नेशनल कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980
(1980 का अधिनियम संख्यांक 42)
[19 जुलाई, 1980]
देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के लिए आवश्यक पटसन की महत्वपूर्ण
वस्तुओं का निरन्तर विनिर्माण, उत्पादन और वितरण सुनिश्चित
करके जनसाधारण के हित साधन के लिए मैसर्स नेशनल
कम्पनी लिमिटेड के उपक्रमों का उचित प्रबन्ध
सुनिश्चित करने की दृष्टि से उसके उपक्रमों
के अर्जन और अन्तरण का और उनसे
संबंधित तथा उनके आनुषंगिक
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
मैसर्स नेशनल कम्पनी लिमिटेड, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की प्रथम अनुसूची में उल्लिखित वस्तुओं के, अर्थात्, पूर्णतः या भागतः पटसन के बने टेक्सटाइल के, विनिर्माण और उत्पादन में लगी हुई थी;
और केन्द्रीय सरकार ने मैसर्स नेशनल कम्पनी लिमिटेड के उपक्रमों का प्रबंध, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18कक के अधीन ग्रहण कर लिया था;
और मैसर्स नेशनल कम्पनी लिमिटेड के उपक्रमों का अर्जन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि कम्पनी के उपक्रम, देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण पूर्वोक्त वस्तुओं का निरन्तर विनिर्माण, उत्पादन और वितरण करके, जनसाधारण का हित साधन करते रहें;
भारत गणराvय के इकतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम नेशनल कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 है ।
(2) इस अधिनियम की धारा 29 और धारा 30 के उपबंध तुरन्त प्रभावी होंगे और शेष उपबंध 27 अप्रैल, 1980 को प्रवृत्त हुए समझे जाएंगे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से 27 अप्रैल, 1980 अभिप्रेत है;
(ख) आयुक्त" से धारा 15 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है;
(ग) कम्पनी" से मैसर्स नेशनल कम्पनी लिमिटेड अभिप्रेत है, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ में एक कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय पश्चिमी बंगाल राvय में 18ए, ब्राबोर्न रोड, कलकत्ता-700001, में है;
(घ) विद्यमान सरकारी कम्पनी" से ऐसी कोई कम्पनी अभिप्रेत है जो नियत दिन को कारबार चला रही है;
(ङ) नई सरकारी कम्पनी" से ऐसी कोई सरकारी कम्पनी अभिप्रेत है जो नियत दिन को या उसके पश्चात् बनी और रजिस्ट्रीकृत हुई है;
(च) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ज) इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के सम्बन्ध में, विनिर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार, उस उपबंध के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी;
(झ) उन शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वहीं अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
कम्पनी के उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण
3. कम्पनी के उपक्रमों का केन्द्रीय सरकार को अन्तरण और उनका उसमें निहित होना-नियत दिन को कम्पनी के उपक्रम और ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में कम्पनी के अधिकार, हक और हित इस अधिनियम के आधार पर केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) कम्पनी के उपक्रमों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार और सभी जंगम तथा स्थावर सम्पत्ति, जिसके अन्तर्गत भूमि, भवन, कर्मशालाएं, स्टोर, उपकरण, मशीनरी और उपस्कर, रोकड़ बाकी, हाथ नकदी, आरक्षित निधि, विनिधान तथा बही-ऋण और ऐसी सम्पत्ति में या उससे उत्पन्न होने वाले सभी अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व कम्पनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, भारत में या भारत के बाहर, थे और तत्सम्बन्धी सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य सभी प्रकार की दस्तावेजें भी हैं ।
(2) यथापूर्वोक्त सभी सम्पत्तियां, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई हैं, ऐसे निहित होने के बल पर किसी न्यास, बाध्यता, बन्धक, भार, धारणाधिकार और उन्हें प्रभावित करने वाले सभी अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगी और किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी की ऐसी कोई कुर्की, व्यादेश, डिक्री या आदेश को, जो ऐसी सम्पत्ति के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करे या ऐसी सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग के संबंध में किसी रिसीवर की नियुक्ति करे, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित किसी सम्पत्ति का, प्रत्येक बन्धकदार और किसी ऐसी सम्पत्ति में या उसके सम्बन्ध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे समय के अन्दर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे बन्धक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित की सूचना आयुक्त को देगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति का बन्धकदार या ऐसी किसी सम्पत्ति में या उसके सम्बन्ध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति, धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकमों में से और धारा 9 के अधीन अवधारित रकमों में से भी, बन्धक धन या अन्य शोध्य रकमों के पूर्णतः या भागतः संदाय के लिए अपने अधिकारों और हितों के अनुसार दावा करने का हकदार होगा किन्तु ऐसा कोई बन्धक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी सम्पत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है ।
(5) ऐसे किसी उपक्रम के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, नियत दिन से पूर्व किसी समय अनुदत्त कोई अनुvञप्ति या अन्य लिखत जो नियत दिन से पूर्व प्रवृत्त है, ऐसे उपक्रम के सम्बन्ध में और उसके प्रयोजनों के लिए अपनी परिपक्वता कालावधि के अनुसार ऐसे दिन को और उसके पश्चात् प्रवृत्त बनी रहेगी और ऐसे उपक्रम धारा 5 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी में या धारा 6 के अधीन किसी नई सरकारी कम्पनी में निहित होने की तारीख से ही, यथास्थिति, विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसी अनुvञप्ति या अन्य लिखत में उसी प्रकार प्रतिस्थापित हो गई है मानो ऐसी अनुvञप्ति या अन्य लिखत ऐसी विद्यमान या अन्य नई सरकारी कम्पनी को अनुदत्त की गई हो और ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी उसे उस शेष अवधि के लिए धारण करेगी जिसके लिए कम्पनी उसे उसके निबन्धनों के अनुसार धारण करती ।
(6) यदि नियत दिन को, किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, कम्पनी द्वारा संस्थित या उसके विरुद्ध किया गया कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो, लम्बित है तो कम्पनी के उपक्रमों के अन्तरण या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध, या जहां कम्पनी के उपक्रम धारा 5 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित किए जाने के लिए निर्देशित हैं या धारा 6 के उपबन्धों के आधार पर किसी नई सरकारी कम्पनी को अन्तरित हो गए हैं, वहां वह ऐसी सरकारी कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी या प्रवर्तित की जा सकेगी ।
5. कम्पनी के उपक्रमों को किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित करने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी और धारा 6 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि कोई विद्यमान सरकारी कम्पनी ऐसे निबन्धनों और शर्तों का, जिन्हें अधिरोपित करना वह सरकार ठीक समझे, अनुपालन करने के लिए रजामन्द है या उसने उनका अनुपालन कर लिया है तो वह अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि कम्पनी के वे उपक्रम और उन उपक्रमों के जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, सम्बन्ध में कम्पनी के अधिकार, हक और हित केन्द्रीय सरकार में निहित रहने के बजाय या तो अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख को या उसके पहले या बाद की किसी ऐसी तारीख को (जो नियत दिन के पूर्व की तारीख न हो), जो ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उस विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां अपने उपक्रमों के संबंध में कम्पनी के अधिकार, हक और हित, उपधारा (1) के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित हो जाते हैं, वहां वह सरकारी कम्पनी ऐसे उपक्रमों के संबंध में ऐसे निहित होने की तारीख से ही और धारा 6 के उपबन्धों के आधार पर उपक्रमों के किसी नई सरकारी कम्पनी को अन्तरित होने तक, ऐसे उपक्रमों के संबंध में उनकी स्वामी समझी जाएगी, और ऐसे उपक्रमों के संबंध में केन्द्रीय सरकार के अधिकार और दायित्व ऐसे निहित होने की तारीख से ही, और ऐसे अन्तरण के होने तक, उस विद्यमान सरकारी कम्पनी के क्रमशः अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
6. कम्पनी के उपक्रमों का किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी से किसी नई सरकारी कम्पनी को अन्तरण-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, जहां धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन यह निदेश किया गया है कि कम्पनी के उपक्रम किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित होंगे वहां केन्द्रीय सरकार, यदि उसका समाधान हो जाता है कि कोई नई सरकारी कम्पनी ऐसे निबन्धनों और शर्तों का, जिन्हें अधिरोपित करना केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, अनुपालन करने के लिए रजामन्द है या उसने उनका अनुपालन कर लिया है, अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकेगी कि कम्पनी के उपक्रम उस नई सरकारी कम्पनी को अन्तरित हो जाएंगे और ऐसी अधिसूचना जारी कर दी जाने पर, कम्पनी के ऐसे उपक्रमों के संबंध में कम्पनी के अधिकार, हित और हक, जिनके लिए धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन यह निदेश किया गया है कि वे किसी विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित होंगे, उस विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित रहने के बजाय अधिसूचना जारी की जाने की तारीख से उस नई सरकारी कम्पनी में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में विद्यमान सरकारी कम्पनी के अधिकार, हक और हित, उपधारा (1) के अधीन किसी नई सरकारी कम्पनी में निहित हो जाते हैं, वहां वह नई सरकारी कम्पनी ऐसे निहित होने की तारीख से ही, ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में स्वामी समझी जाएगी और ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में विद्यमान सरकारी कम्पनी के अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, उस नई सरकारी कम्पनी के क्रमशः अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
7. कुछ पूर्व दायित्वों के लिए कम्पनी का दायी होना-(1) नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि के सम्बन्ध में कम्पनी का प्रत्येक दायित्व कम्पनी का दायित्व होगा तथा ऐसी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा न कि केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या, जहां कम्पनी के उपक्रम किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित होते हैं वहां, ऐसी सरकारी कम्पनी के विरुद्ध ।
(2) शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि :-
(क) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में कम्पनी का कोई दायित्व, केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कम्पनी के उपक्रम किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित होते हैं वहां ऐसी सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ;
(ख) कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण का कोई अधिनिर्णय, डिक्री या आदेश, जो नियत दिन के पूर्व उत्पन्न किसी मामले, दावे, या विवाद के बारे में, नियत दिन के पश्चात् पारित किया गया है, केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कम्पनी के उपक्रम किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो गए हैं वहां ऐसी सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ;
(ग) तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबन्ध के उल्लंघन के लिए नियत दिन के पूर्व कम्पनी द्वारा उपगत कोई दायित्व, केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कम्पनी के उपक्रम किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो गए हैं वहां ऐसी सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
अध्याय 3
रकमों का संदाय
8. रकम का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, कम्पनी के उपक्रमों और ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में उसके अधिकार, हक और हित के, धारा 3 के अधीन, केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित होने के लिए कम्पनी को दस करोड़ चार लाख रुपए की रकम नकद और अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट रीति से, देगी ।
(2) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में उसके दायित्वों का निर्वहन, उपधारा (1) के अधीन कम्पनी को शोध्य रकम में से, कम्पनी के लेनदारों के अधिकारों और हितों के अनुसार, किया जाएगा ।
9. अतिरिक्त रकम का संदाय-केन्द्रीय सरकार कम्पनी को, उसके स्वामित्वाधीन उपक्रमों के प्रबन्ध से उसे वंचित किए जाने के लिए, धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकम के अतिरिक्त, दस हजार रुपए प्रतिवर्ष की दर से संगणित रकम उस तारीख को प्रारम्भ होकर, जिसको कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम 1951 (1951 का 65) की धारा 18कक के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेश के अनुसरण में ग्रहण किया गया था, और नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, देगी ।
(2) धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकम और उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार संगणित रकम पर, चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज, नियत दिन से प्रारम्भ होकर उस तारीख को, जिसको ऐसी रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए दिया जाएगा ।
(3) कम्पनी को उपधारा (1) और (2) के उपबंधों के अनुसार अवधारित रकम उस रकम के अतिरिक्त दी जाएगी जो धारा 8 में विनिर्दिष्ट है ।
अध्याय 4
कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध, आदि
10. कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध, आदि-(1) कम्पनी के स्वामित्वाधीन उन उपक्रमों के जिनके सम्बन्ध में अधिकार, हक और हित धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियंत्रण और प्रबन्ध-
(क) जहां केन्द्रीय सरकार ने धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया है, वहां ऐसे निदेश में विनिर्दिष्ट तारीख से ही, उसमें विनिर्दिष्ट विद्यमान सरकारी कम्पनी में, निहित होगा; या
(ख) जहां धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई घोषणा की गई है वहां, ऐसी घोषणा की तारीख से ही, उसमें विनिर्दिष्ट विद्यमान सरकारी कम्पनी में निहित होगा; या
(ग) जहां खण्ड (क) में निर्दिष्ट कोई निदेश या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट कोई घोषणा नहीं की गई है वहां नियत दिन से ही, उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए गए एक या अधिक अभिरक्षकों में निहित होगा,
और तब विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी या, यथास्थिति, इस प्रकार नियुक्त एक या अधिक अभिरक्षक, सभी अन्य व्यक्तियों का अपवर्जन करते हुए, ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग करने और ऐसे सभी कार्य करने के हकदार होंगे जिन शक्तियों का प्रयोग करने और जिन कायों को करने के लिए, अपने स्वामित्वाधीन उपक्रमों के सम्बन्ध में, कम्पनी प्राधिकृत है ।
(2) कम्पनी के उन उपक्रमों के लिए, जिनके सम्बन्ध में धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन उसने कोई निदेश नहीं किया है या धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई घोषणा नहीं की है, केन्द्रीय सरकार एक या अधिक व्यक्तियों को या किसी सरकारी कम्पनी को, अभिरक्षक या अभिरक्षकों के रूप में नियुक्त कर सकेगी और इस प्रकार, नियुक्त एक या अधिक अभिरक्षक उपक्रमों की निधियों में से ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेंगे जो केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे ।
(3) कम्पनी के उपक्रमों का अभिरक्षक या उसके अभिरक्षक, कम्पनी के उपक्रमों का लेखा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रखेगा/रखेंगे जो विहित की जाएं और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबन्ध इस प्रकार रखे गए लेखा की लेखापरीक्षा को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे किसी कम्पनी के लेखा की लेखापरीक्षा को लागू होते हैं ।
11. उपक्रमों के प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्तियों का सभी आस्तियां, आदि परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) कम्पनी के उपक्रमों के प्रबन्ध के विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो जाने पर या अभिरक्षक अथवा अभिरक्षकों की नियुक्ति हो जाने पर, ऐेसे निहित होने या नियुक्ति के ठीक पहले ऐसी कम्पनी के उपक्रमों के प्रबन्ध के भारसाधक सभी व्यक्ति, ऐसी सरकारी कम्पनी को या, यथास्थिति, ऐसे अभिरक्षक या अभिरक्षकों को ऐसी कम्पनी के उपक्रमों से सम्बन्धित सभी आस्तियां, लेखा बहियां, रजिस्टर या अन्य दस्तावेजें, जो उनकी अभिरक्षा में हैं, परिदत्त करने के लिए आबद्ध होंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी अथवा अभिरक्षक या अभिरक्षकों को, उनकी शक्तियों और कर्तव्यों के बारे में ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह मामले की परिस्थितियों में वांछनीय समझे और ऐसी सरकारी कम्पनी या अभिरक्षक भी, यदि वे ऐसा करना आवश्यक समझें तो, केन्द्रीय सरकार को किसी भी समय उस रीति के बारे में, जिसमें कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध उनके द्वारा संचालित किया जाएगा या ऐसे किसी अन्य विषय के बारे में जो ऐसे प्रबन्ध के दौरान उत्पन्न हो, अनुदेश देने के लिए, आवेदन कर सकते हैं ।
12. अपने कब्जे में की आस्तियों, आदि का लेखा-जोखा देने के लिए व्यक्तियों का कर्तव्य-(1) ऐसा कोई व्यक्ति जिसके कब्जे या नियंत्रण में, नियत दिन को, कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी ऐसे उपक्रम से संबंधित कोई आस्तियां, बहियां, दस्तावेजें या अन्य कागजपत्र हैं, जो इस अधिनियम के अधीन केन्दीय सरकार या किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो गया है और जो कम्पनी के हैं या उस दशा में कम्पनी के होते जब कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रम केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी में निहित न हुआ होता, उक्त आस्तियों, बहियों, दस्तावेजों और अन्य कागजपत्रों का लेखा-जोखा केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी को देने के लिए दायी होगा और वह उनका परिदान केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी को या ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय को करेगा जिसे केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
(2) केन्द्रीय सरकार कम्पनी के उन उपक्रमों का, जो धारा 3 के अधीन उसमें निहित हो गए हैं, कब्जा प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा सकेगी या उठवा सकेगी ।
(3) कम्पनी ऐसी अवधि के भीतर जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुvञात करे, उस सरकार को उन उपक्रमों के संबंध में जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, नियत दिन को यथाविद्यमान अपनी समस्त सम्पत्ति और आस्तियों की एक पूर्ण सूची देगी और इस प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार या ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी सभी उचित सुविधाएं कम्पनी को देगी ।
अध्याय 5
कम्पनी के कर्मचारियों के बारे में उपबंध
13. कर्मचारियों के नियोजन का जारी रहना-(1) कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम के संबंध में कम्पनी का प्रत्येक कर्मचारी, नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हो जाएगा और जहां इस अधिनियम के अधीन ऐसा उपक्रम किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो गया है, वहां ऐसी सरकारी कम्पनी में निहित होने की तारीख से ही, उसका कर्मचारी हो जाएगा और वह पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी के अधीन वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा जो उसे उस स्थिति में अनुvञेय होते जब ऐसे निधान न हुआ होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक उसका पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी द्वारा सम्यक् रूप परिवर्तित नहीं कर दी जाती ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1974 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का केन्द्रीय सरकार या किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी को अन्तरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा, कोई न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
14. भविष्य-निधि और अन्य निधियां-(1) जहां कम्पनी ने अपने स्वामित्वाधीन उपक्रमों में से किसी में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य-निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण-निधि या कोई अन्य निधि स्थापित की है वहां ऐसे कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं केन्द्रीय सरकार या किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अन्तरित हो गई हैं, संबंधित धनराशियां ऐसी भविष्य-निधि, अधिवार्षिकी-निधि, कल्याण-निधि या अन्य निधियों में नियत दिन को जमा धनराशियों में से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकार कम्पनी को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगी ।
(2) उन धनराशियों के सम्बन्ध में, जो उपधारा (1) के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या किसी विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को अन्तरित हो जाती हैं, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी द्वारा ऐसी रीति से कार्रवाई की जाएगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 6
संदाय आयुक्त
15. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, कम्पनी को धारा 8 और 9 के अधीन संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए, अधिसूचना द्वारा, एक संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे, और तब आयुक्त ऐसे एक या अधिक व्यक्तियों को भी इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोक्तव्य सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) कोई व्यक्ति, जो आयुक्त द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आयुक्त द्वारा प्राधिकृत किया गया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उनका वही प्रभाव होगा मानो वे शक्तियां उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई हों, प्राधिकार के रूप में नहीं ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
16. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) कंपनी को संदाय किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर निम्नलिखित रकम आयुक्त को नकद देगी-
(क) धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकम के बराबर रकम;
(ख) धारा 9 के अधीन कम्पनी को देय रकम के बराबर अतिरिक्त रकम ।
(2) केन्द्रीय सरकार, भारत के लोक खाते में, आयुक्त के नाम एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त की गई प्रत्येक रकम उक्त निक्षेप खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा ।
(3) आयुक्त कम्पनी के ऐसे उपक्रमों के बारे में जिनके सम्बन्ध में इस अधिनियम के अधीन उसे संदाय किया गया है,अभिलेख रखेगा ।
(4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकम पर प्रोद्भूत होने वाला ब्याज कम्पनी के फायदे के लिए काम आएगा ।
17. केन्द्रीय सकरार या सरकारी कम्पनी की कुछ शक्तियां-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी, नियत दिन के पश्चात् वसूल किया गया, कम्पनी को शोध्य कोई धन, जो उसके स्वामित्वाधीन उन उपक्रमों में से किसी के सम्बन्ध में है जो कि केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी में निहित हो गए हैं, विनिर्दिष्ट तारीख तक अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करके, प्राप्त करने की हकदार इस बात के होते हुए भी होगी कि ऐसी वसूली नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि से सम्बन्ध रखती है ।
(2) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या विद्यमान या नई सरकारी कंपनी आयुक्त को ऐसे प्रत्येक संदाय के सम्बन्ध में दावा कर सकेगी जो नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि के सम्बन्ध में कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों में से किसी की बाबत उसके किसी दायित्व का निर्वहन करने के लिए उस सरकार या साकारी कम्पनी द्वारा नियत दिन के पश्चात् किया गया है और ऐसे प्रत्येक दावे को पूर्विकता, उन पूर्विकताओं के अनुसार प्राप्त होगी जो उस विषय को इस अधिनियम के अधीन प्राप्त है जिसके सम्बन्ध में ऐसे दायित्व का निर्वहन केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी द्वारा किया गया है ।
(3) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, नियत दिन के पूर्व के किसी संव्यवहार के सम्बन्ध में कम्पनी के स्वामित्वाधीन किन्हीं उपक्रमों से सम्बन्धित ऐसे दायित्व, जिनका विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व निर्वहन नहीं किया गया है, उस कम्पनी के दायित्व होंगे ।
18. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जिसका कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम के सम्बन्ध में अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय की बाबत कम्पनी के विरुद्ध कोई दावा है, ऐसा दावा विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर आयुक्त के समक्ष करेगा :
परन्तु यदि आयुक्त का समाधान हो जाता है कि दावेदार तीस दिन की उक्त अवधि के अन्दर दावा करने से पर्याप्त कारण से निवारित रहा था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकेगा किन्तु उसके पश्चात् नहीं ।
19. दावों की पूर्विकता-धारा 18 के अधीन दावों को निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी, अर्थात् :-
(क) प्रवर्ग i को अन्य सभी प्रवर्गों पर अग्रता दी जाएगी और प्रवर्ग ii को प्रवर्ग iii पर अग्रता दी जाएगी और इसी प्रकार आगे भी;
(ख) प्रत्येक प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावे, समान पंक्ति के होंगे और उनका पूर्णतः संदाय किया जाएगा किन्तु यदि रकम ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए अपर्याप्त है तो वे समान अनुपात में कम कर दिए जाएंगे और तदनुसार उनका संदाय किया जाएगा;
(ग) किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट विषय की बाबत किसी दायित्व के निर्वहन का प्रश्न केवल तभी उठेगा जब उसके ठीक उच्चतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट सभी दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अधिशेष रह जाए ।
20. दावों की परीक्षा-(1) आयुक्त, धारा 18 के अधीन किए गए दावों की प्राप्ति पर, उन्हें अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकता-क्रम में क्रमबद्ध करेगा और ऐसे पूर्विकता-क्रम से उनकी परीक्षा करेगा ।
(2) यदि दावों की परीक्षा करने पर, आयुक्त की यह राय है कि इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावों को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह ऐसे निम्नतर प्रवर्ग की बाबत दायित्वों की परीक्षा करे ।
21. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) अनुसूची में उपवर्णित पूर्विकताओं के प्रति निर्देश से दावों की परीक्षा करने के पश्चात् आयुक्त कोई तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पूर्व प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा ।
(2) इस प्रकार नियत तारीख की कम से कम चौदह दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में जिसका परिचालन देश के अधिकांश भाग में हो, और ऐसी प्रादेशिड्ड भाषा के, जिसे आयुक्त उपयुक्त समझे, किसी दैनिक समाचरपत्र के एक अंक में विvञापन द्वारा दी जाएगी, और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत आयुक्त के समक्ष विvञापन में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर फाइल करे ।
(3) प्रत्येक दावेदार, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहता है, आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरणों से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात् जो उसकी राय में आवश्यक है और कम्पनी को दावे का खण्डन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदारों को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, लिखित रूप में दावे को, पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार कर सकेगा ।
(5) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान भी हैं, जहां वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे वहीं शक्तियां प्राप्ति होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य तात्त्विक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य है, प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असन्तुष्ट है, उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील उस उच्च न्यायालय में कर सकता है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कम्पनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है :
परन्तु जहां कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है, आयुक्त नियुक्त किया जाता है वहां ऐसी अपील उस उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा सुनी और निपटाई जाएगी ।
22. आयुक्त द्वारा दावेदारों को धन का संवितरण-इस अधिनियम के अधीन कोई दावा स्वीकार करने के पश्चात्, ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त द्वारा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त की जाएगी जिसे या जिन्हें ऐसी धनराशि शोध्य है और ऐसा संदाय किए जाने पर कम्पनी, उसके स्वामित्वाधीन उपक्रमों के सम्बन्ध में ऐसे दावे की बाबत अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाएगी ।
23. कम्पनी को रकमों का संवितरण-(1) यदि कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम के सम्बन्ध में आयुक्त को संदत्त धन में से, अनुसूची में यथाविनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अतिशेष रह जाता है तो आयुक्त उस अतिशेष का संवितरण ऐसी कम्पनी को करेगा ।
(2) जहां किसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति का कब्जा इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो गया है किन्तु ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति उस कम्पनी की नहीं है, वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकर या किसी विद्यमान या नई सरकरी कम्पनी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी मशीनरी या उपस्कर या अन्य संपत्ति पर कब्जा उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर बनाए रखे, जिनके अधीन वे नियत दिन के ठीक पूर्व कंपनी के कब्जे में थी ।
24. असंवितरित या दावा न की गई रकम का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना-यदि आयुक्त को संदत्त कोई धन, जो उस तारीख से, जिसको आयुक्त का पद परिसमाप्त किया जाता है, ठीक पूर्ववर्ती तारीख को असंवितरित या दावा न किया गया रहता है, तो वह उसे अपने पद के अन्तिम रूप में परिसमापन से पूर्व केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अन्तरित करेगा, किन्तु इस प्रकार अन्तरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकता है, और उस सम्बन्ध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अन्तरण किया ही नहीं गया था और धन के संदाय के लिए आदेश यदि कोई है, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश समझा जाएगा ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
25. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
26. दायित्व का ग्रहण किया जाना-(1) जहां अनुसूची के भाग 1 में किसी प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट किसी मद से उत्पन्न होने वाले कम्पनी के किसी दायित्व का, आयुक्त द्वारा निर्वहन, इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई रकम में से पूर्ण रूप से नहीं किया जाता है वहां आयुक्त केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में उस दायित्व की मात्रा जिसका निर्वहन नहीं हुआ है, संसूचित करेगा और वह दायित्व केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण कर लिया जाएगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी को, जिसमें धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी निदेश के आधार पर या धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन की गई किसी घोषणा के आधार पर कम्पनी के उपक्रम निहित हो गए हैं, निदेश दे सकेगी कि वह उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण किए गए दायित्व को ग्रहण कर ले और ऐसा निदेश प्राप्त होने पर ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे दायित्व का निर्वहन करे ।
27. जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर दी जाती तब तक प्रबन्ध का अभिरक्षक में निहित रहना-कम्पनी के उपक्रम इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या किसी विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी में निहित हो जाने पर भी,-
(क) अभिरक्षक, जो उस तारीख से पूर्व, जिसको उपक्रम इस प्रकार निहित हुए थे, ऐसे उपक्रम के कार्यकलाप का प्रबन्ध कर रहा है, उस समय तक जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी ऐसे उपक्रमों के प्रबन्ध की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर देती, उपक्रमों के कार्यकलाप का प्रबन्ध उसी प्रकार करता रहेगा मानो अभिरक्षक को, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी ने ऐसे उपक्रमों का प्रबन्ध करने के लिए प्राधिकृत किया हो ;
(ख) जब तक कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर देती तब तक अभिरक्षक या इस प्रयोजन के लिए उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को, कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में किसी बैंक में ऐस उपक्रमों के खाते को उसी प्रकार चलाते रहने के लिए प्राधिकृत बना रहेगा मानो अभिरक्षक या उनके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति को ऐसा खाता चलाने के लिए केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी ने प्राधिकृत किया हो ।
28. केन्द्रीय सरकार या सरकार कम्पनी द्वारा अनुसमर्थन के अभाव में संविदाओं का प्रभावहीन हो जाना-किसी सेवा, विक्रय या प्रदाय के लिए कम्पनी के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम के सम्बन्ध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, कम्पनी द्वारा की गई प्रत्येक संविदा, जो नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, नियत दिन से एक सौ अस्सी दिन की समाप्ति से ही प्रभावहीन हो जाएगी, जब तक कि ऐसी संविदा का उस अवधि की समाप्ति के पूर्व, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी, जिसमें ऐसे उपक्रम इस अधिनियम के अधीन निहित हुए हैं, लिखित रूप में अनुसमर्थन नहीं कर देती और केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी ऐसे संविदा का अनुसमर्थन करने में ऐसे परिवर्तन या उपान्तर कर सकेगी जो वह ठीक समझे :
परन्तु, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और संविदा में कोई परिवर्तन या उपान्तर तब तक नहीं करेगी जब तक कि,-
(क) उसका यह समाधान नहीं हो जाता कि ऐसी संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है या दुर्भाव से की गई है या वह केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी के लिए अहितकर है, और
(ख) संविदा के पक्षकारों को सुनवाई या युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया जाता और संविदा का अनुसमर्थन करने से इंकार करने या उसमें कोई परिवर्तन या उपान्तर करने के कारणों को लेखबद्ध नहीं कर दिया जाता ।
29. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति-
(क) कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी से सदोष विधारित करेगा; या
(ख) कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा, सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसे सदोष प्रतिधारित करेगा; या
(ग) कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों से सम्बन्धित किसी दस्तावेज को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी को, या उस सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने से जानबूझकर विधारित करेगा या उसे देने में असफल रहेगा; या
(घ) कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों से सम्बन्धित किन्हीं आस्तियों, लेखा-बहियों या रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, केन्द्रीय सरकार या विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी को या उस सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने में असफल रहेगा; या
(ङ) कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति को सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा अथवा इस अधिनियम के अधीन ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या या बिल्कुल गलत है,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से भी जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
30. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक था, और उसके प्रति उत्तरदायी था, साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के लिए दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी जो यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति और मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है;
(ख) फर्म के सम्बन्ध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
31. सद्भापूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के या उस सरकार के किसी अधिकारी के या उस विद्यमान या नई सरकारी कम्पनी के, जिसमें इस अधिनियम के अधीन कम्पनी के उपक्रम निहित हो गए हैं, या उस सरकार या ऐसी सरकारी कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के, विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के या उसके किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारीयों के या उक्त विद्यमान नई सरकारी कम्पनी के या उस कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के, विरुद्ध न होगी ।
32. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस धारा या धारा 33 और धारा 34 द्वारा प्रदत्त शक्तियों से भिन्न, इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन शक्ति का कोई प्रत्यायोजन किया जाता है तो वह व्यक्ति, जिसको ऐसी शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है, केन्द्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा ।
33. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह समय जिसके अन्दर, और वह रीति जिससे, धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन कोई सूचना आयुक्त को दी जाएगी;
(ख) वह रीति और वह प्ररूप जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन अभिरक्षक या अभिरक्षकों द्वारा धारा 10 की उपधारा (3) द्वारा अपेक्षित रूप में लेखा रखा जाएगा ;
(ग) वह रीति जिससे धारा 14 में निर्दिष्ट किसी भविष्य-निधि या अन्य निधि के धन को बरता जाएगा;
(घ) कोई अन्य विषय जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी :
परन्तु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
35. निरसन और व्यावृत्ति-(1) नेशनल कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अध्यादेश, 1980 (1980 का 4) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबन्धों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
अनुसूची
(धाराएं 18, 19, 20, 21 और 26 देखिए)
पूर्विकता-क्रम
भाग 1
प्रवर्ग i
केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी के उपक्रमों का प्रबंध ग्रहण किए जाने के पूर्व या उसके पश्चात् की किसी अवधि के संबंध में कर्मचारियों को असंदत्त वेतन, मजदूरी, भविष्य-निधि, कर्मचारी राvय बीमा अभिदाय, भारतीय जीवन बीमा निगम से संबंधित प्रीमियम की बकाया और कर्मचारियों को शोध्य कोई अन्य रकमें ।
प्रवर्ग ii
केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी के उपक्रमों का प्रबंध ग्रहण किए जाने के पूर्व या उसके पश्चात् की किसी अवधि के संबंध में राष्ट्रीयकृत बैंकों और लोक वित्तीय संस्थानों से कम्पनी द्वारा अभिप्राप्त किए गए प्रतिभूत उधार ।
भाग 2
प्रवर्ग iii
प्रबंध ग्रहण के पश्चात् की अवधि के दौरान किए गए किसी संव्यवहार के संबंध में व्यापार और अन्य लेनदारों के शोध्य रकमें ।
प्रवर्ग iv
प्रबंध ग्रहण के पूर्व की अवधि के लिए केन्द्रीय सरकार, राvय सरकार और स्थानीय प्राधिकरणों या राvय विद्युत बोर्ड को शोध्य राजस्व, कर, उपकर, रेट या अन्य शोध्य रकमें ।
प्रवर्ग v
प्रबंध ग्रहण के पूर्व की किसी अवधि के दौरान, किए गए किसी संव्यवहार के संबंध में व्यापार और अन्य लेनदारों को शोध्य रकमें ।
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