राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2006
(2006 का अधिनियम संख्यांक 28)
[13 जुलाई, 2006]
फैशन प्रौद्योगिकी में शिक्षा और अनुसंधान के संवर्धन और विकास
के लिए राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना
और निगमन के लिए तथा उससे संबंधित
और उसके आनुषंगिक
विषयों के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सतावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2006 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) नियत दिन" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना की तारीख अभिप्रेत है
(ख) बोर्ड" से धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन गठित संस्थान का शासक बोर्ड अभिप्रेत है;
(ग) अध्यक्ष" से धारा 3 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन नामनिर्देशित, संस्थान का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(घ) महानिदेशक" से धारा 15 के अधीन नियुक्त, संस्थान का महानिदेशक अभिप्रेत है;
(ङ) फैशन" के अंतर्गत, प्रचलित प्रवृत्ति या जीवन शैली, विशेषतः पोशाक और आभूषण की शैलियां या व्यवहार के शिष्टाचार या लोकप्रिय शैलियों का सृजन, संवर्धन या अध्ययन का कारबार या माल, वस्त्रों, उपसाधनों, शिल्प और प्रसाधन सामग्रियों जैसी नई शैलियों का डिजाइन करना, उत्पादन और विपणन करना भी है ; और फैशन प्रौद्योगिकी" शब्दों का अर्थ उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों के अनुसार लगाया जाएगा ;
(च) निधि" से धारा 19 के अधीन रखी जाने वाली संस्थान निधि अभिप्रेत है;
(छ) संस्थान" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान अभिप्रेत है;
(ज) संस्थान कैम्पस" से नई दिल्ली, गांधी नगर, चेन्नई, मुम्बई, हैदराबाद, बंगलौर, कोलकाता या भारत में किसी अन्य स्थान पर या विदेश में अवस्थित ऐसा कोई संस्थान कैम्पस, जो शासक बोर्ड द्वारा विनिश्चित किया जाए, अभिप्रेत है;
(झ) सिनेट" से धारा 12 में निर्दिष्ट संस्थान की सिनेट अभिप्रेत है;
(ञ) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान, नई दिल्ली अभिप्रेत है;
(ट) परिनियम" और अध्यादेश" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए संस्थान के क्रमशः परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।
अध्याय 2
संस्थान
3. संस्थान की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान के पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय स्थापित किया जाएगा ।
(2) संस्थान का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) संस्थान का शासक बोर्ड निम्न से मिलकर बनेगा, जिसमें निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -
(क) एक अध्यक्ष, जो विख्यात शिक्षाविद्, वैज्ञानिक या प्रौद्योगिकीविद् या वृत्तिक होगा, जिसे कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा;
(ख) तीन संसद् सदस्य, जिनमें से दो लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा लोक सभा से और एक राज्य सभा के सभापति द्वारा राज्य सभा से नामनिर्देशित किया जाएगा;
(ग) संस्थान का महानिदेशक, पदेन;
(घ) भारत सरकार के राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान से संबंधित मंत्रालय या विभाग का वित्तीय सलाहकार, पदेन;
(ङ) भारत सरकार के राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान से संबंधित मंत्रालय या विभाग का संयुक्त सचिव, पदेन;
(च) भारत सरकार के उच्चतर शिक्षा से संबंधित मंत्रालय या विभाग का प्रतिनिधि, जो उस मंत्रालय या विभाग के सचिव द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा, पदेन;
(छ) उन राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले जिनमें संस्थान का कैम्पस अवस्थित है, उन व्यक्तियों में से, जो शिक्षाविद् हैं या फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लगे हुए प्रतिष्ठित उद्योगपति हैं, केन्द्रीय सरकार द्वारा पांच व्यक्ति नामनिर्देशित किए जाएंगे; और
(ज) फैशन प्रौद्योगिकी में दो विख्यात विशेषज्ञ, जिनमें से एक शिक्षाविद्, केंद्रीय सरकार की सिफारिशों पर कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा ।
(4) अध्यक्ष और पदेन सदस्यों से भिन्न, बोर्ड के अन्य सदस्यों की पदावधि तीन वर्ष होगी और वे ऐसे भत्तों के हकदार होंगे, जो केंद्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(5) आकस्मिक रिक्ति भरने के लिए बोर्ड के नामनिर्देशित सदस्यों की पदावधि उस सदस्य की शेष पदावधि तक बनी रहेगी जिसके स्थान पर वह नामनिर्देशित किया गया है ।
(6) बोर्ड का अधिवेशन वर्ष में कम से कम चार बार ऐसे स्थान और समय पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार की बाबत प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा, जो बोर्ड द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(7) यह घोषित किया जाता है कि शासक बोर्ड के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने या उसका सदस्य होने के लिए निरर्हित नहीं करेगा ।
4. संपत्तियों का निहित होना-(1) नियत दिन से ही, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी संपत्तियां जो इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व सोसाइटी में निहित थीं, ऐसे प्रारंभ से ही संस्थान में निहित हो जाएंगी ।
5. संस्थान के निगमन का प्रभाव-नियत दिन से ही, -
(क) किसी संविदा या अन्य लिखत में सोसाइटी के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह संस्थान के प्रति निर्देश है;
(ख) सोसाइटी के सभी अधिकार और दायित्व संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे; और
(ग) नियत दिन से ठीक पहले सोसाइटी द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा, संस्थान में उसी सेवाधृति के अनुसार, उसी पारिश्रमिक, उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसे कि वह उस दशा में धारण करता जिसमें यह अधिनियम पारित नहीं किया जाता और तब तक इसी प्रकार धारण करेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी सेवाधृति, पारिश्रमिक, निबंधन और शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक्तः परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :
परंतु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन संस्थान द्वारा कर्मचारी से की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार समाप्त किया जा सकता है या, यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया गया है तो स्थायी कर्मचारी की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारी की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर संस्थान द्वारा समाप्त किया जा सकेगा ।
6. संस्थान के कृत्य-संस्थान के निम्नलिखित कृत्य होंगे, -
(i) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शिक्षा और अनुसंधान में क्वालिटी और विशिष्टता को विकसित करना और उनका संवर्धन करना;
(ii) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रियों, डाक्टरेट और पोस्ट डाक्टरेट पाठ्यक्रमों और अनुसंधान के लिए पाठ्यक्रम अधिकथित करना;
(iii) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां प्रदान करना;
(iv) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मानद डिग्रियां, पुरस्कार या अन्य विशिष्टियां प्रदान करना;
(v) विश्व के किसी भाग में ऐसी शैक्षिक या अन्य संस्थाओं के साथ, जिनके उद्देश्य पूर्णतः या भागतः संस्थान के उद्देश्यों के समरूप हैं, संकाय के सदस्यों और विद्वानों का आदान-प्रदान करके और साधारणतया ऐसी रीति से, जो उनके समान उद्देश्य के लिए सहायक हों, सहयोग करना;
(vi) अध्यापकों, फैशन प्रौद्योगिकीविदों और अन्य वृत्तिकों के लिए पाठ्यक्रम संचालित करना;
(vii) फैशन प्रौद्योगिकी और उसके उपयोजन के क्षेत्र में, विशिष्टतः स्थानीय रूप से उत्पादित सामग्री, थोक उत्पादन की अपेक्षाओं, उन्नत क्वालिटी और डिजाइन तथा अंतरराष्ट्रीय विपणन के एकीकरण से संबंधित, अनुसंधान और अध्ययन करना;
(viii) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उपलब्ध साहित्य और सामग्री का संग्रह करना और उसे बनाए रखना जिससे देश के भीतर आधुनिक सूचना केन्द्र विकसित किया जा सके;
(ix) अनुसंधानकर्ताओं के उपयोग के लिए फैशन प्रौद्योगिकी संसाधन और विश्लेषण के केन्द्रीय संकाय का सृजन करना;
(x) फैशन प्रौद्योगिकी क्षेत्र में प्रयोग करने और नव परिवर्तन लाने के लिए तथा व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने के लिए एक केन्द्र रखना;
(xi) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, शैक्षिक, वृत्तिक और औद्योगिक वचनबद्धताओं पर केन्द्रीभूत करते हुए, सूचना के सृजन और पारेषण के लिए एक अंतरराष्ट्रीय केन्द्र का विकास करना;
(xii) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान करने और प्रशिक्षण को कार्यान्वित करने में बहुविषयी अभिगम का विकास करना जिससे कि वृत्ति, अकादमी और फैशन उद्योग के व्यापक हित को बेहतर ढंग से लाभ पहुंचाया जा सके;
(xiii) फैशन प्रौद्योगिकी के चुने हुए क्षेत्रों में समय-समय पर राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियां, सेमीनार, सम्मलेन और प्रदर्शनी आयोजित करना;
(xiv) विकासशील देशों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने वाले पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करना;
(xv) संस्थान तथा उद्योग के बीच फैशन प्रौद्योगिकी और अन्य तकनीकी कर्मचारिवृंद के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करके और संस्थान द्वारा प्रायोजित और निधिक अनुसंधान और परामर्शी परियोजनाओं को हाथ में लेकर अकादमी और उद्योग के पारस्परिक प्रभाव के लिए केन्द्र के रूप में कार्य करना;
(xvi) फैशन उत्पादों के कारीगरों, शिल्िपयों, विनिर्माताओं, डिजाइनरों और निर्यातकों को तकनीकी सहायता प्रदान करना; और
(xvii) फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कोई अन्य क्रियाकलाप चलाना, जो ऊपर विनिर्दिष्ट रूप से सूचीबद्ध नहीं हैं ।
7. बोर्ड की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के संपूर्ण नियंत्रण के अधीन, संस्थान के कार्यकलाप के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और संस्थान की उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा जिनका इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है और उसे सिनेट के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड, -
(क) संस्थान के प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति विषयक प्रश्नों का विनिश्चय करेगा;
(ख) भारत में किसी अवस्थान पर या विदेश में संस्थान के नए कैम्पस स्थापित करने के बारे में विनिश्चय करेगा;
(ग) फीसों और अन्य प्रभारों को नियत करेगा, उनकी मांग करेगा और उन्हें प्राप्त करेगा;
(घ) छात्रों के निवास के लिए हॉलों और छात्रावासों की स्थापना करेगा, उनका अनुरक्षण और प्रबंध करेगा;
(ङ) संस्थान के छात्रों के निवास का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करेगा तथा उनके अनुशासन का विनियमन करेगा तथा उनके स्वास्थ्य, सामान्य कल्याण और सांस्कृतिक तथा सामूहिक जीवन के संवर्धन की व्यवस्था करेगा;
(च) अध्यापन और अन्य पदों की स्थापना करेगा तथा उन पर (महानिदेशक के पद को छोड़कर) नियुक्तियां करेगा;
(छ) परिनियम और अध्यादेश बनाएगा और उनमें परिवर्तन, उपांतरण करेगा या उन्हें विखंडित करेगा;
(ज) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, पुरस्कार और पदक संस्थित और प्रदान करेगा;
(झ) संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट, वार्षिक लेखाओं और आगामी वित्तीय वर्ष के बजट प्राक्कलनों पर उनकी विकास योजनाओं के विवरण सहित, विचार करेगा और ऐसे संकल्प पारित करेगा, जो वह ठीक समझे;
(ञ) सरकार के दान, अनुदान, संदान या उपकृतियां प्राप्त करना और, यथास्थिति, वसीयतकर्ताओं, दाताओं और अंतरकों से जंगम या स्थावर संपत्तियों को वसीयत में, दान के रूप में या अंतरण के रूप में प्राप्त करेगा; और
(ट) ऐसी सभी बातें करेगा जो पूर्वोक्त सभी या किन्हीं कृत्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
(3) बोर्ड को उतनी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी जितनी वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।
(4) धारा 3 की उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना किसी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति से व्ययन नहीं करेगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार, संस्थान के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उसके कामकाज की जांच करने के लिए तथा उस पर रिपोर्ट देने के लिए ऐसी रीति में, जो केन्द्रीय सरकार निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी ।
(6) केन्द्रीय सरकार, ऐसी कोई रिपोर्ट प्राप्त होने पर, ऐसी कार्रवाई कर सकेगी और ऐसे निदेश जारी कर सकेगी जिसे वह, रिपोर्ट में वर्णित किसी विषय के बारे में आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(7) कुलाध्यक्ष को, बोर्ड के अध्यक्ष या उसके द्वारा नामनिर्दिष्ट अन्य सदस्यों को केन्द्रीय सरकार की सिफारिशों के आधार पर हटाने की शक्ति होगी ।
(8) केन्द्रीय सरकार को, यदि वह ऐसा करना समुचित समझे, अन्य सदस्यों को हटाने की शक्ति होगी ।
(9) किसी अध्यक्ष या सदस्य को उपधारा (7) या उपधारा (8) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे उस विषय में सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
8. संस्थान का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना-(1) संस्थान सभी स्त्रियों और पुरुषों के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग के हों और सदस्यों, छात्रों, शिक्षकों या कर्मकारों को प्रवेश देने या नियुक्त करने में या किसी भी अन्य बात के संबंध में धार्मिक विश्वास या मान्यता का कोई मानदंड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी ।
(2) संस्थान किसी संपत्ति की कोई वसीयत, संदान या अंतरण स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें, बोर्ड की राय में इस धारा के भाव और उद्देश्य के विरुद्ध कोई शर्तें या बाध्यताएं अंतर्ग्रस्त हैं ।
9. संस्थान में शिक्षण-संस्थान के कैम्पस में सभी शिक्षण कार्य संस्थान द्वारा या उसके नाम से इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार किया जाएगा ।
10. कुलाध्यक्ष-भारत का राष्ट्रपति संस्थान का कुलाध्यक्ष होगा ।
11. संस्थान के प्राधिकारी-संस्थान के प्राधिकारी निम्नलिखित होंगे, अर्थात्: -
(क) शासक बोर्ड;
(ख) सिनेट; और
(ग) ऐसे अन्य प्राधिकारी, जिन्हें परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकारी घोषित किया जाए ।
12. सिनेट-संस्थान की सिनेट में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -
(क) महानिदेशक, पदेन, जो सिनेट का अध्यक्ष होगा;
(ख) सभी संस्थान कैम्पस निदेशक और ज्येष्ठ आचार्य;
(ग) ऐसे तीन व्यक्ति, जो संस्थान के कर्मचारी न हों, और जिन्हें महानिदेशक के परामर्श से अध्यक्ष द्वारा विज्ञान, इंजीनियरी और मानविकों के क्षेत्रों में से प्रत्येक क्षेत्र के लिए ख्याति प्राप्त शिक्षाविदों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा और उनमें से एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होगा;
(घ) संस्थान का एक पूर्व छात्र जो अध्यक्ष द्वारा महानिदेशक के परामर्श से, चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा; और
(ङ) कर्मचारिवृंद के ऐसे अन्य सदस्य जो परिनियमों में अधिकथित किए जाएं ।
13. सिनेट के कृत्य-इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए संस्थान की सिनेट, संस्थान में शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के स्तरों का नियंत्रण और साधारण विनियमन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी तथा वह ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।
14. अध्यक्ष के कृत्य, शक्तियां और कर्तव्य-(1) अध्यक्ष सामान्यतः बोर्ड के अधिवेशनों की और संस्थान के दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।
(2) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
15. महानिदेशक-(1) संस्थान का महानिदेशक बोर्ड द्वारा केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से तीन वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त किया जाएगा ।
(2) महानिदेशक, संस्थान का प्रधान कार्यपालक अधिकारी होगा और वह संस्थान के उचित प्रशासन के लिए तथा उसमें अनुदेश देने और अनुशासन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा ।
(3) महानिदेशक बोर्ड को वार्षिक रिपोर्ट और लेखे प्रस्तुत करेगा ।
(4) महानिदेशक ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेश द्वारा उसे समनुदेशित किए जाएं ।
(5) केन्द्रीय सरकार को तीन वर्ष की अवधि से पूर्व, यदि वह ऐसा करना समुचित समझती है तो महानिदेशक को हटाने की शक्ति होगी ।
16. कुल-सचिव-(1) संस्थान के कुल-सचिव की नियुक्ति ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं और वह संस्थान के अभिलेखों, सामान्य मुद्रा, संस्थान की निधियों तथा संस्थान की ऐसी अन्य संपत्ति का, जो बोर्ड उसके भारसाधन में सौंपे, अभिरक्षक होगा ।
(2) कुल-सचिव, बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों के, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
(3) कुल-सचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए महानिदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।
(4) कुल-सचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों या महानिदेशक द्वारा उसे समनुदेशित किए जाएं ।
17. अन्य प्राधिकारियों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य-इसमें इससे पहले वर्णित प्राधिकारियों और अधिकारियों से भिन्न प्राधिकारियों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य परिनियमों द्वारा अवधारित किए जाएंगे ।
18. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-संस्थान को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए केंद्रीय सरकार संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोजन के पश्चात् संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि का और ऐसी रीति से जो वह उचित समझे, संदाय कर सकेगी ।
19. संस्थान की निधि-(1) संस्थान ऐसी निधि रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे: -
(क) केंद्रीय सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;
(ख) संस्थान द्वारा प्राप्त सभी फीस तथा अन्य प्रभार;
(ग) अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत या अंतरणों के रूप में संस्थान द्वारा प्राप्त सभी धन; और
(घ) किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से संस्थान द्वारा प्राप्त सभी धन ।
(2) निधि में जमा किए गए सभी धन ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे, जिसे संस्थान, केंद्रीय सरकार के अनुमोदन से विनिश्चित करे ।
(3) निधि का उपयोग संस्थान के व्ययों की, जिनके अंतर्गत इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में और कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए व्यय भी हैं, पूर्ति के लिए किया जाएगा ।
20. विन्यास निधि की स्थापना-केंद्रीय सरकार, धारा 19 में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को: -
(क) विन्यास निधि और विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए किसी अन्य निधि की स्थापना करने;
(ख) अपनी निधि में से कोई धन विन्यास निधि या किसी अन्य निधि में अंतरण करने; का निदेश दे सकेगी ।
21. लेखा और संपरीक्षा-(1) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलन-पत्र भी है, ऐसे प्ररूप में, जो विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से जारी करे ।
(2) संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक करेगा और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा उपगत कोई भी व्यय भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संस्थान द्वारा संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक तथा संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो साधारणतः नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियों, लेखाओं, संबद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागजपत्रों को पेश किए जाने की मांग करने तथा संस्थान के किसी कार्यालय का निरीक्षण करने का भी अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित संस्थान के लेखे उसकी संपरीक्षा रिपोर्ट सहित, प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
22. पेंशन और भविष्य निधि-(1) संस्थान अपने कर्मचारियों के, जिनके अंतर्गत महानिदेशक भी है, फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी पेंशन, बीमा और भविष्य निधियां स्थापित करेगा, जो वह आवश्यक समझे ।
(2) जहां, कोई ऐसी भविष्य निधि इस प्रकार स्थापित की गई है, वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हो ।
23. नियुक्तियां-संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां महानिदेशक की नियुक्ति को छोड़कर परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार निम्नलिखित द्वारा की जाएंगी, -
(क) यदि नियुक्ति सहायक आचार्य या उससे ऊपर के पद पर शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के बारे में की जाती है या यदि नियुक्ति किसी अशैक्षणिक कर्मचारिवृंद के बारे में किसी कॉडर में की जाती है जिसका अधिकतम वेतनमान सहायक आचार्य के वेतनमान के समान या उससे उच्चतर है, तो बोर्ड द्वारा; और
(ख) किसी अन्य मामले में, महानिदेशक द्वारा ।
24. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किए जा सकेंगे, अर्थात्: -
(क) शिक्षण विभागों का बनाया जाना;
(ख) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र-सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;
(ग) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद का वर्गीकरण, नियुक्ति की पद्धति और सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;
(घ) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े प्रवर्गों के व्यक्तियों के लिए पदों का आरक्षण, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित किया जाए;
(ङ) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद के फायदे के लिए पेंशन, बीमा, भविष्य निधियों की स्थापना;
(च) संस्थान के प्राधिकरणों का गठन, शक्तियां और कर्तव्य;
(छ) हॉलों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;
(ज) बोर्ड के सदस्यों की रिक्तियों को भरने की रीति;
(झ) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन;
(ञ) सिनेट के अधिवेशन, ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति और उनके कामकाज के संचालन में अनुपालन की जाने वाली प्रक्रिया;
(ट) कोई अन्य बात जो इस अधिनियम के अधीन परिनियमों द्वारा विहित की जानी है या की जा सकेगी ।
25. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) संस्थान का प्रथम परिनियम बोर्ड द्वारा कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से बनाया जाएगा और उसकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
(2) बोर्ड, समय-समय पर, नया या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या इस धारा में इसके पश्चात् उपबंधित रीति में परिनियम को संशोधित या निरसित कर सकेगा ।
(3) प्रत्येक नए परिनियम के लिए या परिनियमों में परिवर्धन या परिनियम के किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष का पूर्व अनुमोदन अपेक्षित होगा । कुलाध्यक्ष उसके लिए अनुमति दे सकेगा या अनुमति रोक सकेगा या उसे बोर्ड को विचार के लिए वापस भेज सकेगा ।
(4) नए परिनियम, विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष उसके लिए अनुमति नहीं दे देता है ।
26. अध्यादेश-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संस्थान के अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किए जा सकेंगे, अर्थात्: -
(क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;
(ख) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े प्रवर्गों के व्यक्तियों के लिए आरक्षण;
(ग) संस्थान की सभी डिग्रियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;
(घ) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों को डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों में और संस्थान की परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा और वे डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्रों लिए पात्र होंगे;
(ङ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र-सहायता वृत्तियां, पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने की शर्तें;
(च) परीक्षा निकाय, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग तथा उनके कर्तव्य;
(छ) परीक्षाओं का संचालन;
(ज) संस्थान के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना;
(झ) संस्थान में अध्ययन पाठ्यक्रमों के लिए और संस्थान में डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्रों की परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;
(ञ) संस्थान के छात्रों के निवास की शर्तें और हालों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण किया जाना; और
(ट) कोई अन्य बात जो इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन अध्यादेशों द्वारा उपबंधित की जानी है या की जा सकेगी ।
27. अध्यादेश किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे ।
(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश ऐसी तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निर्दिष्ट करे, किन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, बोर्ड को यथाशक्यशीघ्र, प्रस्तुत किया जाएगा और बोर्ड द्वारा अपने आगामी अधिवेशन में उस पर विचार किया जाएगा ।
(3) बोर्ड को ऐसे किसी अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसे संकल्प की तारीख से ऐसा अध्यादेश, यथास्थिति, तद्नुसार उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।
28. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) संस्थान और उसके किन्हीं कर्मचारियों के बीच किसी संविदा से उद्भूत होने वाला कोई विवाद, संबंधित कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान के अनुरोध पर ऐसे माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा जिसमें संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य और कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।
(2) माध्यस्थम् अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और उस पर किसी न्यायालय में आक्षेप नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देश किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।
(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(5) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।
अध्याय 3
प्रकीर्ण
29. रिक्तियों, आदि के कारण कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-इस अधिनियम अथवा परिनियमों के अधीन गठित संस्थान या बोर्ड या सिनेट या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य निम्नलिखित कारणों से अविधिमान्य नहीं होगा, -
(क) उसमें कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
(ग) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता, जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।
30. प्रायोजित स्कीमें-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, जब कभी संस्थान, किसी सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य अभिकरण से, जिसमें कोई अनुसंधान स्कीम या कोई परामर्शी कर्तव्यभार या कोई शिक्षण कार्यक्रम या पीठ, आचार्य पद या कोई छात्रवृत्ति, आदि को प्रायोजित करने वाला उद्योग भी सम्मिलित है, संस्थान में निष्पादित या प्रदत्त होने वाली, निधियां प्राप्त करता है, तो: -
(क) प्राप्त रकम संस्थान द्वारा संस्थान की निधि से पृथक् रूप में रखी जाएगी और उसका केवल स्कीम के प्रयोजन के लिए उपयोग किया जाएगा; और
(ख) उसे निष्पादित करने के लिए अपेक्षित कर्मचारिवृंद की, प्रायोजक संगठनों द्वारा नियत निबंधनों और शर्तों के अनुसार भर्ती की जाएगी:
परंतु उपयोग में न लिया गया शेष धन, इस अधिनियम की धारा 20 के अधीन सृजित विन्यास निधि को अंतरित कर दिया जाएगा ।
31. संस्थान को डिग्री आदि देने की शक्ति-इस अधिनियम के अधीन संस्थान को डिग्रियां, डिप्लोमा, प्रमाणपत्र और अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां देने की शक्ति होगी, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित या निगमित किसी विश्वविद्यालय या संस्थान द्वारा प्रदत्त ऐसी तत्समान डिग्रियों, डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों और अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियों के समतुल्य होंगी ।
32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसा उपबंध कर सकेगी या निदेश दे सकेगी, जो इस अधिनियम के प्रयोजनों से असंगत न हो, और उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो:
परंतु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
33. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले सोसाइटी के शासक बोर्ड के रूप में कार्य करने वाला शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक कार्य करता रहेगा जब तक इस अधिनियम के अधीन संस्थान के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी नए बोर्ड के गठन पर बोर्ड के ऐसे सदस्य, जो ऐसे गठन के पहले पद धारण कर रहे हों, पद धारण नहीं करेंगे; और
(ख) जब तक कि इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं, तब तक इस अधिनियम के प्रारंभ होने से ठीक पूर्व प्रवृत्त सोसाइटी के नियम और विनियम, अनुदेश और मार्गदर्शक सिद्धांत, उस संस्थान को वहां तक लागू होते रहेंगे, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं ।
34. परिनियमों और अध्यादेशों का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम या अध्यादेश, राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम या अध्यादेश, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम या अध्यादेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह परिनियम या अध्यादेश नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु उस परिनियम या अध्यादेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस परिनियम या अध्यादेश के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(3) परिनियम या अध्यादेश बनाने की शक्ति के अंतर्गत उक्त परिनियमों या अध्यादेशों या उनमें से किसी को उस तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्व की नहीं होगी, भूतलक्षी रूप से प्रभावी करने की शक्ति भी होगी किंतु किसी ऐसे परिनियम या अध्यादेश को भूतलक्षी रूप से प्रभावी नहीं किया जाएगा जिससे ऐसे किसी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो जिसे ऐसा परिनियम या अध्यादेश लागू हो ।
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