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मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 ( Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 )


 

मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986

(1986 का अधिनियम संख्यांक 25)

[19 मई, 1986]

उन मुस्लिम स्त्रियों के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए, जिनका

उनके पति द्वारा विवाह विच्छेद हो गया है या जिन्होंने अपने पति

से विवाह विच्छेद प्राप्त कर लिया है और उससे

संबद्ध या उसके आनुषंगिक विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 है ।

(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, सम्पूर्ण भारत पर है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) विच्छिन्न विवाह स्त्री" से ऐसी मुस्लिम स्त्री अभिप्रेत है जिसका मुस्लिम विधि के अनुसार विवाह हुआ था और जिसका, मुस्लिम विधि के अनुसार, उसके पति द्वारा विवाह विच्छेद किया गया है, या जिसने अपने पति से विवाह विच्छेद प्राप्त कर लिया है ;

(ख) इद्दत की अवधि" से किसी विच्छिन्न विवाह स्त्री की दशा में अभिप्रेत है,-

(i) यदि उसका ऋतुस्राव होता है, तो विवाह विच्छेद की तारीख के पश्चात् तीन ऋतुस्राव ;

(ii) यदि उसका ऋतुस्राव नहीं होता है तो उसके विवाह विच्छेद के पश्चात् तीन चन्द्रमास ; और

(iii) यदि वह अपने विवाह विच्छेद के समय गर्भवती है तो विवाह विच्छेद और उसकी संतान के जन्म या उसके गर्भ के समापन के बीच की अवधि, इनमें जो भी पूर्वतर हो ;

(ग) मजिस्ट्रेट" से वह प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट अभिप्रेत है जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन उस क्षेत्र में अधिकारिता का प्रयोग करता है, जहां विच्छिन्न विवाह स्त्री निवास करती है ;

(घ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।

3. मेहर या मुस्लिम स्त्री की अन्य संपत्ति का विवाह विच्छेद के समय उसको दिया जाना- (1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई विच्छिन्न विवाह स्त्री निम्नलिखित की हकदार होगी, अर्थात् :-

(क) कोई युक्तियुक्त और ऋजु उपबन्ध और भरणपोषण जो उसके पूर्व पति द्वारा इद्दत की अवधि में उसके लिए किया जाना है और संदत्त किया जाना है  ;

(ख) जहां वह अपने विवाह विच्छेद के पूर्व या उसके पश्चात् उससे जन्मी संतान का स्वयं भरणपोषण करती है वहां, कोई युक्तियुक्त और ऋजु उपबन्ध और भरणपोषण जो ऐसी संतान के जन्म की सम्बन्धित तारीखों से दो वर्ष की अवधि के लिए उसके पूर्व पति द्वारा किया जाना है और संदत्त किया जाना है ;

(ग) मुस्लिम विधि के अनुसार उसके विवाह के समय या उसके पश्चात् किसी समय उसको संदत्त किए जाने के लिए करार पाई गई मेहर या डावर की राशि के बराबर रकम ; और

(घ) उसके नातेदारों या मित्रों या पति द्वारा अथवा पति के किसी नातेदार या उसके मित्रों द्वारा विवाह के पूर्व या विवाह के समय अथवा उसके विवाह के पश्चात् दी गई सभी सम्पत्ति ।

                (2) जहां किसी विच्छिन्न विवाह स्त्री के विवाह विच्छेद पर कोई युक्ितयुक्त और ऋजु उपबन्ध नहीं किया गया है और भरणपोषण अथवा शोध्य मेहर या डावर की रकम उसको संदत्त नहीं की गई है अथवा उपधारा (1)  के खंड (घ) में निर्दिष्ट सम्पत्ति का परिदान नहीं किया गया है वहां वह या उसके द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत कोई व्यक्ति उसकी ओर से, यथास्थिति, ऐसे उपबन्ध और भरणपोषण, मेहर या डावर के संदाय अथवा सम्पत्ति के परिदान के आदेश के लिए किसी मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकेगा ।

                (3) जहां किसी विच्छिन्न विवाह स्त्री द्वारा उपधारा (2) के अधीन कोई आवेदन किया गया है वहां मजिस्ट्रेट, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि-

(क) उसका पति, अपने पास पर्याप्त साधन होते हुए, इद्दत की अवधि के भीतर उसके और उसकी संतान के लिए युक्तियुक्त और ऋजु उपबन्ध करने और भरणपोषण का संदाय करने में असफल रहा है या उसने ऐसा करने में उपेक्षा की है ; या

(ख) मेहर अथवा डावर की राशि के बराबर रकम का संदाय नहीं किया गया है या उपधारा (1) के खण्ड (घ) में निर्दिष्ट सम्पत्ति का उसको परिदान नहीं किया गया है,

आवेदन फाइल करने की तारीख के एक मास के भीतर उसके पूर्व पति को विच्छिन्न विवाह स्त्री के लिए, यथास्थिति, युक्तियुक्त और ऋजु उपबन्ध करने तथा भरणपोषण का संदाय करने, जो वह विच्छिन्न विवाह स्त्री की आवश्यकताओं, उसके विवाह के दौरान उसके द्वारा उपभोग किए गए जीवन स्तर और उसके पूर्व पति के साधनों को दृष्टि में रखते हुए ठीक और उचित अवधारित करे या विच्छिन्न विवाह स्त्री को ऐसे मेहर या डावर के संदाय या उपधारा (1) के खण्ड (घ) में निर्दिष्ट सम्पत्ति के परिदान के लिए निर्देश देते हुए आदेश कर सकेगा :

परन्तु यदि मजिस्ट्रेट उक्त अवधि के भीतर आवेदन का निपटारा किया जाना असाध्य समझता है तो वह ऐसे कारणों से, जो उसके द्वारा अभिलिखित किए जाएंगे, आवेदन का निपटारा उक्त अवधि के पश्चात् कर सकेगा ।

(4) यदि कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध उपधारा (3) के अधीन कोई आदेश किया गया है, उस आदेश का पालन करने में पर्याप्त कारण के बिना असफल रहता है तो मजिस्ट्रेट शोध्य भरणपोषण या मेहर या डावर की रकम के उद्ग्रहण के लिए वारण्ट, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन जुर्माने के उद्ग्रहण के लिए उपबंधित रीति से, जारी कर सकेगा और वारण्ट के निष्पादन के पश्चात् असंदत्त रह गई संपूर्ण रकम या उसके किसी भाग के लिए ऐसे व्यक्ति को कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की या, यदि पहले ही संदाय कर दिया जाता है तो संदाय तक की, हो सकेगी, दण्डादिष्ट कर सकेगा । किन्तु ऐसा दण्डादेश ऐसे व्यक्ति को प्रतिरक्षा में सुने जाने के अधीन होगा और ऐसा दण्डादेश उक्त संहिता के उपबन्धों के अनुसार अधिरोपित किया जाएगा ।

4. भरणपोषण के संदाय के लिए आदेश- (1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि विच्छिन्न विवाह स्त्री ने पुनर्विवाह नहीं किया है और वह इद्दत की अवधि के पश्चात् अपना भरणपोषण करने में समर्थ नहीं है वहां वह उसके ऐसे नातेदारों को, जो उसकी मृत्यु पर मुस्लिम विधि के अनुसार उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होने के हकदार होंगे, विच्छिन्न विवाह स्त्री की आवश्यकताओं, उसके विवाह के दौरान उसके द्वारा उपभोग किए गए जीवन स्तर और ऐसे नातेदारों के साधनों को ध्यान में रखते हुए, यह निर्देश देते हुए आदेश कर सकेगा कि वे ऐसे युक्तियुक्त और ऋजु भरणपोषण का, जो वह ठीक और उचित अवधारित करे, उसको संदाय करें और ऐसा भरणपोषण ऐसे नातेदारों द्वारा उसी अनुपात में, जिसमें वे उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होंगे और ऐसी अवधियों पर संदत्त किया जाएगा जैसी वह अपने आदेश में विनिर्दिष्ट करे :

परन्तु जहां ऐसी विच्छिन्न विवाह स्त्री की संतान हैं, वहां मजिस्ट्रेट केवल ऐसी संतान को ही भरणपोषण का संदाय करने का आदेश देगा, और ऐसी किसी संतान के भरणपोषण का संदाय करने में असमर्थ होने की दशा में, मजिस्ट्रेट ऐसी विच्छिन्न विवाह स्त्री के माता-पिता को उसके भरणपोषण का संदाय करने का आदेश देगा :

परन्तु यह और कि यदि माता-पिता में से कोई मजिस्ट्रेट द्वारा आदिष्ट भरणपोषण के अपने अंश का संदाय इस आधार पर करने में  असमर्थ है कि उसके पास ऐसा संदाय करने के साधन नहीं हैं, तो मजिस्ट्रेट उसके द्वारा ऐसी असमर्थता का सबूत पेश किए जाने पर यह आदेश कर सकेगा कि मजिस्ट्रेट द्वारा आदिष्ट भरणपोषण में ऐसे नातेदारों का अंश ऐसे अन्य नातेदारों द्वारा जिनके बारे में मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत हो कि उनके पास उसका संदाय करने के साधन हैं, ऐसे अनुपात में संदत्त किया जाए जैसा मजिस्ट्रेट आदेश करना ठीक समझे ।

(2) जहां कोई विच्छिन्न विवाह स्त्री अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है और उपधारा (1) में यथावर्णित उसके कोई नातेदार नहीं हैं यह ऐसे नातेदारों अथवा उनमें से किसी के पास मजिस्ट्रेट द्वारा आदिष्ट भरणपोषण का संदाय करने के पर्याप्त साधन नहीं हैं या अन्य नातेदारों के पास उन नातेदारों के अंशों का संदाय करने के साधन नहीं हैं जिनके अंशों का, ऐसे अन्य नातेदारों द्वारा संदाय किए जाने के लिए मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (1) के दूसरे परन्तुक के अधीन आदेश किया गया है वहां मजिस्ट्रेट, आदेश द्वारा, वक्फ अधिनियम, 1954 (1954 का 29) की धारा 6 के अधीन या किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन स्थापित राज्य वक्फ बोर्ड की, जो उस क्षत्र में जिसमें वह स्त्री निवास करती है, कार्य कर रहा हो, यथास्थिति, ऐसे भरणपोषण का संदाय, जो उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा अवधारित किया जाए, या ऐसे नातेदारों के, जो संदाय करने में असमर्थ हैं, अशों का संदाय ऐसी अवधियों पर करने का निदेश दे सकेगा जो वह आदेश में विनिर्दिष्ट करे । 

 5. 1974 के अधिनियम 2 की धारा 125 से धारा 128 तक के उपबंधों द्वारा शासित होने का विकल्प-यदि धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन की पहली सुनवाई की तारीख को विच्छिन्न विवाह स्त्री और उसका पूर्व पति शपथपत्र या किसी अन्य लिखित घोषणा द्वारा ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, या तो संयुक्त रूप से या पृथक्तः, यह घोषित करते हैं कि वे दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 125 से धारा 128 तक के उपबन्धों द्वारा शासित होना चाहते हैं और वे आवेदन की सुनवाई करने वाले न्यायालय में ऐसा शपथपत्र या घोषणा फाइल करते है, तो मजिस्ट्रेट ऐसे आवेदन को तदनुसार निपटाएगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, आवेदन की पहली सुनवाई की तारीख" से वह तारीख अभिप्रेत है जो आवेदन के प्रत्यर्थी की हाजिरी के लिए समन में नियत की गई है ।

6. नियम बनाने की शक्ित-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा-

(क) धारा 5 के अधीन फाइल किए जाने वाले शपथपत्र या अन्य लिखित घोषणा का प्ररूप ; 

(ख) इस अधिनियम के अधीन आवेदनों का निपटारा करने में मजिस्ट्रेट द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत ऐसे आवेदनों के पक्षकारों को सूचना की तामील, ऐसे आवेदनों की सुनवाई की तारीखें और अन्य विषय हैं  ;

(ग) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

                (3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने  के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

7. संक्रमणकालीन उपबन्ध-विच्छिन्न विवाह स्त्री द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 125 के अधीन या धारा 127 के अधीन किया गया प्रत्येक आवेदन, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित है, उक्त संहिता में किसी बात के होते हुए भी और इस अधिनियम की धारा 5 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार निपटाया जाएगा ।

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