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टोकियो कन्वेंशन अधिनियम, 1975 ( Tokyo Convention Act, 1975 )


 

टोकियो कन्वेंशन अधिनियम, 1975

(1975 का अधिनियम संख्यांक 20)

[8 मई, 1975]

वायुयानों पर किए गए अपराधों तथा कुछ अन्य

कार्यों से सम्बन्धित कन्वेंशन को

प्रभावी करने के लिए

अधिनियम

वायुयानों पर किए गए अपराधों तथा कतिपय अन्य कार्यों से सम्बन्धित एक कन्वेंशन पर 14 सितम्बर, 1963 को टोकियो में हस्ताक्षर हुए थे ;

और यह समीचीन है कि भारत उक्त कन्वेंशन को मान ले और उसे प्रभावी करने के निमित्त उपबन्ध किए जाएं ;

अतः भारत गणराज्य के छब्बीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम टोकियो कन्वेंशन अधिनियम, 1975 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

अध्याय 2

परिभाषाएं

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) वायुयान" से ऐसा वायुयान अभिप्रेत है, जो चाहे वह भारत में रजिस्ट्रीकृत हो या नहीं-

(i) सैनिक वायुयान से, अन्यथा

(ii) किसी ऐसे वायुयान से, जो किसी राज्य का है या उसकी सेवा में अनन्यतः प्रयोग किया जाता है,

भिन्न है ;

                                (ख) समुचित प्राधिकारी" से,-

(i) भारत के सम्बन्ध में, ऐसा पुलिस अधिकारी अभिप्रेत है जो पंक्ति में सहायक उपनिरीक्षक या आप्रवासन अधिकारी से निम्न न हो, और

(ii) किसी अन्य ऐसे देश के संबंध में, जो कन्वेंशन देश है, ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसके कृत्य भारत में या तो किसी पुलिस अधिकारी के, जो पंक्ति में सहायक उपनिरीक्षक से निम्न न हो, या किसी आप्रवासन अधिकारी के कृत्यों के समरूप हैं ;

(ग) कमांडर" से, किसी वायुयान के संबंध में, कर्मीदल का वह सदस्य अभिप्रेत है जिसे उसके प्रचालक ने उस वायुयान के कमांडर के रूप में पदाभिहित किया हो, और यदि ऐसा कोई व्यक्ति न हो तो वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो वायुयान का तत्समय ऐसा कमानधारी विमानचालक हो ;

(घ) कन्वेंशन देश" से वह देश अभिप्रेत है जिसमें तत्समय टोकियो कन्वेंशन प्रवृत्त है ;

(ङ) भारत में रजिस्ट्रीकृत वायुयान" से ऐसा वायुयान अभिप्रेत है-

(क) जो भारत में तत्समय रजिस्ट्रीकृत है ; अथवा

(ख) जो किसी देश में तत्समय रजिस्ट्रीकृत नहीं है किन्तु जिसके विषय में या तो वायुयान का प्रचालक अथवा उसमें स्वामी के रूप में विधिक अथवा लाभप्रद हित रखने का हकदार प्रत्येक व्यक्ति निम्नलिखित अपेक्षाओं की पूर्ति करता है, अर्थात् :-

(i) वह भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान में किसी विधिक या लाभप्रद हित का स्वामी होने के लिए अर्हित व्यक्ति है, और

(ii) वह भारत में निवास करता है या उसके कारबार का मुख्य स्थान भारत में है ; अथवा

(ग) जो भारत से भिन्न किसी अन्य देश में तत्समय रजिस्ट्रीकृत है और जो किसी ऐसे व्यक्ति को जो, अथवा ऐसे व्यक्तियों को, जिनमें से प्रत्येक, उपखण्ड (ख) (i) और (ii) में विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं की पूर्ति करता है, भाड़े पर अंतरित किया गया है ;

(च) सैनिक वायुयान" से किसी देश की नौसैना, थल सेना या वायु सेना का वायुयान अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसा प्रत्येक वायुयान भी है जो उस प्रयोजन के लिए नौसेना, थल सेना या वायु सेना की सेवा के किसी व्यक्ति द्वारा समादेशित है ;

(छ) प्रचालक" से, किसी भी वायुयान के संबंध में, किसी भी समय ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास उस समय वायुयान का प्रबन्ध है ;

(ज) कमानधारी विमानचालक" से, किसी वायुयान के संबंध में, ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो वायुयान में किसी अन्य विमानचालक के निदेशाधीन नहीं है और उस वायुयान के चालन का तत्समय भारसाधक है और उड़ान की अवधि के दौरान वायुयान के प्रचालन और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है ;

(झ) टोकियो कन्वेंशन" से वायुयानों पर किए गए अपराधों तथा कुछ अन्य कार्यों से संबंधित वह कन्वेंशन अभिप्रेत है जिस पर 14 सितम्बर, 1963 को टोकियो में हस्ताक्षर हुए थे ;

(ञ) किसी देश अथवा उसकी राज्यक्षेत्रीय सीमाओं के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत उस देश का राज्यक्षेत्रीय सागर खण्ड है, यदि कोई हो, और उड़ानरत किसी वायुयान के प्रति निर्देश के अन्तर्गत उस वायुयान के प्रति निर्देश भी है जो ऐसी अवधि में, जिसमें वह ऐसे समुद्र या भूमि पर है किसी देश की राज्यक्षेत्रीय सीमा के भीतर नहीं है ।

                (2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए जिस अवधि के दौरान कोई वायुयान उड़ानरत हो उसके संबंध में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत उस क्षण से, जब किसी वायुयान को उड़ान के लिए उठाने के प्रयोजनार्थ शक्ति का उपयोग किया जाता है, उस क्षण तक की अवधि सम्मिलित है जब कि उस उड़ान की समाप्ति पर उसकी भूमि पर उतरने की दौड़ (यदि कोई हो) समाप्त होती है ; और धारा 5 के प्रयोजन के लिए पूर्वोक्त अवधि के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत-

(i) उस क्षण से जब वायुयान के सभी बाहरी द्वार, यदि कोई हों, उड़ान के लिए यात्रियों के चढ़ जाने के पश्चात् बन्द कर दिए जाते हैं, तब तक की अवधि सम्मिलित है जब ऐसा कोई द्वार, उड़ान के पश्चात् यात्रियों के उतरने के लिए खोल दिया जाता है ;

(ii) यदि किसी वायुयान को विवश होकर उतरना पड़े तो तत्पश्चात् उस समय तक की ऐसी कोई भी अवधि सम्मिलित है जब तक कि,-

(क) जहां वायुयान विवश होकर भारत में उतरता है वहां, समुचित प्राधिकारी इस प्रकार उतरने के स्थान पर पहुंच नहीं जाता है, और

(ख) किसी अन्य दशा में, समुचित प्राधिकारी उस वायुयान की तथा उस पर के व्यक्तियों और सम्पत्ति की जिम्मेदारी नहीं संभाल लेता है ।

अध्याय 3

अपराध

3. दंड विधि का वायुयान को लागू होना-(1) भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान पर, जब वह भारत में, या भारत के ऊपर से, अन्यत्र उड़ान पर हो, होने वाला कोई कार्य या लोप वही अपराध होगा जो भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन होता यदि वह भारत में हुआ होता :

परन्तु यह उपधारा किसी ऐसे कार्य या लोप को लागू नहीं होगी जो भारत के बाहर के किसी देश की, जहां वायुयान उड़ रहा हो, किसी विधि द्वारा, या उसके अधीन, अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से प्राधिकृत किया गया है ।

(2) ऐसे किसी वायुयान पर, जब कि वह भारत में, या भारत के ऊपर से, अन्यत्र उड़ान पर हो, भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी अपराध के लिए, (जो वायुयान अधिनियम, 1934 (1934 का 22) के अधीन किसी अपराध से भिन्न हो) कोई भी कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसकी सहमति से ही संस्थित की जाएगी अन्यथा नहीं ।

(3) उपधारा (2) की कोई भी बात किसी अपराध की बाबत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी, अथवा उसकी गिरफ्तारी के लिए वारण्ट निकालने, अथवा किसी अपराध से आरोपित किसी व्यक्ति को अभिरक्षा में अथवा जमानत पर प्रतिप्रेषित करने को निवारित नहीं करेगी ।

4. प्रत्यर्पण अधिनियम के बारे में उपबन्ध-उड़ानरत वायुयान पर किए गए अपराधों को प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 (1962 का 34) लागू करने के प्रयोजनों के लिए ऐसे वायुयान के बारे में, जो किसी कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत है, किसी भी समय जब वह वायुयान उड़ानरत है, यह समझा जाएगा कि वह उसी देश की अधिकारिता के भीतर है, भले ही वह तत्समय किसी अन्य देश की अधिकारिता के भीतर भी हो या न हो ।

5. वायुयान के कमांडर की शक्तियां-(1) यदि उड़ानरत किसी वायुयान के, भले ही वह वायुयान कहीं भी क्यों न हो, कमांडर को किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में, जो उस वायुयान पर है, यह विश्वास करने के उचित आधार हैं कि-

(क) सम्बन्धित व्यक्ति ने वायुयान पर, जब वह उड़ानरत है, कोई ऐसा कार्य किया है या वह कोई ऐसा कार्य करने वाला है, जिससे-

(i) उस वायुयान की अथवा उस पर के व्यक्तियों की या सम्पत्ति की सुरक्षा को ; अथवा

(ii) वायुयान पर सुव्यवस्था और अनुशासन को संकट उत्पन्न होता है या हो सकता है ; अथवा

(ख) संबंधित व्यक्ति ने उस वायुयान पर, जब वह उड़ान पर हो, कोई ऐसा कार्य किया है जो कमांडर की राय में उस देश में, जिसमें वायुयान रजिस्ट्रीकृत हुआ है, प्रवृत्त किसी विधि के अधीन, जो विधि राजनीतिक नहीं है या मूलवंशी या धर्म के कारण भेदभाव पर आधारित नहीं है, अपराध है,

तो उपधारा (4) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कमांडर उस व्यक्ति की बाबत ऐसी उचित कार्रवाई कर सकेगा जिसके अन्तर्गत उस व्यक्ति का अवरोध भी है जो-

(i) वायुयान की, अथवा उस पर के व्यक्तियों या सम्पत्ति की सुरक्षा बनाए रखने के लिए ; अथवा

(ii) वायुयान पर सुव्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने के लिए ; अथवा

(iii) उस व्यक्ति को उपधारा (5) के उपबन्धों के अनुसार उतार देने अथवा हवाले कर देने के लिए कमांडर को सशक्त बनाने के लिए,

आवश्यक हों ।

                (2) वायुयान का कमान्डर किसी व्यक्ति को, जिसे अवरुद्ध करने का वह हकदार है, अवरुद्ध करने के लिए कर्मीदल के अन्य सदस्यों को और यात्रियों को प्राधिकृत कर सकेगा या कर्मीदल के अन्य सदस्यों की सहायता की अपेक्षा कर सकेगा और यात्रियों की सहायता के लिए अनुरोध कर सकेगा किन्तु उसकी अपेक्षा नहीं कर सकेगा ।  

(3) यदि कर्मीदल के किसी सदस्य या यात्री को यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वायुयान की अथवा उसमें के व्यक्तियों या सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए उचित निवारक कार्रवाई करना तुरन्त आवश्यक है तो वह उपधारा (2) के अधीन ऐसे प्राधिकरण के बिना भी ऐसी कार्रवाई कर सकेगा ।

(4) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अधीन वायुयान पर के किसी व्यक्ति पर अधिरोपित कोई भी अवरोध उस समय के पश्चात् जारी नहीं रखा जाएगा जब वह वायुयान तत्पश्चात् सर्वप्रथम उड़ानरत नहीं रह जाता जब तक कि उसके पहले, अथवा उस समय के यथासाध्य पश्चात्, वायुयान का कमांडर वायुयान पर किसी व्यक्ति के अवरुद्ध किए जाने के तथ्य की और उसके कारणों की सूचना उस देश के, जिसमें वह वायुयान इस प्रकार उड़ानरत नहीं रह जाता, समुचित प्राधिकारी को नहीं भिजवा देता, किन्तु वह अवरोध, ऐसी सूचना के अधीन रहते हुए,-

(क) उस समय और उसके पश्चात् के उस प्रथम अवसर के बीच की किसी अवधि के लिए, जिस पर कमांडर समुचित प्राधिकारियों की अपेक्षित सहमति से अवरोध के अधीन व्यक्ति को उपधारा (5) के उपबन्धों के अनुसार उतार देने या हवाले कर देने में समर्थ हो जाता है (जिसके अन्तर्गत और आगे की उड़ान की अवधि भी है) ; अथवा

(ख) यदि अवरुद्ध व्यक्ति उस वायुयान पर अवरुद्ध रह कर अपनी यात्रा जारी रखने को सहमत हो जाता है तो,

उस समय के पश्चात् जारी रख सकेगा ।

                (5) वायुयान का कमांडर,-

(क) यदि, वायुयान पर किसी व्यक्ति के विषय में उसको-

(i) उपधारा (1) के खण्ड (क) में वर्णित रूप में विश्वास करने का उचित आधार है ; और

(ii) यह विश्वास करने के उचित आधार हैं कि वायुयान की या वायुयान पर के व्यक्तियों अथवा सम्पत्ति की सुरक्षा की अथवा वायुयान पर सुव्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने के दृष्टि से ऐसा करना आवश्यक है,

                                तो वह उस व्यक्ति को किसी ऐसे देश में उतार सकता है जिसमें वह वायुयान हो, और

(ख) यदि वायुयान पर किसी व्यक्ति के विषय में उसे उपधारा (1) के खण्ड (ख) में वर्णित रूप में विश्वास करने के उचित आधार हैं तो वह उस व्यक्ति को समुचित प्राधिकारी के हवाले कर सकता है ।

                (6) वायुयान का कमांडर,-

(क) यदि वह किसी व्यक्ति को, उपधारा (5) के खण्ड (क) के अनुसरण में, भारत में रजिस्ट्रीकृत वायुयान की दशा में किसी देश में, अथवा किसी अन्य वायुयान की दशा में भारत में उतार देता है तो वह इस प्रकार उतारे जाने के तथ्य और उसके लिए जो कारण हैं उनकी रिपोर्ट-      

(i) जिस देश में उसे उतारा गया है उस देश के समुचित प्राधिकारी को करेगा ; और

(ii) वह व्यक्ति जिस देश का राष्ट्रिक है उसके समुचित राजनयिक या कौन्सलीय आफिसर को करेगा ;

(ख) यदि किसी व्यक्ति को उपधारा (5) के खण्ड (ख) के अनुसरण में भारत में हवाले करना चाहता है, अथवा भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान की दशा में किसी अन्य ऐसे देश में हवाले करना चाहता है जो कन्वेन्शन देश है तो, वायुयान उतरने से पूर्व अथवा उसके पश्चात् उचित रूप से यथासाध्यशीघ्र अपने उस आशय की और उसके लिए जो कारण है, उसकी सूचना-

(i) समुचित प्राधिकारी को देगा ; और

(ii) किसी भी दशा में वह व्यक्ति जिस देश का राष्ट्रिक है उसके समुचित राजनयिक अथवा कौन्सलीय आफिसर को देगा ;

और किसी वायुयान का कमांडर, जो इस उपधारा की अपेक्षाओं का उचित कारण के बिना अनुपालन करने में असफल रहेगा, संक्षेपतः दोषसिद्धि पर, एक हजार रुपए से अनधिक जुर्माने से दण्डनीय होगा ।

6. अधिकारिता-(1) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि भारत में किसी न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए खुले समुद्र पर की गई दस्युता के बारे में अधिकारिता रखने वाले न्यायालय को इस अधिनियम में वर्णित वायुयान पर किए गए अपराधों तथा अन्य कार्यों के बारे में अधिकारिता होगी भले ही वह अपराध या कार्य कहीं भी क्यों न किया गया हो ।

                (2) अधिकारिता प्रदान करने के प्रयोजनों के लिए, उड़ानरत वायुयान पर भारत में प्रवृत्त विधि के अधीन किए गए अपराध के बारे में यह समझा जाएगा कि वह भारत में ऐसे स्थान पर किया गया है जहां अपराधी तत्समय हो ।

7. वायुयान के सम्बन्ध में साक्ष्य के बारे में उपबन्ध-(1) जहां किसी वायुयान पर किए गए अपराध या अन्य कार्य के लिए भारत में किसी न्यायालय के समक्ष किन्हीं कार्यवाहियों में किसी व्यक्ति का परिसाक्ष्य अपेक्षित है और न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि सम्बन्धित व्यक्ति भारत में नहीं पाया जा सकता वहां उस न्यायालय के समक्ष साक्ष्य में उन कार्यवाहियों की विषयवस्तु के सम्बन्ध में ऐसा अभिसाक्ष्य ग्राह्य होगा जो उस व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर शपथ पर पहले ही दिया गया था, और जो-

(क) अपराध से आरोपित व्यक्ति की उपस्थिति में इस प्रकार दिया गया था ; और

(ख) किसी देश के किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के समक्ष, जो भारतीय नागरिकता अधिनियम,1955 (1955 का 57) की प्रथम अनुसूची में उल्लिखित है, अथवा केन्द्रीय सरकार के किसी कौन्सलीय आफिसर के समक्ष, इस प्रकार दिया गया है ।

                (2) ऐसा कोई भी अभिसाक्ष्य उस न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या कौन्सलीय आफिसर के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किया जाएगा जिसके समक्ष वह अभिसाक्ष्य दिया गया था और वह यह प्रमाणित करेगा कि अपराध से आरोपित व्यक्ति अभिसाक्ष्य लेने के समय उपस्थित था ।

                (3) किसी भी कार्यवाही में उस व्यक्ति के, जिसके द्वारा ऐसा अभिसाक्ष्य अधिप्रमाणित किया गया प्रतीत होता है या ऐसा कोई प्रमाणपत्र दिया गया प्रतीत होता है, हस्ताक्षर या पदीय हैसियत को साबित करना आवश्यक नहीं होगा और जब तक कि प्रतिकूल साबित न हो जाए ऐसा प्रमाणपत्र किसी भी कार्यवाही में इस बात का पर्याप्त साक्ष्य होगा कि अपराध से आरोपित व्यक्ति उस अभिसाक्ष्य के देने के समय उपस्थित था ।

                (4) यदि यथापूर्वोक्त ऐसे कौन्सलीय आफिसर से यह शिकायत की गई है कि कोई अपराध भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान पर, जब कि वह भारत में, या भारत के ऊपर से, अन्यत्र उड़ान पर हो, किया गया हो, तो वह अधिकारी उस मामले की शपथ पर जांच कर सकेगा ।

                (5) इस धारा में-

(क) अभिसाक्ष्य" शब्द के अन्तर्गत कोई शपथपत्र, प्रतिज्ञान अथवा शपथ पर किया गया कथन आता है ; और

(ख) शपथ" शब्द के अन्तर्गत शपथ के स्थान पर प्रतिज्ञान अथवा घोषणा करने के लिए विधि द्वारा अनुज्ञात व्यक्तियों की दशा में प्रतिज्ञान अथवा घोषणा भी आती है,

और इस धारा की कोई भी बात ऐसे किसी अभिसाक्ष्य की, जो इस धारा के अतिरिक्त भी साक्ष्य में ग्राह्य है, साक्ष्य के रूप में स्वीकृति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी ।

8. दस्तावेजी साक्ष्य के बारे में उपबंध-(1) इस अधिनियम के अधीन किसी भी विधिक कार्यवाही में, केन्द्रीय सरकार के सिविल विमानन से सम्बद्ध मंत्रालय द्वारा प्रकाशित कोई दस्तावेज, जिसका एरोनाटिकल इन्फार्मेशन पब्लिकेशन" के नाम से ज्ञात प्रकाशन अथवा नोटम" तथा एरोनाटिकल इन्फार्मेशन सर्कुलर" के नाम से ज्ञात श्रृंखला का कोई प्रकाशन होना तात्पर्यित हो, उस दस्तावेज में वर्णित मामलों का साक्ष्य होगा ।

                (2) किसी वायुयान से पारेषित या उससे प्राप्त कोई भी संदेश या संकेत, जिसका सम्बन्ध वायुयान की स्थिति से है, कतिपय अभिलेखों के साक्ष्य में रूप में माना जाएगा और सभी विधिक कार्यवाहियों को लागू होगा ।

अध्याय 4

प्रकीर्ण

9. कुछ वायुयानों को इस अधिनियम के उपबन्ध उपान्तरों सहित लागू करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकती है कि इस अधिनियम के सभी या कोई उपबन्ध धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (ङ) के    उपखण्ड (ख) में निर्दिष्ट वायुयान को, ऐसे उपान्तरों सहित लागू होंगे जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

10. कन्वेंशन के संविदाकारी पक्षकार-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह प्रमाणित कर सकेगी कि टोकियो कन्वेंशन के संविदाकारी पक्षकार कौन-कौन हैं और उन्होंने कन्वेंशन के उपबन्धों का किस विस्तार तक उपयोग किया है और केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी कोई भी अधिसूचना उसमें प्रमाणित विषयों के बारे में निश्चायक साक्ष्य होगी ।

11. कुछ वायुयानों को कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत समझने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी वायुयान के सम्बन्ध में टोकियो कन्वेंशन के अनुच्छेद 18 की अपेक्षाओं की पूर्ति हो गई है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकती है कि इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसा वायुयान उस कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत समझा जाएगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।

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