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भारतीय सैनिक (मुकदमा) अधिनियम, 1925 ( Indian Soldiers (Litigation) Act, 1925 )


 

भारतीय सैनिक (मुकदमा) अधिनियम, 1925

(1925 का अधिनियम संख्यांक 4)1

[26 फरवरी, 1925]

विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा करने वाले भारतीय सैनिकों के

सिविल और राजस्व मुकदमों के सम्बन्ध में विशेष

संरक्षण का उपबंध करने से संबंधित

विधि का समेकन और संशोधन

करने के लिए

अधिनियम

विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा करने वाले भारतीय सैनिकों के सिविल और राजस्व मुकदमों के संबंध में विशेष संरक्षण का उपबन्ध करने से सम्बन्धित विधि का समेकन और संशोधन करना समीचीन है

अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय सैनिक (मुकदमा) अधिनियम, 1925 है  

 2[(2) इसका विस्तार 3॥। सम्पूर्ण भारत पर है

(3) यह 1925 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा  

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध हो, - 

 4[() “न्यायालय" से किसी दण्ड न्यायालय से भिन्न कोई न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा अधिकरण या अन्य अधिकारी भी है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट किया जाए और जो ऐसा अधिकरण या प्राधिकारी है जिसे उसके समक्ष लम्बित किसी मामले के सम्बन्ध में साक्ष्य प्राप्त करने के लिए और ऐसे मामले से संबंधित पक्षकारों के अधिकारों और बाध्यताओं का ऐसे साक्ष्य के आधार पर, उसके समक्ष पक्षकारों की सुनवाई के पश्चात् अवधारण करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया है;]

() “भारतीय सैनिक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो 5[सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45)] 6[या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62)] के अधीन है

() “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है

() “कार्यवाही" के अन्तर्गत कोई वाद, अपील या आवेदन भी है; और 

6[() किसी न्यायालय के किसी डिक्री या आदेश के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत किसी न्यायालय के किसी निर्णय, अवधारण या अधिनिर्णय के प्रति कोई निर्देश भी है ]

  1. अधिनियम का विस्तार का०आ० 4, तारीख 20-12-1962, भारत का राजपत्र, 1963, भाग 2, खण्ड 3 (त्त्) पृ० 3 द्वारा पाण्डिचेरी पर; 1963 के विनियम सं० 6 की धारा                 2 और अनुसूची 1 द्वारा दादरा और नागर हवेली पर, 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा सम्पूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर और अधिसूचना सं०            सा०का०नि० 621 (), तारीख 22-8-1984 द्वारा संघ राज्यक्षेत्र गोवा, दमन और दीव पर किया गया
  2. विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित  
  3. 1956 के अधिनियम सं० 62 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर शब्दों का लोप किया गया  
  4. 1970 के अधिनियम सं० 23 की धारा 2 द्वारा खंड () के स्थान पर प्रतिस्थापित
  5. 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित  
  6. 1970 के अधिनियम सं० 23 की धारा 2 द्वारा अन्तःस्थापित

 

 

 

 

 

 

 

3. वे परिस्थितियां जिनमें किसी भारतीय सैनिक के बारे में समझा जाएगा कि वह विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, किसी भारतीय सैनिक के बारे में, यथास्थिति, यह समझा जाएगा कि वह, -

() विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है या करता रहा है-जब वह युद्ध की परिस्थितियों के अधीन या समुद्र पार या 1[भारत से परे] किसी स्थान पर 2[या भारत के भीतर किसी ऐसे स्थान पर सेवा कर रहा है या करता रहा है जो केंद्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट किया जाए]

() युद्ध की परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है या करता रहा है-जब वह केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित किसी ऐसे संघर्ष के जो, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए युद्ध-स्थिति है, चालू रहने के दौरान किसी समय या तत्पश्चात् छह मास की अवधि के दौरान किसी समय-

(i) भारत के बाहर सेवा कर रहा है या करता रहा है,

(ii) फील्ड सेवा पर जाने के लिए आदेश प्राप्त कर रहा है या करता रहा है

(iii) किसी ऐसे यूनिट में सेवा कर रहा है या करता रहा है जिसकी उस समय लामबन्दी की जा रही  है, या 

(iv) ऐसी परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है या करता रहा है जो, विहित प्राधिकारी की राय में, किसी कार्यवाही के पक्षकार के रूप में किसी न्यायालय में हाजिर होने के लिए समर्थ बनाने के लिए उसे अनुपस्थिति छुट्टी प्राप्त करने से रोकती है, या जब वह किसी अन्य समय ऐसी परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है या करता रहा है जिनके अधीन सेवा को केन्द्रीय सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना द्वारा युद्ध की परिस्थितियों के अधीन सेवा घोषित किया है; और

 3[() समुद्र पार सेवा कर रहा है या करता रहा है-जब वह भारत के बाहर (श्रीलंका से भिन्न) किसी स्थान पर सेवा कर रहा है, या करता रहा है तथा उस स्थान और 4[भारत] के बीच यात्रा पूर्णतः या भागतः सामान्यतया समुद्र मार्ग द्वारा की जाती है ]

                 5[स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए और 1939 के सितम्बर के तीसरे दिन से ऐसे सैनिक के बारे में जो युद्ध-कैदी है या रहा है, यह समझा जाएगा कि वह युद्ध की परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है या करता रहा है ]

4. न्यायालय में वादपत्रों, आवेदनों या अपीलों में दी जाने वाली विशिष्टियां-यदि किसी न्यायालय में कोई वादपत्र, आवेदन या अपील उपस्थित करने वाले किसी व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई प्रतिपक्षी ऐसा भारतीय सैनिक है जो विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है तो वह अपने वादपत्र, आवेदन या अपील में इस तथ्य का कथन करेगा  

5. जिस मामले में भारतीय सैनिक का प्रतिनिधित्व नहीं किया गया है उनमें मध्यक्षेप करने की कलक्टर की शक्ति-यदि किसी कलक्टर के पास विश्वास करने का कारण है कि कोई भारतीय सैनिक, जो उसके जिले में मामूली तौर से निवास करता है या जिसकी उसमें संपत्ति है और जो किसी न्यायालय के समक्ष लम्बित किसी कार्यवाही का कोई पक्षकार है, उसमें हाजिर होने में असमर्थ है, तो कलक्टर उन तथ्यों के बारे में उस न्यायालय को विहित रीति से प्रमाणित कर सकेगा

 6. जिस मामले में भारतीय सैनिक का प्रतिनिधित्व नहीं किया गया है उसमें दी जाने वाली सूचना- 6[(1)] यदि किसी कलक्टर ने धारा 5 के अधीन प्रमाणित कर दिया है, या यदि न्यायालय के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई भारतीय सैनिक, जो उसके समक्ष लम्बित किसी कार्यवाही का कोई पक्षकार है, उसमें हाजिर होने में असमर्थ है, और यदि उस सैनिक का प्रतिनिधित्व उसकी ओर से हाजिर होने, अभिवचन करने या कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया है, तो न्यायालय कार्यवाही निलम्बित करेगा और उसकी सूचना विहित प्राधिकारी को विहित रीति से देगा :

  1. विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 1970 के अधिनियम सं० 23 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित  
  3. भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा खण्ड () के स्थान पर प्रतिस्थापित   
  4. भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम और अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948 द्वारा ब्रिटिश भारत के स्थान पर प्रतिस्थापित
  5. 1942 के अधिनियम सं० 64 की धारा 2 द्वारा अन्तःस्थापित
  6. 1942 के अधिनियम सं० 64 की धारा 3 द्वारा धारा 6 उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनर्संख्यांकित  

 

 

 

 

 

 

परन्तु न्यायालय कार्यवाही निलम्बित करने और सूचना जारी करने से उस दशा में विरत रह सकेगा जिसमें

() कार्यवाही कोई ऐसा वाद, अपील या आवेदन है जिससे सैनिक ने शुफाधिकार को प्रवर्तित कराने के उद्देश्य से अकेले या दूसरों के साथ संयुक्त रूप से संस्थित किया है, या 

() न्यायालय की राय में, उस कार्यवाही में उस सैनिक के हित या तो कार्यवाही के किसी अन्य पक्षकार के हितों के समान है और उनका ऐसे अन्य पक्षकार द्वारा पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व किया गया है या वे केवल औपचारिक प्रकृति के हैं  

 1[(2) यदि उस न्यायालय को, जिसके समक्ष कोई कार्यवाही लम्बित है, यह प्रतीत होता है कि कोई भारतीय सैनिक जो कार्यवाही का तो पक्षकार नहीं है किन्तु कार्यवाही के परिणाम से पर्याप्त रूप से संपृक्त है और हाजिर होने में उसकी असमर्थता के कारण उसके हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना सम्भव है, तो न्यायालय कार्यवाही निलम्बित कर सकेगा और उसकी सूचना विहित प्राधिकारी को विहित रीति से देगा ]

7. कार्यवाहियों का मुल्तवी किया जाना-यदि धारा 6 के अधीन सूचना की प्राप्ति पर विहित प्राधिकारी उस न्यायालय को, जिसमें कार्यवाही लम्बित है, विहित रीति से प्रमाणित करता है कि वह सैनिक, जिसके सम्बन्ध से सूचना दी गई थी, विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है और न्याय के हितों में उस सैनिक के संबंध में कार्यवाही मुल्तवी करना आवश्यक है तो न्यायालय तब उस सैनिक के संबंध में कार्यवाही को विहित अवधि के लिए या यदि कोई अवधि विहित नहीं की गई है तो ऐसी अवधि के लिए मुल्तवी करेगा, जो वह ठीक समझे

8. प्रमाणपत्र मिलने पर न्यायालय कार्यवाही चालू रख सकेगा-यदि धाराके अधीन सूचना जारी किए जाने के पश्चात् विहित प्राधिकारी या तो यह प्रमाणित करता है कि सैनिक विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा नहीं कर रहा है या ऐसा मुल्तवी किया जाना आवश्यक नहीं है, अथवा इस सूचना के कि ऐसा मुल्तवी किया जाना आवश्यक है, जारी किए जाने की तारीख से ऐसे सैनिक की दशा में जो उस जिले में निवास करता है जिसमें न्यायालय स्थित है, दो मास के भीतर या, किसी अन्य दशा में, तीन मास के भीतर प्रमाणित करने में असफल रहता है तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो, कार्यवाही चालू रख सकेगा

 

9. छुटी पर भारतीय सैनिक के विरुद्ध कार्यवाहियों का मुल्तवी किया जाना-यदि कोई दस्तावेज, जिसका किसी भारतीय सैनिक के, जो किसी कार्यवाही का पक्षकार है, कमान आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित हो, उस न्यायालय के समक्ष जिसमें कार्यवाही लम्बित है, उस सैनिक द्वारा या उसकी ओर से पेश की जाती है और जिसका आशय यह है कि सैनिक-

() दो मास से अनधिक की अवधि के लिए अनुपस्थिति छुट्टी पर है और अपनी छुट्टी के अवसान पर विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा पर जाने वाला है, या 

() तीन मास से अनधिक की अवधि के लिए बीमारी-छुट्टी पर है और अपनी छुट्टी के अवसान पर इस दृष्टि से अपने यूनिट में काम पर वापस आने वाला है कि वह विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा पर चला जाएगा,

तो, ऐसे सैनिक के संबंध में कार्यवाही, किसी ऐसी दशा में जो 2[धारा 6 की उपधारा (1)] के परन्तुक में निर्दिष्ट है धारा 7 में उपबन्धित रीति से मुल्तवी की जा सकेगी, और किसी अन्य दशा में मुल्तवी की जाएगी  

 

10. युद्ध या विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा करने वाले किसी भारतीय सैनिक के विरुद्ध पारित डिक्रियों और आदेशों को अपास्त करने की शक्ति-(1) किसी न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही में जिसमें किसी भारतीय सैनिक 3॥। के विरुद्ध कोई डिक्री या आदेश तब पारित किया गया है जब वह किन्हीं विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा था,

 

 

  1. 1942 के अधिनियम सं० 64 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 4 द्वारा धारा 6 के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 5 द्वारा कतिपय शब्दों का लोप किया गया

 

 

 

वह सैनिक 1[या यदि उसकी मृत्यु हो गई है तो, उसका विधिक प्रतिनिधि] उस न्यायालय को जिसने ऐसी डिक्री या आदेश पारित किया है, उसे अपास्त करने के लिए किसी आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा और यदि प्रतिपक्षी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि न्याय के हितों के लिए यह अपेक्षित है कि सैनिक के विरुद्ध डिक्री या आदेश अपास्त किया जाना चाहिए तो न्यायालय ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे, तदनुसार आदेश कर सकेगा   

 2[(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन के लिए परिसीमा-काल, डिक्री या आदेश की तारीख से, या, जहां उस कार्यवाही में, जिसमें डिक्री या आदेश पारित किया गया था, सैनिक पर समन या सूचना की सम्यक् रूप से तामील नहीं हुई थी वहां उस तारीख से जिसको आवेदक को डिक्री या आदेश की जानकारी हुई थी, नब्बे दिन होगा, और इंडियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) की धारा 5 के उपबन्ध ऐसे आवेदनों को लागू होंगे ]

(3) यदि वह डिक्री या आदेश जिसके संबंध में उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया जाता है, ऐसी प्रकृति का है कि वह उसी अकेले सैनिक के विरुद्ध अपास्त नहीं किया जा सकता है तो वह उन सभी या किन्हीं पक्षकारों के विरुद्ध अपास्त किया जा सकेगा जिनके विरुद्ध वह किया गया है  

(4) जहां कोई न्यायालय किसी डिक्री या आदेश को इस धारा के अधीन अपास्त करता है वहां वह, यथास्थिति, उस वाद, अपील, या आवेदन के संबंध में कार्यवाही करने के लिए दिन नियत करेगा

 3[11. जहां भारतीय सैनिक या उसका विधिक प्रतिनिधि पक्षकार है वहां परिसीमा विधि का उपांतर-किसी न्यायालय में किस वाद, अपील या आवेदन के लिए जिसका कोई पक्षकार भारतीय सैनिक है या रहा है अथवा किसी भारतीय सैनिक का विधिक प्रतिनिधि है, इस अधिनियम की धारा 10 की उपधारा (2), इंडियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा परिसीमा-काल की संगणना करने में उस अवधि का जिसके दौरान वह सैनिक किन्हीं विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है और यदि इस प्रकार सेवा करते समय सैनिक की मृत्यु हो गई है तो उसकी मृत्यु की तारीख से उस तारीख तक की अवधि का जिसको उसकी मृत्यु की सरकारी तौर पर सूचना भारत के प्राधिकारियों द्वारा उसके निकट संबंधियों को भेजी गई थी, अपवर्जन कर दिया जाएगा :

परन्तु शुफाधिकार के प्रवर्तन के उद्देश्य से संस्थित किसी वाद, की गई किसी अपील या किए गए किसी आवेदन की दशा में यह धारा 4[ 5[उस दशा में ही लागू होगी जब उक्त अधिकार ऐसी परिस्थितियों में प्रोद्भूत होता है और वह किसी ऐसे क्षेत्र में स्थित कृषि भूमि और गांव वाली स्थावर सम्पत्ति के संबंध में है] जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना6 द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ]

 7[12. प्रश्नों को विहित प्राधिकारियों को निर्दिष्ट करने की न्यायालय की शक्ति-यदि किसी न्यायालय को संदेह होता है कि धारा 10 या धारा 11 के प्रयोजनों के लिए कोई भारतीय सैनिक किसी विशिष्ट समय में विशेष परिस्थितियों के अधीन सेवा कर रहा है या कर रहा था अथवा नहीं, या इस प्रकार सेवा करते समय उसकी मृत्यु हो गई है अथवा नहीं या न्यायालय को ऐसी मृत्यु की तारीख के बारे में या उस तारीख के बारे में संदेह होता है, जिसको ऐसी मृत्यु की सरकारी तौर पर सूचना भारत के प्राधिकारियों द्वारा उसके निकट संबंधियों को भेजी गई थी, तो वह न्यायालय इस प्रश्न को विहित प्राधिकारी को विनिश्चय के लिए निर्देशित कर सकेगा और उस प्राधिकारी का प्रमाणपत्र इस प्रश्न के संबंध में निश्चायक सबूत होगा ]

 

 

  1. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 5 द्वारा अन्तःस्थापित
  2. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित
  3. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 6 द्वारा धारा 11 के स्थान पर प्रतिस्थापित
  4. 1944 के अध्यादेश सं० 14 की धारा 2 द्वारा जोड़ा गया
  5. 1946 के अधिनियम सं० 18 की धारा 2 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित
  6. ऐसे उपांतरणों के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1946, भाग 1, पृ० 1305  
  7. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 7 द्वारा प्रतिस्थापित  

 

 

 

13. नियम बनाने की शक्ति- 1[(1)] 2[केन्द्रीय सरकार] 3॥। निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध करने के लिए नियम4 राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी, अर्थात्: -

() वह रीति जिससे और वह प्ररूप जिसमें इस अधिनियम के अधीन कोई सूचना या प्रमाणपत्र दिया जाएगा

() वह अवधि जिसके लिए धारा 7 के अधीन कार्यवाहियां या कार्यवाहियों का कोई वर्ग मुल्तवी किया जाएगा

() वे व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विहित प्राधिकारी होंगे

() कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है; और 

() साधारणतः इस अधिनियम के प्रयोजनों के आनुषंगिक कोई विषय  

 5[(2) इस धारा  के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परितर्वन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

14. इस अधिनियम के उपबन्धों को सरकार की सेवा में के अन्य व्यक्तियों को लागू करने की शक्ति- 6[(1)] 2[राज्य लोक सेवाओं के बारे में राज्य सरकार, और अन्य मामलों में केन्द्रीय सरकार] राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के सभी या कोई उपबंध ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट सरकार की सेवा में के व्यक्तियों के अन्य किसी वर्ग को उसी रीति से लागू होंगे जिस रीति से वे भारतीय सैनिकों को लागू होते हैं  

 7[(2) जहां इस धारा के अधीन राज्य सरकार ने यह निर्देश दिया है कि इस अधिनियम के सभी या कोई उपबन्ध सरकार की सेवा में के व्यक्तियों के किसी वर्ग को लागू होंगे वहां धारा 3 और धारा 13 द्वारा केन्द्रीय सरकार में निहित शक्तियों का प्रयोग व्यक्तियों के उस वर्ग के बारे में राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ]

14. [भाग राज्य द्वारा पोषित बल के सदस्यों पर उपबन्ध लागू करने की शक्ति ]-विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा निरसित  

15. [1918 के अधिनियम सं० 9 और 1924 के अधिनियम सं० 12 का निरसन ]-निरसन अधिनियम, 1927 (1927 का 12) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित

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  1. 1986 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-5-1986 से) धारा 13 उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनर्संख्यांकित  
  2. भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सपरिषद् गवर्नर जनरल के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. 1970 के अधिनियम सं० 23 की धारा 4 द्वारा कतिपय शब्दों का लोप किया गया  
  4. भारतीय सैनिक (मुकदमा) नियम, 1938 के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1938, भाग 1, पृ० 968 और भारतीय नौसैनिक (मुकदमा) नियम के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1945, भाग 1, पृ० 622
  5. 1986 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-5-1986 से) अंतःस्थापित
  6. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 8 द्वारा धारा 14 उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनर्संख्यांकित  
  7. 1942 के अध्यादेश सं० 64 की धारा 8 द्वारा अन्तःस्थापित

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