) किसी युक्तियुक्त समय पर और ऐसी सहायता के साथ, जो वह ठीक समझे, किसी भवन, कारखाने, परिसर या जलयान में, प्रवेश कर सकता है ;

(ख) किसी नियोजक से कर्मकारों के नियोजन के सम्बन्ध में किसी रजिस्टर, मस्टर-रोल या अन्य दस्तावेजों के पेश किए जाने की अपेक्षा कर सकता है और ऐसे दस्तावेजों की जांच कर सकता है ;

(ग) उसी स्थल पर या अन्यत्र किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए ले सकता है कि क्या इस अधिनियम के उपबंधों का पालन हो रहा है या पालन किया गया है ;

(घ) किसी नियोजक की, उसके अभिकर्ता, या सेवक की या किसी अन्य व्यक्ति की, जो स्थापन या उससे सम्बन्धित किसी परिसर का भारसाधक पाया जाता है या किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसके बारे में निरीक्षक के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त हेतुक है कि वह स्थापन में कर्मकार है या रहा है, परीक्षा कर सकता है ;

(ङ) इस अधिनियम के अधीन किसी स्थापन के सम्बन्ध में बनाए रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज की प्रतियां बना सकता है या उससे उद्धरण ले सकता है ।

                (4) ऐसा व्यक्ति, जिससे निरीक्षक ने कोई रजिस्टर या अन्य दस्तावेज पेश करने या कोई जानकारी देने की अपेक्षा की है, ऐसी अध्यपेक्षा का पालन करेगा ।

10. शास्तियां-(1) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् कोई नियोजक जिससे अधिनियम के अधीन ऐसा करने की अपेक्षा की   गई है-

(क) अपने द्वारा नियोजित कर्मकारों के सम्बन्ध में कोई रजिस्टर या अन्य दस्तावेज बनाए रखने में लोप करेगा या असफल रहेगा, अथवा

(ख) कर्मकारों के नियोजन से संबंधित कोई रजिस्टर, मस्टर-रोल या अन्य दस्तावेज पेश करने में लोप करेगा या असफल रहेगा, अथवा

(ग) कोई साक्ष्य देने में लोप करेगा या देने से इंकार करेगा या अपने अभिकर्ता, सेवक या किसी अन्य व्यक्ति को, जो स्थापन का भारसाधक है, या किसी कर्मकार को साक्ष्य देने से रोकेगा, अथवा

(घ) कोई जानकारी देने में लोप करेगा या देने से इंकार करेगा,

तो वह,  [सादा कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से,ट दंडनीय होगा ।

                (2) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् कोई नियोजक,-

(क) इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में कोई भर्ती करेगा, अथवा

(ख) पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए असमान दरों पर पारिश्रमिक का संदाय करेगा, अथवा

(ग) पुरुष और स्त्री कर्मकारों के बीच कोई विभेद इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में करेगा, अथवा

(घ) समुचित सरकार द्वारा धारा 6 की उपधारा (5) के अधीन दिए गए किसी निदेश का पालन करने में लोप करेगा या असफल रहेगा,

तो वह 1[प्रथम अपराध के लिए जुर्माने से, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो बीस हजार रुपए तक हो सकेगा, या कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी किन्तु जो एक वर्ष तक की हो सकेगी, या दोनों से, और द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराधों के लिए ऐसे कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा,] दंडनीय होगा ।

                (3) यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जिससे ऐसा करने की अपेक्षा की गई है, निरीक्षक की कोई रजिस्टर या अन्य दस्तावेज पेश करने में या कोई जानकारी देने में लोप करेगा या इंकार करेगा तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

11. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तो वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरादायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :

                परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकरी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा

(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

               

 [12. अपराधों का संज्ञान और विचारण-(1) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

(2) न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान-

(क) अपनी जानकारी पर या समुचित सरकार द्वारा, या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी द्वारा, किए गए परिवाद पर, या

(ख) अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा या किसी मान्यताप्राप्त कल्याण संस्था या संगठन द्वारा किए गए परिवाद पर करेगा अन्यथा नहीं ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त कल्याण संस्था या संगठन" से केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त मान्याप्राप्त सामाजिक कल्याण संस्था या संगठन अभिप्रेत है ।]

13. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी । 

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) वह रीति जिससे धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिवाद या दावा किया जाएगा ;

(ख) वे रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें जिन्हें नियोजक से ऐसे कर्मकारों के सम्बन्ध में, जो उसके द्वारा नियोजित हैं, बनाए रखने की अपेक्षा धारा 8 के अधीन की गई है ;

(ग) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है ।

                (3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

14. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार किसी राज्य सरकार को उस राज्य में इस अधिनियम को कार्यान्वित करने के सम्बन्ध में निदेश दे सकती है ।

 [15. कतिपय विशेष मामलों को अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम की कोई बात,-

(क) स्त्रियों के साथ विशेष बर्ताव करने वाली किसी विधि की अपेक्षाओं के अनुपालन में स्त्रियों के नियोजन के निबंधनों और शर्तों को प्रभावित करने वाले मामलों को लागू नहीं होगी ; या

(ख) स्त्रियों के साथ निम्नलिखित की बाबत किसी विशेष बर्ताव के संबंध में लागू नहीं होगी :-

(i) शिशु का जन्म या प्रत्याशित जन्म, या

(ii) निवृत्त, विवाह या मृत्यु अथवा उसके संबंध में किसी व्यवस्था से संबंधित निबंधन और शर्तें ।]

16. घोषणा करने की शक्ति-जहां मामले की सभी परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् समुचित सरकार का समाधान हो जाता है कि किसी स्थापन में पुरुष और स्त्री कर्मकारों के पारिश्रमिक में या पारिश्रमिक के विशिष्ट स्वरूप में अन्तर है या नियोजन लिंग से भिन्न बात पर आधारित है वहां वह, अधिसूचना द्वारा, इस आशय की घोषणा कर सकती है और नियोजक के किसी ऐसे कार्य को, जो उस अन्तर के कारण हो, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन नहीं समझा जाएगा ।

17. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसा कोई आदेश कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हो :

परन्तु ऐसा प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

18. निरसन और व्यावृत्ति-(1) समान पारिश्रमिक अध्यादेश, 1975 (1975 का 12) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्यवाही (जिसके अन्तर्गत उसके अधीन की गई कोई अधिसूचना, नामनिर्देशन, नियुक्ति, आदेश या निदेश भी है) इस अधिनियम के तत्समान उपबन्धों के अधीन की गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम उस समय प्रवृत्त था जब ऐसी बात या कार्यवाही की गई थी ।

_____________

Download the LatestLaws.com Mobile App
 
 
Latestlaws Newsletter
 

Publish Your Article

 

Campus Ambassador

 

Media Partner

 

Campus Buzz

 

LatestLaws Guest Court Correspondent

LatestLaws Guest Court Correspondent Apply Now!
 

LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026

 

LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!

 
 
 

LatestLaws Partner Event : IJJ

 
 
Latestlaws Newsletter