कराधान विधियां (वसूली की कार्यवाहियों का चालू रखा जाना और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1964
(1964 का अधिनियम संख्यांक 11)
[12 मई, 1964]
सरकारी शोध्यों के संबंध में कार्यवाहियों के चालू रखे जाने
और विधिमान्यकरण के लिए तथा तत्संसक्त बातों
के लिए उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पन्द्रहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-(1) यह अधिनियम कराधान विधियां (वसूली की कार्यवाहियों का चालू रखा जाना और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1964 कहा जा सकेगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “निर्धारिती" से -
(i) अतिलाभ-कर अधिनियम, 1940 (1940 का 15) या कारबार-लाभ-कर अधिनियम, 1947 (1947 का 21) के संबंध में वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके द्वारा वह कर या कोई अन्य राशि उस अधिनियम के अधीन संदेय हो ;
(ii) सम्पदा-शुल्क अधिनियम, 1953 (1953 का 34) के संबंध में वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो देनदार हो या उस अधिनियम में यथापरिभाषित देनदार व्यक्ति हो ;
(iii) किसी अन्य अनुसूचित अधिनियम के संबंध में, वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो उस अधिनियम में यथापरिभाषित निर्धारिती हो ;
(ख) “सरकारी शोध्य" से जब वह किसी अनुसूचित अधिनियम के संबंध में हो ऐसा कोई भी कर, शुल्क, शास्ति, जुर्माना, ब्याज, वार्षिकी-निक्षेप या कोई भी अन्य राशि अभिप्रेत है जो निर्धारिती द्वारा सरकार को उस अधिनियम के अधीन संदेय हो ;
(ग) “अनुसूचित अधिनियम" से अभिप्रेत है अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई भी अधिनियम ;
(घ) “कराधायक प्राधिकारी" से किसी अनुसूचित अधिनियम के संबंध में वह आफिसर (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) अभिप्रेत है जो उस अधिनियम के अधीन किन्हीं सरकारी शोध्यों के बारे में मांग की सूचना की निर्धारिती पर तामील कराने के लिए सशक्त हो ;
(ङ) “कर-वसूली आफिसर" से जब वह किसी अनुसूचित अधिनियम के संबंध में उस अधिनियम में यथापरिभाषित कर-वसूली आफिसर अभिप्रेत है और जहां कि ऐसी परिभाषा न हो वहां उससे ऐसा आफिसर (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) अभिप्रेत है जिसे सरकारी शोध्यों के बकाया की वसूली के लिए प्रमाणपत्र उस अधिनियम के अधीन भेजा जा सके ।
3. कुछ कार्यवाहियों का चालू रखा जाना और विधिमान्यकरण-(1) जहां कि किन्हीं सरकारी शोध्यों के बारे में मांग की किसी सूचना की तामील कराधायक प्राधिकारी द्वारा किसी निर्धारिती पर किसी अनुसूचित अधिनियम के अधीन कराई जाए और ऐसे सरकारी शोध्यों के बारे में कोई अपील प्रस्तुत की जाए या अन्य कार्यवाही की जाए, वहां -
(क) जब कि ऐसी अपील या कार्यवाही में ऐसे सरकारी शोध्य वर्धित कर दिए जाएं, तब कराधायक प्राधिकारी निर्धारिती पर केवल उतनी रकम के बारे में मांग की दूसरी सूचना की तामील कराएगा जितनी से ऐसे सरकारी शोध्य वर्धित किए गए हों, और उन सरकारी शोध्यों के संबंध में, जो मांग की उस सूचना या उन सूचनाओं में समाविष्ट हों जिसकी या जिनकी निर्धारिती पर तामील उस अपील या कार्यवाही के निबटाए जाने के पूर्व कराई गई हो, कोई भी कार्यवाहियां मांग की नई सूचना की तामील कराए बिना, उस प्रक्रम से चालू रखी जा सकेंगी जिस पर वे उक्त निबटाए जाने के ठीक पूर्व थी ;
(ख) जब कि ऐसे सरकारी शोध्य ऐसी अपील या अन्य कार्यवाही में कम कर दिए जाएं तब-
(i) कराधायक प्राधिकारी के लिए यह आवश्यक न होगा कि वह निर्धारिती पर मांग की नई सूचना की तामील कराए ;
(ii) कराधायक प्राधिकारी निर्धारिती को और जहां कि ऐसी रकम की वसूली के लिए प्रमाणपत्र कर-वसूली आफिसर को भेजा जा चुका हो, वहां उस आफिसर को भी ऐसी कमी किए जाने के तथ्य की प्रज्ञापना देगा ;
(iii) जो कार्यवाहियां मांग की उस सूचना या उन सूचनाओं के आधार पर प्रारम्भ की गई हों, जिसकी या जिनकी निर्धारिती पर तामील ऐसी अपील या कार्यवाही के निबटाए जाने के पूर्व कराई गई हो, वे इस प्रकार कम की गई रकम के संबंध में उस प्रक्रम से चालू रखी जा सकेंगी जिस पर वे उक्त निबटाए जाने के ठीक पूर्व थी ;
(ग) ऐसे सरकारी शोध्यों के संबंध में कोई कार्यवाहियां (जिनके अन्तर्गत किसी शास्ति का अधिरोपण या किसी ब्याज का प्रभारण भी आता है) केवल इस कारण से अविधिमान्य न हो जाएंगी कि ऐसी अपील या कार्यवाही के निबटाए जाने के पश्चात् निर्धारिती पर मांग की नई सूचना की तामील नहीं कराई गई थी या कि ऐसे सरकारी शोध्य ऐसी अपील या कार्यवाही में वर्धित या कम कर दिए गए हैं :
परन्तु यदि ऐसे सरकारी शोध्य (वार्षिकी-निक्षेप से भिन्न) किसी अन्तिम आदेश के परिणामस्वरूप कम हो गए हों और उनके संदाय व्यतिक्रम के कारण निर्धारिती पर अधिरोपित कोई शास्ति इस प्रकार कम हुई रकम से अधिक हो, तो वह आधिक्य वसूल नहीं किया जाएगा और यदि वह पहले ही वसूल कर लिया गया हो तो वह निर्धारिती को उसके ऐसे आवेदन पर वापस कर दिया जाएगा जो उसने कराधायक प्राधिकारी से ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से किया हो जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाए :
परन्तु यह और भी कि यदि वार्षिकी-निक्षेप करने में असफलता के कारण निर्धारिती पर अधिरोपित शास्ति की रकम ऐसे आदेश के परिणामस्वरूप किए जाने के लिए अपेक्षित वार्षिकी-निक्षेप की रकम की आधी से अधिक हो तो ऐसा आधिक्य वसूल नहीं किया जाएगा और यदि वह पहले ही वसूल कर लिया गया हो तो निर्धारिती को उसके ऐसे आवेदन पर वापस कर दिया जाएगा जो उसने कराधायक प्राधिकारी से ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से किया हो जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाए :
परन्तु यह और भी कि जहां कि कोई सरकारी शोध्य ऐसी अपील या कार्यवाही में कम कर दिए जाएं और निर्धारिती उनकी किसी वापसी का हकदार हो, वहां ऐसी वापसी उस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार की जाएगी ।
(2) शंकाओं के निराकरणार्थ एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि जब कि सरकारी शोध्यों की रकम में किसी अनुसूचित अधिनियम के अधीन किसी अपील या अन्य कार्यवाही में पारित किसी आदेश के परिणामस्वरूप फेरफार नहीं किया जाता तब किसी भी दशा में मांग की कोई नई सूचना आवश्यक न होगी ।
(3) इस धारा के उपबंध किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी प्रभावशील होंगे ।
4. अनुसूची के संशोधन की शक्ति-केन्द्रीय सरकार किसी कर या शुल्क के अधिरोपण या उद्ग्रहण के लिए उपबन्ध करने वाले किसी भी केन्द्रीय अधिनियम का नाम, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अनुसूची में बढ़ा सकेगी और ऐसी किसी अधिसूचना के निकाले जाने पर, इस प्रकार बढ़ाया गया अधिनियम धारा 2 के खण्ड (ग) के अर्थ में अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियम समझा जाएगा ।
5. अधिनियम का भूतलक्षी प्रभाव होगा-इस अधिनियम के उपबंध मांग की ऐसी हर एक सूचना के संबंध में लागू होंगे और सदा लागू रहे समझे जाएंगे जिसकी तामील कराधायक प्राधिकारी द्वारा निर्धारिती पर किसी अधिसूचित अधिनियम के अधीन कराई गई हो, चाहे ऐसी सूचना की तामील इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् की गई हो ।
6. कठिनाइयों का निराकरण करने की शक्ति- यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशील करने में कोई कठिनाई उत्पन्न हो तो केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों से अनसंगत ऐसे उपबंध बना सकेगी जो इस कठिनाई के निराकरण के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।
7. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के कार्यान्वयन के लिए नियम [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,ट बना सकेगी ।
[(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
अनुसूची
[धारा 2(ग) देखिए]
1. इण्डियन इनकम टैक्स ऐक्ट, 1922 (1922 का 11) ।
2. अतिलाभ-कर अधिनियम, 1940 (1940 का 15) ।
3. कारबार-लाभ-कर अधिनियम, 1947 (1947 का 21) ।
4. सम्पदा-शुल्क अधिनियम, 1953 (1953 का 34) ।
5. धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27) ।
6. व्यय-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 29) ।
7. दान-कर अधिनियम, 1958 (1958 का 18) ।
8. आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) ।
9. अधिलाभ-कर अधिनियम, 1963 (1963 का 14) ।
[10. कम्पनी (लाभ) अतिकर अधिनियम, 1964 (1964 का 7)] ।
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