भाण्डागारण (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2007
(2007 का अधिनियम संख्यांक 37)
[19 सितंबर, 2007]
भाण्डागारों के विकास और विनियमन, भाण्डागार रसीदों की परक्राम्यता,
भाण्डागारण विकास और विनियामक प्राधिकरण की स्थापना के
लिए और उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के अठावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भाण्डागारण (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2007 है ।
(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर, संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) प्रत्यायन अभिकरण" से, धारा 5 के अधीन प्राधिकरण के पास रजिस्ट्रीकृत अभिकरण, चाहे उसका गठन कैसा भी हो, अभिप्रेत है;
(ख) अनुयोज्य दावे" का वही अर्थ है, जो संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 3 में है;
(ग) प्राधिकरण" से धारा 24 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित भाण्डागारण विकास और विनियामक प्राधिकरण अभिप्रेत है;
(घ) जमाकर्ता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो भाण्डागारपाल को भंडारकरण के लिए माल का परिदान करता है;
(ङ) पृष्ठांकिती" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसको भाण्डागार रसीद परक्रामित की जाती है;
(च) पृष्ठांकन" से भाण्डागार रसीद पर जमाकर्ता या भाण्डागार रसीद के धारक द्वारा उसके परक्रामण के प्रयोजन के लिए हस्ताक्षर किया जाना अभिप्रेत है;
(छ) सूचना के संदर्भ में इलैक्ट्रानिक रूप" से, मीडिया, चुम्बकीय, प्रकाशीय, कम्प्यूटर मेमॉरी, माइक्रोफिल्म, कम्प्यूटर जनित माइक्रो फिश या वैसी ही किसी युक्ति द्वारा जनित, भेजी गई, प्राप्त की गई या एकत्रित की गई कोई सूचना अभिप्रेत है;
(ज) प्रतिमोच्य माल" से ऐसा माल अभिप्रेत है, जिसकी कोई इकाई, प्रकृति या व्यापार की प्रथा के कारण, वैसी ही किसी इकाई के समतुल्य है और जिन्हें किसी भाण्डागारपाल द्वारा प्रतिमोच्य माल के रूप में प्राप्त किया जाता है;
(झ) माल" से सभी मूर्त जंगम माल (अनुयोज्य दावों, धन और प्रतिभूतियों से भिन्न) अभिप्रेत है, चाहे वह प्रतिमोच्य हो या नहीं;
(ञ) श्रेणी" से कृषि उपज (श्रेणीकरण और चिह्नांकन) अधिनियम, 1937 (1937 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा श्रेणी अभिधान के रूप में यथा अधिसूचित किसी माल का क्वालिटी मानक अभिप्रेत है;
(ट) धारक" से अभिप्रेत है-
(i) किसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद के संबंध में ऐसा कोई व्यक्ति, जिसके कब्जे में ऐसी रसीद है और जिसके माल का अधिकार उस रसीद पर पृष्ठांकित है; और
(ii) किसी अपरक्राम्य भाण्डागार रसीद के संबंध में ऐसा कोई व्यक्ति, जो उसमें ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसे माल परिदत्त किया जाना है या उस व्यक्ति के समुदेशिती के रूप में नामित है;
(ठ) सदस्य" से प्राधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उसका अध्यक्ष भी है;
(ड) परक्राम्य भाण्डागार रसीद" से भाण्डागार की ऐसी रसीद, जिसके अधीन उसमें वर्णित माल जमाकर्ता को परिदान किए जाने योग्य है या आदेश जिसका पृष्ठांकन उसके द्वारा वर्णित माल के अंतरण का प्रभाव रखता है और पृष्ठांकिती को जिसके लिए सही हक प्राप्त होता है, अभिप्रेत हैं;
(ढ) अपरक्राम्य भाण्डागार रसीद" से परक्राम्य भाण्डागार रसीद से भिन्न कोई भाण्डागार रसीद अभिप्रेत है;
(ण) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(त) व्यक्ति" के अन्तर्गत कोई फर्म, सहकारी सोसाइटी या कोई संगम या व्यक्तियों का निकाय भी है, चाहे निगमित हो या नहीं;
(थ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(द) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाया गया विनियम अभिप्रेत है;
(ध) भाण्डागार" से सभी अपेक्षाओं के, जिनमें प्राधिकरण द्वारा विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट जनशक्ति सम्मिलित है, अनुरूप ऐसा कोई परिसर (किसी संरक्षित स्थान सहित) अभिप्रेत है, जिसमें भाण्डागारपाल, जमाकर्ता द्वारा जमा किए गए माल को अभिरक्षा में लेता है और इसके अंतर्गत तापमान और आर्द्रता की नियंत्रित दशाओं के अधीन माल के भण्डारण का स्थान भी है;
(न) भाण्डागारण कारबार" से माल के भण्डारण के लिए भाण्डागार रखने और परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने का कारबार अभिप्रेत है;
(प) भाण्डागार रसीद" से किसी भाण्डागारपाल या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत प्रतिनिधि (जिसके अंतर्गत जमाकर्ता, चाहे जिस नाम से ज्ञात हों, भी हैं) द्वारा जारी की गई ऐसे माल के भण्डारण की रसीद जिसका स्वामी भाण्डागारपाल नहीं है, लिखित में या इलैक्ट्रानिक रूप में कोई अभिस्वीकृति अभिप्रेत है;
(फ) भाण्डागारपाल" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसको किसी भाण्डागार या भाण्डागारों के संबंध में प्राधिकरण या प्रत्यायन अभिकरण द्वारा भाण्डागारण कारबार चलाने के लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है ।
अध्याय 2
भाण्डागारण कारबार का विनियमन
3. परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने वाले भाण्डागारों के लिए रजिस्ट्रीकरण की अपेक्षा-(1) कोई व्यक्ति भाण्डागारण कारबार तब तक प्रारंभ नहीं करेगा या कारबार नहीं करेगा, जब तक कि वह संबंधित भाण्डागार या भाण्डागारों के संबंध में इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा अनुदत्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त नहीं कर लेता है:
परन्तु जहां कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व भाण्डागारण कारबार कर रहा है, वहां उसे उस दशा में ऐसा कारबार करने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा, यदि उसने ऐसे प्रारंभ की तारीख के तीस दिन के भीतर रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया है:
परन्तु यह और कि कोई ऐसा रजिस्ट्रीकरण ऐसे भाण्डागारों के लिए अपेक्षित नहीं होगा, जो परक्राम्य भाण्डागार रसीद जारी करने का प्रस्ताव नहीं करते हैं ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत भाण्डागार अपरक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने के लिए भी पात्र होगा ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण उसके द्वारा जारी किए गए विनियमों और मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अधीन रहते हुए, धारा 5 के अधीन प्रत्यायन अभिकरण के रूप में रजिस्ट्रीकृत किसी व्यक्ति को, परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने वाले भाण्डागार का कारबार चलाने के लिए किसी व्यक्ति को प्रत्यायन प्रमाणपत्र जारी करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।
4. भाण्डागारों का रजिस्ट्रीकरण-(1) परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने वाले किसी भाण्डागार का कारबार प्रारंभ करने या कारबार करने का इच्छुक व्यक्ति, अपने स्वामित्वाधीन या अधिभोग में एक या अधिक भाण्डागारों के संबंध में रजिस्ट्रीकरण के लिए प्राधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप और रीति में, ऐसे निबन्धनों और शर्तों तथा ऐसी फीस के साथ होगा, जो विहित की जाए ।
(3) प्राधिकरण, आवेदक को, ऐसी जांच करने के पश्चात् और ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह ठीक समझे, विहित प्ररूप में उसको भाण्डागार या भाण्डागारों का कारबार करने के लिए और परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने के लिए प्राधिकृत करते हुए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा जिस पर रजिस्ट्रीकरण संख्या होगी ।
(4) प्राधिकरण, इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र तब तक जारी नहीं करेगा, जब तक कि उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि वह भाण्डागार जिसके संबंध में आवेदन किया गया है, आवेदन में विनिर्दिष्ट प्रकृति के माल के भाण्डागारण के लिए अपेक्षित पर्याप्त सुविधाएं और रक्षोपाय हैं और आवेदक वित्तीय, प्रबंधकीय और अन्य पात्रता संबंधी कसौटियों और सक्षमताओं को जो विनिर्दिष्ट की जाएं, पूरा करता है:
परन्तु इस धारा के अधीन किसी आवेदक को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देने से तब तक इंकार नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक को सुने जाने का अवसर नहीं दे दिया गया हो ।
5. प्रत्यायन अभिकरणों का रजिस्ट्रीकरण-(1) प्राधिकरण, समय-समय पर प्रत्यायन अभिकरणों की संख्या अवधारित करेगा जिन्हें वह परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने वाले भाण्डागारों को प्रत्यायन प्रमाणपत्र जारी करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।
(2) कोई व्यक्ति, जो ऐसी अर्हताएं और अन्य अपेक्षाएं पूरी करता है, जो विहित की जाएं और जो इस अधिनियम के अधीन प्रत्यायन अभिकरण के रूप में कृत्य करने का इच्छुक है, इस अधिनियम के अधीन उस रूप में अपने रजिस्ट्रीकरण की ईप्सा करते हुए प्राधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप और रीति में होगा और उसके साथ ऐसी फीस और प्रतिभूति निक्षेप होगा, जो विहित किया जाए ।
(4) वह प्ररूप जिसमें और वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए, इस धारा के अधीन प्रत्यायन अभिकरण के रूप में रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र जारी किया जा सकेगा, ऐसी होंगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 3
भाण्डागारपाल
6. भाण्डागारपालों के दायित्व-(1) भाण्डागारपाल, माल की ऐसी हानि या ऐसे नुकसान के लिए दायी है, जो माल के संबंध में ऐसी सतर्कता और तत्परता का, जो उसे प्रपुंज, क्वालिटी और मूल्य के माल के सावधान और सतर्क स्वामी के रूप में, वैसी ही दशाओं में, अपनी अभिरक्षा में माल के लिए प्रयोग करता, प्रयोग करने में उसकी असफलता के कारण हुआ है ।
(2) यदि भाण्डागारपाल द्वारा सभी सतर्कता और पूर्वावधानियां बरतने के बावजूद, अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण माल को नुकसान या हानि होती है तो माल के जमा करने के समय माल के मूल्य के बराबर भाण्डागारपाल द्वारा प्रतिकर संदेय होगा ।
(3) यदि भाण्डागारपाल की उपेक्षा के कारण माल को नुकसान या हानि होती है तो प्रतिकर, माल के मूल्य और रसीद के धारक को, लाभ की हानि के बराबर होगा ।
(4) भाण्डागारपाल, ऐसी परिस्थितियों जैसे अनिवार्य बाध्यता, युद्ध की कार्रवाई, लोक शत्रुओं के कार्य और उसी प्रकार की कार्रवाई से हुई भण्डारण के लिए उसे परिदत्त माल की किसी हानि, विनाश, नुकसान या क्षय के लिए उत्तरदायी नहीं होगा ।
7. भाण्डागारपालों के कर्तव्य-(1) किसी विधिपूर्ण प्रतिहेतु की अनुपस्थिति में भाण्डागारपाल, किसी परक्राम्य रसीद में निर्दिष्ट माल का, रसीद के धारक द्वारा मांग किए जाने पर रसीद के धारक को और धारक द्वारा निम्नलिखित सभी शर्तें पूरा करने पर, परिदान किया जाएगा, अर्थात्: -
(क) भाण्डागार के धारणाधिकार का समाधान करना;
(ख) अपरक्राम्य रसीद की दशा में, रसीद का अभ्यर्पण करना और परक्राम्य रसीद की दशा में रसीद का पृष्ठांकनों सहित अभ्यर्पण करना; और
(ग) माल की रसीद की लिखित में अभिस्वीकृति देना ।
(2) यदि कोई भाण्डागारपाल, इस धारा के उपबंधों के अनुपालन में माल का परिदान करने से इंकार करता है या असफल रहता है तो, इंकार करने या असफलता के लिए किसी विधिपूर्ण प्रतिहेतु के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए साबित करने का भार भाण्डागारपाल पर होगा ।
8. भाण्डागारपाल के भाण्डागार कारबार के अभिलेखों और लेखाओं को रखने के कर्तव्य-(1) प्रत्येक भाण्डागारपाल, भाण्डागार के प्रचालन से संबंधित सभी संव्यवहारों के पूरे और सही अभिलेखों और लेखाओं का सैट जिसके अंतर्गत भाण्डागार में प्राप्त और उससे वापस लिए गए सभी माल, उसके कब्जे में जारी न की गई सभी रसीदों, उसके द्वारा जारी की गई, लौटाई गई और रद्द की गई सभी रसीदों के अभिलेख और लेखे भी हैं, किसी सुरक्षित स्थान में रखेगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, भाण्डागारपाल, भाण्डागार कारबार के सभी अभिलेख और लेखे किसी अन्य कारबार के अभिलेखों और लेखाओं से पृथक् और सुभिन्न संख्यात्मक श्रृंखला में ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति में तथा ऐसी अवधि के लिए, जो प्राधिकरण, विनियमों द्वारा निर्दिष्ट करे, रखेगा ।
(3) भाण्डागारपाल, भाण्डागार कारबार के अभिलेखों और लेखाओं को, किसी भी समय जब भी प्राधिकरण द्वारा वांछा की जाए, निरीक्षण के लिए प्राधिकरण को उपलब्ध कराएगा ।
9. विनश्वर और परिसंकटमय माल के संबंध में कार्रवाई करने की भाण्डागारपाल की विशेष शक्तियां-(1) यदि माल विनश्वर या परिसंकटमय प्रकृति के हैं या उनके रखने से मूल्य में बड़ा ह्रास होगा अथवा अन्य संपत्ति को नुकसान होगा तो भाण्डागारपाल, माल के लिए रसीद के धारक को, यदि धारक का नाम और पता भाण्डागारपाल को ज्ञात है अथवा यदि भाण्डागारपाल को ज्ञात नहीं है तब जमाकर्ता को, ऐसी सूचना दे सकेगा जो उन परिस्थितियों के अधीन युक्तियुक्त और संभव है, जिसमें उस व्यक्ति से माल पर धारणाधिकार का समाधान करने और भाण्डागार से उन्हें हटाने की अपेक्षा की जाएगी ।
(2) यदि वह व्यक्ति जिसको उपधारा (1) के अधीन सूचना दी जाती है, सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर धारणाधिकार का समाधान करने और माल को हटाने में असफल रहता है तो भाण्डागारपाल, विज्ञापन के बिना लोक या प्राइवेट विक्रय द्वारा माल का विक्रय कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट सूचना, इलैक्ट्रानिक डाक, स्पीड पोस्ट या रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा या टैलिग्राफिक रूप से उस व्यक्ति को संबोधित करते हुए जिसको वह, उस व्यक्ति के अंतिम ज्ञात पते पर दी जानी है, भेजी जा सकेगी और सूचना, डाक भेजने के तीसरे दिन दे दी गई समझी जाएगी ।
(4) यदि भाण्डागारपाल युक्तियुक्त प्रयास के पश्चात् माल का विक्रय करने में असमर्थ है तो भाण्डागारपाल, उनका ऐसी अन्य रीति में जिसे वह समुचित समझे, व्ययन कर सकेगा और उस कारण से उस पर कोई दायित्व उपगत नहीं करेगा ।
(5) इस धारा के अधीन किए गए माल के विक्रय या व्ययन के आगमों से, भाण्डागारपाल अपने धारणाधिकार का समाधान करने के पश्चात् बकाया को रसीद के धारक के लिए न्यास में रखेगा ।
(6) यदि भाण्डागारपाल का युक्तियुक्त आधारों पर यह समाधान हो जाता है कि मामले की परिस्थितियों में, ऐसी सूचनाएं देने से माल पर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है तो कोई सूचना, आवश्यक नहीं होगी ।
(7) यदि किसी समय भाण्डागारपाल का यह समाधान हो जाता है कि किसी प्रतिमोच्य माल या उसके किसी भाग का इस प्रकार क्षय हो गया है या इस प्रकार क्षय हो रहा है कि परक्राम्य भाण्डागार रसीदों के धारकों को हानि से बचाने के लिए ऐसा करना आवश्यक है और उनसे अनुदेश प्राप्त करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है तो वह, इस निमित्त इन विनियमों के अधीन रहते हुए, माल या उसके किसी भाग का व्ययन कर सकेगा और रसीदों के धारकों के फायदे के लिए किसी निलम्ब लेखा में अपने धारणाधिकार का समाधान करने के पश्चात् विक्रय आगम रख सकेगा ।
(8) उपधारा (7) के अधीन प्रतिमोच्य माल के व्ययन की दशा में भाण्डागारपाल, रसीद के धारक के विकल्प पर या तो विक्रय आगम का संदाय करेगा या उसको उसी श्रेणी, क्वालिटी और मात्रा में माल के समतुल्य माल का परिदान करेगा ।
(9) किसी पृष्ठांकिती को, भाण्डागारपाल के पास अभिलिखित सेवा के लिए पते को सूचित करने का अधिकार होगा ।
10. माल पर भाण्डागारपाल का धारणाधिकार-(1) प्रत्येक भाण्डागारपाल का, भंडारण के लिए उसके पास जमा माल पर धारणाधिकार होगा चाहे वह माल के स्वामी द्वारा या उसके प्राधिकार द्वारा या स्वामी द्वारा या ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा जिसे उसके अभिकर्ता द्वारा माल का कब्जा सौंपा गया है, जमा किया गया है ।
(2) भाण्डागारपाल का धारणाधिकार, भंडारण और अनुरक्षण प्रभारों की रकम के लिए है, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित हैं-
(क) माल के भंडारण और परिरक्षण के लिए सभी विधिपूर्ण प्रभार;
(ख) निम्नलिखित के लिए सभी युक्तियुक्त प्रभार-
(i) ऐसी सूचना जिसको इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन दिया जाना अपेक्षित है;
(ii) विक्रय की सूचना और विज्ञापन;
(iii) माल का विक्रय जहां भाण्डागारपाल के धारणाधिकार का समाधान करने में व्यतिक्रम किया गया है; और
(iv) कानूनी उपबंधों का अनुपालन ।
(3) यदि किसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद के मुख पृष्ठ पर किसी बैंक द्वारा या भाण्डागारपाल द्वारा कोई पृष्ठांकन किया जाता है तो ऐसा पृष्ठांकन, किसी गिरवी का साक्ष्य होगा और गिरवीदार को रसीद के धारक के हित के मुकाबले अग्रता होगी ।
(4) उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी गिरवी की दशा में, भाण्डागारपाल माल का तब तक परिदान नहीं करेगा जब तक गिरवी का पृष्ठांकन सम्यक् रूप से रद्द नहीं कर दिया जाता है ।
(5) यदि माल, भंडारण की घोषित अवधि के भीतर वापस नहीं लिया जाता है तो भाण्डागारपाल को ऐसे किसी माल का, जिस पर उसका धारणाधिकार है, लोक नीलामी द्वारा या इस धारा में उपबंधित किसी अन्य रीति में माल का विक्रय करके अपने प्रभारों को वसूल करने का अधिकार होगा ।
(6) भाण्डागारपाल, उस व्यक्ति को, जो उन प्रभारों के लिए जिनके लिए धारणाधिकार विद्यमान हैं, ऋणी के रूप में उत्तरदायी है, या स्वामी को या माल पर संपत्ति का अधिकार रखने वाले व्यक्ति को, माल का विक्रय करने के अपने आशय की लिखित में सूचना देगा ।
(7) उपधारा (6) के अधीन सूचना में, -
(क) माल के संबंध में सभी ब्यौरे, भाण्डागार का अवस्थान, जमा करने की तारीख, जमाकर्ता का नाम और भाण्डागार में भंडार किए गए माल के लिए भाण्डागारपाल द्वारा दावा किए गए धारणाधिकार का विवरण अंतिर्विष्ट होगा;
(ख) यह कथन होगा कि जब तक सूचना में उल्लिखित नियत के भीतर प्रभार संदत्त नहीं किए जाते हैं तब तक माल को सूचना में यथाविनिर्दिष्ट किसी समय और स्थान पर विक्रय के लिए विज्ञापित नहीं किया जाएगा और लोक नीलामी द्वारा विक्रय नहीं किया जाएगा ।
(8) यदि प्रभार, सूचना में उल्लिखित तारीख को या उससे पूर्व, संदत्त नहीं किए जाते हैं तो, तब तक, जब तक कि प्राधिकरण द्वारा विनियमों द्वारा विक्रय का कोई अन्य ढंग विनिर्दिष्ट नहीं किया जाता है, विक्रय का कोई विज्ञापन उस परिक्षेत्र में जहां विक्रय किया जाना है और साथ ही जहां माल का स्वामी अवस्थित है, परिचालित किसी अग्रणी समाचारपत्र में प्रकाशित किया जाएगा और विक्रय, विज्ञापन के प्रथम प्रकाशन की तारीख से चौदह दिन से पहले नहीं किया जाएगा ।
(9) भाण्डागारपाल, विक्रय के आगमों से अपने धारणाधिकार का समाधान करेगा और अधिशेष का, यदि कोई हो, उसके हकदार व्यक्ति को संदाय करेगा ।
(10) यदि उसके हकदार व्यक्ति द्वारा, माल के विक्रय के पश्चात् दस दिन के भीतर अधिशेष की मांग नहीं की जाती है या जहां विभिन्न दावे हैं, तो भाण्डागारपाल प्राधिकरण से अनुदेश प्राप्त करेगा और प्राधिकरण के आदेशों के अनुसार कार्रवाई करेगा ।
अध्याय 4
भाण्डागार रसीदें
11. भण्डागार रसीदें-(1) भाण्डागार रसीद जो या तो लिखित में या इलैक्ट्रानिक रूप में हो सकेगी, लिखित में माल के हक का दस्तावेज होगी यदि उसमें निम्नलिखित सभी विशिष्टियां अंतर्विष्ट हैं, अर्थात्: -
(क) रसीद संख्यांक;
(ख) भाण्डागार रजिस्ट्रीकरण संख्यांक और वह तारीख जिस तक यह विधिमान्य है;
(ग) भाण्डागार का नाम और उसका डाक का पूरा पता;
(घ) उस व्यक्ति का नाम और पता जिसके द्वारा या जिसकी ओर से माल जमा किया जाता है;
(ङ) भाण्डागार रसीद जारी करने की तारीख;
(च) यह कथन कि प्राप्त माल का उसके धारक को परिदान किया जाएगा या माल का किसी नामित व्यक्ति के आदेश से परिदान किया जाएगा;
(छ) भंडारण प्रभारों और उठाई-धराई प्रभारों की दरें;
(ज) माल या पैकेजों का वर्णन, जिनमें वह माल है और उसके साथ माल की मात्रा और क्वालिटी या श्रेणी की विशिष्टियां होंगी;
(झ) जमा करने के समय माल का बाजार मूल्य;
(ञ) माल या पैकेजों पर जमाकर्ता का प्राइवेट चिह्न यदि कोई हो, प्रतिमोच्य माल की दशा के सिवाय;
(ट) अग्नि, बाढ़, चोरी, सेंधमारी, दुर्विनियोग, बलवे, हड़तालों या आतंकवाद के कारण क्षतिपूर्ति करने वाली बीमा कंपनी का नाम;
(ठ) भाण्डागार रसीद परक्राम्य है या अपरक्राम्य;
(ड) दिए गए किसी अग्रिम की रकम और उपगत किसी दायित्व का विवरण जिसके लिए भाण्डागारपाल अपने धारणाधिकार का दावा करता है;
(ढ) भाण्डागारपाल या उसके प्राधिकृत अभिकर्ता के हस्ताक्षर और तारीख;
(ण) माल की घोषित पुलिन अवधि;
(त) यह तथ्य कि भाण्डागारपाल भंडारण के लिए जमा किए गए माल पर धारणाधिकार रखता है और प्रहस्तन प्रभार; और
(थ) रसीद केवल माल की जिसके लिए वह जारी की जाती है घोषित पुलिन अवधि के अवसान की तारीख तक विधिमान्य होगी ।
(2) यदि, भाण्डागारपाल, जानबूझकर किसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद से उपधारा (1) में उपवर्णित विशिष्टियों में से किसी का लोप करता है तो वह ऐसे लोप से कारित नुकसानी के लिए दायी होगा ।
(3) कोई भी भाण्डागार रसीद, केवल उपधारा (1) में उपवर्णित किसी विशिष्टि के लोप के कारण विवादों या दावों के निपटान के प्रयोजन के लिए, अविधिमान्य नहीं समझी जाएगी ।
(4) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, सभी या किसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग के लिए अथवा भाण्डागारों के किसी वर्ग के लिए, उपधारा (1) में यथाविनिर्दिष्ट किन्हीं विशिष्टियों में जोड़ सकेगा, उन्हें हटा सकेगा या उनको उपांतरित कर सकेगा ।
12. भाण्डागार रसीदों की परक्राम्यता-(1) परक्राम्य भाण्डागार रसीद में उसकी परक्राम्यता को सीमित करने वाले शब्द शून्य होंगे ।
(2) भाण्डागारपाल जो अपरक्राम्य भाण्डागार रसीद जारी करता है, उसके मुखपृष्ठ पर स्पष्ट रूप से अंग्रेजी में नॉन-नेगोसिएबल" या नॉट-नेगोसिएबल" शब्द, अंग्रेजी में या उस भाषा में, जिसमें यह जारी की गई है, चिह्नित कराएगा ।
(3) उपधारा (2) के अननुपालन की दशा में भाण्डागार रसीद का कोई धारक, जो उसे परक्राम्य भाण्डागार रसीद मानते हुए मूल्यवान प्रतिफल के लिए, क्रय करता है तो वह अपने विकल्प पर उस रसीद को किसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद से संबद्ध सभी अधिकार निहित करने वाली और भाण्डागारपाल पर वही दायित्व अधिरोपित करने वाली मान सकेगा जो उसे उस समय उपगत होते जब रसीद परक्राम्य भाण्डागार रसीद होती और भाण्डागारपाल तद्नुसार दायी होगा ।
(4) कोई परक्राम्य भाण्डागार रसीद, उस माल की जिसके लिए यह जारी की जाती है, घोषित पुलिन अवधि के अवसान की तारीख तक परिदान के लिए विधिमान्य होगी ।
13. परिदान द्वारा भाण्डागार रसीद का परक्रामण-परक्राम्य भाण्डागार रसीद इसके परिदान द्वारा परक्रामित की जा सकेगी यदि रसीद के निबंधनों द्वारा भाण्डागारपाल, नामित व्यक्ति के आदेश से माल का परिदान करने का वचन देता है और उस व्यक्ति या किसी पश्चात्वर्ती पृष्ठांकिती ने उसको पृष्ठांकित किया है ।
14. पृष्ठांकन के बिना परक्राम्य भाण्डागार रसीदों का अंतरण-जहां कोई परक्राम्य रसीद, परिदान द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के लिए अंतरित की जाती है, और अंतरक का पृष्ठांकन परक्रामण के लिए आवश्यक है वहां अंतरिती, अंतरक के विरुद्ध उस रसीद को पृष्ठांकित करने के लिए बाध्य करने का अधिकार अर्जित करता है जब तक कि कोई प्रतिकूल आशय प्रकट नहीं होता है और परक्रामण उस समय प्रभावी हो जाता है जब पृष्ठांकन किया जाता है ।
15. भाण्डागार रसीद के परक्रामण पर वारंटी-ऐसा व्यक्ति जो मूल्यवान प्रतिफल के लिए, पृष्ठांकन और परिदान द्वारा, किसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद का परक्रामण करता है, जिसके अंतर्गत वह भी सम्मिलित है जो मूल्यवान प्रतिफल के लिए रसीद द्वारा प्रत्याभूत दावा समनुदेशित करता है, जब तक कि कोई प्रतिकूल आशय प्रकट न हो, निम्नलिखित की वारंटी देता है कि: -
(क) रसीद असली है;
(ख) व्यक्ति के पास परक्रामण करने या उसे अंतरित करने का विधिक अधिकार है;
(ग) व्यक्ति को किसी ऐसे तथ्य का ज्ञान नहीं है जो रसीद की विधिमान्यता को कम करता हो;
(घ) व्यक्ति के पास माल के हक के अंतरण का अधिकार है; और
(ङ) माल वाणिज्यिक है या किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए उपयुक्त है जब वे वारंटियां अंतर्निहित हों यदि पक्षकारों की संविदा, उसके द्वारा प्रस्तुत किए गए माल का रसीद के बिना अंतरण करने के लिए थी ।
16. पृष्ठांकनकर्ता का दायित्व न होना-रसीद का पृष्ठांकन, पृष्ठांकनकर्ता को, भाण्डागारपाल या रसीद के पूर्ववर्ती पृष्ठांकनकर्ता की ओर से किसी असफलता के लिए उनकी संबंधित बाध्यताओं को पूरा करने के लिए दायी नहीं बनाएगा ।
17. कपट, भूल या विबाध्यता द्वारा भाण्डागार रसीद की परक्राम्यता का कम न होना-रसीद के परक्राम्य की विधिमान्यता इस तथ्य से कम नहीं होगी कि: -
(क) परक्रामण, परक्रामण करने वाले व्यक्ति की ओर से कर्तव्य का उल्लंघन था; या
(ख) रसीद के स्वामी को, कपट, भूल या विबाध्यता द्वारा उस व्यक्ति को रसीद का कब्जा या अभिरक्षा सौंपने के लिए उत्प्रेरित किया गया था, यदि उस व्यक्ति ने जिसको रसीद परक्रामित की गई थी या उस व्यक्ति ने, जिसको रसीद बाद में परक्रामित की गई थी, कर्तव्य के उल्लंघन, कपट, भूल या विबाध्यता को जाने बिना, मूल्य का संदाय कर दिया है ।
18. भाण्डागार रसीदों का पश्चात्वर्ती परक्रामण-यदि कोई व्यक्ति ऐसे माल का, जो किसी भाण्डागारपाल की अभिरक्षा में है और जिसके लिए परक्राम्य रसीद जारी कर दी गई है, विक्रय करने, उसे बंधक या गिरवी रखने के पश्चात्, परक्राम्य रसीद पर कब्जा बनाए रखता है तो उस व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के लिए और पूर्ववर्ती विक्रय, बंधक या गिरवी की सूचना के बिना सद्भावपूर्वक रसीद प्राप्त करने वाले व्यक्ति को माल के किसी विक्रय या अन्य व्ययन के अधीन उस माल के पश्चात्वर्ती परक्रामण का वही प्रभाव होगा मानो स्त्र्यथास्थितिऱ् माल के किसी पूर्ववर्ती क्रेता, बंधकदार या गिरवीदार ने पश्चात्वर्ती परक्रामण को स्पष्ट रूप से प्राधिकृत कर दिया था ।
19. माल का देय प्रभारों का संदाय करने के पश्चात् परिदान किया जाना-जब किसी माल के संबंध में, कोई परक्राम्य भाण्डागार रसीद जारी कर दी गई है, तब भाण्डागारपाल जमाकर्ता या पृष्ठांकिती को माल का तब तक परिदान नहीं करेगा जब तक कि अभिरक्षक को आरंभिक जमा करने की तारीख से परिदान किए जाने की तारीख तक के लिए देय प्रभारों का संदाय नहीं कर दिया जाता है और परक्राम्य भाण्डागार रसीद रद्दकरण के लिए अभ्यर्पित नहीं कर दी जाती है ।
20. अपरक्राम्य रसीदों का अंतरण-(1) अपराक्राम्य भाण्डागार रसीद, धारक द्वारा निष्पादित लेख द्वारा, माल के क्रेता या आदाता को परिदान द्वारा, धारक द्वारा अंतरित की जा सकेगी ।
(2) कोई व्यक्ति, जिसको किसी अपरक्राम्य भाण्डागार रसीद के अंतर्गत आने वाले माल को अंतरित किया जाता है, -
(क) माल के अंतरक का हक अर्जित कर लेता है; और
(ख) रसीद या उसकी अनुलिपि को भाण्डागारपाल के पास जमा करने का या भाण्डागारपाल को अंतरण की लिखित में सूचना देने का अधिकार अर्जित कर लेता है ।
(3) अंतरक, माल का अंतरण जमा कर देने पर और अंतरण की लिखित सूचना देने पर और भाण्डागारपाल को अंतरण का सत्यापन करने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् रसीद के निबंधनों के अनुसार, उसके लिए माल को भण्डारण में रखने की भाण्डागारपाल की बाध्यता का फायदा अर्जित करेगा ।
21. परक्राम्य भाण्डागार रसीद की निश्चायकता-किसी ऐसे धारक के पास, जिसने मूल्यवान प्रतिफल के लिए परक्राम्य भाण्डागार रसीद क्रय की है, वह, भाण्डागारपाल या उसके माध्यम से दावा करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध उसमें वर्णित माल के लिए निश्चायक साक्ष्य होगा ।
22. कतिपय दशाओं में उपधारणा-परक्राम्य भाण्डागार रसीद के पृष्ठांकनकर्ता और उसके पृष्ठांकिती के बीच किसी विवाद में जब तक अन्यथा साबित नहीं हो जाता है यह उपधारणा की जाएगी कि-
(क) पृष्ठांकन स्वेच्छया से किया गया है;
(ख) पृष्ठांकन पूर्ण प्रतिफल के लिए किया गया है;
(ग) पृष्ठांकनकर्ता को रसीद में वर्णित माल पर पूर्ण विधिक हक था; और
(घ) पृष्ठांकन ने, माल में पृष्ठांकनकर्ता के सभी अधिकारों, हक और हित का निर्वापन कर दिया है ।
23. अनुलिपि रसीद का जारी किया जाना-(1) कोई भाण्डागारपाल उस मात्रा, क्वालिटी या श्रेणी और अन्य विशिष्टियों के, जो रसीद में उल्लिखित की जाएं, माल को वास्तव में प्राप्त किए बिना कोई भाण्डागार रसीद जारी नहीं करेगा ।
(2) कोई भाण्डागारपाल, किसी व्यक्ति द्वारा जमा किए गए एक ही माल के लिए एक से अधिक रसीद जारी नहीं करेगा:
परन्तु किसी हानि या नष्ट होने की दशा में, कोई अनुलिपि रसीद, ऐसी रीति में, जो प्राधिकरण द्वारा विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, जारी की जा सकेगी ।
(3) यदि भाण्डागारपाल उपधारा (2) के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है तो वह ऐसे किसी व्यक्ति को, जिसने मूल्यवान प्रतिफल के लिए ऐसी रसीद पर उसके मूल होने का विश्वास करते हुए संव्यवहार किया है भले ही संव्यवहार, मूल रसीद के धारक को भाण्डागारपाल द्वारा माल के परिदान के पश्चात् हुआ हो, असफलता के कारण कारित सभी नुकसानियों के लिए दायी होगा ।
(4) वह रसीद जिसके मुखपृष्ठ पर अनुलिपि" शब्द स्पष्ट रूप से चिह्नित किया गया है भाण्डागारपाल द्वारा इस बात का निरूपण और वारंटी है कि वह समुचित रूप से जारी की गई और भाण्डागार रसीद की अनुलिपि जारी करने की तारीख को रद्द न की गई रसीद की एक सही प्रति है ।
अध्याय 5
भाण्डागारण विकास और विनियामक प्राधिकरण
24. प्राधिकरण की स्थापना और निगमन-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, भाण्डागारण विकास और विनियामक प्राधिकरण के नाम से ज्ञात प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और उसको समनुदेशित कृत्यों का पालन करेगा ।
(2) प्राधिकरण, पूर्वोक्त नाम का, शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की, तथा संविदा करने की शक्ति होगी और वह उक्त नाम से वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) प्राधिकरण का प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में होगा और प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा ।
25. प्राधिकरण का गठन-प्राधिकरण निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, -
(क) अध्यक्ष; और
(ख) दो से अनधिक अन्य सदस्य,
जो केंद्रीय सरकार द्वारा योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जिन्हें सूची प्रबंधन, बीमा, परिरक्षण, क्वालिटी नियंत्रण, कृषि बैंककारी, वित्त, अर्थशास्त्र, विधि या प्रशासन का विस्तृत ज्ञान और अनुभव हो ।
26. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की पदावधि-(1) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य अपने पद ग्रहण करने की तारीख से, पांच वर्ष से अनधिक की अवधि तक पद धारण करेगा और पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:
परन्तु कोई व्यक्ति पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में पद धारण नहीं करेगा ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य, -
(क) केन्द्रीय सरकार को तीन मास से अन्यून की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा; या
(ख) धारा 27 के उपबंधों के अनुसार उसके पद से हटाया जा सकेगा ।
27. पद से हटाया जाना-(1) केन्द्रीय सरकार, किसी ऐसे सदस्य को पद से हटा सकेगी, -
(क) जो दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है या किसी समय किया गया है; या
(ख) जो सदस्य के रूप में कार्य करने में शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है; या
(ग) जो किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या
(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या
(ङ) जिसने अपने पद का ऐसे दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बने रहना लोकहित के लिए हानिकारक है ।
(2) कोई सदस्य उपधारा (1) के खंड (घ) या खंड (ङ) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे उस विषय में सुने जाने का उचित अवसर प्रदान नहीं कर दिया गया है ।
28. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा अन्य निबंधन और शर्तें-ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, -
(क) अध्यक्ष को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वही होंगी जो भारत सरकार के सचिव की हैं;
(ख) प्राधिकरण के अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वही होंगी जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की हैं ।
29. सदस्यों के भावी नियोजन पर वर्जन-अध्यक्ष और अन्य सदस्य, उनके उस रूप में पद पर न रहने की तारीख से दो वर्ष की अवधि तक भाण्डागारण सेक्टर में किसी अन्य समुत्थान में कोई नियोजन, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय स्वीकार नहीं करेंगे ।
30. अध्यक्ष का प्राधिकरण का मुख्य कार्यपालक होना-अध्यक्ष, प्राधिकरण का मुख्य कार्यपालक होगा ।
31. प्राधिकरण के अधिवेशन-(1) प्राधिकरण का अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
(2) अध्यक्ष या यदि, वह किसी कारण से प्राधिकरण के अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो, उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित अन्य सदस्य, उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(3) प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष या अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का, द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
32. रिक्तियों आदि से प्राधिकरण की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है; अथवा
(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है;
(ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।
33. प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी-(1) प्राधिकरण उतने अधिकारियों और ऐसे अन्य कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किए गए प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा शासित होंगी ।
34. भाण्डागारण सलाहकार समिति-(1) प्राधिकरण, अधिसूचना द्वारा, धारा 51 के अधीन विनियम बनाने से संबंधित विषयों पर प्राधिकरण को सलाह देने के लिए और इस अधिनियम के उपबंधों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सिफारिशें करने के लिए, भाण्डागारण सलाहकार समिति के नाम से ज्ञात एक सीमिति का गठन कर सकेगा ।
(2) भाण्डागारण सलाहकार समिति वाणिज्य, उद्योग, इंजीनियरी, कृषि, उपभोक्ताओं, भाण्डागारण, क्वालिटी नियंत्रण, परिरक्षण में लगे संगठनों और अनुसंधान निकायों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्राधिकरण के सदस्यों को छोड़कर, पंद्रह से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी ।
(3) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, भाण्डागारण सलाहकार समिति, प्राधिकरण को ऐसे अन्य विषयों पर जो उसे प्राधिकरण द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, सलाह दे सकेगी ।
अध्याय 6
प्राधिकरण की शक्तियां और कृत्य
35. प्राधिकरण की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण का यह कर्तव्य होगा कि वह इस अधिनियम के उपबंधों को विनियमित करे और उनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करे तथा भाण्डागार कारबार की व्यवस्थित वृद्धि का संवर्धन करे ।
(2) पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण की शक्तियों और कृत्यों में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे, अर्थात्: -
(क) भाण्डागारपालों के लिए अपेक्षाएं पूरी करने वाले आवेदकों को भाण्डागारों के संबंध में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करना या ऐसे रजिस्ट्रीकरण को नवीकृत करना, उपांतरित करना, वापस लेना, निलंबित करना या रद्द करना;
(ख) प्रत्यायन अभिकरण के रजिस्ट्रीकरण और कृत्यों को विनियमित करना, ऐसे रजिस्ट्रीकरण को नवीकृत करना, उपांतरित करना, वापस लेना, निलंबित या रद्द करना और भाण्डागारों का प्रत्यायन करने के लिए प्रत्यायन अभिकरणों के पदधारियों के लिए आचार संहिता विनिर्दिष्ट करना;
(ग) भाण्डागारपालों और भाण्डागारण कारबार में लगे कर्मचारिवृंद के लिए अर्हताएं, आचार संहिता और व्यावहारिक प्रशिक्षण विनिर्दिष्ट करना;
(घ) भाण्डागार में जमा माल के संबंध में उसके गिरवी रखने, प्रभारों के सृजन और उनके प्रवर्तन की प्रक्रिया विनियमित करना;
(ङ) भाण्डागार कारबार के संचालन में दक्षता का संवर्धन करना;
(च) माल के श्रेणीकरण के लिए प्रमाणकर्ता अभिकरणों के अनुमोदन के लिए मानकों को अधिकथित करने के लिए विनियम बनाना;
(छ) भाण्डागारण कारबार से संबंधित वृत्तिक संगठनों का संवर्धन करना;
(ज) इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए फीसों और अन्य प्रभारों की दर अवधारित करना और उनका उद्ग्रहण;
(झ) भाण्डागारों, प्रत्यायन अभिकरणों और भाण्डागारण कारबार से संबद्ध अन्य संगठनों से सूचना मंगाना, उनका निरीक्षण करना, जांच और अन्वेषण करना जिसके अंतर्गत उनकी संपरीक्षा भी है;
(ञ) उन दरों, लाभों, निबंधनों और शर्तों को विनियमित करना जो भाण्डागारण कारबार के संबंध में भाण्डागारपालों द्वारा प्रस्थापित की जाएं;
(ट) विनियमों द्वारा वह प्ररूप और रीति विनिर्दिष्ट करना जिनमें लेखाबहियां रखी जाएंगी और भाण्डागारपालों द्वारा लेखा विवरण दिए जाएंगे;
(ठ) मध्यस्थों का एक पैनल रखना और भाण्डागारों और भाण्डागार रसीद धारकों के बीच विवादों में ऐसे पैनल से मध्यस्थों को नामनिर्देशित करना;
(ड) भाण्डागारों में जमा किए गए प्रतिमोच्य माल के जमा शेष धारण करने और अंतरण की इलेक्ट्रानिक प्रणाली विनियमित और विकसित करना;
(ढ) रजिस्ट्रीकृत भाण्डागार में कृषि वाणिज्या के भंडारण के लिए आरक्षित रखे जाने के लिए स्थान की न्यूनतम प्रतिशतता अवधारित करना;
(ण) भाण्डागारपाल के कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को विनिर्दिष्ट करना;
(त) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो विहित किए जाएं ।
अध्याय 7
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
36. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त संसद् द्वारा, विधि द्वारा, किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्राधिकरण को ऐसी धनराशियों का अनुदान दे सकेगी जो सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए ठीक समझे ।
37. निधि का गठन-(1) भाण्डागारण विकास और विनियामक प्राधिकरण निधि के नाम से ज्ञात एक निधि का गठन किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा, -
(क) प्राधिकरण को प्राप्त केन्द्रीय सरकार के सभी अनुदान, फीस और प्रभार;
(ख) प्राधिकरण को ऐसे अन्य स्रोत से प्राप्त सभी राशियां जिसका केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चय किया जाए;
(ग) इस अधिनियम के अधीन शास्तियों के रूप में वसूली गई सभी राशियां ।
(2) निधि का उपयोजन निम्नलिखित की पूर्ति के लिए किया जाएगा, अर्थात्: -
(क) प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य पारिश्रमिक;
(ख) प्राधिकरण के कृत्यों के निर्वहन से संबंधित और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उसके अन्य व्यय ।
38. लेखा और संपरीक्षा-(1) प्राधिकरण, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जैसा केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे ।
(2) प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ऐसे अंतरालों पर जो वह विनिर्दिष्ट करे, करेगा और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत व्यय प्राधिकरण द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति के, उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में साधारणतया होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखा, संबंधित वाउचर और अन्य दस्तावेज और कागज पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखपरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा यथा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित प्राधिकरण के लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ हर वर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
39. केन्द्रीय सरकार को विवरणियों, वार्षिक रिपोर्ट आदि का दिया जाना-(1) प्राधिकरण केन्द्रीय सरकार को, भांडागारण उद्योग के संप्रवर्तन और विकास के लिए किसी प्रस्तावित या विद्यमान कार्यक्रम के संबंध में ऐसी विवरणियां, ब्यौरे और ऐसी विशिष्टियां, जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे, ऐसे समय पर तथा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से देगा, जो विहित की जाए या जैसा केन्द्रीय सरकार उसे देने का निदेश दे ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के पश्चात् नौ मास के भीतर पूर्व वित्तीय वर्ष के दौरान भांडागारण कारबार के संप्रवर्तन और विकास के लिए क्रियाकलाप सहित अपने क्रियाकलाप का सही और पूर्ण ब्यौरा देते हुए, एक रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त रिपोर्टों की प्रतियां, उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएंगी ।
अध्याय 8
केन्दीय सरकार की शक्तियां
40. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कृत्यों के पालन में, तकनीकी और प्रशासनिक विषयों से संबंधित प्रश्नों से भिन्न नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में दे:
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई निदेश दिए जाने के पूर्व प्राधिकरण को अपने विचार व्यक्त करने का यावत्साध्य अवसर दिया जाएगा ।
(2) इस बारे में कि कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
41. केन्द्रीय सरकार की प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि किसी समय केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि-
(क) ऐसी परिस्थितियों के कारण, जो प्राधिकरण के नियंत्रण से बाहर हैं, वह इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन या कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है; या
(ख) प्राधिकरण ने केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी निदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों के निर्वहन या कर्तव्यों के पालन में बार-बार व्यतिक्रम किया है और ऐसे व्यतिक्रम के फलस्वरूप प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति या प्राधिकरण के प्रशासन को नुकसान हुआ है; या
(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है, तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा और उन कारणों से जो उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं, छह मास से अनधिक की उतनी अवधि के लिए, जितनी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगी और किसी व्यक्ति को प्राधिकरण के कृत्यों की देखभाल करने के लिए नामनिर्दिष्ट कर सकेगी:
परंतु ऐसी कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण को प्रस्तावित अधिक्रमण के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का उचित अवसर देगी और प्राधिकरण के अभ्यावेदन पर, यदि कोई हो, विचार करेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर-
(क) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के बारे में यह समझा जाएगा कि उन्होंने अधिक्रमण की तारीख से ही, उस रूप में अपने पद रिक्त कर दिए हैं;
(ख) ऐसी सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से प्रयोग या निर्वहन तब तक किया जा सकेगा, जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है, प्रयोग और निर्वहन उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित व्यक्ति द्वारा किया जाएगा;
(ग) प्राधिकरण के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन सभी संपत्ति, तब तक केन्द्रीय सरकार में निहित होगी, जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है ।
(3) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति पर या उसके पूर्व, केन्द्रीय सरकार, उसके अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नई नियुक्ति करके प्राधिकरण का पुनर्गठन करेगी और ऐसी दशा में कोई ऐसा व्यक्ति जिसने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपना पद रिक्त किया था, पुनर्नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझा जाएगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना की एक प्रति और किसी कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट शीघ्रातिशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
(5) इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति को पद से हटाए जाने पर, किसी विधि या किसी संविदा या ज्ञापन या संगम-अनुच्छेद में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, वह व्यक्ति, पद की हानि या पर्यवसान के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
अध्याय 9
अपीलें
42. अपील प्राधिकरण को अपीलें-(1) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन किए गए प्राधिकरण के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त ऐसे व्यक्ति या प्राधिकरण को (जिसे इसमें इसके पश्चात् अपील प्राधिकरण कहा गया है) ऐसे आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर अपील कर सकेगा:
परन्तु अपील साठ दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् किन्तु नब्बे दिन की कुल अवधि के परे नहीं, यदि अपीलार्थी, अपील प्राधिकरण का यह समाधान कर देता है कि उसके पास उक्त अवधि के भतीर अपील न करने का पर्याप्त हेतुक था, ग्रहण की जा सकेगी ।
(2) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप और रीति में की जाएगी और उसके साथ उस आदेश की एक प्रति, जिसके विरुद्ध अपील की गई है और ऐसी फीस, जो विहित की जाए, दी जाएगी ।
(3) किसी अपील को निपटाने की प्रक्रिया ऐसी होगी जो विहित की जाए:
परन्तु अपील किए जाने से पूर्व अपीलार्थी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।
(4) अपील प्राधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील की यथासंभवशीघ्र सुनवाई की जाएगी और उसका निपटारा किया जाएगा तथा अपील का, इसके फाइल किए जाने की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर अंतिम रूप से निपटारा किए जाने का प्रयास किया जाएगा ।
अध्याय 10
अपराध और शास्तियां
43. अपराध और शास्तियां-(1) कोई भाण्डागारपाल, जानते हुए अपने भाण्डागार में माल का वास्तविक भौतिक परिदान लिए बिना परक्राम्य भाण्डागार रसीद जारी करेगा या भाण्डागारपाल या भाण्डागारपाल का अभिकर्ता या सेवक जो अपना इस बारे में युक्तियुक्त समाधान किए बिना भाण्डागार रसीद जारी करेगा कि वह माल जिसके लिए ऐसी भाण्डागार रसीद जारी की गई है, वास्तव में प्राप्त किया गया है माल की संख्या, भार या श्रेणी भाण्डागार रसीद में विनिर्दिष्ट संख्या, भार या श्रेणी के अनुरूप है या माल ऐसी भाण्डागार रसीद जारी करने के समय उसके वास्तविक नियंत्रण में है, एक अपराध कारित करेगा और वह, कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो माल के मूल्य के चार गुने तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) भाण्डागारपाल या भाण्डागारपाल का अभिकर्ता या सेवक, जो जानते हुए परक्राम्य भाण्डागार रसीद की अनुलिपि जारी करने के लिए प्रक्रिया का सारवान् रूप से पालन किए बिना परक्राम्य भाण्डागार रसीद की अनुलिपि जारी करेगा तो वह, एक अपराध कारित करेगा और ऐसे अपराध के लिए कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा ।
(3) भाण्डागारपाल या भाण्डागारपाल का अभिकर्ता या सेवक, जो जानते हुए कि ऐसे माल के संबंध में परक्राम्य भाण्डागार रसीद बकाया है और रद्द नहीं की गई है, ऐसे परिदान के समय या उससे पूर्व ऐसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद का कब्जा अभिप्राप्त किए बिना माल का परिदान करेगा और जिससे किसी व्यक्ति को विधिविरुद्ध हानि या अभिलाभ होता है तो वह, अपराध कारित करेगा और ऐसे अपराध के लिए कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(4) भाण्डागारपाल जो जमाकर्ता या पृष्ठांकिती द्वारा किसी परक्राम्य भाण्डागार रसीद के अभ्यर्पण पर और अपने सभी विधिपूर्ण प्रभारों के संदाय पर और रसीद प्रदर्शित किए गए माल के परिदान के लिए उसमें वर्णित माल की घोषित पुलिन अवधि के भीतर रसीद पर पृष्ठांकित विल्लंगमों को रद्द करने में असफल रहेगा, अपराध कारित करेगा और ऐसे अपराध के लिए कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो माल के मूल्य के तीन गुने तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(5) कोई जमाकर्ता, जिसने भाण्डागारपाल के पास भंडारण के लिए उसके द्वारा परिदत्त माल के मूल्य के रूप में ऐसी रकम, जिसको वह उचित मूल्य का होना विश्वास नहीं करता है, घोषित किया है, एक अपराध कारित करेगा और ऐसे अपराध के लिए जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
44. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां, इस अध्याय के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो, अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी का भारसाधक था या, यथास्थिति, जमा करने के लिए उत्तरदायी था, अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि उल्लंघन, उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अध्याय के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कोई फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और
(ख) किसी फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है ।
45. न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान प्राधिकरण द्वारा, या प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त लिखित में प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा किए गए किसी परिवाद के सिवाय, नहीं करेगा ।
(2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
अध्याय 11
प्रकीर्ण
46. प्राधिकरण के अध्यक्ष, सदस्य, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण और अपील प्राधिकरण के अध्यक्ष, सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के बारे में, जब वे इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में कार्य कर रहे हैं या उनका कार्य करना तात्पर्यित है, यह समझा जाएगा कि वे भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के भीतर लोक सेवक है ।
47. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी:
परंतु इस अधिनियम की किसी बात से किसी व्यक्ति को, किसी वाद या अन्य कार्यवाहियों से, जो इस अधिनियम के अतिरिक्त उसके विरुद्ध की जा सकेगी, छूट प्राप्त नहीं होगी ।
48. शक्तियों का प्रत्यायोजन-प्राधिकरण, लिखित, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्राधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों और कृत्यों को (धारा 51 के अधीन विनियम बनाने की शक्ति को छोड़कर) जो वह आवश्यक समझे प्रत्यायोजित कर सकेगा ।
49. धन और आय पर कर से छूट-धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या धन, आय, लाभ या अभिलाभ पर कर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण, अपने व्युत्पन्न धन, आय, लाभ या अभिलाभ के संबंध में धन-कर, आय-कर या किसी अन्य कर का, संदाय करने का दायी नहीं होगा ।
50. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) वह प्ररूप और रीति जिसमें परक्राम्य भाण्डागार रसीदें जारी करने के भाण्डागारण कारबार को प्रारंभ करने या कारबार के लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकेगा और वह फीस जो धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन ऐसे आवेदन के साथ दी जाएगी;
(ख) वह प्ररूप, जिसमें भाण्डागार के रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र, धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन जारी किया जा सकेगा;
(ग) वित्तीय, प्रबंधकीय और अन्य पात्रता मानदंड और सक्षमता जिनका कोई आवेदक, भाण्डागारों के रजिस्ट्रीकरण के लिए, धारा 4 की उपधारा (4) के अधीन समाधान करेगा;
(घ) वह अर्हता और अन्य अपेक्षाएं, जिनको प्रत्यायन अभिकरण के रूप में कार्य करने के लिए आवेदन करने वाला कोई व्यक्ति धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन पूरा करेगा;
(ङ) वह प्ररूप और रीति, जिसमें प्रत्यायन अभिकरण के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किया जा सकेगा और वह फीस, जो धारा 5 की उपधारा (3) के अधीन ऐसे आवेदन के साथ दी जाएगी;
(च) धारा 5 की उपधारा (4) के अधीन प्रत्यायन अभिकरण के रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र का प्ररूप;
(छ) धारा 28 के अधीन अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
(ज) ऐसी अन्य शक्तियां, जो प्राधिकरण द्वारा धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (त) के अधीन प्रयोग की जाएं;
(झ) धारा 38 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण द्वारा रखे जाने वाले लेखाओं के वार्षिक विवरण के अनुरक्षण का प्ररूप और रीति;
(ञ) वह प्ररूप और रीति जिसमें तथा वह समय जिसके भीतर प्राधिकरण द्वारा केन्द्रीय सरकार को धारा 39 की उपधारा (1) के अधीन विवरणियां और विवरण तथा विशिष्टियां प्रस्तुत की जानी हैं;
(ट) वह प्ररूप और रीति, जिसमें अपील प्राधिकरण को कोई अपील की जा सकेगी और वह फीस, जो धारा 42 की उपधारा (2) के अधीन ऐसी अपील के साथ दी जाएगी;
(ठ) धारा 42 की उपधारा (3) के अधीन किसी अपील का निपटारा करने में अपील प्राधिकरण द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;
(ड) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए या जिसके संबंध में नियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।
51. प्राधिकरण की विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और भाण्डागार सलाहकार समिति के परामर्श से, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम अधिसूचना द्वारा बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन प्रत्यायन अभिकरणों के प्राधिकारियों को विनियमित करने वाले विषय;
(ख) वह प्ररूप और रीति तथा वह अवधि जिसके लिए भांडागारपाल, धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन, भाण्डागारण कारबार के अभिलेख और लेखे रखेगा;
(ग) धारा 9 की उपधारा (7) के अधीन भाण्डागारपाल द्वारा माल या उसके किसी भाग के व्ययन की रीति और किसी निलंब लेखा में विक्रय आगमों का रखा जाना;
(घ) धारा 10 की उपधारा (10) के अधीन विक्रय का ढंग;
(ङ) धारा 23 की उपधारा (2) के पंरतुक के अधीन अनुलिपि भाण्डागार रसीद जारी करने की रीति;
(च) धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के अधिवेशनों के समय और स्थान तथा ऐसे अधिवेशनों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया जिसके अंतर्गत कारबार के संव्यवहार के लिए आवश्यक गणपूर्ति है;
(छ) धारा 33 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें;
(ज) धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन प्रत्यायन अभिकरणों के रजिस्ट्रीकरण और कृत्य, ऐसे रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण, उपांतरण, वापस लेने, निलंबन या रद्दकरण करने और भाण्डागारों के प्रत्यायन के लिए प्रत्यायन अभिकरणों के पदधारियों के लिए आचार संहिता;
(झ) धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (च) के अधीन माल के श्रेणीकरण के लिए प्रमाणकर्ता अभिकरणों के अनुमोदन के लिए मानक;
(ञ) धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए उद्गृहीत की जाने वाली फीस और अन्य प्रभारों की दर;
(ट) कोई अन्य विषय, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है या विनिर्दिष्ट किया जाए या जिसके संबंध में विनियमों द्वारा उपबंध बनाए जाने हैं या बनाए जाएं ।
52. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम और प्राधिकरण द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह नियम या विनियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत जो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उनके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
53. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंधों का, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के कारण प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
54. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के ऐसे उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित ऐसे आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
55. 1899 के अधिनियम 2 का संशोधन-भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 8ख के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी: -
8ग. परक्राम्य भाण्डागार रसीदों का स्टाम्प शुल्क के दायित्वाधीन न होना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, परक्राम्य भाण्डागार रसीदें, स्टाम्प शुल्क के दायित्वाधीन नहीं होगी ।" ।
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