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वक्फ अधिनियम, 1995 ( Waqf Act, 1995 )


 

वक्फ अधिनियम, 1995

(1995 का अधिनियम संख्यांक 43)

[22 नवम्बर, 1995]

[ओक़ाफ़] के बेहतर और प्रशासन और उनसे संबंधित

 या आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के छियालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम  [वक्फ] अधिनियम, 1995 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह किसी राज्य में उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे तथा किसी राज्य के भीतर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिए और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी, और किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का किसी राज्य या उसमें के किसी क्षेत्र के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसे राज्य या क्षेत्र में उस उपबंध के प्रारंभ के प्रति निर्देश है ।

2. अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम के अधीन अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, यह अधिनियम सभी ओक़ाफ़ को लागू होगा, चाहे वे इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् सृष्ट किए गए हों :

परन्तु इस अधिनियम की कोई बात दरगाह ख्वाजा साहिब, अजमेर को लागू नहीं होगी जिसको दरगाह ख्वाजा साहिब अधिनियम, 1955 (1955 का 36) लागू होता है ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) हिताधिकारी" से कोई व्यक्ति या ऐसा उद्देश्य अभिप्रेत है जिसके फायदे के लिए वक्फ सृष्ट किया जाता है, और इसके अन्तर्गत धार्मिक, पवित्र और पूर्त उद्देश्य तथा कोई अन्य लोकोपयोगी उद्देश्य है जो मुस्लिम विधि द्वारा स्वीकृत है ;

(ख) फायदा" के अन्तर्गत कोई ऐसा फायदा नहीं आता है जिसका दावा करने के लिए कोई मुतवल्ली, केवल ऐसा मुतवल्ली होने के कारण हकदार है ;

(ग) बोर्ड" से धारा 13 की, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन स्थापित वक्फ बोर्ड अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत धारा 106 के अधीन स्थापित सामान्य वक्फ बोर्ड है ;

(घ) मुख्य कार्यपालक अधिकारी" से धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त मुख्य कार्यपालक अधिकारी अभिप्रेत है ;

(ङ) परिषद्" से धारा 9 के अधीन स्थापित केन्द्रीय वक्फ परिषद् अभिप्रेत है ;

 [(ङङ) अधिक्रमणकर्ता" से वक्फ संपत्ति का विधि के प्राधिकार के बिना संपूर्ण या भागतः, अधिभोग करने वाला कोई व्यक्ति अथवा संस्था, सार्वजनिक या निजी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है, जिसकी अभिधृति, पट्टा या अनुज्ञप्ति समाप्त हो गई है या मुतवल्ली या बोर्ड द्वारा पर्यवसित कर दी गई है ;]

(च) कार्यपालक अधिकारी" से धारा 38 की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड द्वारा नियुक्त किया गया कार्यपालक अधिकारी अभिप्रेत है ;

 

 [(छ) ओक़ाफ़ की सूची" से धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन प्रकाशित या धारा 37 के अधीन रखे गए ओक़ाफ़ के रजिस्टर में अंतर्विष्ट ओक़ाफ़ की सूची अभिप्रेत है ;]

(ज) सदस्य" से बोर्ड का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष है ;

(झ) मुतवल्ली" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो मौखिक रूप से अथवा किसी ऐसे विलेख या लिखत के अधीन जिसके द्वारा कोई वक्फ सृष्ट किया गया है अथवा किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा किसी वक्फ का मुतवल्ली नियुक्त किया गया है और इसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति है जो किसी रूढ़ि के आधार पर किसी वक्फ का मुतवल्ली है या जो नायब मुतवल्ली, खादिम, मुजावर, सज्जदानशीन, अमीन या मुतवल्ली के कर्तव्यों का पालन करने के लिए मुतवल्ली द्वारा नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति तथा इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई व्यक्ति, समिति या निगम है, जो तत्समय किसी वक्फ या वक्फ संपत्ति का प्रबंध या प्रशासन कर रहा है :

परन्तु किसी समिति या निगम के किसी सदस्य के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह मुतवल्ली है जब तक कि ऐसा सदस्य ऐसी किसी समिति या निगम का पदाधिकारी नहीं है :   

 [परंतु यह और कि मुतवल्ली" भारत का नागरिक होगा और ऐसी अन्य अर्हताएं पूरी करेगा, जो विहित की जाएं :

परंतु यह भी कि यदि वक्फ में कोई अर्हताएं विनिर्दिष्ट की हैं तो ऐसी अर्हताएं, उन नियमों में उपबंधित की जा सकेंगी, जो राज्य सरकार द्वारा बनाए जाएं ;]

(ञ) किसी वक्फ के संबंध में, शुद्ध वार्षिक आय" से धारा 72 की उपधारा (1) के स्पष्टीकरणों के उपबंधों के अनुसार अवधारित शुद्ध वार्षिक आय अभिप्रेत है ;

(ट) वक्फ में हितबद्ध व्यक्ति" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो वक्फ से कोई धन-संबंधी या अन्य फायदे प्राप्त करने का हकदार है और इसके अन्तर्गत है,-

(i) कोई ऐसा व्यक्ति जिसे वक्फ से संबंधित किसी मस्जिद, ईदगाह, इमामबाड़ा, दरगाह,1[ख़ानक़ाह, पीरख़ाना और कर्बलाट मकबरा, कब्रिस्तान या किसी अन्य धार्मिक संस्था में 1[नमाज अदा] करने या कोई धार्मिक कृत्य करने अथवा वक्फ के अधीन किसी धार्मिक या पूर्त संस्था में भाग लेने का अधिकार है ;

(ii) वाक़िफ़ तथा वाक़िफ़ का कोई वंशज और मुतवल्ली ;

                                (ठ) विहित" से अध्याय 3 के सिवाय, राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

                                (ड) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ;

                                (ढ) शिया वक्फ" से शिया विधि द्वारा शासित वक्फ अभिप्रेत है ;

                                (ण) सुन्नी वक्फ" से सुन्नी विधि द्वारा शासित वक्फ अभिप्रेत है ;

                (त) सर्वेक्षण आयुक्त" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अपर वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त या सहायक वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त है ;

(थ) किसी क्षेत्र के संबंध में, अधिकरण" से धारा 83 की उपधारा (1) के अधीन गठित ऐसा अधिकरण अभिप्रेत है, जिसको उस क्षेत्र के संबंध में अधिकारिता है ;

1[(द) वक्फ" से किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे प्रयोजन के लिए जो मुस्लिम विधि द्वारा पवित्र, धार्मिक या पूर्त माना गया है, किसी जंगम या स्थावर संपत्ति का स्थायी समर्पण अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत है :-

(i) उपयोगकर्ता द्वारा कोई वक्फ किन्तु ऐसे वक्फ का केवल इस कारण वक्फ होना समाप्त नहीं हो जाएगा कि उसका उपयोग करने वाला समाप्त हो गया है चाहे ऐसी समाप्ति की अवधि कुछ भी हो ;

(ii) कोई शामलात पट्टी, शामलात देह, जुमला मलक्कन या राजस्व अभिलेख में दर्ज कोई अन्य नाम;

(iii) अनुदान" जिसके अंतर्गत किसी प्रयोजन के लिए मशरत-उल-खिदमत भी है, जिन्हें मुस्िलम विधि द्वारा पवित्र, धार्मिक या पूर्त माना गया है ; और

(iv) वक्फ-अलल-औलाद वहां तक जहां तक कि संपत्ति का समर्पण किसी ऐसे प्रयोजन के लिए किया गया है जो मुस्िलम विधि द्वारा पवित्र, धार्मिक या पूर्त माना गया है, परंतु जब कोई उत्तराधिकारी नहीं रह जाता है तो वक्फ की आय शिक्षा, विकास, कल्याण और मुस्लिम विधि द्वारा यथा मान्यताप्राप्त ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए खर्च की जाएगी,

और वाक़िफ़" से ऐसा समर्पण करने वाला कोई व्यक्ति अभिप्रेत है ;]

(v) वक्फ विलेख" से कोई ऐसा विलेख या लिखत अभिप्रेत है जिसके द्वारा कोई वक्फ सृष्ट किया गया है और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा विधिमान्य पश्चात्वर्ती विलेख या लिखत है जिसके द्वारा मूल समर्पण के किसी निबंधन में परिवर्तन किया गया है ;

                                (न) वक्फ निधि" से धारा 77 की उपधारा (1) के अधीन बनाई गई वक्फ निधि अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

ओक़ाफ़ का सर्वेक्षण

4. ओक़ाफ़ का प्रारंभिक सर्वेक्षण-(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, राज्य के लिए एक वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त और इतने अपर वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त या सहायक वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त कर सकेगी जितने [राज्य में ओक़ाफ़ का] सर्वेक्षण करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों ।

 [(1क) प्रत्येक राज्य सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट ओक़ाफ़ की सूची रखेगी और ओक़ाफ़ का सर्वेक्षण, यदि ऐसा सर्वेक्षण वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 के प्रारंभ से पूर्व नहीं किया गया था, तो वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष की अवधि से भीतर पूरा किया जाएगा :

परंतु जहां वक्फ का कोई सर्वेक्षण आयुक्त नियुक्त नहीं किया गया है, वहां ऐसे प्रारंभ की तारीख से तीन मास के भीतर ओक़ाफ़ के लिए एक सर्वेक्षण आयुक्त नियुक्त किया जाएगा ।]

(2) सभी अपर वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त और सहायक वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन, वक्फ सर्वेक्षण आयुक्त के साधारण पर्यवेक्षण और नियंत्रण के अधीन करेंगे ।

(3) सर्वेक्षण आयुक्त, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को राज्य में या उसके किसी भाग में विद्यमान वक्फ की बाबत अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा जिसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात् :-

                (क) राज्य में ओक़ाफ़ की संख्या जिसमें शिया वक्फ और सुन्नी वक्फ अलग-अलग दर्शित किए जाएंगे ;

                (ख) प्रत्येक वक्फ का स्वरूप और उद्देश्य ;

                (ग) प्रत्येक वक्फ में समाविष्ट संपत्ति की सकल आय ;

                (घ) प्रत्येक वक्फ की बाबत देय भू-राजस्व, उपकरों, रेटों और करों की रकम ;

                (ङ) प्रत्येक वक्फ की आय की वसूली करने में उपगत व्यय तथा मुतवल्ली का वेतन या अन्य पारिश्रमिक ; और

                (च) प्रत्येक वक्फ के संबंध में ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं ।

(4) सर्वेक्षण आयुक्त को, कोई जांच करते समय निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्ितयां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-

                (क) किसी साक्षी को समन करना और उसकी परीक्षा करना ;

                (ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण किए जाने और पेश किए जाने की अपेक्षा करना ;

                (ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अपेक्षा करना ;

                (घ) किसी साक्षी या लेखाओं की परीक्षा करने के लिए कमीशन निकालना ;

                (ङ) कोई स्थानीय निरीक्षण या स्थानीय अन्वेषण करना ;

                (च) ऐसे अन्य विषय जो विहित किए जाएं ।

(5) यदि, ऐसी किसी जांच के दौरान, इस बारे में कोई विवाद उत्पन्न हो जाता है कि कोई विशिष्ट वक्फ शिया वक्फ है या सुन्नी वक्फ के और वक्फ विलेख में उसके स्वरूप के बारे में स्पष्ट संकेत है तो विवाद का विनिश्चय ऐसे विलेख के आधार पर किया जाएगा ।

(6) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, सर्वेक्षण आयुक्त को राज्य में वक्फ संपत्तियों का द्वितीय या पश्चात्वर्ती सर्वेक्षण करने के लिए निदेश दे सकेगी तथा उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंध ऐसे सर्वेक्षण को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उपधारा (1) के अधीन निर्दिष्ट सर्वेक्षण को लागू होते हैं :

परन्तु ऐसा कोई द्वितीय या पश्चात्वर्ती सर्वेक्षण तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उस तारीख से, जिसकी ठीक पूर्ववर्ती सर्वेक्षण के संबंध में उपधारा (3) के अधीन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी, [दस वर्ष] की अवधि समाप्त नहीं हो जाती है :

 [परन्तु यह और कि पहले से अधिसूचित वक्फ सम्पत्तियों की बाद के सर्वेक्षण में पुनः समीक्षा नहीं की जाएगी सिवाय उस मामले में जहां ऐसी सम्पत्ति की स्थिति किसी विधि के उपबंधों के अनुसार परिवर्तित हो गई है ।]

5. ओक़ाफ़ की सूची का प्रकाशन-(1) धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर, राज्य सरकार, उसकी प्रति बोर्ड को भेजेगी ।

(2) बोर्ड, उपधारा (1) के अधीन उसे भेजी गई रिपोर्ट की परीक्षा करेगा और उस राज्य के सुन्नी ओक़ाफ़ या शिया ओक़ाफ़ की [सूची राजपत्र में प्रकाशन के लिए छह मास की अवधि के भीतर उसे सरकार को वापस भेजेगा] जिससे यह रिपोर्ट संबंधित है, चाहे वे इस अधिनियम के प्रारंभ पर विद्यमान हों या उसके पश्चात् अस्तित्व में आये हों और उसमें ऐसी अन्य विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं ।

 [(3) राजस्व प्राधिकारी-

(i) भूमि अभिलेखों को अद्यतन करते समय उपधारा (2) में निर्दिष्ट ओक़ाफ़ की सूची सम्मिलित करेंगे; और

(ii) भूमि अभिलेखों में नामांतरण विनिश्चित करते समय उपधारा (2) में निर्दिष्ट ओक़ाफ़ की सूची पर विचार करेंगे ।

(4) राज्य सरकार, उपधारा (2) के अधीन समय-समय पर प्रकाशित सूचियों का अभिलेख रखेगी ।]

6. ओक़ाफ़ से संबंधित विवाद-(1) यदि यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि कोई विशिष्ट संपत्ति, जो ओक़ाफ़ की सूची में वक्फ संपत्ति के रूप में विनिर्दिष्ट है, वक्फ संपत्ति है या नहीं अथवा ऐसी सूची में विनिर्दिष्ट कोई वक्फ, शिया वक्फ है या सुन्नी वक्फ तो बोर्ड या वक्फ का मुतवल्ली अथवा  [व्यथित कोई व्यक्ति,] उस प्रश्न के विनिश्चय के लिए अधिकरण में वाद संस्थित कर सकेगा और उस विषय की बाबत उस अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा :

परन्तु अधिकरण द्वारा बोर्ड कोई ऐसा वाद, ओक़ाफ़ की सूची के प्रकाशन की तारीख से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण नहीं किया जाएगा:

 [परंतु यह और कि धारा 4 की उपधारा (6) में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसरण में दूसरे या पश्चात्वर्ती सर्वेक्षण में अधिसूचित ऐसी संपत्तियों की बाबत अधिकरण के समक्ष कोई वाद संस्थित नहीं किया जाएगा ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, किसी वक्फ की बाबत इस अधिनियम के अधीन कोई कार्यवाही, ऐसे किसी वाद के अथवा ऐसे वाद से उत्पन्न होने वाली किसी अपील या किसी अन्य कार्यवाही के लंबित रहने के कारण ही रोकी नहीं जाएगी ।

(3) सर्वेक्षण आयुक्त को, उपधारा (1) के अधीन किसी वाद का पक्षकार नहीं बनाया जाएगा और इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही उसके विरुद्ध नहीं होगी ।

(4) ओक़ाफ़ की सूची, जब तक कि उसमें उपधारा (1) के अधीन अधिकरण के विनिश्चय के अनुसरण में परिवर्तन नहीं किया जाता है, अंतिम और निश्चायक होगी ।

(5) किसी राज्य में इस अधिनियम के प्रारंभ से ही, कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी प्रश्न के संबंध में उस राज्य में किसी न्यायालय में संस्थित या प्रारंभ नहीं की जाएगी ।

7. ओक़ाफ़ से संबंधित विवादों का अवधारण करने की अधिकरण की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात्  [कोई प्रश्न या विवाद] उत्पन्न होता है कि कोई विशिष्ट संपत्ति, जो ओक़ाफ़ की सूची में वक्फ संपत्ति के रूप में विनिर्दिष्ट है, वक्फ संपत्ति है या नहीं अथवा ऐसी सूची में विनिर्दिष्ट कोई वक्फ शिया वक्फ है या सुन्नी वक्फ तो बोर्ड या वक्फ का मुतवल्ली 8[अथवा धारा 5 के अधीन ओक़ाफ़ की सूची के प्रकाशन से व्यथित कोई व्यक्ति] इस प्रश्न के विनिश्चय के लिए ऐसी संपत्ति के संबंध में अधिकारिता रखने वाले अधिकरण को आवेदन कर सकेगा और उस पर अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा :

परन्तु-

(क) राज्य के किसी भाग से संबंधित और इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् प्रकाशित ओक़ाफ़ की सूची की दशा में, कोई ऐसा आवेदन ओक़ाफ़ की सूची के प्रकाशन की तारीख से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण नहीं किया जाएगा ; और

(ख) राज्य के किसी भाग से संबंधित और इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पहले एक वर्ष की अवधि के भीतर किसी भी समय प्रकाशित ओक़ाफ़ की सूची की दशा में, अधिकरण द्वारा ऐसा आवेदन ऐसे प्रारंभ के एक वर्ष की अवधि के भीतर ग्रहण किया जा सकेगा :

परन्तु यह और कि जहां ऐसे किसी प्रश्न की, ऐसे प्रारंभ के पूर्व संस्थित किसी वाद में किसी सिविल न्यायालय द्वारा सुनवाई कर ली गई है और उसका अंतिम रूप से विनिश्चय कर दिया गया है, वहां अधिकरण ऐसे प्रश्न पर नए सिरे से विचार नहीं करेगा ।

(2) इस धारा के अधीन किसी वक्फ की बाबत किसी कार्यवाही की, उस दशा के सिवाय जिसमें अधिकरण को उपधारा (5) के उपबंधों के कारण कोई अधिकारिता नहीं है, किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा केवल इस कारण रोका नहीं जाएगा कि किसी ऐसे वाद, आवेदन, अपील या अन्य कार्यवाही से उद्भूत कोई वाद, आवेदन या अपील या अन्य कार्यवाही लंबित है ।

(3) मुख्य कार्यपालक अधिकारी को, उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन का पक्षकार नहीं बनाया जाएगा ।

(4) ओक़ाफ़ की सूची और जहां ऐसी किसी सूची में उपधारा (1) के अधीन अधिकरण के विनिश्चय के अनुसरण में परिवर्तन किया जाता है वहां इस प्रकर परिवर्तित सूची अंतिम होगी ।

(5) अधिकरण को किसी ऐसे विषय का अवधारण करने की अधिकारिता नहीं होगी जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व, धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में संस्थित किसी वाद या प्रारंभ की गई किसी कार्यवाही की विषय-वस्तु है अथवा जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व किसी ऐसे वाद या कार्यवाही में पारित डिक्री से किसी अपील की अथवा, यथास्थिति, ऐसे वाद, कार्यवाही या अपील से उद्भूत होने वाले किसी पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन के लिए किसी आवेदन की विषय-वस्तु है । 

 [(6) अधिकरण को वक्फ संपत्ति के अप्राधिकृत अधिभोग द्वारा हुई नुकसानियों के निर्धारण और ऐसे अप्राधिकृत अधिभोगियों को वक्फ संपत्ति के उनके अवैध अधिभोग के लिए दंडित करने तथा कलक्टर के माध्यम से भू-राजस्व के बकाया के रूप में नुकसानियों को वसूल करने की शक्तियां होंगी:

परंतु जो कोई, लोक सेवक होते हुए, किसी अधिक्रमण को रोकने या हटाने के अपने विधिपूर्ण कर्तव्य में असफल रहेगा, वह दोषसिद्धि पर ऐसे जुर्माने से, जो प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए, पन्द्रह हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।]

 [8. सर्वेक्षण के खर्च का राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाना-सर्वेक्षण करने का कुल खर्च, जिसके अंतर्गत इस अध्याय के अधीन ओक़ाफ़ की सूची या सूचियों के प्रकाशन का खर्च भी है, राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा ।]

अध्याय 3

केन्द्रीय वक्फ परिषद्

9. केन्द्रीय वक्फ परिषद् की स्थापना और गठन- [(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बोर्डों के कार्यकरण और ओक़ाफ़ के सम्यक् प्रशासन से संबंधित मामलों में केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार और बोर्डों को सलाह देने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय वक्फ परिषद् नामक एक परिषद् स्थापित कर सकेगी ।

                (1क) उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिषद् ऐसे विवाद्यकों पर और ऐसी रीति में, जो उपधारा (4) और उपधारा (5) के अधीन उपबंधित की जाए, बोर्डों को निदेश जारी करेगी ।]

                (2) परिषद् निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-

                                (क) ओक़ाफ़ का भारसाधक संघ का मंत्री-पदेन अध्यक्ष,

                                (ख) निम्नलिखित सदस्य केंद्रीय सरकार द्वारा मुसलमानों में से नियुक्त किए जाएंगे, अर्थात् :-

(i) तीन व्यक्ति, जो अखिल भारतीय स्वरूप और राष्ट्रीय महत्व वाले मुस्लिम संगठनों का प्रतिनिधित्व करते हों ;

 [(ii) राष्ट्रीय ख्याति वाले चार व्यक्ति, जिनमें से एक-एक व्यक्ति प्रशासन या प्रबंध, वित्तीय प्रबंध, इंजीनियरी या वास्तुविद् और आयुर्विज्ञान के क्षेत्रों से होगा ;]

(iii) तीन संसद् सदस्य जिनमें से दो लोक सभा से और एक राज्य सभा से होगा ;

(iv) तीन बोर्डों के अध्यक्ष, चकानुक्रम से ;

(v) दो व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे हों ;

                                                (vi) राष्ट्रीय ख्याति वाला एक अधिवक्ता ;

                (vii) एक व्यक्ति, जो ऐसे वक्फ का जिसकी सकल वार्षिक आय पांच लाख रुपए और उससे अधिक है, प्रतिनिधित्व करेगा ;

(viii) तीन व्यक्ति, जो मुस्लिम विधि के ख्याति प्राप्त विद्वान हैं :

 [परंतु उपखंड (i) से उपखंड (viii) के अधीन नियुक्त किए गए सदस्यों में से कम से कम सदस्य स्त्रियां होंगी ।]

                (3) परिषद् के सदस्यों की पदावधि, उनके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और उनमें आकस्मिक रिक्तियां भरने की रीति ऐसी होगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाए ।

                2[(4) यथास्थिति, राज्य सरकार या बोर्ड, राज्य में वक्फ बोर्डों के कार्यपालन के संबंध में, विशेष रूप से उनके वित्तीय कार्यपालन, सर्वेक्षण, वक्फ विलेखों, राजस्व अभिलेखों के रख-रखाव, वक्फ संपत्तियों के अधिक्रमण, वार्षिक रिपोर्टों और संपरीक्षा रिपोर्टों पर, ऐसी रीति में और समय पर, जो परिषद् द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, परिषद् को सूचना देगा और वह, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अनियमितता या इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य था तो वह स्वप्रेरणा से बोर्ड से विनिर्दिष्ट मुद्दों पर जानकारी मांग सकेगा और यदि परिषद् का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी अनियमितता और अधिनियम का उल्लंघन सिद्ध होता है तो वह ऐसा निदेश जारी कर सकेगी, जो समुचित समझा जाए, जिसका संबंधित राज्य सरकार को सूचना देते हुए संबंधित बोर्ड द्वारा पालन किया जाएगा ।

(5) उपधारा (4) के अधीन परिषद् द्वारा जारी किए गए किसी निदेश से उद्भूत किसी विवाद को केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित किए जाने वाले न्यायनिर्णयन बोर्ड को निर्दिष्ट किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा किसी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा की जाएगी और पीठासीन अधिकारी को संदेय फीस और यात्रा तथा अन्य भत्ते वे होंगे जो उस सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।]

10. परिषद् के वित्त-(1) प्रत्येक बोर्ड, अपनी वक्फ निधि में से प्रतिवर्ष परिषद् को इतना अंशदान करेगा जितना ऐसे ओक़ाफ़ की जिसकी बाबत धारा 72 की उपधारा (1) के अधीन अंशदान किया जाना है, शुद्ध वार्षिक आय के योग के एक प्रतिशत के बराबर है:

परन्तु जहां बोर्ड ने किसी वक्फ विशेष की दशा में, धारा 72 की उपधारा (1) के अधीन उसे किए जाने वाले सम्पूर्ण अंशदान को उस धारा की उपधारा (2) के अधीन छूट दे दी है वहां इस धारा के अधीन परिषद् को किए जाने वाले अंशदान का परिकलन करने के लिए उस वक्फ की, जिसकी बाबत ऐसी छूट मंजूर की गई है, शुद्ध वार्षिक आय हिसाब में नहीं ली जाएगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन परिषद् द्वारा प्राप्त सभी धनराशियों, और उसके द्वारा संदानों, उपकृतियों और अनुदानों के रूप में प्राप्त सभी अन्य धन-राशियों से एक निधि बनेगी जिसका नाम केन्द्रीय वक्फ निधि होगा ।

(3) किन्हीं ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, केन्द्रीय वक्फ निधि, परिषद् के नियंत्रणाधीन होगी और उसका उपयोजन ऐसे प्रयोजनों के लिए किया जा सकेगा जिन्हें परिषद् ठीक समझे ।

11. लेखा और संपरीक्षा-(1) परिषद् अपने लेखाओं के संबंध में ऐसी लेखाबहियां और अन्य बहियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखवाएगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाए ।

(2) परिषद् के लेखाओं की संपरीक्षा और जांच प्रतिवर्ष ऐसे संपरीक्षक द्वारा की जाएगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाए ।

(3) संपरीक्षा का खर्च केन्द्रीय वक्फ निधि में से दिया जाएगा ।

12. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अध्याय के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) परिषद् के सदस्यों की पदावधि, उनके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और उनमें आकस्मिक रिक्तियां भरने की रीति;

(ख) केन्द्रीय वक्फ निधि का नियंत्रण और उपयोजन;

(ग) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे परिषद् के लेखे रखे जा सकेंगे ।

(3) इस अध्याय के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हों, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

अध्याय 4

बोर्डों की स्थापना और उनके कृत्य

13. निगमन-(1) उस तारीख से जिसे राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, एक वक्फ बोर्ड स्थापित किया जाएगा जिसका वह नाम होगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए:

 [परंतु उस दशा में, जहां इस धारा के अधीन यथा अपेक्षित वक्फ बोर्ड स्थापित नहीं किया गया है, वहां इस अधिनियम के उपबंधों या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 के प्रारंभ की तारीख से छह मास के भीतर, एक वक्फ बोर्ड स्थापित किया जाएगा ।]

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि किसी राज्य में शिया ओक़ाफ़ की संख्या उस राज्य में सभी ओक़ाफ़ के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक है या यदि उस राज्य में शिया ओक़ाफ़ की संपत्तियों की आय उस राज्य में सभी ओक़ाफ़ की संपत्तियों की कुल आय के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक है तो राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे नामों से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, सुन्नी ओक़ाफ़ और शिया ओक़ाफ़ क लिए एक-एक वक्फ बोर्ड स्थापित कर सकेगी ।

1[(2क) जहां वक्फ बोर्ड धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन स्थापित किय जाता है, वहां शिया वक्फ की दशा में, शिया मुस्लिम सदस्य होंगे और सुन्नी वक्फ की दशा में, सुन्नी मुस्लिम सदस्य होंगे ।]

(3) बोर्ड, शाश्वत्त उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे संपत्ति का अर्जन और धारण करने की तथा किसी ऐसी संपत्ति को, ऐसी शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, अन्तरित करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।

14. बोर्ड की संरचना-(1) किसी राज्य और [दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी संघ राज्यक्षेत्र] का बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, अर्थात्: -

                (क) एक अध्यक्ष;

(ख) एक और अधिक से अधिक दो सदस्य जो राज्य सरकार ठीक समझे, जिनका निर्वाचन ऐसे प्रत्येक निर्वाचकगण से किया जाएगा, जिसमें-

(i) यथास्थिति, राज्य या 2[दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र] के मुस्लिम संसद् सदस्य,

                                (ii) राज्य विधान-मंडल के मुस्लिम सदस्य,

                                2[(iii) संबंधित राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की विधिज्ञ परिषद् के मुस्लिम सदस्य:

परंतु यदि किसी राज्य या किसी संघ राज्यक्षेत्र की विधिज्ञ परिषद् का कोई मुस्लिम सदस्य नहीं है तो, यथास्थिति, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र से किसी ज्येष्ठ मुस्लिम अधिवक्ता को नामनिर्देशित कर सकेगा, और]

                                (iv) ऐसे ओक़ाफ़ के, जिनकी वार्षिक आय एक लाख या उससे अधिक है, मुतवल्ली, होंगे ।

 [स्पष्टीकरण 1-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि उपखंड (i) से उपखंड (iv) में वर्णित प्रवर्गों के सदस्य प्रत्येक प्रवर्ग के लिए गठित निर्वाचकगण से निर्वाचित होंगे ।

स्पष्टीकरण 2-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषत किया जाता है कि यदि कोई मुस्लिम सदस्य खंड (ख) के उपखंड (i) में यथानिर्दिष्ट राज्य या दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र से संसद् का सदस्य नहीं रहता है या खंड (ख) के उपखंड (ii) के अधीन यथा अपेक्षित राज्य विधान सभा का सदस्य नहीं रहता है तो उस सदस्य के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने उस तारीख से, जिससे वह, यथास्थिति, राज्य या दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र से संसद् का सदस्य या राज्य विधान सभा का सदस्य नहीं रहा है, यथास्थिति, राज्य या दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के लिए बोर्ड के सदस्य का पद रिक्त कर दिया है ।]

 [(ग) मुस्लिमों में से ऐसा एक व्यक्ति, जिसके पास नगर योजना या कारबार प्रबंधन, सामाजिक कार्य, वित्त या राजस्व, कृषि और विकास क्रियाकलापों में वृत्तिक अनुभव है, जिसे राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा;

(घ) मुस्लिमों में से एक-एक व्यक्ति, जो शिया और सुन्नी इस्लाम धर्म विद्या के मान्यताप्राप्त विद्वानों में से होगा, जिसे राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा;

(ङ) मुस्लिमों में से एक व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार द्वारा राज्य सरकार के ऐसे अधिकारियों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, जो राज्य सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे की पंक्ति के न हों ।]

                1[(1क) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार का कोई मंत्री बोर्ड के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट नहीं किया जाएगा:

परंतु किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, बोर्ड पांच से अन्यून और सात से अनधिक ऐसे सदस्यों से मिलकर बनेगा, जिन्हें केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के खंड (ख) के उपखंड (i) से उपखंड (iv) या खंड (ग) से खंड (ङ) के अधीन विनिर्दिष्ट प्रवर्गों से नियुक्त किया जाएगा:

परंतु यह और कि बोर्ड में नियुक्त किए गए सदस्यों में कम से कम दो सदस्य स्त्रियां होंगी:

परंतु यह भी कि ऐसे प्रत्येक मामले में, जहां मुतवल्ली पद्धति विद्यमान है, वहां एक मुतवल्ली बोर्ड के सदस्य के रूप में होगा ।]

(2) उपधारा (1) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट सदस्यों का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा ऐसी रीति से होगा जो विहित की जाए:

परन्तु जहां, यथास्थिति, संसद्, राज्य विधान-मंडल या राज्य विधिज्ञ परिषद् के मुस्लिम सदस्यों की संख्या केवल एक है वहां ऐसे मुस्लिम सदस्य को बोर्ड में निर्वाचित घोषित किया जाएगा:

परन्तु यह और कि जहां उपधारा (1) के खंड (ख) के उपखंड (i) से उपखंड (iii) में उल्लिखित किसी भी प्रवर्ग में कोई मुस्लिम सदस्य नहीं है वहां निर्वाचकगण का गठन, यथास्थिति, संसद्, राज्य विधान-मंडल या राज्य विधिज्ञ परिषद् के पूर्व मुस्लिम सदस्यों से होगा ।

(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, जहां राज्य सरकार का, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) के खंड (ख) के उपखंड (i) से उपखंड (iii) में उल्लिखित किसी भी प्रवर्ग के लिए निर्वाचकगण का गठन करना युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है वहां राज्य सरकार ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझे, बोर्ड के सदस्यों के रूप में नामनिर्देशित कर सकेगी ।

(4) बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों की संख्या सभी समयों पर उपधारा (3) के अधीन जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, बोर्ड के नामनिर्देशित सदस्यों से अधिक रहेगी ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।             

(6) बोर्ड के शिया सदस्यों या सुन्नी सदस्यों की संख्या का अवधारण करने में, राज्य सरकार, बोर्ड द्वारा प्रशासित किए जाने वाले शिया ओक़ाफ़ और सुन्नी ओक़ाफ़ की संख्या और महत्व को ध्यान में रखेगी और सदस्यों की नियुक्ति, जहां तक हो सके, ऐसे अवधारण के अनुसार की जाएगी ।

3।                            ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(8) जब कभी बोर्ड का गठन या पुनर्गठन किया जाए, इस प्रयोजन के लिए बुलाए गए अधिवेशन में उपस्थित बोर्ड के सदस्य अपने में से एक को बोर्ड का अध्यक्ष निर्वाचित करेंगे ।

(9) बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, की जाएगी ।

15. पदावधि-बोर्ड के [सदस्य, धारा 14 की उपधारा (9) में निर्दिष्ट अधिसूचना की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक] पद धारण करेंगे ।

16. बोर्ड का सदस्य नियुक्त किए जाने या सदस्य बने रहने के लिए निरर्हताएं-कोई व्यक्ति, बोर्ड का सदस्य नियुक्त किए जाने या सदस्य बने रहने के लिए निरर्हित होगा: -

                (क) यदि वह मुसलमान नहीं है और इक्कीस वर्ष से कम आयु का है;

                (ख) यदि उस व्यक्ित के बारे में यह पाया जाता है कि वह विकृतचित्त है;

                (ग) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है;

                (घ) यदि वह किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष किया गया है जिसमें नैतिक अधमता अन्तग्रस्त है और ऐसी दोषसिद्धि को उलटा नहीं गया है, अथवा उसे एसे अपराध के लिए पूर्ण रूप से क्षमा नहीं किया गया है;

                 [(घक) वह किसी वक्फ संपत्ति पर अधिक्रमण का दोषी अभिनिर्धारित किया गया है;]

                (ङ) यदि वह किसी पूर्व अवसर पर-

                                (i) सदस्य या मुतवल्ली के रूप में अपने पद से हटा दिया गया है; या

                (ii) कुप्रबन्ध या भ्रष्टाचार के कारण किसी विश्वास के पद से सक्षम न्यायालय या अधिकरण के आदेश द्वारा,

                हटा दिया गया है ।

17. बोर्ड के अधिवेशन-(1) बोर्ड का कार्य करने के लिए उसका अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होगा जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।

(2) अध्यक्ष अथवा उसकी अनुपस्थिति में सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया कोई सदस्य बोर्ड के अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(3) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, ऐसे सभी प्रश्न, जो बोर्ड के किसी अधिवेशन के समक्ष आएं, उपस्थित सदस्यों के बहुत से विनिश्चित किए जाएंगे और मत बराबर होने की दशा में अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले किसी अन्य व्यक्ित का द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।

18. बोर्ड की समितियां-(1) बोर्ड, जब कभी आवश्यक समझे, साधारणतः या किसी प्रयोजन विशेष के लिए अथवा किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए, ओक़ाफ़ के पर्यवेक्षण के लिए समितियां स्थापित कर सकेगा ।

(2) ऐसी समितियों का गठन, उनके कृत्य और उनके कर्तव्य तथा उनकी पदावधि बोर्ड द्वारा, समय-समय पर, अवधारित की जाएगी:

परन्तु ऐसी समितियों के सदस्यों के लिए बोर्ड का सदस्य होना आवश्यक नहीं होगा ।

19. अध्यक्ष और सदस्यों का पद त्याग-अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित, लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:

परन्तु अध्यक्ष या सदस्य तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक उसके उत्तराधिकारी की नियुक्ति, राजपत्र में अधिसूचित नहीं की जाती ।

20. अध्यक्ष और सदस्यों का हटाया जाना-(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बोर्ड के अध्यक्ष अथवा उसके किसी सदस्य को हटा सकेगी, यदि वह-

                (क) धारा 16 में विनिर्दिष्ट किसी निरर्हता से ग्रस्त है या ग्रस्त हो जाता है; या

                (ख) कार्य करने से इन्कार कर देता है या कार्य करने में असमर्थ है अथवा ऐसी रीति से कार्य करता है जिसके बारे में राज्य सरकार, कोई स्पष्टीकरण सुनने के पश्चात् जो वह दे, यह समझती है कि वह ओक़ाफ़ के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है;

                (ग) बोर्ड की राय में, पर्याप्त प्रतिहेतु के बिना, बोर्ड के क्रमवर्ती तीन अधिवेशनों में उपस्थित होने में असफल   रहता है ।

(2) जहां बोर्ड का अध्यक्ष उपधारा (1) के अधीन हटाया जाता है, वहां वह बोर्ड का सदस्य भी नहीं रहेगा ।

 [20क. अविश्वास मत द्वारा अध्यक्ष का हटाया जाना-धारा 20 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड के अध्यक्ष को अविश्वास मत द्वारा निम्नलिखित रीति से हटाया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किसी व्यक्ति में विश्वास या अविश्वास मत अभिव्यक्त करने वाला कोई संकल्प विहित रीति के सिवाय और तब तक नहीं लाया जाएगा, जब तक अध्यक्ष के रूप में उसके निर्वाचन की तारीख के पश्चात् बारह मास व्यपगत न हो गए हों और उसे राज्य सरकार की पूर्व अनुज्ञा से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं;

(ख) अविश्वास की सूचना, उन आधारों का, जिन पर ऐसा प्रस्ताव लाया जाना प्रस्तावित है, स्पष्ट रूप से कथन करते हुए राज्य सरकार को संबोधित की जाएगी और उस पर बोर्ड के कुल सदस्यों में से कम से कम आधे सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे;

(ग) अविश्वास की सूचना पर हस्ताक्षर करने वाले बोर्ड के कम से कम तीन सदस्य, उनके द्वारा हस्ताक्षरित इस आशय के शपथ-पत्र के साथ राज्य सरकार को व्यक्तिगत रूप से सूचना प्रस्तुत करेंगे कि अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर असली हैं और ये हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा सूचना की अंतर्वस्तु को सुनने या पढ़ने के पश्चात् किए गए हैं;

(घ) इसमें ऊपर यथा उपबंधित अविश्वास की सूचना की प्राप्ति पर, राज्य सरकार, ऐसा समय, तारीख और स्थान नियत करेगी, जो प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव के प्रयोजन के लिए बैठक आयोजित करने हेतु उपयुक्त समझा जाए:

परंतु ऐसी बैठक के लिए कम से कम पन्द्रह दिन की सूचना दी जाएगी;

(ङ) खंड (घ) के अधीन बैठक की सूचना में यह भी उपबंधित होगा कि अविश्वास प्रस्ताव सम्यक् रूप से पारित किए जाने की दशा में, या, यथास्थिति, नए अध्यक्ष का निर्वाचन भी उसी बैठक में किया जाएगा;

(च) राज्य सरकार, उस बैठक के, जिसमें अविश्वास के संकल्प पर विचार किया जाएगा, पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य करने के लिए एक राजपत्रित अधिकारी को (उस विभाग के, जो बोर्ड के अधीक्षण और प्रशासन से संबद्ध है, किसी अधिकारी से भिन्न) भी नामनिर्देशित करेगी;

(छ) बोर्ड की ऐसी बैठक की गणपूर्ति बोर्ड के कुल सदस्यों के आधे सदस्यों से होगी ;

(ज) अविश्वास के संकल्प को पारित किया गया समझा जाएगा, यदि उसे उपस्थित सदस्यों के साधारण बहुमत द्वारा पारित कर दिया जाता है;

(झ) यदि अविश्वास के किसी संकल्प को पारित कर दिया जाता है तो, अध्यक्ष तुरंत पद धारण करने से प्रविरत हो जाएगा और उसके उत्तरवर्ती द्वारा, जिसे उसी बैठक में एक अन्य संकल्प द्वारा निर्वाचित किया जाएगा, पद ग्रहण किया जाएगा;

(ञ) नए अध्यक्ष के निर्वाचन का संचालन खंड (झ) के अधीन, खंड (च) में निर्दिष्ट उक्त पीठासीन अधिकारी की अध्यक्षता के अधीन, बैठक में निम्नलिखित रीति से किया जाएगा, अर्थात्: -

(अ) अध्यक्ष, बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों में से निर्वाचित किया जाएगा;

(आ) अभ्यर्थियों के नामनिर्देशन का प्रस्ताव और समर्थन बैठक में ही किया जाएगा और नाम वापस लिए जाने के पश्चात् निर्वाचन, यदि कोई हो, गुप्त मतदान की पद्धति द्वारा होगा;

(इ) निर्वाचन बैठक में उपस्थित सदस्यों के साधारण बहुमत द्वारा किया जाएगा और मतों के बराबर रहने की दशा में, मामले का विनिश्चय लाटरी डाल कर किया जाएगा; और

(ई) बैठक की कार्यवाहियों पर पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे;

(ट) खंड (ज) के अधीन निर्वाचित नया अध्यक्ष अविश्वास के संकल्प द्वारा हटाए गए अध्यक्ष की शेष पदावधि तक ही पद धारण करेगा; और

(ठ) यदि अविश्वास का संकल्प पारित करने संबंधी प्रस्ताव बैठक में गणपूर्ति की कमी या अपेक्षित बहुमत के न होने के कारण असफल हो जाता है तो अविश्वास प्रस्ताव पर विचार किए जाने के लिए कोई पश्चात्वर्ती बैठक पूर्व बैठक की तारीख से छह मास के भीतर नहीं की जाएगी ।]

21. रिक्ति का भरा जाना-जब किसी सदस्य का स्थान उसके हटाए जाने, पदत्याग, मृत्यु या अन्य कारण से रिक्त हो जाता है, तब उसके स्थान पर नए सदस्य की नियुक्ति की जाएगी और ऐसा सदस्य तब तक पद धारण करेगा जब तक कि वह सदस्य, जिसके स्थान को वह भरता है, पद धारण करने का हकदार होता यदि ऐसी रिक्ति न हुई होती ।

22. रिक्तियों, आदि से बोर्ड की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-बोर्ड का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्यों में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।

23. मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति और उसकी पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें- [(1) बोर्ड का एक पूर्णकालिक मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा, जो मुस्लिम होगा और वह बोर्ड द्वारा सुझाए गए दो नामों के पैनल से, सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त किया जाएगा और जो राज्य सरकार के उप सचिव की पंक्ति से नीचे का नहीं होगा और उस पंक्ति के किसी मुस्लिम अधिकारी के उपलब्ध न होने की स्थिति में समकक्ष पंक्ति के किसी मुस्लिम अधिकारी को प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त किया जा सकेगा ।]

(2) मुख्य कार्यपालक अधिकारी की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) मुख्य कार्यपालक अधिकारी, बोर्ड का पदेन सचिव होगा और वह बोर्ड के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन होगा ।

24. बोर्ड के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) बोर्ड को उतनी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की सहायता उपलब्ध होगी जो इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के दक्षतापूर्ण पालन के लिए आवश्यक हों जिसके ब्यौरे बोर्ड द्वारा राज्य सरकार से परामर्श करके अवधारित किए जाएंगे ।

(2) अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, उनकी पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं ।

25. मुख्य कार्यपालक अधिकारी के कर्तव्य और शक्तियां-(1) इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के और बोर्ड के निदेशों के अधीन रहते हुए, मुख्य कार्यपालक अधिकारी के कृत्यों के अंतर्गत हैं, -

(क) ओक़ाफ़ और वक्फ की संपत्ति की प्रकृति और मात्रा का अन्वेषण करना तथा जहां आवश्यक हो वहां वक्फ की संपत्ति की तालिका मंगाना और मुतवल्लियों से लेखाओं, विवरणियों और सूचनाओं की समय-समय पर मांग करना;

(ख) वक्फ की संपत्ति और उनसे संबंधित लेखाओं, अभिलेखों, विलेखों या दस्तावेजों का निरीक्षण करना या निरीक्षण करवाना;

(ग) साधारणतया ऐसे सभी कार्य करना जो ओक़ाफ़ के नियंत्रण, अनुरक्षण और अधीक्षण के लिए आवश्यक हों ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी वक्फ की बाबत निदेश देने की शक्तियों का प्रयोग करने में बोर्ड, वक्फ विलेख में वाक़िफ़ द्वारा दिए गए निदेशों, वक्फ के प्रयोजन और वक्फ की ऐसी प्रथाओं और रूढ़ियों के अनुरूप कार्य करेगा जिन्हें मुस्लिम विधि की ऐसी शाखा द्वारा मंजूरी दी गई हो, जिससे वक्फ संबंधित है ।

(3) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, मुख्य कार्यपालक अधिकारी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम के अधीन सौंपे जाएं या प्रत्यायोजित की जाएं ।

26. बोर्ड के आदेशों या संकल्पों की बाबत मुख्य कार्यपालक अधिकारी की शक्तियां-जहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी का यह विचार है कि बोर्ड द्वारा पारित किया गया कोई आदेश या संकल्प-

(क) विधि के अनुसार पारित नहीं किया गया है; या

(ख) इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन, अथवा किसी अन्य विधि द्वारा बोर्ड को प्रदत्त शक्तियों के बाहर है अथवा उनका दुरुपयोग करने वाला है; या

(ग) यदि कार्यान्वित किया गया तो-

(i) बोर्ड को अथवा संबंधित वक्फ को या साधारणतया ओक़ाफ़ को वित्तीय हानि पहुंचा सकता है; या

(ii) कोई बल्वा या शांति भंग कर सकता है; और

(iii) मानव जीवन, स्वास्थ्य या क्षेम को खतरा उत्पन्न कर सकता है; या

(घ) बोर्ड के लिए, या किसी वक्फ के लिए या साधारणतया ओक़ाफ़ के लिए फायदाप्रद नहीं है,

तो वह, ऐसे आदेश या संकल्प के कार्यान्वयन के पूर्व मामले को बोर्ड के समक्ष उसके पुनर्विचार के लिए रखेगा और यदि ऐसा आदेश या संकल्प ऐसे पुनर्विचार के पश्चात् उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा पुष्ट नहीं कर दिया जाता है तो आदेश या संकल्प पर अपने आक्षेपों के साथ मामले को राज्य सरकार को निर्देशित करेगा और उस पर राज्य सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

 [27. बोर्ड द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन-बोर्ड, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, धारा 32 की उपधारा (2) के खंड (ग), खंड (घ), खंड (छ) और खंड (ञ) और धारा 110 के अधीन उल्लिखित बोर्ड की शक्तियों और कृत्यों के सिवाय, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को, जो वह आवश्यक समझे, बोर्ड या किसी क्षेत्रीय समिति के अध्यक्ष, किसी अन्य सदस्य, मुख्य कार्यपालक अधिकारी या किसी अन्य अधिकारी या सेवक प्रत्यायोजित कर सकेगा ।]

 [28. बोर्ड के निदेशों के कार्यान्वयन करने की जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट की शक्तियां-इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के किसी जिले का जिला मजिस्ट्रेट या उसकी अनुपस्थिति में अपर जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट बोर्ड के ऐसे विनिश्चयों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी होगा जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा संसूचित किए जाएं और बोर्ड, जहां कहीं आवश्यक समझे, अपने विनिश्चयों के कार्यान्वयन के लिए अधिकरण से निदेशों की ईप्सा कर सकेगा ।]

29. अभिलेखों, रजिस्टरों आदि का निरीक्षण करने की मुख्य कार्यपालक अधिकारी की शक्तियां- [(1)] मुख्य कार्यपालक अधिकारी या उसके द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत बोर्ड का कोई अन्य अधिकारी,  [ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं ।] सभी युक्तियुक्त समयों पर, किसी भी लोक कार्यालय में किसी वक्फ से अथवा जंगम या स्थावर संपत्तियों से, जो वक्फ संपत्ति हैं या जिनके बारे में वक्फ संपत्ति होने का दावा किया गया है, संबंधित किसी अभिलेख, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज का निरीक्षण करने का हकदार होगा ।

 [(2) मुतवल्ली या वक्फ संपत्तियों से संबंधित किसी दस्तावेज को अभिरक्षा में रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति, लिखित में उसे पेश करने की मांग किए जाने पर, विहित अवधि के भीतर मुख्य कार्यपालक अधिकारी के समक्ष पेश करेगा ।

(3) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, सरकार का कोई अभिकरण या कोई अन्य संगठन वक्फ संपत्तियों या ऐसी संपत्तियों से, जिनके वक्फ संपत्ति होने का दावा किया गया है, संबंधित अभिलेखों, संपत्तियों के रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों की प्रतियां मुख्य कार्यपालक अधिकारी को, उससे इस आशय के लिखित अनुरोध पर, दस कार्य दिवसों के भीतर, प्रदान करेगा:

परंतु उपधारा (2) और उपधारा (3) में यथावर्णित कार्रवाई करने के पूर्व मुख्य कार्यपालक अधिकारी बोर्ड का अनुमोदन प्राप्त करेगा ।]

30. अभिलेखों का निरीक्षण-(1) बोर्ड अपनी कार्यवाहियों या अपनी अभिरक्षा में के अन्य अभिलेखों का निरीक्षण अनुज्ञात कर सकेगा और ऐसी फीस का संदाय किए जाने पर तथा ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, उनकी प्रतियां दे सकेगा ।

(2) इस धारा के अधीन दी गई सभी प्रतियां, बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा ऐसी रीति से प्रमाणित की जाएंगी, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 76 में उपबंधित है ।

(3) उपधारा (2) द्वारा मुख्य कार्यपालक अधिकारी को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग, बोर्ड के ऐसे अन्य अधिकारियों या अधिकारियों द्वारा भी किया जा सकेगा जो बोर्ड द्वारा इस निमित्त साधारण या विशेष रूप से प्राधिकृत किए जाएं ।

31. संसद् की सदस्यता के लिए निरर्हता का निवारण-इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों के पद, संसद् सदस्य चुने जाने या संसद् सदस्य होने [या संघ राज्यक्षेत्र के विधान-मंडल का सदस्य या किसी राज्य विधान-मंडल का सदस्य, यदि समुचित राज्य विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन ऐसा घोषित किया गया हो, होने] के लिए निरर्हित नहीं करेंगे और कभी भी निरर्हित करने वाले नहीं समझे जाएंगे ।

32. बोर्ड की शक्तियां और उसके कृत्य-(1) ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं, राज्य में सभी ओक़ाफ़ का सामान्य अधीक्षण, राज्य के लिए स्थापित बोर्ड में निहित होगा ; तथा बोर्ड का यह कर्तव्य होगा कि वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का इस प्रकार प्रयोग करे जिससे यह सुनिश्चित हो जाए कि उसके अधीक्षण के अधीन आने वाले ओक़ाफ़ को उचित रूप से अनुरक्षित, नियंत्रित और प्रशासित किया जाता है और उनकी आय का उन उद्देश्यों तथा उन प्रयोजनों के लिए सम्यक् रूप से उपयोजन किया जाता है जिनके लिए ऐसे वक्फ सृष्ट किए गए थे या आशयित थे :

परन्तु किसी वक्फ की बाबत इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में, बोर्ड, वाक़िफ़ के निदेशों, वक्फ के प्रयोजनों और वक्फ की किसी प्रथा या रूढ़ि के अनुरूप कार्य करेगा, जिसे मुस्लिम विधि की ऐसी शाखा द्वारा मंजूरी दी गई हो ।

स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस उपधारा में, वक्फ" के अन्तर्गत ऐसा वक्फ है जिसके संबंध में इस अधिनियम के आरम्भ के पूर्व या उसके पश्चात्, किसी न्यायालय द्वारा कोई स्कीम बनाई गई है ।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड के निम्नलिखित कृत्य होंगे, अर्थात्: -

(क) ऐसा अभिलेख रखना जिसमें प्रत्येक वक्फ के प्रारम्भ, उसकी आय, उसके उद्देश्य तथा हिताधिकारियों के बारे में जानकारी हो;

(ख) यह सुनिश्िचत करना कि ओक़ाफ़ की आय और अन्य सम्पत्ति का उन उद्देश्यों तथा उन प्रयोजनों के लिए उपयोजन किया जाता है जिनके लिए, ऐसे वक्फ आशयित थे या सृष्ट किए गए थे ।

(ग) ओक़ाफ़ के प्रशासन के लिए निदेश देना;

(घ) किसी वक्फ के प्रबन्ध के लिए स्कीमें स्थिर करना:

परन्तु ऐसा कोई स्थिरीकरण, प्रभावित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए बिना नहीं किया जाएगा;

(ङ) यह निदेश देना कि-

                (i) किसी वक्फ की अधिशेष आय का उस वक्फ के उद्देश्यों से संगत रूप में उपयोग किया जाए;

                (ii) ऐसे किसी वक्फ की, जिसके उद्देश्य किसी लिखत से स्पष्ट नहीं हैं, आय का किस रीति से उपयोग किया जाए;

(iii) किसी ऐसी दशा में, जिसमें किसी वक्फ का कोई उद्देश्य अस्तित्व में नहीं रह गया है अथवा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, वक्फ की आय के इतने भाग का जितना पहले उस उद्देश्य के लिए उपयोजित किया जाता था, किसी ऐसे अन्य उद्देश्य के लिए जो समरूप या निकटतम समरूप हो या मूल उद्देश्य के लिए या गरीबों के फायदे के लिए या मुस्लिम समुदाय में ज्ञान या विद्या की अभिवृद्धि के प्रयोजन के लिए उपयोजन किया जाए:

                                परन्तु इस खंड के अधीन कोई निदेश, प्रभावित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए बिना नहीं दिया जाएगा ।

स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए, बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग, -

                (i) सुन्नी वक्फ की दशा में, बोर्ड के सुन्नी सदस्यों द्वारा ही किया जाएगा; और

                (ii) शिया वक्फ की दशा में, बोर्ड के शिया सदस्यों द्वारा ही किया जाएगा:

परन्तु जहां बोर्ड में सुन्नी या शिया सदस्यों की संख्या को और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, बोर्ड को यह प्रतीत हो कि उसकी शक्ति का प्रयोग ऐसे सदस्यों द्वारा ही नहीं किया जाना चाहिए वहां वह ऐसे अन्य, यथास्थिति, सुन्नी या शिया मुसलमानों को, जिन्हें वह ठीक समझे, इस खण्ड के अधीन अपनी शक्ितयों का प्रयोग करने के लिए बोर्ड के अस्थायी सदस्यों के रूप में सहयोजित कर सकेगा;

(च) मुतवल्लियों द्वारा प्रस्तुत बजटों की संवीक्षा करना और अनुमोदन करना तथा ओक़ाफ़ के लेखाओं की संपरीक्षा के लिए व्यवस्था करना;

(छ) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार मुतवल्लियों को नियुक्त करना और उन्हें हटाना;

(ज) वक्फ की खोई हुई सम्पत्तियों को पुनः प्राप्त करने के लिए उपाय करना;

(झ) ओक़ाफ़ के संबंध मं न्यायालय में वाद और कार्यवाहियां संस्थित करना और उनकी प्रतिरक्षा करना;

 [(ञ) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुसार वक्फ की किसी स्थावर संपत्ति के पट्टे की मंजूरी देना:

परंतु ऐसी कोई मंजूरी बोर्ड के उपस्थित सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई के बहुमत द्वारा ऐसे संव्यवहार के पक्ष में अपना मत दिए जाने पर ही दी जाएगी अन्यथा नहीं:

परंतु यह और कि जहां बोर्ड द्वारा ऐसी मंजूरी नहीं दी जाती है वहां ऐसा करने के कारणों को लेखबद्ध किया जाएगा;]

(ट) वक्फ निधि का प्रशासन करना;

(ठ) मुतवल्लियों से वक्फ की सम्पत्ति की बाबत ऐसी विवरणियां, आंकड़े, लेखा और अन्य जानकारी मांगना, जिसकी बार्ड समय-समय पर अपेक्षा करे;

(ड) वक्फ की सम्पत्ति, लेखाओं, अभिलेखों या उनसे संबंधित विलेखों और दस्तावेजों का निरीक्षण करना या निरीक्षण कराना;

(ढ) ओक़ाफ़ के और वक्फ संपत्ति के स्वरूप और विस्तार का अन्वेषण और अवधारण करना तथा जब कभी आवश्यक हो, वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण कराना;

 [(ढक) वक्फ भूमि या भवन का बाजार किराया, ऐसी रीति में, जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, अवधारित करना या अवधारित कराना;]

(ण) साधारणतया ऐसे सभी कार्य करना जो ओक़ाफ़ के सम्यक् नियंत्रण, अनुरक्षण और प्रशासन के लिए आवश्यक हों ।

                (3) जहां बोर्ड ने उपधारा (2) के खण्ड (घ) के अधीन प्रबंध की कोई स्कीम परिनिर्धारित की है अथवा उसके खण्ड (ङ) के अधीन कोई निदेश दिया है वहां वक्फ में हितबद्ध या ऐसे परिनिर्धारण या निदेश से प्रभावित कोई व्यक्ति परिनिर्धारण या निदेश को अपास्त कराने के लिए अधिकरण में वाद संस्थित कर सकेगा और उस पर अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा ।

                (4) जहां बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि किसी वक्फ भूमि पर जो वक्फ संपत्ति है,  [शैक्षिक संस्था, वाणिज्ियक केन्द्र, बाजार, रिहायशी या आवासीय फ्लैटों के रूप में और ऐसे अन्य विकास की संभावना हैट वहां वह संबंधित वक्फ के मुतवल्ली से, उस पर सूचना की तामील करके यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह, साठ दिन से अन्यून ऐसे समय के भीतर, जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, अपना विनिश्चय सूचित करे कि वह सूचना में विनिर्दिष्ट विकास संकर्मों को निष्पादित करने के लिए इच्छुक हैं या नहीं ।

(5) उपधारा (4) के अधीन जारी की गई सूचना के संबंध में प्राप्त उत्तर पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात्, यदि बोर्ड का समाधान हो जाता है कि मुतवल्ली सूचना में अपेक्षित संकर्म को निष्पादित करने के लिए इच्छुक नहीं है या उसे निष्पादित करने में समर्थ नहीं है तो वह  । । । संपत्ति को ग्रहण कर सकेगा, उस पर से किसी ऐसे भवन या संरचना को हटा सकेगा जो बोर्ड की राय में, संकर्म के निष्पादन के लिए आवश्यक है और ऐसे संकर्म को वक्फ निधि से या संबंधित वक्फ सम्पत्तियों की प्रतिभूति पर वित्त जुटा कर, निष्पादित कर सकेगा और सम्पत्ति को अपने नियंत्रण और प्रबंध में उतने समय तक रख सकेगा जब तक इस धारा के अधीन बोर्ड द्वारा उपगत सभी व्यय और साथ ही उस पर ब्याज, ऐसे संकर्म के अनुरक्षण पर व्यय और संपत्ति पर उपगत अन्य समुचित प्रभार, संपत्ति से व्युत्पन्न आय से वसूल न कर लिए जाएं :

परन्तु बोर्ड, संबंधित वक्फ के मुतवल्ली को, बोर्ड द्वारा सम्पत्ति को ग्रहण किए जाने के ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्षों के दौरान, संपत्ति से व्युत्पन्न औसत शुद्ध वार्षिक आय की मात्रा तक प्रतिवर्ष प्रतिकर के रूप में देगा ।

(6) उपधारा (5) में प्रगणित सभी व्ययों की विकसित संपत्ति की आय में से प्रतिपूर्ति कर लिए जाने के पश्चात्, विकसित संपत्ति, संबंधित वक्फ के मुतवल्ली को वापस कर दी जाएगी ।

33. निरीक्षण करने की मुख्य कार्यपालक अधिकारी या उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्तियों की शक्तियां-(1) इस बात की परीक्षा करने की दृष्टि से कि क्या मुतवल्ली की ओर से अपने कार्यपालक या प्रशासनिक कर्तव्यों के निर्वहन में किसी असफलता के कारण या उसमें किसी उपेक्षा के कारण, किसी वक्फ या वक्फ संपत्ति को कोई हानि या नुकसान हुआ है, बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से मुख्य कार्यपालक अधिकारी,  [या उसके द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति]  । । । ऐसी सभी जंगम और स्थावर संपत्तियों का, जो वक्फ संपत्ति हैं और उनसे संबंधित सभी अभिलेखों, पत्राचार, योजनाओं, लेखाओं और अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण कर सकेगा ।

(2) जब कभी उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई निरीक्षण किया जाता है तो संबंधित मुतवल्ली तथा उसके अधीन कार्यरत सभी अधिकारी और अन्य कर्मचारी और वक्फ के प्रशासन से संबद्ध, प्रत्येक व्यक्ति ऐसा निरीक्षण करने वाले व्यक्ति को ऐसी सभी सहायता और सुविधाएं देंगे जो आवश्यक हों, और जिनकी ऐसा निरीक्षण करने के लिए उसके द्वारा युक्तियुक्त रूप से अपेक्षा की जाए, और निरीक्षण के लिए वक्फ से संबंधित कोई भी जंगम संपत्ति या दस्तावेजें जो निरीक्षण करने वाले व्यक्ति द्वारा मांगी जाएं, प्रस्तुत करेंगे और उसे वक्फ से संबंधित ऐसी जानकारी प्रदान करेंगे जिसकी उसके द्वारा अपेक्षा की जाए ।

(3) जहां किसी ऐसे निरीक्षण के पश्चात्, यह प्रतीत हो कि संबंधित मुतवल्ली ने अथवा ऐसे किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी ने, जो उसके अधीन कार्यरत है या था, किसी धन या अन्य वक्फ संपत्ति का दुर्विनियोग, दुरुपयोग या कपटपूर्वक प्रतिधारण किया था अथवा वक्फ की निधि में से अनियमित, अप्राधिकृत या अनुचित व्यय किया था तो मुख्य कार्यपालक अधिकारी, मुतवल्ली या संबंधित व्यक्ति को हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् कि पूर्वोक्त रकम या संपत्ति की वसूली का आदेश उसके विरुद्ध क्यों न पारित किया जाए और ऐसे स्पष्टीकरण पर, यदि कोई हो, जिसे ऐसा व्यक्ति दे, विचार करने के पश्चात् उस रकम या संपत्ति का जिसका दुर्विनियोग, दुरुपयोग या कपटपूर्वक प्रतिधारण किया गया था अथवा ऐसे व्यक्ति द्वारा उपगत अनियमित, अप्राधिकृत या अनुचित व्यय की रकम का अवधारण करेगा और ऐसे व्यक्ति को निदेश देते हुए यह आदेश करेगा कि वह ऐसे समय के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, इस प्रकार अवधारित रकम का संदाय करे और उक्त संपत्ति को वक्फ को वापस लौटा दे ।

(4) ऐसे आदेश से व्यथित कोई मुतवल्ली या अन्य व्यक्ित, आदेश की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर, अधिकरण को अपील   कर सकेगा:

परन्तु ऐसी कोई अपील, अधिकरण द्वारा तभी ग्रहण की जाएगी जब अपीलार्थी ने मुख्य कार्यपालक अधिकारी के पास वह रकम, जो उपधारा (3) के अधीन अपीलार्थी द्वारा संदेय के रूप में अवधारित की गई है, जमा करा दी हो और अधिकरण को, अपील का निपटारा लंबित रहने तक, उपधारा (3) के अधीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा किए गए आदेश के प्रवर्तन को रोकने वाला कोई आदेश पारित करने की शक्ति नहीं होगी ।

(5) अधिकरण, ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, उपधारा (3) के अधीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा किए गए आदेश की पुष्टि कर सकेगा, उसे उलट सकेगा या उपांतरित कर सकेगा अथवा ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट रकम का, पूर्णतः या भागतः, परिहार कर सकेगा और खर्चे के बारे में ऐसे आदेश कर सकेगा जो वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे ।

(6) उपधारा (5) के अधीन अधिकरण द्वारा किया गया आदेश अंतिम होगा ।

34. धारा 33 के अधीन अवधारित रकम की वसूली-जहां कोई मुतवल्ली या अन्य व्यक्ति, जिसे धारा 33 की उपधारा (3) या उपधारा (5) के अधीन संदाय करने के लिए या किसी संपत्ति का कब्जा वापस लौटाने के लिए आदेश दिया गया है, ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट समय के भीतर ऐसा संदाय करने में या ऐसी संपत्ति को लौटाने में लोप करेगा या असफल रहेगा वहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी, बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से, पूर्वोक्त संपत्ति का कब्जा लेने के लिए ऐसी कार्रवाई करेगा जो वह ठीक समझे और वह उस जिले के, जिसमें ऐसे मुतवल्ली या अन्य व्यक्ति की संपत्ति स्थित है, कलक्टर को, एक प्रमाणपत्र भी भेजेगा जिसमें वह रकम कथित की जाएगी जो धारा 33 के अधीन, यथास्थिति, उसके द्वारा या अधिकरण द्वारा ऐसे मुतवल्ली या अन्य व्यक्ति द्वारा संदेय रकम के रूप में अवधारित की गई है और तब कलक्टर ऐसे प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम की वसूली इस प्रकार करेगा मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो और ऐसी रकम की वसूली किए जाने पर, उसे मुख्य कार्यपालक अधिकारी को संदत्त करेगा जो उसकी प्राप्ति पर, उस रकम को संबंधित वक्फ की निधियों में   जमा करेगा ।

35. अधिकरण द्वारा सशर्त कुर्की-(1) जहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी का समाधान हो जाता है कि मुतवल्ली या कोई अन्य व्यक्ति, जिसे धारा 33 की उपधारा (3) या उपधारा (5) के अधीन कोई संदाय करने का आदेश दिया गया है, उक्त आदेश के निष्पादन को विफल करने या उसमें विलंब करने के आशय से, -

                (क) अपनी संपूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग का व्ययन करने वाला है; या

                (ख) अपनी संपूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग को मुख्य कार्यपालक अधिकारी की अधिकारिता से हटाने वाला है,

वहां वह, बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से, उक्त संपत्ति या उसके किसी ऐसे भाग की जो वह आवश्यक समझे, सशर्त कुर्की के लिए अधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।

(2) मुख्य कार्यपालक अधिकारी, जब तक कि अधिकरण अन्यथा निदेश न दे, कुर्क की जाने के लिए अपेक्षित संपत्ति और उसके प्राक्कलित मूल्य को आवेदन में विनिर्दिष्ट करेगा ।

(3) अधिकरण, यथास्थिति, मुतवल्ली या संबंधित व्यक्ति को यह निदेश दे सकेगा कि वह उसके द्वारा नियत किए जाने वाले समय के भीतर, उक्त संपत्ति या उसके मूल्य को या उसके ऐसे भाग को, जो धारा 34 में निर्दिष्ट प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम को चुकाने के लिए पर्याप्त हो, अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत करने और उसके व्ययनाधीन रखने के लिए, जब भी अपेक्षित हो, या तो उतनी राशि की, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रतिभूति दे या हाजिर हो और यह हेतुक दर्शित करे कि उसे ऐसी प्रतिभूति क्यों नहीं  देनी चाहए ।

(4) अधिकरण, इस प्रकार विनिर्दिष्ट संपूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग की सशर्त कुर्की के लिए भी आदेश में, निदेश दे सकेगा ।

(5) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक कुर्की, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के उपबन्धों के अनुसार ऐसे की जाएगी मानो वह उक्त संहिता के उपबंधों के अधीन किया गया कुर्की का आदेश हो ।

अध्याय 5

ओक़ाफ़ का रजिस्ट्रीकरण

36. रजिस्ट्रीकरण-(1) प्रत्येक वक्फ, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृष्ट किया गया हो या उसके पश्चात्, बोर्ड के कार्यालय में रजिस्टर किया जाएगा ।

(2) रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन मुतवल्ली द्वारा किया जाएगा:

परन्तु ऐसे आवेदन [वाक़िफ़ अथवा] उसके वंशजों द्वारा या वक्फ के किसी हिताधिकारी या उस संप्रदाय के, जिसका वह वक्फ है, किसी भी मुसलमान द्वारा किए जा सकेंगे ।

(3) रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से और ऐसे स्थान पर किया जाएगा जिसका बोर्ड विनियमों द्वारा, अपबंध करे और उसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात्: -

                (क) वक्फ संपत्तियों का वर्णन, जो उनकी पहचान के लिए पर्याप्त हो;

                (ख) ऐसी संपत्तियों से सकल वार्षिक आय;

                (ग) भू-राजस्व, उपकरों, रेटों और करों की रकम जो वक्फ संपत्तियों की बाबत प्रतिवर्ष संदेय हैं;

                (घ) वक्फ संपत्तियों की आय की वसूली में हुए वार्षिक व्यय का प्राक्कलन;

                (ङ) वक्फ के अधीन निम्नलिखित के लिए अलग से रखी गई रकम: -

                                (i) मुतवल्ली का वेतन और विभिन्न व्यक्तियों के भत्ते;

                                (ii) पूर्णतः धार्मिक प्रयोजन;

                                (iii) पूर्त प्रयोजन; और

                                (iv) कोई अन्य प्रयोजन;

                (च) कोई अन्य विशिष्टियां जो बोर्ड, विनियमों द्वारा, उपबंधित करे ।

                (4) ऐसे प्रत्येक आवेदन के साथ वक्फ विलेख की एक प्रति होगी अथवा यदि ऐसा कोई विलेख निष्पादित नहीं किया गया है या उसकी प्रति प्राप्त नहीं की जा सकती है तो उसमें वक्फ के उद्गम, उसके स्वरूप और उसके उद्देश्यों की पूरी विशिष्टियां होंगी जहां तक कि वे आवेदक को ज्ञात हैं ।

                (5) उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक आवेदन आवेदक द्वारा जैसी ऐसी रीति से हस्ताक्षरित और सत्यापित किया जाएगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अभिवचनों को हस्ताक्षरित और सत्यापित करने के लिए उपबंधित है ।

                (6) बोर्ड आवेदक से कोई ऐसी अतिरिक्त विशिष्टियां या जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेगा जो वह आवश्यक समझे ।

                (7) रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन की प्राप्ति पर, बोर्ड वक्फ के रजिस्ट्रीकरण से पहले आवेदन के असली होने और उसकी विधिमान्यता और उसमें किन्हीं विशिष्टियों के सही होने के बारे में ऐसी जांच कर सकेगा जो वह ठीक समझे और जब आवेदन वक्फ संपत्ति का प्रशासन करने वाले व्यक्ति से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है तब बोर्ड वक्फ को रजिस्टर करने से पहले आवेदन की सूचना वक्फ संपत्ति का प्रशासन करने वाले व्यक्ति को देगा और यदि वह सुनवाई चाहता है तो उसको सुनेगा ।

                (8) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व सृष्ट ओक़ाफ़ की दशा में, रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन, ऐसे प्रारंभ से तीन मास के भीतर और ऐसे प्रारंभ के पश्चात् सृष्ट ओक़ाफ़ की दशा में वक्फ के सृष्ट किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर किया जाएगा:

                परन्तु जहां किसी वक्फ के सृष्ट किए जाने के समय कोई बोर्ड नहीं है वहां ऐसा आवेदन बोर्ड की स्थापना की तारीख से तीन मास के भीतर किया जाएगा ।

37. ओक़ाफ़ का रजिस्टर- [(1)] बोर्ड ओक़ाफ़ का एक रजिस्टर रखेगा जिसमें प्रत्येक वक्फ की बाबत वक्फ विलेखों की प्रतियां, जब उपलब्ध हों, और निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात्: -

                                (क) वक्फ का वर्ग;

                                (ख) मुतवल्ली का नाम;

(ग) वक्फ विलेख के अधीन अथवा रूढ़ि या प्रथा द्वारा मुतवल्ली के पद के उत्तराधिकार का नियम;

(घ) सभी वक्फ संपत्तियों की विशिष्टियां और उनसे संबंधित सभी हक विलेख और दस्तावेजें;

(ङ) रजिस्ट्रीकरण के समय प्रशासन की स्कीम और व्यय की स्कीम की विशिष्टियां ;

(च) ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं ।

                 [(2) बोर्ड ओक़ाफ़ के रजिस्टर में दर्ज संपत्तियों के ब्यौरे, वक्फ संपत्ति पर अधिकारिता रखने वाले संबंधित भू-अभिलेख कार्यालय को अग्रेषित करेगा ।

(3) भू-अभिलेख कार्यालय, उपधारा (2) में यथा उल्लिखित ब्यौरे प्राप्त करने पर स्थापित प्रक्रिया के अनुसार, या तो भू-अभिलेख में आवश्यक प्रविष्टियां करेगा या धारा 36 के अधीन वक्फ संपत्ति के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर अपनी आपत्तियां बोर्ड को संसूचित करेगा ।]

38. कार्यपालक अधिकारियों को नियुक्त करने की बोर्ड की शक्ति-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड यदि उसकी यह राय हो कि वक्फ के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं, ऐसे किसी वक्फ के लिए जिसकी कुल वार्षिक आय पांच लाख रुपए से कम नहीं है, पूर्णकालिक या अंशकालिक आधार पर या अवैतनिक रूप में कार्यपालक अधिकारी और साथ ही उतने सहायक कर्मचारिवृन्द जितने वह आवश्यक समझे, नियुक्त कर सकेगा:

परन्तु नियुक्ित के लिए चुना गया व्यक्ति, इस्लाम को मानने वाला होना चाहिए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रत्येक कार्यपालक अधिकारी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो केवल ऐसी वक्फ संपत्ति के प्रशासन से संबंधित है, जिसके लिए उसकी नियुक्ति की गई है और वह उन शक्तियों का प्रयोग और उन कर्तव्यों का निर्वहन बोर्ड के निदेश, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन करेगा:

परन्तु कार्यपालक अधिकारी जिसे ऐसे वक्फ के लिए नियुक्त किया गया है, जिसकी कुल वार्षिक आय पांच लाख रुपए से कम नहीं है, यह सुनिश्चित करेगा कि वक्फ का बजट प्रस्तुत किया जाए, वक्फ के लेखे नियमित रूप से रखे जाएं और लेखाओं का वार्षिक विवरण ऐसे समय के भीतर प्रस्तुत किया जाए जो बोर्ड विनिर्दिष्ट करे ।

(3) उपधारा (2) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करते समय कार्यपालक अधिकारी मुस्लिम विधि द्वारा स्वीकृत किन्हीं धार्मिक कर्तव्यों अथवा किसी प्रथा या रूढ़ि में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा ।

(4) कार्यपालक अधिकारी और उसके कर्मचारिवृन्द के वेतन और भत्ते बोर्ड द्वारा नियत किए जाएंगे और ऐसे वेतन की मात्रा नियत करने में बोर्ड वक्फ की आय, कार्यपालक अधिकारी के कर्तव्यों की सीमा और उनकी प्रकृति का सम्यक् ध्यान रखेगा तथा यह भी सुनिश्चित करेगा कि ऐसे वेतन और भत्तों की रकम वक्फ की आय से अननुपातिक न हो और उस पर कोई अनावश्यक वित्तीय भार न पड़े ।

(5) कार्यपालक अधिकारी और उसके कर्मचारिवृन्द के वेतन और भत्ते बोर्ड द्वारा वक्फ निधि में से संदत्त किए जाएंगे और यदि वक्फ को कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति के परिणामस्वरूप कोई अतिरिक्त आय प्राप्त होती है तो बोर्ड, संबंधित वक्फ निधि में से वेतन और भत्तों पर खर्च की गई रकम की प्रतिपूर्ति का दावा कर सकेगा ।

(6) बोर्ड, पर्याप्त कारणों से और कार्यपालक अधिकारी को या उसके कर्मचारिवृन्द के किसी सदस्य को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, कार्यपालक अधिकारी या उसके कर्मचारिवृन्द के किसी सदस्य को उसके पद से निलंबित कर सकेगा, हटा सकेगा या पदच्युत कर सकेगा ।

(7) ऐसा कोई कार्यपालक अधिकारी या उसके कर्मचारिवृन्द का ऐसा कोई सदस्य जो उपधारा (6) के अधीन पद से हटाए जाने या पदच्युत किए जाने के किसी आदेश से व्यथित है, आदेश के संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर आदेश के विरुद्ध अधिकरण को अपील कर सकेगा और अधिकरण ऐसे अभ्यावेदन पर जो बोर्ड ऐसे मामले में करे, विचार करने के पश्चात् और कार्यपालक अधिकारी को या उसके कर्मचारिवृन्द के किसी सदस्य को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, ऐसे आदेश की पुष्टि कर सकेगा, उसका उपान्तरण कर सकेगा या उसे उलट सकेगा ।

39. ऐसे ओक़ाफ़ के संबंध में, जो अस्तित्व में नहीं रहे हैं, बोर्ड की शक्तियां-(1) बोर्ड, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि वक्फ के उद्देश्य या उनका कोई भाग अस्तित्व में नहीं रह गया है, चाहे ऐसी समाप्ति इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व हुई हो, या उसके पश्चात्, तो विहित रीति से ऐसे वक्फ से संबंधित संपत्ति और निधि अभिनिश्चित करने के लिए जांच कराएगा जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा की जाएगी ।

(2) मुख्य कार्यपालक अधिकारी से जांच की रिपोर्ट प्राप्त होने पर, बोर्ड-

                (क) ऐसे वक्फ की संपत्ति और निधि को विनिर्दिष्ट करते हुए, आदेश पारित करेगा;

                (ख) यह निदेश देते हुए आदेश पारित करेगा कि ऐसे वक्फ से संबंधित संपत्ति या निधियां जो वसूल की गई हैं, किसी वक्फ संपत्ति के नवीकरण के लिए उपयोजित की जाएंगी या उपयोग में लाई जाएंगी और जहां ऐसा कोई नवीकरण किए जाने की आवश्यकता नहीं है अथवा जहां ऐसे नवीकरण के लिए निधियों का उपयोग संभव नहीं है वहां धारा 32 की उपधारा (2) के खंड (ङ) के उपखंड (iii) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों में से किसी के लिए विनियोजित की जाएंगी ।

(3) यदि बोर्ड के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी ऐसे भवन या अन्य स्थान का, जिसका उपयोग किसी धार्मिक प्रयोजन या शिक्षण के लिए या पूर्त कार्य के लिए किया जा रहा था, चाहे इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात्, उस प्रयोजन के लिए उपयोग किया जाना बन्द हो गया है तो वह अधिकरण को ऐसे भवन या अन्य स्थान के कब्जे को वापस लेने का निदेश देने वाले आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(4) यदि अधिकरण का ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि ऐसा भवन या अन्य स्थान-

                (क) वक्फ संपत्ति है;

                (ख) भूमि के अर्जन से संबंधित उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अर्जित नहीं किया गया है या वह किसी ऐसी विधि के अधीन अर्जन की प्रक्रिया के अधीन नहीं है या भूमि सुधार से संबंधित उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन राज्य सरकार में निहित नहीं हुआ है; और

(ग) किसी ऐसे व्यक्ति के अधिभोग में नहीं है जिसे ऐसे भवन या अन्य स्थान पर अधिभोग में रखने के लिए उस समय प्रवृत्त किसी विधि के द्वारा या उसके अधीन प्राधिकृत किया गया है तो वह-

(i) ऐसे किसी व्यक्ति से जिसका उस पर अप्राधिकृत कब्जा है, ऐसे भवन या स्थान को वापस लेने का निदेश देते हुए, आदेश कर सकेगा; और

(ii) यह निदेश देते हुए, आदेश कर सकेगा, कि ऐसी संपत्ति, भवन या स्थान का पूर्व की भांति धार्मिक प्रयोजन या शिक्षण के लिए उपयोग किया जाए, या यदि ऐसा उपयोग संभव न हो तो उसका उपयोग धारा 32 की उपधारा (2) के खंड (ङ) के उपखंड (iii) में विनिर्दिष्ट किसी प्रयोजन के लिए किया जाए ।

40. यह विनिश्चय कि क्या कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है-(1) बोर्ड किसी ऐसी संपत्ति के बारे में जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह वक्फ संपत्ति है, स्वयं जानकारी संगृहीत कर सकेगा और यदि इस बाबत कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई विशिष्ट संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं अथवा कोई वक्फ सुन्नी वक्फ है या शिया वक्फ तो वह ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह उचित समझे, उस प्रश्न का विनिश्चय कर सकेगा ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रश्न पर बोर्ड का विनिश्चय जब तक कि उसको अधिकरण द्वारा द्वारा प्रतिसंहृत या उपांतरित न कर दिया जाए, अंतिम होगा ।

                (3) जहां बोर्ड के पास यह विश्वास करने का कारण है कि भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) के अनुसरण में अथवा सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन या किसी अन्य अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी न्यास या सोसाइटी की कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है वहां बोर्ड, ऐसे अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी संपत्ति के बारे में जांच कर सकेगा और यदि ऐसी जांच के पश्चात् बोर्ड का समाधान हो जाता है कि ऐसी संपत्ति वक्फ संपत्ति है, तो वह, यथास्थिति, न्यास या सोसाइटी से मांग कर सकेगा कि वह ऐसी संपत्ति को इस अधिनियम के अधीन वक्फ संपत्ति के रूप में रजिस्ट्रीकृत कराए या इस बात का कारण बताए कि ऐसी संपत्ति को इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत क्यों नहीं किया जाए :

परन्तु ऐसे सभी मामलों में, इस उपधारा के अधीन की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना, उस प्राधिकारी को दी जाएगी जिसके द्वारा न्यास या सोसाइटी रजिस्ट्रीकृत की गई है ।

(4) बोर्ड, ऐसे हेतुक पर सम्यक् रूप से विचार करने के पश्चात् जो उपधारा (3) के अधीन जारी की गई सूचना के अनुसरण में दर्शित किया जाए, ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे, और बोर्ड द्वारा इस प्रकार किया गया आदेश अंतिम होगा जब तक कि वह किसी अधिकरण द्वारा प्रतिसंहृत या उपांतरित नहीं कर दिया जाता है ।

41. वक्फ का रजिस्ट्रीकरण कराने और रजिस्टर को संशोधित करने की शक्ति-बोर्ड, किसी वक्फ के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने के लिए या वक्फ के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध करने के लिए, मुतवल्ली को निदेश दे सकेगा अथवा वक्फ को स्वयं रजिस्टर करा सकेगा अथवा किसी समय ओक़ाफ़ के रजिस्टर को संशोधित कर सकेगा ।

42. वक्फ के प्रबंध में किए गए परिवर्तन का अधिसूचित किया जाना-(1) मुतवल्ली की मृत्यु या निवृत्ति या हटाए जाने के कारण किसी रजिस्ट्रीकृत वक्फ के प्रबंध में किसी परिवर्तन की दशा में, नया मुतवल्ली बोर्ड को उस परिवर्तन के बारे में तुरन्त अधिसूचित करेगा और कोई अन्य व्यक्ति ऐसा कर सकेगा ।

                (2) धारा 36 में उल्लिखित विशिष्टियों में से किसी में किसी अन्य परिवर्तन की दशा में, मुतवल्ली परिवर्तन होने के तीन मास के भीतर, बोर्ड को ऐसे परिवर्तन के बारे में अधिसूचित करेगा ।

43. इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व रजिस्ट्रीकृत ओक़ाफ़ का रजिस्ट्रीकृत समझा जाना-इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, यदि कोई वक्फ इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्टर किया गया है तो उस वक्फ को इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रजिस्टर कराना आवश्यक नहीं होगा और ऐसे प्रारंभ के पूर्व किया गया कोई ऐसा रजिस्ट्रीकरण इस अधिनियम के अधीन किया गया रजिस्ट्रीकरण समझा जाएगा ।

 

 

 

अध्याय 6

ओक़ाफ़ के लेखाओं का रखा जाना

44. बजट-(1) वक्फ का प्रत्येक मुतवल्ली प्रत्येक वर्ष ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष के लिए एक बजट तैयार करेगा, जिसमें उस वित्तीय वर्ष के दौरान प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किए जाएंगे ।

                (2) ऐसा प्रत्येक बजट वित्तीय वर्ष के आरंभ होने के कम से कम [तीस दिन] पूर्व मुतवल्ली द्वारा बोर्ड को प्रस्तुत किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित के लिए पर्याप्त उपबंध किया जाएगा, अर्थात्: -

                                (i) वक्फ के उद्देश्यों को पूरा करना;

                                (ii) वक्फ संपत्ति का अनुरक्षण और परिरक्षण करना;

                (iii) ऐसे सभी दायित्वों और विद्यमान प्रतिबद्धताओं का, जो इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन वक्फ के लिए आबद्धकर है, निर्वहन करना ।

                 1[(3) बोर्ड द्वारा बजट की किसी मद को वक्फ के उद्देश्यों और इस अधिनियम के उपबंधों के प्रतिकूल समझे जाने की दशा में, वह ऐसी मद के परिवर्धन या हटाए जाने के लिए ऐसा निदेश दे सकेगा, जो वह ठीक समझे ।]

                (4) यदि वित्तीय वर्ष के दौरान मुतवल्ली इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि प्राप्तियों या विभिन्न शीर्षों के अधीन खर्च की जाने वाली रकमों के वितरण के संबंध में बजट में किए गए उपबंधों को उपांतरित करना आवश्यक है तो वह बोर्ड को अनुपूरक या पुनरीक्षित बजट प्रस्तुत कर सकेगा और उपधारा (3) के उपबंध जहां तक हो सके, ऐसे अनुपूरक या पुनरीक्षित बजट को लागू होंगे ।

45. बोर्ड के सीधे प्रबंध के अधीन ओक़ाफ़ के लिए बजट का तैयार किया जाना-(1) मुख्य कार्यपालक अधिकारी, प्रत्येक वर्ष, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए, बोर्ड के सीधे प्रबंध के अधीन प्रत्येक वक्फ के लिए आगामी वित्तीय वर्ष के लिए एक बजट तैयार करेगा जिसमें प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किए जाएंगे और उसे बोर्ड को अनुमोदन के लिए प्रस्तुत करेगा ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन बजट प्रस्तुत करते समय, मुख्य कार्यपालक अधिकारी, एक ऐसी विवरणी भी तैयार करेगा, जिसमें बोर्ड के सीधे प्रबंध के अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक वक्फ की आय में वृद्धि के, यदि कोई हो, ब्यौरे तथा वे उपाय जो उसके बेहतर प्रबंध के लिए किए गए हैं तथा वर्ष के दौरान उनसे प्रोद्भूत होने वाले परिणाम दिए जाएंगे ।

                (3) मुख्य कार्यपालक अधिकारी नियमित लेखे रखेगा तथा बोर्ड के सीधे प्रबंध के अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक वक्फ के उचित प्रबंध के लिए उत्तरदायी होगा ।

                (4) मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा उपधारा (1) के अधीन प्रस्तुत किया गया प्रत्येक बजट धारा 46 की अपेक्षाओं का अनुपालन करेगा तथा इस प्रयोजन के लिए उसमें वक्फ के मुतवल्ली के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे मुख्य कार्यपालक अधिकारी के प्रति निर्देश हैं ।

                (5) बोर्ड के सीधे प्रबंध के अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक वक्फ लेखाओं की संपरीक्षा, राज्य स्थानीय निधि परीक्षक या किसी अन्य अधिकारी द्वारा, जो राज्य सरकार द्वारा इस प्रयोजन के लिए नियुक्त किया जाए, वक्फ की आय का विचार किए बिना, की जाएगी ।

                (6) धारा 47 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध तथा धारा 48 और 49 के उपबंध, जहां तक कि वे इस धारा के उपबंधों से असंगत नहीं हैं, इस धारा में निर्दिष्ट लेखाओं की संपरीक्षा को लागू होंगे ।

                (7) जहां कोई वक्फ, बोर्ड के सीधे प्रबंध के अधीन है वहां वक्फ द्वारा बोर्ड को ऐसे प्रशासनिक प्रभार संदेय होंगे जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं:

                परन्तु मुख्य कार्यपालक अधिकारी, बोर्ड के सीधे प्रबंध के अन्तर्गत आने वाले वक्फ की सकल वार्षिक आय के दस प्रतिशत से अधिक का प्रशासनिक प्रभारों के रूप में संग्रहण नहीं करेगा ।

46. ओक़ाफ़ के लेखाओं का प्रस्तुत किया जाना-(1) प्रत्येक मुतवल्ली नियमित लेखा रखेगा ।

                (2) जिस तारीख को धारा 36 में निर्दिष्ट आवेदन किया गया है उसकी ठीक अगली  [जुलाई के प्रथम दिन] के पहले, और तत्पश्चात् प्रतिवर्ष 2[जुलाई के प्रथम दिन] के पहले, प्रत्येक वक्फ का मुतवल्ली, यथास्थिति, मार्च के 31वें दिन को समाप्त होने वाली बारह मास की अवधि के दौरान अथवा उक्त अवधि के उस भाग के दौरान जिसके दौरान इस अधिनियम के उपबंध वक्फ को लागू हैं, वक्फ की ओर से मुतवल्ली द्वारा प्राप्त या व्यय की गई सभी धनराशियों का, ऐसे प्ररूप में और ऐसी विशिष्टियों को अन्तर्विष्ट करने वाला, जो बोर्ड द्वारा विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं, एक पूरा और सही लेखा विवरण तैयार करेगा और बोर्ड को देगा :

                परन्तु उस तारीख में जिसको वार्षिक लेखा बन्द किए जाने हैं, बोर्ड के विवेकानुसार परिवर्तन किया जा सकेगा ।

47. ओक़ाफ़ के लेखाओं की संपरीक्षा-(1) धारा 46 के अधीन बोर्ड को प्रस्तुत किए गए ओक़ाफ़ के लेखाओं की संपरीक्षा और जांच निम्नलिखित रीति से की जाएगी, अर्थात्: -

(क) ऐसे वक्फ की दशा में जिसकी कोई आय नहीं है या जिसकी शुद्ध वार्षिक आय [पचास हजार रुपए] से अधिक नहीं है, लेखाओं के विवरण का प्रस्तुत किया जाना धारा 46 के उपबंधों का पर्याप्त अनुपालन होगा तथा ऐसे दो प्रतिशत ओक़ाफ़ के लेखाओं की संपरीक्षा बोर्ड द्वारा नियुक्त संपरीक्षक द्वारा प्रतिवर्ष की जाएगी;

(ख) ऐसे वक्फ के, जिसकी शुद्ध वार्षिक आय 1[पचास हजार रुपएट से अधिक है, लेखाओं की संपरीक्षा प्रत्येक वर्ष या ऐसे अंतरालों पर, जो विहित किए जाएं, ऐसे संपरीक्षक द्वारा की जाएगी, जो राज्य सरकर द्वारा तैयार किए गए संपरीक्षकों के पैनल में से बोर्ड द्वारा नियुक्त किया गया हो तथा संपरीक्षकों का ऐसा पैनल तैयार करते समय राज्य सरकार संपरीक्षकों का पारिश्रमिक मान विनिर्दिष्ट करेगी;

(ग) राज्य सरकार [बोर्ड को सूचित करते हुए] किसी भी समय, किसी वक्फ के लेखा की संपरीक्षा राज्य स्थानीय निधि परीक्षक द्वारा अथवा उस प्रयोजन के लिए राज्य सरकार द्वारा अभिहित किसी अन्य अधिकारी द्वारा करा सकेगी ।

                (2) संपरीक्षक अपनी रिपोर्ट बोर्ड को प्रस्तुत करेगा और संपरीक्षक की रिपोर्ट में, अन्य बातों के साथ-साथ, अनियमित, अवैध या अनुचित व्यय के अथवा धन या अन्य संपत्ति को वसूल करने की असफलता के, जो उपेक्षा या अवचार के कारण हुई हो, सभी मामलों को तथा किसी अन्य मामले को, जिसकी रिपोर्ट करना संपरीक्षक आवश्यक समझता है, विनिर्दिष्ट किया जाएगा, तथा रिपोर्ट में किसी ऐसे व्यक्ति का नाम भी होगा जो संपरीक्षक की राय में ऐसे व्यय या असफलता के लिए जिम्मेदार है और ऐसे प्रत्येक मामले में संपरीक्षक उस व्यय या हानि की रकम को ऐसे व्यक्ति द्वारा देय प्रमाणित करेगा ।

                (3) वक्फ के लेखाओं की संपरीक्षा का खर्च उस वक्फ की निधि में से दिया जाएगा:

                परन्तु ऐसे ओक़ाफ़ के संबंध में, जिनकी शुद्ध वार्षिक आय 1[पचास हजार रुपए से अधिक] है, राज्य सरकार द्वारा बनाए गए पैनल में से नियुक्त संपरीक्षकों का पारिश्रमिक, उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट पारिश्रमिक मान के अनुसार दिया जाएगा:

                परन्तु यह और कि जहां किसी वक्फ के लेखाओं की संपरीक्षा राज्य स्थानीय निधि परीक्षक या किसी अन्य ऐसे अधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार ने इस निमित्त अभिहित किया है, की जाती है वहां ऐसी संपरीक्षा का खर्च ऐसे वक्फ की शुद्ध वार्षिक आय के डेढ़ प्रतिशत से अधिक नहीं होगा और ऐसा खर्च संबंधित वक्फ की निधि में से पूरा किया जाएगा ।

48. संपरीक्षक की रिपोर्ट पर बोर्ड द्वारा आदेश का पारित किया जाना-(1) बोर्ड संपरीक्षक की रिपोर्ट की रिपोर्ट की जांच करेगा और उसमें उल्लिखित किसी मामले के बारे में किसी व्यक्ति से स्पष्टीकरण मांग सकेगा तथा रिपोर्ट के बारे में ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे और उनके अन्तर्गत ऐसी रकम की वसूली के लिए आदेश भी होंगे जो संपरीक्षक द्वारा धारा 47 की उपधारा (2) के अधीन प्रमाणित की गई है ।

                (2) मुतवल्ली या कोई अन्य ऐसा व्यक्ति जो बोर्ड द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित है, आदेश की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर, आदेश का उपांतरण करने या उसे अपास्त करने के लिए अधिकरण को आवेदन कर सकेगा तथा अधिकरण, ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, आदेश की पुष्टि या उपांतरण कर सकेगा अथवा इस प्रकार प्रमाणित रकम का, पूर्णतः या भागतः, परिहार कर सकेगा तथा खर्च के बारे में ऐसा आदेश भी कर सकेगा जो वह मामले की परिस्थितियों में समुचित समझे ।

                (3) उपधारा (2) के अधीन किया गया कोई आवेदन अधिकरण द्वारा तभी ग्रहण किया जाएगा जब धारा 47 की उपधारा (2) के अधीन संपरीक्षक द्वारा प्रमाणित रकम पहले अधिकरण में निक्षिप्त कर दी गई हो और अधिकरण को उपधारा (1) के अधिन बोर्ड द्वारा किए गए आदेश का प्रवर्तन रोकने की कोई शक्ति नहीं होगी ।

                (4) उपधारा (2) के अधीन अधिकरण द्वारा किया गया आदेश अंतिम होगा ।

                (5) ऐसी प्रत्येक रकम, जिसकी वसूली के लिए उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन कोई आदेश किया गया है, जहां ऐसी रकम असंदत्त रहती है, वहां, धारा 34 या धारा 35 में विनिर्दिष्ट रीति से उसी प्रकार वसूल की जा सकेगी मानो उक्त आदेश धारा 35 की उपधारा (3) के अधीन अवधारित किसी रकम की वसूली के लिए हो ।

49. देय प्रमाणित की गई राशियों का भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल किया जा सकना-(1) संपरीक्षक द्वारा धारा 47 के अधीन अपनी रिपोर्ट में किसी व्यक्ति द्वारा देय प्रमाणित की गई प्रत्येक राशि जब तक कि ऐसा प्रमाणपत्र धारा 48 के अधीन बोर्ड या अधिकरण द्वारा दिए गए किसी आदेश से परिवर्तित या रद्द नहीं कर दिया जाता है और परिवर्तित प्रमाणपत्र पर देय प्रत्येक राशि, बोर्ड द्वारा उसके लिए जारी की गई मांग की तामील के पश्चात् साठ दिन के भीतर ऐसे व्यक्ति द्वारा संदत्त की जाएगी ।

                (2) यदि ऐसा संदाय उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार नहीं किया जाता है तो ऐसी संदेय राशि संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् बोर्ड द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्र पर उसी रीति से वसूल की जा सकेगी जिससे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ।

50. मुतवल्लियों के कर्तव्य-प्रत्येक मुतवल्ली का कर्तव्य होगा कि वह-

(क) बोर्ड के निदेशों को इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के उपबंधों के अनुसार कार्यान्वित करे;

(ख) ऐसी विवरणियां दे और ऐसी जानकारी या विशिष्टियों का प्रदाय करे जिनकी बोर्ड द्वारा इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के उपबंधों के अनुसार समय-समय पर अपेक्षा की जाए;

(ग) वक्फ संपत्तियों, लेखाओं या अभिलेखों या विलेखों और उनसे संबंधित दस्तावेजों का निरीक्षण अनुज्ञात करे;

(घ) सभी लेकदेयों का भुगतान करे; और

(ङ) ऐसा कोई अन्य कार्य करे जिसे करने के लिए उससे इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन विधिपूर्वक अपेक्षा की गई है ।

51. बोर्ड की मंजूरी के बिना वक्फ संपत्ति के अन्य संक्रामण का शून्य होना- [(1) वक्फ विलेख में किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसी स्थावर संपत्ति का, जो वक्फ संपत्ति है, कोई पट्टा तब तक शून्य होगा, जब तक ऐसा पट्टा बोर्ड की पूर्व मंजूरी से न किया गया हो:

परंतु किसी मस्जिद, दरगाह, खानकाह, कब्रिस्तान या इमाबाड़े का पट्टा, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश राज्य में के किन्हीं अनुप्रयुक्त कब्रिस्तानों के सिवाय जहां ऐसा कब्रिस्तान वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व पट्टे पर दिया जा चुका है, नहीं किया जाएगा ।

(1क) वक्फ संपत्ति का कोई विक्रय, दान, विनिमय, बंधक या अंतरण आरंभ से ही शून्य होगा:

परंतु यदि बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि किसी वक्फ संपत्ति को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विकसित किया जा सकता है, तो वह कारणों को लेखबद्ध करके, उस संपत्ति का विकास कार्य, ऐसे अभिकरण के माध्यम से और ऐसी रीति में, जो बोर्ड द्वारा अवधारित किए जाएं, करा सकेगा और ऐसी वक्फ संपत्ति के विकास की सिफारिशों वाला एक संकल्प ला सकेगा जिसे बोर्ड की कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित किया जाएगा: 

परंतु यह और कि इस उपधारा की कोई बात भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) या भूमि अर्जन से संबंधित किसी अन्य विधि के अधीन किसी लोक प्रयोजन के लिए वक्फ संपत्तियों के किसी अर्जन पर प्रभाव नहीं डालेगी यदि ऐसा अर्जन बोर्ड के परामर्श से किया जाता है:

परंतु यह भी कि, -

(क) अर्जन, उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 (1991 का 42) के उल्लंघन में नहीं होगा;

(ख) वह प्रयोजन, जिसके लिए भूमि का अर्जन किया जा रहा है, निर्विवाद रूप से सार्वजनिक प्रयोजन होगा;

(ग) ऐसी कोई वैकल्पिक भूमि उपलब्ध नहीं है, जो उस प्रयोजन के लिए अधिक या कम उपयुक्त समझी जाएगी;

(घ) वक्फ के हित और उद्देश्य को पर्याप्त रूप से सुरक्षित रखने के लिए प्रतिकर, प्रचलित बाजार मूल्य पर होगा अथवा अर्जित भूमि के स्थान पर उचित मुआवजे सहित, कोई उपयुक्त भूमि होगा ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

52. धारा 51 के उल्लघंन में अंतरित की गई वक्फ संपत्ति का वापस लिया जाना-(1) यदि बोर्ड का, ऐसी रीति से जांच करने के पश्चात्, जो विहित की जाए, यह समाधान हो जाता है कि किसी वक्फ की कोई स्थावर संपत्ति, जो धारा 36 के अधीन रखे गए ओक़ाफ़ के रजिस्टर में उस रूप में दर्ज है, धारा 51  [या धारा 56] के उपबंधों के उल्लंघन में बोर्ड की पूर्व मंजूरी के बिना अंतरित की गई है तो वह उस कलक्टर को, जिसकी अधिकारिता के भीतर वह संपत्ति स्थित है, उस संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने और उसे उसका परिदान करने की अध्यपेक्षा भेज सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अध्यपेक्षा की प्राप्ति पर, कलक्टर उस व्यक्ति को, जिसके कब्जे में संपत्ति है, यह निदेश देने वाला आदेश पारित कर सकेगा कि वह आदेश की तामील की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर बोर्ड की संपत्ति का परिदान कर दे ।

(3) उपधारा (2) के अधीन पारित प्रत्येक आदेश की तामील निम्न प्रकार से की जाएगी, अर्थात्:-

                (क) वह आदेश उस व्यक्ित को जिसके लिए वह आशयित है, देकर या उसका उसे निविदान करके या डाक द्वारा भेजकर; या

                (ख) यदि ऐसा व्यक्ति नहीं पाया जा सकता है तो आदेश को उसके अंतिम ज्ञात निवास-स्थान या कारबार के स्थान के किसी सहजदृश्य भाग में लगाकर अथवा आदेश को उसके कुटुम्ब के किसी वयस्क पुरुष सदस्य या, सेवक को देकर या उसका उसको निविदान करके या उसे उस संपत्ति के, जिससे वह संबंधित है, किसी सहजदृश्य भाग में लगवाकर:

परन्तु यदि वह व्यक्ति, जिस पर आदेश की तामील की जानी है, अवयस्क है तो उसके संरक्षक पर अथवा उसके कुटुम्ब के किसी वयस्क पुरुष सदस्य या सेवक पर की गई तामील उस अवयस्क पर तामील समझी जाएगी ।

(4) उपधारा (2) के अधीन कलक्टर के आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, आदेश की तामील की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे अधिकरण को अपील कर सकेगा जिसकी अधिकारिता के भीतर वह संपत्ति स्थित है और ऐसी अपील पर उस अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा । 

(5) जहां उपधारा (2) के अधीन पारित किसी आदेश का अनुपालन नहीं किया गया है तथा ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील करने का समय अपील किए बिना समाप्त हो गया है अथवा उस समय के भीतर की गई अपील, यदि कोई हो, खारिज कर दी गई है वहां कलक्टर उस संपत्ति का कब्जा, जिसके बारे में आदेश किया गया है, ऐसा बल प्रयोग करके, यदि कोई हो, प्राप्त करेगा जो उस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो, और उसका बोर्ड को परिदान करेगा ।

(6) इस धारा के अधीन अपने कृत्यों का प्रयोग करने में कलक्टर का मार्गदर्शन ऐसे नियमों से होगा, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।

 [52क. बोर्ड की मंजूरी के बिना वक्फ संपत्ति के अन्यसंक्रामण के लिए शास्ति-(1) जो कोई, ऐसी जंगम या स्थावर संपत्ति का, जो वक्फ संपत्ति है, बोर्ड की पूर्व मंजूरी के बिना, किसी भी प्रकार की किसी रीति में, चाहे स्थायी रूप से अस्थायी रूप से, अन्य संक्रामण करेगा या क्रय करेगा, या कब्जा लेगा, वह ऐसी अवधि के कठोर कारावास से, जो दो वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा:

परंतु इस प्रकार अन्यसंक्रामित वक्फ संपत्ति, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसके लिए किसी प्रतिकर के बिना बोर्ड में निहित हो जाएगी ।

(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन दंडनीय कोई अपराध संज्ञेय और अजमानतीय होगा ।

(3) कोई न्यायालय इस धारा के अधीन किसी अपराध का संज्ञान बोर्ड या इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा किए गए परिवाद पर करने के सिवाय नहीं करेगा ।

(4) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से निम्नतर कोई न्यायालय इस धारा के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।]

53. वक्फ की ओर से संपत्ति के क्रय पर निर्बन्धन-वक्फ विलेख में किसी बात के होते हुए भी, किसी वक्फ के लिए या उसकी ओर से किसी वक्फ की निधियों में से कोई स्थावर संपत्ति बोर्ड की पूर्व मंजूरी से ही क्रय की जाएगी, अन्यथा नहीं तथा बोर्ड ऐसी मंजूरी तब तक नहीं देगा, जब तक कि उसका यह विचार न हो कि ऐसी संपत्ति का अर्जन वक्फ के लिए आवश्यक या फायदाप्रद है तथा उसके लिए दी जाने के लिए प्रस्थापित कीमत पर्याप्त और युक्तियुक्त है:

परन्तु ऐसी मंजूरी दिए जाने के पूर्व, प्रस्थापित संव्यवहार से संबंधित विशिष्टियां राजपत्र में प्रकाशित की जाएंगी जिसमें उनकी बाबत आक्षेप और सुझाव आमंत्रित किए जाएंगे तथा बोर्ड उन आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात् जो उसे मुतवल्लियों या वक्फ में हितबद्ध अन्य व्यक्तियों से प्राप्त हों, ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे ।

54. वक्फ संपत्ति से अधिक्रमणों का हटाया जाना-(1) जब कभी मुख्य कार्यपालक अधिकारी का, कोई शिकायत प्राप्त होने पर या स्वप्रेरणा से, यह विचार हो कि किसी ऐसी भूमि, भवन, जगह या अन्य संपत्ति पर, जो वक्फ संपत्ति है और जो इस अधिनियम के अधीन उस रूप में रजिस्ट्रीकृत की गई है, कोई अधिक्रमण हुआ है तो वह अधिक्रमणकर्ता पर ऐसी सूचना की तामील कराएगा जिसमें अधिक्रमण की विशिष्टियां विनिर्दिष्ट की जाएंगी और उससे ऐसी तारीख के पूर्व, जो सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, यह हेतुक दर्शित करने की मांग की जाएगी कि उससे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व अधिक्रमण को हटाने की अपेक्षा करने वाला आदेश क्यों न किया जाए, तथा ऐसी सूचना की प्रति संबंधित मुतवल्ली को भी भेजेगा ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट सूचना की तामील ऐसी रीति से की जाएगी जो विहित की जाए ।

(3) यदि सूचना में विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान प्राप्त आक्षेपों पर विचार करने के पश्चात् तथा ऐसी रीति से जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए, मुख्य कार्यपालक अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि प्रश्नगत संपत्ति वक्फ संपत्ति है और ऐसी किसी वक्फ संपत्ति पर अधिक्रमण हुआ है [तो वह ऐसे अधिक्रमण को हटाए जाने हेतु बेदखली का आदेश प्रदान करने के लिए अधिकरण को आवेदन कर सकेगा] तथा अधिक्रमण की गई भूमि, भवन, जगह या अन्य संपत्ति का कब्जा वक्फ के मुतवल्ली को परिदत्त कर सकेगा ।

 [(4) अधिकरण, मुख्य कार्यपालक अधिकारी से ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर, उसके कारण अभिलिखित करके यह निदेश देते हुए कि वक्फ संपत्ति उन सभी व्यक्तियों द्वारा खाली की जाएगी जो उसके या उसके किसी भाग के अधिभोग में हों, बेदखली के आदेश करेगा और आदेश की एक प्रति वक्फ संपत्ति के किसी बाह्य द्वार पर या अन्य सहजदृश्य भाग पर चिपकवाएगा:

परंतु अधिकरण, बेदखली का कोई आदेश करने से पूर्व, उस व्यक्ति को सुने जाने का अवसर देगा जिसके विरुद्ध मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा बेदखली का आवेदन किया गया है ।

(5) यदि कोई व्यक्ति, उपधारा (2) के अधीन आदेश चिपकाने की तारीख से पैंतालीस दिन के भीतर बेदखली के आदेश का अनुपालन करने से इंकार करता है या असफल रहता है, तो मुख्य कार्यपालक अधिकारी या इन निमित्त उसके द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति वक्फ संपत्ति से उस व्यक्ति को बेदखल कर सकेगा और उसका कब्जा ले सकेगा ।]

55. धारा 54 के अधीन किए गए आदेशों का प्रवर्तन-जहां धारा 54 का  [उपधारा (4)] के अधीन किसी अधिक्रमण को हटाने के लिए आदिष्ट व्यक्ति, यथास्थिति, उस आदेश में विनिर्दिष्ट समय के भीतर ऐसे अधिक्रमण को हटाने में लोप करता है या असफल रहता है अथवा उस भूमि, भवन, जगह या अन्य संपत्ति को, जिससे आदेश संबंधित है, पूर्वोक्त समय के भीतर खाली करने में असफल रहता है वहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी 2[उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह भूमि, भवन, जगह या अन्य संपत्ति स्थित है, अधिक्रमणकर्ता को बेदखल करने के लिए अधिकरण के आदेश को निर्दिष्ट कर सकेगाट और तब ऐसा मजिस्ट्रेट अधिक्रमणकर्ता को यह निदेश देते हुए आदेश करेगा कि वह, यथास्थिति, अधिक्रमण को हटा ले अथवा उस भूमि, भवन, जगह या अन्य संपत्ति को खाली कर दे और उसका कब्जा संबंधित मुतवल्ली को परिदत्त कर दे तथा उस आदेश का अनुपालन करने में व्यतिक्रम की दशा में, मजिस्ट्रेट, यथास्थिति, अधिक्रमण को हटा सकेगा या अधिक्रमणकर्ता को उस भूमि, भवन, जगह या अन्य सम्पत्ति से बेदखल कर सकेगा तथा इस प्रयोजन के लिए ऐसी पुलिस सहायता ले सकेगा, जो आवश्यक हो ।

 [55क. अप्राधिकृत अधिभोगियों द्वारा वक्फ संपत्ति पर छोड़ी गई संपत्ति का व्ययन-(1) जहां कोई व्यक्ति धारा 54 की उपधारा (4) के अधीन किसी वक्फ की संपत्ति से बेदखल किया गया है, वहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी, उस व्यक्ति को, जिसके कब्जे से वक्फ की संपत्ति ली गई है, चौदह दिन की सूचना देने के पश्चात् और उस सूचना को उस परिक्षेत्र में परिचालित किए जाने वाले कम से कम एक समाचारपत्र में प्रकाशित करने के पश्चात् और वक्फ संपत्ति के सहजदृश्य भाग पर चिपकाकर सूचना की अंतर्वस्तुओं की उद्घोषणा करने के पश्चात् ऐसे परिसर पर शेष किसी संपत्ति को हटा सकेगा या हटवा सकेगा या लोक नीलामी द्वारा उसका व्ययन    कर सकेगा ।

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई संपत्ति विक्रीत की जाती है, वहां हटाने, विक्रय करने से संबंधित व्ययों और ऐसे अन्य व्ययों किराए, नुकसानी या खर्चों के बकायों के मद्दे राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी या निगमित प्राधिकरण को शोध्य रकम, यदि कोई हो, की कटौती करने के पश्चात् विक्रय आगम ऐसे व्यक्ति को संदत्त किए जाएंगे जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी को उसका हकदार प्रतीत हो:

परंतु जहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी उस व्यक्ति के बारे में जिसको अतिशेष रकम संदेय है या उसका प्रभाजन करने के बारे में विनिश्चय करने में असमर्थ है तो वह ऐसा विवाद अधिकरण को निर्दिष्ट कर सकेगा और उस पर अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा ।]

56. वक्फ संपत्ति का पट्टा अनुदत्त करने की शक्ति पर निर्बन्धन-(1) किसी ऐसी स्थावर संपत्ति का, जो वक्फ संपत्ति है, [तीस वर्ष से अधिक की किसी अवधि के लिए पट्टा,] वक्फ विलेख या लिखत में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, शून्य और प्रभावहीन होगा:

 [परंतु तीस वर्ष तक की किसी अवधि के लिए कोई पट्टा वाणिज्यिक क्रियाकलापों, शिक्षा या स्वास्थ्य प्रयोजनों के लिए राज्य सरकार के अनुमोदन से, ऐसी अवधि और प्रयोजनों के लिए किया जा सकेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं:

परंतु यह और कि किसी स्थावर वक्फ संपत्ति जो कि एक कृषि भूमि है, का तीन वर्ष से अधिक की अवधि का पट्टा वक्फ के विलेख या लिखत या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी शून्य होगा और उसका कोई प्रभाव नहीं होगा:

परंतु यह भी कि किसी वक्फ संपत्ति का पट्टा करने से पूर्व बोर्ड, पट्टे के ब्यौरे कम से कम एक प्रमुख राष्ट्रीय और प्रादेशिक समाचारपत्रों में प्रकाशित करेगा और बोली आमंत्रित करेगा ।]

(2) किसी ऐसी स्थावर सम्पत्ति का, जो वक्फ संपत्ति है, [एक वर्ष से अधिक और तीस वर्ष से अनधिक की किसी अवधि के लिए पट्टा,] वक्फ विलेख या लिखत में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, शून्य और प्रभावहीन होगा, जब तक कि वह बोर्ड की पूर्व मंजूरी से नहीं किया जाता है ।

(3) बोर्ड, इस धारा के अधीन पट्टा । । । दिए जाने या उसका नवीकरण किए जाने के लिए मंजूरी देने में, उन निबंधनों और शर्तों का पुनर्विलोकन करेगा, जिन पर ऐसे पट्टे 2। । । का दिया जाना या उसका नवीकरण किया जाना स्थापित है तथा ऐसे निबंधनों और शर्तों का पुनरीक्षण किए जाने के अधीन रहते हुए ऐसी रीति से, जो वह निदिष्ट करे, उसका अनुमोदन करेगा:

 [परंतु बोर्ड, किसी वक्फ संपत्ति के तीन वर्ष से अधिक की किसी अवधि के लिए किसी पट्टे के संबंध में तुरंत राज्य सरकार को सूचना देगा और तत्पश्चात् वह उस तारीख से, जिसको बोर्ड राज्य सरकार को सूचना देता है, पैंतालीस दिन की समाप्ति के पश्चात् प्रभावी हो सकेगा ।]

3[(4) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किंतु उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

57. वक्फ संपत्ति की आय में से कतिपय खर्चों का संदाय करने के लिए मुतवल्ली का हकदार होना-वक्फ विलेख में किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक मुतवल्ली वक्फ सम्पत्ति की आय में से ऐसे किन्हीं व्ययों का संदाय कर सकेगा जो उसके द्वारा धारा 36 के अधीन कोई विशिष्टियां, दस्तावेजें या प्रतियां अथवा धारा 46 के अधीन कोई लेखा अथवा बोर्ड द्वारा अपेक्षित कोई जानकारी या दस्तावेजें देने के लिए अपने को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए अथवा बोर्ड के निदेशों को कार्यान्वित करने के लिए अपने को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए उचित रूप से उपगत किए गए हों ।

58. मुतवल्ली द्वारा व्यतिक्रम की दशा में देयों का संदाय करने की बोर्ड की शक्ति-(1) जहां मुतवल्ली ऐसे किसी राजस्व, उपकर, रेट या कर का संदाय करने से इन्कार करता है या संदाय करने में असफल रहता है जो सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी को देय हो, वहां बोर्ड उन देयों का वक्फ निधि में से भुगतान कर सकेगा और इस प्रकार संदत्त की गई रकम को वक्फ सम्पत्ति में से वसूल कर सकेगा तथा इस प्रकार संदत्त की गई रकम के साढ़े बारह प्रतिशत से अनधिक नुकसानी को भी वूसल कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन देय कोई धनराशि, संबंधित मुतवल्ली को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, बोर्ड द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्र पर उसी रीति से वसूल की जा सकेगी जिससे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ।

59. आरक्षित निधि का सजृन-ऐसे किराए और राजस्व के उपकर, रेट और करों का संदाय करने के लिए जो सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी को देय हों, वक्फ संपत्ति की मरम्मत के खर्चे का भुगतान करने तथा वक्फ संपत्ति के परिरक्षण के लिए उपबंध करने के प्रयोजन के लिए बोर्ड, वक्फ की आय में से एक आरक्षित निधि के, ऐसी रीति से सृजन और अनुरक्षण का निदेश दे सकेगा, जिसे वह ठीक समझे ।

60. समय का बढ़ाया जाना-यदि बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है तो वह उस समय को, जिसके भीतर इस अधिनियम के अधीन मुतवल्ली द्वारा कोई कार्य किया जाना अपेक्षित है, बढ़ा सकेगा ।

61. शास्तियां-(1) यदि कोई मुतवल्ली-

                (क) वक्फ के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने में;

                (ख) इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित विशिष्टियों या लेखाओं के विवरण या विवरणियां देने में;

                (ग) बोर्ड द्वारा अपेक्षित जानकारी या विशिष्टियों का प्रदाय करने में;

                (घ) वक्फ संपत्तियों, लेखाओं या अभिलेखों या विलेखों और उनसे संबंधित दस्तावेजों का निरीक्षण अनुज्ञात करने में;

(ङ) बोर्ड या अधिकरण द्वारा आदेश दिए जाने पर किसी वक्फ संपत्ति के कब्जे का परिदान करने में;

(च) बोर्ड के निदेशों को कार्यान्वित करने में;

(छ) किन्हीं लोक देयों का भुगतान करने में; या

(ज) कोई ऐसा अन्य कार्य करने में जिसे करने के लिए वह इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन विधिपूर्वक अपेक्षित है,

असफल रहेगा तो वह, जब तक कि वह न्यायालय या अधिकरण का यह समाधान नहीं कर देता है कि उसकी असफलता के लिए उचित कारण था, जुर्माने से, [जो खंड (क) से खंड (घ) के अननुपालन के लिए दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा और खंड (ङ) से खंड (ज) के अननुपालन की दशा में, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा] ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि-

(क) मुतवल्ली किसी वक्फ के अस्तित्व को छिपाने की दृष्टि से, -

(i) ऐसे वक्फ की दशा में, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृष्ट किया गया था, धारा 36 की उपधारा (8) में उसके लिए विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर; या

(ii) किसी ऐसे वक्फ की दशा में, जो ऐसे समय प्रारम्भ के पश्चात् सृष्ट किया गया था, वक्फ के सृजन की तारीख से तीन मास के भीतर,

                इस अधिनियम के अधीन उसके रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने का लोप करेगा या उसमें असफल रहेगा; या

                (ख) कोई मुतवल्ली, बोर्ड को कोई विवरण, विवरणी या जानकारी देगा, जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह किसी तात्त्विक विशिष्टि में मिथ्या, भ्रामक, असत्य या गलत है,

तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो पन्द्रह रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।

                (3) कोई भी न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान, बोर्ड अथवा बोर्ड द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप में प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

                (4) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

                (5) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन अधिरोपित जुर्माना वसूल कर लिए जाने पर, वक्फ निधि में जमा किया जाएगा ।

                (6) प्रत्येक ऐसे मामले में जिसमें अपराधी इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है, जो उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय है और उसे जुर्माने का दण्डादेश दिया जाता है, न्यायालय जुर्माने के संदाय के व्यतिक्रम में ऐसी अवधि का कारावास भी अधिरोपित करेगा, जो विधि द्वारा ऐसे व्यतिक्रम के लिए प्राधिकृत हो ।

62. मुतवल्ली द्वारा अपनी प्रतिरक्षा के लिए वक्फ के किसी धन का व्यय किया जाना-कोई मुतवल्ली किसी ऐसे खर्च, प्रभार या व्यय को पूरा करने के लिए जो उसे पद से हटाए जाने के लिए या उससे आनुषंगिक किसी वाद, अपील या किसी अन्य कार्यवाही के संबंध में या उसके विरुद्ध कोई अनुशासनिक कार्रवाई किए जाने के लिए उसके द्वारा किए जाते हैं, या किए जाएं, उस वक्फ की निधियों में से जिसका वह मुतवल्ली है, कोई धन व्यय नहीं करेगा ।

63. कुछ दशाओं में मुतवल्ली नियुक्त करने की शक्ति-जब किसी वक्फ के मुतवल्ली का पद रिक्त हो जाए और ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे वक्फ विलेख के निबन्धनों के अधीन नियुक्त किया जाए तब अथवा जहां मुतवल्ली के रूप में कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति का अधिकार विवादग्रस्त हो वहां, बोर्ड मुतवल्ली के रूप में कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति को ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों पर नियुक्त कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

64. मुतवल्ली का हटाया जाना-(1) किसी अन्य विधि या वक्फ विलेख में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड किसी मुतवल्ली को उसके पद से हटा सकेगा, यदि ऐसा मुतवल्ली-

                                (क) धारा 61 के अधीन दण्डनीय अपराध के लिए एक से अधिक बार दोषसिद्ध किया गया है; अथवा

(ख) आपराधिक न्यास भंग के किसी अपराध के लिए या ऐसे किसी अन्य अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, जिसमें नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है और ऐसी दोषसिद्धि को उलट नहीं दिया गया है और उस अपराध की बाबत उसे पूर्ण क्षमा प्रदान नहीं कर दी गई है; अथवा

(ग) विकृतचित का है या किसी ऐसे अन्य मानसिक या शारीरिक त्रुटि से ग्रस्त है, जो उसे मुतवल्ली के कृत्यों का पालन और कर्तव्यों का निर्वहन करने के अयोग्य बना दे; अथवा

                                (घ) अनुन्मोचित दिवालिया है; अथवा

(ङ) लिकर या अन्य स्िप्रटयुक्त निर्मितियां पीने का आदी साबित हो जाता है या स्वापक ओषधि का सेवन करने का आदी है; अथवा

(च) वक्फ की और से या वक्फ के विरुद्ध सवेतन विधि व्यवसायी के रूप में नियोजित है; अथवा

(छ) लगातार दो वर्ष तक ऐसे नियमित लेखाओं को रखने में, युक्तियुक्त हेतुक के बिना, असफल रहा है अथवा लगातार दो वर्षों में वह वार्षिक लेखा विवरण देने में असफल रहा है जो धारा 46 की उपधारा (2) द्वारा अपेक्षित है; अथवा

(ज) किसी वक्फ संपत्ति की बाबत किसी विद्यमान पट्टे में अथवा वक्फ के साथ की गई किसी संविदा या उसके लिए किए जाने वाले किसी कार्य में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः हितबद्ध है अथवा उसके द्वारा ऐसे वक्फ को देय कोई राशि उस पर बकाया है; अथवा

(झ) वक्फ के संबंध में अथवा किसी धन या अन्य वक्फ संपत्ति की बाबत अपने कर्तव्यों की निरन्तर उपेक्षा करता है अथवा कोई अपकरण, दुष्करण या निधियों का दुरुपयोजन करता है या न्याय-भंग करता है; अथवा

(ञ) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या बोर्ड द्वारा इस अधिनियम अथवा इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के किसी उपबन्ध के अधीन दिए गए विधिपूर्ण आदेशों की जानबूझकर और बार-बार अवज्ञा करता है; अथवा 

(ट) वक्फ संपत्ति का दुर्विनियोग करता है या उसके संबंध में कपटपूर्वक व्यवहार करता है ।

(2) मुतवल्ली के पद से किसी व्यक्ति का हटाया जाना, हिताधिकारी के रूप में या किसी अन्य हैसियत में वक्फ संपत्ति की बाबत उसके निजि अधिकारों को, यदि कोई हों, अथवा सज्जदानशीन के रूप में उसके अधिकारों को, यदि कोई हो, प्रभावित नहीं करेगा ।

                (3) बोर्ड द्वारा उपधारा (1) के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि उसने उस मामले में विहित रीति से जांच न कर ली हो तथा ऐसा विनिश्चय, बोर्ड के सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से न किया गया हो ।

                (4) कोई मुतवल्ली, जो उपधारा (1) के खण्ड (ग) से खण्ड (झ) तक में से किसी खंड के अधीन पारित किसी आदेश से व्यथित है, उस तारीख से जिसको उसे आदेश प्राप्त होता है, एक मास के भीतर आदेश के विरुद्ध अधिकरण को अपील कर सकेगा और ऐसी अपील पर अधिकरण का विनिश्चय अन्तिम होगा ।

                (5) जहां किसी मुतवल्ली के विरुद्ध उपधारा (3) के अधीन कोई जांच प्रस्थापित है, या प्रारंभ की गई है वहां बोर्ड, यदि उसकी यह राय है कि वक्फ के हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो, जांच के समाप्त होने तक ऐसे मुतवल्ली को आदेश द्वारा निलम्बित कर सकेगा:

                परन्तु दस दिन से अधिक की अवधि के लिए ऐसा निलंबन मुतवल्ली को प्रस्थापित कार्रवाई के विरुद्ध सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए जाने के पश्चात् ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

                (6) जहां मुतवल्ली द्वारा उपधारा (4) के अधीन अधिकरण को कोई अपील फाइल की जाती है वहां बोर्ड, अधिकरण को यह आवेदन कर सकेगा कि वह अपील का विनिश्चय होने तक वक्फ के प्रबंध के लिए एक रिसीवर नियुक्त करे तथा जहां ऐसा आवेदन किया जाता है वहां अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, वक्फ का प्रबंध करने के लिए उपयुक्त व्यक्ति को रिसीवर नियुक्त कर सकेगा तथा इस प्रकार नियुक्त रिसीवर को यह सुनिश्चित करने का निदेश दे सकेगा कि मुतवल्ली के और वक्फ के रूढ़िजन्य और धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा की जाए ।

                (7) जहां कोई मुतवल्ली, उपधारा (1) के अधीन उसके पद से हटा दिया गया है वहां बोर्ड, आदेश द्वारा, मुतवल्ली को निदेश दे सकेगा कि वह वक्फ संपत्ति के कब्जे का परिदान बोर्ड को अथवा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अधिकारी को अथवा वक्फ संपत्ति के मुतवल्ली के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त किसी व्यक्ति या समिति को करे ।

                (8) इस धारा के अधीन अपने पद से हटाया गया किसी वक्फ का मुतवल्ली, ऐसे हटाए जाने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक उस वक्फ के मुतवल्ली के रूप में पुनःनियुक्ति का पात्र नहीं होगा ।

65. कुछ ओक़ाफ़ का बोर्ड द्वारा सीधे प्रबंध ग्रहण किया जाना-(1) जहां किसी वक्फ के मुतवल्ली के रूप में नियुक्ति के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति उपलब्ध नहीं है अथवा जहां बोर्ड का ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि किसी मुतवल्ली के पद में रिक्ति को भरने से वक्फ के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, वहां बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कुल मिलाकर पांच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि या अवधियों के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, वक्फ का सीधे प्रबंध ग्रहण कर सकेगा ।

                (2) राज्य सरकार, स्वप्रेरणा से या वक्फ में हितबद्ध किसी व्यक्ति के आवेदन पर, बोर्ड द्वारा उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन के लिए किसी मामले का अभिलेख मंगा सकेगी तथा ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जो वह ठीक समझे तथा राज्य सरकार द्वारा इस प्रकार किए गए आदेश अंतिम होंगे और उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट रीति से प्रकाशित किए जाएंगे ।

                (3) प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् यथाशीघ्र, बोर्ड ऐसे प्रत्येक वक्फ के संबंध में जो उसके सीधे प्रबंध के अधीन हो एक विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगा जिसमें निम्नलिखित जानकारी दी जाएगी, अर्थात्: -

(क) उस वर्ष के, जिसकी रिपोर्ट दी जा रही है, ठीक पूर्ववर्ती वर्ष की वक्फ की आय के ब्यौरे;

(ख) वक्फ के प्रबंध को सुधारने और आय में वृद्धि करने के लिए किए गए उपाय;

(ग) वह अवधि, जिसके दौरान वक्फ, बोर्ड के सीधे प्रबंध के अधीन रहा है और साथ ही उन कारणों का स्पष्टीकरण कि वक्फ के प्रबंध को वर्ष के दौरान मुतवल्ली या किसी प्रबंध समिति को सौंपा जाना क्यों संभव नहीं हुआ है; और

(घ) ऐसे अन्य विषय, जो विहित किए जाएं ।

                (4) राज्य सरकार, उपधारा (3) के अधीन उसे प्रस्तुत की गई रिपोर्ट की जांच करेगी और ऐसी जांच के पश्चात् बोर्ड को ऐसे निदेश या अनुदेश जारी करेगी जो वह ठीक समझे तथा बोर्ड ऐसे निदेशों या अनुदेशों की प्राप्ति पर उनका अनुपालन करेगा ।

 [(5) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड, किसी वक्फ का प्रशासन ग्रहण करेगा, यदि वक्फ बोर्ड के पास उसके समक्ष यह साबित करने के लिए साक्ष्य है कि वक्फ के प्रबंध तंत्र ने इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन किया है ।]

66. मुतवल्ली की नियुक्ति और उसे हटाए जाने की शक्तियों का राज्य सरकार द्वारा कब प्रयोग किया जाएगा-जब कभी किसी वक्फ विलेख में या न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश में या किसी वक्फ के प्रबंध की किसी स्कीम में यह उपबंधित हो कि कोई न्यायालय या बोर्ड से भिन्न कोई प्राधिकारी किसी मुतवल्ली की नियुक्ति कर सकेगा या उसे हटा सकेगा या प्रबंध की ऐसी स्कीम स्थिर कर सकेगा या उसको उपांतरित कर सकेगा अथवा वक्फ पर अन्यथा अधीक्षण का प्रयोग कर सकेगा तो ऐसे वक्फ विलेख, डिक्री, आदेश या स्कीम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी पूर्वोक्त शक्तियां राज्य सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य होंगी :

परन्तु जहां कोई बोर्ड स्थापित किया गया है वहां राज्य सरकार ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने के पूर्व बोर्ड से परामर्श करेगी ।

67. प्रबन्ध समिति का पर्यवेक्षण और अतिष्ठित किया जाना-(1) जब कभी किसी वक्फ का पर्यवेक्षण या प्रबन्ध, वक्फ द्वारा नियुक्त किसी समिति में, निहित हो जाता है तब, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी समिति तब तक कार्य करती रहेगी जब तक कि उसे बोर्ड द्वारा अतिष्ठित नहीं कर दिया जाता है अथवा तब तक, उसकी अवधि का, जो वक्फ द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अवसान नहीं हो जाता है:

परन्तु ऐसी समिति बोर्ड के निदेश, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगी तथा ऐसे निदेशों का पालन करेगी, जो बोर्ड, समय-समय पर, जारी करे:

परन्तु यह और कि यदि बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि किसी समिति द्वारा किसी वक्फ के प्रबन्ध के लिए कोई स्कीम इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के किसी उपबंध के अथवा वक्फ के निदेशों से असंगत है तो वह किसी भी समय स्कीम को ऐसी रीति से उपांतरित कर सकेगा, जो उसे वक्फ के निदेशों के अथवा इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुरूप बनाने के लिए आवश्यक हो ।

(2) इस अधिनियम में और वक्फ विलेख में किसी बात के होते हुए भी, यदि बोर्ड का ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई समिति उचित और समाधानप्रद रूप से कार्य नहीं कर रही है अथवा वक्फ का प्रबंध ठीक नहीं किया जा रहा है तथा उसके उचित प्रबन्ध के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह, आदेश द्वारा, ऐसी समिति को अतिष्ठित कर सकेगा और ऐसे अतिष्ठित किए जाने पर वक्फ के किसी निदेश का, जहां तक कि उसका समिति के गठन से संबंध है, कोई प्रभाव नहीं रह जाएगा :

परन्तु बोर्ड, किसी समिति को अतिष्ठित करने का कोई आदेश करने के पूर्व, ऐसी सूचना जारी करेगा जिसमें प्रस्थापित कार्रवाई के कारणों को उल्लिखित किया जाएगा तथा समिति से एक मास से अन्यून उतने समय के भीतर जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, यह हेतुक दर्शित करने की मांग की जाएगी कि ऐसी कार्रवाई क्यों न की जाए ।

(3) बोर्ड द्वारा उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, विहित रीति से प्रकाशित किया जाएगा और ऐसे प्रकाशन पर वह मुतवल्ली पर और वक्फ में कोई हित रखने वाले सभी व्यक्तियों पर आबद्धकर होगा ।

(4) बोर्ड द्वारा उपधारा (2) के अधीन किया गया कोई आदेश अंतिम होगा:

                परन्तु उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर अधिकरण को अपील कर सकेगा:

                परन्तु यह और कि अधिकरण को, ऐसी अपील के लंबित रहने तक बोर्ड द्वारा किए गए आदेश के प्रवर्तन का निलंबन करने की कोई शक्ति नहीं होगी ।

                (5) जब कभी बोर्ड उपधारा (2) के अधीन किसी समिति को अतिष्ठित करता है तब वह उपधारा (2) के अधीन किए गए अपने आदेश के साथ ही नई प्रबन्ध समिति का गठन करेगा ।

                (6) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड उपधारा (2) के अधीन किसी समिति को अतिष्ठित करने के बजाय उसके किसी सदस्य को, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे सदस्य ने उस रूप में अपनी हैसियत का दुरुपयोग किया है अथवा जानते हुए ऐसी ऐसी रीति से कार्य किया है जो वक्फ के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली है, हटा सकेगा और किसी सदस्य के हटाए जाने के प्रत्येक ऐसे आदेश की उस पर तामील रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा की जाएगी:

                परन्तु सदस्य को हटाए जाने के लिए कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उसे प्रस्थापित कार्रवाई के विरुद्ध हेतुक दर्शित करेन का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो:

                परन्तु यह और कि ऐसा कोई सदस्य जो समिति की सदस्यता से अपने हटाए जाने के किसी आदेश से व्यथित है, ऐसे आदेश को अपने पर तामील किए जाने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, ऐसे आदेश के विरुद्ध अधिकरण को अपील कर सकेगा और अधिकरण, अपीलार्थी और बोर्ड को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, बोर्ड द्वारा किए गए आदेश की पुष्टि कर सकेगा, उसे उपांतरित कर सकेगा या उसे उलट सकेगा और ऐसी अपील में अधिकरण द्वारा किया गया आदेश अंतिम होगा ।

68. मुतवल्ली या समिति का अभिलेखों आदि का परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) जहां किसी मुतवल्ली या प्रबन्ध समिति को इस अधिनियम के या बोर्ड द्वारा बनाई गई किसी स्कीम के उपबन्धों के अनुसार हटाया गया है वहां वह मुतवल्ली या वह समिति जिसे इस प्रकार पद से हटाया गया है (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् हटाया गया मुतवल्ली या हटाई गई समिति कहा गया है), उस आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख से एक मास के भीतर उत्तरवर्ती मुतवल्ली या उत्तरवर्ती समिति को कार्यभार सौंपेगी और वक्फ के अभिलेखों, लेखाओं तथा सभी संपत्ति के (जिसके अंतर्गत नकदी है) कब्जे का परिदान करेगी ।

                (2) जहां कोई हटाया गया मुतवल्ली या हटाई गई समिति, उत्तरवर्ती मुतवल्ली या समिति को उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कार्यभार सौंपने या अभिलेखों, लेखाओं और संपत्ति का (जिनके अंतर्गत नकदी है) को कब्जा परिदत्त करने में असफल रहती है अथा ऐसे मुतवल्ली या समिति को पूर्वोक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् उनका कब्जा अभिप्राप्त करने से रोकती है या उसमें बाधा डालती है, वहां उत्तरवर्ती मुतवल्ली या उत्तरवर्ती समिति का कोई सदस्य किसी ऐसे  [जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या उनके समकक्षट को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वक्फ संपत्ति का कोई भाग स्थित है, जिनके साथ ऐसे उत्तरवर्ती मुतवल्ली या समिति की नियुक्ति करने वाले आदेश की प्रमाणित प्रति होगी, एक आवेदन कर सकेगा और तब ऐसा 1[जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या उनके समकक्षट हटाए गए मुतवल्ली या हटाई गई समिति के सदस्यों को सूचना देने के पश्चात्, ऐसा आदेश कर सकेगा जिसमें, यथास्थिति, उत्तरवर्ती मुतवल्ली या समिति को उतने समय के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, कार्यभार सौंपने और वक्फ के ऐसे अभिलेखों, लेखाओं और संपत्ति का (जिसके अंतर्गत नकदी है) कब्जा देने का निदेश दिया गया हो ।

                (3) जहां हटाया गया मुतवल्ली या हटाई गई समिति का कोई सदस्य कार्यभार सौंपने अथवा अभिलेखों, लेखाओं और    संपत्ति के (जिनके अंतर्गत नकदी है) कब्जे की उपधारा (2) के अधीन 1[किसी मजिस्ट्रेटट द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर परिदान नहीं करेगा या उसमें असफल रहेगा वहां, यथास्थिति, हटाया गया मुतवल्ली या हटाई गई समिति का प्रत्येक सदस्य कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो आठ हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

                (4) जब कभी कोई हटाया गया मुतवल्ली या हटाई गई समिति का कोई सदस्य, 1[किसी मजिस्ट्रेटट द्वारा उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेशों का अनुपालन करने में लोप करता है या असफल करता है तो 1[किसी मजिस्ट्रेटट, उत्तरवर्ती मुतवल्ली या समिति को कार्यभार ग्रहण करने और ऐसे अभिलेखों, लेखाओं या संपत्ति का (जिनके अंतर्गत नकदी है) कब्जा लेने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को ऐसी पुलिस सहायता, जो उस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो, लेने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।

                (5) उत्तरवर्ती मुतवल्ली या समिति की नियुक्ति के किसी आदेश को इस धारा के अधीन 1[किसी मजिस्ट्रेटट के समक्ष कार्यवाहियों में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

                (6) इस धारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित है, किसी सक्षम सिविल न्यायालय में यह सिद्ध करने के लिए वाद प्रस्तुत करने से वर्जित नहीं करेगी कि उसे 1[किसी मजिस्ट्रेटट द्वारा उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेश में विनिर्दिष्ट संपत्ति में अधिकार, हक और हित प्राप्त हैं ।

69. वक्फ के प्रशासन के लिए स्कीम बनाने की बोर्ड की शक्ति- [(1) जहां बोर्ड का, वक्फ के समुचित प्रशासन के लिए कोई स्कीम विरचित करने के संबंध में जांच के पश्चात्, चाहे स्वप्रेरणा से या किसी वक्फ में हितबद्ध पांच से अन्यून व्यक्तियों के आवेदन पर समाधान हो जाता है तो वह युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और विहित रीति में मुतवल्ली या अन्य व्यक्तियों के साथ परामर्श करने के पश्चात्, आदेश द्वारा, वक्फ के प्रशासन के लिए ऐसी स्कीम विरचित कर सकेगा ।]

                (2) उपधारा (1) के अधीन बनाई गई स्कीम में वक्फ के ऐसे मुतवल्ली को, जो उस तारीख के ठीक पूर्व जिसको स्कीम प्रवृत्त होती है, उस हैसियत में पद धारण कर रहा है, हटाए जाने के लिए उपबंध किया जा सकेगा:

                परन्तु जहां ऐसी किसी स्कीम में किसी आनुवंशिक मुतवल्ली के हटाए जाने के लिए उपबंध किया जाता है वहां वह स्कीम उस व्यक्ति को, जो इस प्रकार हटाए गए मुतवल्ली से आनुवंशिक उत्तराधिकार में ठीक बाद का व्यक्ति है, वक्फ के उचित प्रशासन के लिए नियुक्त समिति के एक सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए भी उपबंध किया जाएगा ।

                (3) उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, विहित रीति से प्रकाशित किया जाएगा और ऐसे प्रकाशन पर वह अंतिम होगा तथा मुतवल्ली पर और वक्फ में हितबद्ध सभी व्यक्तियों पर आबद्धकर होगा:

                परंतु ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित है, ऐसे आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर अधिकरण को अपील कर सकेगा तथा ऐसी अपील की सुनवाई करने के पश्चात् अधिकरण उस आदेश की पुष्टि कर सकेगा, उसे उलट सकेगा या उसे उपांतरित कर सकेगा:

                परन्तु यह और कि इस धारा के अधीन किए गए आदेश के प्रवर्तन को रोकने की अधिकरण को कोई शक्ति नहीं होगी ।

                (4) बोर्ड, किसी भी समय, आदेश द्वारा, चाहे वह स्कीम के प्रवर्तन में आने के पूर्व या उसके पश्चात् किया गया हो, स्कीम को रद्द कर सकेगा या उपांतरित कर सकेगा ।

                (5) वक्फ के उचित प्रशासन के लिए स्कीम के बनाए जाने तक, बोर्ड किसी उपयुक्त व्यक्ति को वक्फ के मुतवल्ली के सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करने के लिए तथा ऐसे मुतवल्ली की शक्तियों का प्रयोग करने और कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त कर सकेगा ।

70. वक्फ के प्रशासन से संबंधित जांच-किसी वक्फ में हितबद्ध कोई व्यक्ति, वक्फ के प्रशासन से संबंधित जांच करने के लिए बोर्ड को आवेदन कर सकेगा जो शपथपत्र से समर्थित होगा और यदि बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार हैं कि वक्फ के कार्यकलापों का ठीक प्रबन्ध नहीं किया जा रहा है तो वह, उस संबंध में ऐसी कार्रवाई करेगा जो वह ठीक समझे ।

71. जांच करने की रीति-(1) बोर्ड, धारा [70] के अधीन प्राप्त आवेदन पर या स्वप्रेरणा से, -

                                (क) ऐसी रीति से जो विहित की जाए, जांच कर सकेगा; या

                (ख) वक्फ से संबंधित किसी मामले की जांच करने के लिए किसी व्यक्ित को इस निमित्त प्राधिकृत कर सकेगा, और ऐसी कार्रवाई कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

                (2) इस धारा के अधीन किसी जांच के प्रयोजनों के लिए, बोर्ड या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को साक्षियों को हाजिर कराने और दस्तावेजों के पेश किए जाने के लिए वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं ।

अध्याय 7

बोर्ड का वित्त

72. बोर्ड को संदेय वार्षिक अंशदान-(1) प्रत्येक ऐसे वक्फ का मुतवल्ली, जिसकी शुद्ध वार्षिक आय पांच हजार रुपए से कम नहीं है, बोर्ड को ऐसे बोर्ड द्वारा वक्फ को प्रदान की गई सेवाओं के लिए प्रतिवर्ष वक्फ द्वारा व्युत्पन्न शुद्ध वार्षिक आय में से, ऐसी वार्षिक आय के सात प्रतिशत से अनधिक इतना अंशदान करेगा, जो विहित किया जाए ।

स्पष्टीकरण 1-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, शुद्ध वार्षिक आय" से किसी वर्ष में वक्फ की सभी स्रोतों से सकल आय, जिसके अंतर्गत ऐसे नजराने और चढ़ावे हैं जो ओक़ाफ़ की संपत्ति में के अंशदानों की कोटि में नहीं आते हैं, अभिप्रेत हैं जैसे कि निम्नलिखित की कटौती करने के पश्चात् आएं, अर्थात्: -

                (i) वक्फ द्वारा सरकार को संदत्त किया गया भू-राजस्व;

                (ii) वे रेट, उपकर और अनुज्ञप्ति फीसें, जो उसके द्वारा सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी को संदत्त की गई हैं;

                (iii) [वक्फ के फायदे के लिए मुतवल्ली द्वारा सीधे खेती के अधीन भूमि के संबंध मेंट निम्नलिखित सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए उपगत व्यय, अर्थात्: -

                                (क) सिंचाई संकर्मों का अनुरक्षण या उनकी मरम्त, जिसके अंतर्गत सिंचाई की पूंजी लागत नहीं आएगी;

                                (ख) बीज या पौध;

                                (ग) खाद;

                                (घ) कृषि औजारों का क्रय और अनुरक्षण;

                                (ङ) खेती के लिए पशुओं का क्रय और अनुरक्षण;

                (च) हल चलाने, पानी देने, बुवाई करने, प्रतिरोपण करने, कटाई करने, गहराई करने और अन्य कृषि संक्रियाओं के लिए मजदूरी:

परंतु इस खंड के अधीन उपगत किसी व्यय के संबंध में कुल कटौती वक्फ की भूमियां से व्युत्पन्न आय के [बीस प्रतिशत] से अधिक नहीं होगी:

  [परंतु यह और कि पट्टे पर, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, दी गई वक्फ भूमि के संबंध में ऐसी कोई कटौती, चाहे वह बटाई हो या फसल में हिस्सा बांटना हो या उसका कोई अन्य नाम हो, अनुज्ञात नहीं की जाएगी;]

(iv) किराए पर दिए गए भवनों की विविध मरम्मतों पर व्यय, जो उनसे व्युत्पन्न वार्षिक किराए के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होगा या वास्तविक व्यय, इनमें से जो भी कम हो;

(v) स्थावर संपत्ति के अथवा स्थावर संपत्ति से संबंधित या उनसे उद्भूत होने वाले अधिकारों के विक्रय आगम, यदि ऐसे आगमों का वक्फ के लिए आय उपार्जित करने के लिए पुनः विनिधान किया जाता है:

परन्तु प्राप्ितयों की निम्नलिखित मदों को इस धारा के प्रयोजनों के लिए आय नहीं समझा जाएगा, अर्थात्: -

                                (क) वसूल किए गए अग्रिम और निक्षेप तथा लिए गए या वसूल किए गए ऋण;

(ख) कर्मचारियों, पट्टेदारों या ठेकेदारों द्वारा प्रतिभूति के रूप में किए गए निक्षेप और अन्य निक्षेप, यदि कोई हो;

(ग) बैंकों से या विनिधानों के प्रत्याहरण;

(घ) न्यायालयों द्वारा अधिनिर्णीत किए गए खर्चों मद्धे वसूल की गई रकमें;

(ङ) धार्मिक पुस्तकों के और प्रकाशनों के विक्रय आगम, जहां ऐसे विक्रय धर्म का प्रचार करने की दृष्टि से अलाभप्रद उद्यम के रूप में किए जाते हैं;

(च) दाताओं द्वारा वक्फ की संपत्ति में के अंशदानों के रूप में नकदी या वस्तु रूप में दान या चढ़ावे:

परन्तु ऐसे दानों व चढ़ावों से प्रोद्भूत होने वाली आय पर ब्याज को, यदि कोई हो सकल वार्षिक आय की संगणना करने में हिसाब में लिया जाएगा;

(छ) वक्फ द्वारा की जाने वाली विनिर्दिष्ट सेवा के लिए और ऐसी सेवा पर व्यय किए जाने के लिए नकदी या वस्तु रूप में प्राप्त स्वैच्छिक अंशदान;

(ज) संपरीक्षा वसूलियां ।

स्पष्टीकरण 2-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, शुद्ध वार्षिक आय का अवधारण करने में, किसी वक्फ द्वारा उसके लाभप्रद उपक्रमों से, यदि कोई हों, व्युत्पन्न शुद्ध लाभ को ही आय माना जाएगा तथा उसके अलाभप्रद उपक्रमों जैसे विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों, दरिद्रालयों, अनाथालयों अथवा इसी प्रकार की अन्य संस्थाओं के संबंध में, सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा दिए गए अनुदानों अथवा जनता से प्राप्त दानों अथवा शिक्षा संस्थाओं के विद्यार्थियों से संगृहीत फीसों को आय नहीं माना जाएगा ।

(2) बोर्ड किसी मस्जिद या अनाथालय या किसी विशेष वक्फ की दशा में ऐसे अंशदान को, ऐसे समय के लिए, जो वह ठीक समझे, कम कर सकेगा या उसका परिहार कर सकेगा ।

(3) किसी वक्फ का मुतवल्ली, उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा किया जाने वाला अंशदान उन विभिन्न व्यक्ितयों से वसूल कर सकेगा जो वक्फ से कोई धन-संबंधी या अन्य भौतिक फायदे प्राप्त करने के हकदार हैं किन्तु ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक से वसूल की जा सकने वाली राशि ऐसी रकम से अधिक नहीं होगी जिसका, कुल किए जाने वाले अंशदान से, वह अनुपात है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा प्राप्त फायदों के मूल्य का वक्फ की समस्त शुद्ध वार्षिक आय से है:

परन्तु यदि वक्फ को उपलब्ध कोई ऐसी आय जो उपधारा (1) के अधीन अंशदान से भिन्न है, इस अधिनियम के अधीन शोध्य धन के रूप में संदेय रकमों से अधिक है और वक्फ विलेख के अधीन संदेय रकम से अधिक है तो अंशदान का ऐसी आय में से संदाय किया जाएगा ।

(4) किसी वक्फ की बाबत उपधारा (1) के अधीन किया जाने वाला अंशदान, सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी के किसी शोध्य धन के अथवा वक्फ सम्पत्ति या उसकी आय पर किसी अन्य कानूनी प्रथम भार के पहले संदाय किए जाने की शर्त के अधीन रहते हुए, वक्फ की आय पर प्रथम भार होगा और संबंधित मुतवल्ली को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् बोर्ड द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्र पर भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलीय होगा ।

(5) यदि मुतवल्ली, वक्फ की आय वसूल कर लेता है और ऐसे अंशदान का संदाय करने से इंकार करता है अथवा संदाय नहीं करता है तो वह वैयक्तिक रूप से भी ऐसे अंशदान के लिए जिम्मेदार होगा जो स्वयं उससे या उसकी सम्पत्ति से पूर्वोक्त रीति से वसूल किया जा सकेगा ।

(6) जहां, इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात्, किसी वक्फ का मुतवल्ली, वक्फ की शुद्ध वार्षिक आय की विवरणी उसके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर प्रस्तुत नहीं करता है या ऐसी विवरणी प्रस्तुत करता है, जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी की राय में किसी तात्त्विक विशिष्टि में गलत या मिथ्या है, अथवा जिससे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के उपबंधों का अनुपालन नहीं होता है, तो मुख्य कार्यपालक अधिकारी, अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार वक्फ की शुद्ध वार्षिक आय का निर्धारण कर सकेगा अथवा मुतवल्ली द्वारा प्रस्तुत की गई विवरणी में दर्शित शुद्ध वार्षिक आय का पुनरीक्षण कर सकेगा और इस प्रकार निर्धारित या पुनरीक्षित शुद्ध वार्षिक आय इस धारा के प्रयोजनों के लिए वक्फ की शुद्ध वार्षिक आय समझी जाएगी :

परन्तु शुद्ध वार्षिक आय का कोई निर्धारण या मुतवल्ली द्वारा प्रस्तुत विवरणी का कोई पुनरीक्षण मुतवल्ली को सूचना दिए जाने के पश्चात् ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं, जिसमें उससे यह अपेक्षा की गई हो कि वह सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर यह हेतुक दर्शित करे कि ऐसा निर्धारण या विवरणी का पुनरीक्षण क्यों नहीं किया जाए, तथा ऐसा प्रत्येक निर्धारण या पुनरीक्षण मुतवल्ली द्वारा दिए गए उत्तर पर, यदि कोई हो, विचार किए जाने के पश्चात् किया जाएगा ।

(7) कोई मुतवल्ली, जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा उपधारा (6) के अधीन किए गए निर्धारण या पुनरीक्षण से व्यथित है, निर्धारण या विवरणी के पुनरीक्षण की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर बोर्ड को अपील कर सकेगा तथा बोर्ड, अपीलार्थी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, उस निर्धारण या विवरणी के पुनरीक्षण की पुष्टि कर सकेगा, उसे उलट सकेगा या उसे उपांतरित कर सकेगा और उस पर बोर्ड का विनिश्चय अंतिम होगा ।

(8) यदि इस धारा के अधीन उद्ग्रहणीय अंशदान या उसका कोई भाग, किसी कारण से इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् किसी वर्ष में, निर्धारण से छूट गया है तो मुख्य कार्यपालक अधिकारी, उस वर्ष की जिससे ऐसा छूट गया निर्धारण संबंधित है, अंतिम तारीख से पांच वर्ष के भीतर, मुतवल्ली पर ऐसी सूचना की तामील कर सकेगा, जिसमें उस पर उस अंशदान या उसके भाग का, जो निर्धारण से छूट गया है, निर्धारण किया गया हो और जिसमें ऐसी सूचना की तामील की तारीख से तीस दिन के भीतर उसके संदाय की मांग की गई हो तथा इस अधिनियम के और इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध, जहां तक हो सके, उसी प्रकार लागू होंगे मानो निर्धारण इस अधिनियम के अधीन प्रथमतः किए गए हों । 

73. बैंकों या अन्य व्यक्ति को संदाय करने का निदेश देने की मुख्य कार्यपालक अधिकारी की शक्ति-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, यदि मुख्य कार्यपालक अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक और समीचीन है तो वह किसी ऐसे बैंक को, जिसमें या किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके पास वक्फ का कोई धन निक्षिप्त है, यह निदेश देते हुए आदेश कर सकेगा कि वह ऐसे धन में से जो ऐसे बैंक में वक्फ के नाम जमा हो या ऐसे व्यक्ति के पास निक्षिप्त हो अथवा ऐसी धनराशियों में से जो ऐसे बैंक या अन्य व्यक्ति द्वारा समय-समय पर वक्फ के लिए या उसकी ओर से निक्षेप के रूप में प्राप्त की जाएं, धारा 72 के अधीन उद्ग्रहणीय अंशदान का संदाय करे और ऐसे आदेशों की प्राप्ति पर, यथास्थिति, बैंक या अन्य व्यक्ति, जब  उपधारा (3) के अधीन कोई अपील नहीं की गई है, तब ऐसे आदेशों का अनुपालन करेगा अथवा जहां उपधारा (3) के अधीन कोई अपील की गई है वहां ऐसी अपील पर अधिकरण द्वारा किए गए आदेशों का अनुपालन करेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश के अनुसरण में बैंक या अन्य व्यक्ित द्वारा किया गया प्रत्येक संदाय इस प्रकार संदत्त राशि के संबंध में ऐसे बैंक या अन्य व्यक्ित के दायित्व के पूर्ण उन्मोचन के रूप में प्रवर्तित होगा ।

(3) कोई ऐसा बैंक या अन्य व्यक्ति, जिसे कोई संदाय करने के लिए उपधारा (1) के अधीन आदेश दिया गया है, आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर ऐसे आदेश के विरुद्ध अधिकरण को अपील कर सकेगा तथा ऐसी अपील पर अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा ।

(4) बैंक का प्रत्येक ऐसा अधिकारी या अन्य व्यक्ति, जो किसी युक्तियुक्त हेतुक के बिना, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश का अनुपालन करने में असफल रहेगा, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो आठ हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

74. वक्फ को संदेय शाश्वत वार्षिकी में से अंशदान की कटौती-(1) प्रत्येक ऐसा प्राधिकारी, जो जमींदारियों या जागीरों के उत्सादन अथवा भूमि की अधिकतम सीमाएं अधिकथित करने से संबंधित किसी विधि के अधीन किसी वक्फ को संदेय किसी शाश्वत वार्षिकी का संवितरण करने के लिए सशक्त है, मुख्य कार्यपालक अधिकारी से ऐसे प्रमाणपत्र की प्राप्ति पर जिसमें वक्फ द्वारा धारा 72 के अधीन किए जाने वाले अंशदान की रकम, जो असंदत्त रह गई है, विनिर्दिष्ट हो, वक्फ को शाश्वत वार्षिकी संदाय करने से पहले ऐसे प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम की कटौती करेगा और इस प्रकार काटी गई रकम मुख्य कार्यपालक अधिकारी को प्रेषित करेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी को प्रेषित की गई प्रत्येक रकम वक्फ द्वारा किया गया संदाय समझी जाएगी और इस प्रकार प्रेषित की गई रकम की मात्रा तक शाश्वत वार्षिकी के संदाय के संबंध में ऐसे प्राधिकारी के दायित्व के पूर्व उन्मोचन के रूप में प्रवर्तित होगी ।

75. उधार लेने की बोर्ड की शक्ति-(1) इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजनों के लिए बोर्ड राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से, ऐसी धनराशि तथा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो राज्य सरकार अवधारित करे, उधार ले सकेगा ।

(2) बोर्ड उधार ली गई धनराशि का, उसके संबंध में देय किसी ब्याज या लागत सहित, उधार के निबंधनों और शर्तों के अनुसार प्रतिसंदाय करेगा ।

76. बिना मंजूरी के मुतवल्ली द्वारा धन का उधार दिया जाना या उधार लिया जाना-(1) कोई मुतवल्ली, कार्यपालक अधिकारी या वक्फ के प्रशासन का भारसाधक कोई अन्य व्यक्ति, बोर्ड की पूर्व मंजूरी के बिना, वक्फ का कोई धन या कोई वक्फ संपत्ति उधार नहीं देगा या वक्फ प्रयोजनों के लिए कोई धन उधार नहीं लेगा:

परन्तु यदि वक्फ विलेख में, यथास्थिति, ऐसे उधार लेने या उधार देने के लिए कोई स्पष्ट उपबंध है तो ऐसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है ।

(2) बोर्ड, मंजूरी देते समय, कोई ऐसे निबंधन और शर्तें विनिर्दिष्ट कर सकेगा जिनके अधीन रहते हुए उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति, कोई धन उधार देने या उधार लेने के लिए अथवा कोई अन्य वक्फ संपत्ति उधार देने के लिए उसके द्वारा प्राधिकृत किया गया है ।

(3) जहां इस धारा के उपबंधों के उल्लंघन में कोई धन उधार दिया जाता है या उधार लिया जाता है अथवा अन्य वक्फ संपत्ति उधार दी जाती है वहां मुख्य कार्यपालक अधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह-

(क) उस व्यक्ति की, जिसके द्वारा कोई रकम उधार दी गई थी या उधार ली गई थी, वैयक्तिक निधियों में से उस रकम के, जो इस प्रकार उधार दी गई है या उधार ली गई है, बराबर रकम, उस पर देय ब्याज सहित, वसूल कर ले;

(ख) इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में उधार दी गई वक्फ संपत्ति का कब्जा, उस व्यक्ति से जिसे वह उधार दी गई थी या उन व्यक्तियों से, जो ऐसी संपत्ति पर उस व्यक्ति के माध्यम से, जिसे ऐसी संपत्ति उधार दी गई थी, हक का दावा करते हैं, वापस ले लें ।

77. वक्फ निधि-(1) इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा प्राप्त या वसूल की गई सभी धनराशियों और बोर्ड द्वारा दानों, उपकृतियों या अनुदानों के रूप में प्राप्त सभी अन्य धनराशियों से एक निधि बनाई जाएगी जिसका नाम वक्फ निधि होगा ।

                (2) दानों, उपकृतियों और अनुदानों के रूप में बोर्ड द्वारा प्राप्त सभी धनराशियों का एक पृथक् उपशीर्ष के अधीन निक्षेप किया जाएगा और लेखा रखा जाएगा ।

                (3) किन्हीं ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, वक्फ निधि, बोर्ड के नियंत्रणाधीन होगी । किन्तु सामान्य वक्फ बोर्ड के नियंत्रणाधीन वक्फ निधि, इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के, यदि कोई हों, अधीन होगी ।

                (4) वक्फ निधि का उपयोजन निम्न प्रकार से किया जाएगा, अर्थात्: -

(क) धारा 75 के अधीन लिए गए उधार का प्रतिसंदाय तथा उस पर ब्याज का संदाय;

(ख) वक्फ निधि और वक्फ के लेखाओं की संपरीक्षा के खर्च का संदाय;

(ग) बोर्ड के अधिकारी और कर्मचारिवृन्द के वेतन और भत्तों का संदाय;

                                (घ) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को यात्रा भत्तों का संदाय;

(ङ) इस अधिनियम द्वारा या, इसके अधीन अधिरोपित कर्तव्यों के पालन में, तथा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में बोर्ड द्वारा उपगत सभी व्ययों का संदाय;

(च) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन बोर्ड पर अधिरोपित किसी बाध्यता के निर्वहन के लिए बोर्ड द्वारा उपगत सभी व्ययों का संदाय ।

 [(छ) मुस्लिम स्त्री (विवाह-विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 25) के उपबंधों के अधीन सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा आदेश किए गए अनुसार मुस्लिम स्त्रियों के भरण-पोषण का संदाय ।]

                (5) यदि उपधारा (4) में निर्दिष्ट व्यय को पूरा को पूरा करने के पश्चात् कोई अतिशेष रहता है तो बोर्ड ऐसे अतिशेष के किसी भाग का वक्फ सम्पत्ति के परिरक्षण और संरक्षण के लिए अथवा ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

78. बोर्ड का बजट-(1) बोर्ड प्रत्येक वर्ष, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष के लिए एक बजट तैयार करेगा जिसमें उस वित्तीय वर्ष के दौरान प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किए जाएंगे तथा उसकी प्रति राज्य सरकार को भेजेगा ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन अपने को भेजे गए बजट की प्राप्ति पर, राज्य सरकार, उसकी जांच करेगी और उसमें ऐसे परिवर्तन, संशोधन या उपांतरण किए जाने का सुझाव देगी जो वह ठीक समझे तथा ऐसे सुझाव बोर्ड को उसके विचार के लिए भेजेगी ।

                (3) राज्य सरकार से सुझावों की प्राप्ति पर, बोर्ड उस सरकार द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों, संशोधनों या उपांतरणों के संबंध में उस सरकार को लिखित अभ्यावेदन कर सकेगा और राज्य सरकार, ऐसे अभ्यावेदनों पर विचार करने के पश्चात्, उनकी प्राप्ति की तारीख से तीन सप्ताह की अवधि के भीतर, बोर्ड को उस मामले के संबंध में अपना अंतिम विनिश्चय संसूचित करेगी और राज्य सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

                (4) उपधारा (3) के अधीन राज्य सरकार के विनिश्चय की प्राप्ति पर, बोर्ड, राज्य सरकार द्वारा अंतिम रूप से सुझाए गए सभी परिवर्तनों, संशोधनों या उपांतरणों को अपने बजट में सम्मिलित करेगा और इस प्रकार परिवर्तित, संशोधित या उपांतरित बजट ही ऐसा बजट होगा जो बोर्ड द्वारा पारित किया जाएगा ।

79. बोर्ड के लेखे-बोर्ड अपने लेखाओं के संबंध में ऐसी लेखाबहियां और अन्य बहियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखवाएगा जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं ।

80. बोर्ड के लेखाओं की संपरीक्षा-(1) बोर्ड के लेखाओं की वार्षिक संपरीक्षा और जांच ऐसे संपरीक्षक द्वारा की जाएगी, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाए ।

                (2) संपरीक्षक अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा और संपरीक्षक की रिपोर्ट में अन्य बातों के साथ-साथ यह विनिर्दिष्ट किया जाएगा कि क्या बोर्ड के सीधे प्रबंध के अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक वक्फ के लेखाओं को पृथक्तः रखा गया है और क्या ऐसे प्रत्येक लेखा की राज्य स्थानीय निधि परीक्षक द्वारा वार्षिक संपरीक्षा की गई है और उसमें अनियमित, अवैध या अनुचित व्यय के अथवा धन वसूल करने या अन्य सपत्ति को वपास लेने की असफलता के, जो उपेक्षा या अवचार के कारण हुई हो, सभी मामलों को तथा किसी अन्य मामले को, जिसकी रिपोर्ट करना संपरीक्षक आवश्यक समझता है, विनिर्दिष्ट किया जाएगा, तथा रिपोर्ट में किसी ऐसे व्यक्ति का नाम भी होगा जो संपरीक्षक की राय में ऐसे व्यय या असफलता के लिए उत्तरदायी है और ऐसे प्रत्येक मामले में संपरीक्षक उस व्यय या हानि की रकम को ऐसे व्यक्ति द्वारा देय प्रमाणित करेगा ।

                (3) संपरीक्षा का खर्च का वक्फ निधि में से संदत्त किया जाएगा ।

81. संपरीक्षक की रिपोर्ट पर राज्य सरकार द्वारा आदेशों का पारित किया जाना-राज्य सरकार, संपरीक्षक की रिपोर्ट की जांच करेगी और उसमें उल्लिखित मामले के संबंध में किसी व्यक्ति से स्पष्टीकरण मांग सकेगी तथा रिपोर्ट पर ऐसे आदेश पारित करेगी जो वह ठीक समझे  [और राज्य सरकार द्वारा संपरीक्षक की रिपोर्ट की एक प्रति और आदेश ऐसी रिपोर्ट राज्य विधान-मंडल के प्रत्येक सदन में, जहां विधान-मंडल में दो सदन हैं अथवा ऐसे विधान-मंडल जिसमें एक सदन है, उस सदन में रखे जाने के तीस दिन के भीतर परिषद् के पास भेजेगी ।]

82. बोर्ड को देय राशियों का भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल किया जाना-(1) संपरीक्षक द्वारा धारा 80 के अधीन अपनी रिपोर्ट में किसी व्यक्ति द्वारा देय प्रमाणित की गई प्रत्येक राशि, बोर्ड द्वारा जारी की गई मांग की सूचना की तामील के पश्चात् साठ दिन के भीतर ऐसे व्यक्ति द्वारा संदत्त की जाएगी ।

                (2) यदि ऐसा संदाय उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार नहीं किया जाता है तो संदेय राशि, संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात्, बोर्ड द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्र पर भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।

अध्याय 8

न्यायिक कार्यवाहियां

83. अधिकरणों, आदि का गठन- [(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के अधीन किसी वक्फ या वक्फ संम्पत्ति या किसी अभिधारी की बेदखली से संबंधित किसी विवाद, प्रश्न या अन्य मामले के अवधारण के लिए या ऐसी संपत्ति के पट्टाकर्ता या पट्टेदार के अधिकारों या बाध्यताओं का अवधारण करने के लिए उतने अधिकरण का गठन करेगी जितने वह ठीक समझे और ऐसे प्रत्येक अधिकरण की स्थानीय सीमाएं और अधिकारिता परिनिश्चित करेगी ।]

                (2) कोई मुतवल्ली, वक्फ में हितबद्ध व्यक्ति या कोई अन्य व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश से या इसके अधीन बनाए गए नियमों से व्यथित है, इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट समय के भीतर या जहां ऐसा कोई समय विनिर्दिष्ट नहीं है, उस समय के भीतर, जो विहित किया जाए, अधिकरण को वक्फ से किसी संबंधित विवाद, प्रश्न या अन्य मामले के अवधारण के लिए आवेदन कर सकेगा ।

                (3) जहां उपधारा (2) के अधीन किया गया कोई आवेदन किसी ऐसी वक्फ संपत्ति से संबंधित है, जो दो या अधिक अधिकरणों की अधिकारिता की प्रादेशिक सीमाओं के अन्तर्गत आती है, वहां ऐसा आवेदन उस अधिकरण को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वक्फ का मुतवल्ली या, उसके मुतवल्लियों में से कोई एक मुतवल्ली वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता है, कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है, किया जा सकेगा तथा जहां ऐसा कोई आवेदन पूर्वोक्त अधिकरण को किया जाता है वहां अधिकारिता रखने वाला अन्य अधिकरण या रखने वाले अन्य अधिकरण ऐसे विवाद, प्रश्न या अन्य मामले के अवधारण के लिए कोई आवेदन ग्रहण नहीं करेंगे :

                परन्तु यदि राज्य सरकार की यह राय है कि वक्फ के या वक्फ में हितबद्ध किसी व्यक्ति के या वक्फ संपत्ति के हित में यह समीचीन है कि ऐसे आवेदन का अंतरण, ऐसे वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित विवाद, प्रश्न या अन्य मामले के अवधारण के लिए अधिकारिता रखने वाले किसी अन्य अधिकरण को कर दिया जाए तो वह ऐसे आवेदन का अंतरण, अधिकारिता रखने वाले किसी अन्य अधिकरण को कर सकेगी और ऐसे अंतरण पर, वह अधिकरण जिसे आवेदन इस प्रकार अंतरित किया जाता है, आवेदन की बाबत उस प्रक्रम से, जिस पर उस अधिकरण के समक्ष वह आवेदन था, जिससे आवेदन इस प्रकार अंतरित किया गया है, वहां के सिवाय कार्रवाई करेगा जहां अधिकरण की यह राय है कि न्याय के हित में यह आवश्यक है कि आवेदन की बाबत नए सिरे से कार्रवाई की जाए ।

                 [(4) प्रत्येक अधिकरण निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, -

(क) ऐसा एक व्यक्ति, जो राज्य न्यायिक सेवा का जिला, सेशन या प्रथम वर्ग सिविल न्यायाधीश की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति का पद धारण करने वाला सदस्य होगा, जो अध्यक्ष होगा;

(ख) ऐसा एक व्यक्ति, जो उपर जिला मजिस्ट्रेट की पंक्ति के समतुल्य पंक्ति का राज्य सिविल सेवा का अधिकारी होगा, सदस्य;

(ग) ऐसा एक व्यक्ति, जिसके पास मुस्लिम विधि और विधि शास्त्र का ज्ञान है, सदस्य,

और ऐसे प्रत्येक व्यक्ति की नियुक्ति नाम से या पदनाम से की जाएगी ।

                (4क) पदेन सदस्यों के रूप में नियुक्त व्यक्तियों से भिन्न अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति के निबंधन और शर्तें जिनके अन्तर्गत उन्हें संदेय वेतन और भत्ते भी हैं, वे होंगी, जो विहित की जाएं ।]

                (5) अधिकरण को सिविल न्यायालय समझा जाएगा और इसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण अथवा किसी डिक्री या आदेश का निष्पादन करते समय सिविल न्यायालय द्वारा प्रयोग की जा सकती हैं ।

                (6) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, अधिकरण ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो विहित की जाए ।

                (7) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और आवेदन के पक्षकारों पर आबद्धकर होगा तथा उस विनिश्चय का वही बल होगा, जो सिविल न्यायालय द्वारा की गई डिक्री का होता है ।

                (8) अधिकरण के किसी विनिश्चय का निष्पादन उस सिविल न्यायालय द्वारा किया जाएगा जिसे ऐसा विनिश्चय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अनुसार निष्पादन के लिए भेजा जाता है ।

                (9) अधिकरण द्वारा किए गए किसी विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध, चाहे वह अंतरिम हो या अन्यथा, कोई अपील नहीं होगी:

                परन्तु उच्च न्यायालय, स्वप्रेरणा से अथवा बोर्ड या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर, किसी ऐसे विवाद, प्रश्न या अन्य मामले से जिसका अधिकरण द्वारा अवधारण किया गया है, संबंधित अभिलेख ऐसे अवधारण की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन के लिए मंगा सकेगा और उसकी जांच कर सकेगा तथा ऐसे अवधारण की पुष्टि कर सकेगा, उसे उलट सकेगा या उसे उपांतरित कर सकेगा अथवा ऐसा अन्य आदेश पारित करेगा, जो वह ठीक समझे ।

84. अधिकरण द्वारा कार्यवाहियों का शीघ्रता से किया जाना और पक्षकारों को अपने विनिश्चय की प्रतियों का दिया जाना-जब कभी किसी वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित किसी विवाद, प्रश्न या अन्य मामले के अवधारण के लिए अधिकरण को कोई किया जाता है, तब वह अपनी कार्यवाहियां यथासंभव शीघ्रता से करेगा और ऐसे मामले की सुनवाई की समाप्ति पर यथासाध्यशीघ्र, अपना विनिश्चय, लिखित रूप में, देगा और ऐसे विनिश्चय की प्रति विवाद के प्रत्येक पक्षकार को देगा ।

85. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन-किसी वक्फ, वक्फ संपत्ति या अन्य मामले से संबंधित किसी विवाद, प्रश्न या अन्य मामले की बाबत जिसका इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अधिकरण द्वारा अवधारित किया जाना अपेक्षित है, किसी [सिविल न्यायालय, राजस्व न्यायालय और कोई अन्य प्राधिकरण] में कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।

86. कतिपय दशाओं में रिसीवर की नियुक्ति-सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, -

                                (क) बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से, -

(i) किसी ऐसी स्थावर संपत्ति के, जो वक्फ संपत्ति है, किसी सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के निष्पादन में विक्रय को अपास्त करने के लिए;

(ii) किसी स्थावर संपत्ति के, जो वक्फ संपत्ति है, मुतवल्ली द्वारा बोर्ड की मंजूरी के बिना या उससे भिन्न रूप में किए गए किसी अंतरण को चाहे वह मूल्यवान प्रतिफल के लिए किया गया हो या नहीं, अपास्त करने के लिए;

(iii) खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट संपत्ति के कब्जे को वापस लेने के लिए अथवा संबंधित वक्फ के मुतवल्ली को ऐसी संपत्ति का कब्जा लौटाने के लिए,

                संस्थित की जाती है या प्रारंभ की जाती है; या

(ख) ऐसी स्थावर संपत्ति के, जो वक्फ संपत्ति है और जिसका पूर्वतन मुतवल्ली [या किसी अन्य व्यक्ति] द्वारा अंतरण, चाहे वह मूल्यवान प्रतिफल के लिए किया गया हो या नहीं, बोर्ड की मंजूरी के बिना या उससे भिन्न रूप में किया गया है और जो प्रतिवादी के कब्जे में है, कब्जे को वापस लेने के लिए मुतवल्ली द्वारा संस्थित की जाती है या प्रारंभ की जाती है,

वहां न्यायालय, वादी के आवेदन पर, ऐसी संपत्ति का रिसीवर नियुक्त कर सकेगा तथा ऐसे रिसीवर को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसी संपत्ति की आय में से आवेदन को समय-समय पर ऐसी रकम का संदाय करे जो न्यायालय वाद आगे चलाने के लिए आवश्यक समझे ।

                 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

88. किसी अधिसूचना, आदि की विधिमान्यता के बारे में आक्षेप का वर्जन-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन निकाली गई किसी अधिसूचना या किए गए आदेश या विनिश्चय या की गई कार्यवाही या कार्रवाई को किसी सिविल न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

89. पक्षकारों द्वारा बोर्ड के विरुद्ध लाए गए वादों की सूचना-बोर्ड के विरुद्ध ऐसे किसी कार्य के बारे में, जो उसके द्वारा इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसरण में किया जाना तात्पर्यित है, कोई वाद तब तक संस्थित नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसा विवरण लिखित सूचना के, जिसमें वाद हेतुक, वादी का नाम, विवरण और निवास-स्थान तथा अनुतोष, जिसका वह दावा करता है, कथित होगा, बोर्ड के कार्यालय में परिदान किए जाने या वहां छोड़ दिए जाने के ठीक पश्चात् दो मास समाप्त न हो गए हों और वाद-पत्र में यह कथन होगा कि ऐसी सूचना का इस प्रकार परिदान किया गया है या वह छोड़ दी गई है ।

90. न्यायालयों द्वारा वादों, आदि की सूचना-(1) वक्फ संपत्ति के हक या कब्जे अथवा, मुतवल्ली या हिताधिकारी के अधिकार से संबंधित प्रत्येक वाद या कार्यवाही में, न्यायालय या अधिकरण ऐसा वाद या कार्यवाही संस्थित करने वाले पक्षकार के खर्च पर बोर्ड को सूचना देगा ।

                (2) जब कभी कोई वक्फ संपत्ति किसी सिविल न्यायालय की डिक्री के निष्पादन में अथवा किसी राजस्व, उपकर, रेट या कर की, जो सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी को देय है, वसूली के लिए विक्रयार्थ अधिसूचित की जाती है तब उस न्यायालय, कलक्टर या अन्य व्यक्ति द्वारा, जिसके आदेश के अधीन विक्रय अधिसूचित किया जाता है, बोर्ड को सूचना दी जाएगी ।

                (3) उपधारा (1) के अधीन सूचना के अभाव में, वाद या कार्यवाही में पारित कोई डिक्री या आदेश उस दशा में शून्य घोषित कर दिया जाएगा जब बोर्ड, ऐसे वाद या कार्यवाही की अपने को जानकारी होने के  [छह मासट के भीतर, न्यायालय को इस निमित्त आवेदन करता है ।

                (4) उपधारा (2) के अधीन सूचना के अभाव में, विक्रय उस दशा में शून्य घोषित कर दिया जाएगा जब बोर्ड, विक्रय की अपने को जानकारी होने के एक मास के भीतर, उस न्यायालय या अन्य प्राधिकारी को जिसके आदेश के अधीन विक्रय किया गया था, इस निमित्त आवेदन करता है ।

91. 1894 के अधिनियम 1 के अधीन कार्यवाहियां-(1) यदि भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 के अधीन अथवा भूमि या अन्य संपत्ति के अर्जन से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन कार्यवाहियों के अनुक्रम में,  [अधिनिर्णय किए जाने के पूर्व, यदि कोई संपत्ति] वक्फ संपत्ति है तो ऐसे अर्जन की सूचना की तामील बोर्ड पर कलक्टर द्वारा की जाएगी तथा आगे की कार्यवाहियों को रोक दिया जाएगा जिससे कि बोर्ड ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास के भीतर किसी समय कार्यवाही में पक्षकार के रूप में उपस्थित हो सके और अभिवचन कर सके ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के पूर्वगामी उपबंधों में, उनमें निर्दिष्ट किसी अन्य विधि के संबंध में, कलक्टर के प्रति निर्देश का, यदि कलक्टर, उस विधि के अधीन भूमि या अन्य संपत्ति के अर्जन के लिए संदेय प्रतिकर या अन्य रकम का अधिनिर्णय करने के लिए किसी ऐसी अन्य विधि के अधीन सक्षम प्राधिकारी नहीं है तो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसी अन्य विधि के अधीन ऐसा अधिनिर्णय करने के लिए सक्षम प्राधिकारी के प्रति निर्देश है ।

(2) यदि बोर्ड के पास यह विश्वास करने का कारण है कि अर्जनाधीन कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है तो वह अधिनिर्णय दिए जाने के पूर्व किसी समय कार्यवाही में पक्षकार के रूप में उपस्थित हो सकेगा और अभिवचन कर सकेगा ।

                (3) जब बोर्ड, उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन उपस्थित हुआ है तब भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 31 या धारा 32 के अधीन अथवा उपधारा (1) में निर्दिष्ट अन्य विधि के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन कोई आदेश, बोर्ड को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित नहीं किया जाएगा ।

                (4) बोर्ड की सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना, भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 31 या धारा 32 के अधीन अथवा उपधारा (1) में निर्दिष्ट अन्य विधि के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन पारित कोई आदेश, उस दशा में शून्य घोषित कर दिया जाएगा जब बोर्ड, आदेश की अपने को जानकारी होने के एक मास के भीतर, उस प्राधिकारी को, जिसने आदेश किया था, इस निमित्त आवेदन करता है ।

92. बोर्ड का वाद या कार्यवाही में पक्षकार होना-किसी वक्फ या किसी वक्फ संपत्ति की बाबत किसी वाद या कार्यवाही में, बोर्ड उस वाद या कार्यवाही के पक्षकार के रूप में उपस्थित हो सकेगा और अधिवचन कर सकेगा ।

93. मुतवल्लियों द्वारा या उनके विरुद्ध वादों में समझौते का वर्जन-वक्फ संपत्ति के हक या मुतवल्ली के अधिकारों के संबंध में किसी वक्फ के मुतवल्ली द्वारा या उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में किसी वाद या कार्यवाही में कोई समझौता बोर्ड की मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा ।

94. अपने कर्तव्यों के निर्वहन में मुतवल्ली के असफल रहने की दशा में अधिकरण को आदेश करने की शक्ति-(1) जहां कोई मुतवल्ली कोई ऐसा कार्य करने के लिए बाध्यताधीन है जो मुस्लिम विधि द्वारा, पवित्र, धार्मिक या पूर्त माना गया है और वह मुतवल्ली ऐसा करने में असफल रहता है वहां वह बोर्ड, अधिकरण को ऐसे आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा कि मुतवल्ली को निदेश दिया जाए कि वह ऐसा कार्य करने के लिए आवश्यक रकम, बोर्ड को या बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को संदाय करे ।

                (2) जहां कोई मुतवल्ली वक्फ के अधीन उस पर अधिरोपित किन्हीं अन्य कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए बाध्यताधीन है और वह मुतवल्ली ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करने में जानबूझकर असफल रहता है वहां बोर्ड या वक्फ में हितबद्ध कोई व्यक्ति अधिकरण को आवेदन कर सकेगा और अधिकरण उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

95. विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण करने की अपील प्राधिकारी की शक्ति-जहां इस अधिनियम के अधीन, कोई अपील फाइल करने के लिए कोई अवधि विनिर्दिष्ट की गई है, वहां यदि अपील प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपील करने से पर्याप्त हेतुक से निवारित किया गया था तो वह उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा ।

अध्याय 9

प्रकीर्ण

96. ओक़ाफ़ के लौकिक क्रियाकलापों का विनियमन करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) ओक़ाफ़ के लौकिक क्रियाकलापों का विनियमन करने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार को निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे, अर्थात्: -

(क) वक्फ प्रशासन के साधारण सिद्धांत और नीतियां अधिकथित करना, जहां तक उनका संबंध ओक़ाफ़ के लौकिक क्रियाकलापों से है;

(ख) केन्द्रीय वक्फ परिषद् और बोर्ड के कृत्यों का समन्वय करना, जहां तक उनका संबंध उनके लौकिक कृत्यों से है;

(ग) साधारणतया ओक़ाफ़ के लौकिक क्रियाकलापों के प्रशासन का पुनर्विलोकन करना और सुधारों का, यदि कोई हों, सुझाव देना ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन अपनी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करने में, केन्द्रीय सरकार किसी बोर्ड से कोई कालिक या अन्य रिपोर्ट मंगा सकेगी और बोर्ड को ऐसे निदेश जारी कर सकेगी जो वह ठीक समझे तथा बोर्ड ऐसे निदेशों का अनुपालन करेगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए लौकिक क्रियाकलाप" के अन्तर्गत, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और अन्य कल्याणकारी क्रियाकलाप हैं ।

97. राज्य सरकार द्वारा निदेश-धारा 96 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए किन्हीं निदेशों के अधीन रहते हुए, राज्य सरकार, बोर्ड को, समय-समय पर, ऐसे साधारण या विशेष निदेश दे सकेगी जो वह राज्य सरकार ठीक समझे और बोर्ड अपने कृत्यों के पालन में, ऐसे निदेशों का अनुपालन करेगा:

                 [परंतु राज्य सरकार ऐसा कोई निदेश जारी नहीं करेगी, जो किसी वक्फ विलेख या किसी वक्फ की प्रथा, पद्धति या रूढ़ि के प्रतिकूल हो ।]

98. राज्य सरकार द्वारा वार्षिक रिपोर्ट-(1) राज्य सरकार, वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य वक्फ बोर्ड के कार्यकरण और प्रशासन तथा उस वर्ष के दौरान राज्य में ओक़ाफ़ के प्रशासन की बाबत एक साधारण वार्षिक रिपोर्ट तैयार कराएगी और उसे जहां, राज्य विधान-मंडल के दो सदन हैं, वहां प्रत्येक सदन के समक्ष, अथवा जहां ऐसे विधान-मंडल का एक सदन है वहां उस सदन के समक्ष, रखवाएगी तथा ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट ऐसे प्ररूप में होगी और उसमें वे बातें होंगी जिनका विनियमों द्वारा उपबंध किया जाए ।

99. बोर्ड को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि राज्य सरकार की यह राय है कि बोर्ड इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अपने पर अधिरोपित कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ है अथवा उसके पालन में उसने बार-बार व्यतिक्रम किया है अथवा वह अपनी शक्तियों से आगे बढ़ गया है या उसने उनका दुरुपयोग किया है अथवा वह केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 96 के अधीन या राज्य सरकार द्वारा धारा 97 के अधीन जारी किए गए किसी निदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर और पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रहा है अथवा यदि वार्षिक निरीक्षण के पश्चात् प्रस्तुत की गई किसी रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि बोर्ड के बने रहने से राज्यों में ओक़ाफ़ के हितों को क्षति पहुंचने की संभावना है तो राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बोर्ड को छह मास से अनधिक अवधि के लिए अतिष्ठित कर सकेगी :

परन्तु इस उपधारा के अधीन अधिसूचना निकालने के पूर्व राज्य सरकार, बोर्ड को यह हेतुक दर्शित करने के लिए उचित समय देगी कि उसे अतिष्ठित क्यों न कर दिया जाए तथा बोर्ड के स्पष्टीकरणों और आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी:

 [परंतु यह और कि इस धारा के अधीन राज्य सरकार की शक्ति का प्रयोग तभी किया जाएगा, जब वित्तीय अनियमितताओं, कदाचार या इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य हो ।]

                (2) उपधारा (1) के अधीन बोर्ड को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -

(क) बोर्ड के सभी सदस्य अतिष्ठित किए जाने की तारीख से ही ऐसे सदस्यों की हैसियत में अपने पदों को रिक्त    कर देंगे;

(ख) उन सभी शक्तियों और कर्तव्यों का, जिनका इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन, बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से प्रयोग या पालन किया जा सकेगा, प्रतिष्ठिति काल के दौरान ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा प्रयोग या पालन किया जाएगा जिन्हें राज्य सरकार निर्दिष्ट करे; और

(ग) बोर्ड में निहित सभी संपत्ति, अतिष्ठिति काल के दौरान, राज्य सरकार में निहित रहेगी ।

                (3) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठिति काल की समाप्ति पर, राज्य सरकार, -

 [(क) अतिष्ठिति काल को, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, छह मास की एक और अवधि तक बढ़ा सकेगी और निरंतर अतिष्ठिति काल एक वर्ष से अनधिक का नहीं होगा; या]

(ख) बार्ड को धारा 14 में उपबंधित रीति से पुनर्गठित कर सकेगी ।

100. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, बोर्ड या मुख्य कार्यपालक अधिकारी या सर्वेक्षण आयुक्त के अथवा इस अधिनियम के अधीन सम्यक्तः नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

101. सर्वेक्षण आयुक्त, बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों का लोक सेवक समझा जाना-(1) सर्वेक्षण आयुक्त, बोर्ड के सदस्य, बोर्ड के प्रत्येक अधिकारी, प्रत्येक संपरीक्षक तथा प्रत्येक अन्य व्यक्ति को, जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश द्वारा उस पर अधिरोपित किन्हीं कर्तव्यों के निर्वहन के लिए सम्यक्तः नियुक्त किया गया है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

                (2) वक्फ का प्रत्येक मुतवल्ली, ऐसी प्रबंध समिति चाहे वह बोर्ड द्वारा या किसी वक्फ विलेख के अधीन गठित की गई हो, प्रत्येक सदस्य, प्रत्येक कार्यपालक अधिकारी और वक्फ में कोई पद धारण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

102. कतिपय बोर्डों के पुनर्गठन के लिए विशेष उपबंध-(1) जहां राज्यों के पुनर्गठन का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन राज्यों के पुनर्गठन के कारण कोई संपूर्ण राज्य या उसका कोई भाग, जिसकी बाबत बोर्ड ऐसे पुनर्गठन की तारीख के ठीक पूर्व कार्य कर रहा था, उस दिन किसी अन्य अन्य राज्य को अंतरित कर दिया गया है और ऐसे अंतरण के कारण, उस राज्य की सरकार को, जिसके किसी भाग में बोर्ड कार्य कर रहा है, यह प्रतीत होता है कि उस बोर्ड का विघटन कर दिया जाए अथवा उस संपूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए उसे अन्तर्राज्यीय बोर्ड के रूप में पुनर्गठित किया जाए, वहां वह राज्य सरकार, यथास्थिति, ऐसे विघटन या ऐसे पुनर्गठन के लिए ऐसी स्कीम बनाएगी जिसके अन्तर्गत बोर्ड की आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों का किसी अन्य बोर्ड या राज्य सरकार को अंतरण करने तथा बोर्ड के कर्मचारियों का अंतरण या पुनर्नियोजन करने के संबंध में प्रस्थापनाएं हैं और उस स्कीम को केन्द्रीय सरकार को भेजेगी ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन उसे भेजी गई स्कीम की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार, संबंधित [परिषद् और राज्य सरकारों से परामर्श करने के पश्चात्,] स्कीम को उपांतरणों के सहित या उनके बिना अनुमोदित कर सकेगी और इस प्रकार अनुमोदित स्कीम को ऐसा आदेश करके प्रभावी कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।

                (3) उपधारा (2) के अधीन आदेश में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

                                (क) बोर्ड का विघटन;

                                (ख) बोर्ड का किसी भी रीति से पुनर्गठन जिसके अंतर्गत, जहां आवश्यक हो, नए बोर्ड की स्थापना है;

                                (ग) वह क्षेत्र जिसकी बाबत पुनर्गठित बोर्ड या नया बोर्ड कार्य करेगा, और क्रियाशील होगा;

                (घ) बोर्ड की आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों का (जिनके अंतर्गत उसके द्वारा की गई किसी संविदा के अधीन अधिकार और दायित्व हैं) किसी अन्य बोर्ड या राज्य सरकार को पूर्णतः या भागतः अन्तरण तथा ऐसे अन्तरण के निबंधन और शर्तें;

(ङ) बोर्ड के स्थान पर ऐसे किसी अन्तरिती का प्रतिस्थापन अथवा ऐसे किसी अन्तरिती का किसी ऐसी विधिक कार्यवाही में पक्षकार के रूप में जोड़ा जाना जिसमें बोर्ड एक पक्षकार है तथा बोर्ड के समक्ष लम्बित किसी कार्यवाही का ऐसे किसी अन्तरिती को अन्तरण;

(च) बोर्ड के किन्हीं कर्मचारियों का ऐसे किसी अन्तरिती को या उसके द्वारा अंतरण या पुनर्नियोजन तथा संबंधित राज्य के पुनर्गठन का उपबंध करने वाली विधि के अधीन रहते हुए, ऐसे कर्मचारियों को ऐसे अन्तरण या पुनर्नियोजन के पश्चात् लागू सेवा के निबंधन और शर्तें; और

(छ) ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक विषय जो अनुमोदित स्कीम को प्रभावी करने के लिए      आवश्यक हों ।

                (4) जहां किसी बोर्ड की आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों को अंतरित करने वाला कोई आदेश इस धारा के अधीन दिया जाता है वहां उस आदेश के आधार पर बोर्ड की आस्तियां, अधिकार और दायित्व अंतरिती में निहित हो जाएंगे और उसकी आस्तियां, अधिकार और दायित्व हो जाएंगे ।

                (5) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।

                (6) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

103. किसी राज्य के भाग के लिए बोर्ड की स्थापना करने के लिए विशेष उपबंध-(1) जहां किसी राज्य के पुनर्गठन का उपबन्ध करने वाली किसी विधि द्वारा किए गए किन्हीं प्रादेशिक परिवर्तनों के कारण यह अधिनियम उस तारीख से जिसको वह विधि प्रवृत्त होती है, किसी राज्य के किसी भाग या भागों पर ही लागू है किन्तु उसके शेष भाग में प्रवृत्त नहीं किया गया है वहां इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, उस राज्य सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा, वह ऐसे भाग या भागों के लिए जिनमें यह अधिनियम प्रवृत्त है, एक या अधिक बोर्डों की स्थापना करे और ऐसी दशा में, इस अधिनियम में बोर्ड के संबंध में राज्य" शब्द के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह राज्य के उस भाग के प्रति निर्देश है जिसके लिए बोर्ड की स्थापना की गई है ।

                (2) जहां ऐसा कोई बोर्ड स्थापित किया गया है और राज्य सरकार को यह प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण राज्य के लिए बोर्ड की स्थापना की जाए वहां राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा, राज्य के उस भाग के लिए स्थापित बोर्ड का विघटन कर सकेगी अथवा ऐसे बोर्ड को पुनर्गठित और पुनःसंगठित कर सकेगी अथवा सम्पूर्ण राज्य के लिए नया बोर्ड स्थापित कर सकेगी और तब राज्य के उस भाग के लिए बोर्ड की आस्तियां, अधिकार और दायित्व, यथास्थिति, पुनर्गठित बोर्ड या नए बोर्ड में निहित हो जाएंगे और उसकी आस्तियां, अधिकार और दायित्व हो जाएंगे ।

104. उन व्यक्तियों द्वारा, जो इस्लाम के मानने वाले नहीं हैं, कतिपय ओक़ाफ़ की सहायता के लिए दी गई या दान की गई सम्पत्ति को अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, जब कोई जंगम या स्थावर सम्पत्ति किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो इस्लाम को मानने वाला नहीं है, किसी ऐसे वक्फ की सहायता के लिए दी गई या दान की गई है जो-

                                (क) कोई मस्जिद, ईदगाह, इमामबाड़ा, दरगाह, खानागाह या मकबरा है;

                                (ख) कोई मुस्लिम कब्रिस्तान है;

                                (ग) कोई सराय या मुसाफिर खाना है,

तब ऐसी सम्पत्ति उस वक्फ में समाविष्ट समझी जाएगी और उसके संबंध में उसी रीति से कार्रवाई की जाएगी जिसे उस वक्फ के संबंध में की जाती है जिसमें वह इस प्रकार समाविष्ट है ।

 [104क. वक्फ संपत्ति के विक्रय, दान, विनिमय, बंधक या अंतरण का प्रतिषेध-(1) कोई व्यक्ति, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी वक्फ विलेख में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी किसी जंगम या स्थावर संपत्ति का, जो वक्फ संपत्ति है, किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय, दान, विनिमय, बंधक या अंतरण नहीं करेगा ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट संपत्ति का कोई विक्रय, दान, विनिमय, बंधक या अंतरण आरंभ से ही शून्य होगा ।]

 [104ख. सरकारी अभिकरणों के अधिभोग में की वक्फ संपत्तियों का वक्फ बोर्डों को प्रत्यावर्तन-(1) यदि सरकारी अभिकरणों द्वारा किसी वक्फ संपत्ति का अधिभोग किया गया है तो यह अधिकरण के आदेश की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर बोर्ड या मुतवल्ली को वापस कर दी जाएगी ।

(2) यदि सपंत्ति लोक प्रयोजन के लिए अपेक्षित है, तो सरकारी अभिकरण, वर्तमान बाजार मूल्य पर अधिकरण द्वारा, यथास्थिति, किराए या प्रतिकर का अवधारण के लिए आवेदन कर सकेगा ।]

105. दस्तावेजों आदि की प्रतियां पेश किए जाने की अपेक्षा करने की बोर्ड और मुख्य कार्यपालक अधिकारी की           शक्ति-तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड या मुख्य कार्यपालक अधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसकी अभिरक्षा में वक्फ से संबंधित कोई अभिलेख, रजिस्टर, रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज अथवा कोई ऐसी स्थावर संपत्ति है, जो वक्फ संपत्ति है, अपेक्षा करे कि वह आवश्यक खर्च का संदाय किए जाने पर, ऐसे किसी अभिलेख, रजिस्टर, रिपोर्ट या दस्तावेज की प्रतियां या उनसे उद्धरण पेश करे तथा प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जिससे ऐसी अपेक्षा की जाती है, बोर्ड या मुख्य कार्यपालक अधिकारी को, यथाशीघ्र, अपेक्षित अभिलेख, रजिस्टर, रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज की प्रतियां या उससे उद्धरण पेश करेगा ।

106. सामान्य बोर्ड का गठन करने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता        है कि-

                (i) दो या अधिक राज्यों में मुस्लिम जनसंख्या की अल्पता के कारण;

                (ii) ऐसे राज्यों में ओक़ाफ़ के अपर्याप्त संसाधनों के कारण; और

                (iii) ऐसे राज्यों में ओक़ाफ़ की संख्या और आय तथा मुस्लिम जनसंख्या के बीच अननुपात के कारण,

राज्यों में ओक़ाफ़ और ऐसे राज्यों में मुस्लिम जनसंख्या के हित में यह समीचीन है कि ऐसे राज्यों में से प्रत्येक राज्य के लिए पृथक् बोर्डों के बजाय एक सामान्य बोर्ड बनाया जाए वहां वह, संबंधित राज्यों में से प्रत्येक राज्य की [परिषद् और सरकार से परामर्श करने के पश्चात्] ऐसे राज्यों के लिए, जो वह ठीक समझे, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, सामान्य बोर्ड स्थापित कर सकेगी और उसी या किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा वह स्थान विनिर्दिष्ट कर सकेगी जहां ऐसे सामान्य बोर्ड का प्रधान कार्यालय स्थित होगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रत्येक सामान्य बोर्ड यावत्साध्य ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगा जो धारा 14 की, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट हैं ।

(3) जब कभी उपधारा (1) के अधीन कोई सामान्य बोर्ड स्थापित किया जाता है तब-

                (क) वे सभी शक्तियां, जो किसी वक्फ विलेख या ओक़ाफ़ से संबंधित तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबंध के अधीन राज्य सरकार में निहित हैं, केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगी और तब ऐसे वक्फ विलेख या विधि में राज्य सरकारों के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे केन्द्रीय सरकार के प्रति निर्देश हैं:

                परन्तु दो या अधिक राज्यों के लिए सामान्य बोर्ड स्थापित करते समय, केन्द्रीय सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि संबंधित राज्यों में से प्रत्येक राज्य का कम से कम एक प्रतिनिधि बोर्ड के सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाए;

                (ख) इस अधिनियम में किसी राज्य के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उन राज्यों में से, जिनके लिए सामान्य बोर्ड स्थापित किया गया है, प्रत्येक राज्य के प्रति निर्देश है;

                (ग) केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य में बोर्ड को लागू किसी नियम पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, सामान्य बोर्ड के कारबार के संचालन और उसके कामकाज का विनियमन करते हुए नियम बना सकेगी ।

(4) सामान्य बोर्ड एक ऐसा निगमित निकाय होगा, जिसके उद्देश्य एक राज्य तक ही सीमित नहीं होंगे और जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी तथा जिसे, ऐसी शर्तों और निर्बंधनों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, संपत्ति अर्जित और धारण करने तथा ऐसी संपत्ति का अंतरण करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा या उस पर वाद लाया जाएगा ।

107. वक्फ संपत्ति की वापसी के लिए 1963 के अधिनियम 36 का लागू होना-परिसीमा अधिनियम, 1963 की कोई बात वक्फ में समाविष्ट स्थावर संपत्ति के कब्जे या ऐसी संपत्ति में किसी हित के कब्जे के लिए किसी वाद को लागू नहीं होगी ।

108. निष्क्रांत वक्फ संपत्ति के बारे में विशेष उपबन्ध-इस अधिनियम के उपबन्ध, निष्क्रांत संपत्ति प्रशासन अधिनियम, 1950   (1950 का 31) की धारा 2 के खंड (च) के अर्थ में किसी ऐसी निष्क्रांत संपत्ति के संबंध में लागू होंगे और सदैव लागू हुए समझे जाएंगे, जो, उक्त अर्थ के अंतर्गत ऐसी निष्क्रांत संपत्ति होने के ठीक पूर्व, किसी वक्फ में समाविष्ट संपत्ति थी और विशिष्टतया, निष्क्रांत संपत्ति प्रशासन अधिनियम, 1950 के अधीन अभिरक्षक के अनुदेशों के अनुसरण में, इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व बोर्ड का किसी ऐसी संपत्ति का (चाहे किसी दस्तावेज के अंतरण द्वारा या किसी अन्य रीति से और चाहे साधारणतया या विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए) सौंपा जाना, इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा प्रभाव रखेगा और सदैव प्रभाव रखने वाला समझा जाएगा माना ऐसे सौंपा जाना-

(क) ऐसी संपत्ति को ऐसे बोर्ड में उसी रीति से और उसी प्रभाव से, जो निष्क्रांत संपत्ति प्रशासन अधिनियम, 1950 (1950 का 31) की धारा 11 की उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए ऐसी संपत्ति के न्यासी में निहित हो जाने से होता, ऐसे सौंपे जाने की तारीख से निहित करने के लिए प्रवर्तित हुआ था; और 

(ख) ऐसे बोर्ड को, तब तक के लिए जब तक वह आवश्यक समझे, संबंधित वक्फ का सीधे प्रबंध ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत करने के लिए प्रवर्तित हुआ था ।

 [108क. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंधों का, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी अध्यारोही प्रभाव होगा ।]

109. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के अध्याय 3 के प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

 [(i) धारा 3 के खंड (i) के अधीन मुतवल्ली के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए किसी व्यक्ति द्वारा पूरी किए जाने के लिए अपेक्षित अर्हताएं;

(iक) ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (च) के अधीन सर्वेक्षण आयुक्त की रिपोर्ट में अंतर्विष्ट हो सकेंगी;]

(ii) धारा 4 की उपधारा (4) के खंड (च) के अधीन कोई अन्य विषय;

(iii) वे विशिष्टियां जो धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन प्रकाशित ओक़ाफ़ की सूची में हो सकेंगी;

(iv) धारा 14 की उपधारा (2) के अधीन बोर्ड के सदस्यों के एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन की रीति;

(v) धारा 23 की उपधारा (2) के अधीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी की सेवा के निबंधन और शर्तें;

(vi) वे शर्तें और निर्बन्धन, जिनके अधीन रहते हुए, मुख्य कार्यपालक अधिकारी या कोई अन्य अधिकारी 2[धारा 29 की उपधारा (1) के] अधीन किसी लोक कार्यालय, अभिलेखों या रजिस्टरों का निरीक्षण कर सकेगा;

 [(viक) वह अवधि जिसके भीतर मुतवल्ली या कोई अन्य व्यक्ति, धारा 31 की उपधारा (2) के अधीन वक्फ संपत्तियों से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत कर सकेगा;

(viख) वे शर्तें, जिनके अधीन सरकार का कोई अभिकरण या कोई अन्य संगठन 31 की उपधारा (3) के अधीन अभिलेखों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों की प्रतियों का प्रदाय, कर सकेगा;]

(vii) वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए, धारा 38 की उपधारा (1) के अधीन कोई कार्यपालक अधिकारी और सहायक कर्मचारिवृन्द नियुक्त किए जा सकेंगे;

(viii) वह रीति जिससे धारा 39 की उपधारा (1) के अधीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा जांच की जा सकेगी;

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(x) वह अंतराल, जिस पर ओक़ाफ़ के लेखाओं की धारा 47 की उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसरण में संपरीक्षा की जा सकेगी;

(xi) वह समय जिसके भीतर किसी संपत्ति के विक्रय की धारा 51 की उपधारा (2) के पहले परंतुक के अधीन सूचना दी जानी होगी और वह रीति जिससे उस धारा की उपधारा (3) के अधीन किया गया अनुमोदन प्रकाशित किया जाएगा;

(xii) वह मार्गदर्शन जिसके अधीन रहते हुए कलक्टर धारा 52 के अधीन इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में अंतरित संपत्ति को वापस लेगा;

(xiii) धारा 54 की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई सूचना की तामील की रीति और वह रीति जिससे उस धारा की उपधारा (3) के अधीन कोई जांच की जानी है;

(xiv) वह रीति जिससे धारा 64 या धारा 71 के अधीन कोई जांच की जा सकेगी;

(xv) अन्य विषय जो धारा 65 की उपधारा (3) के अधीन प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में विनिर्दिष्ट किए जाएं;

(xvi) धारा 67 की उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेश के प्रकाशन की रीति;

(xvii) वह रीति जिससे धारा 69 की उपधारा (1) के अधीन मुतवल्ली से परामर्श किया जा सकेगा ;

(xviii) धारा 69 की उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश के प्रकाशन की रीति;

(xix) वह दर जिस पर किसी मुतवल्ली द्वारा धारा 72 के अधीन अंशदान किया जाना है;

(xx) धारा 77 के अधीन वक्फ निधि में धनराशियों का संदाय, ऐसी धनराशियों का विनिधान, अभिरक्षा और संवितरण;

(xxi) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जिसके भीतर धारा 78 के अधीन बोर्ड का बजट तैयार और प्रस्तुत किया    जा सकेगा;

(xxii) वह समय जिसके भीतर अधिकरण की धारा 83 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन किया जाएगा;

 [(xxiiक) धारा 83 की उपधारा (4क) के अधीन अध्यक्ष और पदेन सदस्यों के रूप में नियुक्त व्यक्तियों से भिन्न अन्य सदस्यों की नियुक्ति के निबंधन और शर्तें, जिनके अंतर्गत उन्हें संदेय वेतन और भत्ते भी हैं;]

(xxiii) वह प्रक्रिया जिसका धारा 83 की उपधारा (6) के अधीन अधिकरण अनुसरण करेगा;

(xxiv) वह प्ररूप जिसमें धारा 98 के अधीन वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी है तथा वे बातें जो ऐसी रिपोर्ट में होंगी; और

(xxv) कोई अन्य विषय, जो विहित किए जाने हैं या विहित किए जाएं ।

110. विनियम बनाने की बोर्ड की शक्ति-(1) बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों को कार्यान्वित करने के लिए, राज्य सरकार की पूर्व मंजरी से, ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों ।

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

                                (क) धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड के अधिवेशनों का समय और स्थान;

(ख) बोर्ड के अधिवेशनों में प्रक्रिया और कार्य का संचालन;

(ग) समितियों और बोर्ड का गठन और उनके कृत्य तथा ऐसी समितियों के अधिवेशनों में कार्य के किए जाने की प्रक्रिया;

(घ) बोर्ड के अध्यक्ष या सदस्यों अथवा समितियों के सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते या फीस;

(ङ) धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन बोर्ड के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें;

(च) वक्फ के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन का प्ररूप, उसमें होने वाली अतिरिक्त विशिष्टियां तथा धारा 36 की उपधारा (3) के अधीन ओक़ाफ़ के रजिस्ट्रीकरण की रीति और स्थान;

(छ) धारा 37 के अधीन ओक़ाफ़ के रजिस्टर में होने वाली अतिरिक्त विशिष्टियां;

(ज) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जिसके भीतर धारा 44 की उपधारा (1) के अधीन ओक़ाफ़ के बजट, मुतवल्लियों द्वारा तैयार और प्रस्तुत किए जा सकेंगे तथा बोर्ड द्वारा अनुमोदित किए जा सकेंगे;

(झ) बोर्ड द्वारा धारा 79 के अधीन रखी जाने वाली लेखाबहियां और अन्य बहियां;

(ञ) बोर्ड की कार्यवाहियों और अभिलेखों के निरीक्षण के लिए या उनकी प्रतियां जारी किए जाने के लिए संदेय फीसें;

(ट) वे व्यक्ति जिनके द्वारा बोर्ड का कोई आदेश या विनिश्चय अधिप्रमाणित किया जा सकेगा; और

(ठ) कोई अन्य विषय जिसका विनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

                (3) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी विनियम, राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और ऐसे प्रकाशन की तारीख से    प्रभावी होंगे ।

111. नियमों और विनियमों का राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाना-धारा 110 के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और 111 के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।

112. निरसन और व्यावृत्तियां-(1) वक्फ अधिनियम, 1954 (1954 का 29) और वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 1984 (1984 का 69) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं ।

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अधिनियमों के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

                (3) यदि इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व, किसी राज्य में, कोई ऐसी विधि जो इस अधिनियम की तत्स्थानी है, प्रवृत्त है तो तत्स्थानी विधि निरसित हो जाएगी:

                परन्तु ऐसा निरसन उस तत्स्थानी विधि के पूर्व प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगा और इसके अधीन रहते हुए यह है कि उस तत्स्थानी विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग करते हुए की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए की गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम उस दिन प्रवृत्त था जिस दिन ऐसी बात या कार्रवाई की गई थी ।

113. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, ऐसे आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:

                परन्तु ऐसा कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ित के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

                (2) इस धारा के अधीन किया गया आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

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