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बोनस संदाय अधिनियम, 1965 ( Payment of Bonus Act, 1965 )


 

बोनस संदाय अधिनियम, 1965

(1965 का अधिनियम संख्यांक 21)

[25 सितंबर, 1965]

[कतिपय स्थापनों में नियोजित व्यक्तियों को

लाभों के आधार पर अथवा उत्पादन या

उत्पादकता के आधार पर बोनस के

सदांय तथा उससे संबंधित

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम]

भारत गणराज्य के सोलहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होना-(1) यह अधिनियम बोनस संदाय अधिनियम, 1965 कहा जा सकेगा  

2. इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है  

(3) इस अधिनियम में यथा उपबंधित के सिवाय, यह-

() हर कारखाने को; तथा 

() ऐसे हर अन्य स्थापन को, जिनमें किसी लेखा वर्ष के दौरान किभी दिन बीस या अधिक व्यक्ति नियोजित हों,

लागू होगा:

 [परन्तु समुचित सरकार, ऐसा करने के अपने आशय की कम से कम दो मास की सूचना देने के पश्चात्, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंध किसी स्थापन या स्थापनों के किसी वर्ग को [जिनके अंतर्गत ऐसा स्थापन भी है जो कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खंड () के उपखंड (ii) के अर्थ में कारखाना है] जिनमें बीस से कम उतने व्यक्ति नियोजित हों जितने अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसे लेखा वर्ष से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, लागू कर सकेगी, किन्तु इस प्रकार विनिर्दिष्ट व्यक्तियों की संख्या किसी भी दशा में दस से कम नहीं होगी ]

(4) इस अधिनियम में यथा उपबंधित के सिवाय, इस अधिनियम के उपबंध, किसी कारखाने या अन्य स्थापन के संबंध में, जिसे यह अधिनियम लागू है, सन् 1964 में किसी दिन को प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष के बारे में तथा हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के बारे में प्रभावशील होंगे:

 [परंतु जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में सन् 1964 में किसी दिन को प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष के बारे में तथा हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के बारे में निर्देश का अर्थ सन् 1968 में किसी दिन को प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष तथा हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के प्रति निर्देश से लगाया जाएगा:]

4[परंतु यह और कि जब इस अधिनियम के उपबंध उपधारा (3) के परंतुक के अधीन कोई अधिसूचना जारी करके किसी स्थापन या स्थापनों के किसी वर्ग को लागू किए गए हों, तब, यथास्थिति, सन् 1964 में किसी दिन को प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष तथा हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के प्रति निर्देश का या सन् 1968 में किसी दिन को प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष तथा हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के प्रति निर्देश का, ऐसे स्थापन या स्थापनों के उस वर्ग के संबंध में, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट लेखा वर्ष तथा हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के प्रति निर्देश है ]                                                                                                                 

(5) कोई स्थापन जिसे यह अधिनियम लागू है, इस बात के होते हुए भी कि उसमें नियोजित व्यक्तियों की संख्या, 4[यथास्थिति] बीस से, 4[या उपधारा (3) के परंतुक के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट संख्या] से कम हो जाती है, इस अधिनियम से शासित होता रहेगा  

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

(1) लेखा वर्ष" से

(i) किसी निगम के संबंध में, ऐसे दिन को समाप्त होने वाला वर्ष अभिप्रेत है जब निगम की बहियां और लेखा बंद और संतुलित किए जाते हैं

(ii) किसी कंपनी के संबंध में, वह कालावधि अभिप्रेत है जिसकी बाबत कंपनी का कोई लाभ और हानि का लेखा, जो कंपनी की वार्षिक साधारण बैठक के समक्ष रखा गया है बनाया जाता है, चाहे ऐसी कालावधि एक वर्ष की हो या हो

(iii) किसी अन्य दशा में-

() अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाला वर्ष अभिप्रेत है; अथवा 

() यदि किसी स्थापन के नियोजक द्वारा रखे जाने वाले लेखा मार्च के 31वें दिन से भिन्न किसी दिन को बंद और संतुलित किए जाते हैं तो नियोजक के विकल्प पर उस दिन समाप्त होने वाला वर्ष अभिप्रेत है जब उसके लेखा इस प्रकार बंद और संतुलित किए जाते हैं

परन्तु नियोजक द्वारा इस उपखंड के पैरा () के अधीन एक बार विकल्प का प्रयोग कर लिए जाने पर उसका पुनः प्रयोग विहित अधिकारी की लिखित रूप में पूर्वानुज्ञा के और ऐसी शर्तों पर के सिवाय, जैसी कि वह प्राधिकारी ठीक समझे, किया जाएगा

(2) कृषि आय" का वही अर्थ होगा जो उसका आय-कर अधिनियम में है

(3) कृषि आय-कर विधि" से कृषि आय पर कर के उद्ग्रहण से संबंधित कोई तत्समय प्रवृत्त विधि अभिप्रेत है

(4) आबंटनीय अधिशेष" से

() ऐसे किसी नियोजक के संबंध में, [जो (बैंककारी कंपनी से भिन्न) ऐसी कंपनी है,] जिसने आय-कर अधिनियम की धारा 194 के उपबंधों के अनुसार अपने लाभों में से संदेय लाभांशों के बारे में भारत के भीतर घोषणा और संदाय के लिए विहित इंतजाम उस अधिनियम के अधीन नहीं किया है, किसी लेखा वर्ष में उपलभ्य अधिशेष का सड्सठ प्रतिशत अभिप्रेत है,

() किसी अन्य दशा में ऐसे उपलभ्य अधिशेष का साठ प्रतिशत अभिप्रेत है,

(5) समुचित सरकार" से-

(i)  किसी स्थापन के संबंध में, जिसकी बाबत औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है, केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है

(ii) किसी अन्य स्थापन के संबंध में, उस राज्य की सरकार अभिप्रेत है जिसमें वह अन्य स्थापन स्थित है

(6) उपलभ्य अधिशेष" से धारा 5 के अधीन संगणित उपलभ्य अधिशेष अभिप्रेत है;

(7) अधिनिर्णय" से किसी औद्योगिक विवाद या तत्संबंधी किसी प्रश्न का वह अंतरिम या अंतिम अवधारण अभिप्रेत है जो किसी श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण द्वारा, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन गठित है, अथवा किसी राज्य में औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और समझौते से संबंधित किसी तत्समान प्रवृत्त विधि के अधीन गठित किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा किया गया है और इसके अंतर्गत माध्यस्थम् पंचाट भी है जो उस अधिनियम की धारा 10 के अधीन या उस विधि के अधीन दिया गया है;

(8) बैंककारी कंपनीसे बैंककारी कंपनी अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 में यथापरिभाषित बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित कोई समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट तत्स्थानी नया बैंक,  [बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित कोई 1[तत्स्थानी नया बैंकट भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खंड (खत्त्) में यथापरिभाषित कोई सहकारी बैंक तथा कोई ऐसी अन्य बैंककारी संस्था भी है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की जाए

(9) कंपनी" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में यथापरिभाषित कोई कंपनी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उस अधिनियम की धारा 591 के अर्थान्तर्गत विदेशी कंपनी भी है;

(10) सहकारी सोसाइटी" से ऐसी सोसाइटी अभिप्रेत है जो सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) या किसी राज्य में सहकारी सोसाइटियों से संबंधित किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्टर की हुई या रजिस्टर की गई समझी जाती है;

(11) निगम" से किसी केन्द्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है किंतु इसके अंतर्गत कोई कंपनी या सहकारी सोसाइटी नहीं है

(12) प्रत्यक्ष कर" से-

() ऐसा कोई कर अभिप्रेत है जो

(i) आय-कर अधिनियम;

(ii) अधिलाभ-कर अधिनियम, 1963 (1963 का 14); 

(iii) कंपनी (लाभ) अधिकर अधिनियम, 1964 (1964 का 7);

(iv) कृषि आय-कर विधि,

के अधीन प्रभार्य है, तथा 

() कोई अन्य कर, जो उसकी प्रकृति या आपतन को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए प्रत्यक्ष कर होना घोषित किया जाए

(13) कर्मचारी" से (शिक्षु से भिन्न) ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो भाड़े या इनाम के लिए किसी उद्योग में कोई कुशल या अकुशल शारीरिक, पर्यवेक्षी, प्रबंधकीय, प्रशासकीय, तकनीकी या लिपिकीय कार्य करने के लिए  [इक्कीस हजार रुपए] प्रतिमास से अनधिक वेतन या मजदूरी पर नियोजित है, चाहे नियोजन के निबंधन अभिव्यक्त या विवक्षित हों

(14) नियोजक" के अंतर्गत

(i) किसी स्थापन के संबंध में, जो कारखाना है, उस कारखाने का स्वामी या अधिभोगी भी है और इसके अंतर्गत ऐसे स्वामी या अधिभोगी का अभिकर्ता, मृत-स्वामी या अधिभोगी का विधिक प्रतिनिधि तथा जहां कि कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 7 की उपधारा (1) के खंड () के अधीन कारखाने के प्रबन्धक की हैसियत में कोई व्यक्ति नामित किया गया है वहां ऐसा नामित व्यक्ति भी है, तथा 

(ii) किसी अन्य स्थापन के संबंध में, वह व्यक्ति या वह प्राधिकारी, जिसका स्थापन के कार्यकलाप पर अंतिम नियंत्रण होता है, तथा जहां कि उक्त कार्यकलाप किसी प्रबंधक, प्रबंध-निदेशक या प्रबंध-अभिकर्ता को सौंपे गए हैं वहां ऐसा प्रबंधक, प्रबंध-निदेशक या प्रबंध-अभिकर्ता भी है;

(15) प्राइवेट-सेक्टर-स्थापन" से पब्लिक-सेक्टर-स्थापन से भिन्न कोई स्थापन अभिप्रेत है;

(16) पब्लिक-सेक्टर-स्थापन" से वह स्थापन अभिप्रेत है जिसका स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंध-

() कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कंपनी द्वारा किया जाता है;

() ऐसे निगम द्वारा किया जाता है जिसकी पूंजी का चलीस प्रतिशत से अन्यून (चाहे अकेले या संयुक्त रूप से) - 

(i) सरकार द्वारा; अथवा 

(ii) भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा; अथवा 

(iii) सरकार के या भारतीय रिजर्व बैंक के स्वामित्व में के निगम द्वारा,

धृत है

(17) कारखाना" का वही अर्थ होगा जो उसका कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खंड () में है

(18) सकल लाभ" से धारा 4 के अधीन परिकलित सकल लाभ अभिप्रेत है

(19) आय-कर अधिनियम" से आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) अभिप्रेत है

(20) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है

(21) वेतन या मजदूरी" से धन के रूप में अभिव्यक्त किए जाने योग्य (अतिकालिक काम की बाबत पारिश्रमिक से भिन्न) वह सभी पारिश्रमिक अभिप्रेत है जो यदि नियोजन के निबंधन चाहे वे अभिव्यक्त या विवक्षित हों, पूरे हो जाएं तो कर्मचारी को उसके नियोजन की या ऐसे नियोजन में किए गए काम की बाबत संदेय होगा तथा इसके अंतर्गत महंगाई भत्ता (अर्थात् सब नकद संदाय, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो निर्वाह व्यय में वृद्धि के कारण कर्मचारी को दिए जाते हैं) भी हैं किंतु इसके अन्तर्गत नहीं हैं-

                                (i) कोई अन्य भत्ता जिसका वह कर्मचारी तत्समय हकदार है,

(ii) किसी गृह-वास सुविधा की अथवा प्रकाश, जल, चिकित्सीय परिचर्या या अन्य सुख-सुविधा के प्रदाय या किसी सेवा का या रियायती दर पर खाद्यान्न या अन्य चीजों के प्रदाय का मूल्य,

(iii) यात्रा संबंधी कोई रियायत

(iv) कोई बोनस (जिसके अन्तर्गत प्रोत्साहन, उत्पादन तथा हाजिरी बोनस भी है),

(v) किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन नियोजक द्वारा किसी पेंशन निधि में या भविष्य-निधि में या कर्मचारी के फायदे के लिए संदत्त या संदेय कोई अभिदाय,

(vi) कोई छंटनी प्रतिकर या कोई उपदान या अन्य निवृत्ति-कालिक फायदा जो कर्मचारी को संदेय हो, या उसे किया गया कोई अनुग्रहपूर्वक संदाय

(vii) कर्मचारी को संदेय कोई कमीशन

स्पष्टीकरण-जहां किसी कर्मचारी को उसे संदेय संपूर्ण वेतन या मजदूरी के अथवा उसके भाग के बढ़ने में, उसके नियोजक द्वारा निःशुल्क भोजन भत्ता या निःशुल्क भोजन दिया जाता है वहां ऐसा भोजन भत्ता या ऐसे भोजन का मूल्य इस खंड के प्रयोजन के लिए ऐसे कर्मचारी के वेतन या मजदूरी का भाग समझा जाएगा

(22) इस अधिनियम में प्रयुक्त शब्दों या पदों के जिनकी परिभाषा यहां नहीं की गई है किंतु औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में हुई है, वे ही अर्थ होंगे जो उनको क्रमशः उस अधिनियम में समनुदिष्ट हैं  

3. स्थापनों के अंतर्गत, विभागों, उपक्रमों और शाखाओं का होना-जहां कोई स्थापन विभिन्न विभागों या उपक्रमों से मिलकर बने हैं या उसकी शाखाएं हैं चाहे वे एक ही स्थान में या विभिन्न स्थानों में स्थित हों, वहां ऐसे सभी विभाग या उपक्रम या शाखा को इस अधिनियम के अधीन बोनस की संगणना करने के प्रयोजन के लिए उसी स्थापन का भाग समझा जाएगा:

परंतु जहां किसी लेखा वर्ष के लिए पृथक् तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि का लेखा किसी ऐसे विभाग या उपक्रम या शाखा की बाबत तैयार किए जाते या बनाए रखे जाते हैं, वहां ऐसे विभाग या उपक्रम या शाखा को उस वर्ष के लिए इस अधिनियम के अधीन बोनस की संगणना के प्रयोजन के लिए पृथक् स्थापन तब के सिवाय समझा जाएगा जब कि ऐसे विभाग या उपक्रम या शाखा को बोनस की संगणना करने के प्रयोजन के लिए स्थापन का भाग उस लेखा वर्ष के प्रारंभ से ठीक पूर्व समझा गया है

 [4. सकल लाभों की संगणना-किसी लेखा वर्ष की बाबत किसी स्थापन से नियोजक को व्युत्पन्न सकल लाभ की संगणना-

() बैंककारी कंपनी की दशा में, उस रीति से की जाएगी जो प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट है

() किसी अन्य दशा में, उस रीति से की जाएगी जो द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट है ]

5. उपलभ्य अधिशेष की संगणना-किसी लेखा वर्ष की बाबत उपलभ्य अधिशेष, धारा 6 में निर्दिष्ट राशियों की उसमें से कटौती के पश्चात् उस वर्ष का सकल लाभ होगा

 [परंतु सन् 1968 में किसी दिन प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष की बाबत और हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष की बाबत उपलभ्य अधिशेष, निम्नलिखित का योग होगा-

() धारा 6 में निर्दिष्ट राशियों की कटौती करने के पश्चात् उस लेखा वर्ष के सकल लाभ; तथा

() इन दोनों में के, अर्थात्: -

(i) ठीक पूर्ववर्ती लेखा वर्ष के नियोजक के सकल लाभों के बराबर रकम की बाबत धारा 7 के उपबंधों के अनुसार परिकलित प्रत्यक्ष कर; तथा 

(ii) ऐसे पूर्ववर्ती लेखा वर्ष के नियोजक के सकल लाभों में से बोनस की रकम की कटौती करने के पश्चात् उस रकम के, जो नियोजक ने अपने कर्मचारियों को इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार उस वर्ष के लिए दी हो या देने का दायी हो, बराबर रकम की बाबत धारा 7 के उपबंधों के अनुसार परिकलित प्रत्यक्ष कर,

अंतर के बराबर रकम ]

6. सकल लाभों में से काटी जाने वाली राशियां-निम्नलिखित राशियां पूर्विक भारों के रूप में सकल लाभों में से काटी जाएंगी, अर्थात्: -

() कोई भी ऐसी रकम, जो अवक्षयण मद्धे, यथास्थिति, आय-कर अधिनियम की धारा 32 की उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार अथवा कृषि आय-कर विधि के उपबन्धों के अनुसार अनुज्ञेय हो:

परन्तु जहां कोई नियोजक अपने कर्मचारियों को सकल लाभ में से प्रकल्पनाश्रित प्रसामान्य अवक्षयण की कटौती करने के पश्चात् कोई बोनस, 29 मई, 1965 के पूर्व किए गए और उस तारीख पर अस्तित्वशील किसी समझौते या अधिनिर्णय या करार के अधीन देता रहा है वहां इस खंड के अधीन काटी जाने वाली अवक्षयण की रकम, ऐसे नियोजक के विकल्प पर (ऐसे विकल्प का प्रयोग एक बार और उस तारीख से एक वर्ष के भीतर करना होगा), ऐसी प्रकल्पनाश्रित प्रसामान्य अवक्षयण रहेगी;

() [विकास रिबेट या विनिधान मोक या विकास मोक] के रूप की कोई भी रकम, जिसे नियोजक आय-कर अधिनियम के अधीन अपनी आय में से काट लेने का हकदार है

() धारा 7 के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, कोई प्रत्यक्ष-कर जिसको उस लेखा वर्ष के लिए देने का दायित्व नियोजक का उस वर्ष के दौरान अपनी आय, लाभों और अभिलाभों की बाबत है;

() ऐसी अतिरिक्त राशियां जैसी [तृतीय अनुसूची] में नियोजक की बाबत विनिर्दिष्ट हैं  

7. नियोजक द्वारा संदेय प्रत्यक्ष कर का परिकलन-ऐसे [किसी प्रत्यक्ष-कर] का परिकलन, 3[जो नियोजक द्वारा] किसी लेखा वर्ष के लिए 3[संदेय है] निम्नलिखित उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, उन दरों से किया जाएगा जो नियोजक की उस वर्ष की आय के बारे में लागू हो, अर्थात्: -

() ऐसे कर का परिकलन करने में

(i) कोई ऐसी हानि जो नियोजक ने किसी पूर्व लेखा वर्ष की बाबत उपगत की है और प्रत्यक्ष करों से संबंधित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन अग्रनीत की गई है

(ii) अवक्षयण विषयक किन्हीं ऐसी बकायों को जिन्हें नियोजक आय-कर अधिनियम की धारा 32 की उपधारा (2) के अधीन आगामी किसी लेखा वर्ष या किन्हीं लेखा वर्षों के अवक्षयण लेखे मोक की रकम में जोड़ने का हकदार है;  

(iii) वित्त अधिनियम, 1965 (1965 का 10) के प्रारंभ के ठीक पूर्व यथाप्रवृत्त आय-कर अधिनियम की धारा 84 के अधीन नियोजक को प्रदत्त कोई छूट या उस अधिनियम की धारा 101 की उपधारा (1) के अधीन कोई कटौती जिसका वह हकदार है,

गणना में नहीं ली जाएगी;

() जहां नियोजक ऐसी धार्मिक या पूर्त संस्था है जिसे धारा 32 के उपबंध लागू नहीं होते हैं तथा उसकी संपूर्ण आय या उसका कोई भाग आय-कर अधिनियम के अधीन कर से छूट प्राप्त है, वहां इस प्रकार छूट प्राप्त आय की बाबत ऐसी संस्था को समझा जाएगा मानो वह ऐसी कंपनी हो जिसमें जनता उस अधिनियम के अर्थ में पर्याप्त रूप से हितबद्ध है;

() जहां नियोजक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है वहां आय-कर अधिनियम के अधीन ऐसे नियोजक द्वारा संदेय कर का परिकलन इस आधार पर किया जाएगा कि स्थापन से उसे व्युत्पन्न आय ही उसकी आय है

() जहां किसी नियोजक की आय के अंतर्गत कोई ऐसे लाभ या अभिलाभ हैं जो भारत से बारह किसी माल या वाणिज्या के निर्यात से व्युत्पन्न हुए हों और ऐसी आय पर कोई रिबेट प्रत्यक्ष करों से संबंधित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन अनुज्ञात है, वहां ऐसा रिबेट गणना में नहीं लिया जाएगा;

() प्रत्यक्ष करों के संदाय में [(विकास रिबेट या विनिधान मोक या विकास मोक से भिन्न)] कोई रिबेट या प्रतिदेय रकम या राहत रकम या कटौती (जो इस धारा में इसके पूर्व वर्णित नहीं है) जो प्रत्यक्ष कर संबंधी किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन या सुसंगत वार्षिक वित्त अधिनियम के अधीन किसी उद्योग के विकास के लिए अनुज्ञात है, गणना में नहीं ली जाएगी  

8. बोनस के लिए पात्रता-हर कर्मचारी अपने नियोजक से लेखा वर्ष में इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार बोनस पाने का हकदार होगा, परंतु यह तब जबकि उसने उस स्थापन में उस वर्ष में कम से कम तीस काम के दिनों के लिए, काम किया हो

9. बोनस के लिए अनर्हता-इस अधिनियम में किसी बात के अंतर्विष्ट होते हुए भी, कोई कर्मचारी इस अधिनियम के अधीन बोनस प्राप्त करने के लिए निरर्हित होगा, यदि वह

() कपट; अथवा

() स्थापन के परिसर में होते हुए किसी बलवात्मक या हिंसात्मक आचरण; अथवा 

() स्थापन की किसी संपत्ति की चोरी, उसके दुर्विनियोग या अभिध्वंस,

के कारण सेवाच्युत कर दिया जाता है  

 [10. न्यूनतम बोनस का संदाय-इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, हर नियोजक वर्ष 1979 में किसी भी दिन को प्रारंभ होने वाले लेखा वर्ष के संबंध में और हर पश्चात्वर्ती लेखा वर्ष के संबंध में हर कर्मचारी को भले ही उस लेखा वर्ष में नियोजक के पास कोई आबंटनीय अधिशेष हो या नहीं, ऐसे न्यूनतम बोनस का संदाय करने के लिए आबद्ध होगा जो कर्मचारी द्वारा उस लेखा वर्ष में उपार्जित वेतन या मजदूरी के 8.33 प्रतिशत के बराबर या एक सौ रुपए, दोनों में से जो भी अधिक हो, होगा :

परंतु जहां कर्मचारी ने उस लेखा वर्ष के प्रारंभ पर पन्द्रह वर्ष की आयु पूरी नहीं की है वहां ऐसे कर्मचारी के संबंध में इस धारा के उपबंध ऐसे प्रभावशील होंगे मानो एक सौ रुपए" शब्दों के स्थान पर साठ रुपए" शब्द रख दिए गए हैं   

11. अधिकतम बोनस का संदाय-(1) जहां धारा 10 में निर्दिष्ट किसी लेखा वर्ष की बाबत आबंटनीय अधिशेष उस धारा के अधीन कर्मचारियों को संदेय न्यूनतम बोनस की रकम से अधिक है, वहां नियोजक उस लेखा वर्ष में ऐसे हर कर्मचारी को, ऐसे न्यूनतम बोनस के बदले ऐसे बोनस का संदाय करने के लिए आबद्ध होगा जिसकी रकम ऐसे कर्मचारी द्वारा उस लेखा वर्ष में उपार्जित वेतन या मजदूरी के अनुपात में होगी किंतु ऐसे वेतन या मजदूरी के बीस प्रतिशत से अधिक नहीं होगी  

(2) इस धारा के अधीन आबंटनीय अधिशेष की संगणना करने में, धारा 15 के उपबंधों के अधीन आगे के लिए रखी गई रकम या मुजरा की गई रकम, उस धारा के उपबन्धों के अनुसार, लेखा में ली जाएगी ]

 [12. कतिपय कर्मचारियों की बाबत बोनस का परिकलन-जहां किसी कर्मचारी का वेतन या मजदूरी  [सात हजार रुपए या समुचित सरकार द्वारा, अनुसूचित नियोजन के लिए यथा नियत न्यूनतम मजदूरी, इनमें से जो भी उच्चतर हो] प्रति मास से अधिक हो जाती है, वहां ऐसे कर्मचारी को, यथास्थिति, धारा 10 या धारा 11 के अधीन संदेय बोनस का परिकलन इस प्रकार किया जाएगा मानो उसका वेतन या मजदूरी 3[सात हजार रुपए या समुचित सरकार द्वारा, अनुसूचित नियोजन के लिए यथा नियत न्यूनतम मजदूरी, इनमें से जो भी उच्चतर हो] प्रति मास हो ]

 [स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए अनुसूचित नियोजन" शब्द का वही अर्थ होगा जो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (1948 का 11) की धारा 2 के खंड () में है ]

 [13. कतिपय दशाओं में बोनस का अनुपाततः कम किया जाना-जहां किसी कर्मचारी ने किसी लेखा वर्ष में सभी काम के दिनों में काम नहीं किया है वहां, यथास्थिति, एक सौ रुपए अथवा साठ रुपए का न्यूनतम बोनस बोनस, यदि ऐसा बोनस उतने दिन के, जितने दिन उसने उस लेखा वर्ष में काम किया है, उसके वेतन या मजदूरी के 8.33 प्रतिशत से अधिक हो, अनुपाततः कम कर दिया जाएगा ]

14. काम के दिनों की संख्या की संगणना-कर्मचारी की बाबत यह बात धारा 13 प्रयोजनों के लिए समझी जाएगी कि उसने किसी लेखा वर्ष में स्थापन में उन दिनों में भी काम किया है जिन दिनों

() वह किसी करार के अधीन, या औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (1946 का 20) के अधीन स्थायी आदेश द्वारा यथा अनुज्ञात रूप में, या औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन या स्थापन को लागू किसी अन्य विधि के अधीन कामबंदी में रखा गया है

() वह वेतन या मजदूरी के सहित छुट्टी पर रहा है;

() वह अपने नियोजन से उद्भूत और उसके अनुक्रम में दुर्घटना द्वारा कारित अस्थायी निःशक्तता के कारण अनुपस्थित रहा है; तथा 

() वह कर्मचारी वेतन या मजदूरी के सहित प्रसूति छुट्टी पर रहा है  

 [15. आबंटनीय अधिशेष का आगे के लिए रखा जाना और मुजरा किया जाना-(1) जहां किसी लेखा वर्ष के लिए आबंटनीय अधिशेष, धारा 11 के अधीन उस स्थापन में सब कर्मचारियों को संदेय अधिकतम बोनस की रकम से अधिक है वहां वह आधिक्य, उस लेखा वर्ष में उस स्थापन में नियोजित कर्मचारियों के कुल वेतन या मजदूरी के बीस प्रतिशत की परिसीमा के अधीन रहते हुए, उत्तरवर्ती लेखा वर्ष के लिए और उसी प्रकार चौथे लेखा वर्ष तक, जिसमें वह चौथा लेखा वर्ष भी सम्मिलित है, उस रीति से, जो चतुर्थ अनुसूची में दर्शित की गई है, बोनस के संदाय के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए जाने के लिए, आगे के लिए रखे जाने के लिए अग्रनीत किया जाएगा

(2) जहां किसी लेखा वर्ष के लिए कोई उपलभ्य अधिशेष नहीं है या उस वर्ष की बाबत आबंटनीय अधिशेष उस स्थापन के कर्मचारियों को धारा 10 के अधीन संदेय न्यूनतम बोनस की रकम से कम पड़ता है, और उपधारा (1) के अधीन अग्रनीत और आगे के लिए रखी गई कोई भी ऐसी रकम या पर्याप्त रकम नहीं है जो न्यूनतम बोनस के संदाय के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाई जा सके, वहां, यथास्थिति, ऐसी न्यूनतम रकम या कमी को उत्तरवर्ती लेखा वर्ष में और चौथे लेखा वर्ष तक जिसमें वह चौथा लेखा वर्ष भी सम्मिलित है उस रीति से, जो चतुर्थ अनुसूची में दर्शित की गई है, मुजरा किए जाने के लिए अग्रनीत किया जाएगा

(3) चतुर्थ अनुसूची में यथादर्शित आगे के लिए रखे जाने या मुजरा किए जाने का सिद्धांत, इस अधिनियम के अधीन बोनस के संदाय के प्रयोजन के लिए उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन आने वाले सभी अन्य मामलों को लागू होगा

(4) जहां किसी लेखा वर्ष में अग्रनीत कोई रकम इस धारा के अधीन आगे के लिए रखी गई या मुजरा की गई है, वहां उत्तरवर्ती लेखा वर्ष के लिए बोनस की संगणना करने में, पूर्वतन लेखा वर्ष की आगे के लिए रखी गई या मुजरा की गई अग्रनीत रकम, प्रथमतः लेखा में ली जाएगी ]

16. कतिपय स्थापनों की बाबत विशेष उपबंध- [(1) जहां इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् कोई स्थापन नए सिरे से स्थापित किया जाता है वहां ऐसे स्थापन के कर्मचारी उपधारा (1), (1) और (1) के उपबंधों के अनुसार इस अधिनियम के अधीन बोनस पाने के हकदार होंगे  

(1) उस लेखा वर्ष के अगले प्रथम पांच लेखा वर्षों में, जिसमें नियोजक अपने द्वारा उत्पादित या विनिर्मित माल का विक्रय करता है या, यथास्थिति, ऐसे स्थापन में सेवा करता है, बोनस केवल उस लेखा वर्ष की बाबत संदेय होगा जिसमें नियोजक को ऐसे स्थापन से लाभ व्युत्पन्न होता है और ऐसे बोनस का परिकलन उस वर्ष के संबंध में इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किंतु धारा 15 के उपबंधों को लागू किए बिना किया जाएगा  

(1) उस लेखा वर्ष के अगले छठे और सातवें लेखा वर्षों के लिए, जिसमें नियोजक अपने द्वारा उत्पादित या विनिर्मित माल का विक्रय करता है या, यथास्थिति, ऐसे स्थापन से सेवा करता है, धारा 15 के उपबंध निम्नलिखित उपांतरों के अध्यधीन रहते हुए लागू होंगे, अर्थात्: -

(i) छठे लेखा वर्ष के लिए-

पांचवें और छठे लेखा वर्षों की बाबत आगे के लिए रखे गए या मुजरा किए गए आबंटनीय अधिशेष के, यथास्थिति, आधिक्य या कमी को, यदि कोई हो, हिसाब में लेते हुए, उस रीति से, जो [चतुर्थ अनुसूची] में दर्शित है, यथास्थिति, आगे के लिए रखा जाएगा या मुजरा किया जाएगा;

(ii) सातवें लेखा वर्ष के लिए-

पांचवें, छठे और सातवें लेखा वर्षों की बाबत आगे के लिए रखे गए या मुजरा किए गए आबंटनीय अधिशेष के, यथास्थिति, अधिक्य या कमी को, यदि कोई हो हिसाब में लेते हुए, उस रीति से जो 2[चतुर्थ अनुसूची] में दर्शित है, यथास्थिति, आगे के लिए रखा जाएगा या मुजरा किया जाएगा  

(1) उस लेखा वर्ष के अगले आठवें लेखा वर्ष से, जिसमें नियोजक अपने द्वारा उत्पादित या विनिर्मित माल का विक्रय करता है या, यथास्थिति, ऐसे स्थापन में सेवा करता है, धारा 15 के उपबंध ऐसे स्थापन के संबंध में ऐसे लागू होंगे जैसे वे किसी अन्य स्थापन के संबंध में लागू होते हैं  

स्पष्टीकरण 1-उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए किसी स्थापन को उसके अवस्थान, प्रबंध, नाम या स्वामित्व में तब्दीली होने के कारण ही नए सिरे से स्थापित किया गया नहीं समझा जाएगा  

स्पष्टीकरण 2-उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए किसी नियोजक के बारे में यह बात कि उसको किसी लेखा वर्ष में लाभ व्युत्पन्न हुआ है तब तक नहीं समझी जाएगी जब तक कि

() उसने उस वर्ष के अवक्षयण के लिए व्यवस्था कर ली हो जिसके लिए वह, यथास्थिति, आय-कर अधिनियम के अधीन या कृषि आय-कर विधि के अधीन हकदार है; और 

() ऐसे अवक्षयण मद्धे बकाया तथा उसके द्वारा उपगत हानियां, जो उस स्थापन के संबंध में पूर्ववर्ती लेखा वर्ष के मद्धे हों, उसके लाभों में से पूर्णतया मुजरा कर ली गई हों  

स्पष्टीकरण 3-किसी कारखाने के परीक्षणार्थ चलाने के दौरान अथवा किसी खान या तेल-क्षेत्र के पूर्वेक्षण प्रक्रम के दौरान उत्पादित या विनिर्मित माल का विक्रय उपधारा (1), (1) और (1) के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं जाएगा और जहां ऐसे उत्पादन या विनिर्माण के संबंध में कोई प्रश्न उठता है वहां पक्षकारों को अपने मामले का अभ्यावेदन करने के लिए युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् समुचित सरकार द्वारा किया गया विनिश्चय अंतिम होगा और किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ]  

(2) [उपधारा (1), (1), (1) और (1)] के उपबंध विद्यमान स्थापनों द्वारा स्थापित नए विभागों या उपक्रमों या शाखाओं को यावत्शक्य लागू होंगे:

परन्तु यदि कोई नियोजक, किसी विद्यमान स्थापन के संबंध में, जो भिन्न-भिन्न कालावधियों में स्थापित विभिन्न विभागों या उपक्रमों या शाखाओं से (चाहे वे एक ही उद्योग में हों या होंमिल कर बना हो, सभी ऐसे विभागों या उपक्रमों या शाखाओं के कर्मचारियों को उन संचित लाभों के आधार पर, जो इस बात को विचार में लिए बिना कि ऐसे विभागों या उपक्रमों या शाखाओं की स्थापना किस तारीख को हुई थी सभी ऐसे विभागों या उपक्रमों या शाखाओं की बाबत संगणित किए गए हैं, बोनस 29 मई, 1965 के पूर्व संदत्त करता रहा है, तो ऐसा नियोजक सभी ऐसी विभागों या उपक्रमों या शाखाओं के (भले ही उनकी स्थापना उस तारीख से पूर्व या पश्चात् हुई हो) कर्मचारियों को यथापूर्वोक्त संगणित संचित लाभों के आधार पर बोनस का संदाय इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार करने के दायित्व के अधीन होगा  

17. अधिनियम के अधीन संदेय बोनस के विरुद्ध रुढ़िगत या अंतरिम बोनस का समायोजन-जहां किसी लेखा वर्ष में-

() नियोजक के कर्मचारी को कोई पूजा बोनस या अन्य रुढ़िगत बोनस दे दिया है; अथवा 

() नियोजक ने इस अधिनियम के अधीन संदेय बोनस का कोई भाग, ऐसे बोनस के संदेय हो जाने की तारीख से पूर्व कर्मचारी को दे दिया है,

वहां नियोजक हकदार होगा कि वह उस लेखा वर्ष की बाबत इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा उस कर्मचारी को संदेय बोनस की रकम में से उस प्रकार संदत्त बोनस की रकम की कटौती कर ले तथा वह कर्मचारी केवल बाकी को प्राप्त करने का हकदार होगा  

18. अधिनियम के अधीन संदेय बोनस में से कतिपय रकमों की कटौती-जहां कोई कर्मचारी ऐसे अवचार का दोषी किसी लेखा वर्ष में पाया जाता है जिससे नियोजक को वित्तीय हानि कारित होती है वहां नियोजक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह बोनस की उस रकम में से, जो केवल उस लेखा वर्ष की बाबत इस अधिनियम के अधीन उस द्वारा कर्मचारी को संदेय हो हानि की उस रकम की कटौती कर ले तथा वह कर्मचारी बाकी को, यदि कोई हो, प्राप्त करने का हकदार होगा

19. बोनस के संदाय के लिए समय परिसीमा- [वे सब रकमें] जो कर्मचारी को इस अधिनियम के अधीन बोनस के रूप में संदेय हों, नकदी में उसके नियोजक द्वारा

() वहां, जहां कि बोनस के संदाय के संबंध में विवाद धारा 22 के अधीन किसी प्राधिकारी के समक्ष लंबित हो, ऐसे विवाद की बाबत अधिनिर्णय के प्रवर्तनशील हो जाने की या समझौते के प्रवर्तन में आने की तारीख के एक मास के भीतर संदत्त की जाएंगी;  

() किसी अन्य दशा में, लेखा-वर्ष की समाप्ति से आठ मास की कालावधि के भीतर संदत्त की जाएंगी:

                परंतु समुचित सरकार या ऐसा प्राधिकारी, जिसे समुचित सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, नियोजक द्वारा उससे आवेदन किए जाने पर और पर्याप्त कारणों के लिए, आदेश द्वारा, उक्त आठ मास की कालावधि को इतनी अतिरिक्त कालावधि या कालावधियों से बढ़ा सकेगा जितनी वह ठीक समझे, किंतु इस प्रकार की बढ़ाई गई कुल कालावधि किसी भी दशा में दो वर्ष से अधिक की नहीं होगी  

                                                                                                                                                                                   

                                                                                                                                                                                   

 

20. कतिपय दशाओं में पब्लिक-सेक्टर-स्थापनों को अधिनियम का लागू होना- [(1)] यदि कोई पब्लिक-सेक्टर-स्थापन किसी लेखा वर्ष में किसी प्राइवेट-सेक्टर-स्थापन की, प्रतियोगिता में कोई माल, जो उस द्वारा उत्पादित या विनिर्मित किया गया है, बेचता है या कोई सेवा करता है ओर ऐसे विक्रय या सेवाओं या दोनों से प्राप्त आय उस वर्ष में उसकी सकल आय के बीस प्रतिशत से कम है तो इस अधिनियम के उपबंध ऐसे पब्लिक-सेक्टर-स्थापन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे तद्रूप प्राइवेट-सेक्टर-स्थापन के संबंध में लागू होते हैं    

 [(2) उपधारा (1) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, इस अधिनियम की कोई बात ऐसे कर्मचारियों को लागू नहीं होंगी जो पब्लिक-सेक्टर के किसी स्थान में नियोजित हैं ]

21. नियोजक द्वारा देय बोनस की वसूली-जहां किसी समझौता या अधिनिर्णय या करार के अधीन कोई धन कर्मचारी को अपने नियोजक द्वारा बोनस के रूप में देय है, वहां स्वयं कर्मचारी या इस निमित्त लिखित रूप में उस द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति अथवा कर्मचारी की मृत्यु हो जाने की दशा में, उसका समनुदेशिती या वारिस, उस धन की, जो उसे देय है, वसूली के लिए आवेदन, वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, समुचित सरकार से कर सकेगा और यदि समुचित सरकार का या ऐसे प्राधिकारी का जिसे समुचित सरकार इस निमित विनिर्दिष्ट करे, समाधान हो जाता है कि ऐसा कोई धन देय है, तो वह उस रकम के लिए एक प्रमाणपत्र कलक्टर को जारी करेगा जो उसे वसूल करने के लिए, उसी रीति से अग्रसर होगा जिससे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है :

परन्तु ऐसा हर आवेदन नियोजक से कर्मचारी को धन के देय हो जाने की तारीख के एक वर्ष के भीतर करना होगा:

परन्तु यह और कि ऐसा कोई आवेदन उक्त एक वर्ष की कालावधि के अवसान के पश्चात् भी ग्रहण किया जा सकेगा यदि समुचित सरकार का समाधान हो जाता है कि आवेदक के पास उक्त कालावधि के भीतर आवेदन किए जाने के लिए पर्याप्त हेतुक था

 स्पष्टीकरण-इस धारा में और [धारा 22, 23, 24 और 25] में कर्मचारी" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो इस अधिनियम के अधीन बोनस के संदाय के लिए हकदार है किन्तु जो उस समय नियोजन में नहीं है  

22. इस अधिनियम के अधीन विवादों का निर्देशन-जहां इस अधिनियम के अधीन संदेय बोनस की बाबत या पब्लिक-सेक्टर-स्थापन को इस अधिनियम के लागू होने की बाबत कोई विवाद नियोजक और उसके कर्मचारियों के बीच उत्पन्न हो, वहां ऐसे विवाद को, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या उस राज्य में प्रवृत्त औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और समझौते से संबंधित किसी तत्समान विधि के अर्थ में औद्योगिक विवाद समझा जाएगा तथा तदनुसार, यथास्थिति, उस अधिनियम के या ऐसी विधि के उपबंध, अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, लागू होंगे  

23. निगमों और कम्पनियों के तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि के लेखाओं की विशुद्धता के बारे में उपधारणा-(1) जहां ऐसे नियोजक के, जो निगम है या बैंककारी कम्पनी से भिन्न कम्पनी है, तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि लेखा, जो भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 की उपधारा (1) के अधीन कंपनियों के संपरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से अर्हित संपरीक्षकों द्वारा सम्यक् रूप से संपरीक्षित है (इसमें इसके पश्चात् इस धारा में,[और  [धारा 24 और 25] में,] उक्त प्राधिकारी" के रूप में निर्दिष्ट), किसी मध्यस्थ या अधिकरण के समक्ष की जिसे धारा 22 में विनिर्दिष्ट प्रकृति का कोई विवाद निर्देशित किया गया है, ऐसी कार्यवाही के दौरान, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन या किसी राज्य में प्रवृत्त औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और समझौते से सम्बन्धित किसी तत्समान विधि के अधीन है, उनके समक्ष पेश किए जाते हैं, वहां उक्त प्राधिकारी ऐसे तुलन-पत्र में तथा लाभ और हानि लेखा में के कथनों और विशिष्टियों के विशुद्ध होने की उपधारणा कर सकेगा, और निगम या कम्पनी के लिए यह आवश्यक होगा कि वह ऐसे कथनों और विशिष्टियों की विशुद्धता के बारे में शपथ-पत्र फाइल करके या किसी अन्य ढंग से साबित करे :

परन्तु जहां ऐसे प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि निगम या कम्पनी के तुलन-पत्र अथवा लाभ और हानि लेखा में के कथन और विशिष्टियां विशुद्ध नहीं हैं, वहां ऐसे कथनों और विशिष्टियों की विशुद्धता का पता चलाने के लिए ऐसी कार्यवाही कर सकेगा, जैसी वह आवश्यक समझे   

(2) जब तुलन-पत्र की अथवा लाभ और हानि लेखा की किसी मद के सम्बन्ध में किसी सफाई की अपेक्षा करने वाला आवेदन किसी ट्रेड यूनियन द्वारा, जो विवाद का पक्षकार है, या जहां कोई ट्रेड यूनियन नहीं है वहां उन कर्मचारियों द्वारा, जो विवाद के पक्षकार हैं, उक्त प्राधिकारी से किया जाता है तब वह इस बारे में अपना समाधान करने के पश्चात् कि ऐसी सफाई आवश्यक है, यथास्थिति, निगम को या कम्पनी को आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगा कि वह ट्रेड यूनियन या कर्मचारियों को ऐसी सफाई ऐसे समय के भीतर दे, जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए और, यथास्थिति, निगम या कम्पनी ऐसे निदेश का अनुपालन करेगी

 [24. बैंककारी कम्पनियों के संपरीक्षित लेखाओं का प्रश्नगत किया जाना-(1) जहां नियोजक, जो बैंककारी कम्पनी है, और उसके कर्मचारियों के बीच का कोई विवाद, जो धारा 22 में विनिर्दिष्ट प्रकृति का है, उक्त प्राधिकारी को उस धारा के अधीन निर्देशित किया जा चुका है, और उस बैंककारी कम्पनी के सम्यक् रूप से संपरीक्षित लेखाओं को कार्यवाहियों के अनुक्रम के दौरान उसके समक्ष पेश कर दिया जाता है, वहां उक्त प्राधिकारी किसी व्यवसाय-संघ या कर्मचारियों को ऐसे लेखाओं की शुद्धता को प्रश्नगत करने की अनुज्ञा नहीं देगा, किन्तु व्यवसाय संघ या कर्मचारी को उस बैंककारी कम्पनी से ऐसी जानकारी अभिप्राप्त करने की अनुज्ञा दी जा सकेगी जैसी इस अधिनियम के अधीन देय बोनस की रकम को सत्यापित करने के लिए आवश्यक है

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट कोई बात व्यवसाय-संघ या कर्मचारी को ऐसी कोई जानकारी अभिप्राप्त करने के लिए समर्थ नहीं बनाती है, जिसे देने के लिए वह बैंककारी कम्पनी, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 34 के उपबन्धों के अधीन विवश नहीं है

25. जो नियोजक निगम या कम्पनी नहीं है उसके लेखाओं का संपरीक्षण-(1) जहां नियोजक, जो निगम या कम्पनी नहीं है, और उसके कर्मचारियों के बीच का ऐसा कोई विवाद, जो धारा 22 में विनिर्दिष्ट प्रकृति का है उक्त प्राधिकारी को उस धारा के अधीन निर्दिष्ट किया जा चुका है तथा ऐसे नियोजक के लेखा जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 की उपधारा (1) के अधीन कम्पनियों के संपरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से अर्हित किसी संपरीक्षक द्वारा संपरीक्षित है उक्त प्राधिकारी के समक्ष पेश किए जाते हैं, वहा धारा 23 के उपबन्ध इस प्रकार से संपरीक्षित लेखाओं को यावत्शक्य लागू होंगे  

(2) जब कि उक्त प्राधिकारी का यह निष्कर्ष है कि ऐसे नियोजक के लेखा किसी संपरीक्षक द्वारा संपरीक्षित नहीं किए गए हैं और उसकी यह राय है कि ऐसे नियोजक के लेखाओं की संपरीक्षा उसे निर्देशित प्रश्न के विनिश्चय के लिए आवश्यक है, तब वह नियोजक को आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगा कि वह अपने लेखाओं की संपरीक्षा ऐसे संपरीक्षक या संपरीक्षकों द्वारा, जिसे या जिन्हें वह ठीक समझे, इतने समय के भीतर जितना निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए अथवा इतने अतिरिक्त समय के भीतर जितने की वह अनुज्ञा दे, करा ले और तदुपरि नियोजक ऐसे निदेश का अनुपालन करेगा

(3) जहां कोई नियोजक उपधारा (2) के अधीन संपरीक्षा करने में असफल रहता है वहां धारा 28 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसा प्राधिकारी लेखाओं की संपरीक्षा ऐसे संपरीक्षक या ऐसे संपरीक्षकों द्वारा, जिसे या जिन्हें वह ठीक समझे, करवा सकेगा  

(4) जब लेखा उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन संपरीक्षित किए जाते हैं तब धारा 23 के उपबन्ध इस प्रकार संपरीक्षित लेखा को यावत्शक्य लागू होंगे  

(5) उपधारा (3) के अधीन की गई किसी संपरीक्षा के तथा उससे आनुषंगिक व्यय (जिसके अन्तर्गत संपरीक्षक या संपरीक्षकों का पारिश्रमिक भी है) उक्त प्राधिकारी द्वारा अवधारित किए जाएंगे (जो अवधारण अंतिम होगा) तथा नियोजक द्वारा संदत्त किए जाएंगे और ऐसे संदाय के व्यतिक्रम पर नियोजक से उस रीति से वसूलीय होंगे जो धारा 21 में उपबन्धित है

26. रजिस्टरों, अभिलेखों, आदि का बनाए रखा जाना-हर नियोजक ऐसे रजिस्टरों, अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से तैयार करेगा और बनाए रखेगा जैसे या जैसी विहित की जाए

27. निरीक्षक-(1) समुचित सरकार ऐसे व्यक्तियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी तथा उन सीमाओं को परिनिश्चित कर सकेगी जिनमें वे अधिकारिता का प्रयोग करेंगे

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त कोई निरीक्षक यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी का अनुपालन किया गया है या नहीं

() किसी नियोजक से ऐसी जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेगा जिसे वह आवश्यक समझे

() किसी युक्तियुक्त समय पर और ऐसी सहायता के साथ, यदि कोई हो, जैसी वह ठीक समझे, किसी स्थापन या उससे सम्बन्धित किसी परिसर में प्रवेश कर सकेगा, तथा ऐसे किसी व्यक्ति से, जो उसका भारसाधक पाया जाए, यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह व्यक्ति स्थापन में व्यक्तियों के नियोजन सम्बन्धी अथवा वेतन या मजदूरी या बोनस के संदाय सम्बन्धी किन्हीं लेखाबहियों, रजिस्टरों तथा अन्य दस्तावेजों को परीक्षा के लिए उसके समक्ष पेश करे;

() नियोजक की, उसके अभिकर्ता या सेवक की अथवा किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की, जो स्थापन या उससे सम्बन्धित किसी परिसर का भारसाधक पाया जाए अथवा किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसके बारे में यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त हेतुक निरीक्षक के पास है कि वह उस स्थापन का कर्मचारी है अथवा रहा है परीक्षा ऐसी किसी भी बात के बारे में कर सकेगा जो पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी से सुसंगत है

() उस स्थापन के सम्बन्ध में रखी गई किसी बही, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज की प्रतियां बना सकेगा या उससे उद्धरण ले सकेगा

() ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जैसी विहित की जाएं  

(3) हर निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा  

(4) कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिससे निरीक्षक द्वारा उपधारा (1) के अधीन यह अपेक्षा की गई है कि वह व्यक्ति किसी लेखा-बही, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज को उसके समक्ष पेश करे अथवा उसे कोई जानकारी दे, ऐसा करने के लिए वैध रूप से आबद्ध होगा

 [(5) इस धारा में अन्तर्विष्ट कोई बात किसी निरीक्षक को, किसी बैंककारी कम्पनी से यह अपेक्षा करने के लिए समर्थ नहीं बनाएगी कि वह ऐसा कोई कथन या जानकारी दे या प्रकट करे अथवा अपनी ऐसी किन्हीं लेखा-बहियों या अन्य दस्तावेजों को पेश करे या उनका निरीक्षण करने दे जिन्हें देने, प्रकट करने, पेश करने या जिनका निरीक्षण करने देने के लिए वह बैंककारी कम्पनी, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 34 के उपबन्धों के अधीन विवश नहीं की जा सकती है

28. शास्ति-यदि कोई व्यक्ति-

() इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्धों में से किसी का उल्लंघन करेगा; अथवा 

() जिसे इस अधिनियम के अधीन कोई निदेश दिया गया है या जिससे कोई अपेक्षा की गई है, ऐसे निदेश या अपेक्षा का अनुपालन नहीं करेगा,

तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा  

29. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध को करने वाला व्यक्ति कम्पनी है तो हर व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक था या उसके प्रति उत्तरदायी था, और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराधों की दोषी समझी जाएगी तथा वे अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और तद्नुसार दण्डित किए जाने के भागी होंगे:

परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात, ऐसे किसी व्यक्ति को दण्ड के दायित्व के अधीन नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसके ज्ञान के बिना किया गया था, या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता का प्रयोग किया था  

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित किया जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकरी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है, या उसकी ओर से की गई किसी उपेक्षा के परिणामस्वरूप हुआ है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा, तथा वह अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और तद्नुसार दण्डित किए जाने का भागी होगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए

() कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा 

() निदेशक" से किसी फर्म के सम्बन्ध में उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है

30. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान समुचित सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन [या उस सरकार के किसी ऐसे अधिकारी द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन (जो केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी के मामले में प्रादेशिक श्रम आयुक्त की पंक्ति से और राज्य सरकार के किसी अधिकारी के मामले में श्रम आयुक्त की पंक्ति से, नीचे का नहीं होगा) जिसे वह सरकार इस निमित्त विशिष्ट रूप में प्राधिकृत करेट किए गए परिवाद पर के सिवाय नहीं करेगा

(2) प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से अवर और कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा  

31. अधिनियम के अधीन की गई कार्यवाही के लिए परित्राण-सरकार या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही ऐसी किसी बात के लिए, जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई की जाने के लिए आशयित है, नहीं होगी  

 [31. उत्पादन या उत्पादकता से सम्बद्ध बोनस के संदाय की बाबत विशेष उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, -

(i) जहां बोनस संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारम्भ के पूर्व कर्मचारियों ने अपने नियोजक के साथ कोई ऐसा करार या समझौता कर लिया है, अथवा 

(ii) जहां ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् कर्मचारी अपने नियोजक के साथ कोई ऐसा करार या समझौता करते हैं,

जो इस अधिनियम के अधीन संदेय लाभों पर आधारित बोनस के बदले में उत्पादन या उत्पादकता से सम्बद्ध किसी वार्षिक बोनस के संदाय के लिए है, वहां ऐसे कर्मचारी उस बोनस को पाने के हकदार होंगे जो उन्हें, यथास्थिति, ऐसे करार या समझौते के अधीन देय है

 [परन्तु ऐसा कोई करार या समझौता, जिसके द्वारा कर्मचारी धारा 10 के अधीन न्यूनतम बोनस प्राप्त करने के अपने अधिकार को त्याग देते हैं, वहां तक अकृत और शून्य होगा जहां तक कि वह उन्हें उनके ऐसे अधिकार से वंचित करने के लिए तात्पर्यित है:]

 [परन्तु यह और कि] ऐसे कर्मचारी सुसंगत लेखा वर्ष के दौरान अपने द्वारा उपार्जित वेतन या मजदूरी के बीस प्रतिशत से अधिक ऐसे बोनस का संदाय पाने के हकदार नहीं होंगे ]

32. कतिपय वर्गों के कर्मचारियों को अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम की कोई भी बात निम्नलिखित में से किसी को भी लागू नहीं होगी

(i) [साधारण बीमा कारबार चलाने वाले किसी बीमाकर्ता द्वारा नियोजित कर्मचारी तथा भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा नियोजित कर्मचारी

(ii) वाणिज्यिक पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) की धारा 3 के खण्ड (42) में यथापरिभाषित नाविक

(iii) वे कर्मचारी जो डाक कर्मकार (नियोजन का विनियमन) अधिनियम, 1948 (1948 का 9) के अधीन बनाई गई किसी स्कीम के अधीन रजिस्ट्रीकृत या सूचीबद्ध हों तथा रजिस्ट्रीकृत या सूचीबद्ध नियोजकों द्वारा नियोजित हों

(iv) ऐसे किसी उद्योग में लगे किसी स्थापन द्वारा नियोजित कर्मचारी, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी के किसी विभाग द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन चलाया जाता है

(v) निम्नलिखित द्वारा नियोजित कर्मचारी-

() इण्डियन रेड क्रास सोसाइटी या वैसे ही प्रकार की कोई अन्य संस्था (जिसके अन्तर्गत उसकी शाखाएं भी हैं), तथा

() विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षा संस्थाएं,

() ऐसी संस्थाएं (जिनके अंतर्गत अस्पताल, वाणिज्य मण्डल और समाज कल्याण संस्थाएं भी हैं), जो लाभ के प्रयोजन से स्थापित नहीं है

                                                                                                                                                     

                                                                                                                                                     

(viii) भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नियोजित कर्मचारी

(ix) निम्नलिखित द्वारा नियोजित कर्मचारी

() भारतीय औद्योगिक वित्त निगम

() धारा 3 के अधीन स्थापित कोई भी वित्तीय निगम अथवा राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) की धारा 3 के अधीन स्थापित कोई भी संयुक्त वित्तीय निगम

() निक्षेप बीमा निगम

 

 [() राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक;]

() यूनिट ट्रस्ट आफ इण्डिया

() भारतीय औद्योगिक विकास बैंक;

 [(चक) भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक;] 

 [(चच) राष्ट्रीय आवास बैंक;]

() [(बैंककारी कम्पनी से भिन्न)] जो कोई अन्य वित्तीय संस्था पब्लिक-सेक्टर स्थापन है वैसी कोई वित्तीय संस्था जिसे

(i) उसकी पूंजी संरचना को

(ii) उसके उद्देश्यों और क्रियाकलाप की प्रकृति को

(iii) उस वित्तीय सहायता या ऐसी किसी भी रियायत की, जो सरकार द्वारा उसे दी जाती है, प्रकृति और परिमाण को, तथा 

(iv) किसी अन्य सुसंगत तथ्य को

                                ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार ने शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया हो

                                                                                                                                                     

(ix) वे कर्मचारी, जो किसी अन्य देश से होकर जाने वाले मार्गों पर क्रियाशील जल परिवहन-स्थानों द्वारा नियोजित हैं  

33. [अधिनियम का बोनस संदाय के बारे में कतिपय लम्बित विवादों को लागू होना ]-बोनस संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 23) की धारा 21 द्वारा (25-9-1975 से) निरसित   

 [34. अधिनियम से असंगत विधियों और करारों का प्रभाव-धारा 31 के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी अधिनिर्णय, करार, समझौते या सेवा की संविदा के निबंधनों में उनसे असंगत ऐसी किसी बात के होते हुए भी प्रभावशील होंगे ]

35. व्यावृत्ति-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात, कोयला खान भविष्य-निधि, कुटुम्ब पेंशन और बोनस स्कीम अधिनियम, 1948 (1948 का 46) या तद्धीन बनाई गई किसी स्कीम के उपबन्धों पर प्रभाव डालने वाली समझी जाएगी

36. छूट देने की शक्ति-यदि किसी स्थापन को या स्थापनों के वर्ग की वित्तीय स्थिति तथा अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समुचित सरकार की यह राय है कि इस अधिनियम के सब उपबन्धों या किसी उपबन्ध का उसको लागू किया जाना लोक हित में होगा तो वह, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी कालावधि के लिए जैसी उसमें विनिर्दिष्ट की जाए तथा ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे उस अधिनियम के सब उपबन्धों या किसी उपबन्ध से छूट किसी ऐसे स्थापन को या स्थापनों के वर्ग को दे सकेगी  

37. [कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति ]-बोनस संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 23) की धारा 23 द्वारा (25-9-1975) से निरसित

38. नियम बनाने की शक्ति- [(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन, नियम बना सकेगी

 (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-

() धारा 2 के खण्ड (1) के उपखण्ड (iii) के परन्तुक के अधीन अनुज्ञा अनुदत्त करने वाले प्राधिकारी

() रजिस्टरों, अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों का तैयार किया जाना तथा वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 26 के अधीन ऐसे रजिस्टरों, अभिलेखों और दस्तावेजों को बनाए रखा जा सकेगा,

() वे शक्तियां जो निरीक्षक द्वारा धारा 27 की उपधारा (2) के खण्ड () के अधीन प्रयोग की जा सकेंगी;

() कोई अन्य बात जो विहित की जानी है या की जाए  

 [(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

39. कतिपय विधियों का लागू होना वर्जित होगा-अभिव्यक्त रूप से यथा उपबन्धित के सिवाय इस अधिनियम के उपबन्ध औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 12) या किसी राज्य में प्रवृत्त औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और समझौते से सम्बन्धित तत्समान किसी विधि के अतिरिक्त होंगे कि उसके अल्पीकरण में  

40. निरसन और व्यावृत्ति-(1) बोनस संदाय अध्यादेश, 1965 (1965 का 3) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है  

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या लाई गई कोई कार्यवाही इस अधिनियम के अधीन ऐसे की गई या ऐसे लाई गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम 29 मई, 1965 को प्रारम्भ हो गया था  

 

 

[प्रथम अनुसूची

[धारा 4() देखिए]

सकल लाभों की संगणना

.......... को समाप्त होने वाला लेखा वर्ष

मद संख्यांक

विशिष्टियां

उपमद की रकम

मुख्य मदों की रकम

टिप्पणियां

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

1.

प्रायिक और आवश्यक उपबन्ध करने के पश्चात् लाभ-हानि लेखा में यथादर्शित शुद्ध लाभ

रु०

रु०

 

2.

निम्नलिखित के लिए उपबंधित रकम पीछे जोड़ दें: -          

 

 

 

 

() कर्मचारियों को बोनस . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

() अवक्षयण . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

() विकास रिबेट/आरक्षिति . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

() कोई अन्य आरक्षिति . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. .

 

 

 

पाद-टिप्पण (1) देखिए

पाद-टिप्पण (1) देखिए

 

मद संख्यांक 2 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

रु०

 

 

3.

निम्नलिखित को भी पीछे जोड़ दें:

 

 

 

 

() कर्मचारियों को पूर्व लेखा-वर्षों की बाबत संदत्त बोनस...

 

 

पाद-टिप्पण (1) देखिए

 

() कर्मचारियों को निम्नलिखित के योग के आधिक्य में संदत्त या संदेय उपदान की बाबत विकलित रकम, अर्थात्: -

 

 

 

 

(i) किसी अनुमोदित उपदान निधि के लिए संदत्त किए जाने के लिए उपबंधित रकम, यदि कोई है; और. . . . . . . . . . . .

 

 

 

 

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

 

(ii) कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति पर या किसी कारणवश उनका नियोजन समाप्त कर दिए जाने पर उन्हें संदत्त वास्तविक रकम... . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

रु०

रु०

 

 

() आय-कर के लिए अनुज्ञेय रकम के आधिक्य में संदाय . . ..

 

 

 

 

() (वैज्ञानिक गवेषणा पर उस पूंजीगत व्यय से भिन्न जिसकी कटौती प्रत्यक्ष करों से संबंधित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन अनुज्ञात है) पूंजीगत व्यय तथा पूंजीगत हानियां (जो पूंजीगत आस्तियों के विक्रय पर हुई उन हानियों से भिन्न हैं जिन पर आय-कर के लिए अवक्षयण अनुज्ञात किया गया है) . . . . . . . . .

 

 

पाद-टिप्पण (1) देखिए

 

() बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 34 की उपधारा (2) के निबन्धनों के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रमाणित कोई रकम . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

 

 

 

 

() भारत के बाहर स्थित किसी कारबार की हानियां या तत्संबंधी व्यय . . . . . . . . . . . . . . ..  . . . . . . . . . . . . . . . . .  

 

 

 

 

मद संख्यांक 3 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

 

 

4.

निम्नलिखित से भिन्न वह आय, वे लाभ या अभिलाभ (यदि कोई हों) भी जोड़ दें जो प्रकाशित या प्रकटित आरक्षिति खाते में सीधे जमा किए गए हैं: -

 

 

 

 

(i) पूंजीगत प्राप्तियां तथा पूंजीगत लाभ (जिनमें उन पूंजीगत आस्तियों के विक्रय पर हुए लाभ भी सम्मिलित हैं जिन पर आय-कर के लिए अवक्षयण अनुज्ञात नहीं किया गया है) . . . . . . . . . . . ..

 

 

 

 

(ii) भारत के बाहर स्थित किसी कारबार के लाभ और तत्संबंधी प्राप्तियां . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

 

 

 

 

(iii) भारत के बाहर विनिधानों से विदेशी बैंककारी कम्पनियों की आय

 

 

 

 

मद संख्यांक 4 का शुद्ध जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

रु०

 

 

5.

मद संख्यांक 1, 2, 3, और 4 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 

रु०

 

 

6.

निम्नलिखित की कटौती करें: -

 

 

 

 

() पूंजीगत प्राप्तियों और पूंजीगत लाभ (जो उन आस्तियों के विक्रय पर लाभों से भिन्न हैं, जिन पर अवक्षयण, आय-कर के लिए अनुज्ञात किया गया है) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..  

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

() भारत से बाहर स्थित किसी कारबार के लाभ तथा तत्संबंधी प्राप्तियां . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. .

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

() भारत से बाहर विनिधानों से विदेशी बैंककारी कम्पनियों की आय . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

() निम्नलिखित से भिन्न वे व्यय या हानियां (यदि कोई हों) जो प्रकाशित या प्रकटित आरक्षिति में से प्रत्यक्षतः विकलित की गई हैं: -

 

 

 

 

(i) पूंजीगत व्यय तथा पूंजीगत हानियां (जो उन पूंजीगत आस्तियों के विक्रय पर हुई हानियों से भिन्न है जिन पर अवक्षयण, आय-कर के लिए अनुज्ञात नहीं किया गया है) . . ..           

 

 

 

 

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

 

(ii) भारत से बाहर स्थित किसी कारबार की हानियां

रु०

रु०

 

 

() विदेशी बैंककारी कम्पनियों की दशा में, प्रधान कार्यालय के आनुपातिक प्रशासनिक (उपरिव्यय) जो भारतीय कारबार के हिस्से पड़ने चाहिएं

 

 

पाद-टिप्पण (3) देखिए

 

() पूर्व लेखा-वर्षों की बाबत संदत्त किसी भी प्रत्यक्ष कर के किसी आधिक्य का प्रतिदाय तथा पूर्व लेखा-वर्षों के लेखे बोनस, अवक्षयण या विकास रिबेट संबंधी कोई उपबंधित अधिमान रकम, यदि वह लेखा में पुनः प्रविष्ट की गई है . . . . . . . . . . . . . . ..  

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

() बजट सम्बन्धी अनुदानों की मार्फत किन्हीं विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए सरकार द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा स्थापित किसी निगमित निकाय द्वारा या किसी अन्य अभिकरण द्वारा प्रत्यक्षतः या किसी अभिकरण के माध्यम से दी गई नकद साहय्यिकी, यदि कोई हो . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. .

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

मद संख्यांक 6 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

 

 

7.

बोनस के प्रयोजनों के लिए सकल लाभ (मद संख्यांक 5 ऋण मद संख्यांक 6) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

 

 

 

 

 

 

 

[स्पष्टीकरण-मद 3 की उपमद () में, अनुमोदित उपदान निधि" पद का वही अर्थ है जो उसका आय-कर अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (5) में है

पाद टिप्पण

(1) यदि वे और जिस विस्तार तक वे लाभ और हानि खाते पर प्रभारित किए गए हों  

(2) यदि वे और जिस विस्तार तक वे लाभ और हानि खाते में जमा किए गए हों  

(3) उस अनुपात में, जो भारतीय सकल लाभ का (मद सं०7) (उस समेकित लाभ-हानि खाते के अनुसार जो केवल ऊपर वाली मद संख्यांक 2 में यथा समायोजित रूप में है) संकलित विश्व सकल लाभ से है ]  

[द्वितीय अनुसूची]

[धारा 4() देखिए]

सकल लाभ की संगणना

......... को समाप्त होने वाला लेखा वर्ष

मद संख्यांक

विशिष्टियां

उपमद की रकम

मुख्य मदों की रकम

टिप्पणियां

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

 

 

रु०

रु०

 

1.

लाभ और हानि लेखा के अनुसार शुद्ध लाभ . . . . . . . . . . . . . . ..

 

 

 

2.

निम्नलिखित के लिए उपबंधित रकम पीछे जोड़ दें-

 

 

 

 

() कर्मचारियों के लिए बोनस . . . . . . . . . . . . . . . . . .. 

 

 

 

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

 

() अवक्षयण. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

रु०

 

 

() प्रत्यक्ष कर, जिनके अन्तर्गत पूर्व लेखा वर्षों के लिए उपबन्धित रकम (यदि कोई हो) भी है . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .  

 

 

 

 

[() विकास रिबेट/विनिधान मोक/विकास मोक आरक्षिति] 

 

 

पाद-टिप्पण (1) देखिए

 

() कोई अन्य आरक्षिति . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 

 

 

वही

 

मद संख्यांक 2 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

 

 

3.

निम्नलिखित को भी पीछे जोड़ दें-

 

 

 

 

() पूर्व लेखा वर्षों की बाबत कर्मचारियों को संदत्त बोनस

 

 

पाद-टिप्पण (1) देखिए

 

[(कक) कर्मचारियों को निम्नलिखित के योग से अधिक संदत्त या संदेय उपदान की बाबत उनके नामे डाली गई रकम-

 

 

पाद-टिप्पण (1) देखिए

 

(i) अनुमोदित उपदान निधि में जमा की गई या उसमें संदाय के लिए उपबंधित रकम, यदि कोई हो; और...  

 

 

 

 

(ii) कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति पर या किसी कारण से उनके नियोजन की समाप्ति पर वास्तव में संदत्त रकम] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

 

 

 

 

() आय-कर के लिए अनुज्ञेय रकम के आधिक्य में संदान

 

 

 

 

() लेखा वर्ष के दौरान आय-कर अधिनियम की धारा 280 के उपबन्धों के अधीन कोई देय वार्षिकी या दी गई किसी वार्षिकी का संराशिकृत मूल्य . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .         

 

 

 

 

() (वैज्ञानिक गवेषणा पर उस पूंजीगत व्यय से भिन्न जिसकी कटौती प्रत्यक्ष करों से संबंधित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन अनुज्ञात हो) पूंजी व्यय तथा (उन पूंजी आस्तियों के विक्रय पर हुई उन हानियों से भिन्न, जिन पर अवक्षयण आय-कर या कृषि आय-कर के लिए अनुज्ञात किया गया हो) पूंजी हानियां . . . . . ..                    

 

 

 

 

() भारत से बाहर स्थित किसी कारबार से संबंधित हानियां या व्यय . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

 

 

 

 

मद संख्यांक 3 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

 

 

4.

निम्नलिखित से भिन्न वह आय, वे लाभ या अभिलाभ (यदि कोई हों) को भी जोड़ दें जो आरक्षिति खाते में सीधे जमा किए गए हैं: -  

 

 

 

 

(i) पूंजी प्राप्तियां तथा पूंजी लाभ (जिनके अन्तर्गत उन पूंजी आस्तियों के विक्रय पर लाभ भी है जिन पर अवक्षयण आय-कर या कृषि आय-कर के लिए अनुज्ञात नहीं किया गया है); 

 

 

 

 

(ii) भारत से बाहर स्थित किसी कारबार के लाभ और तत्संबंधी प्राप्तियां

 

 

 

 

(iii) भारत से बाहर के विनिधानों से विदेशी समुत्थानों की आय

 

 

 

 

मद संख्यांक 4 का शुद्ध जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

रु०

 

 

 

मद संख्यांक 1, 2, 3 और 4 का जोड़ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ..

रु०

 

 

 

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

6.

निम्नलिखित की कटौती करें-

रु०

रु०

 

 

() पूंजी प्राप्तियां और पूंजी लाभ (जो उन आस्तियों के विक्रय पर हुए लाभों से भिन्न हैं, जिन पर अवक्षयण आय-कर या कृषि आय-कर के लिए अनुज्ञात किया गया है)

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

() भारत से बाहर स्थित किसी कारबार से सम्बन्धित लाभ और प्राप्तियां

 

 

-वही-

 

() भारत से बाहर के विनिधानों से विदेशी समुत्थानों की आय

 

 

-वही-

 

() आरक्षिति में प्रत्यक्षतः नामे डाले गए वे व्यय या हानियां (यदि कोई हों) जो निम्नलिखित से भिन्न हैं-

 

 

 

 

(i) पूंजीगत व्यय तथा पूंजी हानियां जो उन पूंजी आस्तियों के विक्रय पर हुई हानियों से भिन्न हैं जिन पर अवक्षयण आय-कर या कृषि आय-कर के लिए अनुज्ञात नहीं किया गया है); 

 

 

 

 

(ii) भारत से बाहर स्थित किसी कारबार की हानियां

 

 

 

 

() विदेशी समुत्थानों की दशा में प्रधान कर्यालय के अनुपाती प्रशासनिक (उपरि) व्यय जो भारतीय कारबार के हिस्से में पड़ने चाहिए

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

() पूर्व लेखा वर्षों की बाबत संदत्त किसी भी प्रत्यक्ष कर का प्रतिदाय तथा पूर्व लेखा वर्षों लेखे यदि बोनस, अवक्षयण, कराधान या विकास रिबेट या विकास मोक सम्बन्धी यदि कोई अधिमात्रिक रकम उपबन्धित की गई है तो वह रकम यदि लेखा में पुनः प्रविष्ट की गई हो

 

 

पाद-टिप्पण (2) देखिए

 

[() नकद सहायकी, यदि कोई हो, जिसे विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए सरकार ने या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा स्थापित किसी निगमित निकाय ने या किसी अन्य अभिकरण ने बजट-अनुदान के माध्यम से दी है, चाहे वह सीधे या किसी अभिकरण के माध्यम से दी गई हो और उसके आगम जो ऐसे प्रयोजनों के लिए आरक्षित हों ]

 

 

 

 

मद संख्यांक 6 का जोड़

रु०

 

 

7.

बोनस के प्रयोजनों के लिए सकल लाभ (मद संख्यांक 5 में से मद संख्यांक 6 घटा कर जो आए)

रु०

 

 

[स्पष्टीकरण-मद 3 की उपमद (कक) में, अनुमोदित उपदान निधि" पद का वही अर्थ है जो उसका आय-कर अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (5) में है ]

 

पाद टिप्पण

(1) यदि वे और उस विस्तार तक वे लाभ और हानि लेखा में से प्रभारित किए गए हों

(2) यदि वे उस विस्तार तक जिस तक वे लाभ और हानि लेखा में जमा किए गए हों   

(3) उस अनुपात में, जो भारतीय सकल लाभ की (मद सं०7) (उस समेकित लाभ-हानि लेखा के अनुसार जो केवल ऊपर वाली मद संख्यांक 2 में यथा समायोजित रूप में है) कुल विश्वव्यापी लाभ से है ]  

[तृतीय अनुसूची]

[धारा 6() देखिए]

मद संख्यांक

नियोजक की कोटि

अतिरिक्त रकमें जिनकी कटौती की जानी है

(1)

(2)

(3)

1.

[बैंककारी कंपनी से भिन्न कंपनी]

(i) उसके अधिमान प्राप्त शेयर-पूंजी की बाबत लेखा वर्ष के लिए संदेय लाभांश जो ऐसी वास्तविक दर पर संगणित हों जिस पर ऐसे लाभांश संदेय हैं;

(ii) लेखा वर्ष के यथा प्रारम्भ पर उसकी समादत्त साम्य शेयर-पूंजी का 8.5 प्रतिशत

(iii) लेखा वर्ष के यथा प्रारम्भ पर उसके तुलन-पत्र में दर्शित उसकी आरक्षितियों का 6 प्रतिशत जिसके अन्तर्गत पूर्व लेखा वर्ष से अग्रणीत कोई लाभ भी है:

परन्तु जहां कि नियोजक कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 591 के अर्थ में विदेशी कम्पनी है वहां इस मद के अधीन वह कुल रकम, जिसकी कटौती की जानी है, वह उस संकलित मूल्य पर 8.5 प्रतिशत होगी जो भारत में उस कम्पनी की शुद्ध स्थिर आस्तियों तथा चालू आस्तियों की भारत में उसके चालू दायित्वों की रकम की (जो उस किसी रकम से भिन्न है जो चाहे तो उसके प्रधान कार्यालय द्वारा दिए गए किसी अधिदाय मद्धे या अन्यथा या कम्पनी द्वारा अपने प्रधान कर्यालय को दिए गए किसी ब्याज मद्धे कम्पनी द्वारा अपने प्रधान कार्यालय को देय दिखाई गई है) कटौती करने के पश्चात् है

 

[2. बैंककारी कम्पनी

(i) उसकी अधिमान प्राप्त अंशपूंजी की बाबत लेखा वर्ष के लिए संदेय लाभांश जो ऐसी दर पर संगणित हों जिस पर ऐसे लाभांश संदेय हैं;

(ii) लेखा वर्ष के प्रारम्भ पर यथाविद्यमान उसकी समादत्त साधारण अंश-पूंजी का 7.5 प्रतिशत

(iii) उसके तुलन-पत्र में लेखा वर्ष के प्रारम्भ पर यथादर्शित उसकी आरक्षिति का 5 प्रतिशत, जिसके अन्तर्गत पूर्व लेखा वर्ष से अग्रणीत कोई लाभ भी है

(iv) लेखा वर्ष की बाबत कोई राशि, जो उसके द्वारा

                () बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की                 धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन आरक्षित निधि को अन्तरित की गई                 है, अथवा

                () भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए किसी निदेश या सूचना के अनुसरण में भारत में किन्हीं आरक्षितियों को अन्तरित की गई है, दोनों में जो भी अधिक है:

परन्तु जहां बैंककारी कम्पनी, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 591 के अर्थ में विदेशी कम्पनी है, वहां इस मद के अधीन कटौती की जाने वाली रकम निम्नलिखित का योग होगी, -

 

 

(i) उसके अधिमान प्राप्त अंशधारियों को लेखा वर्ष के लिए ऐसी रकम पर जिसका उसकी कुल अधिमान प्राप्त अंश-पूंजी से वही अनुपात है जो भारत में उसकी कुल कामकाज निधियों का उसकी कुल विश्व कामकाज निधियों से है, उसी दर से संदेय लाभांश जिस पर ऐसे लाभांश संदेय हैं;

 

मद संख्यांक

नियोजक की कोटि

अतिरिक्त रकमें जिनकी कटौती की जानी है

(1)

(2)

(3)

 

 

(ii) उस रकम का 7.5 प्रतिशत, जिसका उसकी कुल समादत्त साधारण अंशपूंजी से वही अनुपात है जो भारत में उसकी कुल कामकाज निधियों का उसकी कुल विश्व कामकाज निधियों से है;

 

 

(iii) उस रकम का 5 प्रतिशत, जिसका उसकी कुल प्रकटित आरक्षितियों से वही अनुपात है जो भारत में उसकी कुल कामकाज निधियों का उसकी कुल विश्व कामकाज निधियों से है;

 

 

(iv) कोई राशि, जो लेखा वर्ष की बाबत उसके द्वारा बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 11 की उपधारा (2) के खंड () के उपखंड (ii) के अधीन भारतीय रिजर्व बैंक में निक्षिप्त की जाती है और जो पूर्वोक्त उपबंध के अधीन इस प्रकार निक्षिप्त किए जाने के लिए अपेक्षित रकम से अधिक नहीं है ]

3.

निगम

(i) लेखा वर्ष के यथा प्रारम्भ पर उसकी समादत्त पूंजी का 8.5 प्रतिशत

 

 

(ii) लेखा वर्ष के यथा प्रारम्भ पर उसके तुलन-पत्र में दर्शित उसकी आरक्षितियों का, यदि कोई हों, 6 प्रतिशत जिसके अन्तर्गत पूर्व लेखा वर्ष से अग्रनीत कोई लाभ भी है

4.

सहकारी सोसाइटी

(i) ऐसी सोसाइटी द्वारा अपने स्थापन में विनिहित उस पूंजी का 8.5 प्रतिशत जो लेखा वर्ष के प्रारम्भ पर उसकी लेखा-बहियों से साक्ष्यित है;

 

 

(ii) ऐसी राशि जो लेखा वर्ष की बाबत सहकारी सोसाइटियों से सम्बन्धित किसी तत्सयम प्रवृत्त-विधि के अधीन आरक्षित निधि में अग्रनीत की गई हो  

5.

कोई अन्य नियोजक जो पूर्वोक्त कोटियों में से किसी में नहीं आता

उस द्वारा अपने स्थापन में विनिहित पूंजी का 8.5 प्रतिशत जो लेखा वर्ष के प्रारम्भ पर उसकी लेखा-बहियों से यथा साक्ष्यित है

 

 

परन्तु जहां ऐसा नियोजक ऐसा व्यक्ति है जिसे आय-कर अधिनियम का अध्याय 22 लागू होता है वहां उस अध्याय के उपबन्धों के अधीन लेखा-वर्ष के दौरान संदेय वार्षिकी निक्षेप की भी कटौती की जाएगी

 

 

परन्तु यह और कि जहां ऐसा नियोजक कोई फर्म है वहां उस लेखा वर्ष के संबंध में उस स्थापन से धारा 6 के खण्ड () के उपबन्धों के अनुसार अवक्षयण की कटौती करने के पश्चात् उसे व्युत्पन्न सकल लाभों के 25 प्रतिशत के बराबर रकम की भी कटौती उस स्थापन के संचालन में भाग लेने वाले सब भागीदारों के पारिश्रमिक के रूप में की जाएगी किन्तु जहां भागीदारी करार चाहे वह मौखिक या लिखित हो, ऐसे किसी भागीदार को पारिश्रमिक के संदाय के लिए उपबन्ध करता है, तथा

 

 

(i) जहां ऐसे सब भागीदारों को संदेय कुल पारिश्रमिक उक्त 25 प्रतिशत से कम है वहां ऐसी रकम जो अड़तालीस हजार रुपए से अधिक हो, जो ऐसे हर एक भागीदार को संदेय है; अथवा

 

 

(ii) जहां ऐसे सब भागीदारों को संदेय कुल पारिश्रमिक उक्त 25 प्रतिशत से अधिक है वहां उतनी प्रतिशत रकम या ऐसे हर एक भागीदार को अड़तालीस हजार रुपए की दर से संगणित रकम में से, जो भी कम हो, उस रकम की, उस परन्तुक के अधीन कटौती की जाएगी:

परन्तु यह और भी कि जहां ऐसा नियोजक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है वहां, -

 

 

(i)  लेखा वर्ष की बाबत उस स्थापन से ऐसे नियोजक को धारा 6 के खण्ड () के उपबन्धों के अनुसार अवक्षयण की कटौती करने के पश्चात् व्युत्पन्न सकल लाभ के 25 प्रतिशत के बराबर रकम की; अथवा

 

मद संख्यांक

नियोजक की कोटि

अतिरिक्त रकमें जिनकी कटौती की जानी है

(1)

(2)

(3)

 

 

(ii) अड़तालीस हजार रुपए की, दोनों में से जो भी कम हो, कटौती ऐसे नियोजक के पारिश्रमिक के रूप में की जाएगी

6.

मद संख्यांक 1 या मद संख्यांक 3 या मद संख्यांक 4 या मद संख्यांक 5 में आने वाला कोई नियोजक और जो विद्युत प्रदाय अधिनियम, 1948 (1948 का 54) के अर्थ में अनुज्ञप्तिधारी है

पूर्वोक्त मदों में से किसी के अधीन कटौती की जाने वाली राशियों के अतिरिक्त ऐसी राशियों की भी कटौती की जाएगी जो उस लेखा वर्ष की बाबत उस अधिनियम की छठी अनुसूची के अधीन आरक्षित निधि से विनियोजित किए जाने के लिए अपेक्षित है

 

 

 

 

स्पष्टीकरण-स्तम्भ (3) में मद संख्यांक [1(iii), 2(iii) और (3(ii)] में दी गई आरक्षितियों" अभिव्यक्ति के अन्तर्गत कोई ऐसी रकम नहीं आती है जो-

(i) किसी ऐसे प्रत्यक्ष कर के संदाय के, जो तुलन-पत्र के अनुसार संदेय होगा

(ii) धारा 6 के खण्ड () के उपबन्धों के अनुसार अनुज्ञेय किसी अवक्षयण की पूर्ति के

(iii) ऐसे लाभांशों के संदाय, जो घोषित किए गए हैं,

प्रयोजन के लिए अलग रख ली गई है किन्तु इसके अन्तर्गत

() इस स्पष्टीकरण के खंड (i) में निर्दिष्ट रकम से अतिरिक्त और ऐसी अधिक रकम आती है जो किसी प्रत्यक्ष कर के संदाय के प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट आरक्षिति के रूप में अलग रखी गई है; तथा 

() कोई ऐसी रकम आती है जो, उतनी रकम से जितनी धारा 6 के खण्ड () के उपबन्धों के अनुसार अनुज्ञेय है, आधिक्य में के अवक्षयण की पूर्ति के लिए अलग रखी गई है   

 

[चतुर्थ अनुसूची]

(धारा 15 और 16 देखिए)

                इस अनुसूची में, सब कर्मचारियों की देय वार्षिक संबलम् या मजदूरी के 8.33 प्रतिशत के बराबर बोनस की कुल रकम के बारे में यह धारणा कर ली गई है कि वह 1,04,167 रुपए है तद्नुसार वह अधिकतम बोनस जिसके संदत्त किए जाने के लिए सब कर्मचारी हकदार होंगे (सब कर्मचारियों के वार्षिक संबलम् या मजदूरी का 20 प्रतिशत) 2,50,000 रुपए होगा

वर्ष

बोनस के रूप में आबंटनीय उपलभ्य अतिशेष के, यथास्थिति, साठ प्रतिशत या सड़सठ प्रतिशत के बराबर रकम

बोनस के रूप में संदेय रकम

वह अग्रनीत रकम जो वर्ष के आगे के लिए रखी गई या मुजरा की गई है

आगे के लिए रखी गई या मुजरा की गई कुल रकम, जो अग्रनीत की गई हो

1

2

3

4

5

 

रु०

रु०

रु०

रु०

(वर्ष) का

1.

1,04,167

1,04,167

कुछ नहीं

कुछ नहीं

2.

6,35,000

2,50,000

आगे के लिए रखा गया

2,50,000

आगे के लिए रखा गया

2,50,000

(2)

3.

2,20,000

2,50,000

(वर्ष-2 से 30,000 सम्मिलित करते हुए)

कुछ नहीं

आगे के लिए रखा गया

2,20,000 

(2)

4.

3,75,000

2,50,000

आगे के लिए रखा गया

1,25,000

आगे के लिए रखा गया 

2,20,000

(2)

1,25,000 

(4)

5.

1,40,000

2,50,000

(वर्ष-2 से 1,10,000 सम्मिलित करते हुए)

कुछ नहीं

आगे के लिए रखा गया 

1,10,000

(2)

1,25,000

(4)

6.

3,10,000

2,50,000

आगे के लिए रखा गया

60,000

आगे के लिए रखा गया

कुछ नहीं

(2)

1,25,000

(4)

60,000

(6)

7.

1,00,000

2,50,000

(वर्ष-4 से 1,25,000 और वर्ष-6 से 25,000 सम्मिलित करते हुए)

कुछ नहीं

आगे के लिए रखा गया

35,000

(6)

8.

(हानि-लेख) कुछ नहीं

1,04,167

(वर्ष-6 से 35,000 सम्मिलित करते हुए)

मुजरा

69,167

मुजरा

69,167

(8)

9.

10,000

1,04,167

मुजरा

94,167

मुजरा

69,167

94,167  

 

(8)

(9)

 

1

2

3

4

5

10.

2,15,000

1,04,167

(वर्ष-8 से 69,167 और वर्ष-9 से 41,666 मुजरा के पश्चात्)

 

कुछ नहीं

मुजरा

52,501

(9)

टिप्पण-

अधिकतम

न्यूनतम

वर्ष 2 से आगे के लिए रखा गया 1,10,000 रुपए का अतिशेष व्यपगत होता है

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