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स्वर्ण बाण्ड (उन्मुक्ति और छूट) अधिनियम, 1993 ( Gold Bonds (Immunities And Exemptions) Act, 1993 )


 

स्वर्ण बाण्ड (उन्मुक्ति और छूट) अधिनियम, 1993

(1993 का अधिनियम संख्यांक 25)

[2 अप्रैल, 1993]

स्वर्ण बाण्ड के अभिदाताओं को कतिपय उन्मुक्तियों का और

ऐसे बाण्डों के संबंध में प्रत्यक्ष करों से कतिपय

छूटों का तथा उनसे संबंधित या उनके

आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत में निवासियों की निष्क्रिय स्वर्ण संपदा को गतिशील बनाने की दृष्टि से, ऐसे निवासियों द्वारा स्वर्ण बाण्ड में अभिदाय करने को संभव बनाने के लिए कतिपय उन्मुक्तियों और छूटों का उपबन्ध करना समीचीन है;

                भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :- 

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम स्वर्ण बाण्ड (उन्मुक्ति और छूट) अधिनियम, 1993 है

                (2) यह 31 जनवरी, 1993 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,-  

() स्वर्ण बाण्ड" से धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाई गई स्कीम के अनुसार उस सरकार द्वारा जारी किए गए स्वर्ण बाण्ड, 1998 अभिप्रेत हैं;

() अभिदाता" से अभिप्रेत है कोई व्यष्टि, हिन्दू अविभवत कुटुम्ब, किसी न्यास के न्यासी, कोई फर्म या कम्पनी, जो भारत में निवासी है या निवासी हैं और जिसने या जिन्होंने स्वर्ण बाण्ड में आरंभतः अभिदाय किया है

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, व्यष्टि" पद के अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं,- 

                (i) उसके विधिक वारिस; या

(ii) जहां हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्यों के बीच विभाजन हो गया है वहां ऐसे कुटुम्ब का प्रत्येक सदस्य जिसका स्वर्ण बाण्डों में कोई अंश है

() अन्य सभी शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं, और आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो उस अधिनियम में हैं  

3. स्वर्ण बाण्ड स्कीम-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को या उसके पश्चात्, किन्तु विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व, स्वर्ण बाण्ड, 1998 में अभिदाय के लिए स्कीम बना सकेगी

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए विनिर्दिष्ट तारीख" से, 31 मार्च, 1993 या ऐसी अन्य पश्चात्वर्ती तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे

(2) उपधारा (1) के अधीन बनाई गई स्कीम, बनाई जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी

4. उन्मुक्तियां-(1) धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), दान-कर अधिनियम, 1958 (1958 का 18), आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43), सीमा-शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52), विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) और विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 1976 (1976 का 49) में किसी बात के होते हुए भी,-

() किसी अभिदाता से, किसी भी प्रयोजन के लिए, स्वर्ण बाण्ड के लिए अभिदत्त स्वर्ण की प्रकृति और उसके अर्जन के स्रोत को, जिसके अन्तर्गत उस धन का स्रोत भी है जिससे स्वर्ण अर्जित किया गया था, प्रकट करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी;

() किसी अभिदाता के विरुद्ध उक्त अधिनियमों में से किसी के अधीन, इस आधार पर कि उक्त अभिदाता स्वर्ण बाण्ड का स्वामी है, कोई जांच या अन्वेषण प्रारंभ नहीं किया जाएगा; और

() इस तथ्य पर कि कोई अभिदाता स्वर्ण बाण्ड का स्वामी है, उक्त अधिनियमों में से किसी के अधीन किसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए ध्यान नहीं दिया जाएगा और वह साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होगा :

                परन्तु इस उपधारा की कोई बात वहां लागू नहीं होगी जहां पूर्वोक्त अधिनियमों में से, किसी के उपबंधों के अनुसार अभिदाता द्वारा अभिदत्त स्वर्ण की बाबत कोई कार्यवाही इस अधिनियम के प्रारंभ से पहले ही शुरू कर दी गई हो

                (2) उपधारा (1) की कोई बात, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 9 या अध्याय 17, स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61), आतंकवादी और विध्वंसक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1987 (1987 का 28) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन दंडनीय किसी अपराध के अभियोजन के संबंध में या किसी सिविल दायित्व के प्रवर्तन के प्रयोजन के लिए लागू नहीं होगी

5. कतिपय दशाओं में स्वर्ण बाण्डों का हिसाब में लिया जाना-धारा 4 के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, -

                                () आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के उपबंध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे-

                                                (i) अभिदाता को स्वर्ण बाण्डों से प्रोद्भूत होने वाला कोई ब्याज;

                                                (ii) अभिदाता को उद्भूत होने वाला कोई दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ;

() दान-कर अधिनियम, 1958 (1958 का 18) के उपबंध वहां लागू नहीं होंगे जहां किसी अभिदाता द्वारा, जो कोई व्यष्टि है, स्वर्ण बाण्ड का दान अपने पति या पत्नी, संतान अथवा माता या पिता को किया जाता है   

6. निरसन और व्यावृत्तियां-(1) स्वर्ण बाण्ड (उन्मुक्ति और छूट) अध्यादेश, 1993 (1993 का अध्यादेश संख्यांक 22) इसके द्वारा निरसित किया जाता है

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी

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