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ललित कला अकादमी (प्रबंध-ग्रहण) अधिनियम, 1997 ( Lalit Kala Akadami (Taking Over Management) Act, 1997 )


 

ललित कला अकादमी (प्रबंध-ग्रहण) अधिनियम, 1997

(1997 का अधिनियम संख्यांक 17)

[25 मार्च, 1997]

ललित कला अकादमी का लोकहित में सीमित अवधि

के लिए प्रबंध-ग्रहण करने का और उससे

संबंधित या उसके आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                ललित कला अकादमी का गठन भारत सरकार द्वारा तारीख 5 अगस्त, 1954 को पारित संसदीय संकल्प द्वारा रंगचित्रकलाओं, लेखाचित्रकलाओं, मूर्तिकलाओं, आदि जैसे दृश्य कलाओं को प्रोत्साहित करने और उनका उन्नयन करने के लिए दृश्य कलाओं के क्षेत्र में शीर्षस्थ सांस्कृतिक निकाय के रूप में किया गया था; 

और ललित कला अकादमी को सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन तारीख 11 मार्च, 1957 को सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किया गया था;

और अकादमी को अपने क्रियाकलाप के क्षेत्र में पूर्ण कार्यात्मक स्वायत्तता है, यद्यपि भारत सरकार संगठन के लिए एकमात्र निधि उपलब्ध कराने वाला अभिकरण है;

और ललित कला अकादमी द्वारा निधियों के दुरुपयोग के संबंध में कई हलकों से, जिनके अंतर्गत संसद् के माननीय सदस्य भी हैं, प्राप्त शिकायतों के अनुसरण में, एक समिति का गठन भारत सरकार द्वारा तारीख 24 मार्च, 1988 के संकल्प द्वारा श्री पी० एन० हकसर की अध्यक्षता में ललित कला अकादमी सहित राष्ट्रीय अकादमियों के कार्यकरण की जांच करने के लिए किया गया था और उक्त समिति ने उक्त अकादमी के प्रबंध में कार्यकलाप की विस्तृत जांच के पश्चात् उसकी महापरिषद्, कार्यकारिणी बोर्ड और कलाकार निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली की पुनर्संरचना करने की सिफारिश की ;

और उन गंभीर कठिनाइयों को देखते हुए जो ललित कला अकादमी के प्रबंध के संबंध में उत्पन्न हुई हैं, उसके प्रबंध का सीमित अवधि के लिए ग्रहण करना आवश्यक है और यह अनुभव किया गया है कि ललित कला अकादमी का प्रबन्ध-ग्रहण करने में कोई विलंब अकादमी के हितों और उद्देश्यों के लिए अत्यन्त हानिकर होगा;

भारत गणराज्य के अड़तालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -    

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम ललित कला अकादमी (प्रबन्ध-ग्रहण) अधिनियम,1997 है । 

(2) यह 24 जनवरी, 1997 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा । 

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) प्रशासक" से धारा 4 के अधीन प्रशासक के रूप में नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है; 

(ख) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ग) सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम" से दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में यथा प्रवृत्त सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) अभिप्रेत है; 

(घ) सोसाइटी" से ललित कला अकादमी अभिप्रेत है, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है; 

(ङ) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किन्तु सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं, जो उस अधिनियम में हैं ।

 

 

 

अध्याय 2

ललित कला अकादमी का प्रबंध-ग्रहण

3. सोसाइटी का प्रबंध-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, और उसके पश्चात् तीन वर्ष की अवधि के लिए, सोसाइटी का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएगा:

                परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि सोसाइटी का उचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने के लिए यह समीचीन है कि ऐसा प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार में तीन वर्ष की उक्त अवधि के समाप्त होने के पश्चात् निहित बना रहे तो वह ऐसे प्रबन्ध के बने रहने के लिए ऐसी अवधि के लिए, जो एक समय में एक वर्ष से अधिक न हो, जो वह ठीक समझे, समय-समय पर निदेश जारी कर सकेगी, किन्तु ऐसी कुल अवधि, जिसके लिए ऐसा प्रबंध केन्द्रीय सरकार में निहित बना रहेगा, किसी भी दशा में, पांच वर्ष से अधिक नहीं होगी ।   

                (2) सोसाइटी के प्रबन्ध की बाबत यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत सभी आस्तियों, अधिकारों, पट्टाधृतियों, शक्तियों, प्राधिकारों तथा विशेषाधिकारों और सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, जिनके अन्तर्गत भूमि, भवन, कलाकृतियां, कर्मशालाएं, परियोजनाएं, भंडार, उपकरण, पुस्तकालय, मशीनरी, आटोमोबाइल और अन्य यान हैं, रोकड़बाकी, आरक्षित निधियों, विनिधानों तथा बही ऋणों और ऐसी संपत्ति से, जो इस अधिनियम के प्रारंम्भ के ठीक पूर्व सोसाइटी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में थी, उद्भूत सभी अन्य अधिकारों और हितों तथा ऐसी सभी लेखाबहियों, रजिस्टरों, नक्शों, रेखांकों और उससे संबंधित किसी भी प्रकार के सभी अन्य दस्तावेजों का प्रबंध है ।

                (3) कोई संविदा, चाहे वह अभिव्यक्त है, या विवक्षित, या अन्य ठहराव, जहां तक उसका संबंध सोसाइटी के प्रबंध और सोसाइटी के कार्यकलाप से है और जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, ऐसे प्रारम्भ को समाप्त हो गया समझा जाएगा ।

(4) इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व, सोसाइटी के प्रबंध के भारसाधक सभी व्यक्तियों, जिनके अन्तर्गत, यथास्थिति, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव या अवैतनिक सचिव के रूप में पद धारण करने वाले व्यक्ति भी हैं, और सोसाइटी की महापरिषद्, कार्यकारिणी बोर्ड, वित्त समिति और सभी अन्य समितियों के सदस्यों के बारे में यह समझा जाएगा कि उन्होंने अपने पद उस रूप में ऐसे प्रारंभ को रिक्त कर दिए हैं ।

4. सोसाइटी का प्रशासक-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, सोसाइटी के प्रशासक के रूप में उसका प्रशासन ग्रहण करने के प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त करेगी और प्रशासक सोसाइटी का प्रबंध केन्द्रीय सरकार के लिए और उसकी ओर से करेगा ।

(2) प्रशासक के पर्यवेक्षण, नियंत्रण और निदेशों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व, सोसाइटी की वित्त समिति के कृत्यों का प्रयोग केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी द्वारा किया जाएगा, जिसकी नियुक्ति उस सरकार द्वारा की जाएगी ।

(3) केन्द्रीय सरकार, प्रशासक को उसकी शक्तियों और कर्तव्यों के बारे में ऐसे निदेश (जिनके अन्तर्गत किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के समक्ष किन्हीं विधिक कार्यवाहियों के आरम्भ, प्रतिरक्षा किए जाने या जारी रखे जाने संबंधी निदेश   भी हैं) जारी कर सकेगी जो वह सरकार वांछनीय समझे और प्रशासक किसी भी समय ऐसी रीति के बारे में, जिससे वह सोसाइटी का प्रबन्ध करेगा, या ऐसे प्रबंध के दौरान उत्पन्न होने वाले किसी विषय के संबंध में अनुदेशों के लिए केन्द्रीय सरकार को आवेदन कर सकेगा । 

(4) इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए नियमों के अन्य उपबंधों के और केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, प्रशासक, सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, सोसाइटी के प्रबंध के संबंध में, यथास्थिति, महापरिषद् या कार्यकारिणी बोर्ड की शक्तियों का, जिनके अन्तर्गत ऐसी सोसाइटी की किसी संपत्ति या आस्तियों का निपटान करने की शक्तियां भी हैं, चाहे ऐसी शक्तियां तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन या सोसाइटी के ज्ञापन तथा नियमों और विनियमों से या किसी अन्य स्रोत से व्युत्पन्न होती हों, प्रयोग करने का हकदार होगा ।

                (5) सोसाइटी के भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा, अभिरक्षा या नियंत्रण रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति को तत्काल प्रशासक को परिदत्त करेगा ।

(6) कोई ऐसा व्यक्ति, जिसके पास इस अधिनियम के प्रारम्भ को उसके कब्जे में या उसके नियंत्रण में सोसाइटी के प्रबन्ध से संबंधित कोई पुस्तक, कागजपत्र, कालाकृतियां या अन्य दस्तावेजें, जिनके अन्तर्गत इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सोसाइटी के प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्तियों के संकल्पों से युक्त कार्यवृत्त पुस्तकें भी हैं, सोसाइटी के प्रबन्ध से संबंधित चालू चैक बुक, कोई पत्र, ज्ञापन, टिप्पण या उसके और सोसाइटी के बीच अन्य पत्र-व्यवहार हैं, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, पुस्तकों, कागजपत्रों, कलाकृतियों और अन्य दस्तावेजों (जिनके अन्तर्गत ऐसी कार्यवृत्त पुस्तकें, चैक बुक, पत्र, ज्ञापन, टिप्पण या अन्य पत्र-व्यवहार हैं) के लिए प्रशासक को लेख-जोखा देने का दायी होगा ।   

(7) इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व सोसाइटी के प्रशासन का भारसाधक कोई व्यक्ति उस दिन से दस दिन के भीतर या ऐसी बढ़ाई गई अवधि के भीतर जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुज्ञात करे, इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व सोसाइटी के भागरूप सभी सम्पतियों और आस्तियों की (जिनके अन्तर्गत बही ऋणों और विनिधानों तथा सामानों की विशिष्टियां भी हैं) और ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व विद्यमान उसके प्रशासन के संबंध में सोसाइटी के सभी दायित्वों और बाध्यताओं की तथा उसके प्रशासन के संबंध में और ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्रवृत्त सोसाइटी द्वारा किए गए सभी करारों की भी एक पूर्ण सूची प्रशासक को देगा । 

(8) प्रशासक सोसाइटी की निधियों में से वह पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो केन्द्रीय सरकार नियत करे । 

5. किसी संविदा के समय-पूर्व पर्यवसान के लिए प्रतिकर का अधिकार न होना-तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई ऐसा व्यक्ति, जिसकी बाबत प्रबंध की कोई संविदा या अन्य ठहराव धारा 3 की उपधारा (3) में अंतर्विष्ट उपबंधों के कारण पर्यवसित हो गया है अथवा जिसका कोई पद धारण करना उस धारा की उपधारा (4) में अन्तर्विष्ट उपबंधों के कारण समाप्त हो गया है, प्रशासन की संविदा या अन्य ठहराव के समयपूर्व पर्यवसान के लिए या अपने पद की हानि के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।

6. सोसाइटी के प्रशासन का त्याग-(1) यदि, धारा 3 की उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, उस उपधारा में निर्दिष्ट अवधि के समाप्त होने के पूर्व किसी भी समय केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि सोसाइटी का प्रबंध उस सरकार में निहित करने के प्रयोजन पूरे हो गए हैं या किसी अन्य कारण से यह आवश्यक नहीं है कि सोसाइटी का प्रबंध उस सरकार में निहित बना रहना चाहिए तो वह, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, सोसाइटी के प्रबंध का, उस तारीख से जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, त्याग कर सकेगी ।    

(2) सोसाइटी का प्रशासन, उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख से ही, सोसाइटी की महापरिषद् में निहित हो जाएगा और ऐसा प्रबंध सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा, किन्तु सोसाइटी के प्रबंध के संबंध में ऐसे उपाय, यदि कोई हों, उपधारा (1) के अधीन आदेश के प्रकाशन के पश्चात् किए जा सकते हैं ।  

7. 1960 के अधिनियम 21 का लागू होना-(1) सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम में या सोसाइटी के ज्ञापन तथा नियमों और विनियमों में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु धारा 6 की उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सोसाइटी का प्रबंध जब तक केन्द्रीय सरकार में निहित बना रहता है तब तक, - 

(क) सोसाइटी के सदस्यों या किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वे या वह किसी व्यक्ति को सोसाइटी की महापरिषद् के सदस्य के रूप में नामनिर्देशित या नियुक्त करें या करे;

(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ को या उसके पश्चात् सोसाइटी के सदस्यों के किसी अधिवेशन में या सोसाइटी की महापरिषद् के किसी अधिवेशन में पारित किसी संकल्प को तब तक कार्यान्वित नहीं किया जाएगा जब तक कि केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित न किया जाए;

(ग) सोसाइटी के विघटन के लिए या किसी अन्य सोसाइटी में विलयन के लिए या उसके प्रशासन की बाबत किसी रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई कार्यवाही केन्द्रीय सरकार की सहमति के सिवाय किसी न्यायालय में नहीं होगी ।

                (2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए और ऐसे अन्य अपवादों, निर्बंधनों और परिसीमाओं, यदि कोई हों, जो विहित की जाएं, के अधीन रहते हुए, सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम सोसाइटी को उसी रीति से लागू होता रहेगा जिससे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व उसको लागू था ।

अध्याय 3

प्रकीर्ण

8. शास्तियां-वह व्यक्ति, जो-

(क) सोसाइटी के भागरूप किसी संपत्ति को अपने कब्जे या अभिरक्षा या नियंत्रण में रखते हुए ऐसी संपत्ति को प्रशासक या इस अधिनियम के अधीन प्राधिकृत किसी व्यक्ति से सदोष विधारित करेगा, या

(ख) किसी ऐसी संपत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा, या

(ग) सोसाइटी के भागरूप किसी संपत्ति का जानबूझकर प्रतिधारण करेगा या परिदान करने में असफल रहेगा या उसे हटाएगा या नष्ट करेगा, या 

(घ) किन्हीं ऐसी पुस्तकों, कागजपत्रों, कलाकृतियों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे या अभिरक्षा या नियंत्रण में हों, जानबूझकर विधारित करेगा या उनके लिए प्रशासक या इस अधिनियम के अधीन प्राधिकृत किसी व्यक्ति को लेखाजोखा देने में असफल रहेगा, या

(ङ) धारा 4 की उपधारा (6) में यथाउपबंधित जानकारी या विशिष्टियां किसी उचित कारण के बिना देने में असफल रहेगा,

कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दण्डनीय होगा । 

9. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और 

(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

10. अधिनियम के प्रवर्तन की अवधि का अपवर्जन-सोसाइटी द्वारा अपने प्रबंध के संबंध में किसी संव्यवहार से उद्भूत किसी विषय की बाबत किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी वाद या आवेदन के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा विहित परिसीमा की अवधि की संगणना करने में, वह समय, जिनके दौरान यह अधिनियम प्रवृत्त है, अपवर्जित कर दिया जाएगा । 

11. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम या इसके अधीन निकाली गई किसी अधिसूचना, किए गए किसी आदेश या बनाए गए किसी नियम के उपबंधों का, इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि में या किसी ऐसी लिखत में, जिसका इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव है या किसी न्यायालय की किसी डिक्री या उसके किसी आदेश में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभाव होगा ।

12. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भापूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही प्रशासक या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी । 

(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी बाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या प्रशासक या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

13. असद्भापूर्वक की गई संविदाएं रद्द या परिवर्तित की जा सकेंगी-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्ववर्ती एक वर्ष के भीतर किसी समय सोसाइटी और किसी अन्य व्यक्ति के बीच की गई कोई संविदा या करार, जहां तक ऐसी संविदा या करार सोसाइटी के प्रबंध से संबंधित है, असद्भावपूर्वक किया गया है या सोसाइटी के हितों के लिए हानिकर है तो वह ऐसी संविदा या करार को रद्द या परिवर्तित करने वाला आदेश (या तो बिना शर्त या ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे) कर सकेगी और तत्पश्चात् ऐसी संविदा या करार का तद्नुसार प्रभाव होगा :

परन्तु किसी संविदा या करार को ऐसी संविदा या करार के पक्षकारों को सुने जाने का उचित अवसर दिए बिना रद्द या परिवर्तित नहीं किया जाएगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी आदेश द्वारा व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश में परिवर्तन कराने या उसे उलटवाने के लिए आवेदन दिल्ली स्थित उच्च न्यायालय को कर सकेगा और तब ऐसा न्यायालय ऐसे आदेश को पुष्ट, उपांतरित या उलट सकेगा । 

14. नियोजन की संविदा समाप्त करने की शक्ति-यदि प्रशासक की यह राय है कि सोसाइटी द्वारा अपने प्रबन्ध के संबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी भी समय की गई नियोजन की कोई संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है, तो वह नियोजन की ऐसी संविदा को कर्मचारी को एक मास की लिखित रूप में सूचना या उसके बदले में एक मास का वेतन या मजदूरी देकर समाप्त कर सकेगा ।

15. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

16. निरसन और व्यावृत्ति-(1) ललित कला अकादमी (प्रबन्ध-ग्रहण) अध्यादेश, 1997 (1997 का अध्यादेश संख्यांक 10) इसके द्वारा निरसित किया जाता है । 

(2) ललित कला अकादमी (प्रबंध-ग्रहण) अध्यादेश, 1997 (1997 का अध्यादेश संख्यांक 10) के निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

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