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मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 ( Mental Health Act, 1987 (Repealed) )


 

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987

(1987 का अधिनियम संख्यांक 14)

[22 मई, 1987]

मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के उपचार और उनकी देख-रेख से

संबंधित विधि का समेकन और संशोधन करने के लिए, उनकी

संपत्ति और कार्यकलापों की बाबत बेहतर उपबंध

करने के लिए और उनसे संबद्ध या

उनके आनुषंगिक विषयों के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है । 

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे और विभिन्न राज्यों के लिए और इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी, और किसी राज्य में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी उपबंध में किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, - 

(क) किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती किए गए किसी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संबंध में भरण-पोषण का खर्च" से ऐसी मदों का खर्च अभिप्रेत होगा जो राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे; 

(ख) जिला न्यायालय" से, किसी ऐसे क्षेत्र में जिसके लिए कोई नगर सिविल न्यायालय है, वह न्यायालय, और किसी अन्य क्षेत्र में, आरंभिक अधिकारिता वाला प्रधान सिविल न्यायालय, अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत ऐसा कोई अन्य सिविल न्यायालय भी है जिसे राज्य सरकार इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं मामलों के बारे में कार्यवाही करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, सक्षम न्यायालय विनिर्दिष्ट करे; 

(ग) निरीक्षक अधिकारी" से किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का निरीक्षण करने के लिए राज्य सरकार द्वारा या अनुज्ञापन प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति अभिप्रेत है;

(घ) अनुज्ञप्ति" से धारा 8 के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति अभिप्रेत है; 

(ङ) अनुज्ञप्तिधारी" से अनुज्ञप्ति का धारक अभिप्रेत है; 

(च) अनुज्ञप्त मनश्चिकित्सीय अस्पताल" या अनुज्ञप्त मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह" से इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, अनुज्ञप्त या अनुज्ञप्त समझा जाने वाला मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह अभिप्रेत है; 

(छ) अनुज्ञापन प्राधिकारी" से ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए राज्य सरकार द्वारा अनुज्ञापन प्राधिकारी विनिर्दिष्ट किया जाए;  

(ज) मजिस्ट्रेट" से अभिप्रेत है-

(1) दंड प्रक्रिया सहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 2 के खंड (ट) के अर्थ के अंतर्गत किसी महानगर क्षेत्र के संबंध में, महानगर मजिस्ट्रेट; 

(2) किसी अन्य क्षेत्र के संबंध में, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, उपखंड न्यायिक मजिस्ट्रेट या ऐसा अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसे राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन मजिस्ट्रेट के कृत्यों का पालन करने के लिए अधिसूचना द्वारा, सशक्त करे; 

(झ) चिकित्सा अधिकारी" से अभिप्रेत है ऐसा राजपत्रित चिकित्सा अधिकारी जो सरकार की सेवा में है, और इसके अन्तर्गत ऐसा चिकित्सा व्यवसायी भी है जो राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए चिकित्सा अधिकारी घोषित किया जाता है; 

(ञ) किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के संबंध में, भारसाधक चिकित्सा अधिकारी" से ऐसा चिकित्सा अधिकारी अभिप्रेत है जो, उस समय उस अस्पताल या परिचर्या गृह का भारसाधक है; 

(ट) चिकित्सा व्यवसायी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास ऐसी मान्यताप्राप्त आयुर्विज्ञान अर्हता है जो- 

(i) भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) की धारा 2 के खंड (ज) में परिभाषित है और जिसका नाम उस धारा के खंड (ट) में यथापरिभाषित राज्य चिकित्सा रजिस्टर में दर्ज किया गया है;

(ii) भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1970 (1970 का 48) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ज) में परिभाषित है और जिसका नाम उस धारा की उपधारा (1) के खंड (ञ) में यथापरिभाषित भारतीय चिकित्सा के राज्य रजिस्टर में दर्ज किया गया है; तथा 

(iii) होम्योपैथी केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1973 (1973 का 59) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (छ) में परिभाषित है और जिसका नाम उस धारा की उपधारा (1) के खण्ड (झ) में यथापरिभाषित राज्य होम्योपैथी रजिस्टर में दर्ज है; 

(ठ) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसको मानसिक मंदता से भिन्न किसी मानसिक विकास के कारण उपचार की आवश्यकता है; 

(ड) मानसिक रूप में बीमार बंदी" से मानसिक रूप से बीमार ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके मनश्चिकित्सीय अस्पताल, मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह, जेल या सुरक्षित अभिरक्षा के किसी अन्य स्थान में निरोध या ले जाने के लिए    धारा 27 में यथानिर्दिष्ट आदेश किया गया है;

(ढ) अवयस्क" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अठारह वर्ष की आयु पूरी नहीं की है; 

(ण) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है; 

(त) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; 

(थ) मनश्चिकित्सीय अस्पताल" या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह" से, यथास्थिति, ऐसा अस्पताल या परिचर्या गृह अभिप्रेत है जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के उपचार और देख-रेख के लिए सरकार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किया गया है और इसके अन्तर्गत मानसिक रूप से बीमार ऐसे व्यक्तियों के लिए सरकार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा स्थापित या अनुरक्षित स्वास्थ्य लाभ-भवन भी है किंतु सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित ऐसा साधारण अस्पताल या साधारण परिचर्या गृह जो मनश्चिकित्सीय सेवाओं की भी व्यवस्था करता है इसके अन्तर्गत नहीं है ;  

(द) मनश्चिकित्सक" से ऐसा चिकित्सा व्यवसायी अभिप्रेत है जिसके पास भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) के अधीन गठित भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् द्वारा मान्यताप्राप्त मनश्चिकित्सा की स्नातकोत्तर डिग्री या डिप्लोमा है और इसके अंतर्गत किसी राज्य के संबंध में, कोई ऐसा चिकित्सा अधिकारी भी है जिसको उस राज्य की सरकार ने मनश्चिकित्सा में उसके ज्ञान और अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मनश्चिकित्सक घोषित कर दिया है; 

(ध) ग्रहण-आदेश" से किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या ग्रह में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की भर्ती और उसके निरोध के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किया गया आदेश अभिप्रेत है;

(न) नातेदार" के अंतर्गत ऐसा कोई भी व्यक्ति है जिसका मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति से रक्त, विवाह या दत्तकग्रहण के आधार पर कोई नाता है;

(प) संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, राज्य सरकार" से उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण

3. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए केन्द्रीय प्राधिकरण-(1) केंद्रीय सरकार ऐसे पदाभिधान से, जो वह ठीक समझे, एक मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की स्थापना करेगी । 

(2) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्राधिकरण केंद्रीय सरकार के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन होगा । 

(3) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्राधिकरण, - 

(क) केंद्रीय सरकार के अधीन मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और ऐसे अन्य सभी मामलों की बाबत जो, इस अधिनियम के अधीन, केंद्रीय सरकार से या केंद्रीय सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी से संबंधित है विनियमन, विकास, निदेशक और समन्वय का भारसाधक होगा;  

(ख) केंद्रीय सरकार के नियंत्रणाधीन मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों और अन्य मानसिक स्वास्थ्य सेवा अभिकरणों का (जिनके अन्तर्गत वे स्थान भी है जिनमें मानिसक रूप से बीमार व्यक्तियों को रखा जा सकेगा या निरुद्ध किया जा सकेगा) पर्यवेक्षण करेगा; 

(ग) मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सभी मामलों में केंद्रीय सरकार को सलाह देगा;   

(घ) मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित मामलों की बाबत ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगा जिनकी केंद्रीय सरकार अपेक्षा करे ।  

स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 4 के प्रयोजनों के लिए, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं" के अन्तर्गत मनश्चिकित्सीय अस्पताल और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों के अलावा, मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के लिए सम्प्रेक्षण वार्ड, दिन परिचर्या केंद्र, साधारण अस्पतालों में अंतरंग रोगियों का उपाचार, गमनीय उपचार सुविधाएं और अन्य सुविधाएं, स्वास्थ्य लाभगृह और स्वास्थ्य विश्राम गृह भी हैं । 

4. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए राज्य प्राधिकरण-(1) राज्य सरकार ऐसे पदाभिधान से, जो वह ठीक समझे, एक मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की स्थापना करेगी । 

(2) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्राधिकरण राज्य सरकार के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन होगा ।  

(3) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्राधिकरण- 

(क) राज्स सरकार के अधीन मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और ऐसे अन्य मामलों की बाबत जो, इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार से या राज्य के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी से संबंधित है, विनियमन, विकास और समन्वय का भारसाधक होगा; 

(ख) राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और परिचर्या गृहों और अन्य मानसिक स्वास्थ्य सेवा अभिकरणों का (जिनके अन्तर्गत वे स्थान भी हैं जिनमें मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों को रखा जा सकेगा या निरुद्ध किया जा सकेगा) पर्यवेक्षण करेगा; 

(ग) मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सभी मामलों में राज्य सरकार को सलाह देगा; 

(घ) मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित मामलों की बाबत ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगा जिनकी राज्य सरकार अपेक्षा करे ।

अध्याय 3

मनश्चिकित्सीय अस्पताल और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह

5. मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों की स्थापना या अनुरक्षण-(1) केंद्रीय सरकार भारत के किसी भी भाग में या राज्य सरकार अपनी अधिकारिता की सीमाओं के भीतर ऐसे स्थानों पर जो वह ठीक समझे मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की भर्ती, उपचार और देख-रेख के लिए मनश्चिकित्सीय अस्पतालों या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों की स्थापना या अनुरक्षण कर सकेगी और निम्नलिखित व्यक्तियों के लिए पृथक् मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों की स्थापना या अनुरक्षण किया जा सकेगा, अर्थात् :- 

(क) ऐसे व्यक्ति जिनकी आयु सोलह वर्ष से कम है; 

(ख) ऐसे व्यक्ति जो एल्कोहल या अन्य ऐसी ओषधियों के व्यसनी है जिनसे व्यक्ति के आचरण में परिवर्तन हो जाता है; 

(ग) ऐसे व्यक्ति जो किसी अपराध के लिए सिद्धदोष किए गए हों; और 

(घ) ऐसे व्यक्ति जो किसी अन्य वर्ग या श्रेणी के हैं जो विहित की जाए । 

(2) जहां केंद्रीय सरकार ने मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की स्थापना या अनुरक्षण किया हो वहां इस अधिनियम में राज्य सरकार के प्रति किसी निर्देश का ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह केंद्रीय सरकार के प्रति निर्देश है ।

6. केवल अनुज्ञप्ति से ही मनश्चिकित्सीय अस्पतालों या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों की स्थापना या अनुरक्षण-(1) इस अधिनियम के प्रारंभ से ही कोई भी व्यक्ति किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की तभी स्थापना या अनुरक्षण करेगा जब उसके पास इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई विधिमान्य अनुज्ञप्ति हो, अन्यथा नहीं:  

परंतु केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा अनुज्ञप्त मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह (चाहे वह पागलखाना या किसी अन्य नाम से जाना जाता हो) जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व उस रूप में अनुरक्षित है, अनुरक्षित रखा जा सकेगा और निम्नलिखित अवधि के लिए इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, अनुज्ञप्त मनश्चिकत्सीय अस्पताल या अनुज्ञप्त मनश्िचकित्सीय परिचर्या गृह समझा जाएगा:

(क) ऐसे प्रारंभ से तीन मास; या

(ख) यदि किसी अनुज्ञप्ति के लिए धारा 7 के अनुसार किया गया कोई आवेदन खंड (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर लंबित है तो ऐसे आवेदन के निपटाए जाने तक ।

                (2) उपधारा (1) की कोई बात केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह को लागू न होगी । 

7. अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन-(1) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसके पास इस अधिनियम के प्रारंभ के समय कोई ऐसी विधिमान्य अनुज्ञप्ति है जो किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की स्थापना या अनुरक्षण के लिए उस व्यक्ति को प्राधिकृत करती है और यदि उक्त व्यक्ति धारा 6 की उपधारा (1) के परंतुक के खंड (क) में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के पश्चात् ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह की स्थापना या उसके अनुरक्षण को चालू रखना चाहता है तो वह ऐसी अवधि की समाप्ति के कम से कम एक मास पूर्व, यथास्थिति, ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह की स्थापना या अनुरक्षण के लिए एक नई अनुज्ञप्ति दी जाने के लिए अनुज्ञापन प्राधिकारी को आवेदन करेगा । 

(2) ऐसा कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की स्थापना या अनुरक्षण करना चाहता है, जब तक कि उसके पास पहले से ही ऐसी कोई विधिमान्य अनुज्ञप्ति न हो, अनुज्ञप्ति दी जाने के लिए अनुज्ञापन प्राधिकारी को आवेदन करेगा ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में और ऐसी फीस के साथ होगा जो विहित की जाए । 

8. अनुज्ञप्ति देना या उससे इंकार करना-धारा 7 के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर अनुज्ञापन प्राधिकारी ऐसी जांच करेगा जो वह ठीक समझे और जहां उसका यह समाधान हो जाता है कि-

(क) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की स्थापना या अनुरक्षण या इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व स्थापित ऐसे किसी अस्पताल या परिचर्या गृह का अनुरक्षण चालू रखना आवश्यक है; 

(ख) आवेदक मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की भर्ती, उपचार और देख-रेख के लिए विहित न्यूनतम सुविधाएं प्रदान करने की स्थिति में है; और 

(ग) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह ऐसे चिकित्सा अधिकारी के भारसाधन में होगा जो मनश्चित्सीय है,

वहां वह आवेदक को विहित प्ररूप में अनुज्ञप्ति देगा और जहां उसका इस प्रकार समाधान नहीं हुआ है वहां अनुज्ञापन प्राधिकारी आदेश द्वारा, आवेदन की गई अनुज्ञप्ति देने से इंकार करेगा:

परंतु अनुज्ञप्ति देने से इंकार करने वाला कोई आदेश करने से पूर्व अनुज्ञापन प्राधिकारी आवेदक को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देगा और अनुज्ञप्ति देने से इंकार करने वाले प्रत्येक आदेश में ऐसे इंकार किए जाने के कारण उल्लिखित किए जाएंगे और उन कारणों की सूचना आवेदक को ऐसी रीति में दी जाएगी, जो विहित की जाए ।

9. अनुज्ञप्ति की अवधि और उसका नवीकरण-(1) अनुज्ञप्ति अंतरणीय या विरासतीय नहीं होगी । 

(2) जहां अनुज्ञप्तिधारी किसी कारणवश इस रूप में कार्य करने में असमर्थ है या जहां अनुज्ञप्तिधारी की मृत्यु हो जाती है, वहां यथास्थिति, अनुज्ञप्तिधारी या ऐसे अनुज्ञप्तिधारी का विधिक प्रतिनिधि विहित रीति से मामले की रिपोर्ट तुरंत अनुज्ञापन प्राधिकारी को करेगा और उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, संबंधित मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण चालू रखा जा सकेगा और उसे, यथास्थिति-

(क) ऐसी रिपोर्ट की तारीख से या अनुज्ञप्तिधारी की मृत्यु की दशा में, उसकी मृत्यु की तारीख से, तीन मास की अवधि के लिए, या 

(ख) यदि अनुज्ञप्ति के लिए उपधारा (3) के अनुसार किया गया कोई आवेदन खंड (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर लंबित है तो ऐसे आवेदन के निपटाए जाने तक, 

अनुज्ञप्त मनश्चिकित्सीय अस्पताल या अनुज्ञप्त मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह समझा जाएगा ।

(3) यदि उपधारा (2) में निर्दिष्ट अनुज्ञप्तिधारी का विधिक प्रतिनिधि उपधारा (2) में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के पश्चात् मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण चालू रखना चाहता है तो वह ऐसी अवधि की समाप्ति के कम से कम एक मास पूर्व, यथास्थिति, ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह के अनुरक्षण के लिए नई अनुज्ञप्ति दिए जाने के लिए अनुज्ञापन प्राधिकारी को आवेदन करेगा और धारा 8 के उपबंध ऐसे आवेदन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 7 के अधीन किए गए किसी आवेदन के संबंध में लागू होते हैं । 

(4) प्रत्येक अनुज्ञप्ति जब तक कि उसे धारा 11 के अधीन पहले की प्रतिसंहृत नहीं कर दिया जाता, दिए जाने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए विधिमान्य होगी । 

(5) अनुज्ञप्ति का समय-समय पर नवीकरण अनुज्ञापन प्राधिकारी को ऐसे प्ररूप में और ऐसी फीस के साथ जो विहित की जाए, उस निमित्त किए गए आवेदन पर किया जा सकेगा और ऐसा प्रत्येक आवेदन उस तारीख के कम से कम एक वर्ष पूर्व किया जाएगा जिसको अनुज्ञप्ति की विधिमान्यता की अवधि समाप्त होने वाली है:

परंतु अनुज्ञप्ति का नवीकरण करने से तब तक इंकार नहीं किया जाएगा जब तक अनुज्ञापन प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि: -  

(i) अनुज्ञप्तिधारी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की भर्ती, उपचार और देख-रेख के लिए विहित न्यूनतम सुविधाएं प्रदान करने की स्थिति में नहीं है; या

(ii) अनुज्ञप्तिधारी ऐसे चिकित्सा अधिकारी की व्यवस्था करने की स्थिति में नहीं है जो ऐसा मनश्चिकित्सक हो कि वह मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का भार ग्रहण कर सके; या 

(iii) अनुज्ञप्तिधारी ने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन किया है ।

10. विहित शर्तों के अनुसार मनश्चिकित्सीय अस्पताल और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण किया जाना-प्रत्येक मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए किया जाएगा, जो विहित की जाएं । 

11. अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण-(1) यदि अनुज्ञापन प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि, -

(क) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह को अनुज्ञप्तिधारी के द्वारा इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुसार अनुरक्षित नहीं किया जा रहा है; या

(ख) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण ऐसी गिति में किया जा रहा है जो उसके अंतरंग रोगियों की नैतिक, मानसिक या शारीरिक सुख-सुविधा के लिए अहितकर है, 

तो वह ऐसी किसी अन्य शास्ति पर जो अनुज्ञिप्धारी पर अधिरोपित की जा सकती है प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, लिखित आदेश द्वारा अनुज्ञप्ति को प्रतिसंहृत कर सकेगी:

                परंतु ऐसा कोई आदेश अनुज्ञप्तिधारी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए बिना नहीं किया जाएगा और प्रत्येक ऐसे आदेश में अनुज्ञप्ति के प्रतिसंहरण के आधार उल्लिखित किए जांएगे और उन आधारों की सूचना अनुज्ञप्तिधारी को ऐसी रीति से दी जाएगी, जो विहित की जाए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश में यह निदेश होगा कि मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के अंतरग रोगियों को ऐसे अन्य मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में स्थानांतरित किया जाएगा जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए और उसमें ऐसा स्थानांतरण होने तक ऐसे अंतरंग रोगियों की देख-रेख और अभिरक्षा के बारे में उपबंध (जिसके अंतर्गत निदेशों के रूप में उपबंध भी है) भी होंगे । 

(3) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, - 

(क) जहां धारा 12 के अधीन ऐसे आदेश के विरुद्ध कोई अपील नही की गई है, वहां ऐसी अपील के लिए विहित अवधि के समाप्त होते ही प्रभावी होगा; और 

(ख) जहां ऐसी अपील की गई है और वह खारिज कर दी गई, वहां ऐसे खारिजी आदेश की तारीख से प्रभावी होगा । 

12. अपील-(1) अनुज्ञापन प्राधिकारी के ऐसे आदेश से, जिससे अनुज्ञप्ति देने या अनुज्ञप्ति का नवीकरण करने से इंकार किया गया है, या अनुज्ञप्ति को प्रतिसंहृत किया गया है, व्यथित कोई व्यक्ति, राज्य सरकार को ऐसी रीति से और ऐसी कालावधि के भीतर जो विहित की जाए, अपील कर सकेगी:

परंतु राज्य सरकार विहित कालावधि के अवसान के पश्चात् की गई अपील को भी ग्रहण कर सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील करने से पर्याप्त हेतुक से निवारित हो गया था । 

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए । 

13. मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों का निरीक्षण और रोगियों को देखना-(1) निरीक्षक अधिकारी किसी भी समय किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा ओर निरीक्षण के लिए ऐसे अभिलेखों के पेश किए जाने की अपेक्षा कर सकेगा जो इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार रखे जाने के लिए अपेक्षित हैं:

परन्तु इस प्रकार निरीक्षण किए गए रोगी के वैयक्तिक अभिलेख उपधारा (3) के प्रयोजनों के सिवाय गोपनीय रखे जाएंगे ।

(2) निरीक्षक अधिकारी ऐसे रोगी से जिसका उसमें उपचार और देख-रेख हो रही है- 

(क) उपचार और देख-रेख के बारे में ऐसे रोगी द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी शिकायत की जांच करने के प्रयोजन के लिए; या

(ख) किसी भी दशा में, जिसमें निरीक्षक अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी अंतरंग रोगी का समुचित उपचार और देख-रेख नहीं हो रही है,

एकांत में पूछताछ कर सकेगा । 

(3) जहां निरीक्षक अधिकारी का समाधान हो जाता है कि किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में किसी अंतरंग रोगी का समुचित उपचार और देख-रेख नहीं हो रही है वहां वह मामले की रिपोर्ट अनुज्ञापन प्राधिकारी को कर सकेगा और तदुपरि अनुज्ञापन प्राधिकारी, भारसाधक चिकित्सा अधिकारी या, यथास्थिति, मश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के अनुज्ञप्तिधारी को ऐसा निदेश दे सकेगा जो वह ठीक समझे और प्रत्येक ऐसा भारसाधक चिकित्सा अधिकारी या अनुज्ञप्तिधारी ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।

14. बाह्य रोगियों का उपचार-प्रत्येक मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में मानसिक रूप से बीमार ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के उपचार के लिए जिसकी हालत अंतरंग रोगी के रूप में भर्ती की जाने लायक नहीं है या जिसका उपचार तत्समय अंतरंग रोगी के रूप में नहीं हो रहा है, ऐसी सुविधाओं की व्यवस्था भी की जा सकेगी जो विहित की जाएं ।

अध्याय 4

मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती और निरोध

भाग 1

स्वेच्छा के आधार पर भर्ती

15. स्वैच्छिक रोगी के रूप में भर्ती के लिए वयस्क द्वारा अनुरोध-ऐसा कोई व्यक्ति (जो अवयस्क नहीं है) जो स्वयं को मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति समझता है और उपचार के लिए किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मानश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती होना चाहता है, वह स्वैच्छिक रोगी के रूप में भर्ती किए जाने के लिए भारसाधक चिकित्सा अधिकारी से अनुरोध कर सकेगा । 

16. प्रतिपाल्य की भर्ती के लिए संरक्षक द्वारा अनुरोध-जहां किसी अवयस्क का संरक्षक ऐसे अवयस्क को मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति समझता है और ऐसे अवयस्क को उपचार के लिए किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती कराना चाहता है तो वह ऐसे अवयस्क को स्वैच्छिक रोगी के रूप में भर्ती करने के लिए भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को अनुरोध कर सकेगा ।

17. स्वैच्छिक रोगियों की भर्ती और उनकी बाबत विनियम-(1) धारा 15 या धारा 16 के अधीन अनुरोध की प्राप्ति पर भारसाधक चिकित्सा अधिकारी चौबीस घंटे से अनधिक अवधि के भीतर ऐसी जांच करेगा जो वह ठीक समझे और यदि उसका समाधान हो जाता है कि यथास्थिति, आवेदक या अवयस्क का मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के अंतरंग रोगी के रूप में उपचार अपेक्षित है तो वह, यथास्थिति, ऐसे आवेदक या, अवयस्क को स्वैच्छिक रोगी के रूप में भर्ती कर सकेगा । 

(2) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती किया गया प्रत्येक स्वैच्छिक रोगी ऐसे विनियमों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा जो मनश्चिकित्सीय अस्पाताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी या अनुप्तिधारी द्वारा बनाए जाएं ।

18. स्वैच्छिक रोगियों की छुट्टी-(1) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का भारसाधक चिकित्सा अधिकारी, -

(क) किसी स्वैच्छिक रोगी द्वारा; और 

(ख) यदि वह अवयस्क स्वैच्छिक रोगी है, तो रोगी के संरक्षक द्वारा, इस निमित्त अनुरोध किए जाने पर, उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए और ऐसे अनुरोध की प्राप्ति के चौबीस घंटे के भीतर मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह से रोगी की छुट्टी कर देगा ।  

(2) जहां कोई अवयस्क स्वैच्छिक रोगी, जो किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में भर्ती किया जाता है, वयस्कता प्राप्त कर लेता है वहां ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह का भारसाधक चिकित्सा अधिकारी यथाशीघ्र रोगी को यह सूचना देगा कि उसने वयस्कता प्राप्त कर ली है और यदि ऐसी सूचना के एक मास की अवधि के भीतर अंतरंग रोगी के रूप में उसके बने रहने के लिए उसके द्वारा आवेदन नहीं किया जाता है तो उसकी छुट्टी कर दी जाएगी और यदि उक्त अवधि की समाप्ति से पूर्व अंतरंग रोगी के रूप में उसके बने रहने के लिए भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को कोई अनुरोध नहीं किया जाता है, तो उपधारा (3) =के उपबंधों के अधीन रहते हुए ऐसी अवधि की समाप्ति पर उसकी छुट्टी कर दी जाएगी ।  

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, जहां मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी स्वैच्छिक रोगी की छुट्टी, ऐसे स्वैच्छिक रोगी के हित में नहीं होगी वहां वह, उपधारा (1) के अधीन अनुरोध की प्राप्ति से बहत्तर घंटे के भीतर या यदि उपधारा (2) में वर्णित अवधि की समाप्ति के पूर्व स्वैच्छिक रोगी द्वारा उपधारा (2) के अधीन कोई अनुरोध नहीं किया गया है तो ऐसी समाप्ति से बहत्तर घंटे के भीतर, एक बोर्ड गठित करेगा जो दो चिकित्सा अधिकारियों से मिलकर बने और इस बारे में उसकी राय मानेगा कि क्या ऐसे स्वैच्छिक रोगी को और उपचार की आवश्यकता है और यदि बोर्ड की यह राय है कि ऐसे स्वैच्छिक रोगी को मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में और उपचार की आवश्यकता है तो चिकित्सा अधिकारी स्वैच्छिक रोगी की छुट्टी नहीं करेगा किंतु उसका उपचार एक समय पर नब्बे दिन से अधिक की अवधि तक जारी रखेगा । 

भाग 2

विशेष परिस्थितियों में भर्ती

19. कतिपय विशेष परिस्थितियों में मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की भर्ती-(1) ऐसा कोई मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति जो स्वैच्छिक रोगी के रूप में भर्ती के लिए अपनी इच्छा व्यक्त नहीं करता या व्यक्त करने में असमर्थ है, उस मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के किसी नातेदार या मित्र द्वारा उस निमित्त किए गए आवेदन पर मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में तभी भर्ती किया जा सकेगा और रखा जा सकेगा जब भारसाधक चिकित्सा अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के हित में ऐसा करना आवश्यक है ;

परंतु अंतरंग रोगी के रूप में इस प्रकार भर्ती किया गया कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अनुसार ही अधिक से अधिक नब्बे दिन की अवधि के लिए मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अन्तरंग रोगी के रूप में रखा जाएगा, अन्यथा नहीं । 

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन विहित प्ररूप में होगा और उसके साथ दो चिकित्सा व्यवसायियों के जिनमें एक चिकित्सा व्यवसायी सरकार की सेवा में होगा, इस आशय के दो चिकित्सा प्रमाणपत्र संलग्न किए जाएंगे कि ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की दशा ऐसी है कि उसे मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में देख-रेख और उपचार के अधीन रखा जाए:

परंतु यदि संबंधित मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी का समाधान हो जाता है कि ऐसा करना उचित है तो वह ऐसे प्रमाणपत्रों की अपेक्षा करने की बजाय उस अस्पताल या परिचर्या गृह में कार्यरत दो चिकित्सा व्यवसायियों द्वारा मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की परीक्षा करा सकेगा ।  

(3) उपधारा (1) के अधीन भर्ती किया गया कोई मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति या उसका नातेदार या मित्र उसकी छुट्टी के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकेगा और मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को जिसके कहने पर उस मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती किया गया था सूचना देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे आवेदन मंजूर या खारिज कर सकेगा । 

(4) पूर्वोक्त उपधारा के उपबंधों का प्रतिकूल प्रभाव ऐसे मजिस्ट्रेट की जिसके समक्ष मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का मामला लाया जाता है, उन शक्तियों पर जो उसके द्वारा इस धारा के अधीन या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन ग्रहण आदेश पारित करने के लिए प्रयोक्तव्य है, तब नहीं पड़ेगा जब उस मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के सुसंगत उपबंधों के अनुसरण में ऐसा करना आवश्यक है ।  

भाग 3

ग्रहण-आदेश

क-आवेदनों पर ग्रहण-आदेश

20. ग्रहण-आदेश के लिए आवेदन-(1) ग्रहण-आदेश के लिए आवेदन निम्नलिखित व्यक्ति कर सकेगा: -

(क) मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का भारसाधक चिकित्सा अधिकारी; या

(ख) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का पति, पत्नी या उसका नातेदार । 

(2) जहां किसी ऐसे मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के, जिसमें मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का उपचार अस्थायी उपचार आदेश के अधीन हो रहा है, भारसाधक चिकित्सा अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि: -

(क) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति इस प्रकार के और इस हद तक मानसिक विकार से ग्रस्त है कि, यथास्थिति, मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में उसका उपचार छह मास से अधिक के लिए करते रहना आवश्यक है; या 

(ख) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसकी वैयक्तिक सुरक्षा या अन्य व्यक्तियों की सुरक्षा के हित में यह आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति को मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध रखा जाए, वहां वह उस मजिस्ट्रेट को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर यथास्थिति,मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह स्थित है यथास्थिति ऐसे मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का ग्रहण-आदेश के अधीन निरोध किए जाने के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(3) उपधारा (5) के उपबंधों के अधीन रहते हुए ऐसे व्यक्ति का जिनके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, पति या पत्नी या जब कोई पति या पत्नी नहीं है या जब पति या पत्नी किसी बीमारी या भारत में अनुपस्थिति के कारण या अन्यथा आवेदन करने से निवारित हो जाती है, तो ऐसे व्यक्ति का कोई अन्य नातेदार उस मजिस्ट्रेट के समक्ष, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर उक्त व्यक्ति सामान्यतः निवास करता है, मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में ग्रहण आदेश के अधीन उस व्यक्ति के निरोध के लिए जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, आवेदन कर सकेगा ।

(4) जहां ऐसे व्यक्ति का, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, पति या पत्नी, आवेदक नहीं है, वहां आवेदन में पति या पत्नी द्वारा आवेदन न किए जाने के कारणों का उल्लेख किया जाएगा और उसमें उस व्यक्ति से, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, आवेदक की नातेदारी का और आवेदन करने की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया जाएगा ।

(5) कोई भी व्यक्ति: -

(1) जो अवयस्क है, या

(2) जिसने आवेदन करने की तारीख से पूर्व, चौदह दिन के भीतर उस व्यक्ति को नहीं देखा है जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है,

इस धारा के अधीन आवेदन नहीं करेगा ।

(6) उपधारा (3) के अधीन प्रत्येक आवेदन विहित प्ररूप में किया जाएगा और विहित रीति से हस्ताक्षरित और सत्यापित किया जाएगा और उसमें यह कथन किया जाएगा कि क्या उस व्यक्ति की, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, मानसिक दशा की जांच के लिए कोई आवेदन पहले किया गया है या नहीं और उसके साथ दो चिकित्सा व्यवसायियों के, जिनमें से एक चिकित्सा व्यवसायी सरकार की सेवा में होगा, चिकित्सीय प्रमाणपत्र संलग्न किए जाएंगे । 

21. चिकित्सा प्रमाणपत्रों का प्ररूप और विषयवस्तु-धारा 20 की उपधारा (6) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक चिकित्सा प्रमाणपत्र में यह कथन होगा कि- 

(क) उस उपधारा में निर्दिष्ट प्रत्येक चिकित्सा व्यवसायी ने स्वतंत्र रूप से उस व्यक्ति की परीक्षा कर ली है जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है और अपने स्वयं के संप्रेक्षणों तथा उसको संसूचित की गई विशिष्टियों के आधार पर अपनी राय बना ली है; और 

(ख) ऐसे प्रत्येक चिकित्सा व्यवसायी की राय में वह व्यक्ति, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, इस प्रकार के और इस हद तक मानसिक विकार से ग्रस्त है कि उसको किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध करना आवश्यक है और ऐसा निरोध उस व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसकी वैयक्तिक सुरक्षा या अन्य व्यक्तियों के संरक्षण के हित में आवश्यक है ।

22. ग्रहण-आदेश के लिए आवेदन के संबंध में प्रक्रिया-(1) धारा 20 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर यदि मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि-

(i) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति इस प्रकार के और इस हद तक मानसिक विकार से ग्रस्त है कि उसके उपचार के लिए किसी मनश्चिकित्सीय अस्तपाल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में उसको निरुद्ध करना आवश्यक है, या 

(ii) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसकी वैयक्तिक सुरक्षा या अन्य व्यक्तियों के संरक्षण के हित में यह आवश्यक है कि उसे ऐसे निरुद्ध किया जाए, और मामले की परिस्थितियों में अस्थायी उपचार आदेश पर्याप्त नहीं होगा तथा ग्रहण-आदेश किया जाना आवश्यक है,

तो वह ग्रहण-आदेश कर सकेगा ।

(2) धारा 20 की उपधारा (3) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर मजिस्ट्रेट आवेदन में किए गए कथनों पर और उस मानसिक बीमारी के साक्ष्य पर विचार करेगा जो चिकित्सा प्रमाणपत्रों से प्रकट होती है । 

(3) यदि मजिस्ट्रेट यह समझता है कि आगे कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है, तो वह स्वयं उस व्यक्ति की, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, परीक्षा करेगा जब तक कि वह ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह नहीं समझता है कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन नहीं है । 

(4) यदि मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि ग्रहण-आदेश उचित रूप से तुरंत किया जा सकता है, तो वह ऐसा आदेश कर सकेगा, और यदि मजिस्ट्रेट का ऐसा समाधान नहीं होता है तो वह आवेदन पर आगे विचार के लिए तारीख नियत करेगा और उस व्यक्ति के संबंध में जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, ऐसी जांच कर सकेगा जो वह ठीक समझे । 

(5) उपधारा (4) के अधीन नियत तारीख की सूचना आवेदक को और किसी अन्य व्यक्ति को दी जाएगी जिसको मजिस्ट्रेट की राय में ऐसी सूचना दी जानी चाहिए । 

(6) यदि मजिस्ट्रेट उपधारा (4) के अधीन आवेदन पर आगे विचार करने के लिए तारीख नियत करता है तो वह आवेदन का निपटारा होने तक उस व्यक्ति की जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, समुचित देख-रेख और अभिरक्षा के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे । 

(7) उपधारा (4) के अधीन नियत तारीख को या ऐसी आगे की तारीख को जो मजिस्ट्रेट द्वारा नियत की जाए, वह बंद कमरे में निम्नलिखित व्यक्तियों की उपस्थिति मेंआवेदन पर विचार करेगा:

(i) आवेदक; 

(ii) वह व्यक्ति जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है (जब तक कि मजिस्ट्रेट स्वविवेकानुसार अन्यथा निदेश न दे); 

(iii) वह व्यक्ति, जिसको वह व्यक्ति, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त करे; और

(iv) ऐसा अन्य व्यक्ति जिसे मजिस्ट्रेट ठीक समझे, 

और यदि मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि जिस व्यक्ति के बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है और जिसके संबंध में आवदेन किया गया है मानसिक रूप से इतना बीमार है कि उस व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसके वैयक्तिक क्षेम के हित में या अन्य व्यक्तियों के संरक्षण के लिए उसे किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में उपचार के लिए निरुद्ध करना आवश्यक है तो वह उस प्रयोजन के लिए ग्रहण-आदेश पारित कर सकेगा और यदि उसका ऐसे समाधान नहीं होता है तो वह आवेदन खारिज कर देगा और ऐसे किसी आदेश में स्वयं आवेदक द्वारा या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपदा में से जांच के ऐसे खर्चों का भुगतान किए जाने का जो मजिस्ट्रेट उपयुक्त समझे, उपबंध किया जा सकेगा ।

                (8)  यदि आवेदन उपधारा (7) के अधीन खारिज कर दिया जाता है तो मजिस्ट्रेट ऐसी खारिजी के कारणों को लेखबद्ध करेगा और आदेश की एक प्रति आवेदक को दी जाएगी ।

                ख-मजिस्ट्रेट के समक्ष मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के पेश किए जाने पर ग्रहण-आदेश  

23. पुलिस अधिकारियों की कतिपय मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के संबंध में शक्तियां और कर्तव्य-(1) पुलिस थाने का प्रत्येक भारसाधक अधिकारी, - 

(क) अपने थाने की सीमाओं के भीतर इधर-उधर घूमते-फिरते पाए गए किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी संरक्षा में ले सकेगा या लिवा सकेगा जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि वह व्यक्ति मानसिक रूप से इतना बीमार है कि वह स्वयं अपनी देख-रेख करने में असमर्थ है; और 

(ख) अपने थाने की सीमाओं के भीतर किसी ऐसे व्यक्ति को संरक्षा में ले सकेगा या लिवा सकेगा जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि वह मानसिक बीमारी के कारण खतरनाक है । 

(2) उपधारा (1) के अधीन संरक्षा में लिए गए किसी व्यक्ति को, ऐसी संरक्षा में लिए जाने के आधारों की यथाशीघ्र, सूचना दिए बिना या जहां ऐसे व्यक्ति को संरक्षा में लेने वाले अधिकारी की राय में ऐसा व्यक्ति उन आधारों को समझने में समर्थ नहीं है, वहां उसके नातेदारों या मित्रों को, यदि काई हो, ऐसे आधारों की सूचना दिए बिना पुलिस द्वारा निरुद्ध नहीं किया जाएगा । 

(3) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो इस धारा के अधीन संरक्षा में लिया जाता है या निरुद्ध किया जाता है ऐसी संस्था में उसके लिए जाने के चौबीस घंटे की अवधि के भीतर, जिसमें से वह समय निकाल दिया जाएगा जो उस स्थान से जहां वह ऐसी संरक्षा में लिया गया था, मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक हो, निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और वह मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक निरुद्ध नहीं किया जाएगा । 

24. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के पेश किए जाने पर प्रक्रिया-(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है और यदि उसकी राय में आगे कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है तो मजिस्ट्रेट, -

(क) उसकी समझने की सामर्थ्य जानने के लिए उसकी परीक्षा करेगा;

(ख) किसी चिकित्सा अधिकारी से उसकी परीक्षा कराएगा; और 

(ग) ऐसे व्यक्ति के संबंध में ऐसी जांच करेगा जो वह आवश्यक समझे । 

(2) उपधारा (1) के अधीन कार्यवाहियां पूरी हो जाने के पश्चात् मजिस्ट्रेट किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में उक्त व्यक्ति के निरोध को प्राधिकृत करने वाला ग्रहण-आदेश निम्नलिखित दशा में पारित कर सकेगा: - 

(क) यदि चिकित्सा अधिकारी ऐसे व्यक्ति के बारे में यह प्रमाणित करता है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति     है; और 

(ख) यदि मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि उक्त व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति है और उस व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसके वैयक्तिक क्षेम के हित में या अन्य व्यक्तियों के संरक्षण के लिए ऐसा आदेश पारित करना आवश्यक है:

                परंतु यदि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का कोई नातेदार या मित्र यह चाहता है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को उपचार के लिए विशिष्ट रूप से अनुज्ञप्त किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या अनुज्ञात मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भेजा जाना चाहिए और वह ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण का खर्च चुकाने के लिए मजिस्ट्रेट के समाधानप्रद रूप में लिखित रूप से वचनबद्ध होता है तो मजिस्ट्रेट, ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी के सहमत होने पर उस अस्पताल या परिचर्या गृह में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की भर्त्ती के लिए और उसमें उसके निरोध के लिए ग्रहण-आदेश करेगा :

                परंतु यह और कि यदि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का कोई नातेदार या मित्र, उतनी रकम का, जितनी मजिस्ट्रेट अवधारित करे प्रतिभुओं सहित या उनके बिना कोई बंधपत्र लिखता है जिसमें यह वचन दिया जाता है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और उसे स्वयं को या दूसरों को कोई क्षति पहुंचाने से रोका जाएगा, तो मजिस्ट्रेट ग्रहण-आदेश करने के बजाय उसे उसके नातेदार या मित्र की देख-रेख में सौंप सकेगा ।   

25. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के साथ क्रूरता का व्यवहार किए जाने या उसे समुचित देख-रेख और नियंत्रण में रखे जाने की दशा में आदेश-(1) पुलिस थाने का प्रत्येक भारसाधक अधिकारी जिसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि उसके थाने की सीमाओं के भीतर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार है और वह समुचित देख-रेख और नियंत्रण में नहीं है या कोई नातेदार या कोई अन्य व्यक्ति जो ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भारसाधक है, उसके साथ क्रूरता का व्यवहार कर रहा है या उसकी उपेक्षा कर रहा है तो वह ऐसे मजिस्ट्रेट को, जिसकी स्थानीय सीमाओं के भीतर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति निवास करता है, इस तथ्य की तुरंत रिपोर्ट देगा । 

(2) ऐसा कोई प्राइवेट व्यक्ति जिसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार है और वह समुचित देख-रेख और नियंत्रण में नहीं है या मानसिक रूप से बीमार ऐसे व्यक्ति को भारसाधन में रखने वाले किसी नातेदार या अन्य व्यक्ति द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है या उसकी उपेक्षा की जाती है तो वह इस तथ्य की रिपोर्ट उस मजिस्ट्रेट को करेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति निवास करता है । 

(3) यदि मजिस्ट्रेट को पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट पर या किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त रिपोर्ट या सूचना के आधार पर या अन्यथा यह प्रतीत होता है कि उसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मानसिक रूप से बीमार कोई व्यक्ति समुचित देख-रेख और नियंत्रण में नहीं है या उसको भारसाधन में रखने वाला कोई नातेदार या कोई अन्य व्यक्ति है उसके साथ क्रूरता का व्यवहार कर रहा है या उसकी उपेक्षा कर रहा है तो मजिस्ट्रेट मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अपने समक्ष पेश करा सकेगा और ऐसे नातेदार या अन्य व्यक्ति को समन कर सकेगा जो ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भारसाधक है या जिसे भारसाधक होना चाहिए था ।

(4) यदि ऐसा नातेदार या कोई अन्य व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है तो मजिस्ट्रेट आदेश द्वारा ऐसा नातेदार या अन्य व्यक्ति से ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की समुचित देख-रेख करने की अपेक्षा कर सकेगा और जहां ऐसा कोई नातेदार या अन्य व्यक्ति जानबूझकर उक्त आदेश का अनुपालन करने में उपेक्षा करेगा वहां वह जुर्माने से जो दो हजाए रुपए तक हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

(5) यदि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण करने के लिए वैध रूप से आबद्ध हो या यदि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए वैद्य रूप से आबद्ध व्यक्ति ऐसे व्यक्ति का भरण-पोषण करने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है या किसी अन्य कारणवश मजिस्ट्रेट ऐसा करना आवश्यक समझे तो वह मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अपने समक्ष पेश करा सकेगा, और ऐसी किसी कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो उपधारा (4) के अधीन की जाए, धारा 24 में उपबंधित रीति से इस प्रकार कार्यवाही कर सकेगा मानो ऐसा व्यक्ति धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन उसके समक्ष पेश किया गया हो ।

ग-कतिपय मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की भर्ती और निरोध से संबंधित अतिरिक्त उपबंध

26. समीक्षण के पश्चात् अंतरंग रोगी के रूप में भर्ती-यदि किसी जिला न्यायालय की, जो अध्याय 6 के अधीन कोई जांच किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में कोई समीक्षण कर रहा है, जो मानसिक रूप से बीमार पाया गया है यह राय है कि ऐसे व्यक्ति के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि उस व्यक्ति को किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मानश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में भर्ती किया जाए और उसमें रखा जाए और जिला न्यायालय ऐसे प्रत्येक आदेश में समय-समय पर परिवर्तन या उसे प्रतिसंहृत कर सकेगा ।

27. मानसिक रूप से बीमार बंदी की भर्ती और निरोध-बंदी अधिनियम, 1900 (1900 का 31) की धारा 30 के अधीन या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) की धारा 144 के अधीन या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) की धारा 145 के अधीन या नौ सेना अधिनियम 1957 (1957 का 62) की धारा 143 अथवा 144 के अधीन, या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 330 या धारा 335 के अधीन कोई आदेश जिसमें मानसिक रूप से बीमार बंदी के किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में प्रवेश के लिए निदेश दिया गया है, इस बात के लिए पर्याप्त रूप से प्राधिकार देने वाला होगा, कि उसे ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह में या किसी ऐसे अन्य मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में जहां वह निरुद्ध किए जाने के लिए विधिपूर्वक अंतरित किया जा सकता है, प्रवेश मिले । 

28. चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट लंबित रहने तक उस व्यक्ति का निरोध जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है-(1) जब कोई ऐसा व्यक्ति जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, धारा 23 या 25 के अधीन मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होता है, या लाया जाता हे, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति का, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, किसी साधारण अस्पताल या साधारण परिचर्या गृह या मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के संप्रेक्षण वार्ड में या किसी समुचित स्थान में समुचित चिकित्सीय अभिरक्षा के अधीन दस दिन से अनधिक ऐसी अवधि के लिए निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत कर सकेगा जो मजिस्ट्रेट किसी चिकित्सा अधिकारी द्वारा यह अवधारित कर सकने के लिए आवश्यक समझे कि क्या उस व्यक्ति का, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है धारा 24 की उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन चिकित्सा प्रमाणपत्र उचित रूप से दिया जा सकता है । 

(2) मजिस्ट्रेट, उपधारा (1) में उल्लिखित प्रयोजन के लिए समय-समय पर लिखित आदेश द्वारा, उस व्यक्ति का जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, ऐसी अवधि के लिए और निरोध प्राधिकृत कर सकेगा जो वह ठीक समझे किंतु यह अवधि एक बार में दस दिन से अधिक की नहीं होगी: 

परंतु ऐसा कोई प्राधिकार नहीं दिया जाएगा जिससे कोई व्यक्ति इस उपधारा के अधीन कुल मिलाकर तीस दिन से अधिक की लगातार अवधि के लिए निरुद्ध किया जाए ।

29. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का तब तक निरोध जब तक उसे मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में नहीं ले जाया जाता-जब किसी मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 22, धारा 24, या धारा 25 के अधीन कोई ग्रहण-आदेश किया जाता है, तो वह उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, निदेश दे सकेगा कि वह मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति, जिसके संबंध में आदेश किया गया है, ऐसे स्थान में तीस दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो मजिस्ट्रेट ठीक समझे, तब तक निरुद्ध किया जाए जब तक कि उसे किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में नहीं ले जाया जाता । 

घ-इस अध्याय के अधीन आदेशों के संबंध में प्रकीर्ण उपबंध

30. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की चिकित्सीय परीक्षा का समय और रीति-जहां इस अध्याय के अधीन कोई आदेश चिकित्सीय प्रमाणपत्र के आधार पर किया जाना अपेक्षित है, वहां ऐसा आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उस व्यक्ति ने, जिसने चिकित्सीय प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर किया है या जहां ऐसा आदेश दो चिकित्सीय प्रमाणपत्रों के आधार पर किया जाना अपेक्षित है वहां संबंधित प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति यह प्रमाणित नहीं कर देता है कि उसने, -

(i) किसी ऐसे मामले में, जिसमें आवेदन पर आदेश किया गया है, ऐसा आवेदन किए जाने की तारीख से ठीक पूर्व दस दिन के भीतर; और

(ii) किसी अन्य मामले में, आदेश की तारीख से ठीक पूर्व दस दिन के भीतर,

उस व्यक्ति की, जिसके बारे में अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है स्वयं परीक्षा कर ली है:

                परंतु, जहां ग्रहण-आदेश दो चिकित्सीय प्रमाणपत्रों के आधार पर किया जाना अपेक्षित है, वहां ऐसा आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रमाणपत्रों में यह दर्शित न हो कि प्रत्येक प्रमाणपत्र पर हस्तारक्षर करने वाले व्यक्ति ने उस व्यक्ति की, जिसके बारे में यह अभिकथन है, कि वह मानसिक रूप से बीमार है, दूसरे प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति से स्वतंत्र रूप से परीक्षा कर ली है ।

31. ग्रहण-आदेश के लिए प्राधिकार-इस अध्याय के अधीन किया गया ग्रहण-आदेश इस बात के लिए पर्याप्त प्राधिकार होगा कि-

(i) आवेदक या उसके द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति, या 

(ii) ऐसे ग्रहण-आदेश की दशा में, जो आवेदन से अन्यथा किया गया है, आदेश करने वाले प्राधिकारी द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति;

मानसिक रूप, से बीमार व्यक्ति को, ऐसे आदेश में वर्णित स्थान पर ले जाए, या, यथास्थिति, आदेश में विनिर्दिष्ट मनश्चिकित्सीय अस्पताल में या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में उसकी भर्ती और उपचार के लिए अथवा उसमें या किसी ऐसे मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में जिसमें उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ले जाया जा सकता है उसके प्रवेश और निरोध के लिए ले जाए और भारसाधक चिकित्सा अधिकारी उन आदेशों का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा:

                परंतु यदि भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को यह प्रतीत हो कि मनश्चिकित्सीय अस्पताल में या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में, पर्याप्त जगह नहीं है तब वह उसकी भर्ती करने के पश्चात् उस तथ्य की जानकारी उस मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय को देगा जिसने आदेश पारित किया था और तब, यथास्थिति, वह मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे:

                परंतु यह और कि प्रत्येक ग्रहण-आदेश निम्नलिखित दशाओं में प्रभावी नहीं रहेगा जब-  

(क) आदेश किए जाने की तारीख से तीस दिन की समाप्ति पर जब तक उस अवधि में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को आदेश में वर्णित स्थान में भर्ती न कर लिया गया हो, और

(ख) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की छुट्टी हो जाने पर । 

32. भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को ग्रहण-आदेश की प्रति का भेजा जाना-ग्रहण-आदेश करने वाला प्रत्येक मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय उस मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को जिसमें ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की भर्ती की जानी है, ऐसे आदेश की प्रमाणित प्रति अपेक्षित चिकित्सा प्रमाणपत्रों और विशिष्टियों के विवरण के साथ भेजेगा ।

33. अस्थायी उपचार आदेश या ग्रहण-आदेश द्वारा जिन मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों में भर्ती का निदेश दिया जा सकता है उनके बारे में निर्बंधन-कोई मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय जिस राज्य में अधिकारिता का प्रयोग करता है, उस राज्य से बाहर वह मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अंतरंग रोगी के रूप में भर्ती करने या उसके निरोध के लिए     ग्रहण-आदेश पारित नहीं करेगा:

परंतु किसी अन्य राज्य में स्थित किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती या निरोध के लिए कोई आदेश तभी पारित किया जा सकेगा जब राज्य सरकार ने, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, और ऐसे अन्य राज्य की सरकार की सहमति अभिप्राप्त करने के पश्चात् उस निमित्त मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय को प्राधिकृत कर दिया हो ।

34. आदेश या दस्तावेज का संशोधन-यदि ग्रहण-आदेश के अधीन किसी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती करने के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि वह आदेश जिसके अधीन वह भर्ती किया गया था या निरुद्ध किया गया था या जिन दस्तावेजों के आधार पर ऐसा आदेश किया गया था उनमें से कोई दस्तावेज त्रुटिपूर्ण या गलत है, तो उसके पश्चात् किसी भी समय उक्त आदेश का संशोधन, उस मजिस्ट्रेट या जिला न्यायालय की अनुज्ञा से, उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों द्वारा किया जा सकेगा जिसने या जिन्होंने उस पर हस्ताक्षर किए थे, और ऐसा संशोधन किए जाने पर वह आदेश ऐसे प्रभावी होगा और सदैव ऐसे प्रभावी समझा जाएगा मानो, यथास्थिति, वह मूलतः इस प्रकार संशोधित रूप में ही किया गया था या जिन दस्तावेजों पर उक्त आदेश किया गया था वे मूलतः इस प्रकार संशोधित रूप में ही दिए गए थे । 

35. उस व्यक्ति के लिए प्रतिस्थानी नियुक्त करने की शक्ति, जिसके आवेदन पर ग्रहण-आदेश किया गया है-(1) इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, मजिस्ट्रेट, लिखित आदेश द्वारा (जिसे इसमें इनके पश्चात् प्रतिस्थापन आदेश कहा गया है) इस अधिनियम के अधीन ऐसे व्यक्ति के, जिसके, आवेदन पर ग्रहण-आदेश किया गया था, कर्तव्य और उत्तरदायित्व किसी अन्य ऐसे व्यक्ति को अंतरित कर सकेगा, जो उसका भार संभालने के लिए राजी है, और तब अन्य व्यक्ति इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए वह व्यक्ति समझा जाएगा जिसके आवदेन पर ग्रहण-आदेश किया गया था और इस अधिनियम के पश्चात्वर्ती व्यक्ति के प्रति किए गए सभी निर्देशों के तदनुसार अर्थ लगाए जाएंगे :

परंतु ऐसा कोई प्रतिस्थापन आदेश उस व्यक्ति को, जिसके आवेदन पर ग्रहण-आदेश किया गया था या, यदि उसकी मृत्यु हो गई है तो उसके विधिक प्रतिनिधियों को, प्रतिस्थापन आदेश की तारीख के पूर्व उपगत किसी दायित्व से मुक्त नहीं करेगा ।

(2) कोई प्रतिस्थापन आदेश करने से पूर्व मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को, जिसके आवेदन पर ग्रहण-आदेश किया गया था, यदि वह जीवित है तो, और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के उस नातेदार को सूचना भेजेगा जिसे मजिस्ट्रेट की राय में सूचना मिलनी चाहिए । 

(3) उपधारा (2) के अधीन सूचना में उस व्यक्ति का नाम, जिसके पक्ष में प्रतिस्थापन आदेश करने का प्रस्ताव है, और वह तारीख विनिर्दिष्ट की जाएगी (जो सूचना जारी की जाने की तारीख से बीस दिन से कम नहीं होगी) जिसको ऐसे आदेश किए जाने के संबंध में प्राप्त आक्षेपों पर, यदि कोई हो, विचार किया जाएगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख को या ऐसी किसी पश्चात्वर्ती तारीख को, जिसको कार्यवाहियां स्थगित की जाएं मजिस्ट्रेट किसी ऐसे आक्षेप पर विचार करेगा जो उस व्यक्ति द्वारा जिसे सूचना भेजी गई थी, या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के किसी अन्य नातेदार द्वारा किया गया था विचार करेगा और ऐसे सभी साक्ष्य लेगा, जो ऐसे किसी व्यक्ति या नातेदार द्वारा, या उनकी ओर से पेश किए जाएं और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो मजिस्ट्रेट ठीक समझे प्रतिस्थापन आदेश करेगा या करने से विरत रहेगा:

परंतु यदि उस व्यक्ति की, जिसके आवेदन पर ग्रहण-आदेश किया गया था, मृत्यु हो गई है और कोई अन्य व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन पूर्ववर्ती व्यक्ति के कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का जिम्मा लेने के लिए राजी है और मजिस्ट्रेट की राय में उसके योग्य है तो मजिस्ट्रेट उपधारा (1) के परंतुक में अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस आशय का आदेश करेगा । 

(5) मजिस्ट्रेट इस धारा के अधीन कोई प्रतिस्थापन आदेश करने में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के निकटतम नातेदार को अधिमान देगा किंतु तब नहीं देगा जब ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जांएगे, मजिस्ट्रेट यह समझता है कि ऐसा अधिमान देना मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के हित में नहीं होगा ।

(6) मजिस्ट्रेट इस धारा के अधीन जांच के खर्चों का संदाय किसी व्यक्ति द्वारा या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपदा में से किए जाने के लिए आदेश करेगा, जो वह ठीक समझे । 

(7) उपधारा (2) के अधीन कोई सूचना जिस व्यक्ति के लिए आशयित है उस व्यक्ति के अंतिम ज्ञात पते पर डाक द्वारा भेजी जा सकेगी ।                

36. कुछ धाराओं के अधीन मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए सक्षम अधिकारी-ऐसे किसी क्षेत्र में, जहां पुलिस आयुक्त नियुक्त किया गया है, वहां पुलिस आयुक्त धारा 23, 24, 25 और 28 के अधीन मजिस्ट्रेट की सभी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा और इन अधिनियम के अधीन पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के सभी कृत्यों का निर्वहन कोई ऐसा पुलिस अधिकारी कर सकेगा, जो निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो ।

अध्याय 5

मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों का निरीक्षण करना, उनको छुट्टी देना,

उन्हें अनुपस्थिति की इजाजत देना और उनको ले जाना

भाग 1

निरीक्षण

37. परिदर्शकों की नियुक्ति-(1) यथास्थिति, राज्य सरकार या केंद्रीय सरकार प्रत्येक मनश्चिकित्सीय अस्पताल और प्रत्येक मनश्चिकित्सक परिचर्या गृह के लिए कम से कम पांच परिदर्शक नियुक्त करेगी जिनमें से कम से कम एक चिकित्सा अधिकारी अधिमानतः मनश्चिकित्सीय होगा और दो सामाजिक कार्यकर्ता होंगे । 

(2) राज्य की चिकित्सीय सेवाओं का प्रधान या उसका नामनिर्देशिती अधिमानतः कोई मनश्चिकित्सीय राज्य में सभी मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों का पदेन परिदर्शक होगा । 

(3) उपधारा (1) के अधीन परिदर्शकों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की अर्हताएं तथा उनकी नियुक्ति के निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं । 

38. परिदर्शकों द्वारा मासिक निरीक्षण-कम से कम तीन परिदर्शक उस मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के जिसके संबंध में वे नियुक्त किए गए हैं, प्रत्येक भाग का, प्रत्येक मास में कम से कम एक बार, संयुक्त निरीक्षण करेंगे और धारा 17 के अधीन स्वैच्छिक रोगी के रूप में भर्ती किए गए प्रत्येक अवयस्क और, जहां तक उन परिस्थितियों से अनुमत हो उसमें भर्ती किए गए मानसिक रूप से बीमार प्रत्यक अन्य व्यक्ति की तथा संयुक्त निरीक्षण के तुरंत पश्चात् वहां भर्ती किए गए मानसिक रूप से बीमार प्रत्येक व्यक्ति के भर्ती आदेश की और उससे संबंधित चिकित्सीय प्रमाणपत्रों की परीक्षा करेंगे और उस प्रयोजन के लिए रखी गई एक पुस्तक में ऐसी टिप्पणियां दर्ज करेंगे जो वे ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह के प्रबंध और उसमें रखे अंतरण रोगियों की दशा के संबंध में समुचित समझे :

परंतु परिदर्शक किसी अंतरंग रोगी के ऐसे व्यक्तिगत अभिलेखों का निरीक्षण करने के हकदार नहीं होंगे, जो भारसाधक चिकित्सा अधिकारी की राय में गोपनीय हैं:

परंतु यह और कि यदि कोई परिदर्शक मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के, जिसकी बाबत वह परिदर्शक नियुक्त किया गया था, संयुक्त निरीक्षण में लगातार तीन मास तक भाग नहीं लेता है तो वह ऐसे परिदर्शक का पद धारण करने से प्रविरत हो जाएगा ।

39. मानसिक रूप से बीमार बंदियों का निरीक्षण-(1) धारा 38 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जहां कोई व्यक्ति वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) की धारा 144 या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) की धारा 145 या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) की धारा 143 या धारा 144 या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 330 अथवा     धारा 335 के उपबंधों के अधीन निरुद्ध किया गया है, वहां- 

(i) किसी जेल में निरुद्ध व्यक्ति की दशा में कारागार महानिरीक्षक; और

(ii) जहां मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में ऐसा व्यक्ति निरुद्ध है, वहां धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त सभी या उनमें से कोई तीन परिदर्शक जिनमें से कम से कम एक सामाजिक कार्यकर्ता है,

प्रत्येक तीन मास में एक बार उस व्यक्ति से उस स्थान पर, जहां उसे निरुद्ध किया गया है, उसकी मानसिक स्थिति के बारे में पता लगाने के लिए मुलाकात करेंगे और उसकी मानसिक स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट उस प्राधिकारी को देंगे जिसके आदेश के अधीन उसे इस प्रकार निरुद्ध किया गया है ।

(2) राज्य सरकार अपने अधिकारियों में से किसी को उपधारा (1) के अधीन कारागार महानिरीक्षक के सभी या किन्हीं कृत्यों का निर्वहन करने के लिए सशक्त कर सकेगी ।  

(3) जिस मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का भारसाधक अधिकारी, जिसमें उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति निरुद्ध किया गया है प्रत्येक छह मास में एक बार ऐसे व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक दशा के बारे में एक विशेष रिपोर्ट उस प्राधिकारी को देगा, जिसके आदेश के अधीन उसे निरुद्ध किया गया है । 

(4) मनश्चिकित्सीय प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट विभिन्न अधिनियमों के उपबंधों के अधीन जेल में निरुद्ध किया गया है, प्रत्येक तीन मास से कम से कम एक बार मुलाकात करेगा या जहां मनश्चित्सक उपलब्ध नहीं हैं वहां राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त चिकित्सा अधिकारी उससे मुलाकात करेगा और, यथास्थिति, ऐसा मनश्चित्सक या ऐसा चिकित्सा अधिकारी ऐसे व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक दशा के बारे में एक विशेष रिपोर्ट उस प्राधिकारी को देगा, जिसके आदेश के अधीन उसे निरुद्ध किया गया है ।

भाग 2

छुट्टी देना

40. भारसाधक चिकित्सा अधिकारी द्वारा छूट्टी देने का आदेश-(1) अध्याय 4 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का भारसाधक चिकित्सा अधिकारी, दो चिकित्सा व्यवसायियों की सिफारिश पर, जिनमें से एक अधिमानतः मनश्चिकित्सक होगा, लिखित आदेश द्वारा स्वैच्छिक रोगी से भिन्न किसी ऐसे व्यक्ति की छुट्टी देने का निदेश दे सकेगा जो वहां निरुद्ध है या जिसका वहां अंतरंग रोगी के रूप में उपचार हो रहा है और तब ऐसे व्यक्ति को मनश्चकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह से छूट्टी दे दी जाएगी :

 परंतु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश मानसिक रूप से बीमार बंदी के संबंध में बंदी अधिनियम, 1900 (1900 का 3) की धारा 30 में और किसी अन्य सुसंगत विधि में जैसा उपबंधित है उसी के अनुसार किया जाएगा, अन्यथा नहीं । 

(2) जहां किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में, जो किसी प्राधिकारी के आदेश के अनुसरण में निरुद्ध किया गया है या जिसका अंतरंग रोगी के रूप में उपचार हो रहा है, उपधारा (1) के अधीन छुट्टी देने का कोई आदेश किया गया है, वहां भारसाधक चिकित्सा अधिकारी उस प्राधिकारी को ऐसे आदेश की प्रति तुरंत भेजेगा । 

41. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को आवेदन पर छुट्टी देना-इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आवेदन के अनुसरण में किए गए आदेश के अधीन मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध किसी व्यक्ति को छुट्टी तब दी जाएगी जब वह व्यक्ति जिसके आवेदन पर, ऐसा आदेश किया गया था, भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को इस निमित्त आवेदन करेः

परंतु यदि भारसाधक चिकित्सा अधिकारी लिखित रूप में यह प्रमाणित करता है कि वह व्यक्ति खतरनाक है और स्वतंत्र छोड़े जाने के योग्य नहीं है तो उसको इस धारा के अधीन छुट्टी नहीं दी जाएगी ।

42. नातेदारों या मित्रों द्वारा सम्यक् देख-रेख करने का वचन देने पर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को छूट्टी देने का आदेश-(1) जहां धारा 22, धारा 24 या धारा 25 के अधीन मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का कोई नातेदार या मित्र यह चाहता है कि ऐसे व्यक्ति को उसकी देख-रेख और अभिरक्षा में दे दिया जाए,तो वह भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को आवेदन कर सकेगा, जो उसे उस पर अपनी टिप्पणियों सहित उस प्राधिकारी को भेजेगा जिसके आदेशों के अधीन मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति निरुद्ध किया गया है । 

(2) जब उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन प्राप्त होता है तब प्राधिकारी ऐसे नातेदार या मित्र द्वारा जो ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की उचित देख-रेख करने का वचन दे और यह सुनिश्चित करे कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अपनी या किसी अन्य को क्षतिकारित करने से रोका जाएगा, प्रतिभुओं सहित या रहित उतनी रकम का जितनी ऐसा प्राधिकारी इर निमित्त विनिर्दिष्ट करे, बंधपत्र दिए जाने पर, छुट्टी करने का आदेश करेगा और तब मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को छुट्टी दे दी जाएगी । 

43. निरुद्ध व्यक्ति की प्रार्थना पर उसको छुट्टी देना-(1) इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश के अनुसरण में निरुद्ध कोई व्यक्ति (जो मानसिक रूप से बीमार बंदी नहीं है), जो यह अनुभव करता है कि उसकी मानसिक बीमारी ठीक हो गई है, जहां इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन आवश्यक हो, मजिस्ट्रेट को मनश्चकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह से अपनी छुट्टी के लिए आवेदन कर सकेगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन के समर्थन में उस मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी का, जहां आवेदक का उपचार हो रहा है, या किसी मनश्चिकित्सक का प्रमाणपत्र दिया जाएगा । 

(3) मजिस्ट्रेट ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, उस व्यक्ति को छुट्टी देने वाला या आवेदन को खारिज करने वाला आदेश पारित कर सकेगा ।

44. ऐसे व्यक्ति को छुट्टी देना जो बाद में समीक्षण किए जाने पर स्वस्थचित्त पाया जाए-यदि इस अधिनियम के अधीन किए गए ग्रहण अनुदेश के अनुसरण में मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध किसी व्यक्ति के बारे में  अध्याय 6 के उपबंधों के अनुसार बाद में किए गए समीक्षण पर यह पाया जाता है कि वह स्वस्थचित है या अपनी देख-रेख करने और अपने कार्यकलापों का प्रबंध करने में समर्थ हैं, तो भारसाधक चिकित्सा अधिकारी ऐसे निष्कर्ष की प्रति पेश किए जाने पर, जो जिला न्यायालय द्वारा सम्यक् रूप से प्रमाणित हो उस व्यक्ति को ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह से तत्काल छुट्टी दे देगा ।

भाग 3

अनुपस्थिति की इजाजत

45. अनुपस्थिति की इजाजत-(1) मानसिक रूप से बीमार ऐसे व्यक्ति की ओर से (जो मानसिक रूप से बीमार बंदी नहीं है) जिसका उपचार किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में हो रहा है, अनुपस्थिति की इजाजत के लिए आवेदन भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को निम्नलिखित द्वारा किया जा सकेगा, अर्थात्: - 

(क) उस व्यक्ति की दशा में, जो ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के पति या पत्नी के आवेदन पर भर्ती किया गया था, वहां ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के पति या पत्नी द्वारा या, जहां मानसिक या शारीरिक बीमारी या भारत में अनुपस्थिति के कारण या अन्यथा, पतिप्र्-पत्नी ऐसा आवेदन करने की स्थिति में नहीं है, वहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के ऐसे किसी नातेदार द्वारा, जिसको पति या पत्नी ने सम्यक् रूप से प्राधिकृत किया हो, या 

(ख) किसी व्यक्ति की दशा में, उस व्यक्ति द्वारा जिसके आवेदन पर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति भर्ती किया गया था:

                परन्तु जिस व्यक्ति ने वयस्कता की आयु प्राप्त नहीं कर ली है, वह इस उपधारा के अधीन कोई आवेदन नहीं करेगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन के साथ, प्रतिभुओं सहित या रहित उतनी रकम का एक बंधपत्र होगा जितनी भारसाधक अधिकारी विनिर्दिष्ट करे और उसमें निम्नलिखित बातों के लिए वचन दिया गया होगा-

(i) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की उचित देख-रेख करना;

(ii) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अपनी या अन्य व्यक्तियों की क्षति करने से निवारित करना; और 

                                (iii) अनुपस्थिति की इजाजत की अवधि की समाप्ति पर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को, यथास्थिति, मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में वापस लाना ।

(3) उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर भारसाधक चिकित्सा अधिकारी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को ऐसी अवधि के लिए जो भारसाधक चिकित्सा अधिकारी आवश्यक समझे और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसके वैयक्ितक क्षेम के हित में अथवा दूसरों के संरक्षण के लिए आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, अनुपस्थिति की इजाजत दे सकेगा:

परंतु उन दिनों की कुल संख्या जिनके लिए इस उपधारा के अधीन किसी रोगी को अनुपस्थिति की इजाजत दी जा सकेगी, साठ दिन से अधिक नहीं होगी ।

(4) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को इस धारा के अधीन उसे दी गई अनुपस्थिति की इजाजत की समाप्ति पर मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में वापस नहीं लाया जाता है, वहां भारसाधक चिकित्सा अधिकारी तुरंत उस तथ्य की रिपोर्ट उस मजिस्ट्रेट को करेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर ऐसा अस्पताल या परिचर्या गृह स्थित है और मजिस्ट्रेट, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे उसे, यथास्थिति, मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में वापस लाए जाने का निदेश देने वाला आदेश कर सकेगा । 

(5) इस धारा की कोई बात धारा 15 या धारा 16 में निर्दिष्ट स्वैच्छिक रोगी को लागू नहीं होगी और धारा 18 के उपबन्ध उसको लागू होंगे । 

46. मजिस्ट्रेट द्वारा अनुपस्थिति की इजाजत दिया जाना-(1) जहां भारसाधक चिकित्सा अधिकारी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को धारा 45 के अधीन अनुपस्थिति की इजाजत देने से इंकार करता है वहां आवेदक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अनुपस्थिति की इजाजत देने के लिए उस मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह स्थित है, जिसमें मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति निरुद्ध किया गया है और यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है तो वह आवेदक द्वारा उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार बंधपत्र निष्पादित किए जाने पर, आदेश द्वारा, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, अनुपस्थिति की इजाजत दे सकेगा । 

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक बंधपत्र प्रतिभूतों सहित या रहित और उतनी रकम के लिए होगा जितनी मजिस्ट्रेट विनिश्चित करे और उसमें उन बातों के लिए वचनबंध किया जाएगा जो धारा 45 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट है । 

(3) मजिस्ट्रेट अपने आदेश की एक प्रति भारसाधक चिकित्सा अधिकारी को भेजेगा और ऐसे आदेश की प्राप्ति पर भारसाधक चिकित्सा अधिकारी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को उस व्यक्ति को सौंप देगा, जिसके आवेदन पर इस धारा के अधीन अनुपस्थिति की इजाजत दी गई है । 

भाग 4

ले जाया जाना

47. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को एक मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह से दूसरे मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में ले जाया जाना- (1) मानसिक रूप से बीमार कोई व्यक्ति, जो धारा 15 या धारा 16 में निर्दिष्ट स्वैच्छिक रोगी नहीं है, राज्य सरकार के किसी साधारण या विशेष आदेश के अधीन रहते हुए, किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह से उस राज्य के भीतर किसी अन्य मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह या किसी अन्य राज्य में उस राज्य सरकार की सहमति से किसी अन्य मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में ले जाया जा सकेगा :

परंतु मानसिक रूप से बीमार कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन किए गए आवेदन के अनुसरण में दिए गए आदेश के अधीन किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में भर्ती किया गया है, तब तक नहीं ले जाया जाएगा, जब तक उसकी इत्तिला आवेदक को न दे दी गई हो ।

(2) राज्य सरकार मानसिक रूप से बीमार किसी बंदी को, उस स्थान से जहां उसे तत्समय निरुद्ध किया गया है, राज्य के किसी अन्य मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह, जेल या सुरक्षित अभिरक्षा के किसी अन्य स्थान में या किसी अन्य राज्य में उस राज्य सरकार की सहमति से उसके मनश्चिकित्सीय अस्पताल, मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह, जेल या सुरक्षित अभिरक्षा के किसी अन्य स्थान में ले जाए जाने का निदेश देने वाला ऐसा साधारण या विशेष आदेश कर सकेगी जो वह ठीक सझमे ।

48. भर्ती, निरोध और कुछ दशाओं में पकड़ कर वापस ले जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश के अधीन किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में लाया गया है, वहां यथास्थिति, तब तक निरुद्ध रखा जा सकेगा या अंतरंग रोगी के रूप में भर्ती किया जा सकेगा जब तक कि वहां से उसे किसी विधि के अधीन ले जाया नहीं जाता है या उसको छुट्टी नहीं दी जाती है और ऐसे अस्पताल या परिचर्या गृह से उसके निकल भागने की दशा में, उसे किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अथवा उस अस्पताल या परिचर्या गृह के भारसाधक चिकित्सा अधिकारी या किसी अन्य अधिकारी या सेवक द्वारा या भारसाधक चिकित्सा अधिकारी द्वारा उस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पकड़कर वापस लाया जा सकेगा और उस अस्पताल या परिचर्या गृह में उसे, यथास्थिति, ले जाया जा सकेगा, प्रवेश दिया जा सकेगा और उसे निरुद्ध किया जा सकेगा या अंतरंग रोगी के रूप में रखा जा सकेगा :

परंतु मानिसक रूप से बीमार ऐसे व्यक्ति की दशा में (जो मानसिक रूप से बीमार बंदी नहीं है), इस धारा के अधीन पकड़ कर वापस लाने की उक्त शक्ति का उसके निकल भागने की तारीख से एक मास की अवधि की समाप्ति के पश्चात् प्रयोग नहीं किया जा सकेगा ।  

49. मजिस्ट्रेट के आदेश से अपील-कोई व्यक्ति, जो मजिस्ट्रेट द्वारा पूर्वगामी उपबंधों में से किसी के अधीन पारित किसी आदेश से व्यथित है, उस आदेश के विरुद्ध अपील, उस आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर उस जिला न्यायालय को कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमओं के भीतर उस मजिस्ट्रेट ने शक्तियों का प्रयोग किया था और ऐसी अपील पर जिला न्यायालय का विनिश्चय अंतिम होगा । 

 

अध्याय 6

संपत्ति का कब्जा रखने वाले ऐसे व्यक्ति के संबंध में न्यायिकसमीक्षण जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है और उसके शरीर की अभिरक्षा तथा उसकी सम्पत्ति का प्रबंध

50. न्यायिक समीक्षण के लिए आवेदन-(1) जहां किसी ऐसे व्यक्ति के कब्जे में संपत्ति है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, वहां उसकी मानसिक दशा के बारे में समीक्षण करने के लिए आवेदन या तो- 

(क) उसका कोई नातेदार, या

(ख) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 93) के अधीन नियुक्त लोक रक्षक, या 

(ग) उस राज्य का महाधिवक्ता, जिस राज्य में वह व्यक्ति जिसके बारे में वह अभिकथन है कि वह बीमार है, निवास करता है, या 

(घ) जिस व्यक्ति के बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, उसकी संपत्ति में जहां भूमि है या भूमि में उसका हित है या जहां संपत्ति या उसका कोई भाग इस प्रकार का है कि उस राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित प्रतिपाल्य-अधिकरण को उसे प्रबंध के लिए विधिपूर्वक सौंपा जा सकता है, वहां उस जिले का कलक्टर, जिसमें ऐसी भूमि स्थित है,

उस जिला न्यायालय को कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमओं के भीतर वह व्यक्ति निवास करता है जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है ।  

(2)  उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर जिला न्यायालय उस व्यक्ति पर, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, व्यक्तिगत तामील द्वारा या तामील की ऐसी अन्य रीति से, जो वह ठीक समझे, यह सूचना तामील करेगा कि वह ऐसे स्थान और समय पर हाजिर हो, जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, या वैसी ही रीति से, उस व्यक्ति को जिसकी अभिरक्षा में वह व्यक्ति है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, यह सूचना तामील करेगा कि वह उस व्यक्ति को उक्त स्थान और उक्त समय पर पेश करे जिससे कि उसकी परीक्षा जिला न्यायालय या कोई ऐसा अन्य व्यक्ति कर सके जिससे जिला न्यायालय मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के बारे में रिपोर्ट मांग सकेगा :

परंतु यदि वह व्यक्ति जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है ऐसी स्त्री है, जो उस क्षेत्र में, जहां वह निवास करती है, प्रचलित रूढ़ि के अनुसार या जो उसका धर्म है, उस धर्म के अनुसार लोगों के सामने आने के लिए विवश नहीं की जानी चाहिए, तो जिला न्यायालय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में उपबंधित रूप में कमीशन निकाल कर उसकी परीक्षा करवा करेगा । 

(3) उपधारा (2) के अधीन सूचना की प्रति आवेदक पर और जिस व्यक्ति के बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, उसके नातेदार पर या ऐसे अन्य व्यक्ति पर भी तामील की जाएगी जो जिला न्यायालय की राय में ऐसा व्यक्ति है जिसे जिला न्यायालय द्वारा किए जाने वाले भयायिक समीक्षण की सूचना मिले । 

(4) ऐसे समीक्षण के प्रयोजन के लिए, जिसके लिए आवेदन किया गया है, जिला न्यायालय दो या अधिक व्यक्तियों को असेसरों के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगा । 

51. ऐसे विवाद्यक जिनके बारे में जिला न्यायालय को समीक्षण के पश्चात् अपना निष्कर्ष देना चाहिए-समीक्षण पूरा हो जाने पर जिला न्यायालय निम्नलिखित विषयों के बारे में अपने निष्कर्ष अभिलिखित करेगा: - 

(i) क्या वह व्यक्ति, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, वास्तव में मानसिक रूप से बीमार है या नहीं, और

(ii) जहां ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार है वहां क्या वह स्वयं अपनी देख-रेख करने और अपनी संपत्ति का प्रबंध करने में असमर्थ है, या क्या वह केवल अपनी संपत्ति का प्रबंध करने में असमर्थ है ।

52. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संरक्षक और संपत्ति के प्रबंधक की नियुक्ति के लिए उपबंध-(1) जहां जिला न्यायालय यह निष्कर्ष अभिलिखित करता है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, वास्तव में मानसिक रूप से बीमार है और अपनी देख-रेख करने तथा अपनी संपत्ति का प्रबंध करने में असमर्थ है, वहां धारा 53  के अधीन उसके शरीर की देख-रेख करने के लिए संरक्षक की और धारा 54 के अधीन उसकी संपत्ति का प्रबंध करने के लिए प्रबंधक की नियुक्ति का आदेश करेगा ।

(2) जहां जिला न्यायालय यह निष्कर्ष अभिलिखित करता है कि वह व्यक्ति, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, वास्तव में मानसिक रूप से बीमार है, और अपनी संपत्ति का प्रबंध करने में असमर्थ है, किंतु वह अपनी स्वयं की देख-रेख करने में समर्थ है तो वह उसकी संपत्ति के प्रबंध के संबंध में धारा 54 के अधीन आदेश करेगा । 

(3) जहां, जिला न्यायालय यह निष्कर्ष अभिलिखित करता है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह मानसिक रूप से बीमार है, मानसिक रूप से बीमार नहीं है, वहां वह आवेदन खारिज कर देगा । 

(4) जहां जिला न्यायालय ठीक समझता है वहां एक ही व्यक्ति को उपधारा (1) के अधीन संरक्षक और प्रबंधक नियुक्त कर सकेगा । 

53. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संरक्षक की नियुक्ति-(1) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति स्वयं अपनी देख-रेख करने में असमर्थ है, वहां जिला न्यायालय या, जहां धारा 54 की उपधारा (2) के अधीन कोई निदेश जारी किया गया है, वहां जिले का कलक्टर किसी उपयुक्त व्यक्ति को उसका संरक्षक नियुक्त कर सकेगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन कलक्टर अपने कृत्यों का निर्वहन करने में राज्य सरकार के या उसके द्वारा उस निमित्त नियुक्त किसी प्राधिकारी के अधीक्षण और नियंत्रण के अधीन होगा । 

54. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति के लिए प्रबंधक की नियुक्ति-(1) जहां मानसिक रूप से बीमार ऐसे व्यक्ति की संपत्ति, जो उसका प्रबंध करने में असमर्थ है, ऐसी है कि उसका भार तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन प्रतिपाल्य-अधिकरण द्वारा ग्रहण किया जा सकता है वहां जिला न्यायालय प्रतिपाल्य-अधिकरण को ऐसी संपत्ति का भार ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत करेगा और तब प्रतिपाल्य-अधिकरण ऐसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, उस विधि के अनुसार ऐसी संपत्ति का प्रबंध ग्रहण करेगा ।

(2) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति में संपूर्ण भूमि या उसका कोई भाग या भूमि में कोई ऐसा हित है जिसका भार प्रतिपाल्य अधिकरण ग्रहण नहीं कर सकता है, वहां जिला न्यायालय, उस जिले के कलक्टर को जिसमें वह भूमि स्थित है, सहमति अभिप्राप्त करने के पश्चात् कलक्टर को निदेश दे सकेगा कि वह उस व्यक्ति का और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति के ऐसे भाग या उसमें के हित का भार ग्रहण कर ले, जो प्रतिपाल्य अधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता । 

(3) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति का प्रबंध, यथास्थिति, प्रतिपाल्य-अधिकरण या कलक्टर को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन नहीं सौंपा जा सकता है, वहां जिला न्यायालय किसी भी उपयुक्त व्यक्ति को ऐसी संपत्ति का प्रबंधक होने के लिए नियुक्त करेगा । 

55. कलक्टर द्वारा प्रबंधक की नियुक्ति-जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति जिला न्यायालय द्वारा कलक्टर को धारा 54 की उपधारा (2) के अधीन सौंपी गई है, वहां वह कलक्टर राज्य सरकार के या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त किसी प्राधिकारी के नियंत्रण के अधीन रहते हुए किसी भी उपयुक्त को मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति का प्रबंध करने के लिए नियुक्त कर सकेगा ।

56. संपत्ति के प्रबंधक द्वारा बंधपत्र का निष्पादित किया जाना-प्रत्येक व्यक्ति जिसे जिला न्यायालय या कलक्टर द्वारा मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति का प्रबंधक नियुक्त किया गया है, नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाने पर उतनी राशि का ऐसे प्ररूप में और ऐसे प्रतिभुओं सहित जो वह प्राधिकारी विनिर्दिष्ट करे, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति से होने वाली सभी प्राप्तियों का लेखा-जोखा देने के लिए, बंधपत्र लिखेगा ।

57. संरक्षकों और प्रबंधकों की नियुक्ति और उनका पारिश्रमिक-(1) कोई व्यक्ति जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का विधिक वारिस है, ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का यथास्थिति, संरक्षक या, उसकी संपत्ति का प्रबंधक धारा 53, धारा 54 या धारा 55 के अधीन तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा जब तक कि, यथास्थिति, जिला न्यायालय, या कलक्टर का लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से यह विचार न हो कि ऐसी नियुक्ति मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के फायदे के लिए है । 

(2) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संरक्षक या उसकी संपत्ति के प्रबंधक को, या दोनों को जो इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किए गए हैं, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति में से उतने भत्ते का संदाय किया जाएगा जितना नियुक्ति प्राधिकारी अवधारित करे । 

58. संरक्षक और प्रबंधक के कर्तव्य-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संरक्षक के रूप में या उसकी संपत्ति के प्रबंध के रूप में या दोनों रूप में इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया गया है मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति या उसकी संपत्ति या दोनों की देख-रेख करेगा और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति और उसके कुटुंब के ऐसे सदस्यों के जो उस पर आश्रित हों, भरण-पोषण के लिए उत्तरादायी होगा । 

(2) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संरक्षक के रूप में नियुक्त व्यक्ति, उसकी संपत्ति के प्रबंधक के रूप में नियुक्त व्यक्ति से भिन्न है, वहां उसकी संपत्ति का प्रबंधक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संरक्षक को ऐसे भत्ते का संदाय करेगा, जो सरंक्षक नियुक्त करने वाला प्राधिकारी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति और उसके कुटुम्ब के ऐसे सदस्यों के जो उस पर आश्रित हों, भरण-पोषण के लिए नियत करे ।

59. प्रबंधक की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रत्येक प्रबंधक इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की जिस संपत्ति के संबंध में वह प्रबंधक नियुक्त किया गया है, उस संपत्ति के संबंध में उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करेगा, जिनका प्रयोग मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति ने संपत्ति के स्वामी के रूप में तब किया होता जब वह मानसिक रूप से बीमार न होता और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपदा को प्राप्य सभी दावों को वसूल करेगा और उस संपदा द्वारा विधिक रूप से देय सभी ऋणों का संदाय करेगा और सभी दायित्वों का उन्मोचन करेगा :

परंतु प्रबंधक, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की किसी स्थावर संपत्ति को तब तक बंधक नहीं करेगा, उस पर कोई भार सृजित नहीं करेगा या उसे विक्रय, दान, विनिमय द्वारा या अन्यथा अंतरित नहीं करेगा या ऐसी किसी संपत्ति को पांच वर्ष से अधिक की अवधि के लिए पट्टे पर नहीं देगा जब तक वह इस निमित्त जिला न्यायालय की अनुज्ञा प्राप्त नहीं कर लेता है ।  

(2) जिला न्यायालय प्रबंधक द्वारा किए गए आवेदन पर, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की किसी स्थावर संपत्ति को बंधक रखने, उस पर भार सृजित करने या विक्रय दान, विनिमय द्वारा या अन्यथा अंतरित करने की या ऐसी किसी संपत्ति को पांच वर्ष से अधिक की अवधि के लिए पट्टे पर देने की अनुज्ञा ऐसी शर्तों या निबंधनों के अधीन रहते हुए दे सकेगा जो वह न्यायालय अधिरोपित करना ठीक समझे ।           

(3) जिला न्यायालय, अनुज्ञा के लिए प्रत्येक आवेदन की सूचना की तामील मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के किसी नातेदार या मित्र पर करवाएगा और यदि नातेदार या मित्र से कोई आक्षेप प्राप्त होता है तो उस पर विचार करने के पश्चात्, और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के हितों का ध्यान रखते हुए अनुज्ञा दे सकेगा या देने से इंकार कर सकेगा ।

60. प्रबंधक द्वारा तालिका और वार्षिक लेखाओं का दिया जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रत्येक प्रबंधक अपनी नियुक्ति की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर उस प्राधिकारी को, जिसने उसे नियुक्त किया है, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की स्थावर संपत्ति की, और उन सभी आस्तियों तथा अन्य जंगम संपत्ति की, जो वह मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की ओर से प्राप्त करे, तालिका और उसके साथ ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को प्राप्य सभी दावों और उसके द्वारा देय सभी ऋणों और दायित्वों का एक विवरण देगा ।

(2) प्रत्येक ऐसा प्रबंधक अपने भारसाधन में की संपत्ति और आस्तियों और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के लिए प्राप्त तथा संवितरित रकम और अपने पास बचे रहे अतिशेष का लेखा उक्त नियुक्ति प्राधिकारी को प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के तीन मास की अवधि के भीतर देगा । 

61. जिला न्यायालय के आदेशों के अधीन हस्तांतरण पत्र निष्पादित करने की प्रबंधक की शक्ति-इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रत्येक प्रबंधक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के नाम में और उसकी ओर से-

(क) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति के सभी ऐसे हस्तांतरण पत्रों और विक्रय, बंधक द्वारा या अन्यथा अंतरण की ऐसी लिखतों का निष्पादन करेगा, जिनकी जिला न्यायालय द्वारा अनुज्ञा दी जाए; और 

(ख) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति में उस निमित्त निहित सभी शक्तियों का, अपनी वैयक्तिक हैसियत में अथवा न्यासी या संरक्षक के रूप में की अपनी हैसियत में जिला न्यायालय के आदेशों के अधीन रहते हुए प्रयोग करेगा । 

62. जिला न्यायालय के निदेशानुसार प्रबंधक द्वारा संविदाओं का निष्पादन किया जाना-जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति ने अपनी मानसिक बीमारी के पूर्व अपनी संपत्ति या उसके किसी भाग का विक्रय या अन्यथा व्ययन करने के लिए संविदा की थी और यदि ऐसी संविदा जिला न्यायालय की राय में इस प्रकार की है कि उसका निष्पादन किया जाना चाहिए तो जिला न्यायालय इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रबंधक को ऐसी संविदा का निष्पादन करने के लिए और संविदा को पूरा करने में ऐसे अन्य कार्य करने के लिए ऐसा निदेश दे सकेगा जो न्यायालय आवश्यक समझे और तब प्रबंधक उसके अनुसार कार्य करने के लिए आबद्ध होगा । 

63. कारबार परिसरों का व्ययन-जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार होने के पूर्व, कारबार में लगा हुआ था, वहां यदि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के फायदे के लिए यह प्रतीत होता है कि उसके कारबार परिसरों का व्ययन किया जाए तो जिला न्यायालय ऐसे व्यक्ति की संपत्ति के संबंध में इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रबंधक को ऐसे परिसरों का विक्रय और व्ययन करने और उसके विक्रय आगमों का ऐसी रीति से उपयोजन करने का निदेश दे सकेगा, जो जिला न्यायालय, निर्दिष्ट करे और तब प्रबंधक उसके अनुसार कार्य करने के लिए आबद्ध होगा । 

64. प्रबंधक पट्टों का व्ययन कर सकेगा-जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति किसी पट्टे या उपपट्टे का हकदार है और ऐसे व्यक्ति की संपत्ति के संबंध में इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रबंधक को यह प्रतीत होता है कि ऐसे पट्टे या उपपट्टे का व्ययन करना मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के फायदे के लिए होगा वहां ऐसा प्रबंधक जिला न्यायालय से आदेश अभिप्राप्त करके ऐसे पट्टे या उस उपपट्टे का अभ्यर्पण, समनुदेशन या उसका अन्यथा व्ययन ऐसे व्यक्ति को ऐसे प्रतिफल के लिए और ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सकेगा, जो न्यायालय निदेश दे ।

65. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति से संबंधित किसी विषय के बारे में आदेश करने की शक्ति-जिला न्यायालय मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति या उसकी संपत्ति से किसी प्रकार संबंधित किसी विषय के बारे में किसी व्यक्ति द्वारा उसको किए गए आवेदन पर, इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस विषय के बारे में ऐसे आदेश कर सकेगा, जो वह परिस्थितियों के अनुसार ठीक समझे ।

66. तालिका या लेखाओं की शुद्धता के संबंध में आक्षेप किए जाने पर कार्यवाही-यदि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का कोई नादेदार या कलक्टर जिला न्यायालय को अर्जी देकर, यथास्थिति, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी तालिका या विवरण की अथवा धारा 60 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी वार्षिक लेखा की शुद्धता के संबंध में आक्षेप करता है, तो न्यायालय प्रबंधक को समन कर सकेगा और उस मामले में संक्षिप्त जांच करके उस पर ऐसा आदेश दे सकेगा, जो वह ठीक समझे:

परंतु जिला न्यायालय स्वविवेकानुसार ऐसी अर्जी अपने अधीनस्थ किसी न्यायालय को, या ऐसी दशा में कलक्टर को जहां कलक्टर द्वारा प्रबंधक नियुक्त किया गया हो और कलक्टर द्वारा अर्जी पेश नहीं की गई हो, निर्देशित कर सकेगा । 

67. संपदा के आगमों का सरकारी खजाने में संदाय और उनका विनिधान-प्रबंधक द्वारा किसी संपदा मद्दे प्राप्त सभी रकमों में से उतनी रकम जितनी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के चालू व्यय या उसकी संपत्ति के प्रबंध के लिए अपेक्षित रकम से अधिक हो, सरकारी खजाने में संपदा के खाते में संदत्त की जाएगी और वह भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 20 में विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों में से किन्हीं में समय-समय पर विनिहित की जाएगी, किंतु तब तक नहीं की जाएगी, जब तक  उसकी नियुक्ति करने वाला प्राधिकारी ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह निदेश न दे कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के हित में उन रकमों का अन्यथा विनिधान या उपयोजन किया जाए ।

68. नातेदार हिसाब लेने के लिए वाद ला सकेगा-मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का कोई नातेदार, इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किसी प्रबंधक से अथवा पद या न्यास से उसके हटाए जाने के पश्चात् किसी ऐसे व्यक्ति से, या उसकी मृत्यु हो जाने पर उसके विधिक प्रतिनिधि से, किसी ऐसी संपत्ति की बाबत, जो उस समय या उससे पहले उसके प्रबंध में थी, या ऐसी संपत्ति मद्दे उसके द्वारा प्राप्त किसी धनराशि या अन्य संपत्ति की बाबत हिसाब लेने के लिए वाद जिला न्यायालय की इजाजत से ला सकेगा । 

69. प्रबंधकों और संरक्षकों का हटाया जाना-(1) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति का प्रबंधक उस प्राधिकारी द्वारा जिसने उसे नियुक्त किया था, पर्याप्त और लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से हटाया जा सकेगा, और ऐसा प्राधिकारी उसके स्थान पर नए प्रबंधक को नियुक्त कर सकेगा । 

(2) कोई प्रबंधक जो उपधारा (1) के अधीन हटा दिया गया है मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की सारी संपत्ति का भारसाधन नए प्रबंधक को देने के लिए और ऐसे सब धन का हिसाब देने के लिए आबद्ध होगा, जो उसने प्राप्त या संवितरित किया हो । 

(3) जिला न्यायालय, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के किसी संरक्षक को पर्याप्त कारण से हटा सकेगा और उसके स्थान पर नए संरक्षक को नियुक्त कर सकेगा ।

70. किसी भागीदार के मानसिक रूप से बीमार हो जाने पर भागीदारी का विघटन और संपत्ति का व्ययन-(1) जहां कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी भागीदारी फर्म का सदस्य है, मानसिक रूप से बीमार पाया जाता है, वहां जिला न्यायालय, भागीदारों के विघटन के लिए किसी अन्य भागीदार के आवेदन पर अथवा किसी ऐसे व्यक्ति के आवेदन पर, जिसके बारे में न्यायालय को यह प्रतीत हो कि वह ऐसा विघटन कराने का हकदार है, भागीदारी का विघटन कर सकेगा ।

(2) किसी ऐसी भागीदारी फर्म का, जिसे उपधारा (1) लागू होती है उक्त उपधारा के अधीन या अन्यथा विधि के सम्यक् अनुक्रम में विघटन होने पर प्रबंधक, जो इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया गया है, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के नाम और उसकी ओर से, अन्य भागीदारों के साथ भागीदारी संपत्ति का व्ययन करने में ऐसे निबंधनों पर सम्मिलित हो सकेगा और भागीदारी का विघटन पूरा करने के लिए ऐसे सभी कार्य करेगा, जो जिला न्यायालय निदिष्ट करे । 

71. कतिपय मामलों में प्रबंधक की नियुक्ति किए बिना मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण के लिए संपत्ति का उपयोजन करने की शक्ति-(1) पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी जिला न्यायालय संपदा का कोई प्रबंधक नियुक्त करने के बजाय, यह आदेश कर सकेगा कि नकद रकम की दशा में नकद रकम और किसी अन्य संपत्ति की दशा में उसकी उपज वसूल की जाएगी और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के और उसके कुटंब के ऐसे सदस्यों के जो उस पर आश्रित हैं, भरण-पोषण के लिए उपयोजित किए जाने के लिए ऐसे व्यक्ति को संदत्त या परिदत्त की जाएगी, जिसे जिला न्यायालय द्वारा इस निमित्त नियुक्त किया जाए । 

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति द्वारा दी गई रसीद किसी ऐसे व्यक्ति का वैध रूप से उन्मोचन कर देगी जो इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का धन देता है या उसकी किसी संपत्ति का परिदान करता है । 

72. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के स्टाक, प्रतिभूतियों या शेयरों का कतिपय मामलों में अंतरण करने का आदेश देने की शक्ति-जहां कोई स्टाक या सरकारी प्रतिभूतियां या किसी कंपनी के शेयर (जो भारत के भीतर अंतरणीय हों या जिनके लाभांश भारत में संदेय हों) मानसिक रूप से बीमार किसी ऐसे व्यक्ति के नाम में हैं, या निहित हैं जो उसका फायदा पाने का हकदार है, या इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रबंधक या उसके लिए किसी न्यासी के नाम में हैं या उसमें निहित है और प्रबंधक की निर्वसीयत मृत्यु हो जाती है या वह स्वयं मानसिक रूप से बीमार हो जाता है या वह जिला न्यायालय की अधिकारिता के बाहर है या यह निश्चित नहीं है कि प्रबंधक जीवित है या उसकी मृत्यु हो गई है या वह अपने स्थान पर नियुक्त नए प्रबंधक को स्टाक, प्रतिभूतियां या शेयर अंतरित करने अथवा लाभांशों को प्राप्त करने और उनका संदाय करने में, न्यायालय द्वारा ऐसा करने की अपेक्षा की जाने के पश्चात् चौदह दिन के भीतर उपेक्षा करता है या ऐसा करने से इंकार करता है तो जिला न्यायालय कंपनी या संबद्ध सरकार को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसी रीति से जो जिला न्यायालय निदिष्ट करे, ऐसा अंतरण करे या उन्हें अंतरित कर दे तथा लाभांश प्राप्त करे और उनका संदाय करे । 

73. भारत से बाहर निवास करने वाले मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के स्टाक, प्रतिभूतियों या शेयरों को अंतरित करने का आदेश देने की शक्ति-जहां कोई स्टाक या सरकारी प्रतिभूतियां या किसी कंपनी के शेयर किसी ऐसे व्यक्ति के नाम में हैं या उसमें निहित हैं, जो भारत के बाहर निवास कर रहा है, वहां जिला न्यायालय अपना यह समाधान हो जाने पर कि ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार घोषित कर दिया गया है और उसकी वैयक्तिक संपदा ऐसे व्यक्ति में निहित हो गई है जो उस संपदा का प्रबंध उस स्थान की विधि के अनुसार करने के लिए नियुक्त किया गया है, जहां वह निवास कर रहा है उस कपनी या संबद्ध सरकार को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे स्टाक, प्रतिभूतियों या शेयरों का या उनके किसी भाग का ऐसा अंतरण इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति को या उसके नाम में या अन्यथा करे और ऐसे लाभांश और आगम प्राप्त करे और उनका संदाय करे जो जिला न्यायालय ठीक समझे ।      

74. अस्थायी मानसिक बीमारी की दशा में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण के लिए संपत्ति का उपयोजन करने की शक्ति-यदि जिला न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की मानसिक बीमारी अस्थायी है और उसके भरण-पोषण के लिए या उस पर आश्रित उसके कुटुंब के सदस्यों के भरण-पोषण के लिए अस्थायी अवधि के लिए व्यवस्था करना समीचीन है तो जिला न्यायालय धारा 71 में बताई गई रीति से यह निदेश दे सकेगा कि उसकी संपत्ति या उसके किसी पर्याप्त भाग का उपयोजन उसमें विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए किया जाए । 

75. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के बारे में की गई कार्रवाई का तब अपास्त किया जाना जब जिला न्यायालय को यह पता हो कि उसकी मानसिक बीमारी दूर हो गई है-(1) जहां जिला न्यायालय के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि इस अध्याय के अधीन समीक्षण के पश्चात् मानसिक रूप से बीमार पाए गए व्यक्ति की मानसिक बीमारी दूर हो गई है, वहां वह अपने अधीनस्थ किसी न्यायालय को यह जांच करने के लिए निदेश दे सकेगा कि क्या ऐसे व्यक्ति की मानसिक बीमारी दूर हो गई है । 

(2) उपधारा (1) के अधीन जांच जहां तक हो सके उसी रीति से की जाएगी जिस रीति से इस अध्याय के अधीन कोई समीक्षण किया जाता है । 

(3) यदि इस धारा के अधीन जांच करने के पश्चात् यह पाया जाता है कि किसी व्यक्ति की मानसिक बीमारी दूर हो गई है, वहां जिला न्यायालय आदेश करेगा कि उस मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संबंध में इस अधिनियम के अधीन की गई सभी कार्रवाइयां ऐसे निबंधनों और शर्तों पर अपास्त की जाएं, जो वह न्यायालय अधिरोपित करना ठीक समझे ।

76. अपीलें-इस अध्याय के अधीन जिला न्यायालय द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की अपील उच्च न्यायालय को होगी ।

77. जिला न्यायालय की विनियम बनाने की शक्ति-जिला न्यायालय इस अध्याय के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए समय-समय पर विनियम बना सकेगा ।

अध्याय 7

मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध मानसिक रूप से

बीमार व्यक्तियों के भरण-पोषण का खर्च उठाने का दायित्व

78. कतिपय मामलों से भरण-पोषण का खर्च सरकार द्वारा उठाया जाना-किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में अंतरंग रोगी के रूप में निरुद्ध मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण का खर्च जब तक कि तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित न किया जाए, उस राज्य की सरकार द्वारा जिसका कि वह प्राधिकारी जिसने मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के संबंध में आदेश पारित किया है, अधीनस्थ है वहन किया जाएगा, यदि-

(क) उस प्राधिकारी ने जिसने आदेश पारित किया है, किसी व्यक्ति से ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण का खर्च उठाने के लिए वचन नहीं लिया है; और

(ख) ऐसे व्यक्ति के भरण-पोषण का खर्च उठाने के लिए उक्त आदेश में कोई उपबंध नहीं किया गया है । 

79. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपदा में से या उसके भरण-पोषण के लिए वैध रूप से आबद्ध व्यक्ति से मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण के खर्चे के संदाय के लिए जिला न्यायालय को आवेदन-(1) जहां किसी मानश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में निरुद्ध मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के पास कोई संपदा है या जहां ऐसे व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए बैध रूप से आबद्ध किसी व्यक्ति के पास उसका भरण-पोषण करने के साधन हैं, वहां धारा 78 के अधीन ऐसे व्यक्ति का भरण-पोषण करने के खर्च का भुगतान करने के लिए दायी सरकार या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण का खर्च उठाने के लिए दायी कोई स्थानीय प्राधिकारी, उस जिला न्यायालय को, जिसकी अधिकारिता के भीतर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपदा स्थित है या वह व्यक्ति निवास करता है, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है और जिसके पास ऐसा करने के साधन हैं, ऐसे आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपदा में से उसके भरण-पोषण के खर्च के लिए उपयोग किया जाना प्राधिकृत करता है या उस व्यक्ति को, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है और जिसके पास ऐसा करने के साधन हैं, यह निदेश देता हो कि वह ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भरण-पोषण का खर्च उठाए । 

(2) उपधारा (1) के अधीन जिला न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश का प्रवर्तन उसी रीति से किया जाएगा और वैसा ही बल तथा प्रभाव होगा और उसकी अपील वैसे ही होगी जैसी कि उक्त न्यायालय द्वारा किसी ऐसे वाद में दी गई डिक्री की होती है, जो उसमें उल्लिखित संपत्ति या व्यक्ति के संबंध में है । 

80. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए वैध रूप से आबद्ध व्यक्तियों का ऐसे दायित्व से मुक्त होना-पूर्वगामी उपबंधों की कोई बात मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने के लिए वैध रूप से आबद्ध किसी व्यक्ति को ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का भरण-पोषण करने से मुक्त करने वाली नहीं समझी जाएगी ।

अध्याय 8

मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के मानवीय अधिकारों का संरक्षण

81. मानवीय अधिकारों का अतिक्रमण किए बिना मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों का उपचार किया जाना-(1) किसी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के उपचार के दौरान उसका तिरस्कार (चाहे शारीरिक हो या मानसिक) नहीं किया जाएगा या उसके प्रति क्रूरता नहीं बरती जाएगी । 

(2) किसी उपचाराधीन मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के अनुसंधान के प्रयोजनों के लिए तब तक प्रयोग नहीं किया जाएगा, जब तक कि-

(i) ऐसा अनुसंधान रोग का पता लगाने या उपचार के प्रयोजनों के लिए प्रत्यक्षतः उसके फायदे के लिए न हो; या 

(ii) ऐसे व्यक्ति ने स्वैच्छिक रोगी होने के नाते अपनी सहमति लिखित रूप में न दे दी हो या जहां ऐसा व्यक्ति (चाहे वह स्वैच्छिक रोगी हो या नहीं) अवयस्कता के कारण या अन्यथा विधिमान्य सम्मति देने के लिए अक्षम है वहां उसकी ओर से सम्मति देने के लिए सक्षम संरक्षक या अन्य व्यक्ति ने ऐसे अनुसंधान के लिए अपनी सम्मति लिखित रूप में न दे दी हो । 

(3) मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को तंग करने वाली या मानहानिकारक संसूचनाओं के या उसके उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली संसूचनाओं के निवारण के प्रयोजन के लिए धारा 94 के अधीन इन निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए उपचाराधीन मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति द्वारा या उसको भेजे गए पत्र या अन्य सूचनाएं रोकी नहीं जाएंगी, निरुद्ध नहीं की जाएंगी या नष्ट नहीं की जाएंगी । 

अध्याय 9

शास्तियां और प्रक्रिया

82. अध्याय 3 के उल्लंघन में किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की स्थापना या अनुरक्षण के लिए शास्ति-(1) कोई व्यक्ति, जो अध्याय 3 के उपबंधों के उल्लंघन में कोई मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह स्थापित करेगा या उसका अनुरक्षण करेगा, दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक हो सकेगी, या जुर्माने से जो दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, और किसी दूसरे या पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा । 

(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन दोषसिद्धि के पश्चात् अध्याय 3 के उपबंधों के उल्लंघन में मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण करता रहेगा, वह दोषसिद्धि पर, जुर्माने से, जो प्रथम दिन के पश्चात् उस प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान उल्लंघन जारी रहता है एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

83. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के अनुचित रूप से ग्रहण के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति, जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह में इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार से अन्यथा ग्रहण करेगा या निरुद्ध करेगा, दोषसिद्धि पर, कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

84. धारा 60 और धारा 69 का उल्लंघन करने के लिए शास्ति-मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की संपत्ति का प्रबंध करने के लिए, इस अधिनियम के अधीन नियुक्त कोई प्रबंधक, जो धारा 60 या धारा 69 की उपधारा (2) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, दोषसिद्धि पर, जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा और सिविल कारागार में तब तक निरुद्ध रखा जा सकेगा, जब तक कि वह उक्त उपबंधों का अनुपालन नहीं कर देता है । 

85. अन्य अपराधों के दंड के लिए साधारण उपबंध-कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी का या उसके अधीन बनाए गए किसी ऐसे नियम या विनियम का उल्लंघन करेगा, जिसके उल्लंघन के लिए इस अधिनियम में किसी शास्ति का स्पष्ट रूप से उपबंध नहीं किया गया है, दोषसिद्धि पर, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

86. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय कंपनी के कारबार के संचालन में कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:

परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।  

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-  

(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और 

(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है । 

87.  अभियोजनों के लिए मंजूरी-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी कोई न्यायालय धारा 82 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान अनुज्ञापन अधिकारी की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

अध्याय 10

प्रकीर्ण

88. बंधपत्रों के बारे में उपबंध-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 33 के उपबंध यथाशक्य इस अधिनियम के अधीन लिए गए बंधपत्रों को लागू होंगे । 

89. चिकित्सा अधिकारी द्वारा रिपोर्ट-मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का भारसाधक चिकित्सा अधिकारी उसमें निरुद्ध किसी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की छुट्टी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, उसकी मानसिक और शारीरिक दशा के बारे में उस प्राधिकारी को रिपोर्ट करेगा जिसके आदेश के अधीन ऐसे व्यक्ति को इस प्रकार निरुद्ध किया गया था ।  

90. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को सरकार द्वारा संदेय पेंशन आदि-(1) जहां किसी सरकार द्वारा किसी व्यक्ति को वेतन, पेंशन, उपदान या किसी भत्ते की बाबत कोई राशि संदेय है और इस अधिनियम के अधीन कोई मजिस्ट्रेट यह प्रमाणित कर देता है कि वह व्यक्ति, जिसे उक्त राशि संदेय है, मानसिक रूप से बीमार है तो वह अधिकारी जिसके प्राधिकार के अधीन ऐसी राशि संदेय हो, उक्त रकम का उतना भाग, जितना वह ऐसे व्यक्ति के भरण-पोषण के खर्च का ध्यान रखते हुए ठीक समझे, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के भारसाधक को दे सकेगा और यदि कोई अधिशेष रह जाता है, तो उस अधिशेष या उसके उतने भाग को, जितना वह मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के कुटुबं के ऐसे सदस्यों के, जो भरण-पोषण के लिए उस पर आश्रित हैं, भरण-पोषण के खर्चे का ध्यान रखते हुए ठीक समझे, उन सदस्यों को दे सकेगा । 

(2) जहां उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट निधियों में से कोई अतिरिक्त अधिशेष रकम जहां उस उपधारा में यथा उपबंधित संदाय करने के पश्चात् उपलब्ध हो वहां सरकार उसे निम्नलिखित रूप में उपयोग के लिए अपने पास रखेगी, अर्थात्: - 

(क) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के बारे में उस जिला न्यायालय द्वारा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर ऐसा व्यक्ति निवास करता है या रखा गया है या निरुद्ध किया गया है, यह प्रमाणित कर दिया जाता है कि वह मानसिक रूप से बीमार नहीं रह गया हैं, वहां उस व्यक्ति को संपूर्ण अधिशेष रकम वापस कर दी जाएगी; 

(ख) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की मृत्यु, संदाय से पूर्व हो जाती है वहां उसके उन वारिसों को संपूर्ण अधिशेष रकम का संदाय किया जाएगा जो उस प्राप्त करने के लिए वैध रूप से हकदार हैं;

(ग) जहां मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की मुत्यु, उसकी मानसिक बीमारी दौरान, उसकी संपदा का उत्तराधिकार पाने के लिए वैध रूप से हकदार किसी व्यक्ति को छोड़े बिना हो जाती है, वहां संपूर्ण अधिशेष रकम का उपयोजन जिला न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा से, ऐसे पूर्त प्रयोजन के लिए किया जाएगा जिसका जिला न्यायालय द्वारा अनुमोदन किया जाए । 

(3) यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, इस धारा के अनुसार संदत्त किन्हीं रकमों के संबंध में सभी दायित्वों से उन्मोचित हो जाएगी ।

91. कुल मामलों में राज्य के खर्च पर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की विधिक सहायता-(1) जहां जिला न्यायालय या किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष इस अधिनियम के अधीनकिसी कार्यवाही में कोई विधि व्यवसायी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करता है और जिला न्यायालय या मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है उस व्यक्ति के पास विधि व्यवसायी को नियुक्त करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं, वहां जिला न्यायालय या मजिस्ट्रेट राज्य के खर्च पर, उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी विाधि व्यवसायी को नियत करेगा । 

(2) जहां जिला न्यायालय या किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में कोई विधि व्यवसायी ऐसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति का, जिसके पास विधि व्यवसायी को नियुक्त करने के लिए पर्याप्त साधन हैं, प्रतिनिधित्व नहीं करता है और मामले की सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, जिला न्यायालय या मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि किसी विधि व्यवसायी द्वारा ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए तो जिला न्यायालय या मजिस्ट्रेट उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई विधि व्यवसायी नियत कर सकेगा और राज्य को निदेश दे सकेगा कि वह उसकी बाबत खर्चों का वहन करे तथा उसे ऐसे व्यक्ति की संपत्ति में से वसूल कर ले ।

(3) उच्च न्यायालय, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, निम्नलिखित का उपबंध करने के लिए नियम बना सकेगा: -

(क) उपधारा (1) या उपधारा (2) के प्रयोजन के लिए विधि व्यवसायियों का चयन करने की रीति; 

(ख) ऐसे विधि व्यवसायियों को दी जाने वाली सुविधाएं;

(ग) सरकार द्वारा ऐसे विधि व्यवसायियों को दी जाने वाली फीस और साधारणतया उपधारा (1) या उपधारा (2) के प्रयोजन का कार्यान्वयन ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में, विधि व्यवसायी" का वही अर्थ होगा जो उसका अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 2 के खंड (i) में है । 

92. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण-(1) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी । 

(2) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किस नियम, विनियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने लिए आशयित किसी बात से हुए या होने के लिए आशयित नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही सरकार के विरुद्ध न होगी ।

93.  कतिपय विधियों के प्रति निर्देश का अर्थान्वयन आदि-(1) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति किसी निर्देश का जो किसी क्षेत्र में प्रवृत्त नहीं है, उस क्षेत्र के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त, तत्समान विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है । 

(2) किसी अधिकारी या प्राधिकारी के प्रति इस अधिनियम में किसी निर्देश का उस क्षेत्र के संबंध में जिसमें उसी पदनाम का कोई प्राधिकारी या प्राधिकारी नहीं है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी के प्रति निदेश है, जो केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए ।

94. केंद्रीय सरकार और राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा उन व्यक्तियों की, जो धारा 3 के अधीन मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकारी के रूप में नियुक्त किए जा सकेंगे, अर्हताएं और वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए, उनकी उस धारा के अधीन नियुक्ति की जा सकेगी और ऐसे प्राधिकारी से संबंधित अन्य सभी विषयों का उपबंध करने वाले नियम बना सकेगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य सरकार, केंद्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी:

परंतु प्रथम नियम केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा बनाए जाएंगे । 

(3) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उपधारा (2) के अधीन बनाए गए नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) ऐसे व्यक्तियों की अर्हताएं जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकारी के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा और वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए धारा 4 के अधीन उनकी नियुक्ति की जा सकेगी और ऐसे प्राधिकारी से संबंधित अन्य सभी विषय; 

(ख) ऐसे वर्ग या प्रवर्ग के व्यक्ति, जिनके लिए धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन पृथक् मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृहों की स्थापना और अनुरक्षण किया जा सकेगा; 

(ग) वह प्ररूप जिसमें-

(i) यथास्थिति, धारा 7 या धारा 9 के अधीन अनुज्ञप्ति की मंजूरी या उसके नवीकरण के लिए आवेदन किया जा सकेगा और, उसकी बाबत-संदेय फीस; 

(ii) धारा 8 के अधीन किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह की स्थापना या उसके अनुरक्षण के लिए अनुज्ञप्ति दी जा सकेगी;

(iii) धारा 20 के अधीन ग्रहण-आदेश के लिए आवेदन किया जा सकेगा; 

(घ) वह रीति जिससे अनुज्ञप्ति की मंजूरी देने से इंकार करने या उसे प्रतिसंहृत करने का आदेश, यथास्थिति, धारा 8 या धारा 11 के अधीन संसूचित किया जाएगा;

(ङ) वह रीति जिसमें धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञापन प्राधिकारी को रिपोर्ट की जाएगी; 

(च) वे न्यूनतम सुविधाएं जो धारा 9 की उपधारा (5) के परंतुक में निर्दिष्ट हैं, जिनके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं, अर्थात्: -

(i) मनश्चिकित्सीय-रोगी अनुपात;

(ii) अन्य चिकित्सा या परा-चिकित्सा कर्मचारिवृदं;

(iii) स्थल अपेक्षा;

(iv) उपचार सुविधाएं; और

(v) उपस्कर;

(छ) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए, धारा 16 के अधीन मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय परिचर्या गृह का अनुरक्षण किया जाएगा; 

(ज) वह प्ररूप और वह रीति जिसमें, और वह अवधि, जिसके भीतर ऐसी प्रत्येक अपील की जाएगी जो किसी अनुज्ञप्ति की मंजूरी देने से या, उसका नवीकरण करने से इंकार करने या अनुज्ञप्ति प्रतिसंहृत करने के किसी आदेश के विरुद्ध हो और उसके बारे में धारा 12 के अधीन संदेय फीस; 

(झ) वह रीति जिससे धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन अभिलेख रखे जाएंगे; 

(ञ) किसी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के बहिरंग रोगी के रूप में उपचार के लिए धारा 14 के अधीन प्रदान की जाने वाली सुविधाएं; 

(ट) वह रीति जिसमें धारा 20 की उपधारा (6) के अधीन ग्रहण-आदेश के लिए आवेदन पर हस्ताक्षर किए जाएंगे और उसका सत्यापन किया जाएगा; 

(ठ) ऐसे व्यक्तियों की अर्हताएं जिन्हें परिदर्शकों के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा और वे निबंधन और शर्तें जिन पर धारा 37 के अधीन उनकी नियुक्ति की जा सकेगी और उनके कृत्य; 

(ड) धारा 81 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट तंग करने वाली या मानहानिकारक संसूचनाओं और अन्य बातों का निवारण; 

(ढ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए । 

95. केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का विधान-मंडल के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल नहीं पड़ेगा

(2) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा  

96. अन्य विधियों पर अधिनियम का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे और ऐसी असंगति की सीमा तक समझा जाएगा कि उस अन्य विधि का कोई प्रभाव होगा  

97. कठिनाई दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को किसी राज्य में प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राज्य सरकार आदेश द्वारा, ऐसी कोई बात कर सकेगी जो ऐसे उपबंधों से असंगत हो और जो उस कठिनाई दूर करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो:

परंतु किसी राज्य के संबंध में कोई आदेश इस धारा के अधीन उस तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा, जिसको यह अधिनियम उस राज्य में प्रवृत्त होता है

98. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 (1912 का 4) और पागलपन अधिनियम, 1977 (1977 का जम्मू-कश्मीर अधिनियम 25) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं  

(2)  ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त दोनों अधिनियमों में से किसी के अधीन की गई कोई भी बात या कार्रवाई जहां तक वह बात या कार्रवाई इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्समान उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी, और तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक कि वह अधिनियम के अधीन की गई किसी भी बात या कार्रवाई से अतिष्ठित नहीं कर दी जाती है

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